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यूरोप में राष्ट्रवाद ( लघु उत्तरीय प्रश्न ) 

1. राष्ट्रवाद क्या है ?

उत्तर ⇒ सामान्य अर्थों में राष्ट्रवाद का अर्थ अपने राष्ट्र के प्रति सोच और लगाव की भावना का विकास करना है। दूसरे अर्थों में राष्ट्रवाद एक ऐसी भावना है जो किसी विशेष भौगोलिक, सांस्कृतिक या सामाजिक परिवेश में रहने वाले लोगों में एकता की वाहक बनती है।


2. यूरोप में राष्ट्रवाद को फैलाने में नेपोलियन बोनापार्ट किस तरह सहायक हुआ ?

उत्तर ⇒ यूरोप में राष्ट्रीयता की भावना के विकास में फ्रांस की राज्यक्रांति के पश्चात् नेपोलियन के आक्रमणों ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। फ्रांसीसी क्रांति ने राजनीति को अभिजात्यवर्गीय परिवेश से बाहर कर उसे अखबारों, सड़कों और सर्वसाधारण की वस्तु बना दिया। यूरोप के कई राज्यों में नेपोलियन के अभियानों द्वारा नवयुग. का संदेश पहुँचा। नेपोलियन ने जर्मनी और इटली के राज्यों को भौगोलिक नाम की परिधि से बाहर कर उसे वास्तविक एवं राजनैतिक रूपरेखा प्रदान की। जिससे इटली और जर्मनी के एकीकरण का मार्ग प्रशस्त हुआ। दूसरी तरफ नेपोलियन की सुधारवादी नीतियों के कारण फ्रांसीसी प्रभुता और आधिपत्य के विरुद्ध यूरोप में देशभक्तिपूर्ण विक्षोभ भी जगा।


3. 1830 की जुलाई क्रांति का फ्रांस पर क्या प्रभाव पड़ा ?

उत्तर ⇒ 1830 की जुलाई क्रांति के परिणामस्वरूप फ्रांस में निरंकुश राजशाही का स्थान संवैधानिक गणतंत्र ने ले लिया। इस क्रांति ने फ्रांसीसी क्रांति के सिद्धांतों को पुनर्जीवित किया तथा फ्रांस में उदारवादी मध्यमवर्ग का राजनीतिक महत्त्व बढ़ गया।


4. 1848 ई० की फ्रांसीसी क्रांति के क्या कारण थे ?

उत्तर ⇒ 1830 की क्रांति के बाद लुई फिलिप फ्रांस का राजा बना। उसने अपने विरोधियों को खुश करने के लिए ‘स्वर्णिम मध्यमवर्गीय नीति’ अवलंबन करते हुए सन् 1840 में गीजो को प्रधानमंत्री नियुक्त किया, जो कट्टर प्रतिक्रियावादी था। वह किसी भी तरह के वैधानिक, सामाजिक और आर्थिक सुधारों के विरुद्ध था। फिलिप के पास कोई सुधारात्मक कार्यक्रम नहीं था और न ही उसे विदेश नीति में कोई सफलता हासिल हो रही थी। उसके शासनकाल में देश में भुखमरी एवं बेरोजगारी व्याप्त हो गई। सुधारवादियों ने 22 फरवरी, 1848 ई० को पेरिस में थियर्स के नेतृत्व में एक विशाल भोज का आयोजन किया। राजा ने इस पर रोक लगा दी। अतः पेरिस में विरोध प्रदर्शन हुए और जुलूस निकाले गए। इस पर पुलिस ने गोली चला दी। जिसमें अनेक लोग मारे गए। अतः दमनकारी नीति अपनाए जाने के कारण 1848 ई० की क्रान्ति आरंभ हो गई।


5. 1830 और 1848 की क्रांतियों की सामान्य विशेषताएँ क्या थीं ?

उत्तर ⇒ (i) सभी क्रांतिकारी प्रतिक्रियावादी और निरंकुश शासन की समाप्ति चाहते थे।
(ii) वे उदारवाद और राष्ट्रवाद के समर्थक थे।
(iii) वे वैधानिक शासन की मांग कर रहे थे।
(iv) दोनों क्रांतियों की एक मुख्य विशेषता यह भी थी कि स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों की सुरक्षा मुख्य मुद्दा था।


6. बिस्मार्क के कार्यों की चर्चा करें।

उत्तर ⇒ जर्मनी के एकीकरण में बिस्मार्क की, महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। वह विख्यात राष्ट्रवादी और कूटनीतिज्ञ थे। फ्रैंकफर्ट संसद में उसने भाग लिया। वे रूस और फ्रांस में राजदूत भी रहे। 1862 में वह प्रशा का चांसलर बना। सर्वप्रथम बिस्मार्क ने प्रशा की आर्थिक और सैनिक शक्ति सुदृढ़ की। तत्पश्चात उसने डेनमार्क (1864), आस्ट्रिया (1866-सेडोवा का युद्ध) तथा फ्रांस (1870-सीडान का युद्ध) को पराजित कर जर्मनी का एकीकरण किया।


7. लौह एवं रक्त की नीति क्या थी ?

उत्तर ⇒ लौह एवं रक्त की नीति का प्रतिपादन बिस्मार्क ने किया था। इस नीति के अनुसार सैन्य शक्ति की सहायता से पूरे जर्मन प्रदेश का एकीकरण करना था।


8. मेटरनिख कौन था ? यूरोपीय इतिहास में वह क्यों विख्यात है ?

उत्तर ⇒ मेटरनिख ऑस्ट्रिया का चांसलर था। वह घोर प्रतिक्रियावादी, क्राति क संदेशों का कट्टर विरोधी एवं पुरातन व्यवस्था बनाए रखने का समर्थक था। उसन जिस प्रकार की व्यवस्था यूरोप में स्थापित की उसे मेटरनिख व्यवस्था कहा जाता है। अपनी इसी व्यवस्था के कारण वह यूरोपीय इतिहास में विख्यात है।


9. मेटरनिख युग क्या है?

उत्तर ⇒ मेटरनिख ऑस्ट्रिया का चांसलर था। वियना कांग्रेस (सम्मेलन) के द्वारा यूरोप में नेपोलियन युग का अंत हुआ और मेटरनिख युग की शुरुआत हुई। मेटरनिख घोर प्रतिक्रियावादी था तथा राष्ट्रवाद एवं गणतंत्र का विरोधी था। 1848 की क्रांति के द्वारा मेटरनिख युग की समाप्ति हो गयी।


10. जर्मन राइन महासंघ की स्थापना किसने की ?

उत्तर ⇒ जर्मन राइन महासंघ की स्थापना नेपोलियन ने की।


11. जर्मनी का राजनीतिक एकीकरण के पहले आर्थिक एकीकरण कैसे हुआ ?

उत्तर ⇒ 1815-48 के मध्य जर्मनी में औद्योगिकीकरण की पृष्ठभूमि तैयार हो गई। कोयला और खनिज उद्योग का विकास हुआ। रेल लाइनों का प्रसार हुआ। 1834 । में प्रशा की पहल पर जॉल्वेराइन शुल्क संघ की स्थापना हुई। इस प्रकार जर्मनी का राजनीतिक एकीकरण के पहले आर्थिक एकीकरण हुआ।


12. जर्मनी के एकीकरण की बाधाएँ क्या थीं ?

उत्तर ⇒ जर्मनी के एकीकरण में निम्नलिखित प्रमुख बाधाएँ थीं –

(i) लगभग 300 छोटे-बड़े राज्य
(ii) इन राज्यों में व्याप्त राजनीतिक, सामाजिक तथा धार्मिक विषमताएँ
(iii) राष्ट्रवाद की भावना का अभाव
(iv) ऑस्ट्रिया का हस्तक्षेप तथा
(v) मेटरनिख की प्रतिक्रियावादी नीति।


13. इटली के एकीकरण में काबूर की भूमिका का उल्लेख करें। अथवा, काबूर का संक्षिप्त परिचय दें।

उत्तर ⇒ काबूर को इटली के एकीकरण का राजनीतिज्ञ कहा जाता है। 1850 में वह सार्डिनिया के राजा विक्टर इमैनुएल का मंत्री एवं 1852 में प्रधानमंत्री बना। उसने सैनिक और आर्थिक सुधारों द्वारा सार्डिनिया की स्थिति सुदृढ़ की। पेरिस शांति सम्मेलन में उसने इटली के एकीकरण का प्रश्न उठाया। 1859 में ऑस्ट्रिया को पराजित कर काबूर ने लोम्बार्डी पर अधिकार कर लिया।


14. गैरीबाल्डी कौन था ? इटली के एकीकरण में उसकी क्या भूमिका थी ? अथवा गैरीबाल्डी के कार्यों की चर्चा करें।

उत्तर ⇒ इटली के एकीकरण का द्वितीय चरण गैरीबाल्डी की तलवार ने पूरा किया। वह युद्ध की नीति में विश्वास करता था। उसने सशस्त्र युवकों की एक टुकड़ी बनाई जो ‘लाल कुर्ती’ कहलाए। इनकी सहायता से उसने सिसली पर अधिकार कर वहाँ गणतंत्र की स्थापना की। वह पोप के राज्य पर भी आक्रमण करना चाहता था, परंतु काबूर ने इसकी अनुमति नहीं दी।


15. चार्टिस्ट आंदोलन किस देश में हुआ ?

उत्तर ⇒ चार्टिस्ट आंदोलन इंगलैंड में हुआ था।


16. अन्सर्ट रेनन ने राष्ट्रवाद को किस रूप में परिभाषित किया ?

उत्तर ⇒ फ्रांसीसी दार्शनिक अन्सर्ट रेनन ने 19वीं शताब्दी में राष्ट्रवाद की व्याख्या की। रेनन ने राष्ट्रवाद की एक नई और व्यापक परिभाषा दी जिसके अनुसार राष्ट्र एक बड़ी और व्यापक एकता है।


17. वियना कांग्रेस (सम्मेलन) में फ्रांस में किस राजवंश की पुनर्स्थापना की गई ?

उत्तर ⇒ वियना कांग्रेस 1815 द्वारा फ्रांस में बूढे राजवंश की पुनर्स्थापना की गई।


18. हंगरी के राष्ट्रीय आंदोलन में कोसूथ के योगदान का वर्णन करें।

उत्तर ⇒ हंगरी में राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व ‘कोसुथ’ तथा ‘फ्रांसिस डिक’ ने किया। कोस्थ लोकतांत्रिक विचारों का समर्थक था, उसने वर्गहीन समाज (Classless Society) के विचारों से जनता को परिचित कराया जिस पर प्रतिबंध लगा दिया गया। कोसूथ आस्ट्रियाई अधीनता का विरोध कर यहाँ की व्यवस्था में बदलाव की मांग करने लगा।


19. फ्रांसीसी क्रांतिकारियों ने सामूहिक पहचान का भाव बढ़ाने के लिए क्या किया ?

उत्तर ⇒ फ्रांसीसी क्रांति आरंभ होने के साथ ही क्रांतिकारियों ने राष्ट्रीय और सामूहिक पहचान की भावना जगाने वाले कार्य किए। पितृभूमि और नागरिक जैसे शब्दों द्वारा फ्रांसीसियों में एक सामूहिक भावना और पहचान बढ़ाने का प्रयास किया गया। नये संविधान में सभी नागरिकों को समान अधिकार देकर समानता की स्थापना पर बल दिया गया। राजवंशीय झंडा के स्थान पर राष्ट्रध्वज के रूप में एक नया फ्रांसीसी झंडा अपनाया गया जो तिरंगा था। क्षेत्रीय भाषा के स्थान पर फ्रेंच भाषा को प्रोत्साहित किया गया।


20. वियना कांग्रेस की क्या उपलब्धियाँ हैं ?

उत्तर ⇒ वियना सम्मेलन की मुख्य उपलब्धियाँ थी – नेपोलियन द्वारा पराजित राजवंशों की पुनर्स्थापना का प्रयास किया गया। फ्रांस और स्पेन में बूढे राजवंश को फिर स्थापित किया गया। फ्रांस में लुई 18वाँ को राजगद्दी सौंपी गयी। इटली में ऑस्ट्रियाई राज परिवार को सत्ता सौंपी गयी। नेपोलियन द्वारा स्थापित 39 राज्यों के जर्मन महासंघ को भंग नहीं किया गया। इस प्रकार वियना व्यवस्था द्वारा यूरोप में राजनीतिक परिवर्तन कर पुरानी सत्ता को बहाल किया गया।


21. इटली, जर्मनी के एकीकरण में ऑस्ट्रिया की क्या भूमिका थी?

उत्तर ⇒ इटली के एकीकरण के दौरान ही जर्मन क्षेत्र में भी समान प्रक्रियाएँ चल रही थी। इटली के एकीकरण के मार्ग में ऑस्ट्रिया बाधक बना हुआ था। 1830 की क्रांति के बाद इटली में भी नागरिक आंदोलन शुरू हो गए। मेजिनी ने इन नागरिक आंदोलनों का उपयोग करते हुए उत्तरी और मध्य इटली में एकीकृत गणराज्य स्थापित करने का प्रयास किया। लेकिन ऑस्ट्रिया के चांसलर मेटरनिख द्वारा इन राष्ट्रवादी नागरिक आंदोलनों को दबा दिया गया जिससे इटली का एकीकरण रुक गया। जर्मनी में भी राष्ट्रवादी भावना को कुचलने में ऑस्ट्रिया ने मेटरनिख द्वारा दमनकारी कानून कासवाद के आदेश को जारी किया। अतः दोनों देशों के एकीकरण में ऑस्ट्रिया बाधक था।


22. जर्मनी के एकीकरण के लिए बिस्मार्क ने कौन – सी नीति अपनायी ?

उत्तर ⇒ प्रशा का राजा विलियम प्रथम ने प्रख्यात राष्ट्रवादी और कूटनीतिज्ञ बिस्मार्क को अपना प्रधानमंत्री (चांसलर) नियुक्त किया। जर्मनी के एकीकरण के लिए बिस्मार्क ने ‘रक्त और तलवार’ की नीति अपनायी। सबसे पहले बिस्मार्क ने आर्थिक सुधारों के द्वारा प्रशा की स्थिति मजबूत की। इससे सैनिक शक्ति सुदृढ़ हुई। प्रशा के एकीकरण के लिए उसने डेनमार्क, आस्ट्रिया तथा फ्रांस के साथ युद्ध किया। इसके परिणामस्वरूप ही यूरोप के नक्शे पर एकीकृत जर्मन राष्ट्र का उदय हुआ।


23. विलियम – I के बगैर जर्मनी का एकीकरण बिस्मार्क के लिए असंभव था – कैसे ?

उत्तर ⇒ विलियम-I प्रशा काम, राजा जानता था कि ऑस्ट्रिया और फ्रांस को पराजित किए बिना जर्मनी का एकीकरण संभव नहीं है। 1862 में विलियम – ने जर्मनी के एकीकरण के उद्देश्यों को ध्यान में रखकर महान कूटनीतिज्ञ बिस्मार्क को अपना चांसलर नियुक्त किया। बिस्मार्क का मानना था कि जर्मनी की समस्या का समाधान प्रशा के नेतृत्व में “रक्त और तलवार” की नीति से होगा। अतः अगर विलियम-I बिस्मार्क को चांसलर न बनाया होता तो बिस्मार्क के लिए जमना का एकीकरण असंभव प्रतीत होता।


24. यूनानी स्वतंत्रता संग्राम के परिणामों का उल्लेख करें।

उत्तर ⇒ 1932 में यूनान को एक स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र घोषित कर दिया गया। यद्यपि इस प्रक्रिया में गणतंत्र की स्थापना नहीं हो सकी। परंतु एक स्वतंत्र राष्ट्र के उदय ने मेटरनिख की प्रतिक्रियावादी नीति को गहरी ठेस लगाई। प्रतिक्रियावाद के विरुद्ध राष्ट्रवाद की विजय हुई। यूनानियों के विजय से 1830 के क्रांतिकारियों की प्रेरणा मिली। यूनानी स्वतंत्रता आंदोलन के परिणामस्वरूप बाल्कन क्षेत्र के अन्य ईसाई राज्यों में भी राष्ट्रवादी आंदोलन आरंभ करने की चाह बढ़ी।


25. फ्रैंकफर्ट संसद की बैठक क्यों बुलाई गई ? इसका क्या परिणाम हुआ ?

उत्तर ⇒ फैकफर्ट संसद को बैठक बुलाने का मुख्य उद्देश्य जर्मन राष्ट्र के निर्माण को योजना बनाना था। इसके अनसार जर्मन राष्ट्र का प्रधान एक राजा को बनाना था जिसे संसद के नियंत्रण में काम करना था तथा जर्मनी का एकीकरण उसी के नेतृत्व में होना था। लेकिन जब पशा के राजा फ्रेडरिक विलियम चतुर्थ ने यह प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया तो परिणामस्वरूप एसेंबली भंग हो गयी तथा जर्मनी का एकीकरण पुरा नहीं हो सका।



2. समाजवाद एवं साम्यवाद ( लघु उत्तरीय प्रश्न )


1. समाजवादी दर्शन क्या है ?

उत्तर ⇒ समाजवाद उत्पादन में मुख्यतः निजी स्वामित्व की जगह सामूहिक स्वामित्व या धन के समान वितरण पर जोर देता है। समाजवादी, शोषण उन्मुक्त समाज की स्थापना चाहते हैं। समाजवादी व्यवस्था एक ऐसी अर्थव्यवस्था है जिसके अंतर्गत उत्पादन के सभी साधनों, कारखानों तथा विपणन में सरकार का एकाधिकार हो। समाजवादी व्यवस्था में उत्पादन निजी लाभ के लिए न होकर सारे समाज के लिए होता है।


2. समाजवाद क्या है ?

उत्तर ⇒ समाजवाद एक ऐसी विचारधारा है जिसने आधुनिक काल में समाज को एक नया आयाम दिया। समाजवाद उत्पादन में मुख्यतः निजी स्वामित्व की जगह सामूहिक स्वामित्व या धन के समान वितरण पर जोर देता है। यह एक शोषण उन्मुक्त समाज की स्थापना चाहता है।


3. साम्यवाद एक नयी आर्थिक एवं सामाजिक व्यवस्था थी। कैसे ?

उत्तर ⇒ रूस में क्रांति के बाद नई सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था की स्थापना हुई। सामाजिक असमानता समाप्त कर दी गयी। वर्गविहीन समाज का निर्माण कर रूसी समाज का परंपरागत स्वरूप बदल दिया गया। पूँजीपति और जमींदार वर्ग का उन्मूलन कर दिया गया। समाज में एक ही वर्ग रहा, जो साम्यवादी नागरिकों का था। काम के अधिकार को संवैधानिक अधिकार बना दिया गया। व्यक्तिगत संपत्ति समाप्त कर पूँजीपतियों का वर्चस्व समाप्त कर दिया गया। देश की सारी संपत्ति का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया। इस प्रकार, एक वर्गविहीन औरशोषणमुक्त सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था की स्थापना हुई। इस प्रकार हम कह सकते हैं की रूसी क्रांति के बाद साम्यवाद एक नई आर्थिक एवं सामाजिक व्यवस्था थी।


4. रूसी क्रांति के किन्हीं दो कारणों का उल्लेख करें।

उत्तर ⇒ रूसी क्रांति के दो महत्त्वपूर्ण कारण थे – सामाजिक और आर्थिक। रूसी समाज के बहुसंख्यक किसान वर्ग की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। मजदूर तथा श्रमिक भी शोषण के शिकार थे। अत: किसान मजदूर जारशाही के विरोधी बन गए। रूस की आर्थिक स्थिति भी दुर्बल थी। कृषि तथा उद्योग का समुचित विकास नहीं होने तथा युद्धों से रूस की आर्थिक स्थिति दयनीय हो गई। बेरोजगारी और गरीबी बढ़ गई। इससे क्रांतिकारी भावना को बल मिला।


5. रूस की संसद को क्या कहा जाता था ?

उत्तर ⇒ रूस की संसद को ड्यूमा कहा जाता था।


6. रूस में कृषि दासता की प्रथा किस वर्ष समाप्त हुई?

उत्तर ⇒ रूस में कृषि दासता की समाप्ति जार एलेक्जेंडर द्वितीय के द्वारा 1861 ई० में हुई।


7. ‘रूस की क्रांति’ ने पूरे विश्व को प्रभावित किया। किन्हीं दो उदाहरणों द्वारा स्पष्ट करें।

उत्तर ⇒  रूस की क्रांति ने पूरे विश्व को प्रभावित किया। इसके उदाहरण इस प्रकार हैं –

(i) इस क्रांति के पश्चात श्रमिक या सर्वहारा वर्ग की सत्ता रूस में स्थापित हो गई तथा इससे अन्य क्षेत्रों में भी आंदोलन को प्रोत्साहन मिला।

(ii) रूसी क्रांति के बाद विश्व, विचारधारा के स्तर पर दो खेमों में विभक्त हो गया – पूर्वी यूरोप और पश्चिमी यूरोप।

(iii) द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात पूँजीवादी विश्व तथा सोवियत रूस के बीच शीतयुद्ध की शुरुआत हुई और आगामी चार दशकों तक दोनों खेमों के बीच हथियारों की होड़ जारी रही।


8. रूस की क्रांति किसके नेतृत्व में हुई थी ?

उत्तर ⇒ 1917 ई० की रूसी क्राति बोल्शेविक दल के नेता लेनिन के नेतृत्व में हुई थी ।


9. प्रथम विश्वयुद्ध में रूस की पराजय ने क्रांति देता किया। कैसे ?

उत्तर ⇒ प्रथम विश्वयुद्ध में रूस मित्र राष्ट्रों की ओर से शामिल हुआ था जार का मानना था कि युद्ध के अवसर पर जनता सरकार का समर्थन करेगी में आंतरिक विद्रोह कमजोर पड़ जाएगा। परंतु जार को यह इच्छा परी नहीं हो सकी। विश्वयुद्ध में रूस की लगातार हार होती गई। सैनिकों के पास न तो अब अस्त्र-शस्त्र थे और न ही पर्याप्त रसद एवं वस्त्र। रूसी सेना की कमान स्वयं जा ने संभाल रखी थी। पराजय से उसकी प्रतिष्ठा को गहरी ठेस लगी। इस स्थिति से रूसी जनता और अधिक क्रुद्ध हो गयी तथा पूरी तरह से जारशाही को समाप्त के लिए कटिबद्ध हो गई। वस्तुतः प्रथम विश्वयुद्ध में पराजय रूस में क्रांति हेतु मार्ग प्रशस्त किया।


10. रूसीकरण की नीति क्रांति हेतु कहाँ तक उत्तरदायी थी ?

उत्तर ⇒ रूस में विभिन्न प्रजातियों के निवासी थे। इनमें स्लावों की संख्या सबसे अधिक थी। इनके अतिरिक्त फिन, पोल, जर्मन, यहूदी इत्यादि भी थे। ये भिन्न-भिन्न भाषा तथा रीति-रिवाज को मानते थे। इसलिए रूसी सरकार ने देश की एकता के लिए रूसीकरण की नीति अपनाई। जार की नीति थी—”एक जार, एक चर्च और एक रूस।” परंतु रूस का अल्पसंख्यक वर्ग सरकार की इस नीति से व्यग्र हो गया। जार ने देश के सभी लोगों पर रूसी भाषा, शिक्षा और संस्कृति लादने का प्रयास किया। 1863 ई० में इस नीति के विरुद्ध पोलों ने विद्रोह कर दिया जिसे दबा दिया गया। इस प्रकार रूसी राजतंत्र के प्रति उनका आक्रोश बढ़ता गया।


11. निहिलिज्म से आप क्या समझते हैं ? रूस पर इसका क्या प्रभाव पड़ा ?

उत्तर ⇒ रूसी नागरिकों का एक वर्ग ऐसा था जो चाहता था कि रूस में सुधार आन्दोलन जार के द्वारा किए जाएँ। जार एलेक्जेंडर द्वितीय ने कई सुधार कार्यक्रम भी चलाए, परंतु इससे सुधारवादी संतुष्ट नहीं हुए। इनमें से कुछ ने निहिलिस्ट आंदोलन आरंभ किए। ये निहिलिस्ट के नाम से जाने जाते थे। ये स्थापित व्यवस्था को आतंक का सहारा लेकर समाप्त करना चाहते थे। 1881 में जार एलेक्जेंडर द्वितीय की हत्या निहिलिस्टों ने कर दी। इन निहिलिस्टों के विचारों से प्रभावित होकर क्रांतिकारी जारशाही के विरुद्ध एकजूट होने लगे।


12. बौद्धिक जागरण ने रूसी क्रांति को किस प्रकार प्रभावित किया ?

उत्तर ⇒ 19 वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में रूस में बौद्धिक जागरण हुआ, जिसने लोगो का निरंकुश राजतंत्र के विरुद्ध बगावत करने की प्रेरणा दी। अनेक विख्यात लेखकों और बुद्धिजीवियों – लियो टॉलस्टाय, ईवान तुर्गनेव, फ्योदोर दोस्तोवस्की, मैक्सिम गोर्की ने अपनी रचनाओं द्वारा सामाजिक अन्याय एवं भ्रष्ट राजनीतिक व्यवस्था का विरोध कर एक नए प्रगतिशील समाज के निर्माण का आह्वान किया। रूसी लोग विशेषतः किसान और मजदूर कार्ल मार्क्स के दर्शन से गहरे रूप से प्रभावित हुए। वे शोषण और अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष करने को तत्पर हो गए।


13. नई आर्थिक नीति मार्क्सवादी सिद्धान्तों के साथ कैसे समझौता थी ?

उत्तर ⇒– साम्यवादी व्यवस्था में व्यक्तिगत सम्पत्ति की अवधारणा नहीं थी। परंतु लेनिन ने तत्कालीन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए किसानों को जमीन का स्वामित्व दिया। व्यक्तिगत स्वामित्व में उद्योग चलाने का भी अधिकार नई आर्थिक नीति में दिया गया। स्पष्टतः यह नीति मार्क्सवादी सिद्धांतों के साथ समझौता थी परंतु इससे सोवियत संघ की अर्थव्यवस्था में सुधार हुआ।


14. स्टालिन का परिचय दीजिए।

उत्तर ⇒ लेनिन के बाद सत्ता स्टालिन के हाथों में आई। सोवियत संघ ने विकास के लिए उसने तीन पंचवर्षीय योजनाओं द्वारा औद्योगीकरण को बढ़ावा दिया। कृषि, शिक्षा में सुधार किया तथा श्रमिकों की स्थिति को बेहतर बनाने का प्रयास किया। साथ ही उसने ऐसी नीति बनाई जिससे सर्वाधिकारी शासन की स्थापना हुई।


15. 1917 की बोल्शेविक क्रांति एक सर्वहारा क्रांति थी। स्पष्ट करें।

उत्तर ⇒ 1917 की बोल्शेविक क्रांति के पश्चात रूस ने सर्वहारा वर्ग को अनेक सुविधाएँ प्राप्त हुई। किसानों और मजदूरों को मतदान के अतिरिक्त अन्य राजनीतिक अधिकार मिले। व्यक्तिगत संपत्ति की समाप्ति तथा उद्योगों का राष्ट्रीयकरण किया गया, जिससे एक वर्गहीन समाज का निर्माण तथा सामाजिक समानता की स्थापना हुई। इन परिवर्तनों से रूस में किसानों तथा मजदूरों का सम्मान बढ़ा। इसलिए 1917 की वोल्शेविक क्रांति को सर्वहारा क्रांति कहा जाता है।


16. सर्वहारा वर्ग किसे कहते हैं ?

उत्तर ⇒ सर्वहारा वर्ग समाज का वैसा वर्ग है जिसमें किसान, मजदूर एवं आम गरीब लोग शामिल होते हैं। मार्क्स के अनुसार सर्वहारा वर्ग मजदुरों तथा श्रमिकों का वर्ग था जो सुविधाविहिन वर्ग था जिसे कोई अधिकार प्राप्त नहीं था। यह पुँजीपतियों के द्वारा शोषित तथा उपेक्षित वर्ग था।


17. शीतयुद्ध से आपका क्या अभिप्राय है ?

उत्तर ⇒ शीतयुद्ध प्रत्यक्ष युद्ध न होकर वाकद्वन्द्व द्वारा एक – दूसरे राष्ट्र को नीचा दिखाने का वातावरण है। द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात पूँजीवादी राष्ट्रों और रूस के बीच इसी प्रकार का शीतयुद्ध चलता रहा।


18. रासपुटिन कौन था ?

उत्तर ⇒ रासपुटिन जार निकोलस II का गुरु था जो एक भ्रष्ट, बदनाम और रहस्यमय पादरी था।


19. खूनी रविवार क्या है ?

उत्तर ⇒ रूस में 9 जनवरी, 1905 को लोगों का समूह ‘रोटी दो’ के नारे के साथ सड़कों पर प्रदर्शन करते हुए सेंट पीट्सवर्ग स्थित महल की ओर जा रहा था, परंतु जार की सेना इन निहत्थे लोगों पर गोलियाँ बरसाई जिसमें हजारों लोग मारे गए। इसलिए इस दिन को रूस में खूनी रविवार (लाल रविवार) के नाम से जाना जाता है।


20. रॉबर्ट ओवेन का संक्षिप्त परिचय दें।

उत्तर ⇒ इंगलैंड में समाजवाद का प्रवर्तक रॉबर्ट ओवेन को माना जाता है। इंगलैंड में औद्योगिक क्रांति के परिणामस्वरूप श्रमिकों के शोषण को रोकने हेतु ओवेन ने एक आदर्श समाज की स्थापना का प्रयास किया। उसने स्कॉटलैंड के न्यूलूनार्क नामक स्थान पर एक आदर्श कारखाना और मजदूरों के आवास की व्यवस्था की। इसमें श्रमिकों को अच्छा भोजन, आवास और उचित मजदूरी देने की व्यवस्था की गयी।


21. कार्ल मार्क्स के विषय में आप क्या जानते हैं ?

उत्तर ⇒ कार्ल मार्क्स का जन्म जर्मनी के राइन प्रांत के ट्रियर नगर में एक यहूदी परिवार में हुआ था। मार्क्स पर रूसो, मांटेस्क्यू एवं हीगले की विचारधारा का गहरा प्रभाव था। मार्क्स और एंगेल्स ने मिलकर 1848 में कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो अथवा साम्यवादी घोषणा-पत्र प्रकाशित किया। मार्क्स ने पूँजीवाद की घोर भर्त्सना की और श्रमिकों के हक की बात उठायी। उसने ‘दुनिया के मजदूरों एक हों’ का नारा दिया। मार्क्स ने अपनी विख्यात पुस्तक दास केपिटल का प्रकाशन 1867 में किया जिसे “समाजवादियों की बाइबिल” कहा जाता है।


22. रूस में प्रति – क्रांति क्यों हुई ? बोल्शेविक सरकार ने इसका सामना कैसे किया ?

उत्तर ⇒ बोल्शेविक क्रांति की नीतियों से वैसे लोग व्यग्र हो गए जिनकी संपत्ति और अधिकारों को नई सरकार ने छीन लिया था। अतः सामंत, पादरी, पूँजीपति, नौकरशाह सरकार के विरोधी बन गए। वे सरकार का तख्ता पलटने का प्रयास कर रहे थे। उन्हें विदेशी सहायता भी प्राप्त थी। लेनिन ने प्रति क्रांतिकारियों का कठोरता पूर्वक दमन करने का निश्चय किया। इसके लिए ‘चेका’ नामक विशेष पुलिस दस्ता का गठन किया गया। इसने निर्ममतापूर्वक हजारों षडयंत्रकारियों को मौत के घाट उतार दिया। चेका के लाल आतंक ने षडयंत्रकारियों की कमर तोड़ दी।


23. 1917 ई० की क्रांति के समय रूस में किस राजवंश का शासन था ? इस शासन का स्वरूप क्या था ?

उत्तर ⇒ 1917 ई० की क्रांति के पूर्व रूस में रोमोनोव वंश का शासन था। इस वंश के शासन का स्वरूप स्वेच्छाचारी राजतंत्र था। रूस का सम्राट जार अपने आपको ईश्वर का प्रतिनिधि समझता था। वह सर्वशक्तिशाली था तथा राज्य की सारी शक्तियाँ उसी के हाथों में केंद्रित थी। राज्य के अतिरिक्त वह रूसी चर्च का भी प्रधान था। प्रशा जार और उसके अधिकारियों से त्रस्त था।


24. मेन्शेविकों और बोल्शेविक के विषय में आप क्या जानते हैं ?

उत्तर ⇒ रूस की बोल्शेविक क्रांति मेन्शेविकों (अल्पमतवाले साम्यवादियों) और वोल्शेविकों (बहुमतवाले साम्यवादियों) के बीच सत्ता संघर्ष का परिणाम थी। रूस में राजतंत्र की समाप्ति के बाद सत्ता मेन्शेविक दल के नेता करेन्सकी के हाथों में आई, परंतु उसकी सरकार अलोकप्रिय थी। मेन्शेविक संवैधानिक रूप से देश में राजनीतिक परिवर्तन चाहते थे तथा मध्यमवर्गीय क्रांति के समर्थक थे। परंतु, बोल्शेविक क्रांति के द्वारा परिवर्तन लाना चाहते थे जिसमें मजदूरों की विशेष भूमिका हो। बोल्शेविक दल के नेता लेनिन ने ट्रॉटस्की की सहायता से केरेन्सी की सरकार का तख्ता पलट दिया।


25. क्रांति से पूर्व रूसी किसानों की स्थिति कैसी थी ?

उत्तर ⇒ रूस में जनसंख्या का बहुसंख्यक भाग कृषक ही थे परंतु उनकी स्थिति अत्यंत दयनीय थी। कृषि दासता समाप्त कर दी गई थी परंतु किसानों की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ था। उनके पास पूँजी का अभाव था तथा करों के बोझ से वे दबे हुए थे।


26. स्वप्नदर्शी (यूटोपियन) समाजवादियों के विषय में आप क्या जानते हैं ?

उत्तर ⇒ स्वप्नदर्शी (यूटोपियन) आरंभिक समाजवादी चिन्तक थे जिन्होंने पूँजी और श्रम के बीच सम्बन्धों की समस्या का निराकरण करने का प्रयास किया। उनकी दृष्टि आदर्शवादी थी। वे उच्च और अव्यावहारिक आदर्श से प्रभावित होकर ‘वर्ग-संघर्ष’ की नहीं बल्कि ‘वर्ग समन्वय’ की बात करते थे। स्वप्नदर्शी समाजवादियों में सेंट साइमन, चार्ल्स फूरिए, लुई ब्लाँ तथा रॉबर्ट ओवेन के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है।


27. 1881 ई० में जार एलेक्जेंडर द्वितीय की हत्या किसने की ?

उत्तर ⇒ रूस के शासक जार एलेक्जेंडर द्वितीय की हत्या 1881 ई० में निहिलिस्टो ने कर दी थी।


28. कौमिण्टर्न की स्थापना क्यों की गई ? इसका क्या महत्त्व था ?

उत्तर ⇒ लेनिन का एक महत्त्वपूर्ण कार्य था 1919 ई० में मास्को में थर्ड इंटरनेशनल की स्थापना करना। मार्क्सवाद का प्रचार करने एवं विश्व के सभी मजदूरों को संगठित करने के उद्देश्य से विभिन्न देशों के साम्यवादी दलों के प्रतिनिधि मास्को में एकत्रित हुए। वहीं पर सभी देशों की साम्यवादी पार्टियों का एक संघ बनाया गया जो कौमिण्टर्न कहलाया। इसका मुख्य कार्य विश्व में क्रांति का प्रचार करना एवं साम्यवादियों की सहायता करना था। कौमिण्टर्न का नेतृत्व रूस के साम्यवादी दल के पास रहा। लेनिन के इस कार्य से पूँजीवादी देशों में बेचैनी फैल गयी। रूस से मधुर संबंध बनाने को वे बाध्य हो गए। इंगलैंड ने 1921 में रूस से व्यापारिक संधि कर ली। 1924 तक इटली, जर्मनी, इंगलैंड ने रूस की बोल्शेविक सरकार को मान्यता प्रदान कर दी।

3.हिन्द-चीन में राष्ट्रवाद

1 हो – ची – मिन्ह के संबंध में लिखें।

उत्तर ⇒ हो-ची-मिन्ह साम्यवाद से प्रभावित था। उसने 1925 ई० में ‘वियतनामी क्रांतिकारी दल’ का गठन किया एवं फ्रांसीसी साम्राज्यवाद से लड़ने के लिए कार्यकर्ताओं के सैनिक प्रशिक्षण की व्यवस्था भी की। 1930 ई० में राष्टवादी गटों को एकत्रित कर वियतनाम कांग सान देंग अर्थात् वियतनामी कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना की। विश्वव्यापी आर्थिक मंदी एवं फ्रांसीसी सरकार की क्रूरता के कारण हो-ची-मिन्ह ने राष्ट्रवादी आंदोलन को तीव्र किया।


2. हो-ची-मिन्ह मार्ग क्या है ? बताएँ।

उत्तर – हो – ची – मिन्ह हनोई से चलकर लाओस-कम्बोडिया के सीमा क्षेत्र से गुजरता हुआ दक्षिणी वियतनाम तक जाता था। इसमें सैकड़ों कच्ची – पक्की सड़कें निकलकर पूरे वियतनाम से जुड़ी थी। यह वियतनामियों का रसद सप्लाई मार्ग था। यह मार्ग काफी मजबूत था। अमेरिका सैकड़ों बार इस पर बमबारी कर चुका था, परन्तु वियतकांग एवं उनके समर्थित लोग तुरंत उसकी मरम्मत कर लेते थे। चूँकि हो – ची – मिन्ह मार्ग वियतकांग की जीवन-रेखा थी, अत: अमेरिका इस पर नियंत्रण करना चाहता था। इसी क्रम में उसने लाओस एवं कम्बोडिया पर आक्रमण भी किया। किंतु तीन तरफा संघर्ष में फँसकर उसे वापस होना पड़ा था।


3. हिंद – चीन का अर्थ क्या है ?

उत्तर ⇒ एशिया के हिंद – चीन देशों से अभिप्राय तत्कालीन समय में लगभग 3 लाख (2.80 लाख) वर्ग किमी० में फैले उस प्रायद्वीपीय क्षेत्र से है जिसमें आज के वियतनाम, लाओस और कंबोडिया के क्षेत्र आते हैं। इनकी उत्तरी सीमा म्यांमार एवं चीन को छूती है तो दक्षिण में चीन सागर है और पश्चिम में म्यांमार के क्षेत्र पड़ते हैं।


4. अमेरिका हिन्द – चीन में कैसे दाखिल हुआ, चर्चा करें

उत्तर ⇒ अमेरिका शुरू में फ्रांस का सहयोग कर रहा था लेकिन साम्यवादियों के बढ़ते प्रभाव को रोकने हेतु अमेरिका हिन्द – चीन में दाखिल हुआ। दूसरी तरफ कंबोडिया का शासक सिंहानुक अमेरिका से संबंध विच्छेद कर चीन की ओर झुका जिससे अमेरिका को कंबोडिया में हस्तक्षेप करने का अवसर मिला। साथ ही सिंहानुक साम्यवादी रूस और पूर्वी जर्मनी से संबंध बढ़ाना आरंभ कर दिया। अमेरिका कंबोडिया या पूरे हिन्द चीन में साम्यवादी प्रभाव को बढ़ाना नहीं चाहता था इसलिए उसने हिन्द – चीन में हस्तक्षेप किया।


5. रासायनिक हथियारों नापाम एवं एजेन्ट ऑरेंज का वर्णन करें।

उत्तर ⇒ अमेरिका ने वियतनाम पर आक्रमण में खतरनाक हथियारों, टैंकों एवं बमवर्षक विमानों के व्यापक प्रयोग के साथ-साथ खतरनाक रासायनिक हथियारों का भी प्रयोग किया। ऐसे ही कुछ रासायनिक हथियार थे—नापाम बम, एजेन्ट ऑरेन्ज। नापाम बम में नापाम एक कार्बनिक यौगिक होता है जो अग्नि बमों में गैसोलिन के साथ मिलकर एक ऐसा मिश्रण तैयार करता है जो त्वचा से चिपक जाता और जलता रहता है।
एजेंट ऑरेंज एक ऐसा जहर था जिससे पेड़ों की पत्तियाँ झुलस जाती थी तथा पेड़ मर जाते थे। जंगलों को खत्म करने में इसका प्रयोग किया जाता था।


6. होआ – होआ आंदोलन की चर्चा करें।

उत्तर ⇒ होआ – होआ वियतनाम के एकीकरण हेतु बौद्ध धर्मावलंबियों का एक धार्मिक क्रातिकारी आंदोलन था जो 1939 में शुरू हुआ था। इसके नेता हुइन्ह-फूसो । था। इस आंदोलन में क्रांतिकारी उग्रवादी घटनाओं को भी अंजाम देते थे, जिसमें आत्मदाह तक भी शामिल होता था।


7. वियतनाम में स्कॉलर्स रिवोल्ट क्यों हुआ ?

उत्तर ⇒ वियतनाम में ईसाई मिशनरियों के बढ़ते प्रभाव को समाप्त करने के लिए 1868 में ईसाईयत के विरुद्ध एक सशक्त आंदोलन हुआ। यह आंदोलन स्कालर्स रिवोल्ट अथवा विद्वानों के विद्रोह के नाम से जाना जाता है। इस आंदोलन को राजदरबार के अधिकारियों ने चलाया। वे कैथोलिक (ईसाई) धर्म के प्रचार और वियतनाम पर फ्रांसीसी आधिपत्य के विरोधी थे। इस आंदोलन का जोर सबसे अधिक न्गूएन और हातिएन प्रांतों में था जहाँ हजारों ईसाइयों को मार डाला गया।


8. जेनेवा – समझौता कब और किसके बीच हुआ ?

उत्तर ⇒ 1954 में जेनेवा समझौता फ्रांस और वियतनाम के बीच अमेरिकी हस्तक्षेप के कारण हुआ था।


9. पाथेट लाओ की स्थापना क्यों की गई ?

उत्तर ⇒ पाथेट लाओ एक सैन्य संगठन था। इसकी स्थापना का कारण यह था कि वह इसकी सहायता से लाओस में साम्यवादी व्यवस्था स्थापित करना चाहता था जिसकी स्थापना सुफन्न बोंग ने की थी।


10. एकतरफा अनुबंध व्यवस्था क्या थी ?

उत्तर ⇒ वियतनामी मजदूरों से बागानों में ‘एकतरफा अनुबंध व्यवस्था’ के अंतर्गत काम करवाया जाता था। इस व्यवस्था में मजदूरों को एकरारनामा के अंतर्गत जो बागान मालिकों और मजदूरों के बीच होता था, काम करना पड़ता था। इस व्यवस्था में मजदूरों को कोई अधिकार नहीं था, जबकि मालिक को असीमित अधिकार प्राप्त होते थे।


11. माई – ली – गाँव हत्याकांड का परिचय दें।

उत्तर ⇒ माई – ली दक्षिणी वियतनाम का एक गाँव था जहाँ के लोगों का वियतकांग समर्थक मानकर अमेरिकी सेना ने पूरे गाँव को घेरकर पुरुषों को मार डाला। औरतों तथा बच्चियों को बंधक बनाकर कई दिनों तक सामूहिक बलात्कार किया फिर उन्हें मारकर पूरे गाँव में आग लगा दिया गया। अमेरिकी सेना की इस बर्बरतापूर्वक कार्रवाई की संपूर्ण विश्व में आलोचना हुई थी।


12. फ्रांसीसियों ने मेकांग डेल्टा में नहरें क्यों बनवाई ? इसका क्या परिणाम हुआ ?

उत्तर ⇒ फ्रांसीसियों ने कृषि के विस्तार के लिए मेकांग डेल्टा क्षेत्र में सिंचाई की सुविधा के लिए नहरें बनवाई। सिंचाई की समुचित व्यवस्था उपलब्ध होने से धान की खेती और उत्पादन में आश्चर्यजनक रूप से वृद्धि हुई, जिसके परिणामस्वरूप 1931 तक वियतनाम विश्व का तीसरा चावल निर्यातक देश बन गया।


13. जेनेवा समझौता के प्रावधानों का वर्णन करें।

उत्तर ⇒ 1954 के जेनेवा समझौता के द्वारा इंडो-चीन के लाओस और कंबोडिया स्वतंत्र कर दिए गए। दोनों राज्यों में वैध राजतंत्र एवं संसदीय व्यवस्था लागू की गयी। वियतनाम का विभाजन अस्थायी रूप से दो भागों में कर दिया गया –

(i) उत्तरी वियतनाम
(ii) दक्षिणी वियतनाम। दोनों राज्यों की विभाजक रेखा सत्रहवीं समानातर बनाई गई। उत्तरी वियतनाम में हो-ची-मिन्ह की कम्यनिस्ट सरकार को मान्यता दी गई। दक्षिणी वियतनाम में बाओदाई की सरकार बनी रही। यह भी व्यवस्था की गई कि 1956 में पूरे वियतनाम के लिए चुनाव करवाए जाएंगे।


14. लाओस एवं कंबोडिया पर भारतीय प्रभाव का वर्णन करें।

उत्तर ⇒ लाओस एवं कंबोडिया पर भारतीय संस्कृति का प्रभाव था। इस क्षेत्र में बौद्ध धर्म एवं हिंदू धर्म दोनों का प्रसार हुआ। चौथी सदी में स्थापित कंबोज राज्य के शासक भारतीय मूल के थे। अतः कंबोज भारतीय संस्कृति का प्रधान केंद्र बना। बारहवीं सदी में राजा सूर्यवर्मन ने प्रसिद्ध अंकोरवाट के मंदिर का निर्माण करवाया। यह हिंदू धर्म का विश्व में सबसे बड़ा मंदिर है। सोलहवीं सदी में कंबोज का पतन हो गया और इसके बाद वहाँ आंतरिक अव्यवस्था की स्थिति उत्पन्न हो गयी।


15. वियतनाम में टोंकिन फ्री-स्कूल क्यों स्थापित किए गए ?

उत्तर ⇒ 1907 में वियतनाम में टोंकिन फ्री स्कूल स्थापित किए गए जिसका उद्देश्य वियतनामियों को पश्चिमी शिक्षा दिलाना था। सामान्य शिक्षा के अतिरिक्त इस शिक्षा में विज्ञान, स्वच्छता तथा फ्रांसीसी भाषा की शिक्षा देने की भी व्यवस्था की गई। स्कूल में वियतनामियों को आधुनिक बनाने पर बल दिया गया। छात्रों को पश्चिमी शिक्षा के अतिरिक्त रहन-सहन की यूरोपीय शैली अपनाने की भी शिक्षा दी गई।


16. बाओदायी कौन था ?

उत्तर ⇒ बाओदायी फ्रांस एवं अमेरिका के समर्थन से दक्षिण वियतनाम के प्रांत अन्नाम का शासक बना था। लेकिन वियतनाम में साम्यवादी राष्ट्रवादियों के बढ़ते विरोध के कारण उसका टिकना कठिन साबित हुआ। इसलिए 25 अगस्त, 1945 को बाओदायी ने अपना पद त्याग दिया।


17. 1970 में जकार्ता सम्मेलन क्यों बुलाया गया ?

उत्तर ⇒ कंबोडिया में अमेरिकी हस्तक्षेप के साथ ही चीनी हस्तक्षेप भी शुरू हुआ। इससे विश्वशांति को खतरा उत्पन्न हुआ। अमेरिका ने कंबोडिया से अपनी सेना की वापसी की घोषणा की लेकिन दक्षिण वियतनाम कंबोडिया से अपनी सेना हटाने को तैयार नहीं हुआ। इससे गंभीर स्थिति बन गई। इसी समस्या के समाधान के लिए मई, 1970 में जकार्ता सम्मेलन (ग्यारह एशियाई देशों का सम्मेलन) बुलाया गया।

4. भारत में राष्ट्रवाद

1. भारत में राष्ट्रवाद के उदय के सामाजिक कारणों पर प्रकाश डालें।

उत्तर ⇒ भारतीय राष्ट्रवाद के उदय के सामाजिक कारणों में प्रमुख था – अंगरेजों की प्रजातीय विभेद की नीति। अंग्रेज अपने को श्रेष्ठ तथा भारतीयों को उपेक्षा तथा हेय की दृष्टि से देखते थे। भारतीयों पर अनेक प्रतिबंध थे जैसे रेलगाड़ी, क्लबा, होटलों में वे सफर या प्रवेश नहीं कर सकते थे, जिसमें अंग्रेज हों। सरकारी सवाआ में अंग्रेजों की पक्षपातपूर्ण नीति ने भी राष्ट्रवाद की भावना को प्रेरित किया। सरकारी नागरिक सेवा में भारतीयों का प्रवेश काफी मुश्किल था। बहुत बार परीक्षा में सफल होने के बाद भी उन्हें या तो नियक्त नहीं किया जाता था या अकारण नोकरी से हटा दिया जाता था। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी के साथ भी ऐसा ही किया गया। न भारतीय शिक्षित मध्यम वर्ग मर्माहत हो गया जिसने राष्ट्रवाद के विकास म महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।


2. भारत में राष्ट्रवाद उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलन से कैसे विकसित हुआ ?

उत्तर ⇒ हिंद – चीन के समान भारत में भी राष्ट्रवाद का उदय और विकास औपनिवेशिक शासन के प्रतिक्रिया स्वरूप हुआ। 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध से अंग्रेजी राज की प्रशासनिक, आर्थिक और अन्य नीतियों के विरुद्ध असंतोष की भावना बलवती होने लगी। भारत के राजनीतिक और प्रशासनिक एकीकरण पाश्चात्य शिक्षा के प्रचार, मध्यवर्ग के उदय, सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों, साहित्य और समाचार-पत्रों के विकास तथा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के राष्ट्रवाद की अवधारणा को उत्तेजना प्रदान की।


3. प्रथम विश्वयुद्ध के भारत पर हुए प्रभावों का वर्णन करें।

उत्तर ⇒ प्रथम विश्वयद्ध का भारत पर गहरा प्रभाव पड़ा था। विश्वयद्ध के आर्थिक और राजनीतिक परिणामों से राष्ट्रीय आंदोलन भी प्रभावित हुआ। ब्रिटेन ने भारतीय नेताओं की सहमति लिए बिना भारत को युद्ध में घसीट लिया था। कांग्रेस, उदारवादियों और भारतीय रजवाड़ों ने इस उम्मीद से अंगरेजी सरकार को समर्थन दिया कि युद्ध के बाद उन्हें स्वराज की प्राप्ति होगी, परंतु ऐसा नहीं हुआ। प्रथम विश्वयुद्ध ने भारतीय अर्थव्यवस्था को अव्यवस्थित कर दिया जिससे जनता की स्थिति काफी बेहतर हो गई। विश्वयुद्ध का प्रभाव राजनीतिक गतिविधियों पर भी पड़ा। विश्वयुद्ध के दौरान क्रांतिकारी गतिविधियाँ काफी बढ़ गई तथा राष्ट्रवादी आंदोलन को बल मिला।


4. साइमन कमीशन का गठन क्यों किया गया ? भारतीयों ने इसका विरोध क्यों किया ?

उत्तर ⇒ 1919 ई० के ‘भारत सरकार अधिनियम’ में यह व्यवस्था की गई थी कि दस वर्ष के बाद एक ऐसा आयोग नियक्त किया जाएगा जो इस बात की जाँच करेगा कि इस अधिनियम में कौन-कौन से परिवर्तन संभव है। अतः ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने समय से पूर्व सर जॉन साइमन के नेतृत्व में 8 नवंबर, 1927 को साइमन कमीशन की स्थापना की। इसके सभी 7 सदस्य अंग्रेज थे। इस कमीशन का उद्देश्य संवैधानिक सुधार के प्रश्न पर विचार करना था। इस कमीशन में किसी भी भारतीय को शामिल नहीं किया गया जिसके कारण भारत में इस कमीशन का तीव्र विरोध हुआ।


5. मुस्लिम लीग ने भारतीय राजनीति को किस प्रकार प्रभावित किया ?

उत्तर ⇒ मुस्लिम लीग ने कांग्रेस के विरुद्ध अंग्रेजी सरकार का साथ दिया। इस कारण सरकार ने मुसलमानों को पृथक निर्वाचन क्षेत्र, व्यवस्थापिका सभा में प्रतिनिधित्व आदि सुविधाएँ दी थी। इन सुविधाओं के कारण हिंदू तथा मुसलमानों में मतभेद उत्पन्न हुआ जिससे राष्ट्रीय आंदोलन पर बुरा असर पड़ा। जिन्ना के नेतत्व में लीग ने 14-सूची माँग रखकर भारत के विभाजन में सहायता की।


6. स्वराज पार्टी की स्थापना एवं उद्देश्य की विवेचना करें।

उत्तर ⇒ असहयोग आंदोलन की एकाएक समाप्ति से उत्पन्न निराशा और क्षोभ का प्रदर्शन 1022 में कांग्रेस के गया अधिवेशन में हुआ जिसके अध्यक्ष चितरंजन दास थे। चितरंजन दास और मोती लाल नेहरू ने कांग्रेस से असहमत होकर पदत्याग करते हुए 1922 ई० में स्वराज पार्टी की स्थापना की।
स्वराज पार्टी के नेताओं का मुख्य उद्देश्य था देश के विभिन्न निर्वाचनों में भाग लेकर व्यावसायिक सभाओं एवं सार्वजनिक संस्थाओं में प्रवेश कर सरकार के कामकाज में अवरोध पैदा किया जाए। वे अंग्रेजों द्वारा भारत में चलाई गयी सरकारी परंपराओं का अंत चाहते थे। उनकी नीति थी नौकरशाही की शक्ति को कमजोर कर दमनकारी कानूनों का विरोध करना और राष्ट्रीय शक्ति का विकास करना एवं आवश्यकता पड़ने पर पदत्याग कर सत्याग्रह में भाग लेना।


7. गाँधीजी ने चंपारण में किस व्यवस्था के विरुद्ध किसानों को संघर्ष के लिए प्रेरित किया ?

उत्तर ⇒ गाँधीजी चंपारण में तिनकठिया व्यवस्था के विरुद्ध किसानों को संघर्ष के लिए प्रेरित किया।


8. गाँधीजी ने खिलाफत आंदोलन को समर्थन क्यों दिया ?

उत्तर ⇒ गाँधीजी ने हिन्दू – मुस्लिम एकता के लिए खिलाफत आंदोलन का समर्थन किया, क्योंकि गाँधीजी को भारत में एक बड़ा जन-आंदोलन ‘असहयोग आन्दोलन’ चलाना था।


9. चंपारण आंदोलन कब हुआ तथा इसके क्या कारण थे ?

उत्तर ⇒ चंपारण आंदोलन अप्रैल 1917 ई० में बिहार के चंपारण जिले में हुआ था। बिहार में निल्हे गोरों द्वारा तिनकठिया व्यवस्था प्रचलित थी जिसमें किसान को अपनी भमि के 3/20 हिस्से में नील की खेती करनी होती थी। किसान नील की खेती नहीं करना चाहते थे क्योंकि इससे भमि की उर्वरा कम हो जाती थी। उसे उत्पादन का उचित कीमत भी नहीं मिलता था जिससे उसकी स्थिति दयनीय हो गई थी। किसानों के पक्ष को लेकर महात्मा गाँधी ने चंपारण में सत्याग्रह आंदोलन की शुरुआत की। ब्रिटिश सरकार को अंततः झुकना पड़ा।


10. समाजवादी दल का गठन क्यों हुआ ?

उत्तर ⇒ 20वीं शताब्दी के तीसरे दशक से भारत में समाजवादी विचारधारा का भी उदय और विकास हुआ। समाजवादी भी किसानों और मजदूरों की दयनीय स्थिति में सुधार लाना चाहते थे। विश्वव्यापी आर्थिक मंदी (1929-30) ने सबसे अधिक बुरा प्रभाव श्रमिकों और किसानों पर ही डाला। अतः समाजवादियों ने अपना ध्यान इन पर केंद्रित किया। कांग्रेस के अंदर वामपंथी के अतिरिक्त समाजवादी विचारधारा भी पनपने लगी। नेहरू-सुभाष के अतिरिक्त जयप्रकाश नारायण, नरेंद्र देव, राम मनोहर लोहिया, अच्युत पटवर्धन सरीखे नेता समाजवादी कार्यक्रम अपनाने की माँग करने लगे। इनके प्रयासों से 1934 में कांग्रेस समाजवादी दल की स्थापना की गई।


11. गाँधीजी ने असहयोग आंदोलन क्यों आरंभ किया ? यह प्रथम जनआंदोलन कैसे था ?

उत्तर ⇒ रॉलेट कानून, जालियाँवाला बाग हत्याकांड के विरोध में तथा खिलाफत आंदोलन के समर्थन में गाँधीजी ने असहयोग आंदोलन चलाने का निर्णय लिया। इसका उद्देश्य स्वराज्य की प्राप्ति था। इसमें समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों ने पहली बार व्यापक रूप से भाग लिया। शहरी मध्यमवर्ग की इसमें मुख्य भागीदारी रही। ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों, मजदूरों तथा आदिवासियों ने भी इस आंदोलन में भाग लिया। इस प्रकार, यह प्रथम जनआंदोलन बन गया।


12. 1932 के पूना समझौता का क्या परिणाम हुआ ?

उत्तर ⇒ 26 सितंबर, 1932 को पूना में गाँधीजी और डा० अंबेदकर के बीच पूना समझौता हुआ जिसके परिणामस्वरूप दलित वर्गों (अनुसूचित जातियों) के लिए प्रांतीय और केंद्रीय विधायिकाओं में स्थान आरक्षित कर दिए गए। गाँधीजी ने अपना अनशन तोड़ दिया और हरिजनोद्धार कार्यों में लग गए।


13. रॉलेट एक्ट से आप क्या समझते हैं? इसका विरोध क्यों हुआ ?

उत्तर ⇒ भारत में बढ़ती हुई राष्ट्रवादी घटनाओं एवं असंतोष को दबाने के लिए रॉलेट एक्ट को लाया गया था जिसके अंतर्गत सरकार किसी भी व्यक्ति को बिना साक्ष्य एवं वारंट के भी गिरफ्तार कर सकती थी। इस अधिनियम के अंतर्गत एक विशेष न्यायालय के गठन का प्रावधान था जिसके निर्णय के विरुद्ध कोई अपील नहीं की जा सकती थी। इसीलिए इसका विरोध हुआ।


14. गाँधीजी ने दांडी यात्रा क्यों की? इसका क्या परिणाम हआ ?

उत्तर ⇒ नमक के व्यवहार और उत्पादन पर सरकारी नियंत्रण था। गाँधीजी इसे अन्याय मानते थे एवं इसे समाप्त करना चाहते थे। नमक कानून भंग करने के लिए 12 मार्च, 1930 को गाँधीजी अपने 78 सहयोगियों के साथ दांडी यात्रा (नमक यात्रा) पर निकले। वे 6 अप्रैल, 1930 को दांडी पहुँचे। वहाँ पहुँचकर उन्होंने समुद्र के पानी से नमक बनाकर नमक कानून भंग किया। इसी के साथ नमक सत्याग्रह (सविनय अवज्ञा आंदोलन) आरंभ हुआ और शीघ्र ही पूरे देश में फैल गया।


15. बिहार के किसान आंदोलन पर एक टिप्पणी लिखें

उत्तर ⇒ 1920 के दशक में बिहार के किसानों ने अपने को संगठित करना शरू किया। किसानों के प्रति उदासीन रवैये का फायदा उठाकर वामपंथियों ने उन्हें किसान सभाओं के गठन हेतु प्रेरित किया। फलतः 1922-23 में मुंगेर में शाह मुहम्मद जबैर की अध्यक्षता में किसान सभा का गठन किया गया। बिहार के किसान आंदोलन के एक प्रखर नेता के रूप में स्वामी सहजानंद सरस्वती का नाम विशेष उल्लेखनीय है।


16. खिलाफत आंदोलन के क्या कारण थे ? अथवा, खिलाफत आंदोलन पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।

उत्तर ⇒ ‘तुर्की का सुल्तान’ खलीफा इस्लामी जगत का धर्मगुरु भी था। सेवर्स की संधि द्वारा उसकी शक्ति और प्रतिष्ठा नष्ट कर दी गई। इससे भारतीय मुसलमान उद्वेलित हो गए। खलीफा को पुराना गौरव या उसकी प्रतिष्ठा को पुनर्स्थापित करने के लिए 1919 में अली बंधुओं ने खिलाफत समिति बनाकर आंदोलन करने की योजना बनाई। 17 अक्टूबर, 1919 को खिलाफत दिवस मनाया गया। 1924 में तुर्की के शासक मुस्तफा कमाल पाशा द्वारा खलीफा के पद को समाप्त कर देने से खिलाफत आंदोलन स्वतः समाप्त हो गया।


17. साइमन कमीशन पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।

उत्तर ⇒ साइमन कमीशन के गठन का उद्देश्य 1919 के अधिनियम द्वारा स्थापित उत्तरदायी शासन की स्थापना में किए गए प्रयासों की समीक्षा करना एवं आवश्यक सुझाव देना था। साइमन कमीशन फरवरी 1928 में भारत आया।
आयोग के बंबई (मुंबई) पहुँचने पर इसका स्वागत काले झंडों एवं प्रदर्शनों से किया गया एवं साइमन वापस जाओ के नारे लगाए गए। देशभर में विरोध प्रदर्शन हुए जिसका जवाब अंग्रेजी सरकार ने लाठी से दिया।


18. सविनय अवज्ञा आंदोलन के क्या कारण थे ?

उत्तर ⇒ सविनय अवज्ञा आंदोलन के प्रमुख कारण थे –

(i) साइमन कमीशन का बहिष्कार तथा नेहरू रिपोर्ट को अस्वीकार किया जाना,
(ii) 1929-30 की विश्वव्यापी आर्थिक मंदी,
(iii) भारत में समाजवादी का बढ़ता प्रभाव,
(iv) गाँधीजी के 11 सूत्री मांगों को मानने से इरविन का इनकार,
(v) पूर्ण स्वराज की माँग।


19. गाँधी इरविन पैक्ट अथवा दिल्ली समझौता क्या था ?

उत्तर ⇒ सविनय अवज्ञा आंदोलन की व्यापकता ने अंग्रेजी सरकार को समझौता करने के लिए बाध्य किया। 5 मार्च, 1931 को वायसराय लार्ड इरविन तथा गाँधीजी के बीच समझौता हुआ जिसे दिल्ली समझौता के नाम से भी जाना जाता है। इसके तहत गाँधीजी ने आंदोलन को स्थगित कर दिया तथा वे द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने हेतु सहमत हो गए।


20. असहयोग आंदोलन में चौरी-चौरा की घटना का क्या महत्त्व है ?

उत्तर ⇒ असहयोग आंदोलन पूर्णतः अहिंसक आंदोलन था जिसमें हिंसा का कोई स्थान नहीं था। लेकिन 5 फरवरी, 1922 को गोरखपुर (उत्तरप्रदेश) के चौरा-चौरी नामक स्थान पर आंदोलनकारियों की भीड़ ने पुलिस थाना पर हमला कर अनेक पुलिसकर्मियों को जिंदा जला दिया। इस घटना से गाँधीजी काफी दुखित हुए और उन्होंने तत्काल असहयोग आंदोलन को वापस लेने का निर्णय किया।


21. मुस्लिम लीग के क्या उद्देश्य थे ?

उत्तर ⇒ मुस्लिम लीग की स्थापना 30 दिसम्बर, 1906 को हुई। इसका उद्देश्य था मुस्लिम के हितों की रक्षा करना। इसकी नींव ढाका के नबाव सलीमुल्लाह खाँ ने रखी थी। इसका उद्देश्य मुसलमानों को सरकारी सेवा में उचित स्थान दिलाना एवं न्यायाधीश के पद पर मुसलमानों को जगह दिलाना। विधान परिषद् में अलग निर्वाचक मंडल बनाना एवं काउन्सिल में उचित जगह पाना।


22. नमक सत्याग्रह पर एक टिप्पणी लिखें।

उत्तर ⇒ सविनय अवज्ञा आंदोलन नमक सत्याग्रह से आरंभ हुआ। नमक कानून भंग करने के लिए गाँधीजी ने दांडी को चुना। 12 मार्च, 1930 को अपने 78 विश्वस्त सहयोगियों के साथ गाँधीजी ने साबरमती आश्रम से दांडी यात्रा आरंभ की। 24 दिनों की लम्बी यात्रा के बाद 6 अप्रैल, 1930 को दांडी पहुँचे। वहाँ पहुँचकर उन्होंने समुद्र के पानी से नमक बनाया और शांतिपूर्ण अहिंसक ढंग से नमक कानून भंग किया।


23. बारदोली सत्याग्रह का कारण क्या था ? क्या यह सत्याग्रह सफल रहा ?

उत्तर ⇒ बारदोली सत्याग्रह का कारण सरकार द्वारा किसानों पर बढ़ाए गए करों से था। बारदोली के किसानों ने सरदार बल्लभ भाई पटेल के नेतृत्व में सरकार के विरोध में सत्याग्रह किया। पहले किसानों ने लगान में हुई 22% की कर वृद्धि का विरोध किया तथा सरकार से माँग किया कि सरकार प्रस्तावित लगान में वृद्धि को वापस ले। आंदोलन में महिलाओं की भी सक्रिय भागीदारी रही। सरदार पटेल की गिरफ्तारी की आशंका को देखते हुए गाँधीजी 2 अगस्त, 1928 को बारदोली पहुंचे। गाँधीजी के प्रभाव के कारण सरकार ने लगान में वृद्धि को गलत बताया और बढ़ोतरी 22 प्रतिशत से घटाकर 6.03 प्रतिशत कर दिया। बारदोली सत्याग्रह की सफलता के बाद वहाँ की महिलाओं ने बल्लभ भाई पटेल को ‘सरदार’ की उपाधि प्रदान की।


24. नेहरू रिपोर्ट क्या थी ?

उत्तर ⇒ जब भारतीयों ने साइमन कमीशन का बहिष्कार किया (1928) तब भारत सचिव बर्केनेन्ड ने भारतीयों को सर्वदलीय स्वीकृत एक संविधान बनाने की चुनौती दी। भारतीयों ने मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक आठ सदस्यीय समिति बनाई जिसका उद्देश्य था संविधान का एक प्रारूप बनाना। समिति ने जो प्रतिवेदन तैयार किया उसे नेहरू रिपोर्ट कहा जाता है।


25. मेरठ षडयंत्र से आप क्या समझते हैं ?

उत्तर ⇒ असहयोग आंदोलन की समाप्ति के बाद भारत में साम्यवादी आतंकवादी राष्ट्रवादियों पर सरकार ने दमन शुरू किया। मेरठ षड्यंत्र केस के तहत मार्च, 1929 ई० में 31 मजदूर नेताओं को षड्यंत्रों के आरोप में गिरफ्तार किया गया। उन्हें मेरठ ले जाया गया और वहीं उनपर मुकदमा चलाया गया। यह मुकदमा मेरठ षड्यंत्र केस के नाम से प्रसिद्ध है।


26. जतरा भगत के बारे में आप क्या जानते हैं ? संक्षेप में लिखें।

उत्तर ⇒ छोटानागपुर के उरांव आदिवासियों का अहिंसक आंदोलन 1914 से 1920 तक चलता रहा। इस विद्रोह का नेता जतरा भगत था। इस आंदोलन में सामाजिक एवं शैक्षणिक सुधार पर विशेष बल दिया गया।


27. ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस की स्थापना क्यों हुई ?

उत्तर ⇒ 19 वीं शताब्दी के उतरार्द्ध में भारत में उद्योगों (कल-कारखानों) की स्थापना के साथ ही श्रमिक वर्ग का उदय हुआ। इन औद्योगिक इकाइयों में मजदूरों का कई तरह से शोषण किया जाता था। धीरे-धीरे श्रमिक वर्ग अपने अधिकारों के प्रति सजग हुआ। अपनी माँगों के लिए हड़ताल का सहारा लेने के अतिरिक्त मजदूर संगठित होकर अपना संगठन बनाने का भी प्रयास करने लगे। इसी क्रम में 1920 ई० को लाला लाजपत राय की अध्यक्षता में ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस की स्थापना हुई।


28. स्थायी बंदोवस्त क्या था ?

उत्तर ⇒ अंग्रेजों की कृषि नीति में मुख्य रूप से अधिकतम लगान एकत्रित करने के उद्देश्य से बंगाल में स्थायी बंदोवस्त लागू किया गया। इसमें जमींदारों को एक निश्चित भू-राजस्व सरकार को देना पड़ता तथा जमींदार किसानों से उससे अधिक लगान वसूल करते थे।


29. खोंड विद्रोह का परिचय दें।

उत्तर ⇒ खोंड विद्रोह उड़ीसा की सामंतवादी रियासत दसपल्ला में अक्टूबर, 1914 में शुरू हुआ। यह विद्रोह उत्तराधिकार विवाद से आरंभ हुआ। परंतु शीघ्र ही इसने अलग रूप धारण कर लिया। इसके विस्तार को रोकने के लिए ब्रिटिश सरकार ने विद्रोह को क्रूरतापूर्वक दबा दिया।


30. अल्लूरी सीताराम राजू कौन थे?

उत्तर ⇒ आंध्रप्रदेश की गूडेम पहाड़ियों में 1920 के दशक में नये वन कानूनों के लगाए जाने के प्रतिरोध में आदिवासियों का विद्रोह हुआ। जिसका नेतृत्व अल्लूरी सीताराम राजू ने किया।


31. भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन में जनजातीय समूह की क्या भूमिका थी, वर्णन करें।

उत्तर ⇒ भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन में जनजातिय लोगों की प्रमुख भूमिका रही। 19 वीं शताब्दी की तरह 20 वीं शताब्दी में भी भारत के अनेक भागों में आदिवासी विद्रोह हुए। इन विद्रोहों में रम्पा विद्रोह, अलमरी विद्रोह, उड़ीसा का खोड़ विद्रोह, यह 1914 से 1920 तक चला। 1917 में मयूरभंज में संथालों ने एवं मणिपुर में ‘पोडोई कुकियों’ ने विद्रोह किया था। 1930 में सविनय अवज्ञा आन्दोलन के समय पश्चिमोत्तर प्रांत का जनजातियों ने तीव्र राष्ट्रवादी भावना दिखायी। दक्षिण बिहार के आदिवासियों ने भी राष्ट्रीय चेतना का परिचय दिया। इस प्रकार भारत के कोने-कोने से आदिवासी जनता ने समय – समय पर राष्ट्रीय आन्दोलन में भाग लिया।


32. खिलाफत आंदोलनकारियों की माँग क्या थी ?

उत्तर ⇒ खिलाफत आंदोलनकारियों की माँग निम्नलिखित थी –

(i) तुर्की के सुल्तान की शक्ति और प्रतिष्ठा की पुनः स्थापना,
(ii) अरब प्रदेश खलीफा के अधीन करना,
(iii) खलीफा को मुसलमानों के पवित्र स्थलों का संरक्षक बनाया जाए।


33. कांग्रेस के किस अधिवेशन में पूर्ण स्वाधीनता की माँग की गई तथा इस अधिवेशन के अध्यक्ष कौन थे ?

उत्तर ⇒ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन 1929 में पूर्ण स्वाधीनता की माँग की गई। इस अधिवेशन के अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू थे।


34. जालियाँवाला बाग हत्याकांड के विषय में आप क्या जानते हैं ?

उत्तर ⇒ 13 अप्रैल, 1919 को अमृतसर के जालियाँवाला बाग में वैशाखी के दिन एकत्रित सभा रॉलेट एक्ट एवं पुलिस की दमनकारी नीतियों का विरोध कर रही थी। सभा की कार्रवाई के बीच में ही अमृतसर का सैनिक कमांडर जनरल डायर वहाँ पहुँचा और प्रवेश द्वार बंद कर निहत्थी भीड़ पर अंधाधुंध गोलियाँ चलवा दिया। इस हत्याकांड में 379 लोग मारे गए तथा करीब 1,200 लोग जख्मी हुए।


35. ऑल इण्डिया मुस्लिम लीग की स्थापना कैसे हुई ? इसकी आरंभिक नीति क्या थी ?

उत्तर ⇒ 1906 में मुसलमानों का एक शिष्टमंडल अपनी मांगों के साथ आगा खाँ के नेतृत्व में वायसराय मिंटो से शिमला में मिला। मिंटो ने उनकी मांगों को पूरा करने का आश्वासन दिया। ढाका में एकत्रित प्रमुख मुसलमानों ने 30 दिसंबर, 1906 को मुस्लिम लीग की स्थापना की। लीग ने सरकार के साथ सहयोग का रास्ता अपनाया तथा सरकारी नौकरियों, व्यवस्थापिका सभाओं में प्रतिनिधित्व एवं पृथक निर्वाचन मंडलों की माँग की।


36. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।

उत्तर ⇒ इसकी स्थापना 1925 ई० में के०वी० हेडगेवार ने नागपुर में की थी। इसका मुख्य उद्देश्य युवकों को चारित्रिक एवं शारीरिक रूप से मजबूत बनाकर सशक्त राष्ट्र का निर्माण करना था। इसने हिंदू राष्ट्रवाद का नारा दिया तथा हिंदू धर्म एवं समाज के पुनरूत्थान की नीति अपनाई। सामाजिक संगठन के रूप में यह संस्था आज भी कार्यरत है।


37. मोपला विद्रोह पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।

उत्तर ⇒ केरल के मालाबार में 19वीं-20वीं शताब्दियों में मोपलाओं के अनेक विद्रोह हुए। मोपला एक वर्ग समूह था। जिसमें किसान-मजदूर और अन्य लोग सम्मिलित थे। यह विद्रोह भू-स्वामियों के अत्याचारों के विरुद्ध था। मोपला मुसलमान थे और भू-स्वामी नायर और नम्बूदरी हिंदू। मोपला खलीफा के साथ किए गए अन्याय से भी क्रुध थे। 1921 में सबसे बड़ा मोपला विद्रोह हुआ। मोपलाओं ने अली मुसालियर को अपना राजा घोषित कर धार्मिक उन्माद एवं हिंसा भड़काई। सरकार ने अली मुसालियर को गिरफ्तार कर सेना की सहायता से विद्रोह को कुचल दिया।

5. अर्थव्यवस्था एवं आजीविका

1. कोयला एवं लौह उद्योग ने औद्योगिकीकरण को गति प्रदान की। कैसे ?

उत्तर ⇒ वस्त्र उद्योग की प्रगति कोयले एवं लोहे के उद्योग पर बहुत अधिक निर्भर करती थी इसलिए अंग्रेजों ने इन उद्योगों पर बहुत अधिक ध्यान दिया। इंगलैंड में लोहे और कोयले की प्रचुर मात्रा में खानें थीं। सन् 1815 में हम्फ्री डेवी ने खानों में काम करने के लिए एक ‘सेफ्टी लैम्प’ का आविष्कार किया। 1815 ई० में हेनरी बेसेमर ने एक शक्तिशाली. भट्ठी विकसित करके लौह उद्योग को और भी अधिक बढावा दिया। इस तरह कोयला एवं लौह उद्योग ने औद्योगीकीकरण को गति प्रदान की।


2. औद्योगिक क्रांति से आप क्या समझते हैं ?

उत्तर ⇒ औद्योगिक क्रांति का अर्थ उत्पादन प्रणाली में हुए उन आधारभूत परिवर्तनों से है जिनके फलस्वरूप जनसाधारण को अपनी परंपरागत कृषि, व्यवसाय एवं घरेलू उद्योग-धंधों को छोड़कर नए प्रकार के उद्योगों में काम करने तथा यातायात के नवीन साधनों के प्रयोग का अवसर मिला। यह क्रांति सर्वप्रथम इंगलैंड में 18 वीं सदी के उत्तरार्द्ध में हुई। उद्योगों में मानवश्रम का स्थान मशीनों ने ले लिया। औद्योगिक क्रांति में न तो राजसत्ता का परिवर्तन हुआ और नहीं रक्तपात। यह क्रांति किसी निश्चित अवधि या तिथि को नहीं हुई, इसका निरंतर विकास होता रहा।


3. आदि-औद्योगिकीकरण किसे कहते हैं ?

उत्तर ⇒ यूरोप और इंगलैंड में कारखानों में उत्पादन होने के पूर्व की स्थिति को इतिहासकारों ने आदि-औद्योगिकीकरण का नाम दिया है। इस समय भी बड़े स्तर पर अंतर्राष्ट्रीय बाजार के लिए उत्पादन होता था। परंतु वह उत्पादन एक जगह कारखानों में न होकर दूर-दराज के गाँवों में तथा घरों में होता था।


4. औद्योगिक आयोग की स्थापना कब हुई ? इसके क्या उद्देश्य थे ?

उत्तर ⇒ औद्योगिक आयोग की नियुक्ति सन् 1916 में हुई। भारतीय उद्योग तथा व्यापार के भारतीय वित्त से संबंधित उन क्षेत्रों का पता लगाना, जिसे सरकार सहायता दे सके। .


5. औद्योगिकीकरण के कारण क्या थे ?

उत्तर ⇒ औद्योगिकीकरण के महत्त्वपूर्ण कारण निम्नलिखित थे – नये – नये मशीनों का आविष्कार, फैक्ट्री प्रणाली की शुरुआत, कोयले एवं लोहे की प्रचुरता, सस्ते श्रम की उपलब्धता, यातायात की सुविधा।


6. औद्योगिकीकरण से आप क्या समझते हैं ?

उत्तर ⇒ औद्योगिकीकरण अथवा उद्योगों की बृहत् रूप में स्थापना उस औद्योगिक क्रांति की देन है जिसमें वस्तुओं का उत्पादन मानव श्रम द्वारा न होकर मशीनों के द्वारा होता है। इसमें उत्पादन बृहत् पैमाने पर होता है और जिसकी खपत के लिए बड़े बाजार की आवश्यकता होती है। किसी भी देश के आधुनिकीकरण का एक प्रेरक तत्त्व उसका औद्योगिकीकरण होता है। अत: औद्योगिकीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें उत्पादन मशीनों के द्वारा कारखानों में होता है। इस प्रक्रिया में घरेलू उत्पादन पद्धति का स्थान कारखाना पद्धति ले लेता है।


7. फैक्ट्री प्रणाली के विकास के किन्हीं दो कारणों को बतायें।

उत्तर ⇒ फैक्ट्री प्रणाली के विकास के दो कारण निम्नलिखित थे।

(i) मशीनों एवं नये-नये यंत्रों का आविष्कार,
(ii) उद्योग तथा व्यापार के नये – नये केंद्रों के विकास ने फैक्ट्री प्रणाली को विकसित किया।


8. कलकत्ता में पहली देशी जूट मिल किसने स्थापित की ?

उत्तर ⇒ कलकत्ता में पहली देशी जूट मिल की स्थापना 1917 ई० में एक मारवाड़ी व्यवसायी सेठ हुकुमचंद ने किया था।


9. औद्योगीकरण ने मजदूरों की आजीविका को किस तरह प्रभावित किया ?

उत्तर ⇒ औद्योगिकीकरण के फलस्वरूप बड़े-बड़े कारखाने स्थापित हुए जिसके कारण लघु तथा कुटीर उद्योगों का पतन हो गया। कारखानों में रोजगार की तलाश में गाँवों से बेरोजगार लोगों का समूह शहरों की ओर आने लगे। उन्हें शहरों में नौकरियाँ ढूँढने में अनेक प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। कारखानों में श्रमिकों को स्थायी नौकरी नहीं मिलती थी। अनेक मजदूरों को काम का मौसम समाप्त होने के बाद नौकरी से हटा दिया जाता था। औद्योगिकीकरण ने मजदूरों की आजीविका को इस तरह प्रभावित किया कि उनके पास दैनिक उपयोग की वस्तुओं को खरीदने के लिए धन नहीं रहता था। शहरों में उनके रहने-ठहरने की समुचित व्यवस्था नहीं थी।


10. भारत में निरुद्योगीकरण क्यों हुआ ?

उत्तर ⇒ 1850 के बाद अंग्रेजी सरकार की औद्योगिक नीतियों – मुक्त व्यापार की नीति, भारतीय वस्तुओं के निर्यात पर सीमा और परिवहन शुल्क लगाने, रेलवे, कारखानों में अंग्रेजी पूँजी निवेश, भारत में अंग्रेजी आयात का बढ़ावा देने इत्यादि के फलस्वरूप भारतीय उद्योगों का विनाश हुआ। कारखानों की स्थापना की प्रक्रिया बढ़ी जिससे देशी उद्योग अपना महत्त्व खोने लगे। इससे भारतीय उद्योगों का निरुद्योगीकरण हुआ।


11. सस्ते श्रम ने किस प्रकार औद्योगिकीकरण को बढ़ावा दिया ?

उत्तर ⇒ सस्ते श्रम की उपलब्धता औद्योगिकीकरण के विकास के लिए आवश्यक था। ब्रिटेन में बाड़ाबंदी अधिनियम 1792 ई० से लागू हुआ। बाड़ाबंदी प्रथा के कारण जमींदारों ने छोटे-छोटे खेतों को खरीदकर बड़े-बड़े फार्म स्थापित किए। किसान भूमिहीन मजदूर बन गए। बाड़ाबंदी कानून के कारण बेदखल भमिहीन किसान कारखानों में काम करने के लिए मजबूर हुए। ये कम मजदूरी पर भी काम करने को बाध्य थे। इस सस्ते श्रन ने उत्पादन को बढ़ाने में सहायता की। परिणामस्वरूप औद्योगिकीकरण का मार्ग प्रशस्त हुआ।


12. 1881 के प्रथम कारखाना अधिनियम (फैक्ट्री एक्ट) का परिचय दें।

उत्तर ⇒ 1881 में पहला “फैक्ट्री एक्ट” (कारखाना अधिनियम) पारित हुआ। इसके द्वारा 7 वर्ष से कम आयु के बच्चों को कारखाना में काम करने पर प्रतिबंध लगाया गया, 12 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए काम के घंटे तय किये गये तथा महिलाओं के भी काम के घंटे एवं मजदूरी तय की गई।


13. घरेलू और कटीर उद्योग को परिभाषित करें।

उत्तर ⇒ घरेलू उद्योगों में मशीनों का उपयोग नहीं होता था। जैसे खाद्य प्रसंस्करण, निर्माण, मिट्टी के बरतन बनाना, काँच का सामान बनाना, वस्त्र निर्माण, चमड़े का सामान बनाना, फर्नीचर निर्माण आदि घरेलू उद्योगों की श्रेणी में आते हैं। कुटीर उद्योग उपभोक्ता वस्तुओं अत्यधिक संख्या को रोजगार तथा राष्ट्रीय आय का अत्यधिक सामान वितरण सुनिश्चित करते हैं। कुटीर उद्योग जनसंख्या के बड़े शहरों में प्रवाह को रोकता है।


14. इंगलैंड ने अपने वस्त्र उद्योग को बढ़ावा देने के लिए क्या किया ?

उत्तर ⇒ इंगलैंड में यांत्रिक युग का आरंभ सूती वस्त्र उद्योग से हुआ। 1773 में लंकाशायर के वैज्ञानिक जान के ने फ्लाइंग शटल नामक मशीन बनाई। इससे बुनाई की रफ्तार बढी तथा सृत की माँग बढ़ गई। 1765 में ब्लैक बर्न के जेम्स हारग्रीब्ज ने स्पिनिंग जेनी बनाई। जिससे सत की कताई आठ गुना बढ़ गई। रिचर्ड आर्कराइट ने सूत कातने के लिए स्पिनिंग फ्रेम का आविष्कार किया, जिससे अब हाथ से सूत कातने का काम बंद हो गया। क्रॉम्पटन ने स्पिनिंग म्यूल नामक मशीन बनाई। इन मशीनों के आधार पर इंगलैंड में कम खर्च में ही बारीक सूत अधिक मात्रा में बनाए जाने लगे। इससे वस्त्र उद्योग में क्रांति आ गई। इन संयंत्रों की सहायता से इंगलैंड में वस्त्र उद्योग को बढ़ावा मिला।


15. 1813 ई० का चार्टर एक्ट क्या था ?

उत्तर ⇒ 1813 ई० में ब्रिटिश संसद द्वारा पारित अधिनियम था जिसमें व्यापार पर से ईस्ट इंडिया कंपनी का एकाधिपत्य समाप्त कर दिया गया तथा उसके स्थान पर मुक्त व्यापार की नीति (Policy of Free Trade) का अनुसरण किया गया।


16. उत्पादक अपने उत्पादों को प्रचार करने के लिए कौन-कौन से साधन अपनाते थे ?

उत्तर ⇒ उत्पादों को बेचने के लिए एवं ग्राहकों को आकृष्ट करने के लिए उत्पादक अपने सामान पर लेबल लगाते थे। लेबलों से ही उत्पाद की गुणवत्ता स्पष्ट होती थी। अनेक लेबलों पर प्रभावशाली व्यक्तियों और देवी-देवताओं के चित्र बनाए जाते थे जिससे ग्राहक उनकी ओर आकृष्ट होते थे। 19वीं सदी के अंतिम चरण से उत्पादकों ने अपने-अपने उत्पादन के प्रचार के लिए आकर्षक कैलेंडर छपवाने आरंभ किए।


17. स्वदेशी आंदोलन का उद्योगों पर क्या प्रभाव पड़ा ?

उत्तर ⇒ 1905 के बंग – भंग आंदोलन में स्वदेशी और बहिष्कार की नीति से भारतीय उद्योग लाभान्वित हुए। धागा के स्थान पर कपड़ा बनना आरंभ हुआ। इससे वस्त्र उत्पादन में तेजी आई। 1912 तक सूती वस्त्र उत्पादन दोगुना हो गया। उद्योगपतियों ने सरकार पर दबाव डाला कि वह आयात-शुल्क में वृद्धि करे तथा देशी उद्योगों को रियायत प्रदान करे। कपडा उद्योग के अतिरिक्त अन्य छोटे उद्योगों का भी विकास स्वदेशी आंदोलन के कारण हुआ।


18. 1850 के बाद ब्रिटिश सरकार ने अपने उद्योगों को विकसित करने के लिए क्या किया? इसका देशी उद्योगों पर क्या प्रभाव पड़ा ?

उत्तर ⇒ 1850 के बाद ब्रिटिश सरकार ने अपने उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए मुक्त व्यापार की नीति अपनाई। भारत से आयातित निर्मित वस्तुओं पर भारी बिक्री कर सीमा शुल्क और परिवहन कर लगाया गया। भारत से कच्चा माल का निर्यात किया जाने लगा। इससे देशी कुटीर उद्योगों पर बुरा प्रभाव पड़ा।


19. 1850 -1914 तक के भारतीय उद्योगों की क्या विशेषता थी ?

उत्तर ⇒ इस अवधि में वैसे उद्योगों को बढ़ावा दिया गया जो निर्यात करनेवाले सामानों का उत्पादन करते थे और जो राष्ट्र के लिए लाभदायक थे जैसे-पटसन और चाय।. साथ ही वैसे माल का उत्पादन हुआ जिसमें विदेशी प्रतिस्पर्धा अधिक नहीं थी।


20. वर्तमान समय में भारत में कितने स्टील प्लांट हैं ?

उत्तर ⇒ वर्तमान समय में भारत में 7 स्टील प्लांट कार्यरत हैं। ये हैं –

(i) इंडियन आयरन एंड स्टील कंपनी, हीरापुर
(ii) टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी जमशेदपुर
(iii) विश्वेश्वरैया आयरन एंड स्टील कंपनी, ‘भद्रावती (कर्नाटक)
(iv) राउरकेला स्टील प्लांट, राउरकेला
(v) भिलाई स्टील प्लांट, भिलाई
(vi) दुर्गापुर स्टील प्लांट, दुर्गापुर तथा
(vii) बोकारो स्टील प्लांट, बोकारो।


21. स्लम पद्धति की शुरुआत कैसे हुई ?

अथवा, स्लम से आप क्या समझते हैं ? इसकी शुरुआत क्यों और कैसे हुइ ?

उत्तर ⇒ छोटे, गंदे और अस्वास्थ्यकर स्थानों में जहाँ फैक्ट्री मजदूर निवास करते हैं वैसे आवासीय स्थलों को ‘स्लम’ कहा जाता है।
औद्योगिकीकरण के फलस्वरूप बड़े-बड़े कारखाने स्थापित हुए जिसमें काम करने के लिए बड़ी संख्या में गाँवों से मजदूर पहुँचाने लगे। वहाँ रहने की कोई व्यवस्था नहीं थी। मजदूर कारखाने के निकट रहें, इसलिए कारखानों के मालिकों ने उनके लिए छोटे-छोटे तंग मकान बनवाए। जिसमें सविधाएँ उपलब्ध नहीं थीं। इन मकानों में हवा, पानी तथा रोशनी तथा साफ-सफाई की व्यवस्था भी नहीं थी। इस प्रकार औद्योगिकीकरण के फलस्वरूप स्लम पद्धति की शुरुआत हुई।


22. अठारहवीं शताब्दी में भारत के मुख्य उद्योग कौन-कौन से थे ?

उत्तर ⇒ अठारहवीं शताब्दी तक भारतीय उद्योग विश्व में सबसे अधिक विकसित थे। इस समय कुटीर उद्योग, भारतीय हस्तकला, शिल्प उद्योग मुख्य रूप से प्रचलित थे।


23. भारत की आजादी के बाद कुटीर उद्योग के विकास में भारत सरकार की नीतियों को लिखें।

उत्तर ⇒ कुटीर उद्योगों की उपयोगिता और उनके महत्त्व को देखते हुए स्वतंत्रता के बाद भारत सरकार ने कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन देने के लिए अनेक प्रयास किए हैं। 1948 की औद्योगिक नीति के द्वारा लघु एवं कुटीर उद्योग को प्रोत्साहन दिया गया। 1952-53 में लघु उद्योगों को प्रोत्साहन देने के लिए हथकरघा, सिल्क, खादी, नारियल के रेशे एवं ग्रामीण उद्योग बोर्ड स्थापित किए गए। 1980 की औद्योगिक नीति घोषणा-पत्र में कृषि आधारित उद्योगों को विकसित करने पर बल दिया गया।


24. यातायात की सुविधा ने औद्योगिकीकरण की गति को किस प्रकार तीव्र किया ?

उत्तर ⇒ यातायात की सुविधा ने फैक्ट्री से उत्पादित वस्तुओं को एक जगह से दूसरे जगह पर ले जाने तथा कच्चा माल के फैक्ट्री तक लाने में सहायता की। रेलमार्ग शुरू होने से पहले नदियों एवं समुद्र के रास्ते व्यापार होता था। जहाजों के द्वारा माल को तटों पर पहुँचाया जाता था। रेल के विकास ने औद्योगिकीकरण की गति को तीव्र कर दिया। रेलों द्वारा कोयला, लोहा एवं अन्य औद्योगिक वस्तुओं को कम समय में और कम खर्च पर ले जाना संभव हुआ। अतः यातायात की इन सुविधाओं ने औद्योगिकीकरण की गति को तीव्र कर दिया।


25. भारत में सूती वस्त्र उद्योग का विकास लिखें।

उत्तर ⇒ भारत में कुटीर उद्योग के पतन के बाद देशी एवं विदेशी पूँजी लगाकर वस्त्र उद्योग की कई फैक्ट्रियाँ खोली गयी। 1851 में बंबई में सर्वप्रथम सूती कपड़े की मिल खोली गई। 1854 में पहला वस्त्र उद्योग का कारखाना कावसजी नानाजी दाभार ने खोला। सन् 1854 से 1880 तक 30 कारखानों का निर्माण हुआ। 1880 से 1895 तक सूती कपड़ों के मिलों की संख्या 39 से भी अधिक हो गई। इस समय सस्ते मशीनों को आयात करके भारत में सूती वस्त्र उद्योग को बहुत बढ़ाया गया 1895 से 1914 तक के बीच सूती मिलों की संख्या 144 तक पहुँच गयी थी और भारतीय सूती धागे का निर्यात चीन को होने लगा।


26. ब्रिटेन में महिला कामगारों ने स्पिनिंग जेनी पर क्यों हमले किए ?

उत्तर ⇒ बेरोजगारी की आशंका से मजदूर कारखानेदारी एवं मशीनों के व्यवहार का विरोध कर रहे थे। इसी क्रम में ऊन उद्योग में स्पिनिंग जेनी मशीन का जब व्यवहार होने लगा तब इस उद्योग में लगी महिलाओं ने इसका विरोध आरंभ किया। उन्हें अपना रोजगार छिनने की आशंका थी। अत: उन लोगों ने स्पिनिंग जेनी मशीनों पर आक्रमण कर उन्हें तोड़ना आरंभ किया। उस स्थिति का वर्णन एक मैजिस्ट्रेट ने किया है, जिसकी नियुक्ति मजदूरों के हमले से निर्माता की संपत्ति की सुरक्षा के लिए की गयी थी।


27. प्रथम विश्वयुद्ध के पहले यूरोपीय व्यापारिक कंपनियाँ तथा बैंक के किस प्रकार भारतीय उद्योगों के विकास में सहायक थे ?

उत्तर ⇒ प्रथम विश्वयुद्ध के पहले तक यूरोप की कंपनियाँ व्यापार में पूँजी लगाती थी। यह प्रबंधकीय एजेंसियों के द्वारा होता था. जो उद्योगों पर नियंत्रण भी रखते थे। इनमें बर्ड हिगलर्स एंड कंपनी, एंडयूल और जार्डीन स्किनर एंड कंपनी सबसे बड़ी कंपनियाँ थी। यद्यपि भारत में 1895 में पंजाब नेशनल बैंक, 1906 में बैंक ऑफ इंडिया, 1907 में इंडियन बैंक, 1911 में सेंट्रल बैंक, 1913 में द बैंक ऑफ मैसर तथा ज्वाइंट स्टॉक बैंकों की स्थापना हुई। ये बैंक भारतीय उद्योगों के विकास में सहायक थे।


28. जॉबर कौन थे ?

उत्तर ⇒ कारखानों तथा मिलों में मजदूरों और कामगारों की नियुक्ति का माध्यम जॉबर या रोजगार दिलवाने वाला होता था। प्रत्येक मिल मालिक जॉबर नियुक्त करता था। यह मालिक का विश्वस्त कर्मचारी होता था। वह आवश्यकतानुसार अपने गाँव से लोगों को लाता था और उन्हें कारखानों में नौकरी दिलवाता था एवं मजदूरों को शहर में रहने और उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति में सहायता करता था।


29. गुमाश्ता कौन थे ?

उत्तर ⇒ गुमाश्ता अंग्रेज व्यापारियों के एजेंट थे जिनकी सहायता से भारतीय कारीगरों (बुनकरों) को पेशगी की रकम देकर उनसे उत्पादन कराया जाता था। ये बुनकरों पर नियंत्रण रखते थे। ये वस्तुओं की गुणवत्ता का भी ध्यान रखते थे।


30. बाड़ाबंदी अधिनियम क्या है ?

उत्तर ⇒ बाड़ाबंदी अधिनियम इंगलैंड में 1792 ई० में लागू हुआ। बाड़ाबंदी प्रथा के कारण जमींदारों ने छोटे-छोटे खेतों को खरीदकर बड़े-बड़े फार्म स्थापित किए। इसके कारण छोटे किसान भूमिहीन मजदूर बन गए।


31. लैसेज फेयर क्या था? ‘

उत्तर ⇒ किसी सरकार द्वारा देश की किसी निजी आर्थिक क्रिया में हस्तक्षेप न करना, इसी अहस्तक्षेप की नीति को ‘लैसेज फेयर’ के नाम से जाना जाता है। इसमें माँग एवं पूर्ति की स्वतंत्र शक्तियाँ अर्थव्यवस्था में स्वतः संतुलन बना लेती हैं।


32. बुर्जुआ वर्ग की उत्पत्ति कैसे हुई ?

उत्तर ⇒ शहरों के उद्भव से समाज में बुर्जुआ या मध्यम वर्ग की उत्पत्ति हुई। एक नए शिक्षित वर्ग का अभ्युदय जहाँ विभिन्न पेशों में रहकर भी औसतन एक समान आय प्राप्त करने वाले वर्ग के रूप में उभर कर आए एवं बुद्धिजीवी (बुर्जुआ) वर्ग के रूप में स्वीकार किए गए।


33. ईस्ट इंडिया कंपनी ने गुमाश्तों को क्यों बहाल किया ?

उत्तर ⇒ बुनकरों पर नियंत्रण तथा वस्तुओं की गुणवत्ता का ध्यान रखने के लिए ही गुमाश्तों को बहाल किया गया था।


34. फ्लाईंग शटल के व्यवहार का हथकरघा उद्योग पर क्या प्रभाव पड़ा ?

उत्तर ⇒ फ्लाईंग शटल से जहाँ एक ओर उत्पादन में वृद्धि हुई वहीं कारीगरों की संख्या में कमी लाकर भी बचत किया गया। इससे बुनकरों को दोगुना लाभ हुआ। फ्लाईंग शटल का व्यवहार हथकरघा उद्योग में तेजी से बढ़ने लगा। 1941 तक 35 प्रतिशत से अधिक हथकरघे पलाईंग शटल द्वारा संचालित होने लगे। त्रावनकोर, मैसूर, कोचीन, बंगाल में हथकरघा उद्योग में फ्लाईंग शटल का व्यवहार 70-80 प्रतिशत तक होने लगा। ये क्षेत्र हथकरघा उद्योग के केंद्र बन गए जहाँ बड़े स्तर पर उत्पादन किया जाने लगा। बढ़े हुए उत्पादन के आधार पर हथकरघा उद्योग मिलों में उत्पादित वस्त्र का मुकाबला करने की स्थिति में आ गया।


35. लंदन को “फिनिशिंग-सेंटर” क्यों कहा जाता था ?

उत्तर ⇒ इंगलैंड के कपड़ा व्यापारी वैसे लोगों से जो रेशों के हिसाब से ऊन छाँटते थे (स्टेप्लर्स) ऊन खरीदते थे। इस ऊन को वे सूत काटने वालों तक पहुँचाते थे। तैयार धागा वस्त्र बुनने वालों, चुन्नटों के सहारे कपड़ा समेटने वालों (फलर्ज) और कपड़ा रंगने वालों रंगसाजों के पास ले जाया जाता था। रंगा हुआ वस्त्र लंदन पहुँचता था जहाँ उसकी फिनिशिंग होती थी। इसलिए लंदन को ‘फिनिशिंग सेंटर’ कहा जाता था।


36. 1850-60 के बाद भारत में बगीचा उद्योग के विषय में लिखें।

उत्तर ⇒ 1850-60 के बाद भारत के बगीचा उद्योग में नील, चाय, रबड, कॉफी और पटसन मिलों की शुरुआत हुई। इन उद्योगों पर अधिकतम विदेशी उद्योगपतियों का प्रभाव था तथा इन्हें सरकार द्वारा प्रोत्साहन दिया जाता था।

6. शहरीकरण एवं शहरी जीवन

1. शहरीकरण से आप क्या समझते हैं ?

उत्तर ⇒ शहरीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा ग्रामीण बस्तियाँ, कस्बा या शहरों में परिवर्तित हो जाते हैं। इससे एक नई अर्थव्यवस्था उत्पन्न हुई जिसम कृषि-पशुपालन का स्थान, व्यापार, शिल्प और उद्योग धंधों ने ले लिया।


2. शहर किस प्रकार के क्रियाओं के केन्द्र होते हैं ?

उत्तर ⇒ शहर विभिन्न प्रकार की क्रियाओं के केन्द्र होते हैं, जैसे — रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार वाणिज्य, यातायात आदि। शहर गतिशील अथव्यवस्था जा मुद्रा प्रधान होती है उसके भी केन्द्र होते हैं। शहर राजनीतिक प्राधिकार का भी एक महत्त्वपूर्ण केन्द्र होता है।


3. शहरों में मध्यम वर्ग की भूमिका पर प्रकाश डालें।

उत्तर ⇒ शहरों में पूँजीपति वर्ग एवं श्रमिक वर्ग के साथ-साथ मध्यम वर्ग का भी उदय और विकास हुआ। ये नए सामाजिक समूह के रूप में उभरे। इस समूह में बुद्धिजीवी, नौकरी पेशा समूह, राजनीतिज्ञ, चिकित्सक, व्यापारी प्रमुख थे। व्यावसायिक वर्ग नगरों के विकास का प्रमुख कारण बना जिससे शहरों को नई सामाजिक-आर्थिक स्वरूप प्राप्त हुआ। बुद्धिजीवी एवं राजनीतिक वर्ग ने नया राजनीतिक-सामाजिक चिंतन दिया तथा विभिन्न आंदोलनों को दिशा एवं नेतृत्व प्रदान किया।


4. किन तीन प्रक्रियाओं के द्वारा आधुनिक शहरों की स्थापना निर्णायक रूप से हुई ?

उत्तर ⇒ जिन तीन ऐतिहासिक प्रक्रियाओं ने आधुनिक शहरों की स्थापना में निर्णायक भूमिका निभाई वे निम्नलिखित हैं –

(i) औद्योगिक पूँजीवाद का उदय,
(ii) विश्व के विशाल भू-भाग पर औपनिवेशिक शासन की स्थापना तथा
(iii) लोकतांत्रिक आदर्शों का विकास।


5. शहरों ने किन नई समस्याओं को जन्म दिया ?

उत्तर ⇒ नये-नये शहरों का उदय और शहरों की बढ़ती जनसंख्या ने शहरों में नई-नई समस्याओं को जन्म दिया। शहरों में श्रमिकों की बढ़ती आबादी ने कई नई समस्याओं को जन्म दिया जैसे — बेरोजगारी में वृद्धि, आवास की समस्या तथा स्वास्थ्य संबंधी समस्या इत्यादि।


6. शहरों और गाँवों में मुख्य अंतर क्या है ?

उत्तर ⇒ शहरों और गाँवों में मुख्य अंतर यह है कि ग्रामीण लोगों की आजीविका जहाँ कृषि, पशुपालन एवं घरेलू उद्योग-धंधों पर आश्रित होती है वहीं शहरों में लोग विभिन्न व्यवसायों व्यापार, उद्योग, नौकरी में लगे होते हैं।


7. शहरीकरण का पुरुषों और महिलाओं पर समान रूप से क्या प्रभाव पड़ा ?

उत्तर ⇒ शहरीकरण का पुरुषों और महिलाओं पर समान प्रभाव पड़ा। दोनों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता, अधिकारों और कार्यों पर बल दिया गया।


8. शहरीकरण का पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ा ? इसे रोकने के लिए क्या प्रयास किए गए ?

उत्तर ⇒ शहरीकरण के कारण कल-कारखानों की स्थापना, चिमनियों से निकलनेवाले धुएँ, बेतरतीब भीड़, लोगों और सवारियों की आवाजाही, गंदगी और धूल से पर्यावरण काफी दूषित हो गया। अतः पर्यावरण की सुरक्षा के लिए समय-समय पर प्रयास किए गए। 1840 के दशक में इंग्लैंड के प्रमुख औद्योगिक नगरों में धुआँ नियंत्रण कानून लागू किया गया। भारत में 1863 में कलकत्ता में धुआँ-निरोधक कानून बनाया गया।


9. नगरीय जीवन एवं आधुनिकता एक – दूसरे से अभिन्न रूप से कैसे जुड़े हुए हैं ?

उत्तर ⇒ शहरों (नगरों) का सामाजिक जीवन आधुनिकता के साथ अभिन्न रूप से जोड़ा जा सकता है। वास्तव में नगरीय जीवन एवं आधुनिकता एक-दूसरे की अंतभिव्यक्ति है। शहरों को आधुनिक व्यक्ति का प्रभाव क्षेत्र माना जाता है। शहर व्यक्ति को संतष्ट करने के लिए अंतहीन संभावनाएँ प्रदान करता है। आधुनिकीकरण ने नगरीय जीवन को काफी हद तक प्रभावित किया है।


10. यूरोपीय इतिहास में ‘घेटो’ का क्या अर्थ है ?

उत्तर ⇒ यूरोपीय इतिहास में ‘घेटो’ शब्द का सामान्यत: अर्थ मध्य यूरोपीय शहरों में यहूदियों की बस्ती के लिए प्रयोग किया जाता था। लेकिन आज के संदर्भ में यह विशिष्ट धर्म, नजाति, जाति या समान पहचानवाले लोगों के साथ रहने को इंगित करता है। घेटोकरण की प्रक्रिया में मिश्रित विशेषताओं वाले पडोस के स्थान पर एक समुदाय पड़ोस में बदलाव का होना, सामुदायिक दंगों को ये एक विशिष्ट देशिक रूप देते हैं।


11. आर्थिक तथा प्रशासनिक संदर्भ में ग्रामीण तथा नगरीय व्यवस्था के दो प्रमुख आधार क्या हैं ?

उत्तर ⇒ आर्थिक तथा प्रशासनिक संदर्भ में ग्रामीण तथा नगरीय व्यवस्था के दो प्रमुख आधार हैं –

(i) जनसंख्या का घनत्व- शहरों में जनसंख्या का घनत्व अधिक होता है।
(ii) कृषि आधारित आर्थिक क्रियाओं का अनुपात- कृषि आधारित आर्थिक क्रियाओं का अनुपात गाँवों में अधिक होता है।


12. चार्टिस्ट आंदोलन क्यों चलाया गया था ?

उत्तर ⇒ बालिग पुरुषों के लिए मताधिकार की माँग को लेकर इंगलैंड में चार्टिस्ट आंदोलन चलाया गया।


13. 19वीं, 20वीं शताब्दियों में लंदन में कामकाजी महिलाओं में किस प्रकार का बदलाव आया ? इसके क्या कारण थे ?

उत्तर ⇒ 18वीं, 19वीं शताब्दी में जब इंगलैंड में कारखाने स्थापित होने लगे, तब बड़ी संख्या में स्त्रियाँ भी इनमें काम करने लगी। कुछ समय बाद तकनीक में परिवर्तन के कारण जब कुशल श्रमिकों की आवश्यकता हुई तो इन स्त्रियों को कारखानों से हटाया जाने लगा। कारखानों में काम बंद होने पर स्त्रियाँ घरेलू काम-धंधों में लग गई। 1861 की जनगणना के अनुसार लंदन में ढाई लाख घरेलू नौकर थे जिनमें महिलाओं की संख्या अधिक थी। अनेक औरतें अपने परिवार की आमदनी बढ़ाने के लिए अपने मकान में पेईंग गेस्ट को रख लेती थी। कुछ स्त्रियाँ अपने घर ही रहकर कपड़े सिलने, ऊनी वस्त्र बुनने तथा कपड़ा धोने का काम करने लगी। प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान जब पुरुष बड़ी संख्या में युद्ध में शामिल होने लगे तथा युद्धकालीन आवश्यक सामग्रियों की माँग बढ़ गई तो महिलाएँ पुनः घरेलू काम छोड़कर विभिन्न उद्योगों में काम करने लगी। दफ्तरों में भी उन्हें रोजगार के अवसर मिले। इस प्रकार महिलाओं की आर्थिक क्रियाकलापों में महत्त्वपूर्ण भागीदारी रही।


14. 19वीं शताब्दी के मध्य में बंबई की आबादी में भारी वृद्धि क्यों हुई ?

उत्तर ⇒ 19वीं शताब्दी से बंबई का विकास एक महत्त्वपूर्ण बंदरगाह के रूप र क विकास के साथ-साथ यहाँ प्रशासकीय गतिविधियाँ भी बढ़ गई। अत: यह पश्चिम भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी का मुख्यालय भी बन गया। औद्योगिकीकरण का जब विकास हुआ तो बंबई बड़े औद्योगिक केंद्र के रूप में बदल गया। इसके बाद बंबई का तेजी से विकास हुआ। शहर फैलने लगा, व्यापारी, कारीगर, उद्योगपति, दुकानदार, श्रमिक बड़ी संख्या में आकर यहाँ बसने लगे। इससे बंबई पश्चिमी भारत का सबसे प्रमुख नगर बन गया तथा इसकी आबादी काफी बढ़ती गयी।


15. बंबई की बहुतेरी फिल्में शहर में बाहर से आनेवालों की जिंदगी पर क्यों आधृत होती थी ?

उत्तर ⇒ औद्योगिक और आर्थिक केंद्र होने के अतिरिक्त बंबई रुपहले दुनिया या फिल्म उद्योग का केंद्र था। फिल्मी दुनिया से आकृष्ट होकर इस उद्योग में अपना भविष्य तलाशने एवं सँवारने प्रतिवर्ष हजारों-हजार व्यक्ति इस नगर में आते थे। इसलिए अधिकांश फिल्में बंबई में आनेवाले अप्रवासियों के जीवन और उनके द्वारा भोगी गई कठिनाइयों, इनकी आशाओं और निराशा पर केंद्रित कर बनाई गई।


16. व्यावसायिक पूँजीवाद ने किस प्रकार नगरों के उद्भव में अपना योगदान दिया ?

उत्तर ⇒ नगरों के उद्भव का एक प्रमुख कारण व्यावसायिक पूँजीवाद के उद्भव के साथ संभव हुआ। व्यापक स्तर पर व्यवसाय, बड़े पैमाने पर उत्पादन, मुद्रा प्रधान अर्थव्यवस्था, शहरी अर्थव्यवस्था जिसमें काम के बदले वेतन, मजदूरी का नगद भुगतान, एक गतिशील एवं प्रतियोगी अर्थव्यवस्था, स्वतंत्र उद्यम, मुनाफा कमाने की प्रवृत्ति, मुद्रा, बैंकिंग, साख बिल का विनिमय, बीमा, अनुबंध, कंपनी साझेदारी, ज्वाएंट स्टॉक, एकाधिकार आदि इस पूँजीवादी अर्थव्यवस्था की विशेषताओं ने नये-नये नगरों के उद्भव में अपना योगदान दिया।


17, गाँव के कृषिजन्य आर्थिक क्रियाकलापों की विशेषता को दर्शायें।

उत्तर ⇒ गाँव के कृषिजन्य आर्थिक क्रियाकलापों की विशेषता मुख्य रूप से यह है कि गाँव की आबादी का एक बड़ा हिस्सा कृषि संबंधी व्यवसाय से जुड़ा होता है। अधिकांश वस्तुएँ कृषि उत्पाद से जुड़ी होती हैं जो इनकी आय का प्रमुख स्रोत होती है। गाँव की कषि प्रधान अर्थव्यवस्था मूलतः जीवन-निर्वाह अर्थव्यवस्था की अवधारणा पर आधारित होती हैं।


18. समाज का वर्गीकरण ग्रामीण एवं नगरीय क्षेत्रों में किस भिन्नता के आधार पर किया जाता है ?

उत्तर ⇒ गाँव एवं शहरों में सामाजिक वर्गीकरण मुख्यतः व्यवसाय में भिन्नता के आधार पर किया जाता है। ग्रामीण आबादी का एक बहुत बड़ा भाग मुख्यतः कृषिजन्य क्रियाकलापों से सम्बद्ध होता है। इसके विपरीत शहरी आबादी मख्यतः गैर कृषि व्यवसायों, नौकरी, उद्योग तथा व्यापार में संलग्न होती है।


19. उन दो कानूनों के नाम लिखें जिनके द्वारा इंगलैंड में बाल श्रमिकों को कारखानों में काम करने से रोक दिया गया।

उत्तर ⇒ (i) अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा तथा
(ii) 1902 में फैक्ट्री कानून बनाकर इंगलैंड में बाल श्रमिकों को कारखानों में काम करने से रोक दिया गया।

20. उन दो फिल्मों के नाम लिखें जिनमें बंबई के अंतर्विरोधी आयामों का उल्लेख किया गया है ?

उत्तर ⇒ सी० आई० डी और गेस्ट हाऊस।


21. बंबई की चॉल किस प्रकार की इमारत थी ? इनका निर्माण कब’ से आरंभ हुआ ?

उत्तर ⇒ गरीबों के आवास के लिए बंबई में बड़ी संख्या में चॉल बनवाए गए। चॉल बहुमंजिली इमारतें थी। इसका निर्माण 1860 के दशक से आरंभ हुआ था। इनमें एक कमरे के मकान (खोली) कतार में बने होते थे।


22, 19वीं शताब्दी में धनी लंदनवासियों ने गरीबों के लिए मकान बनाने की वकालत क्यों की ?

उत्तर ⇒ 19वीं शताब्दी में लंदन में गरीबों के आवास से जुड़ी एक बड़ी समस्या थी। कारखानेदारी व्यवस्था ने लंदन नगर का स्वरूप परिवर्तित कर दिया । कारखानों में काम करने के लिए बड़ी संख्या में लोग लंदन आने लगे, परंतु उनके सामने आवास की समस्या थी। शहर में रहने के लिए घर उपलब्ध नहीं थे। इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए धनी लंदनवासियों ने गरीबों के लिए मकान बनाने की वकालत शुरू की। वैसे धनी लोगों ने जिनके पास पर्याप्त जमीन उपलब्ध थी शहर में बाहर से आनेवाले गरीब लोगों के लिए टेनेमेंट्स बनाने लगे।


23. श्रमिक वर्ग का आगमन शहरों में किन परिस्थितियों के अंतर्गत हुआ ?

उत्तर ⇒ आधुनिक शहरों में जहाँ एक ओर पूँजीपति वर्ग का अभ्युदय हुआ तो दूसरी ओर श्रमिक वर्ग का। शहरों में फैक्ट्री प्रणाली की स्थापना के कारण कृषक वर्ग जो लगभग भूमिविहीन कृषि वर्ग के रूप में थे, शहरों की ओर बेहतर रोजगार के अवसर को देखते हुए भारी संख्या में इनका पलायन हुआ। इस तरह शहरों में रोजगार की अपार संभावनाओं को देखते हुए गाँवों से शहरों की ओर श्रमिक वर्ग का आगमन हुआ।


24. नागरिक अधिकारों के प्रति एक नई चेतना किस प्रकार का आंदोलन या प्रयास से बनी ?

उत्तर ⇒ नगरीय सभ्यता ने पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं में भी व्यक्तिवाद की भावना को उत्पन्न किया। एक ओर उनके अधिकारों के लिए विभिन्न आंदोलन चलाए गए। महिलाओं के मताधिकार आंदोलन या विवाहित महिलाओं के लिए संपत्ति में अधिकार आदि आंदोलन के माध्यम से महिलाओं में नागरिक अधिकारों के प्रति एक नई चेतना विकसित हुई। उन्नीसवीं शताब्दी में अधिकतर आंदोलन जैसे चार्टिस्ट (सभी वयस्क पुरुषों के लिए चलाया गया आंदोलन), दस घंटे का आंदोलन (कारखानों में काम के घंटे निश्चित करने के लिए चला आंदोलन) आदि के द्वारा नागरिक अधिकारों के प्रति एक नई चेतना को विकसित किया।


25. 18वीं शताब्दी के मध्य से लंदन की आबादी बढ़ने का क्या कारण था ?

उत्तर ⇒ लंदन एक बड़ा नगर था। इंगलैंड की राजधानी होने के कारण इसकी आबादी लगातार बढ़ती गई। जहाँ 1750 तक इसकी आबादी 6 लाख से अधिक थी। वहीं 1880 तक लंदन की जनसंख्या चालीस लाख हो गई। यद्यपि लंदन में कारखाने नहीं थे परंतु वहाँ रोजगार के अन्य अवसर उपलब्ध थे। इसलिए इंगलैंड के विभिन्न भागों से लोग वहाँ आकर बसने लगे। प्रथम विश्वयुद्ध तक लंदन में मोटर और बिजली के सामान भी बड़े स्तर पर बनाए जाने लगे। इससे नए-नए कारखाने खुले। इससे भी लंदन की आबादी बढ़ती गयी।


26. नगरों में विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग अल्पसंख्यक हैं ऐसी मान्यता क्यों बनी है ?

उत्तर ⇒ विशेषाधिकार प्राप्त वे वर्ग होते हैं जो सामाजिक तथा आर्थिक दृष्टि से सर्वसंपन्न होते हैं। यह बात सही है कि नगरों में सामाजिक तथा आर्थिक विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग सीमित हैं। अतः इन्हें अल्पसंख्यक कहा गया है। चूंकि यह वर्ग सुविधा संपन्न है, इसलिए ये पूर्णरूपेण उन्मुक्त तथा संतष्ट जीवन जी सकते हैं। अधिकतर व्यक्ति जो शहरों में रहते हैं उनके साधन सीमित हैं तथा बाध्यताओं में सीमित रहने के कारण उनको सापेक्षिक स्वतंत्रता प्राप्त नहीं है।


27. लंदन में गरीबों के लिए आवास बनवाने की आवश्यकता क्यों पड़ी ?

उत्तर ⇒ लंदन में गरीबों के लिए आवास बनवाने के अनेक कारण थे

(i) गरीबों के टेनेमेंट्स रैनबसेरे और अजनबी घर अस्वास्थ्यकर और खतरनाक थे।
(ii) इसमें आग लगने का खतरा था जिससे पूरे शहर को नुकसान हो सकता था।
(iii) गरीबों की बड़ी संख्या सामाजिक राजनीतिक उथल-पुथल ला सकती
(iv) गरीबों के विद्रोह की आशंका को दबाने के लिए श्रमिकों के लिए भी आवासीय योजनाएँ बनाई गई।



7. व्यापार और भूमंडलीकरण


1. वैश्वीकरण से क्या समझते हैं ?

उत्तर ⇒ साधारण भाषा में वैश्वीकरण का अर्थ है अपनी अर्थव्यवस्था और विश्व अर्थव्यवस्था में सामंजस्य स्थापित करना। इसके अंतर्गत अनेक विदेशी उत्पाद अपना सामान और सेवाएँ बेच सकते हैं। इसी प्रकार हम अपने देश से निर्मित माल और सेवाएँ दूसरे देशों में बेच सकते हैं। इस प्रकार वैश्वीकरण के कारण विभिन्न देश अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक-दूसरे पर परस्पर रूप में निर्भर रहते हैं।


2. भूमंडलीकरण किसे कहते हैं ?

उत्तर ⇒ भूमंडलीकरण राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, वैज्ञानिक तथा सांस्कृतिक जीवन के विश्वव्यापी समायोजन की प्रक्रिया है जो विश्व के विभिन्न भागों के लोगों को भौतिक व मनोवैज्ञानिक स्तर पर एकीकृत करने का सफल प्रयास करता है।


3. भूमंडलीकरण में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के योगदान (भूमिका) को स्पष्ट करें।

उत्तर ⇒ 19वीं शताब्दी के मध्य से जब पूँजीवाद विश्वव्यापी व्यवस्था बन गया. भमंडलीकरण का स्वरूप भी व्यापक होता गया। इस समय पूँजी का निर्यात अंतर्राष्टीय आर्थिक संबंधों की एक मुख्य विशेषता बन गई और व्यापार का परिमाण भी काफी बढा। धीरे-धीरे यह संपूर्ण विश्व के अर्थतंत्र का नियामक हो गया। इसके प्रभाव को कायम करने में विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व व्यापार संस्था तथा पूँजीवादी देशों की बड़ी-बड़ी व्यापारिक और औद्योगिक कंपनियाँ जिन्हें हम बहुराष्ट्रीय कंपनी कहते हैं, का बहुत बड़ा योगदान था। मुक्त बाजार, मुक्त व्यापार, खुली प्रतिस्पर्धा बहुराष्ट्रीय निगमों (कंपनी) का प्रसार, उद्योग तथा सेवा क्षेत्र का निजीकरण उक्त आर्थिक भूमंडलीकरण के मुख्य तत्त्व हैं।


4. भूमंडलीकरण के भारत पर प्रभावों को स्पष्ट करें।

उत्तर ⇒ भूमंडलीकरण के प्रभाव से भारत भी अछूता नहीं रहा। भूमंडलीकरण के कारण भारतीय लोगों का जीवन स्तर ऊँचा उठा। भूमंडलीकरण के कारण भारतीय लोगों में रोजगार के कई नवीन अवसर को उपलब्ध कराया गया जिसके कारण भारतीय लोगों के जीविकोपार्जन के क्षेत्र में काफी बदलाव आया। जैसे टर । एवं ट्रेबल एजेंसी (यातायात की सुविधा), रेस्टोरेंट रेस्ट हाउस, आवासीय होटल । इत्यादि। सूचना एवं संचार के क्षेत्र में भी क्रांति आई जिससे इस क्षेत्र में भी भारतीय लोगों को रोजगार के अवसर पैदा हुए।


5. आर्थिक संकट से आप क्या समझते हैं ?

उत्तर ⇒ आर्थिक मंदी अर्थव्यवस्था में आनेवाली वैसी स्थिति है जब कृषि, उद्योग तथा व्यापार का विकास अवरुद्ध हो जाए। लाखों लोग बेरोजगारी की स्थिात में आ जाते हैं बैंकों और कंपनियों का दिवालियापन तथा वस्तु और मुद्रा दाना का बाजार में कोई कीमत नहीं रह जाती है।’


6. औद्योगिक क्रांति क्या थी ?

उत्तर ⇒ साधारणतया औद्योगिक क्रांति का तात्पर्य ऐसी प्रक्रिया से है जिसम वस्तओं का उत्पादन मानव श्रम के द्वारा न होकर मशीनों द्वारा कारखानो म हाता है। वाष्प शक्ति से संचालित मशीनों द्वारा कारखानों में व्यापक पैमाने पर वस्तुओ का अधिशेष उत्पादन ही औद्योगिक क्रांति थी।


7. ब्रटेन वुड्स सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य क्या था ?

उत्तर ⇒ ब्रटेन वुड्स सम्मेलन जुलाई, 1944 ई० में अमेरिका के न्यू हैम्पशायर स्थान पर हुआ था जिसका मुख्य उद्देश्य औद्योगिक विश्व में आर्थिक स्थिरता एवं पूर्ण रोजगार था। क्योंकि इसी आधार पर विश्व शांति स्थापित की जा सकती थी।


8. औद्योगिक क्रांति ने किस तरह विश्व बाजार के स्वरूप को विस्तृत किया ?

उत्तर ⇒ विश्व बाजार के स्वरूप को विस्तृत करने में औद्योगिक क्रांति की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। कारखानों के लिए कच्चा माल उपलब्ध कराने तथा उत्पादित वस्तुओं के लिए बाजार उपलब्ध कराने का काम विश्व बाजार ने किया। इस प्रक्रिया में उपनिवेशवाद ने महत्त्वपूर्ण योगदान किया। साथ ही व्यापार, पूँजी के प्रवाह और ‘ श्रमिकों के पलायन ने भी विश्व बाजार के स्वरूप को विस्तृत किया।


9. विश्व बाजार के लाभ-हानि पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।

उत्तर ⇒ विश्व बाजार के लाभ –

(i) यह सभी वर्गों के हितों की सुरक्षा करता है।
(ii) इससे व्यापार और उद्योग को तीव्र गति मिली।
(iii) बैंकिंग और बीमा व्यवसाय का उदय हुआ।
(iv) उपनिवेशों में औद्योगिकीकरण और आधुनिकीकरण हुआ, जैसे-भारत में।
(v) कृषि क्षेत्र में परिवर्तन आया।
(vi) शहरीकरण और जनसंख्या में वृद्धि हुई।

हानियाँ –

(i) एशिया और अफ्रीका में उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद का युग आरंभ हुआ।
(ii) गरीबी, अकाल और भूखमरी बढ़ गई।
(iii) उग्र राष्ट्रवाद का विकास हुआ।


10. गिरमिटिया मजदूरों पर एक टिप्पणी लिखें।

उत्तर ⇒ गिरमिटिया मजदूर वैसे श्रमिक थे जिन्हें अनुबंध के अंतर्गत भारत से ले जाया गया था। इन्हें पूर्वी उत्तर प्रदेश, पश्चिमी बिहार, पंजाब, हरियाणा से जमैका, फिजी, त्रिनिदाद-टोबैगो मारीशस आदि देशों में ले जाया गया। इन्हें मुख्यतः नगदी फसलों (गन्ना) के उत्पादन में लगाया जाता था। 1921 में ब्रिटिश सरकार ने यह व्यवस्था बंद कर दी।


11. वृहत उत्पादन व्यवस्था से आप क्या समझते हैं ?

उत्तर ⇒ वृहत उत्पादन व्यवस्था का आरंभ हेनरी फोर्ड ने कार उद्योग से किया। इससे उत्पादन बढा, लागत और कीमत में कमी आई. मजदरों की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ तथा उपभोक्ता वस्तुओं की माँग बढ़ गई। साथ ही हायर परचेज (किश्त पर सामान खरीदने) की परंपरा भी आरंभ हुई।


12. भारत पर आर्थिक महामंदी के क्या प्रभाव पड़े ?

उत्तर ⇒ भारत पर आर्थिक महामंदी के निम्नलिखित प्रभाव पड़े

(i) आर्थिक महामंदी से भारत का आयात-निर्यात व्यापार घटकर आधा हो गया।
(ii) आर्थिक महामंदी का सबसे बुरा प्रभाव भारत के किसानों को हुआ।
(iii) आर्थिक महामंदी से शहरी वर्ग प्रभावित नहीं हुआ।
(iv) महामंदी के प्रभाव को कम करने के लिए सरकार भारत से सोने का निर्यात करने लगी।
(v) आर्थिक महामंदी के कारण ही महात्मा गांधी को सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारंभ करना पड़ा।


13. संयुक्त राष्ट्र मौद्रिक एवं वित्तीय सम्मेलन क्यों बुलाया गया ? इसकी क्या उपलब्धियाँ थी ?

अथवा, ब्रेटन वुड्स समझौता की व्याख्या करें।

उत्तर ⇒ युद्धोत्तर अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था को सुव्यवस्थित करने के सुझावों के कार्यान्वयन की प्रक्रिया पर विचार-विमर्श करने के लिए 1944 में अमेरिका के न्यू हैम्पशायर में ब्रेटन वुड्स नामक स्थान पर इस सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस सम्मेलन में दो अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संस्थानों का गठन किया गया

(i) अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष तथा
(ii) अंतर्राष्ट्रीय पुनर्निर्माण एवं विकास बैंक अथवा विश्वबैंक।


14. 1950 के बाद विश्व अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण के लिए किए जानेवाले प्रयासों पर प्रकाश डालें।

उत्तर ⇒ द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात् व्यापक तबाही के प्रभाव को कम करने के उद्दे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक पुनर्निर्माण के प्रयास आरंभ किए गए। 1957 में यूरोपीय आर्थिक समुदाय की स्थापना कर एक साझा बाजार की की गई। 1995 में विश्व व्यापार संगठन बनाया गया। विभिन्न देशों ने अपने आर्थिक हितों की सुरक्षा के लिए जी-77, जी-8, आसियान, ओपेक, दक्षेस और यूरोपीय संघ का गठन किया।


15. बहुराष्ट्रीय कंपनी क्या है ?

उत्तर ⇒ कई देशों में एक ही साथ व्यापार और व्यवसाय करनेवाले कंपनियों . को बहुराष्ट्रीय कंपनी कहा जाता है। ये बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ पूँजीवादी देशों की बड़ी-बड़ी व्यापारिक और औद्योगिक कंपनियाँ हैं।


16. अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक विनिमय किन तीन प्रवाहों पर आधृत है?

उत्तर ⇒ अर्थशास्त्रियों के अनुसार अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक विनिमय तीन प्रकार के प्रवाहों पर आधृत हैं, ये हैं—

(i) व्यापार,
(ii) श्रम तथा
(iii) पूँजी।


17. ब्रेटन वुड्स सम्मेलन में स्थापित दो वित्तीय संस्थाओं के नाम लिखें।

उत्तर ⇒ ब्रेटन वुड्स सम्मेलन में स्थापित दो वित्तीय संस्था थी –

(i) अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष एवं
(ii) विश्व बैंक।


18. वर्तमान युग में कॉल सेंटर की क्या उपयोगिता है ?

उत्तर ⇒ वर्तमान समय में जगह-जगह पर कॉल सेंटर स्थापित किए गए हैं जिसमें बैठे-बैठे किसी कंपनी के विषय में वांछित सुविधा प्राप्त की जा सकती है।


19. विश्व बाजार के स्वरूप को स्पष्ट करें।

उत्तर ⇒ 19 वीं शताब्दी से विश्व में अनेक महत्त्वपूर्ण बदलाव आए। ये बदलाव आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और तकनीकी कारणों से आए जिसका समस्त विश्व पर व्यापक प्रभाव पड़ा। औद्योगिक क्रांति के द्वारा उत्पादन के बढ़ते आकार के कारण कच्चे माल तथा तैयार वस्तुओं की बिक्री के लिए बाजार की आवश्यकता हुई। इस विश्व बाजार के स्वरूप का आधार था कपडा उद्योग। औद्योगिक क्रांति के फैलाव के साथ-साथ बाजार का स्वरूप भी विश्वव्यापी होता गया।


20. एकतरफा अनुबंध व्यवस्था पर टिप्पणी लिखें।

उत्तर ⇒ एकतरफा अनुबंध व्यवस्था एक तरह की बंधुआ मजदूरी थी। इस व्यवस्था में मजदूरों को एक एकरारनामा जो बागान मालिक और मजदूरों के बीच होता था के तहत काम करना पड़ता था। उस एकरारनामे । रों को कोई अधिकार नहीं दिए गए थे सारे अधिकार मालिकों को प्राप्त था। रबर बागानों के खेतों एवं खानों में मजदूरों से एकतरफा अनुबंध व्यवस्था पर काम लिया जाता था। काम पूरा नहीं होने पर मजदूरों को मालिक दंडित भी कर सकते थे। वस्तुतः इस व्यवस्था के अंतर्गत मजदूरों की स्थिति गुलामों के समान थी।


21. भारत के सूती वस्त्र उद्योग में गिरावट के क्या कारण थे ?

उत्तर ⇒ 18वीं शताब्दी तक भारतीय सूती कपड़े की माँग सारे विश्व में थी, परंतु 19वीं शताब्दी के आते-आते अनेक कारणों से इसमें गिरावट आती गयी जो निम्नलिखित थे –

(i) भारतीय सूती कपड़े के उद्योग की गिरावट का सबसे मुख्य कारण इंगलैंड की औद्योगिक क्रांति थी जिसके कारण अब उसने भारत से सूती
कपड़े का आयात बंद कर दिया था।

(ii) औपनिवेशिक सरकार भारतीय बाजारों में ब्रिटिश निर्मित सूती वस्त्रों की भरमार कर दी जो भारतीय वस्त्र के मुकाबले काफी सस्ते होते थे।

(iii) अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी काफी कम कीमत में भारतीय कपास या रूई खरीदकर इंगलैंड भेज देती थी। जिससे भारतीय निर्माताओं को अच्छा कपास मिलना मुश्किल हो गया।

(iv) इसके अलावे भारतीय सूती कपड़े के निर्यात पर काफी कर लगा दिए गए तथा ब्रिटिश निर्मित कपड़े का कीमत काफी कम कर या नि:शुल्क भारत आने दिया गया।


22. जिटेन में कॉर्न लॉ समाप्त करने का क्या कारण था ? इसके क्या परिणाम हुए ?

उत्तर ⇒ ब्रिटेन में कॉर्न लॉ द्वारा मक्का के आयात को प्रतिबंधित करवा दिया। फलतः इंगलैंड के कषि उत्पादों को ऊँची कीमत पर बेचकर भू-स्वामी लाभ कमाने लगे। दूसरी ओर अनाज की बढ़ी कीमतों से उद्योगपति और शहरों में रहनेवाले लोग त्रस्त हो गए। इन लोगों ने कॉर्न लॉ का जबर्दस्त विरोध किया और इससे वापस लेने की मांग की। सरकार को बाध्य होकर कॉर्न लॉ समाप्त करना पडा तथा खाद्यान्न के आयात की अनुमति देनी पड़ी।


23. सत्रहवीं शताब्दी के पूर्व होनेवाले आदान-प्रदान का एक उदाहरण एशिया से और एक अमेरिका से दें।

उत्तर ⇒ विभिन्न देशों के साथ संपर्क का एक महत्त्वपूर्ण परिणाम यह हुआ कि खाने-पीने की वस्तुएँ एक देश से दूसरे देश में जाने लगी। व्यापारी और यात्री अपने देश का सामान ले जाते थे और विदेशों की विशिष्ट वस्तुओं को अपने यहाँ लाते थे। नूडल्स के विषय में विद्वानों का मानना है कि यह चीनी मूल का था और वहाँ से ही यह पश्चिमी जगत में पहुँचा। क्रिस्टोफर कोलम्बस अमेरिका से आलू, सोया, मूंगफली, मक्का, टमाटर इत्यादि अपने साथ यूरोप ले गया जहाँ से वे एशिया आए।


24. न्यू डील से आप क्या समझते हैं ?

उत्तर ⇒ आर्थिक मंदी के प्रभावों को समाप्त करने एवं उसे नियंत्रित करने के उद्देश्य से 1932 में अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रेंकलीन डी० रूजवेल्ट ने नई आर्थिक नीति अपनाई जिसे ‘न्यू डील’ का नाम दिया गया। इस नई नीति के अनुसार जन कल्याण -की व्यापक योजना के अंतर्गत आर्थिक, राजनीतिक एवं प्रशासनिक नीतियों को नियमित करने का प्रयास किया गया।


25. अमेरिका के उपनिवेशीकरण में किसका महत्त्वपूर्ण योगदान था ?

उत्तर ⇒ अमेरिका के उपनिवेशीकरण में पुर्तगाल और स्पेन का सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान था।

8. प्रेस-संस्कृति एवं राष्ट्रवाद

1. भारत में मुद्रण के आरंभिक इतिहास पर एक टिप्पणी लिखें।

उत्तर ⇒ भारत में छपाई का इतिहास पुर्तगालियों के आगमन के साथ आरंभ होता है। 16वीं सदी के मध्य में गोवा में पुर्तगाली धर्म प्रचारकों, जेसुइटो ने पहली बार छापाखाना लगाया। उन लोगों ने स्थानीय लोगों से कोंकणी भाषा सीखकर उसमें अनेक पुस्तकें छापी। 16वीं शताब्दी से ही कैथोलिक पादरियों ने तमिल भाषा में पहली पुस्तक को चीन में प्रकाशित की। इसी समय से भारत में पुस्तकों की छपाई ने गति पकड़ी। 1674 तक कोंकणी और कन्नड़ में लगभग पचास पुस्तकों का प्रकाशन हो चुका था। डच धर्म प्रचारकों ने भी पुस्तकों की छपाई में पीछे नहीं रहे। उन लोगों ने पुरानी पुस्तकों के अनुवाद सहित बत्तीस तमिल भाषा की किताबें छापी। इस प्रकार भारत में पुस्तकों का प्रकाशन यूरोपीय धर्म प्रचारकों द्वारा आरंभ किया गया।


2. तकनीकी विकास का मुद्रण पर क्या प्रभाव पड़ा ?

उत्तर ⇒ जैसे-जैसे छपाई का प्रसार होता गया वैसे-वैसे छापाखाना में भी निरंतर सुधार किए गए ताकि कम श्रम, लागत और समय में अधिक-से-अधिक छपाई की जा सके। 18वीं सदी के अंतिम चरण तक धातु के बने छापाखाने काम करने लगे। 19वीं-20वीं सदी में छापाखाना में और अधिक तकनीकी सुधार किए गए। 19वीं शताब्दी में न्यूयॉर्क निवासी एम० ए० हो ने शक्ति चालित बेलनाकर प्रेस का इजाद किया। इसके द्वारा प्रतिघंटा आठ हजार ताव छापे जाने लगे। इससे मुद्रण में तेजी आई। इसी सदी के अंत तक ऑफसेट प्रेस भी व्यवहार में आया। इस छापाखाना द्वारा एक ही साथ छ: रंगों में छपाई की जा सकती थी। 20वीं सदी के आरंभ से बिजली संचालित प्रेस व्यवहार में आया। इसने छपाई को और गति प्रदान की।


3. गुटेनबर्ग ने मुद्रणयंत्र का विकास कैसे किया ?

उत्तर ⇒ यूरोप में छापाखाना के आविष्कार का श्रेय सर्वप्रथम जर्मनी के योहान गुटेनबर्ग को है जिसने 1448 ई० में छापाखाना का आविष्कार किया। जैतून पेरने की मशीन को आधार बनाकर उसने प्रिंटिंग प्रेस का विकास किया। इस छपाई मशीन में पेंच की सहायता से लंबा हैंडल लगाया गया था। पेंच को घुमाकर प्लाटेन को गीले कागज पर दबाया जाता था। साँचे का उपयोग कर अक्षरों की धातु की आकृतियों को ढाला गया। इन टाइपों को घुमाने या ‘मूव’ करने की व्यवस्था की गई थी।


4. भारतीय प्रेस की किन्हीं तीन विशेषताओं का वर्णन करें।

उत्तर ⇒ भारतीय प्रेस की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

(i) यह ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध भारतीयों की भावना को एकरूप देने, उसकी नीतियों एवं शोषण के विरुद्ध जागृति लाने एवं देशप्रेम की भावना जागृत कर राष्ट्र निर्माण में इसने महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया।

(ii) इसके द्वारा न्यायिक निर्णयों में पक्षपात, धार्मिक एवं सामाजिक सुधार आंदोलन को बल मिला तथा भारतीय जनमत जाग्रत हुआ।

(iii) इसने न केवल राष्ट्रवादी आंदोलन को एक नई दिशा दी अपितु भारत में शिक्षा को प्रोत्साहन, आर्थिक विकास एवं औद्योगिकीकरण तथा श्रम आंदोलन को भी प्रोत्साहित करने का कार्य किया।


5. भारत में पांडुलिपियाँ कैसे बनाई जाती थी ?

उत्तर ⇒ प्राचीन काल में भारत में धातु-पत्थर पर अभिलेख उत्कीर्ण करवाने के अतिरिक्त भोजपत्र एवं ताड़ के पत्रों तथा बाद में हाथ से बने कागज का व्यवहार भी लेखन सामग्री के रूप में किया गया। इनसे हस्तलिखित पांडुलिपियाँ तैयार की गई। संस्कृत, पाली, प्राकृत, क्षेत्रीय भाषाओं, अरबी तथा फारसी में ऐसी असंख्य पांडुलिपियाँ तैयार की गई। इनके किनारों को सुंदर रंगीन चित्रों से सुसज्जित किया जाता था। इनके पन्नों को सिलकर उन पर जिल्द चढ़ा दी जाती थी जिससे वे सुरक्षित रहती थी।


6. वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट पारित करने का क्या उद्देश्य था ?

उत्तर ⇒ वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट पारित करने का मुख्य उद्देश्य था –

(i) सरकार वैसी कोई पत्र-पत्रिका अथवा समाचार पत्र को मुक्त रूप से प्रकाशित नहीं होने देना चाहती थी जिसमें सरकारी व्यवस्था और नीतियों की आलोचना हो तथा

(ii) भारत में उभरते राष्ट्रवाद के प्रसार को रोकने के लिए।


7. यंग इंडिया समाचार पत्र के बारे में बताएँ।।

उत्तर ⇒ यंग इंडिया अंग्रेजी में प्रकाशित समाचार पत्र था। इसका प्रकाशन 1919 ई० में अहमदाबाद से हुआ। इसके संपादक महात्मा गाँधी थे। इसके माध्यम से महात्मा गाँधी ने अपने विचारों तथा राष्ट्रवादी आन्दोलन का प्रचार जन-जन तक किया।


8. रोमन चर्च ने प्रकाशकों और पुस्तक विक्रेताओं पर प्रतिबंध क्यों लगाया ?

उत्तर ⇒ रोमन चर्च प्रकाशकों और पुस्तक विक्रेताओं पर प्रतिबंध इसलिए लगाया जिससे प्रकाशक धार्मिक स्वरूप को चुनौती देनेवाली सामग्री का प्रकाशन नहीं कर सकें। पुस्तकें धार्मिक मान्यताओं एवं चर्च की सत्ता को चुनौती दे रहे थे।


9. तिलक ने किस भाषा में केसरी और मराठा का प्रकाशन किया ?

उत्तर ⇒ तिलक ने केसरी का प्रकाशन मराठी भाषा में तथा मराठा का प्रकाशन अंग्रेजी भाषा में किया।


10. इक्वीजीशन से आप क्या समझते हैं ? इसकी जरूरत क्यों पड़ी ?

उत्तर ⇒ धर्म-विरोधी विचारों के प्रसार को रोकने के लिए रोमन चर्च ने इक्वीजीशन नामक संस्था का गठन किया। यह एक प्रकार का धार्मिक न्यायालय था। इसका काम धर्म विरोधियों की पहचान कर उन्हें दंडित करना था। नये धार्मिक विचारों के प्रसार को रोकने के लिए चर्च ने प्रकाशकों और पुस्तक विक्रेताओं पर अनेक प्रतिबंध लगा दिये जिससे वे धार्मिक स्वरूप को चुनौती देनेवाली सामग्री का प्रकाशन नहीं कर सकें। 1558 से चर्च प्रतिबंधित पुस्तकों की सूची रखने लगा जिससे उनका पुनर्मुद्रण और वितरण नहीं हो सके।


11. लॉर्ड लिटन ने राष्ट्रीय आंदोलन को गतिमान बनाया । कैसे ?

उत्तर ⇒ देशी भाषाओं के समाचार-पत्र को नियंत्रण में लाने के लिए लॉर्ड लिटन ने 1878 ई० में वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट पारित किया। देशी समाचार पत्र खुलकर औपनिवेशिक शासन के शोषणकारी नीतियों के खिलाफ राष्ट्रवादी भावना को उत्पन्न कर रहे थे। इसी को ध्यान में रखकर लिटन ने देशी भाषा समाचार-पत्र अधिनियम के माध्यम से समाचार-पत्रों पर अधिक प्रतिबंध लगाया तथा इसे नियंत्रण में लाने का प्रयास किया था। लॉर्ड लिटन के वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट ने राष्ट्रीयता की भावना एवं जन असंतोष में उबाल लाने का कार्य किया ही, साथ ही साथ राष्ट्रीय आंदोलन को भी गतिमान बनाया।


12. मार्टिन लूथर ने अपनी पिच्चानवें स्थापनाएँ किस चर्च के दरवाजे पर टाँग दी ?

उत्तर ⇒ विटेनवर्ग चर्च के दरवाजे पर मार्टिन लूथर ने अपनी पिच्चानवें स्थापनाएँ को टाँग दी।


13. मुद्रण संस्कृति ने फ्रांसीसी क्रांति के लिए किस प्रकार अनुकूल परिस्थितियाँ बनाई ?

उत्तर ⇒ मुद्रित संस्कृति ने निम्नलिखित कारणों से फ्रांसीसी क्रांति के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ बनाई –

(i) इसने ज्ञानोदय के विचारों का प्रसार किया।
(ii) मुद्रण ने वाद-विवाद की संस्कृति का भी विकास किया।
(iii) इसने राजशाही के विरुद्ध असंतोष को बढ़ावा देकर क्रांति की भावना को बलवती बनाया।


14. मार्टिन लूथर कौन था ? अपने धार्मिक विचारों का प्रसार करने के लिए उसने मुद्रित सामग्री का व्यवहार कैसे किया ?

उत्तर ⇒ मार्टिन लूथर जर्मनी का एक धर्मसुधारक था। वह रोमन कैथोलिक चर्च में व्याप्त कुरीतियों का विरोधी था। उसे “धर्मसुधार आंदोलन का अग्रदूत” कहा जाता है। अपने विचारों के लिए उसने मुद्रण का सहारा लिया। उसका मानना था कि “मुद्रण ईश्वर की दी हुई महानतम देन है, सबसे बड़ा तोहफा।” 1517 में उसने ‘पंचानवे स्थापनाएँ’ लिखकर इसकी एक प्रति विटेनबर्ग चर्च के दरवाजे पर टाँग
दी। इसकी प्रतियाँ छापकर चर्च को वाद-विवाद करने की चुनौती दी गई।


15. रोमन कैथोलिक चर्च ने 16वीं सदी के मध्य से प्रतिबंधित पुस्तकों की सूची रखनी क्यों आरंभ की ?

उत्तर ⇒ मार्टिन लूथर ने 1517 में पिच्चानवें स्थापनाएँ लिखी, जिसमें उसने रोमन कैथोलिक चर्च में प्रचलित अनेक परंपराओं एवं धार्मिक विधियों पर प्रहार किया। लूथर के लेख के व्यापक प्रभाव से रोमन कैथोलिक चर्च में विभाजन हो गया। लूथर ने ईसाई धर्म की नई व्याख्या प्रस्तुत की। उसके समर्थक प्रोटेस्टेंट कहलाए। धीरे-धीरे प्रोटेस्टेंट ईसाई धर्म का प्रमुख संप्रदाय बन गया, रूढ़िवादी कैथोलिक संप्रदाय का प्रभाव कमजोर पड़ गया। दूसरी ओर, रोमन कैथोलिक चर्च धर्म विरोधी भावना दबाने के लिए प्रयासरत थे क्योंकि पुस्तकें धार्मिक मान्यताओं एवं चर्च की सत्ता को चुनौती दे रही थी। नए धार्मिक विचारों के प्रसार को रोकने के लिए चर्च ने प्रकाशकों और पुस्तक विक्रेताओं पर अनेक प्रतिबंध लगा दिए और वितरण नहीं हो सके।


16. जापानी उकियों चित्रकला शैली की विषय वस्तु क्या थी ?

उत्तर ⇒ 1753 में एदो (तोक्यों) के कितागावा उतामारों ने एक नई चित्रकला शैली का विकास किया ओ ‘उकियो’ अथवा तैरती दुनिया का चित्र था। इसका विषय वस्तु शहरी लोगों के जीवन का चित्रण था।


17. निम्नलिखित के बारे में 30 शब्दों में लिखें।

  1.  छापाखाना                             
  2.  गुटेनबर्ग     
  3.  वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट                 
  4.  प्रोटेस्टेंटवाद 
  5.  रेशम मार्ग                               
  6.  सर सैयद अहमद                     
  7.  यंग इंडिया                             
  8.  मराठा
  9.  बाइबिल

1. छापाखाना – छापाखाना के आविष्कार का महत्त्व इस भौतिक संसार में आग, पहिया और लिपि की तरह है जिसने अपनी उपस्थिति से पूरे विश्व की जीवन शैली को एक नया आयाम दिया। छापाखाना के आविष्कार और विकास का श्रेय चीन को है।

2. गुटेन्वर्ग – गुटेन्वर्ग का जन्म जर्मनी के मेन्जनगर में एक कृषक-जमींदार व्यापारी परिवार में हुआ था। छापाखाना का आविष्कार गुटेन्वर्ग ने 1450 में किया। गुटेन्वर्ग ने मुद्रण स्याही का भी निर्माण किया। गुटेन्वर्ग छपाई मशीन को ‘मूवेबल टाइप प्रिंटिंग मशीन’ कहा गया।

3. वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट – 1878 ई० में लॉर्ड लिटन ने वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट पारित किया था। यह एक्ट देशी समाचार पत्रों को नियंत्रण में लाने के लिए पास किया गया था क्योंकि देशी भाषा वाले समाचार पत्र सरकार की साम्राज्यवादी नीतियों के विरुद्ध राष्ट्रवादी भावना को उत्पन्न कर रहे थे।

4. प्रोटेस्टेंटवाद – मार्टिन लूथर के लेख के व्यापक प्रभाव से रोमन कैथोलिक चर्च में विभाजन हो गया। लूथर ने ईसाई धर्म की नई व्याख्या प्रस्तुत की। उसके समर्थक प्रोटेस्टेंट कहलाए। धीरे-धीरे प्रोटेस्टेंट संप्रदाय ईसाई धर्म का प्रमुख संप्रदाय बन गया। प्रोटेस्टेंटवाद यह मानता था कि चर्च के रोमन कैथोलिक समुदाय में बुराई तथा भ्रष्टाचार व्याप्त है। अतः चर्च में सुधार की आवश्यकता है।

5. रेशम मार्ग – समरकन्द – पर्शिया-सिरिया मार्ग को रेशम मार्ग कहा जाता था। यह एशिया से यूरोप पहुँचने का व्यापारियों का मार्ग था। इसी रेशम मार्ग से ग्यारहवीं शताब्दी में चीन से कागज यूरोप पहँचा।

6. सर सैयद अहमद – सर सैयद अहमद अलीगढ़ आंदोलन के प्रणेता थे। मुस्लिमों के बीच शिक्षा का प्रसार करने में सर सैयद अहमद का बहुत ही महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। सर सैयद अहमद के राष्ट्रीय राजनीति में बढ़ते प्रभाव के कारण ही उर्दू प्रेस को कांग्रेस समर्थित राष्ट्रीय आंदोलन एवं अंग्रेजी राज से मुसलमानों के संबंधों की नई व्यवस्था करने के लिए प्रेरित किया।

7. यंग इंडिया – ‘यंग इंडिया’ नामक पत्र का संपादन महात्मा गाँधी के द्वारा उनके विचारों एवं राष्ट्रवादी आंदोलन का प्रचार करने के लिए किया गया था। इस पत्र के माध्यम से गाँधीजी ने सरकार को अपने राजनैतिक दर्शन एवं राजनीतिक कार्यक्रमों से अवगत कराया तथा भारतीयों को एक बड़े आंदोलन के लिए प्रशिक्षित किया।

8. मराठा – अंग्रेजी भाषा में ‘मराठा’ नामक समाचार-पत्र की शुरुआत बाल गंगाधर तिलक के संपादन में 1881 ई० में बंबई से हुई। यह पत्र उग्रराष्ट्रवादी विचारों से प्रभावित था तथा इसका जनमानस पर व्यापक प्रभाव था।

9. बाइबिल – बाइबिल ईसाइयों का पवित्र धर्म ग्रंथ है। गुटेन्वर्ग प्रेस में जो पहली पुस्तक छपी वह ईसाई धर्मग्रंथ बाइबिल ही था। गुटेन्वर्ग ने मुद्रण एवं हैण्ड प्रेस का विकास कर 36 लाइन में बाइबिल को 1448 ई० में छापा।

1. इटली के एकीकरण में मेजिनी के योगदान को बतायें।

उत्तर ⇒ इटली के एकीकरण में मेजिनी- मेजिनी को इटली के एकीकरण को पैगम्बर कहा जाता है। वह दार्शनिक, लेखक, राजनेता, गणतंत्र का समर्थक एवं एक कर्मठ कार्यकर्ता था। उसका जन्म 1805 में सार्डिनिया के जिनोआ नगर में हुआ था। 1815 में जब जिनोआ को पिडमौंट के अधीन कर दिया गया, तब इसका विरोध करने वालों में मेजिनी भी था। राष्ट्रवादी भावना से प्रेरित होकर उसने गुप्त क्रांतिकारी संगठन कार्बोनारी की सदस्यता ग्रहण की। अपने गणतंत्रवादी उद्देश्यों के प्रचार के लिए मेजिनी ने 1831 में मार्सेई में ‘यंग इटली’ तथा 1834 में बर्न में ‘यंग युरोप की स्थापना की। इसका सदस्य युवाओं को बनाया गया। मेजिनी जन संप्रभुता के सिद्धांत में विश्वास रखता था। उसने ‘जनार्दन जनता तथा इटली’ का नारा दिया। उसका उद्देश्य आस्ट्रिया के प्रभाव से इटली को मुक्त करवाना तथा संपूर्ण इटली का एकीकरण करना था।


2. इटली के एकीकरण में काबूर और गैरीबाल्डी के योगदानों का उल्लेख करें।

उत्तर ⇒ इटली का एकीकरण मेजिनी, काबूर और गैरीबाल्डी के सतत प्रयासों से हुआ था।

इटली के एकीकरण में काबूर का योगदान– काबूर का मानना था कि सार्डिनिया के नेतृत्व में ही इटली का एकीकरण संभव थाउसने प्रयास आरंभ कर दिए। विक्टर एमैनुएल के प्रधानमंत्री के रूप में उसने इटली की आर्थिक और सैनिक शक्ति सुदृढ़ की। पेरिस शांति-सम्मेलन में उसने इटली । की समस्या को यूरोप का प्रश्न बना दिया। 1859 में फ्रांस की सहायता से ऑस्ट्रिया को पराजित कर उसने लोम्बार्डी पर अधिकार कर लिया। मध्य इटली स्थित अनेक राज्यों को भी सार्डिनिया में मिला लिया गया।

इटली के एकीकरण में गैरीबाल्डी का योगदान- उसका मानना था कि युद्ध के बिना इटली का एकीकरण नहीं होगा। इसलिए, उसने आक्रामक नीति अपनाई। ‘लालकुर्ती’ और स्थानीय किसानों की सहायता से उसने सिसली और नेपल्स पर अधिकार कर लिया। इन्हें सार्डिनिया में मिला लिया गया। वह पोप के राज्य पर भी आक्रमण करना चाहता था, परंतु काबूर ने इसकी अनुमति नहीं दी।


3. जर्मनी के एकीकरण की प्रक्रिया का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत करें।

उत्तर ⇒ शिक्षकों एवं विद्यार्थियों ने जर्मनी के एकीकरण के उद्देश्य से ‘ब्रूशेन शैफ्ट’ नामक सभा स्थापित की। वाइमर राज्य का येना विश्वविद्यालय राष्ट्रीय आंदोलन का केंद्र था। 1834 में जर्मन व्यापारियों ने आर्थिक व्यापारिक समानता के लिए प्रशा के नेतृत्व में जालवेरिन नामक आर्थिक संघ बनाया जिसने राष्ट्रवादी प्रवृत्तियों को बढ़ावा दिया। 1848 ई० में जर्मन राष्ट्रवादियों ने फ्रैंकफर्ट संसद का आयोजन कर प्रशा के राजा फ्रेडरिक विलियम को जर्मनी के एकीकरण के लिए अधिकृत किया लेकिन फ्रेडरिक द्वारा अस्वीकार कर देने से एकीकरण का कार्य रुक गया। फ्रेडरिक की मृत्यु के बाद विलियम प्रथम प्रशा का राजा बना। विलियम राष्ट्रवादी विचारों का पोषक था। विलियम ने जर्मनी के एकीकरण के उद्देश्यों को ध्यान में रखकर महान कूटनीतिज्ञ बिस्मार्क को अपना चांसलर नियुक्त किया। बिस्मार्क ने जर्मनी के एकीकरण के लिए “रक्त और लौह की नीति” का अवलंबन किया। इसके लिए उसने डेनमार्क, ऑस्ट्रिया तथा फ्रांस के साथ युद्ध किया। अंततोगत्वा जर्मनी 1871 में एकीकृत राष्ट्र के रूप में यूरोप के मानचित्र में स्थान पाया।


4. जर्मनी के एकीकरण में बिस्मार्क की भूमिका का वर्णन करें।

उत्तर ⇒ फ्रेडरिक विलियम चतुर्थ की मृत्यु के बाद प्रशा का राजा विलियम प्रथम बना। वह राष्टवादी था तथा प्रशा के नेतत्व में जर्मनी का एकीकरण करना चाहता था। विलियम जानता था कि आस्टिया और फ्रांस को पराजित किए बिना जर्मनी का एकीकरण संभव नहीं है। अतः उसने 1862 ई० में ऑटोबॉन बिस्मार्क को अपना चांसलर (प्रधानमंत्री) नियुक्त किया। बिस्मार्क प्रख्यात राष्ट्रवादी और कूटनीतिज्ञ था। जर्मनी के एकीकरण के लिए वह किसी भी कदम को अनुचित नहीं मानता था। उसने जर्मन राष्ट्रवादियों के सभी समूहों से संपर्क स्थापित कर उन्हें अपना प्रभाव में लाने का प्रयास किया। बिस्मार्क का मानना था कि जर्मनी की समस्या का समाधान बौद्धिक भाषणों से नहीं, आदर्शवाद से नहीं वरन् प्रशा के नेतृत्व में रक्त और लाह को नीति से होगा। 1871 ई० में फ्रैंकफर्ट की संधि द्वारा दक्षिणी रान्य उत्तरी जर्मन महासंघ में मिल गए। अंततोगत्वा जर्मनी 1871 ई० में एक एकीकृत राष्ट्र के रूप में यूरोप के मानचित्र पर उभरकर सामने आया। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि जर्मनी के एकीकरण में बिस्मार्क की भूमिका काफी महत्त्वपूर्ण थी।


5. वियना कांग्रेस (सम्मेलन का आयोजन क्यों किया गया ? इसकी क्या उपलब्धियाँ थी?

उत्तर ⇒ वियना कांग्रेस का उद्देश्य नेपोलियन द्वारा यरोप की राजनीति में लाए गए परिवर्तनों को समाप्त करना, गणतंत्र एवं प्रजातंत्र की भावना का विरोध करना एवं पुरातन व्यवस्था की पुनर्स्थापना करना था। इसके द्वारा निम्नलिखित परिवतन किए गए

(i) फ्रांस को नेपोलियन द्वारा विजित क्षेत्रों को वापस लौटाने को कहा गया।
(ii) प्रशा को उसकी पश्चिमी सीमा पर नए महत्त्वपूर्ण क्षेत्र दिए गए। इटलो को अनेको छोटे-छोटे राज्यों में विभक्त कर दिया गया।
(iv) रूस को पोलैंड का एक भाग दिया गया।
(V) ब्रिटेन को अनेक क्षेत्र दिए गए।
(vi) जर्मन महासंघ पर आस्ट्रिया का प्रभाव स्थापित किया गया।
(vii) नेपोलियन द्वारा पराजित राजवंशों की पुनर्स्थापना की गई। इस प्रकार वियना कांग्रेस में प्रतिक्रियावादी शक्तियों की विजय हुई, फ्रांसीसी क्रांति की उपलब्धियों को तिलांजलि दे दी गई।


6. राष्ट्रवाद के उदय के कारणों एवं प्रभाव की चर्चा करें।

उत्तर ⇒ कारण यूरोप में राष्ट्रीयता की भावना को 1789 की फ्रांसीसी क्रांति तथा नेपोलियन की विजयों ने बढ़ावा दिया। फ्रांसीसी क्रांति ने कुलीन वर्ग के हाथों से राजनीति को सर्वसाधारण एवं मध्यमवर्ग तक पहुँचा दिया। नेपोलियन ने विजित राज्यों में राष्ट्रवादी भावना जागृत कर दी। साथ ही नेपोलियन के युद्धों और विजयों से अनेक राष्ट्रों में फ्रांसीसी आधिपत्य के विरुद्ध आक्रोश पनपा, जिससे राष्ट्रवाद का विकास हुआ। प्रभाव-18वीं एवं 19वीं शताब्दियों में यूरोप में जिस राष्ट्रवाद की लहर चली, उसके व्यापक और दूरगामी प्रभाव यूरोप और विश्व पर पड़े जो निम्नलिखित थे

(i) राष्ट्रीयता की भावना से प्रेरित होकर अनेक राष्ट्रों में क्रांतियाँ और आंदोलन हुए। इनके फलस्वरूप अनेक नए राष्ट्रों का उदय हआ. जैसे इटली और जर्मनी के एकीकृत राष्ट्र।

(ii) यूरोपीय राष्ट्रवाद के विकास का प्रभाव एशिया और अफ्रीका में भी पड़ा। यूरोपीय उपनिवेशों के आधिपत्य के विरुद्ध वहाँ भी औपनिवेशिक शासन से मुक्ति के लिए राष्ट्रीय आंदोलन आरंभ हो गए।

(iii) राष्ट्रवाद के विकास ने प्रतिक्रियावादी शक्तियों और निरंकुश शासकों का
प्रभाव कमजोर कर दिया।


7. राष्ट्रवाद के उदय का यूरोप और विश्व पर क्या प्रभाव पड़ा ?

उत्तर ⇒ 18वीं-19वीं शताब्दी में यूरोप में जिस राष्ट्रवाद की लहर चली गई व्यापक और दूरगामी प्रभाव न केवल यूरोप पर वरन् पूरे विश्व पर पड़ा जो निम्नलिखित

(i) राष्ट्रीयता की भावना से ही प्रेरित होकर अनेक राष्ट्रों में क्रांतियाँ और आंदोलन हए जिसके परिणामस्वरूप अनेक नये राष्ट्रों का उदय हुआ। इटली और जर्मनी का एकीकरण भी राष्ट्रवाद के उदय का ही परिणाम था।

(ii) राष्ट्रवाद के विकास का प्रभाव एशिया और अफ्रीका में भी देखने को मिला। यूरोपीय उपनिवेशों के आधिपत्य के विरुद्ध वहाँ भी औपनिवेशिक शासन से मुक्ति के लिए राष्ट्रीय आंदोलन आरंभ हो गए।

(iii) भारतीय राष्ट्रवादी भी यूरोपीय राष्ट्रवाद से प्रभावित हए। पैसूर के टीपू सलतान ने फ्रांसीसी क्रांति से प्रभावित होकर जैकोबिन क्लब की स्थापना की एवं स्वयं इसका सदस्य भी बना।

(iv) धर्मसुधार आंदोलन के भारतीय नेताओं ने भी राष्ट्रवादी भावनाओं से प्रभावित होकर राष्ट्रीय आंदोलनों को अपना समर्थन दिया।

(v) राष्ट्रवाद के विकास ने यूरोप में प्रतिक्रियावादी शक्तियों और निरंकुश शासकों के प्रभाव को कमजोर कर दिया।

(vi) राष्ट्रवाद के विकास का कुछ नकारात्मक प्रभाव भी पड़ा। 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध से राष्ट्रवाद ‘संकीर्ण राष्ट्रवाद’ में बदल गया। प्रत्येक राष्ट्र अपने राष्ट्रीय हित की दुहाई देकर उचित-अनुचित सब कार्य करने लगे।

(vii) राष्ट्रवाद के उदय ने साम्राज्यवादी प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया। इस साम्राज्यवादी प्रवृत्ति के कारण ही ऑटोमन साम्राज्य ध्वस्त हुआ और पूरा बाल्कन क्षेत्र युद्ध का अखाड़ा बन गया।


8. जुलाई, 1830 की क्रांति का विवरण दें।

उत्तर ⇒ जुलाई, 1830 में चार्ल्स- X (दशम) के स्वेच्छाचारी शासन के विरुद्ध फ्रांस में क्रांति की ज्वाला भड़क उठी। फ्रांस में वियना व्यवस्था के तहत क्रांति के पूर्व की व्यवस्था को स्थापित करने के लिए बूर्वो राजवंश को पुनर्स्थापित किया गया तथा लुई 18वाँ फ्रांस का राजा बना। उसने फ्रांस की बदली हुई परिस्थितियों को समझा और फ्रांसीसी जनता पर पुरातनपंथी व्यवस्था को थोपने का प्रयास नहीं किया। उसने प्रतिक्रियावादी तथा सधारवादी शक्तियों के मध्य सामंजस्य स्थापित करने का. प्रयास किया। उसने संवैधानिक सुधारों की घोषणा भी की। 1824 में उसकी मृत्यु के पश्चात् फ्रांस का राजसिंहासन चार्ल्स दशम को मिला। वह एक स्वेच्छाचारी तथा निरंकुश शासक था जिसने फ्रांस में उभर रही राष्ट्रीयता तथा जनतंत्रवादी भावनाओं को दबाने का कार्य किया। उसके द्वारा प्रतिक्रियावादी पोलिग्नेक को प्रधानमंत्री बनाया गया। पोलिग्नेक ने पूर्व में लुई 18वें द्वारा स्थापित समान नागरिक संहिता के स्थान पर शक्तिशाली अभिजात्य वर्ग की स्थापना तथा उसे विशेषाधिकारों से विभूषित करने का प्रयास किया। उसके इस कदम को उदारवादियों ने चुनौती तथा क्रांति के विरुद्ध षड्यंत्र समझा। प्रतिनिधि सदन एवं दूसरे उदारवादियों ने पोलिग्नेक के विरुद्ध गहरा असंतोष प्रकट किया। चार्ल्स-X ने इस विरोध को प्रतिक्रियास्वरूप 25 जुलाई, 1830 ई० को चार अध्यादेशों द्वारा उदार तत्त्वों का गला घोंटने का प्रयास किया। इन अध्यादेशों के विरुद्ध पेरिस में क्रांति की लहर दौड़ गई। 27-29 जुलाई तक जनता और राजशाही में संघर्ष होता रहा। इसे ही जुलाई क्रांति कहते हैं।


9. 1848 की क्रांति के प्रभावों की समीक्षा कीजिए।

उत्तर ⇒ 1848 की क्रांति के समय फ्रांस का राजा लुई फिलिप था। उसका प्रधानमंत्री गिजो प्रतिक्रियावादी था। वह किसी भी प्रकार के सुधार का विरोधी था। जनता में व्याप्त घोर असंतोष को जब उसने दबाने का प्रयास किया तब क्रोधित जनता ने राजमहल को घेर लिया। फिलिप को किसी से भी सहायता नहीं मिली जिससे विवश होकर वह राजगद्दी छोड़कर इंगलैंड भाग गया। राजा के भागने के बाद क्रांतिकारियों ने फ्रांस में द्वितीय गणराज्य की स्थापना की। नई व्यवस्था के अनुरूप 21 वर्ष से अधिक आयु के सभी वयस्क पुरुषों को मताधिकार मिला। मजदूरों को काम दिलाने के लिए राष्ट्रीय कारखाने खोले गए, उन्हें बेकारी भत्ता भी दिया गया। इन कार्यों से श्रमिकों की स्थिति में विशेष सुधार नहीं आया, उनका असंतोष बना रहा। गणतंत्रवादियों का नेता लामार्टिन एवं सुधारवादियों का नेता लुई ब्लॉ था। शीघ्र ही दोनों में मतभेद आरंभ हो गया। नवंबर में द्वितीय गणराज्य का नया संविधान बना। लुई नेपोलियन गणतंत्र का राष्ट्रपति बना। 1848 ई० की क्रांति के परिणामस्वरूप फ्रांस में एक नए प्रकार के राष्ट्रवाद का उत्थान हुआ जिसका आधार सनिक शक्ति था। 1852 में नेपोलियन ने गणतंत्र को समाप्त कर दिया और स्वयं फ्रांस का सम्राट बन गया।
1848 की क्रांति ने न सिर्फ फ्रांस की पुरातन व्यवस्था का अंत किया बल्कि इटली, जर्मनी, आस्ट्रिया, हॉलैंड, स्वीट्जरलैंड, डेनमार्क, स्पेन, पोलैण्ड, आयरलैंड तथा इगलड भी इस क्रांति से प्रभावित हए। इटली तथा जर्मनी के उदारवाला 7 बढ़ते हुए जन असंतोष का फायदा उठाया और राष्ट्रीय एकीकरण क कीकरण के द्वारा राष्ट्र राज्य की स्थापना की माँगों को आगे बढ़ाया, जो संवैधानिक लोकतत्र लोकतंत्र के सिद्धांत पर आधारित था।


10. यूनानी स्वतंत्रता आंदोलन का संक्षिप्त विवरण दें।

उत्तर ⇒ यूनान का अपना गौरवमय अतीत रहा है। यनानी सभ्यता का साहित्यिक प्रगति, विचार. दर्शन. कला. चिकित्सा. विज्ञान आदि क्षेत्र की उपलब्धिया यूनानया के लिए प्रेरणास्त्रोत थे। परंत इसके बावजद भी यनान तर्की साम्राज्य क अधान था। फ्रांसीसी क्रांति से यनानियों में भी राष्टीयता की भावना की लहर जागा। फलतः तुका शासन से स्वयं को अलग करने के लिए आंदोलन चलाये जाने लगे। इसक लिए इन्होंने हितेरिया फिलाडक नामक संस्था की स्थापना ओडेसा नामक स्थान पर काा इसका उद्देश्य ती शासन को यनान से निष्काषित कर उसे स्वतंत्र बनाना था। क्राति के नेतृत्व के लिए यूनान में शक्तिशाली मध्यम वर्ग का भी उदय हो चुका था। यूनान में विस्फोटक स्थिति तब और बन गई जब तुर्की शासका द्वारा यूनाना स्वतंत्रता संग्राम में संलग्न लोगों को बरी तरह कचलना शरू किया। 1821 ई० में एलेक्जेंडर चिपसिलांटी के नेतत्व में यनान में विद्रोह शरू हो गया। अंतत: 1829 ई० में एड्रियानोपल की संधि द्वारा तुर्की की नाममात्र की अधीनता में यूनान को स्वायत्तता देने की बात तय हुई। फलतः 1832 में यूनान को एक स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर दिया गया। बवेरिया के शासक ‘ओटो’ को स्वतंत्र यूनान का राजा घोषित किया गया।

परिणाम-  यूनानियों ने लंबे और कठिन संघर्ष के बाद ऑटोमन साम्राज्य के अत्याचारी शासन से मुक्ति पाई। यूनान के स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र का उदय हुआ। यद्यपि गणतंत्र की स्थापना नहीं हो सकी परंतु एक स्वतंत्र राष्ट्र के उदय ने मेटरनिख की प्रतिक्रियावादी नीति को गहरी ठेस लगाई।


11. राष्ट्रपति निक्सन के हिन्द-चीन में शांति के संबंध में पाँच सूत्रीयोजना क्या थी ? इसका क्या प्रभाव पड़ा ?

उत्तर ⇒ अमेरिकी-वियतनाम युद्ध में अमेरिकी अत्याचार की आलोचना पूरे विश्व में होने लगी। अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन ने हिन्द-चीन में शांति के लिए पाँच पोजना की घोषणा की जो निम्नलिखित थी

(i) हिन्द-चीन की सभी सेनाएँ युद्ध बंद कर यथास्थान पर रहे।

(ii) युद्ध विराम की देखरेख अंतर्राष्ट्रीय पर्यवेक्षक करेंगे।

(iii) इस दौरान कोई देश अपनी शक्ति बढ़ाने का प्रयत्न नहीं करेगा।

(iv) युद्ध विराम के दौरान सभी तरह की लड़ाइयाँ बंद रहेगी तथा

(v) यद्धं का अंतिम लक्ष्य समूचे हिन्द-चीन में संघर्ष का अंत होगा।

प्रभाव- राष्ट्रपति निक्सन के इस शांति प्रस्ताव को स्वीकार कर दिया गया। निक्सन ने पुनः आठ सूत्री योजना रखी जिसे भी सोवियत संघ ने भी अपना प्रभाव बढाना आरंभ कर दिया। 27 फरवरी हस्ताक्षर हो गया। इस तरह से अमेरिका के साथ चला आ रहा युद्ध समाप्त हो गया एवं अप्रैल 1975 में उत्तरी एवं दक्षिणी वियतनाम का एकीकरण हो गया।

1. रूसी क्रांति के प्रभाव की विवेचना करें।

उत्तर ⇒ 1917 का 1917 की बोल्शेविक क्रांति के दूरगामी और व्यापक प्रभाव पडे। इसका MAIT न सिर्फ रूस पर बल्कि विश्व के अन्य देशों पर भी पड़ा। इस क्रांति के रूस पर निम्नलिखित प्रभाव हुए-

(i) स्वेच्छाचारी जारशाही का अंत- 1917 की बोल्शेविक क्रांति के स्वरूप अत्याचारी एवं निरकुश राजतंत्र की समाप्ति हो गई। रोमनोव वंश के शासन की समाप्ति हुई तथा रूस में जनतंत्र की स्थापना की गई।

(ii) सर्वहारा वर्ग के अधिनायकवाद की स्थापना- बोल्शेविक कांति ने की बार शोषित सर्वहारा वर्ग को सत्ता और अधिकार प्रदान किया। नई व्यवस्था भूमि का स्वामित्व किसानों को दिया गया। उत्पादन के साधनों पर निजी के अनुसार भूमि स्वामित्व
समाप्त कर दिया गया। मजदूरों को मतदान का अधिकार दिया गया।

(iii) नई प्रशासनिक व्यवस्था की स्थापना- क्रांति के बाद रूस में एक नई प्रशासनिक व्यवस्था की स्थापना की गई। यह व्यवस्था साम्यवादी विचारधारा के अनुकूल थी। प्रशासन का उद्देश्य कृषकों एवं मजदूरों के हितों की सुरक्षा करना एवं उनकी प्रगति के लिए कार्य करना था। रूस में पहली बार साम्यवादी सरकार की स्थापन

(iv) नई सामाजिक- आर्थिक व्यवस्था-क्रांति के बाद रूस में नई सामाजिक आर्थिक व्यवस्था की स्थापना हुई। सामाजिक असमानता समाप्त कर दी गई। वर्गविहीन समाज का निर्माण कर रूसी समाज का परंपरागत स्वरूप बदल दिया गया।

क्रांति का विश्व पर प्रभाव- रूसी क्रांति का विश्व के दूसरे देशों पर भी प्रभाव पड़ा। ये प्रभाव निम्नलिखित थे

(i) पूँजीवादी राष्ट्रों में आर्थिक सुधार के प्रयास- विश्व के जिन देशों में पूँजीवादी अर्थव्यवस्था थी। वे भी अब यह महसूस करने लगे कि बिना सामाजिक, आर्थिक समानता के राजनीतिक समानता अपर्याप्त है।

(ii) साम्यवादी सरकारों की स्थापना- रूस के समान विश्व के अन्य देशों चीन, वियतनाम इत्यादि में भी बाद में साम्यवादी सरकारों की स्थापना हुई। साम्यवादी विचारधारा के प्रसार और प्रभाव को देखते हुए राष्ट्रसंघ ने भी मजदूरों की दशा में सुधार लाने के प्रयास किए। इस उद्देश्य से अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक संघ की स्थापना की गई।

(iii) साम्राज्यवाद के पतन की प्रक्रिया तीव्र- बोल्शेविक क्रांति ने साम्राज्यवाद के पतन का मार्ग प्रशस्त कर दिया। रूस ने सभी राष्ट्रों में विदेशी शासन के विरुद्ध चलाए जा रहे स्वतंत्रता आंदोलन को अपना समर्थन दिया। एशिया और अफ्रीका में उपनिवेशों से स्वतंत्रता के लिए प्रयास तेज कर दिए गए।

(iv) नया शक्ति संतुलन- रूस के नवनिर्माण के बाद रूस साम्यवादी सरकारों का अगुआ बन गया। दूसरी ओर अमेरिका पूँजीवादी राष्ट्रों का नेता बन गया। इससे विश्व दो शक्ति खंडों में विभक्त हो गया। इसने आगे चलकर दोनों खेमों में सशस्त्रीकरण की होड एवं शीतयद्ध को जन्म दिया।


2. कार्ल मार्क्स की जीवनी एवं सिद्धांतों का वर्णन करें।

उत्तर ⇒ कार्ल मार्क्स का जन्म 5 मई, 1818 ई० को जर्मनी में राइन प्रांत के ट्रियर नगर में एक यहदी परिवार में हआ था। समाजवादी विचारधारा को आगे बढाने में कार्ल मार्क्स की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। मार्क्स पर रूसो, मॉटेस्क्यू एवं हीगेल के विचारधारा का गहरा प्रभाव था। मार्क्स और एंगेल्स ने मिलकर 1848 में कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो अथवा साम्यवादी घोषणा-पत्र प्रकाशित किया। मार्क्स ने पूँजीवाद की घोर भर्त्सना की और श्रमिकों के हक की बात उठाई। मजदूरों को अपने हक के लिए लड़ने को उसने उत्प्रेरित किया। मार्क्स ने 1867 ई० में “दास-कैपिटल” नामक पुस्तक की रचना की जिसे ‘समाजवादियों का बाइबिल’ कहा जाता है। मार्क्सवादी दर्शन साम्यवाद (Communism) के नाम से विख्यात हुआ।

मार्क्स के सिद्धांत –

(i) द्वंद्वात्मक भौतिकवाद का सिद्धांत
(ii) वर्ग संघर्ष का सिद्धांत
(iii) इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या
(iv) मूल्य एवं अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत
(v) राज्यहीन व वर्गहीन समाज की स्थापना


3. साम्यवाद के जनक कौन थे ? समाजवाद एवं साम्यवाद में अंतर स्पष्ट करें।

उत्तर ⇒ साम्यवाद के जनक फ्रेडरिक एंगेल्स तथा कार्ल मार्क्स थे। समाजवाद एक ऐसी विचारधारा है जिसने आधुनिक काल में समाज को एक नया रूप प्रदान किया। औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप समाज में पूँजीपति वर्गों द्वारा मजदूरों का शोषण अपने चरमोत्कर्ष पर था। उन्हें इस शोषण के विरुद्ध आवाज उठाने तथा वर्गविहिन समाज करने में समाजवादी विचारधारा ने अग्रणी भूमिका अदा की। समाजवाद उत्पादन में मुख्यतः निजी स्वामित्व की जगह सामूहिक स्वामित्व या धन के समान वितरण पर जोर देता है। यह एक शोषण-उन्मुक्त समाज की स्थापना चाहता है। आरंभिक समाजवादियों में सेंट साइमन, चार्ल्स फूरिए, लुई ब्लाँ तथा राबर्ट ओवेन के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। ये सभी समाजवादी उच्च और व्यवहारिक आदर्श से प्रभावित होकर ‘वर्ग संघर्ष’ की नहीं बल्कि ‘वर्ग समन्वय’ की बात करते थे। दूसरे प्रकार के समाजवादियों में फ्रेडरिक एंगेल्स, कार्ल मार्क्स और उनके बाद के चिंतक ‘साम्यवादी’ कहलाए। ये लोग समन्वय के स्थान पर वर्ग संघर्ष की बात की। इन लोगों ने समाजवाद की एक नई व्याख्या प्रस्तुत की जिसे वैज्ञानिक समाजवाद कहा जाता है। माक्र्सवादी दर्शन साम्यवाद के नाम से विख्यात हुआ। मार्क्स का मानना था कि मानव इतिहास ‘वर्ग संघर्ष’ का इतिहास है। इतिहास उत्पादन के साध नों पर नियंत्रण के लिए दो वर्गों के बीच चल रहे निरंतर संघर्ष की कहानी है।


4. समाजवाद के उदय और विकास को रेखांकित करें।

उत्तर ⇒ समाजवाद एक ऐसी विचारधारा है जिसने आधनिक काल में समाज
को एक रूप प्रदान किया। औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप समाज में पूंजीपति गोदारा मजदरों का लगातार शोषण अपने चरमोत्कर्ष पर था। उन्हें इस शोषण के विरुद्ध आवाज उठाने तथा वर्गविहीन समाज की स्थापना करने में समाजवादी विचारधारा ने अग्रणी भूमिका अदा की। समाजवाद उत्पादन में मुख्यतः निजी स्वामित्व की जगह सामूहिक स्वामित्व या धन के समान वितरण पर जोर देता है। एक शोषण उन्मुक्त समाज की स्थापना चाहता है। समाजवादी विचारधारा की उत्पत्ति 18 वीं शताब्दी के प्रबोधन आंदोलन के दार्शनिकों के लेखों में ढूँढे जा सकते हैं। आरंभिक समाजवादी आदर्शवादी थे, जिनमें सेंट साइमन, चार्ल्स फूरिए, लुई ब्लाँ तथा रॉबर्ट ओवेन के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। समाजवादी आंदोलन और विचारधारा मुख्यतः दो भागों में विभक्त
की जा सकती है –

(i) आरंभिक समाजवादी अथवा कार्ल मार्क्स के पहले के समाजवादी
(ii) कार्ल मार्क्स के बाद के समाजवादी।

आरंभिक समाजवादी आदर्शवादी या ‘स्वप्नदर्शी’ समाजवादी कहे गए। वे उच्च और अव्यावहारिक आदर्श से प्रभावित होकर “वर्ग संघर्ष” की नहीं बल्कि ‘वर्ग समन्वय’ की बात करते थे। दूसरे प्रकार के समाजवादियों में फ्रेडरिक एंगेल्स, कार्ल मार्क्स और उनके बाद के चिंतन जो ‘साम्यवादी’ कहलाए ने वर्ग समन्वय के स्थान पर ‘वर्ग संघर्ष’ की बात कही। इन लोगों ने समाजवाद की एक नई व्याख्या प्रस्तुत की जिसे “वैज्ञानिक समाजवाद” कहा जाता है।


5. यूटोपियन समाजवादियों के विचारों का वर्णन करें।

उत्तर ⇒ (यूटोपियन) समाजवादी आदर्शवादी थे, उनके कार्यक्रम की प्रवृत्ति अव्यावहारिक थी। इन्हें “स्वप्नदर्शी समाजवादी” कहा गया क्योंकि उनके लिए समाजवाद एक सिद्धांत मात्र था। अधिकतर यूटोपियन विचारक फ्रांसीसी थे जो क्रांति के बदले शांतिपूर्ण परिवर्तन में विश्वास रखते थे अर्थात् वे वर्ग संघर्ष के बदले वर्ग समन्वय के हिमायती थे। प्रथम यूटोपियन (स्वप्नदर्शी) समाजवादी जिसने समाजवादी विचारधारा के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया वह फ्रांसीसी विचारक सेंट साइमन था। उसका मानना था कि राज्य और समाज का पुनर्गठन इस प्रकार होना चाहिए जिससे शोषण की प्रक्रिया समाप्त हो तथा समाज के गरीब तबकों की स्थिति में सुधार लाया जा सके। उसने घोषित किया ‘प्रत्येक को उसकी क्षमता के अनुसार तथा प्रत्येक को उसके कार्य के अनुसार।
एक अन्य महत्त्वपूर्ण यूटोपियन विचारक चार्ल्स फूरिए था। वह आधुनिक औद्योगिकवाद का विरोधी था तथा उसका मानना था कि श्रमिकों को छोटे नगर अथवा कसबों में काम करना चाहिए। इससे पूँजीपति उनका शोषण नहीं कर पाएंगे। फ्रांसीसी यूटोपियन चिंतकों में एकमात्र व्यक्ति जिसने राजनीति में भी हिस्सा लिया लई ब्लॉ था। उसका मानना था कि आर्थिक सधारों को प्रभावकारी बनाने के लिए पहले राजनीतिक सुधार आवश्यक है। यद्यपि आरंभिक समाजवादी अपने आदर्शों में सफल नहीं हो सके, लेकिन इन लोगों ने ही पही बार पूँजी और श्रम के बीच संबंध निर्धारित करने का प्रयास किया।


6. लेनिन की नई आर्थिक नीति क्या है ?

उत्तर ⇒ लेनिन एक स्वप्नदर्शी विचारक नहीं, बल्कि वह एक कुशल सामाजिक चिंतक तथा व्यावहारिक राजनीतिज्ञ था। उसने यह स्पष्ट देखा कि तत्काल पूरी तरह समाजवादी व्यवस्था लागू करना या एक साथ सारी पूँजीवादी दुनिया से टकराना संभव नहीं है, जैसा कि ट्रॉटस्की चाहता था। इसलिए 1921 ई० में उसने एक नई नीति की घोषणा की जिसमें मार्क्सवादी मूल्यों से कुछ हद तक समझौता करना पड़ा। नई आर्थिक नीति की प्रमुख बातें निम्नलिखित थी-

(i) किसानों से अनाज लेने के स्थान पर एक निश्चित कर लगाया गया। बचा हुआ अनाज किसान का था और वह इसका मनचाहा इस्तेमाल कर सकता था।

(ii) यघपि यह सिद्धांत कायम रखा गया कि जमीन राज्य की है फिर भा व्यवहार में जमीन किसान की हो गई।

(iii) 20 से कम कर्मचारियों वाले उद्योगों को व्यक्तिगत रूप से चलाने का अधिकार मिल गया।

(iv) उद्योगों का विकेंद्रीकरण कर दिया गया। निर्णय और क्रियान्वयन के बारे में विभिन्न इकाइयों को काफी छुट दी गई।

(v) विदेशी पूँजी भी सीमित तौर पर आमंत्रित की गई।

(vi) व्यक्तिगत संपत्ति और जीवन की बीमा भी राजकीय एजेंसी द्वारा शुरू किया गया।

(vii) विभिन्न स्तरों पर बैंक खोले गए।

(viii) ट्रेड यूनियन की अनिवार्य सदस्यता समाप्त कर दी गई। लेनिन की नई आर्थिक नीति द्वारा उत्पादन की कमी को नियंत्रित किया गया तथा रूस की अर्थव्यवस्था में सुधार हुआ।


7. स्टालिन के कार्यों का उल्लेख करें।

उत्तर ⇒ रूस में सत्ता संभालते ही स्टालिन के समक्ष अनेक विकट समस्याएँ थी। इनमें सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण आर्थिक समस्या थी। अतः सर्वांगीण आर्थिक विकास के लिए स्टालिन ने 1928 में पंचवर्षीय योजना लागू की। तीन पंचवर्षीय योजनाओं द्वारा आर्थिक विकारा को गति की गई। औद्योगिकीकरण की गति बढ़ी, कृषि का आधुनिकीकरण हुआ तथा वैज्ञानिक प्रगति हुई। श्रमिकों, किसानों और स्त्रियों की स्थिति में सुधार लाने का प्रयास किया गया। सामूहिक कृषि की व्यवस्था की गई, परंतु यह व्यवस्था सफल नहीं हो सकी। अत: स्टालिन ने राज्य नियंत्रित कृषि फार्म (कोलखोज) खोले। इसका विरोध करनेवालों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की गई। साम्यवादी दल के भीतर भी स्टालिन की नीतियों की आलोचना की गई। अतः इन्हें षड्यंत्रकारी मानकर दंडित किया गया। अनेकों को जेल में बंद कर दिया गया। ट्रॉटस्की सहित अनेक नेताओं को निर्वासित कर दिया गया। लोकतंत्र, भाषण और प्रेस पर प्रतिबंध लगा दिया गया। क्रांति और मार्क्सवाद के आदर्शों की उपेक्षा की गई। इस नीति का कला और साहित्य के विकास पर प्रतिकूल असर पड़ा। स्टालिन ने सर्वाधिकारवाद की नीति अपनाई तथा तानाशाह बन गया। इसके बावजूद स्टालिन ने सोवियत संघ को एक शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में परिणत कर दिया।

1. हिंद-चीन में राष्ट्रवाद के विकास का वर्णन करें।

उत्तर ⇒ हिंद-चीन में राष्ट्रवाद के विकास में विभिन्न तत्त्वों का योगदान था, जिनमें औपनिवेशिक शोषण की नीतियों तथा स्थानीय आंदोलनों ने काफी बढ़ावा दिया। 20 वीं शताब्दी के शुरुआत में यह विरोध और मुखर होने लगा। उसी परिपेक्ष्य में 1903 ई० में फान-बोई-चाऊ ने ‘दुई तान होई’ नामक एक क्रांतिकारी संगठन की स्थापना की जिसके नेता कुआंग दें थे। फान-बोई-चाऊ ने “द हिस्ट्री ऑफ द लॉऑफ वियतनाम” लिखकर हलचल पैदा कर दी।

1905 में जापान द्वारा रूस को हराया जाना हिंद-चीनियों के लिए प्रेरणा स्रोत बन गया। साथ ही रूसो एवं मांटेस्क्यू जैसे फ्रांसीसी विचारकों के विचार भी इन्हें उद्वेलित कर रहे थे। इसी समय एक-दूसरे राष्ट्रवादी नेता फान-चू-त्रिन्ह हुए जिन्होंने राष्ट्रवादी आंदोलन के राजतंत्रीय स्वरूप की गणतंत्रवादी बनाने का प्रयास किया। जापान में शिक्षा प्राप्त करने गए छात्र इसी तरह के विचारों के समर्थक थे। इन्हीं। छात्रों ने वियतनाम कुवान फुक होई (वियतनाम मुक्ति एसोसिएशन) की स्थापना की। हालाँकि हिंद-चीन में प्रारंभिक राष्ट्रवाद का विकास कोचिन-चीन, अन्नाम, तोकिन जैसे शहरों तक ही सीमित था, परंतु जब प्रथम विश्वयुद्ध शुरू हुआ तो इन्हीं प्रदेशों के हजारों लोगों को सेना में भर्ती किया गया, हजारों मजदूरों को बेगार के। लिए फ्रांस ले जाया गया। युद्ध में हिंद-चीनी सैनिकों की ही बड़ी संख्या में मृत्यु हुई। इन सब बातों की तीखी प्रतिक्रिया हिंद-चीनी लोगों पर हुई और 1914 ई० में ही देशभक्तों ने एक “वियतनामी राष्ट्रवादी दल” नामक संगठन बनाया 1930 के दशक की विश्वव्यापी आर्थिक मंदी ने भी राष्टवाद के विकास में । योगदान किया।


2. हिन्द-चीन उपनिवेश स्थापना का उद्देश्य क्या था ?

अथवा, हिन्द-चीन में फ्रांसीसियों द्वारा उपनिवेश स्थापना के किन्ही तान उद्देश्यों का उल्लेख करें।

उत्तर ⇒ फ्रांस द्वारा हिन्द-चीन में उपनिवेश स्थापना के उद्देश्य इस प्रकार थे

(i) व्यापारिक प्रतिस्पर्धा – फ्रांस द्वारा हिन्द-चीन में उपनिवेश स्थापना का मुख्य उद्देश्य डच एवं ब्रिटिश कंपनियों के व्यापारिक प्रतिस्पर्धा का सामना करना था। भारत में फ्रांसीसी पिछड़ रहे थे तथा चीन में उनके व्यापारिक प्रतिद्वंद्वी मुख्यतः अंग्रेज थे। अतः सुरक्षात्मक आधार के रूप में उन्हें हिन्द-चीन का क्षेत्र उचित लगा जहाँ से वे भारत एवं चीन दोनों तरफ कठिन परिस्थितियों को संभाल सकते थे।

(ii) कच्चे माल तथा बाजार की उपलब्धता- औद्योगिक क्रांति के बाद विभिन्न उद्योगों के सुचारुपूर्वक संचालन के लिए भारी मात्रा में कच्चा माल तथा तैयार उत्पादों की खपत हेतु बाजार की आवश्यकता थी। अतः इन दोनों आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उपनिवेश की स्थापना आवश्यक हो गई।

(iii) गोरे होने का दायित्व – यूरोपीय गोरे लोगों का यह स्वघोषित दायित्व था कि वे पिछड़े काले लोगों के समाज को सभ्य बनाएँ। वे इसे ईश्वर प्रदत्त दायित्व समझते थे।इसके अतिरिक्त कैथोलिक धर्म का प्रचार भी उपनिवेश स्थापना का एक उद्देश्य था।


3. माई-ली गाँव की घटना क्या थी ? इसका क्या प्रभाव पड़ा ?

उत्तर ⇒1968 में युद्ध के दौरान दक्षिण वियतनाम के एक गाँव माई-ली में लोमहर्षक घटना घटी। अमेरिकी सेना ने अपनी पराजय की बौखलाहट में इस गाँव पर आक्रमण कर दिया। पूरे गाँव को घेरकर पुरुषों को मार दिया गया। स्त्रियाँ, यहाँ तक कि बच्चियों के साथ सामूहिक बलात्कार कर उनकी भी हत्या कर दी गई। उसके बाद पूरे गाँव को आग लगाकर जला दिया गया। समाचार-पत्रों ने इस घटना का विवरण छापा। इससे अमेरिका के प्रति तीखी प्रतिक्रिया हुई तथा अमेरिकन प्रशासन की कटु आलोचना हुई।

प्रभाव- अमेरिका ने वियतनामी युद्ध में जो नीति अपनाई उसकी तीखी भर्त्सना हुई। अमेरिका में ही नागरिक सरकारी नीतियों के विरोधी हो गए। वियतनाम में अमेरिका की विफलता स्पष्ट हो गयी। उसे न तो वियतनामी जनता का समर्थन मिला और न ही वियतनामियों के प्रतिरोध को दबा सका। अमेरिकी धन-जन की भी क्षति हुई। वियतनामी युद्ध को “पहला टेलीविजन युद्ध” कहा गया। युद्ध के लोमहर्षक दृश्यों को देखकर अमेरिका और राष्ट्रपति निक्सन की सर्वत्र आलोचना होने लगी। बढ़ते अंतर्राष्ट्रीय दबाव और आलोचना के वशीभूत राष्ट्रपति निक्सन ने 1970 में शांति वार्ता के लिए “पाँच सत्री प्रस्ताव” प्रस्तुत किया।


4. वियतनाम के स्वतंत्रता संग्राम में हो ची मिन्ह के योगदान का मूल्यांकन करें।

उत्तर ⇒ वियतनामी स्वतंत्रता के नेता हो ची मिन्ह थे। उनका मूल नाम नगूयेन सिन्ह कुंग था। वे गूयेन आई क्वोक के नाम से जाने जाते थे। उनका जन्म 19 मई, 1890 को मध्य वियतनाम के एक गाँव के गरीब परिवार में हुआ था। उन्होंने पेरिस और मास्को में शिक्षा ग्रहण की थी। वे मार्क्सवादी विचारधारा से गहरे रूप से प्रभावित थे। उनका मानना था कि संघर्ष के बिना वियतनाम को आजादी नहीं मिल सकती है। फ्रांस में रहते हुए 1917 में उन्होंने वियतनामी साम्यवादियों का एक गुट बनाया। लेनिन द्वारा कॉमिन्टन की स्थापना के बाद वे इसके सदस्य बन गए। साम्यवाद से प्रेरित होकर 1925 में उन्होंने वियतनामी क्रांतिकारी दल का गठन किया। फरवरी, 1930 में हो ची मिन्ह ने वियतनाम के विभिन्न समूह के राष्ट्रवादियों को एकजुट किया। स्वतंत्रता संघर्ष प्रभावशाली ढंग से चलाने के लिए उन्होंने 1930 में वियतनामी कम्युनिस्ट पार्टी (वियतनाम कांग सान देंग) की स्थापना की। यह दल उग्र विचारधारा का समर्थक था। इस दल का नाम बाद में बदलकर इंडो-चाइनिज कम्युनिस्ट पार्टी कर दिया गया। इसी दल के अधीन और हो ची मिन्ह के नेतृत्व में वियतनाम ने स्वतंत्रता प्राप्त की।


5. वियतनाम में साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष में महिलाओं की भूमिका की विवेचना करें।

उत्तर ⇒ वियतनाम के राष्ट्रवादी आंदोलन में महिलाओं की भूमिका काफी महत्त्वपूर्ण थी। युद्ध और शांति दोनों काल में उन. लोगों ने पुरुषों के साथ कंधा से कंधा मिलाकर सहयोग किया। स्वतंत्रता संग्राम में वे विभिन्न रूपों में भाग लेने लगी; छापामार योद्धा के रूप में; कली के रूप में अथवा नर्स के रूप में। समाज ने उनकी १२ मूमका को सराहा और इसका स्वागत किया। वियतनामी राष्ट्रवाद के विकास के साथ स्त्रियाँ बड़ी संख्या में आंदोलनों में भाग लेने लगी। स्त्रियों को राष्ट्रवादी धारा में आकृष्ट करने के लिए बीते वक्त की वैसी महिलाओं का गुणगान किया जान लगा। जिन लोगों ने साम्राज्यवाद का विरोध करते हुए राष्ट्रवादी आंदोलनों में भाग लिया था। राष्ट्रवादी नेता फान बोई चाऊ ने 1913 में ट्रंग बहनों के जीवन पर एक नाटक लिखा। इन बहनों ने वियतनाम पर चीनी आधिपत्य के विरुद्ध होने वाले युद्ध में भाग लिया। युद्ध में पराजय निकट देखकर इन लोगों ने हथियार डालने की बजाय आत्महत्या कर ली। इस नाटक ने वियतनामी समाज पर गहरा प्रभाव डाला। ट्रंग बहने वीरता और देशभक्ति की प्रतीक बन गई। ट्रंग बहनों के समान त्रियुआयू का भी महिमागान किया गया। उसे देश के लिए शहीद होनेवाली देवी के रूप में प्रस्तुत किया गया। इससे वियतनामी स्त्रियों के ऊपर गहरा प्रभाव पड़ा। इनसे प्रेरणा लेकर बड़ी संख्या में स्त्रियाँ स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने लगी।


6. फ्रांसीसी शोषण के साथ-साथ उसके द्वारा किये गये सकारात्मक कार्यों की समीक्षा करें।

उत्तर ⇒ हिंद-चीन में फ्रांसीसी अपनी प्रभुसता स्थापित करने के बाद वहाँ अनेक तरह से शोषण जारी रखा, साथ ही कुछ सकारात्मक कार्य भी किये गए। सर्वप्रथम फ्रांसीसियों ने शोषण के साथ-साथ कृषि की उत्पादकता बढ़ाने के लिए नहरों एवं जल निकासी का समुचित प्रबंध किया और दलदली भूमि, जंगलों आदि में कृषि क्षेत्र को बढ़ाया जाने लगा। इन प्रयासों का ही फल था कि 1931 ई० तक वियतनाम विश्व का तीसरा बड़ा चावल निर्यातक देश बन गया। कृषि के विकास के अतिरिक्त फ्रांसीसी सरकार ने संरचनात्मक विकास के लिए अनेक परियोजनाएँ आरंभ की। यह कार्य आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के अतिरिक्त प्रशासनिक और सैनिक उद्देश्य से भी किया गया। एक विशाल रेल नेटवर्क द्वारा पूरे इंडो-चाईना को जोड़ दिया गया। बंदरगाहों का भी विकास किया गया। सड़कों का जाल-सा विछा दिया गया। फलस्वरूप 1920 के दशक तक व्यापार-वाणिज्य का काफी विकास हुआ जिसका लाभ फ्रांसीसियों ने उठाया। फ्रांसीसियों ने सोची-समझी नीति के अनुरूप वियतनाम में अपनी नई शैक्षणिक नीति लागू की। जहाँ तक शिक्षा का प्रश्न था अब तक परंपरागत स्थानीय भाषा अथवा चीनी भाषा में शिक्षा पा रहे लोगों को अब फ्रांसीसी भाषा में शिक्षा दी जाने लगी। 1907 में वियतनाम में टॉकिन फ्री स्कूल स्थापित किए गए। इनका उद्देश्य वियतनामियों को पश्चिमी शिक्षा दिलाना था।


7. कंबोडिया के इतिहास में नरोत्तम सिंहानुक की भूमिका का उल्लेख कीजिए।

उत्तर ⇒ लाओस के समान कंबोडिया को भी 1954 के जेनेवा समझौता के अनुसार स्वतंत्रता मिली। कंबोडिया में नरोत्तम सिंहानुक को शासक बनाया गया। उसने तटस्थतावादी नीति अपनाई तथा वामपंथियों एवं दक्षिणपंथियों के संघर्ष से अपने को अलग रखा। अमेरिका ने उसे अपने प्रभाव में लाने का प्रयास किया तथा थाइलैंड ने कंबोडिया में अशांति फैलाने की कोशिश की। अतः सिंहानुक ने चीन और जर्मनी से संबंध बढ़ाए। इससे कुपित होकर अमेरिका ने कंबोडिया पर बमबारी की और 1970 में दक्षिण पंथियों की सहायता से उसे पदच्युत कर दिया। सिंहानुक ने पंकिंग में अपनी सरकार बनाई तथा दक्षिणपंथी शासक लोन नोल के विरुद्ध संघर्ष आरंभ कर दिया। लोन नोल की सहायता के लिए अमेरिका ने सेना भेज दी। 1975 में सिंहानुक की लाल खमेर सेना ने राजधानी नाम पेन्ह पर अधिकार कर लिया। स्वदेश लौटकर सिंहानुक 1975 में राष्ट्राध्यक्ष बने। 1978 में उन्होंने राजनीति से संन्यास ले लिया।


8. अमेरिकी वियतनामी युद्ध में हो ची मिन्ह भूलभुलैया मार्ग की क्या भूमिका थी ?

उत्तर ⇒ अमेरिकी वियतनाम युद्ध में हो ची मिन्ह मार्ग की काफी महत्त्वपूर्ण का थी। यद्यपि अमेरिकी फौज ने इस मार्ग को बाधित करने तथा इसे नष्ट करने भी काफी प्रयास किया। इस मार्ग पर बम भी बरसाए गए, परंतु वियतनामियों ने मार्ग को बनाए रखा। इसको क्षतिग्रस्त होने पर इसकी तत्काल मरम्मत कर ली होती थी। उत्तर से दक्षिण वियतनाम तक सैनिक साजो-सामान और रसद पहुँचाने के लिए वियेतमिन्ह द्वारा हो ची मिन्ह ‘भूल भुलैया मार्ग’ का सहारा लिया गया। यह मार्ग वियतनाम के बाहरी इलाकों में लाओस और कंबोडिया होता हुआ उनी वियतनाम से दक्षिणी वियतनाम पहुँचता था। अनुमानतः प्रतिमाह बीस हजार उत्तरी वियतनाम के योद्धा इस मार्ग द्वारा दक्षिणी वियतनाम पहुँचते थे। इस मार्ग में स्थान-स्थान पर विद्रोही वियतनामियों ने सैनिक छावनियाँ और युद्ध में घायलों की चिकित्सा के लिए चिकित्सालय बनवा रखे थे। इसी मार्ग द्वारा रसद और अन्य आवश्यक सामग्रियाँ भेजी जाती थी। ज्यादातर सामानों की ढुलाई महिला-कुली करती थी। इसी मार्ग पर नियंत्रण करने के उद्देश्य से अमेरिका लाओस एवं कम्बोडिया पर आक्रमण भी कर दिया था, परंतु तीन तरफा संघर्ष में फंस कर उसे वापस होना पड़ा था।

1. भारत में राष्ट्रवाद के उदय के कारणों का परीक्षण करें।

उत्तर ⇒ 19वीं शताब्दी में भारतीय राष्ट्रवाद के उदय में अनेक कारणों का योगदान था। इनमें निम्नलिखित कारण प्रमुख थे-

(i) अंग्रेजी साम्राज्यवाद के विरुद्ध असंतोष – भारतीय राष्ट्रीयता के विकास का सबसे प्रमुख कारण अंग्रेजी नीतियों के प्रति बढ़ता असंतोष था। अंग्रेजी सरकार की नीतियों के शोषण के शिकार देशी रजवाड़े, ताल्लुकेदार, महाजन, कृषक, मजदूर, मध्यम वर्ग सभी बने। सभी अंग्रेजी शासन को अभिशाप मानकर इसका खात्मा करने का मन बनाने लगे।

(ii) आर्थिक कारण – भारतीय राष्ट्रवाद का उदयं का एक महत्त्वपूर्ण कारण आर्थिक था। सरकारी आर्थिक नीतियों के कारण कृषि और कुटीर-उद्योग धंधे नष्ट हो गए। किसानों पर लगान एवं कर्ज का बोझ चढ़ गया। किसानों को नगदी फसल नील, गन्ना, कपास उपजाने को बाध्य कर उसका भी मुनाफा सरकार ने उठाया। अंग्रेजी आर्थिक नीति से भारत से धन का निष्कासन हुआ, जिससे भारत की गरीबी बढ़ी। इससे भारतीयों में प्रतिक्रिया हुई एवं राष्ट्रीय चेतना का विकास हुआ।

(iii) अंग्रेजी शिक्षा का प्रसार-19वीं शताब्दी में भारत में अंग्रेजी शिक्षा का प्रचार ने भारतीयों की मानसिक जड़ता समाप्त कर दी। वे भी अब अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम, फ्रांस एवं यूरोप की अन्य महान क्रांतियों से परिचित हुए। रूसो, वाल्टेयर, मेजिनी, गैरीबाल्डी जैसे दार्शनिकों एवं क्रांतिकारियों के विचारों का प्रभाव उनपरपरा पड़ा ।

(iv) सामाजिक, धार्मिक सुधार आंदोलन का प्रभाव –19वीं शताब्दी के सामाजिक, धार्मिक सुधार आंदोलनों ने भी राष्ट्रीयता की भावना विकसित की। ब्रह्मसमाज, आर्य-समाज, प्रार्थना समाज, रामकृष्ण मिशन ने एकता, समानता एवं स्वतंत्रता की भावना जागृत की तथा भारतीयों में आत्म-सम्मान, गौरव एवं राष्ट्रीयता की भावना का विकास करने में योगदान किया।

(v) राजनीतिक एकीकरण- भारत में अंग्रेजों ने उग्र साम्राज्यवादी नीति अपनाई। वारेन हेस्टिंग्स से लेकर लॉर्ड डलहौजी ने येन-केन-प्रकारेण देशी रियासतों को अपना अधीनस्थ बना लिया। 1857 के विद्रोह के बाद महारानी विक्टोरिया ने सभी देशी राज्यों की अंग्रेजी अधिसत्ता में ले लिया। इससे एक प्रकार से भारत का । राजनीतिक एवं प्रशासनिक एकीकरण हुआ। लॉर्ड डलहौजी द्वारा रेल, डाक-तार की व्यवस्था से आवागमन और संचार की सुविधा बढ़ गई। इससे संपूर्ण भारत में। स्थानीयता की भावना के स्थान पर राष्ट्रीयता की भावना बढ़ी।


2. भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में गाँधीजी के योगदान की विवेचना करें।

उत्तर ⇒ भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में 1919-1947 का काल गाँधी युग के नाम से जाना जाता है। राष्ट्रीय आंदोलन को गाँधीजी ने एक नई दिशा दिया। सत्य अहिंसा, सत्याग्रह का प्रयोग कर गाँधीजी भारतीय राजनीति में छा गए। इन्हीं अस्ता का सहारा लेकर वे औपनिवेशिक सरकार के विरुद्ध राष्ट्रीय आंदोलनों क जन-आंदोलन में परिवर्तित कर दिया। 1917-18 में उन्होंने चंपारण, खेड़ा और अहमदाबाद में सत्याग्रह का सफल प्रयोग किया। 1920 ई० में गाँधीजी ने अहसयोग आंदोलन आरंभ किया। जिसम बहिष्कार, स्वदेशी तथा रचनात्मक कार्यक्रमों पर बल दिया गया। 1930 में गाँधी जी ने सरकारी नीतियों के विरुद्ध दूसरा व्यापक आंदोलन सविनय अवज्ञा आंदोलन आरभ किया। इसका आरंभ उन्होंने 12 मार्च, 1930 को दांडी यात्रा से किया। गाँधीजी का 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन था जिसमें उन्होंने लोगों को प्रेरित करते हुए ‘करो या मरो’ का मंत्र दिया। गाँधीजी के सतत् प्रयत्नों के परिणामस्वरूप ही 15 अगस्त, 1947 को भारत का आजादी प्राप्त हुई। वे एक राजनीतिक नेता के साथ-साथ प्रबुद्ध चिंतन समाजसुधारक एवं हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रबल समर्थक थे।


3. सविनय अवज्ञा आंदोलन के कारणों की विवेचना करें।

उत्तर ⇒ ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ गाँधीजी के नेतृत्व में 1930 ई० में शुरू किया गया सविनय अवज्ञा आंदोलन के महत्त्वपूर्ण कारण निम्नलिखित थे –

(i) साइमन कमीशन- सर जॉन साइमन की अध्यक्षता में बनाया गया यह 7 सदस्यीय आयोग था जिसके सभी सदस्य अंग्रेज थे। भारत में साइमन कमीशन के विरोध का मुख्य कारण कमीशन में एक भी भारतीय को नहीं रखा जाना तथा भारत के स्वशासन के संबंध में निर्णय विदेशियों द्वारा किया जाना था।

(ii) नेहरू रिपोर्ट- कांग्रेस ने फरवरी, 1928 में दिल्ली में एक सर्वदलीय सम्मेलन का आयोजन किया। समिति ने ब्रिटिश सरकार से डोमिनियन स्टेट’ की दर्जा देने की माँग की। यद्यपि नेहरू रिपोर्ट स्वीकृत नहीं हो सका, लेकिन संप्रदायिकता की भावना उभरकर सामने आई। अतः गाँधीजी ने इससे निपटने के लिए सविनय अवज्ञा का कार्यक्रम पेश किया।

(iii) विश्वव्यापी आर्थिक मंदी- 1929-30 की विश्वव्यापी आर्थिक मंदी का प्रभाव भारत की अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरा पड़ा। भारत का निर्यात कम हो गया लेकिन अंग्रेजों ने भारत से धन का निष्कासन बंद नहीं किया। पूरे देश का वातावरण सरकार के खिलाफ था। इस प्रकार सविनय अवज्ञा आंदोलन हेतु एक उपयुक्त अवसर दिखाई पड़ा।

(iv) समाजवाद का बढ़ता प्रभाव- इस समय कांग्रेस के युवा वर्गों के बीच मार्क्सवाद एवं समाजवादी विचार तेजी से फैल रहे थे, इसकी अभिव्यक्ति कांग्रेस के अंदर वामपंथ के उदय के रूप में हुई। वामपंथी दबाव को संतुलित करने के आंदोलन के नए कार्यक्रम की आवश्यकता थी।

(v) क्रांतिकारी आंदोलनों का उभार- इस समय भारत की स्थिति विस्फोटक थी। ‘मेरठ षड्यंत्र केस’ और ‘लाहौर षड्यंत्र केस’ ने सरकार विरोधी विचारधारा को उग्र बना दिया था। बंगाल में भी क्रांतिकारी गतिविधियाँ एक बार फिर उभरी।

(vi) पूर्णस्वराज्य की माँग- दिसंबर, 1929 के कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में पर्ण स्वराज्य की माँग की गयी। 26 जनवरी, 1930 को पूर्ण स्वतंत्रता दिवस मनाने की घोषणा के साथ ही पूरे देश में उत्साह की एक नई लहर जागृत हुई।

(vii) गाँधी का समझौतावादी रुख – आंदोलन प्रारंभ करने से पूर्व गाँधी ने वायसराय लार्ड इरावन के समक्ष अपनी 11 सूत्रीय माँग को रखा। परन्तु इरविन ने मांग मानना तो दूर गाँधी से मिलने से भी इनकार कर दिया। सरकार का दमन चक्र तेजी से चल रहा था। अतः बाध्य होकर गाँधीजी ने अपना आंदोलन डांडी मार्च आरम्भ करने का निश्चय किया।


4. असहयोग आंदोलन के कारण एवं परिणाम का वर्णन करें।

उत्तर ⇒ महात्मा गाँधी के नेतृत्व में प्रारंभ किया गया प्रथम जन-आदोलन असहयोग आंदोलन था। इस आंदोलन के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे –

(i) रॉलेट कानून- 1919 ई० में न्यायाधीश सिडनी रॉलेट की अध्यक्षता में रॉलेट कानून (क्रांतिकारी एवं अराजकता अधिनियम) बना। इसके अनुसार किसी भी व्यक्ति को बिना कारण बताए गिरफ्तार कर जेल में डाला जा सकता था तथा इसके खिलाफ वह कोई भी अपील नहीं कर सकता था।

(ii) जालियाँवाला बाग हत्याकांड- 13 अप्रैल, 1919 ई० को बैसाखी मैले के अवसर पर पंजाब के जालियाँवाला बाग में सरकार की दमनकारी नीति के खिलाफ लोग एकत्रित हुए थे। जनरल डायर के द्वारा वहाँ पर निहत्थी जनता पर गाली चलवाकर हजारों लोगों की जान ले ली गयी। गांधीजी ने इस पर काफी प्रतिक्रिया व्यक्त किया।

(iii) खिलाफत आंदोलन- इसी समय खिलाफत का मुद्दा सामने आया। गांधीजी ने इस आंदोलन को अपना समर्थन देकर हिंदू-मुस्लिम एकता स्थापित करने और एक बड़ा सशक्त अंग्रेजी राज विरोधी असहयोग आंदोलन आरंभ करने का निर्णय लिया।

परिणाम – 5 फरवरी, 1922 ई० को गोरखपुर के चौरी-चौरा नामक स्थान पर हिंसक भीड़ द्वारा थाने पर आक्रमण कर 22 पुलिसकर्मियों की हत्या कर दी गयी। जिससे नाराज होकर गाँधीजी ने असहयोग आंदोलन को तत्काल बंद करने की घोषणा की। असहयोग आंदोलन का व्यापक प्रभाव पड़ा।
असहयोग आंदोलन के अचानक स्थगित हो जाने और गाँधीजी की गिरफ्तारी के कारण खिलाफत के मुद्दे का भी अंत हो गया। हिंदू-मुस्लिम एकता भंग हो गई तथा संपूर्ण भारत में संप्रदायिकता का बोलबाला हो गया। न ही स्वराज की प्राप्ति हुई और न ही पंजाब के अन्यायों का निवारण हुआ। असहयोग आंदोलन के । परिणामस्वरूप ही मोतीलाल नेहरू तथा चितरंजन दास के द्वारा स्वराज पार्टी की स्थापना हुई।


5. खिलाफत आंदोलन क्यों हुआ ? गाँधीजी ने इसका समर्थन क्यों किया ?

उत्तर ⇒ तुर्की (ऑटोमन साम्राज्य की राजधानी) का खलीफा जो ऑटोमन साम्राज्य का सुलतान भी था, संपूर्ण इस्लामी जगत का धर्मगुरु था। पैगंबर के बाद सबसे अधिक प्रतिष्ठा उसी की थी। प्रथम विश्वयुद्ध में जर्मनी के साथ तुर्की भी पराजित हुआ। पराजित तुर्की पर विजयी मिस्र-राष्ट्रों ने कठोर संधि थोप दी (सेव्र की संधि)। ऑटोमन साम्राज्य को विखंडित कर दिया गया।
खलीफा और ऑटोमन साम्राज्य के साथ किए गए व्यवहार से भारतीय मुसलमानों में आक्रोश व्याप्त हो गया। वे तुर्की के सुल्तान एवं खलीफा की शक्ति और प्रतिष्ठा की पुनः स्थापना के लिए संघर्ष करने को तैयार हो गए। इसके लिए खिलाफत आंदोलन आरंभ किया गया। 1919 में अली बंधुओं (मोहम्मद अली और शौकत अली) ने बंबई में खिलाफत समिति का गठन किया। आंदोलन चलाने के लिए जगह-जगह खिलाफत कमिटियाँ बनाकर तुर्की के साथ किए गए अन्याय के विरुद्ध जनमत तैयार करने का प्रयास किया गया। ‘ गाँधीजी ने इस आंदोलन को अपना समर्थन देकर हिंदू-मुसलमान एकता स्थापित करने और एक बड़ा सशक्त राजविरोधी आंदोलन आरंभ करने का निर्णय लिया।


6. असहयोग आंदोलन और सविनय अवज्ञा आंदोलन के स्वरूप में क्या अंतर था ? महिलाओं की सविनय अवज्ञा आंदोलन में क्या भूमिका थी ?

उत्तर ⇒ असहयोग आंदोलन और सविनय अवज्ञा आंदोलन के स्वरूप में काफी विभिन्नता थी। असहयोग आंदोलन में जहाँ सरकार के साथ असहयोग करने की बात थी, वहीं सविनय अवज्ञा आंदोलन में न केवल अंग्रेजों का सहयोग न करने के लिए बल्कि औपनिवेशिक कानूनों का भी उल्लंघन करने के लिए आह्वान किया जाने लगा। असहयोग आंदोलन की तुलना में सविनय अवज्ञा आंदोलन काफी व्यापक जनाधार वाला आंदोलन साबित हुआ।
सविनय अवज्ञा आंदोलन में पहली बार महिलाओं ने बड़ी संख्या में भाग लिया। वे घरों की चारदीवारी से बाहर निकलकर गांधीजी की सभाओं में भाग लिया। अनेक स्थानों पर स्त्रियों ने नमक बनाकर नमक कानून भंग किया। स्त्रियों ने विदेशी वस्त्र एवं शराब के दुकानों की पिकेटिंग की। स्त्रियों ने चरखा चलाकर सूत काते और स्वदेशी को प्रोत्साहन दिया। शहरी क्षेत्रों में ऊँची जाति की महिलाएं आंदोलन में सक्रिय थीं तो ग्रामीण इलाकों में संपन्न परिवार की किसान स्त्रिया।


7. भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में वामपंथियों की भूमिका को रेखांकित करें।

उत्तर ⇒ 20 वीं शताब्दी के प्रारंभिक काल में ही भारत में साम्यवादी विचारधाराओं क अंतर्गत बंबई, कलकत्ता, कानपर, लाहौर, मद्रास आदि जगहों पर साम्यवादी सभाएं बननी शुरू हो गई थी। उस समय इन विचारों से जुड़े लोगों में मुजफ्फर अहमद, एस० ए० डांगे, मौलवी बरकतुल्ला, गुलाम हुसैन आदि नाम प्रमुख हैं। इन लोगों ने अपने पत्रों के माध्यम से साम्यवादी विचारों का पोषण शुरू कर दिया था। परंतु रूसी क्रांति की सफलता के बाद साम्यवादी विचारों का तेजी से भारत में फैलाव शुरू हुआ। उसी समय 1920 में एम० एन० राय ने ताशकंद में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना की। असहयोग आंदोलन के दौरान पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से उन्हें उपने विचारों को फैलाने का मौका मिला। अब ये लोग आतंकवादी राष्ट्रवादी आंदोलनों से भी जुड़ने लगे थे। इसलिए असहयोग आंदोलन की समाप्ति के बाद सरकार ने इन लोगों का दमन शुरू किया और पेशावर षड्यंत्र केस (1922-23), कानपुर षड्यंत्र केस (1924) और मेरठ षड्यंत्र केस (1929) के तहत लोगों पर मुकदमें चलाए। तब साम्यवादियों ने लोगों का ध्यान आकर्षित किया और राष्ट्रवादी “साम्यवादी शहीद” कहे जाने लगे। इसी समय इन्हें कांग्रेसियों का समर्थन मिला क्योंकि सरकार द्वारा लाए गए “पब्लिक सेफ्टी बिल” को कांग्रेसी पारित होने नहीं दिए थे, क्योंकि यह कानून कम्युनिस्टों के विरोध में था। इस तरह अब साम्यवादी आंदोलन प्रतिष्ठित होता जा रहा था।
अब तक कई मजदूर संघों का गठन हो चुका था। 1920 में AITUC की स्थापना हो गई थी तथा 1929 में एन० एम० जोशी ने AITUF का गठन कर लिया। इस तरह वामपंथ का प्रसार मजदूर संघों पर बढ़ रहा था। किसानों को भी साम्यवाद से जोड़ने का प्रयास हुआ। लेबर स्वराज पार्टी भारत में पहली किसान मजदूर पार्टी थी लेकिन अखिल भारतीय स्तर पर दिसंबर, 1928 में अखिल भारतीय मजदूर किसान पार्टी बनी। अक्टूबर, 1934 में बंबई में कांग्रेस समाजवादी दल की स्थापना की गयी। सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान साम्यवादियों ने कांग्रेस का विरोध करना शुरू किया क्योंकि कांग्रेस उन उद्योगपतियों एवं मर्थन से चल रही थी जो मजदूरों का शोषण करते थे।


8. जालियाँवाला बाग हत्याकांड क्यों हुआ ? इसने राष्ट्रीय आंदोलन को कैसे बढ़ावा दिया ?

उत्तर ⇒ भारत में क्रांतिकारी गतिविधियों पर अकुंश लगाने के उद्देश्य से सरकार ने 1919 में रॉलेट कानून (क्रांतिकारी एवं अराजकता अधिनियम) बनाया। इस कानून के अनुसार सरकार किसी को भी संदेह के आधार पर गिरफ्तार कर बिना मुकदमा चलाए उसको दंडित कर सकती थी तथा इसके खिलाफ कोई अपील भी नहीं की जा सकती थी। भारतीयों ने इस कानून का कड़ा विरोध किया। इसे ‘काला कानून’ की संज्ञा दी गई। अमृतसर में एक बहुत बड़ा प्रदर्शन हुआ जिसकी अध्यक्षता डॉ० सत्यपाल और डॉ० सैफुद्दीन किचलू कर रहे थे। सरकार ने दोनों को गिरफ्तार कर अमृतसर से निष्कासित कर दिया। जनरल डायर ने पंजाब में फौजी शासन लागू कर आतंक का राज स्थापित कर दिया। पंजाब के लोग अपने प्रिय नेता की गिरफ्तारी तथा सरकार की दमनकारी नीति के खिलाफ 13 अप्रैल, 1919 को वैसाखी मेले के अवसर पर अमृतसर के जालियांवाला बाग में एक विराट सम्मेलन कर विरोध प्रकट कर रहे थे, जिसके कारण ही जनरल डायर ने निहत्थी जनता पर गोलियाँ चलवा दी। यह घटना जालियाँवाला बाग हत्याकांड के नाम से जाना गया।
     जालियाँवाला बाग की घटना ने पूरे भारत को आक्रोशित कर दिया। जगह-जगह विरोध प्रदर्शन और हडताल हुए। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने इस घटना के विरोध में अपना ‘सर’ का खिताब वापस लौटाने की घोषणा की। वायसराय की कार्यकारिणी के सदस्य शंकरन नायर ने इस्तीफा दे दिया। गाँधीजी ने कैसर-ए-हिन्द की उपाधि त्याग दी। जालियाँवाला बाग हत्याकांड ने राष्ट्रीय आंदोलन में एक नई जान फूंक दी।


9. भारत में मजदूर आंदोलन के विकास का वर्णन करें।

उत्तर ⇒ 20 वीं शताब्दी के आरंभ में भारत में मजदूरों के आंदोलन हुए, तथा उनके संगठन बने। श्रमिक आंदोलन को वामपंथियों का सहयोग एवं समर्थन मिला। शोषण के विरुद्ध श्रमिक वर्ग संगठित हुआ। अपनी मांगों के लिए. इसने हड़ताल का सहारा लिया। प्रथम विश्वयुद्ध के पूर्व, इसके दौरान एवं बाद में अनेक हड़ताले हुई। पताल को सुचारू रूप से चलाने के लिए मजदूरों ने अपने संगठन बनाए। 1920 में ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन का गठन लाला लाजपत राय की अध्यक्षता में हुआ। विभिन्न श्रमिक संगठनों को इससे सम्बद्ध किया गया। आगे चलकर साम्यवादी
भाव के कारण इस संघ में फूट पड़ गई और साम्यवादी विचारधारा से प्रभावित संगठन-ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन फेडरेशन रेड ट्रेड यूनियन कांग्रेस का गठन हुआ। 1935 में तीनों श्रमिक संघ पुनः एकजुट हुए। तब से श्रमिक संघ विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रभाव में मजदूरों के हक की लड़ाई लड़ रहे हैं।


10. अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना कैसे हुई ? इसके प्रारंभिक उद्देश्य क्या थे ?

उत्तर ⇒ भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की शुरुआत 19 वीं शताब्दी के अन्तिम चरण में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना से माना जाता है। 1883 ई० में इंडियन एसोसिएशन के सचिव आनंद मोहन बोस ने कलकत्ता में ‘नेशनल काँफ्रंस’ नामक अखिल भारतीय संगठन का सम्मेलन बुलाया जिसका उद्देश्य बिखरे हुए राष्ट्रवादा शक्तियों को एकजुट करना था। परंतु, दूसरी तरफ एक अंग्रेज अधिकारी एलेन ऑक्टोवियन ह्यूम ने इस दिशा में अपने प्रयास शुरू किए और 1884 में ”भारतीय राष्ट्रीय संघ’ की स्थापना की। भारतीयों को संवैधानिक मार्ग अपनाने और सरकार के लिए सुरक्षा कवच बनाने के उद्देश्य से ए०ओ०ह्यूम ने 28 दिसम्बर, 1885 को अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना की। इसके प्रारंभिक उद्देश्य निम्नलिखित थे

(i) भारत के विभिन्न क्षेत्रों में राष्ट्रीय हित के नाम से जुड़े लोगों के , संगठनों के बीच एकता की स्थापना का प्रयास।

(ii) देशवासियों के बीच मित्रता और सद्भावना का संबंध स्थापित कर धर्म, वंश, जाति या प्रांतीय विद्वेष को समाप्त करना।

(iii) राष्ट्रीय एकता के विकास एवं सुदृढ़ीकरण के लिए हर संभव प्रयास करना। राजनीतिक तथा सामाजिक प्रश्नों पर भारत के प्रमुख नागरिकों से चर्चा करना एवं उनके संबंध में प्रमाणों का लेखा तैयार करना।

(v) प्रार्थना पत्रों तथा स्मार पत्रों द्वारा वायसराय एवं उनकी काउन्सिल से सुधारों हेतु प्रयास करना।
इस प्रकार कांग्रेस का प्रारंभिक उद्देश्य शासन में सिर्फ सुधार करना था।


11. 20 वीं शताब्दी के किसान आंदोलन का संक्षिप्त परिचय दें।

उत्तर ⇒ 20 वीं शताब्दी का किसान आंदोलन किसानों में एक नई जागृति ला दी। वे अपने सामाजिक-आर्थिक हितों के सुरक्षा के लिए संगठित होने लगे। यद्यपि महात्मा गाँधी ने किसानों के हित के लिए चंपारण और खेड़ा में सत्याग्रह भी किया परंतु कांग्रेस शुरू से ही किसानों की समस्याओं के प्रति उदासीन बनी रही। इसी बीच वामपंथियों का प्रभाव किसानों और श्रमिकों पर बढ़ता जा रहा था। अत: उनके प्रभाव में 20 वीं शताब्दी के दूसरे और तीसरे दशक में किसान सभाओं का गठन बिहार. बंगाल और उत्तर प्रदेश में हुआ। जहाँ जमींदारी, अत्याचार और शोषण अपनी पराकाष्ठा पर थी। 1920-21 में अवध किसान सभा का गठन किया गया। 1922-23 में मुंगेर में शाह मुहम्मद जुबेर ने किसान सभा का गठन किया। 1928 में पटना के बिहटा में स्वामी सहजानंद सरस्वती ने किसान सभा का गठन किया। 1929 में उन्हीं के नेतृत्व में सोनपर में प्रांतीय किसान सभा की स्थापना की गयी। 1936 में स्वामी सहजानंद की अध्यक्षता में लखनऊ में अखिल भारतीय किसान सभा का गठन हुआ।
अखिल भारतीय किसान सभा ने किसानों को संगठित करने एवं उनमें चेतना जगाने के लिए किसान बुलेटिन एवं किसान घोषणा पत्र जारी किया। किसानों की मुख्य मांगें जमींदारी समाप्त करने, किसानों को जमीन का मालिकाना हक देने, बेगार प्रथा समाप्त करने एवं लगान की बढ़ी दरों में कमी थी। अपनी मांगों के समर्थन में किसानों ने प्रदर्शन तथा व्यापक आंदोलन किए। सितम्बर, 1936 को पूरे देश में किसान दिवस मनाया गया। उत्तर प्रदेश, बिहार और अन्य स्थानों में किसानों की जमीन को बकाश्त जमीन में बदलने के विरुद्ध एक बड़ा आंदोलन हुआ।


12. प्रथम विश्वयद्ध के भारतीय राष्टीय आंदोलन के साथ अन्तसबमा की विवेचना करें।

उत्तर ⇒ प्रथम विश्वयुद्ध के समय भारत में होनेवाली तमाम घटनाएँ से उत्प परिस्थितियों की ही देन थी। इसने भारत में नई आर्थिक और राजनैतिक स्थिति उत्प की जिससे भारतीय राष्ट्रवाद ज्यादा परिपक्व हुआ। महायुद्ध के बाद भारत आर्थिक स्थिति बिगडी। पहले तो कीमतें बढी और फिर आर्थिक गतिविधिया होने लगी जिससे बेरोजगारी बढी। महँगाई अपने चरम बिन्दु पर पहुँच गयी | मजदूर, किसान दस्तकारों का सबसे अधिक प्रभावित किया। इसी परिस्थिति :
धागपतियों का एक वर्ग का उदय हुआ। युद्ध के बाद भारत में विदेशा पूंजी का प्रभाव बढ़ा। भारतीय उद्योगपतियों ने सरकार से विदेशी वस्तुओं के आयात में भारी आयात शुल्क लगाने की माँग की जिससे उनका घरेलू उद्योग बढ़े लेकिन सरकार ने उनकी मांगों को इनकार कर दिया। अंततः प्रथम विश्वयुद्ध ने भारत सहित पूरे एशिया और अफ्रीका में राष्ट्रवादी भावनाओं को प्रबल बनाया।


13. भारत के राष्ट्रीय आंदोलन में जनजातीय लोगों की क्या भूमिका थी ?

उत्तर ⇒ भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास में जनजातियों की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। 19 वीं एवं 20 वीं शताब्दियों में उनके अनेक आंदोलन हुए। 19 वा शताब्दी में हो, कोल, संथाल एवं बिरसा मुंडा आंदोलन हुए। 1916 में दक्षिण भारत की गोदावरी पहाड़ियों के पुराने रंपा प्रदेश में विद्रोह हुआ। 1920 के दशक में आंध्र प्रदेश की गूडेम पहाड़ियों में अल्लूरी सीताराम राजू का विद्रोह हुआ। छोटानागपुर में उराँव जनजातियों के बीच जतरा भगत के नेतृत्व में ताना भगत आंदोलन चला। इन प्रमुख आंदोलनों के अतिरिक्त देश के अन्य भागों में भी अनेक जनजातीय विद्रोह हुए, जैसे – उड़ीसा में 1914 का खोंड विद्रोह, 1917 में मयूरभंज में संथालों एवं मणिपुर में थोडोई कुकियों का विद्रोह, बस्तर में 1910 में गुंदा धुर का विद्रोह इत्यादि। सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान पश्चिमोत्तर सीमाप्रांत की जनजातियों एवं भारत छोडो आंदोलन के समय झारखंड के आदिवासियों ने भी विद्रोह किए। ये सभी जनजातीय विद्रोह प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े हुए थे।

5. अर्थव्यवस्था और आजीविका ( दीर्घ उत्तरीय प्रश्न )


1. औद्योगिकीकरण का भारत पर क्या प्रभाव पड़ा ?

उत्तर ⇒ औद्योगिकीकरण का भारत पर व्यापक पड़ा। औद्योगिकीकरण के भारत पर प्रभाव निम्नलिखित हुए –

(i) उद्योगों का विकास – औद्योगिकीकरण के विकास के पूर्व भारत मा उत्पादन का कार्य छोटे गह उद्योगों में होता था। अब उत्पादन कारखानों में होने लगा। कपड़ा बुनन, सूत कातने के लिए मिल स्थापित हुए। इस प्रकार औद्योगिकीकरण से भारतीय उद्योगों का विकास हुआ।

(ii) नगरीकरण को बढ़ावा- औद्योगिकीकरण ने नगरीकरण को बढ़ावा दिया। औद्योगिक केंद्र नगर के रूप में परिवर्तित हए। वहाँ बाहर के लोगों को आकर बसने से जनसंख्या में वृद्धि हुई। औद्योगिकीकरण के कारण पुराने नगरों जैसे बंबई, कलकत्ता की समृद्धि में वृद्धि हुई तो नए नगर भी विकसित हुए जैसे जमशेदपुर, बोकारो, सिंदरी, धनबाद, डालमियानगर इत्यादि।

(iii) कुटीर उद्योगों की अवनति – कारखानों की स्थापना ने परंपरागत कुटीर एवं लघु उद्योगों का पतन कर दिया। इसका एक मुख्य कारण था, कारखानों में उत्पादित सामान सस्ते थे जबकि कुटीर उद्योगों में उत्पादित सामान महंगे होते थे। इसलिए बाजार में इनकी माँग घट गई। सरकारी नीतियों के कारण कुटीर उद्योगों को कच्चा माल मिलना भी दुर्लभ हो गया। फलत: वे बंद प्राय हो गए।

(iv) सामाजिक विभाजन – ‘भारत में औद्योगिकीकरण के विकास के साथ ही नए-नए सामाजिक वर्गों का उदय और विकास हुआ। कल-कारखानों के विकास के कारण समाज में पूँजीपति वर्ग तथा श्रमिक वर्ग का उदय हुआ।


2. कुटीर उद्योग के महत्त्व एवं उपयोगिता पर प्रकाश डालें।

उत्तर ⇒ भारत में औद्योगिकीकरण ने कुटीर उद्योगों को काफी क्षति पहुँचाई परंतु दस विषम परिस्थिति में भी गाँवों में यह उद्योग फल-फूल रहा था, जिसका लाभ आम जनता को मिल रहा था महात्मा अनुसार लघु एवं कुटीर उद्योग भारतीय सामाजिक दशा के अनकल हैं। कटीर उद्योग उपभाक से अत्यधिक संख्या में रोजगार उपलब्ध कराने में तथा रा. जैसे महत्त्व से जुड़ा है। सामाजिक तथा आर्थिक समस्या स्याओं का समाधान कुटीर उधागों द्वारा ही होता है। कटीर उद्योग में बहत कम पूँजी का अ जी की आवश्यकता होती है। कुटीर उद्योग में वस्तुओं के उत्पादन करने की क्षमत असर उद्योग में वस्तुओं के उत्पादन करने की भापता कछ लोगों क हाथ म न रहकर बहुत से लोगों के हाथ में रहती है। कटीर उद्योग जनसंख्या का या को बड़े शहरों में पलायन को रोकता है। कुटीर उद्योग गाँवों को आत्मनिर्भर बनाने का एक औजार है। आद्यागिकीकरण के विकास के पहले भारतीय निर्मित वस्तुओं का विश्वव्यापी बाजार था। भारतीय मलमल तथा छींट सती कपड़ों की माँग पूरे विश्व में थी। ब्रिटेन भारतीय हाथों से बनी हई वस्तओं का ज्यादा महत्त्व दिया जाता था। हाथों से बन महीन धागों के कपडे तसर मिल्क बनारसी तथा बालुचेरी साड़िया तथा बने हुए बॉडर वाली साडियाँ एवं मद्रास की लंगियों की मांग ब्रिट अधिक थी। चूंकि ब्रिटिश सरकार की नीति भारत में विद बाटश सरकार की नीति भारत में विदेशी निर्मित वस्तओं आयात एवं भारत के कच्चा माल के निर्यात को प्रोत्साहन देना था, इसलिए ग्रामीण उद्योगों पर ध्यान नहीं दिया गया। फिर भी स्वदेशी आंदोलन के समय खादी जैसे वस्त्रों की माँग नं कुटीर उद्योग को बढ़ावा दिया।


3. औद्योगिकीकरण के कारणों का उल्लेख करें।

उत्तर ⇒ औद्योगिकीकरण के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे-

(i) स्वतंत्र व्यापार एवं अहस्तक्षेप की नीति- ब्रिटेन में स्वतंत्र व्यापार और अहस्तक्षेप की नीति ने ब्रिटिश व्यापार को बहुत अधिक विकसित किया। जिसके कारण उत्पादित वस्तुओं की मांग में काफी वृद्धि हुई।

(ii) नय-नये मशीनों का आविष्कार- अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में ब्रिटेन में नये-नये यंत्रों एवं मशीनों के आविष्कार ने उद्योग जगत में ऐसी क्रांति का सूत्रपात किया, जिससे औद्योगिकीकरण का मार्ग प्रशस्त हुआ। 1770 ई० में जेम्स हारग्रीब्ज ने सूत काटने की एक अलग मशीन ‘स्पिनिंग जेनी’ बनाई। सन् 1773 में जॉन के ने फ्लाइंग शदल’ बनाया जिसके द्वारा जुलाहे बड़ी तेजी से काम करने लगे तथा धागे की माँग बढ़ने लगी। टॉमस बेल के ‘बेलनाकार छपाई’ के आविष्कार ने तो सूती वस्त्रों की रंगाई एवं छपाई में नई क्रांति ला दी।

(iii) कोयले एवं लोहे की प्रचुरता – चूँकि वस्त्र उद्योग की प्रगति कोयले एवं लोहे के उद्योग पर बहुत अधिक निर्भर करती है, इसलिए इन उद्योगों पर बहुत अधिक ध्यान दिया गया। ब्रिटेन में कोयल एवं लोहे की खाने प्रचूर मात्रा में थी। 1815 ई० में हेनरी बेसेमर ने एक शक्तिशाली भट्टी विकसित करके लौह उद्योग को और भी बढ़ावा दिया।

(iv) उद्योग तथा व्यापार के नये-नये केंद्र- फैक्ट्री प्रणाली के कारण उद्योग एवं व्यापार के नये-नये केंद्र स्थापित होने लगे। लिवरपुल में स्थित लंकाशायर तथा मैनचेस्टर सूती वस्त्र उद्योग का बड़ा केंद्र बन गया। न्यू साउथ वेल्स ऊन उत्पादन का केंद्र बन गया।

(v) सस्ते श्रम की उपलब्धता – औद्योगिकीकरण में ब्रिटेन में सस्ते श्रम की आवश्यकता की भूमिका भी अग्रणी रही। बाड़ाबंदी प्रथा की शुरुआत के कारण जमींदारों ने छोटे-छोटे खेतों को खरीदकर बड़े-बड़े फार्म स्थापित कर लिए। जमीन बेचनेवाले छोटे किसान भूमिहीन मजदूर बन गए। मशीनों द्वारा फैक्ट्री में काम करने के लिए असंख्य मजदूर कम मजदूरी पर भी तैयार हो जाते थे।

(vi) यातायात की सुविधा- फैक्ट्री में उत्पादित वस्तुओं को एक जगह स दसरे जगह पर ले जाने तथा कच्चा माल की फैक्ट्री तक लाने के लिए ब्रिटेन म यातायात की अच्छी सुविधा उपलब्ध थी। रेलमार्ग शुरू होने से पहले नदियों एवं समुद्र के रास्ते व्यापार होता था। जहाजरानी उद्योग में यह विश्व का अग्रणी देश था और सभी देशों के सामानों का आयात-निर्यात मुख्यतया ब्रिटेन के व्यापारिक जहाजी बेड़े से ही होता था, जिसका आर्थिक लाभ औद्योगिकीकरण की गति का तीव्र करने में सहायक बना।

(vii) विशाल उपनिवेश – औद्योगिकीकरण की दिशा में ब्रिटेन द्वारा स्थापित विशाल उपनिवेशों ने भी योगदान दिया। इन उपनिवेशों से कच्चा माल सस्ते दामा में प्राप्त करना तथा उत्पादित वस्तुओं को वहाँ के बाजारों में महँगे दामों पर बेचना आसान था।


4. उपनिवेशवाद से आप क्या समझते हैं ? औद्योगिकीकरण ने उपनिवेशवाद को कस जन्म दिया ?

उत्तर ⇒ किसी शक्तिशाली साम्राज्यवादी देशों द्वारा किसी दूसरे कमजोर देशों पर अधिकार कर उसकी सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक एवं उसके शासन प्रबंध पर नियंत्रण कर लेने की प्रक्रिया को ही उपनिवेशवाद कहते हैं। अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में नये-नये यंत्रों एवं मशीनों के आविष्कार ने उद्योग जगत में ऐसे क्रांति का सूत्रपात किया जिससे औद्योगिकीकरण एवं उपनिवेशवाद दोनों का मार्ग प्रशस्त हुआ। मशीनों का आविष्कार तथा कारखानों की स्थापना से उत्पादन में काफी वृद्धि हुई। इसकी खपत किसी एक देश में होना संभव नहीं था। अतः सामानों की बिक्री के लिए तथा कच्चे माल की प्राप्ति के लिए यूरोप के बड़े-बड़े देश बाजार और उपनिवेश खोजने लगे। यूरोप के नई राष्ट्रों ने अमेरिका, एशिया, अफ्रीका इत्यादि महादेशों में अपने-अपने उपनिवेश स्थापित किए। इसी क्रम में एशिया में भारत ब्रिटेन के एक विशाल उपनिवेश के रूप में उभरा। भारत सिर्फ प्राकृतिक एवं कृत्रिम संसाधनों में ही सम्पन्न नहीं था, बल्कि यह उनका एक वृहत बाजार भी साबित हुआ। इस तरह हम कह सकते हैं कि औद्योगिकीकरण ने उपनिवेशवाद को बढ़ावा दिया।


5. औद्योगिक क्रांति सर्वप्रथम इंगलैंड में ही क्यों हुई ?

उत्तर ⇒ औद्योगिक क्रांति सबसे पहले इंगलैंड में हुई। इसके प्रमख कारण निम्नलिखित थे

(i) इंगलैंड की भौगोलिक स्थिति उद्योग धंधों के विकास के अनुकूल थी। उसके पास अच्छे समुद्री बंदरगाह एवं प्रचुर मात्रा में कोयला और लोहा जैसे खनिज पदार्थ उपलब्ध थे।

(ii) 18 वीं शताब्दी में इंगलैंड में कृषि क्रांति हुई जिससे सस्ते मजदूर बड़ी संख्या में उपलब्ध हो गए।

(iii) उपनिवेशों से व्यापारिक संबंध स्थापित कर व्यापारियों ने कारखानों को चलाने के लिए कच्चा माल तथा उत्पादित वस्तुओं की बिक्री के लिए बड़ा बाजार . सुनिश्चित कर लिया।

(iv) मुक्त व्यापार और अहस्तक्षेप की नीति अपनाकर ब्रिटिश सरकार ने व्यापार और उद्योगों के विकास को बढ़ावा दिया।

(v) औद्योगिक क्रांति लाने में इंगलैंड के वैज्ञानिकों का भी महत्त्वपूर्ण योगदान था जिन्होंने नए-नए मशीनों का आविष्कार किया।

(vi) भारत जैसे संपन्न उपनिवेशों से इंगलैंड को उद्योगों के लिए कच्चा माल एवं उत्पादित वस्तुओं के लिए बाजार भी उपलब्ध हो गया।
उपरोक्त कारणों के चलते ही औद्योगिक क्रांति सर्वप्रथम यूरोप में हुई।


6. औद्योगिक क्रांति का इंगलैंड पर क्या प्रभाव पड़ा ?

उत्तर ⇒ औद्योगिक क्रांति ने व्यापक रूप से इंगलैंड के आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन को प्रभावित किया। इंगलैंड में औद्योगिक क्रांति के निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण परिणाम हुए –

(i) कारखानेदारी प्रथा का विकास – औद्योगिक क्रांति के कारण इंगलैंड में बड़ी संख्या में विशाल कारखाने खुले जिनमें बड़े स्तर पर उत्पादन होने लगा।

(ii) नगरों के स्वरूप में परिवर्तन – कारखानों की स्थापना से तत्कालीन नगरों का स्वरूप बदल गया। अब आधुनिक नगरों का उदय हुआ। अनेक नगर औद्योगिक केन्द्र बन गए।

(iii) पूँजीपति वर्ग का विकास – औद्योगिक क्रांति के परिणामस्वरूप इंगलैंड में पूंजीपति वर्ग का विकास हुआ। कुलीन, सम्पन्न एवं व्यापारी अपनी अतिरिक्त पूँजी उद्योगों में निवेश करने लगा।

(iv) श्रमिक वर्ग का उदय – औद्योगिक क्रांति के कारण कारखानों में काम करने वाले श्रमिक वर्ग का उदय हुआ। ये अपना घर-गाँव छोड़कर शहरों में आकर कारखानों में काम करने लगे। परंतु इनकी स्थिति शोचनीय थी। वे शोषण, गरीबी और भूखमरी के शिकार थे।

(v) बाल श्रम की प्रथा का विकास – कारखानेदारी प्रथा के विकास ने बाल श्रम की प्रथा को भी बढ़ावा दिया। उद्योगपति इन्हें कम मजदूरी पर ही बहाल कर इनसे कारखानों में काम लेते थे जिससे उन्हें मुनाफा होता था।

(vi) स्त्री-श्रम का विकास- बच्चों के समान स्त्रियों को भी कारखानेदारों ने कम मजदूरी पर काम में लगाया। इनका भी जीवन कष्टदायक था।

(vii) उपनिवेशवाद का विकास- औद्योगिक क्रांति ने उपनिवेशवाद को बढ़ावा दिया। कारखानों को चलाने के लिए कच्चे माल की आपूर्ति एवं उत्पादित : सामान की खपत के लिए बाजार की खोज के लिए एशिया और अफ्रीका में उपनिवेश स्थापित किए गए।


7. औद्योगिकीकरण के परिणामस्वरूप होने वाले परिवर्तनों पर प्रकाश डालें।

उत्तर ⇒ औद्योगिकीकरण के प्रभाव से यहाँ के आर्थिक एवं सामाजिक जीवन में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए। ये परिवर्तन निम्नलिखित हैं

(i) साम्राज्य-राष्ट्रवाद का विकास – औद्योगिकीकरण के कारण भारी मात्रा में कच्चे माल तथा उत्पादों की खपत हेतु बाजार की आवश्यकता थी। उपनिवेशों में ये दोनों ही उपलब्ध थे। उपनिवेशों की होड़ ने साम्राज्यवाद को जन्म दिया।

(ii) कुटीर उद्योगों का पतन – बड़े-बड़े कारखानों की स्थापना से प्राचीन लघु एवं कुटीर उद्योग का पतन हो गया। कुटीर उद्योग में तैयार माल महंगा तथा कारखाने में उत्पादित सामान सस्ता था। नतीजा यह हुआ कि कुटीर उद्योग समाप्त होने लगे क्योंकि बाजार में इसकी माँग घट गयी थी।

(iii) समाज में वर्ग विभाजन – औद्योगिकीकरण के फलस्वरूप समाज म तीन वर्गों का उदय हुआ.पूँजीपति, बुर्जुआ तथा मजदूर वर्ग।

(iv) स्लम पद्धति की शुरुआत – औद्योगिकीकरण के परिणामस्वरूप नवोदित फैक्ट्री मजदूर वर्ग शहर में छोटे-छोटे घरों में रहने लगे। जहाँ किसी प्रकार की सुविधा नहीं थी। इस प्रकार स्लम पद्धति की शुरुआत हुई।

(v) उद्योगों का विकास –औद्योगिकीकरण के कारण भारत में कारखानों की स्थापना एवं नये-नये यंत्रों का आविष्कार हुआ। विभिन्न उद्योगों से संबद्ध कारखाने खुले और उद्योगों का बड़े स्तर पर विकास हुआ। लोहा एवं इस्पात, कोयला, सीमेंट, चीनी, कागज, शीशा और अन्य उद्योग स्थापित हुए जिनमें बड़े स्तर’ पर उत्पादन हुआ।


8. ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारतीय बुनकरों से सूती और रेशमी वस्त्र नियमित आपूर्ति के लिए क्या व्यवस्था की ?

उत्तर ⇒ सूती वस्त्र उद्योग में व्याप्त प्रतिद्वंद्विता को समाप्त कर उस पर अपना एकाधिकार स्थापित करने के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी ने नियंत्रण एवं प्रबंधन की नई नीति अपनाई जिससे उसे वस्त्र की आपूर्ति लगातार होती रही। इसके लिए कंपनी ने निम्नलिखित व्यवस्था की –

(i) गुमाश्तों की नियुक्ति – कपड़ा व्यापार पर एकाधिकार स्थापित करने के लिए बिचौलियों को समाप्त करना एवं बुनकरों पर सीधा नियंत्रण स्थापित करना आवश्यक था। इसके लिए कंपनी ने अपने नियमित कर्मचारी नियुक्त किए जो “गुमाश्ता” कहे जाते थे। इनका मुख्य काम बुनकरों पर नियंत्रण रखना, उससे कपड़ा इकट्ठा करना तथा बुने गए वस्त्रों की गुणवत्ता की जाँच करना था।

(ii) बुनकरों को पेशगी की व्यवस्था – बनुकरों से स्वयं तैयार सामान प्राप्त करने के लिए कंपनी ने उन्हें अग्रिम पेशगी देने की नीति अपनाई। अग्रिम राशि या पेशगी प्राप्त कर बुनकर अब सिर्फ कंपनी के लिए ही वस्त्र तैयार कर सकते थे। वे अपना माल ईस्ट इंडिया कंपनी के अतिरिक्त अन्य किसी कंपनी या व्यापारी को नहीं बेच सकते थे। बुनकरों को कच्चा माल खरीदने के लिए ऋण भी उपलब्ध कराया गया। अग्रिम राशि और कर्ज से कपड़ा तैयार कर बुनकरों को माल गुमाश्तों को सौंपना पड़ा।


9. प्रथम विश्वयुद्ध के समय भारत का औद्योगिक उत्पादन क्यों बढ़ा ? व्याख्या कीजिए।

उत्तर ⇒ प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान और उसके बाद भारत के औद्योगिक । उत्पादन में काफी तेजी आई जिसके निम्नलिखित प्रमुख कारण थे –

(i) प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटेन में सैनिक आवश्यकता के अनुरूप अधिक सामान बनाए जाने लगे जिससे मैनचेस्टर में बननेवाले वस्त्र उत्पादन में गिरावट आई। इससे भारतीय उद्यमियों को अपने बनाए गए वस्त्र की खपत के लिए देश में ही बहत बड़ा बाजार मिल गया।

(ii) विश्वयुद्ध के लंबा खींचने पर भारतीय उद्योगपतियों ने भी सैनिकों की आवश्यकता के लिए सामान बनाकर मुनाफा कमाना आरंभ कर दिया। सैनिकों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए देशी कारखानों में भी सैनिकों के लिए वर्दी, जूते, जूट की बोरियाँ, टेन्ट, जीन इत्यादि बनाए जाने लगे। इससे देशी कारखानों में उत्पादन बढ़ा।

(iii) युद्ध काल में कारखानों में उत्पादन बढाने के अतिरिक्त अनेक नये-नय कारखाने खोले गए। मजदूरों की संख्या में भी वृद्धि की गयी। फलस्वरूप प्रथम विश्वयुद्ध के समय भारत के औद्योगिक उत्पादन में तेजी से वृद्धि हुआ।


10. स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत सरकार ने मजदूरों की स्थिति म सधार के क्या प्रयास किए ?

उत्तर ⇒ स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत सरकार ने मजदूरों की स्थिति में सुधार लाने के लिए कुछ सराहनीय प्रयास किया। मजदूरों की आजीविका एवं उनके अधिकारों को ध्यान में रखते हुए सरकार ने सन् 1948 में न्यूनतम मजदूरी कानून पारित किया जिसके द्वारा कुछ उद्योगों में मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी देना आवश्यक बना दिया गया। प्रथम पंचवर्षीय योजना में इसे महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया तथा दूसरी योजना में तो यहाँ तक स्पष्ट किया गया कि श्रमिकों को इतनी मजदूरी अवश्य मिलनी चाहिए जिससे वह अपना गुजारा कर सकें तथा साथ ही अपनी कार्यकुशलता बनाए रख सकें। तीसरी पंचवर्षीय योजना में मजदूरी वार्ड स्थापित किया गया और बोनस आयोग भी स्थापित किया गया। मजदूरों की स्थिति में सुधार हेतु सन् 1962 में केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय श्रम आयोग स्थापित किया। इसके द्वारा मजदूरों को रोजगार उपलब्ध कराया गया तथा उनकी मजदूरी को सुधारने का प्रयास किया गया।
इस तरह स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत सरकार ने उद्योग में लगे मजदूरों की आर्थिक स्थिति में सुधार के लिए कई कदम उठाए हैं, जिसके कारण श्रमिकों की स्थिति में काफी सुधार आया है।


11. 18 वीं शताब्दी तक अंतर्राष्ट्रीय बाजार में भारतीय वस्त्रों की माँग बने रहने का क्या कारण था ?

उत्तर ⇒ प्राचीन काल से ही भारत का वस्त्र उद्योग अत्यंत विकसित स्थिति में था। यहाँ विभिन्न प्रकार के वस्त्र बनाए जाते थे। उनमें महीन सूती (मलमल) और रेशमी वस्त्र मुख्य थे। उनकी माँग अंतर्राष्ट्रीय बाजार में काफी थी। कंपनी सत्ता की स्थापना एवं सुदृढीकरण के आरंभिक चरण तक भारत के वस्त्र निर्यात में गिरावट नहीं आई। भारतीय वस्त्रों की माँग अंतर्राष्ट्रीय बाजार में बनी हुई थी जिसका मुख्य कारण था कि ब्रिटेन में वस्त्र उद्योग उस समय तक विकसित स्थिति में नहीं पहुँचा था। एक अन्य कारण यह था कि जहाँ अन्य देशों में मोटा सूत बनाया जाता था वहीं भारत में महीन किस्म का सूत बनाया जाता था। इसलिए आर्मीनियन और फारसी व्यापारी पंजाब, अफगानिस्तान, पूर्वी फारस और मध्य एशिया के मार्ग से भारतीय सामान ले जाकर इसे बेचते थे। महीन कपड़ों के थान ऊँट की पीठ पर लादकर पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत से पहाड़ी दरों और रेगिस्तानों के पार ले जाए जाते थे। मध्य एशिया से इन्हें यूरोपीय मंडियों में भेजा जाता था।


12. औद्योगिकीकरण ने सिर्फ आर्थिक ढाँचे को ही प्रभावित नहीं किया बल्कि राजनैतिक परिवर्तन का भी मार्ग प्रशस्त किया, कैसे ?

उत्तर ⇒ औद्योगिकीकरण वास्तव में न सिर्फ आर्थिक ढाँचे को प्रभावित किया वरन इसने राजनैतिक परिवर्तन के मार्ग को भी प्रशस्त कर दिखाया। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत सरकार ने जहाँ एक तरफ कुटीर उद्योग को बढ़ावा दिया वहीं दूसरी तरफ औद्योगिकीकरण प्रक्रिया भी आगे बढ़ने लगी। अब रसायन एवं बिजली जैसे औद्योगिक क्षेत्रों का विस्तार होने लगा तथा विद्युत् इलेक्ट्रॉनिक एवं स्वचालित मशीनों का प्रयोग किया जाने लगा। उन्नीसवीं शताब्दी में ब्रिटेन की औद्योगिक नीति ने जिस तरह औपनिवेशिक शोषण की शुरुआत की, भारत में राष्ट्रवाद की नींव उसका प्रतिफल था। यही कारण था कि जब महात्मा गाँधी ने असहयोग आंदोलन की शुरुआत की तो राष्ट्रवादियों के साथ अहमदाबाद एवं खेड़ा मिल मजदूरों ने उनका साथ दिया। महात्मा गाँधी ने विदेशी वस्तुओं को बहिष्कार एवं स्वदेशी वस्तुओं को अपनाने पर बल डालते हुए कुटीर उद्योग को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया तथा उपनिवेशवाद के खिलाफ उसका प्रयोग किया। पूरे भारत के मिलों में काम करनेवाले मजदूरों ने भारत छोड़ो आंदोलन में उनका साथ दिया। अतः औद्योगिकीकरण में जिसकी शुरुआत एक आर्थिक प्रक्रिया के तहत हुई थी, भारत में राजनैतिक एवं सामाजिक परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त हुआ।


13. 19 वीं शताब्दी में यूरोप में कुछ उद्योगपति मशीनों के बजाए हाथ से काम करनेवाले श्रमिकों को प्राथमिकता देते थे। इसका क्या कारण था ?

उत्तर ⇒ 19वीं शताब्दी में औद्योगिकीकरण के बावजद हाथ से काम करने वाले श्रमिकों की माँग बनी रही। अनेक उद्योगपति मशीनों के स्थान पर हाथ से काम करने वाले श्रमिकों को ही प्राथमिकता देते थे। इसके प्रमख कारण निम्नलिखित थे –

(i) इंगलैंड में कम मजदूरी पर काम करने वाले श्रमिक बड़ी संख्या में उपलब्ध थे। उद्योगपतियों को इससे लाभ था। मशीन लगाने पर आने वाले खर्च से कम खर्च पर ही इन श्रमिकों से काम करवाया जा सकता था।

(ii) मशीनों को लगवाने में अधिक पँजी की आवश्यकता थी। साथ ही मशीन के खराब होने पर उसकी मरम्मत कराने में अधिक धन खर्च होता था। मशीने उतनी अच्छी नहीं थी, जिसका दावा आविष्कारक करते थे।

(iii) एक बार मशीन लगाए जाने पर उसे सदैव व्यवहार में लाना पड़ता था, परंतु श्रमिकों की संख्या आवश्यकतानुसार घटाई-बढ़ाई जा सकती थी। उदाहरण के लिए इंगलैंड में जाडे के मौसम में गैसघरों और शराबखानों में अधिक काम रहता था। बंदरगाहों पर जाड़ा में ही जहाजों की मरम्मत तथा सजावट का काम किया जाता था। इसलिए उद्योगपति मशीनों के व्यवहार से अधिक हाथ से काम करने वाले मजदूरों को रखना ज्यादा पसंद करते थे।

(iv) विशेष प्रकार के सामान सिर्फ कुशल कारीगर ही हाथ से बना सकते थे। मशीन विभिन्न डिजाइन और आकार के सामान नहीं बना सकते थे। .

(v) विक्टोरियाकालीन ब्रिटेन में हाथ से बनी चीजों की बहुत अधिक माँग थी। । हाथ से बने सामान परिष्कृत, सुरुचिपूर्ण, अच्छी फिनिशवाली, बारीक डिजाइन और विभिन्न आकारों की होती थी। कुलीन वर्ग इसका उपयोग करना गौरव की बात मानते थे।
इसलिए आधुनिकीकरण के युग में मशीनों के व्यवहार के बावजूद हाथ से काम करनेवाले श्रमिकों की माँग बनी रही।

6. शहरीकरण एवं शहरी जीवन ( दीर्घ उत्तरीय प्रश्न )


1. ग्रामीण तथा नगरीय जीवन के बीच भिन्नताओं को स्पष्ट करें।

उत्तर ⇒  ग्रामीण तथा शहरी या नगरीय जीवन के बीच दो मूलभूत अंतर देखा जाता है। प्रथम जनसंख्या का घनत्व और दूसरा कृषि आधारित आर्थिक क्रियाओं का अनुपात। नगरों में जनसंख्या का घनत्व ग्रामीण इलाकों से अधिक होता है। गाँवों में कम लोग ही अधिक स्थानों में रहते हैं परंतु नगरों में कम स्थानों में अधिक लोग रहते हैं। इसलिए गाँव जहाँ खुलापन लिए होते हैं वहीं शहर संकुचित एवं भीड़-भाड़ वाले होते हैं। नगरों और गाँवों में दूसरा मूलभूत अंतर कृषिजन्य क्रियाकलापों से संबंधित है। ग्रामीण जनसंख्या का एक बहुत बड़ा भाग कृषि और इसके उत्पाद पर आश्रित रहता है और वही इनकी आजीविका का मुख्य साधन होता है। इसके विपरीत शहरी जनसंख्या का अधिकांश भाग गैर-कृषि व्यवसायों विशेषकर नौकरी, उद्योग तथा व्यापारिक गतिविधियों में लगी रहती है। इसके अतिरिक्त ग्रामीण तथा शहरी जीवन की अर्थव्यवस्था एक-दूसरे से भिन्न होती है। शहरी अर्थव्यवस्था मुद्रा प्रधान अर्थव्यवस्था होती है। यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था की तुलना में अधिक गतिशील होती है।


2. शहरीकरण की प्रक्रिया में व्यवसायी वर्ग, मध्यम वर्ग एवं मजदूर वर्ग की भूमिका की चर्चा करें।

उत्तर ⇒ शहरीकरण की प्रक्रिया से समाज में विभिन्न वर्गों का अस्तित्व आया। शहरीकरण की प्रक्रिया में इन वर्गों की भूमिका क्रमानुसार इस प्रकार है

व्यवसायी वर्ग – शहरीकरण की प्रक्रिया के कारण व्यापार तथा वाणिज्य का विकास हुआ। नये-नये व्यवसायों के कारण विभिन्न व्यवसायी वर्ग का उदय हुआ चुकी व्यापार शहरों में ही होते थे इसलिए शहरों में ही विभिन्न व्यवसायी वर्ग अस्तित्व में आए। शहरों में यह व्यवसायी वर्ग एक नये सामाजिक शक्ति के रूप में उभरकर आए।

मध्यम वर्ग – शहरीकरण के परिणामस्वरूप समाज के एक नये वर्ग मध्यम वर्ग का उदय हुआ। यह एक शिक्षित वर्ग था जो विभिन्न पेशों में रहकर भी औसतन एक समान आय प्राप्त करने वाला वर्ग के रूप में उभरकर सामने आया एवं बुद्धिजीवी वर्ग कहलाया। यह मध्यम वर्ग शहरों में विभिन्न रूपों में कार्यरत जैसे-शिक्षक, वकील, चिकित्सक, इंजीनियर, क्लर्क, एकाउंटेंट्स आदि। समाज पर इनका व्यापक प्रभाव था। ये राजनीतिक आदोलन में भाग लेते थे एवं इसे नेतृत्व भी प्रदान करते थे।

मजदूर वर्ग – शहरीकरण की प्रक्रिया ने समाज में जहाँ एक ओर पूँजीपति वर्ग को जन्म दिया वहीं दूसरी ओर प्रमिक या मजदूर वर्ग को भी। कारखानेदारी प्रथा से शहरों में श्रमिक वर्ग का भी उदय और विकास हुआ। ये मजदूर वर्ग संगठित होकर अपना संगठन बनाये तथा अपनी मांगों के समर्थन में समय-समय पर हड़ताल भी किए। इस प्रकार हड़ताल और श्रमिक आंदोलन आधुनिक शहरों की विशेषता बन गई।


3. शहरी जीवन में किस प्रकार के सामाजिक बदलाव आए ?

उत्तर ⇒ शहरी जीवन के कारण विभिन्न प्रकार के सामाजिक बदलाव आए, जो निम्नलिखित हैं

(i) शहरों में ‘सामूहिक पहचान’ के सिद्धांत को बढ़ावा मिला। ये समूह विभिन्न प्रजातियों, नृजातियों, जातियों, प्रदेश, क्षेत्रीयता का प्रतिनिधित्व करते हैं। कम स्थान में विभिन्न प्रकार के लोगों के रहने से पहचान की भावना बढ़ती है।

(ii) शहरीकरण के कारण शहरों में नए सामाजिक समूह बने। ये समूह व्यावसायिक थे जैसे बुद्धिजीवी, नौकरी पेशा समूह, राजनीतिज्ञ, चिकित्सक, व्यापारी इत्यादि। व्यवसायी वर्ग नगरों के उदय का एक प्रमुख कारण बना।

(iii) शहरीकरण के कारण समाज के नये मध्यमवर्ग का उदय हुआ। यह वर्ग पढ़ा-लिखा था। इसके अधिकांश सदस्य या तो नौकरी पेशा से संबंधित थे अथवा स्वतंत्र व्यवसाय में कार्यरत थे—जैसे वकील, डॉक्टर, लिपिक इत्यादि। ये नये सामाजिक परिवर्तनों को अपनाकर इनका प्रसार करते थे। समाज पर इनका व्यापक प्रभाव था।

(iv) शहरीकरण के कारण समाज में पूँजीपति वर्ग का भी उदय हुआ। अपनी पूँजी के आधार पर ये उद्योगों को नियंत्रित करते थे। आर्थिक उन्मुक्तवाद की नीति का लाभ उठाकर इन लोगों ने अपार धन संग्रह किया था। ये मजदूरों का शोषण करते थे। इसलिए धीरे-धीरे इनके विरुद्ध मजदूरों में प्रतिक्रिया हुई और मजदूर आंदोलन हुए।

(v) शहरी जीवन ने श्रमिकों के जीवन स्तर में भी काफी बदलाव लाए । कारखानों और उद्योगों में रोजगार की तलाश में गाँवों से आकर बड़ी संख्या में भूमिहीन किसान और मजदूर शहरों में बसने लगे। इनके श्रम पर ही औद्योगिक इकाइयाँ चली। परंतु पूँजीपतियों ने श्रमिकों का शोषण किया। फलतः श्रमिक संगठित हुए और श्रमिक संघों की स्थापना की गई। श्रमिकों ने अपनी मांगों की पूर्ति के लिए समय-समय पर हड़ताल किये। इस प्रकार हड़ताल और श्रमिक आंदोलन आधुनिक शहरों की विशेषता बन गई। शहरी जीवन ने औरतों के प्रति सोच में भी काफी बदलाव लाया। औरतों ने भी मताधिकार की माँग अथवा विवाहित स्त्रियों को संपत्ति में अधिकार देने के लिए आंदोलन चलाया।


4. शहरीकरण से आप क्या समझते हैं ? शहरीकरण में सहायक तत्वों का उल्लेख करें। या, शहरों के विकास की पृष्ठभूमि एवं उसके प्रक्रिया पर प्रकाश डालें।

उत्तर ⇒ शहरीकरण का इतिहास काफी पुराना है। मानव सभ्यता के विकास के साथ-साथ शहरों का भी उदय और विकास हुआ। सुमेर (मेसोपोटामिया), हड़प्पा (भारत-पाकिस्तान) रोम और यूनानी सभ्यताओं में अनेक नगर विकसित हुए। मध्यकालीन और आधुनिक काल में भी शहरीकरण की प्रक्रिया जारी रही। प्राचीन, मध्यकालीन और आधुनिक शहरों के स्वरूप में अंतर देखा जा सकता है। इन सभी शहरों की एक साझा विशेषता थी कि शहर गैर कषक उत्पादन, व्यवसाय और व्यापार के केंद्र थे। शहरों में नगरीय जीवन एवं संस्कृति का विकास हुआ। शहरीकरण उस प्रक्रिया को कहते हैं जिसके अंतर्गत गाँव, छोटे कस्बे, शहर, र और महानगर में तब्दील हो जाते हैं। शहरों के उदय और विकास में अनेक नों का योगदान रहा है। इनमें आर्थिक, राजनीतिक और धार्मिक कारणों का समान महत्त्वपूर्ण है। शहरों का उदय एवं इसकी विकास की प्रक्रिया में तीन तत्त्वों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। ये हैं –

(i) औद्योगिक पूँजीवाद का उदय
(ii) उपनिवेशवाद का विकास तथा
(iii) लोकतांत्रिक आदर्शों का विकास।
टीकरण ने आर्थिक व्यवस्था के साथ-साथ सामाजिक एवं राजनीतिक व्यवस्था पर भी गहरा प्रभाव डाला।


5. शहरीकरण का पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ा ? प्रदूषण को रोकने के लिए क्या प्रयास किए गए ?

उत्तर ⇒ शहरीकरण का प्रतिकूल प्रभाव पर्यावरण पर पड़ता है। शहरों में कल-कारखानों के खुलने, बेतरतीब भीड़, गाड़ियों और लोगों की लगातार आवाजाही, गंदगी और धूल से पर्यावरण दूषित होगा। शहरों का विस्तार करने के क्रम में पाकतिक वातावरण को नष्ट कर दिया गया। जंगल काटे गए, पहाड़ियों को समतल किया गया तथा तटीय इलाकों को भूमि के रूप में परिवर्तित किया गया। इन सबका परिणाम हुआ पर्यावरण का दूषित होना। हवा, पानी को गंदगी ने प्रदूषित कर दिया, शोर-शराबे से भी वायु प्रदूषण बढ़ा। धीरे-धीरे नगर नियोजक इन समस्याओं की
ओर ध्यान देने लगे। पर्यावरण को साफ-सुथरा बनाए रखने के लिए कुछ प्रयास किए गए।
सरकार ने समय-समय पर शहरों के पर्यावरण में सुधार लाने और प्रदूषण को नियंत्रित करने के प्रयास किए। शहर में दुर्गंध फैलानेवाले इलाकों की सफाई करवाई गई। गंदे कारखानों को शहर से बाहर स्थानांतरित करने का प्रयास किया गया जो कारगर नहीं हुआ। भारत में पहली बार कलकत्ता में ही 1863 में धुआँ निरोधक कानून पारित किया गया। बंगाल धुआँ निरोधक आयोग के प्रयासों से कलकत्ता में औद्योगिक इकाइयों से निकलनेवाले धुएँ पर नियंत्रण कर वायु प्रदूषण को कम करने का प्रयास किया गया।


6. बंबई की चॉल और उनमें रहने वालों के जीवन पर एक संक्षिप्त निबंध लिखें।

उत्तर ⇒ चॉल मुख्यतः गरीब लोगों और बाहर से बंबई में आकर बसनेवाले लोगों के लिए बनवाए गए। 1901 की जनगणना के अनुसार बंबई की लगभग 80 प्रतिशत आबादी इन चॉलों में रहती थी।
चॉल बहुमंजिली इमारतें थी। इनमें एक कमरे के मकान (खोली) कतार में बने होते थे। इनमें शौचालय और नल की व्यवस्था सार्वजनिक रूप से की गई थी। एक कमरे में औसतन चार-पाँच व्यक्ति रहते थे। कमरों का किराया अधिक होने के कारण कई मजदूर मिलकर एक कमरा ले लेते थे। एक चॉल में सामान्यतः एक ही जाति बिरादरी वाले रहते थे।
चॉलों का वातावरण अत्यंत दूषित और अस्वास्थ्यकर था। इनके पास ही खुले गटर और गंदी नालियाँ बहती थी। भैंसों के तबेले भी इनके पास ही रहते थे। इसस बराबर दुर्गंध आती रहती थी। शौचालयों में जाने के लिए एवं पानी लेने के लिए नल पर कतारें लगानी पड़ती थी। कमरों में स्थान की कमी होने के कारण सड़कों पर और सार्वजनिक स्थान पर खाना बनाया जाता था, कपड़ा धोया जाता था और सोया भी जाता था। खाली जगहों पर शराब की दुकानें एवं अखाड़े भी खोल लिए जात थे। सार्वजनिक स्थलों पर विविध प्रकार के मनोरंजन भी किए जाते थे। चॉलों में रहनेवालों का जीवन चॉलों में ही सिमटा हुआ था। यहीं उन्हें रोजगारों, हड़तालों, प्रदर्शनों और अन्य गतिविधियों के विषय में जानकारी मिलती थी। इस प्रकार चॉलों में रहनेवालों के लिए बंबई कठिनाइयों और संघर्ष का पर्याय था।


7. पेरिस के हॉसमानीकरण से आप क्या समझते हैं ? पेरिस कापुनर्निर्माण कैसे किया गया ?

उत्तर ⇒1852 में फ्रांस के सम्राट लुई तृतीय ने पेरिस के पुनर्निर्माण का निर्णयलिया। यह कार्य सियाँ नामक स्थान के प्रीफेक्ट बैरान हॉसमान जो एक विख्यातऔर कुशल वास्तुकार था को सौंपा गया। पेरिस के पुनर्निर्माण के दो स्पष्ट उद्देश्य थे।

(i) नगर को सुंदर, भव्य और आकर्षक बनाना तथा

(ii) पेरिस में बगावत कीसंभावना को रोकने के लिए नगर में गरीबों की बस्ती को नष्ट करना। हॉसमान द्वारापेरिस का पुनर्निर्माण ‘पेरिस का हॉसमानीकरण’ कहलाता है।
हॉसमान ने पेरिस के पुनर्निर्माण में सत्रह वर्षों का लम्बा समय लगाया। इसअवधि में पूरे नगर में सीधी, चौड़ी और छायादार सड़कें (बुलेबर्ड्स) बनाई गई। बड़ेऔर खुले मैदान बनाए गए तथा बाग-बगीचे लगवाए गए। स्थान-स्थान पर बसपड़ावों का निर्माण करवाया गया तथा पानी पीने के लिए नल लगवाए गए। नगरमें शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस को नियुक्त किया गया। अपराधों परनियंत्रण रखने के लिए रात्रि में पुलिस गश्त की व्यवस्था की गई। हॉसमान ने पेरिसका हुलिया बदलकर रख दिया। पेरिस नगर सौंदर्य में यूरोप में अन्य सभी नगरों से बढ़ गया, यह पूरे यूरोप के लिए ईर्ष्या का विषय बन गया।


8. 19 वीं शताब्दी में इंगलैंड में मनोरंजन के कौन से साधन थे ?

उत्तर ⇒ 19वीं शताब्दी में इंगलैंड के शहरवासियों के लिए विभिन्न प्रकार केमनोरंजन की व्यवस्था की गयी। मशीनी जीवन व्यतीत करने के साथ-साथ रविवारएवं छुट्टियों का दिन आराम और मनोरंजन में व्यतीत करने के लिए समाज के विभिन्नवर्गों ने अलग-अलग रास्ते ढूँढ़े। 18वीं शताब्दी के अंतिम दशक से तीन-चार सौधनी एवं संभ्रात परिवार के लोगों के मनोरंजन के लिए ऑपेरा रंगमंच और शास्त्रीय संगीत के सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते थे। 19वीं सदी में मनोरंजन का एक प्रमुख केंद्र शराबखाना था। रेलवे का आरंभ होने के पूर्व शराबखानों में लोग घोड़ागाड़ियों से आते थे। शराबखाने सामान्यतः घोड़ागाड़ियों के रास्ते में स्थापित किए गए। इनमें मुसाफिर आकर ठहरते थे और रात्रि विश्राम भी करते थे। ये मुगलकालीन भारत में प्रचलित सराय के समान थे।
19वीं शताब्दी से लंदनवासियों को अपने इतिहास की जानकारी देने के लिएसंग्रहालय एवं कला दीर्घाएँ सरकार द्वारा खोली गयी। पुस्तकालय भी स्थापित किए गए जो एक ही साथ मनोरंजन एवं ज्ञानवर्द्धन के केंद्र बन गए। 1810 में संग्रहालयों में प्रवेश शुल्क समाप्त कर देने से दर्शकों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई। समाज के निम्न तबके के लोग अपने मनोरंजन के लिए संगीत सभा का आयोजन करते थे।


9. पाटलिपुत्र (पटना) के इतिहास का संक्षिप्त विवरण दीजिए।

उत्तर ⇒ पाँचवीं शताब्दी ई० पूर्व में मगध साम्राज्य की राजधानी राजगृह से स्थानांतरित कर पाटलिपुत्र में बनाई गई। नंदों और मौयों के शासन काल में इस नगर का चातुर्दिक विकास हुआ। यूनानी राजदूत मेगास्थनीज ने इस नगर की यात्रा की एवं इसका विवरण लिखा। बाद में चीनी यात्री फाहियान एवं ह्वेनसांग भी यहाँ आए। गुप्तकाल तक पाटलिपुत्र शिल्प, व्यापार, शिक्षा और सांस्कृतिक गतिविधियों का केन्द्र बना रहा।
गुप्तोत्तर काल से पाटलिपुत्र नगर का पतन हुआ। 1541 में शेरशाह ने गंगा-गंडक के संगम पर एक किला का निर्माण करवाया। इस समय से पाटलिपत्र पटना के रूप में विख्यात हुआ। 17 वीं शताब्दी के आरंभ में पटना आजिमाबाद के नाम से जाना गया। इसी समय यूरोपीय व्यापारिक कंपनियों का नगर में आगमन हुआ। सिखों के अंतिम गुरु गुरु गोविन्द सिंह की जन्मस्थली होने के कारण सिख धर्मावलम्बियों के लिए यह नगर तीर्थस्थान बन गया।


10. लंदन में “गार्डन सिटी” की योजना क्यों बनाई गई ? इस योजना का कार्यान्वयन कैसे किया गया ?

उत्तर ⇒ लंदन में “गार्डन सिटी” की योजना इसलिए बनाई गई क्योंकि स्वच्छ वातावरण में रहने और काम करने से लोग अच्छे नागरिक बन सकेंगे। लंदन में धनी लोगों के लिए वास्तुकार और योजनाकार एवेनेजर हावर्ड ने बागीचों के शहर या गार्डन सिटी की योजना तैयार की। इस शहर की योजना इस रूप में बनाई गई कि शहर में साफ-सुथरे बाग-बागीचे हों, लोगों के रहने और उनके काम करने के स्थान हों। हावर्ड का मानना था कि ऐसे स्वच्छ वातावरण में रहने और काम करनेवाले लोग अच्छे नागरिक बन सकेंगे। हावर्ड की योजना के आधार पर रेमंड अनविन और बैरी पार्कर ने न्यू अर्जविंक नामक बागीचों के शहर का खाका बनाया। इस शहर में बाग-बागीचों, मनमोहन परिदृश्यों, साफ-सुथरे भव्य मकानों की व्यवस्था की गई जिसमें नए सामुदायिक जीवन का विकास हुआ परंतु महँगे होने के कारण इस शहर में सिर्फ कुलीन और संपन्न लोग ही रह सकते थे, गरीबों के लिए इसमें स्थान नहीं था।


11. लंदन में भूमिगत रेलवे का निर्माण क्यों किया गया? इसकी क्या प्रतिक्रिया हुई ?

उत्तर ⇒ लंदन का जब विस्तार होने लगा तब यह शहर इतना विशालकाय हो गया कि लोगों को अपने कार्यस्थल पर पैदल पहुँचना कठिन हो गया। इसके अतिरिक्त लंदन के बाहर के उपशहरों में रहनेवाले लोगों को भी लंदन पहुँचने में मुश्किलें आ रही थी। इसलिए परिवहन के साधनों के विकास की आवश्यकता पड़ी। इसके लिए भूमिगत रेलवे के विकास की योजना बनाई गई। इसका सबसे बड़ा लाभ था कि लोग उपनगरीय बस्तियों से सुविधापूर्वक लंदन आकर अपना काम कर सकते थे। इसका दूसरा लाभ यह था कि भूमिगत रेलवे की सुविधा होने से लंदन परने आबादी का बोझ कम हो जाता। इसलिए 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में लंदन मेंभूमिगत रेल का विकास किया गया। भूमिगत रेलवे के विकास के साथ इसकी प्रतिक्रिया भी व्यक्त की गई। आरंभ में लोगों को भूमिगत रेल से यात्रा करना असुविधाजनक और भयभीत कर देने वाला लगता था। अखबार में एक पाठक ने भूमिगत रेल में अपनी यात्रा का अनुभव इस प्रकार लिखा, “मेरा मानना है कि इन भूमिगत रेलगाड़ियों को फौरन बंद कर देना चाहिए। ये स्वास्थ्य के लिए भयानक खतरा है।” इसी तरह की निराशाजनक प्रतिक्रिया कुछ अन्य लोगों की भी थी। उनका कहना था कि, “इन लौहदैत्यों ने शहर की अफरातफरी और अस्वास्थ्यकर माहौल को और बढ़ा दिया है।” अनुमानतः दो मील लंबी लाइन बिछाने के लिए नौ सौ घर गिरा दिए जाते थे।


12. एक औपनिवेशिक शहर के रूप में बंबई शहर के विकास की समीक्षा करें।

उत्तर ⇒ बंबई भारत का एक प्रमुख शहर था। सत्रहवीं शताब्दी में यह सात टापुओं का इलाका था। 1661 ई० में इंगलैंड के सम्राट चार्ल्स द्वितीय का विवाह पुर्तगाल की राजकुमारी से हुआ, जिसके परिणामस्वरूप पुर्तगाल ने चार्ल्स द्वितीय को दहेज में बंबई दे दिया। बाद में चार्ल्स-11 ने बंबई को ईस्ट इंडिया कंपनी को दे दिया। अपने व्यापार और राजनीतिक प्रभाव के विकास के क्रम में ईस्ट इंडिया कंपनी ने बंबई का विकास कर उसे महानगर में परिवर्तित कर दिया। बंबई का महत्त्व कपड़ा निर्यात केंद्र के रूप में था। अत: कंपनी ने पश्चिम भारत के प्रमुख बंदरगाह सूरत के स्थान पर बंबई को अपनी व्यापारिक गतिविधियों का केंद्र बनाया। 19वीं शताब्दी से बंबई का विकास एक महत्त्वपूर्ण बंदरगाह के रूप में होने लगा। यहाँ से अफीम और कपास का निर्यात किया जाता था। व्यापार के विकास के साथ-साथ यहाँ प्रशासकीय गतिविधियाँ भी बढ़ गई। अत: यह पश्चिमी भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी का मुख्यालय भी बन गया। औद्योगिकीकरण का जब विकास हुआ तो बंबई बड़े औद्योगिक केंद्र के रूप में बदल गया। ईस्ट इंडिया कंपनी ने बंबई को बंबई प्रेसीडेंसी की राजधानी बनाई। इसके बाद बंबई का तेजी से विकास हुआ। शहर फैलने लगा, व्यापारी, कारीगर, उद्योगपति, दुकानदार, श्रमिक बड़ी संख्या में यहाँ आकर बसने लगे। इससे बंबई पश्चिमी भारत का सबसे प्रमुख नगर बन गया। औद्योगिकीकरण के कारण बंबई नगर का तेजी से विकास हुआ। 1854 में बंबई में पहली सूती मिल की स्थापना के साथ ही बंबई औद्योगिकीकरण के मार्ग पर तेजी से आगे बढ़ा।

7. व्यापार और भूमंडलीकरण ( दीर्घ उत्तरीय प्रश्न )


1. 1929 के आर्थिक संकट के कारण एवं परिणामों को स्पष्ट करें।

उत्तर ⇒ 1929 के आर्थिक संकट के कारण-1929 के आर्थिक संकट के महत्त्वपूर्ण कारण निम्नलिखित हैं-

(i) कृषि के क्षेत्र में अति उत्पादन के कारण विश्व बाजारों में खाद्यान्नों की आपूर्ति आवश्यकता से अधिक हो गई। इससे अनाज के मूल्य में कमी आई तथा उनका खरीददार नहीं रहा।

(ii) गरीबी और बेरोजगारी से उपभोक्ताओं की क्रय-क्षमता घट गई थी, अत: विश्व बाजार पर आधारित व्यवस्था लड़खड़ा गई।

(iii) अमेरिकी पैंजी के प्रवाह में कमी आर्थिक संकट का एक अन्य महत्त्वपूर्ण कारण था। अमेरिकी अर्थव्यवस्था का संकटग्रस्त हो जाना विश्व में महामंदी की स्थिति ला दी।

1929 के आर्थिक संकट के परिणाम – आर्थिक महामंदी का विश्वव्यापी प्रभाव पड़ा। यूरोपीय अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई। यूरोप के अनेक बैंक रातोंरात बंद हो गए। अनेक देशों की मुद्रा का अवमूल्यन हो गया। अनाज और कच्चे माल की कीमतें घटने लगी। व्यापक विश्व बाजार का स्थान संकुचित आर्थिक राष्ट्रवाद ने ले लिया।


2. आर्थिक मंदी का अमेरिका, यूरोप तथा भारत पर हुए प्रभावों को इंगित करें।

उत्तर ⇒1929 ई० की आर्थिक संकट मंदी का प्रभाव अमेरिका, युरोप सहित भारत पर भी पडा जो निम्नलिखित हैं

(i) अमेरिका पर प्रभाव- आर्थिक मंदी का सबसे बुरा परिणाम अमेरिका को झेलना पड़ा। मंदी के कारण बैंकों ने लोगों को कर्ज देना बंद कर दिया और दिए हुए कर्ज की वसूली तेज कर दी। कर्ज वापस नहीं हो पाने से बैंकों ने लोगों के सामानों को कुर्क कर लिया। कारोबार के ठप पड़ जाने से बेरोजगारी बढ़ी तथा कर्ज की वसूली नहीं होने पर बैंक बर्बाद हो गए।

(ii) यूरोप पर प्रभाव- इस आर्थिक मंदी से सबसे प्रभावित देश जर्मनी और ब्रिटेन था। फ्रांस इस मंदी से इसलिए बच गया क्योंकि उसे जर्मनी से काफी मात्रा में युद्ध हर्जाना की राशि प्राप्त हुई थी। जर्मनी में अराजकता फैल गयी जिसका लाभ उठाकर हिटलर ने अपने आपको सत्तासीन किया। 1929 के बाद ब्रिटेन के उत्पादन, निर्यात, रोजगार, आयात तथा जीवन निर्वाह स्तर पर सबमें तेजी से गिरावट आई।

(iii) भारत पर प्रभाव- इस आर्थिक महामंदी ने भारतीय व्यापार को काफी प्रभावित किया। 1928 से 1934 के बीच देश का आयात-निर्यात घटकर आधा हो गया। गेहूँ की कीमत में 50 प्रतिशत की गिरावट आई। कृषि मूल्य में कमी के बावजद अंग्रेजी सरकार लगान की दरें कम करने को तैयार नहीं थी जिससे किसानों में असंतोष की भावना बढ़ी। आर्थिक मंदी भारत में सविनय अवज्ञा आंदोलन को जन्म दिया।


3. 1919 से 1945 के बीच विकसित होनेवाले राजनैतिक और आर्थिक संबंधों पर टिप्पणी लिखें।

उत्तर ⇒ युद्धोत्तर आर्थिक व्यवस्था और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को दो चरणों में बाँटकर देखा जा सकता है

(i) 1920 से 1929 तक का काल तथा (ii) 1929 से द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति अथवा 1945 तक का काल। इस समय के अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को विकसित करने में आर्थिक कारणों का महत्त्वपूर्ण योगदान था।

(i) 1920 से 1929 तक का काल सामान्यतः आर्थिक समुत्थान एवं विकास का काल था। प्रथम महायुद्ध के बाद विश्व पर से यूरोप का प्रभाव क्षीण हो गया। हालाँकि एशियाई-अफ्रीकी उपनिवेशों पर उसकी पकड़ यथास्थिति बनी रही। युद्ध की समाप्ति के तत्काल बाद का दो वर्ष आर्थिक संकट का काल था। इस समय उत्पादन और माँग में कमी आई, बेरोजगारी बढ़ी जिससे औद्योगिक इकाइयों में श्रमिकों के हड़ताल होने लगे। 1922 के बाद के वर्षों में स्थिति में बदलाव आने लगा। नये तकनीक की सहायता से औद्योगिक विकास ने गति पकडी जिससे उत्पादन बढ़ा तथा उपभोक्ता वर्ग का भी विकास हुआ।

(ii) 1929-1945 इस चरण में अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संबंधों का विकास विश्वव्यापी आर्थिक महामंदी के प्रभावों को समाप्त करने अथवा उन्हें नियंत्रित करने के उद्देश्य से हुआ। आर्थिक महामंदी का आरंभ अमेरिका से हुआ था। अतः मंदी के प्रभाव को नियंत्रित करने का प्रयास वहीं से आरंभ हुआ। 1932 में फ्रेंकलीन डी० रूजवेल्ट अमेरिका के राष्ट्रपति निर्वाचित हुए। मंदी से निबटने के लिए रूजवेल्ट ने नई आर्थिक नीति अपनाई जिसे न्यू डील का नाम दिया गया। अमेरिका के समान यूरोपीय राष्ट्रों ने भी महामंदी के प्रभाव से बाहर निकलने एवं अर्थव्यवस्था को विकसित करने का प्रयास किया। इसके लिए यूरोपीय राष्ट्रों की सरकारों ने कड़ा मुद्रा नियंत्रण स्थापित किया। पूर्वी यूरोपीय राष्ट्रों ने 1932 में ओटावा सम्मेलन आयोजित किया, जिसमें आयात-निर्यात को संतुलित करने का प्रयास किया गया।


4. दो महायुद्धों के बीच और 1945 के बाद औपनिवेशिक देशों में होनेवाले राष्ट्रीय आन्दोलनों पर एक निबंध लिखें।

उत्तर ⇒ प्रथम विश्वयुद्ध के समाप्त होते ही मित्र राष्ट्रों ने दुनिया के सभी राष्ट्रों के लिए जनतंत्र तथा राष्ट्रीय आत्मनिर्णय का एक नया यग आरम्भ करने का वचन दिया था। ब्रिटिश सरकार ने तो यह घोषणा कर दी थी कि स्वराज्य स्थापना के जिस सिद्धांतों के लिए हम लड़ रहे हैं उसे भारत सहित सभी उपनिवेशों में लागू कर क्रमशः एक जिम्मेवार सरकार की स्थापना की जायेगी। युद्ध प्रारंभ होने के समय निलक तथा गाँधी जैसे नेताओं ने ब्रिटिश सरकार को युद्ध में हर संभव सहायता न की। परन्तु युद्ध के बाद मित्र राष्ट्रों ने उपनिवेशों में जनतंत्र लागू करने के बजाए इस पर और कठोर नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास किया। रॉलेट एक्ट (1919) पारित होना तथा जालियांवाला बाग हत्याकाण्ड भारत में इसका उदाहरण है। 1029 की आर्थिक संकट के कारण उपनिवेशों का निर्यात घट गया। कषि सीटों के दाम घट गए फिर भी सरकार लगान की दर में कमी हेत तैयार नहीं भी दन सबसे उपनिवेशों में सरकार के प्रति घोर असंतोष राष्ट्रीय आंदोलन हेत जनता को प्रेरित कर रहा था। इसी वातावरण में 1930 ई० में भारत में सविनय अवज्ञा आन्दोलन शुरू हुआ। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय ब्रिटेन ने पुनः भारतीयों से युद्ध में सहयोग की अपेक्षा रखते हुए क्रमशः अगस्त प्रस्ताव तथा क्रिप्स मिशन भेजा। इन दोनों प्रस्ताव से बात नहीं बनी और 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन ने ब्रिटिश शासन की नींव हिला दी।


5. 1945 से 1960 के बीच विश्व स्तर पर विकसित होने वाले आर्थिक संबंधों पर प्रकाश डालें।

उत्तर ⇒ 1945 से 1960 के बीच विश्व स्तर पर विकसित होने वाले अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संबंधों को तीन क्षेत्रों में विभाजित करके देखने का प्रयास किया जा सकता है। प्रथम, 1945 के बाद विश्व में दो भिन्न अर्थव्यवस्था का प्रभाव बढ़ा और दोनों ने विश्वस्तर पर अपने प्रभावों तथा नीतियों को बढ़ाने का प्रयास किया। संपूर्ण विश्व मुख्यतः दो गुटों में विभाजित हो गया। एक साम्यवादी अर्थतंत्र वाले देशों का गुट जिसका नेतृत्व सोवियत रूस कर रहा था, जिसकी विशेषता थी राज्य नियंत्रित अर्थव्यवस्था और दूसरा, पूँजीवादी अर्थतंत्र वाले देशों का गुट जिसकी विशेषता थी बाजार और मुनाफा आधारित आर्थिक व्यवस्था जिसका नेतृत्व संयुक्त राज्य अमेरिका कर रहा था। दूसरा क्षेत्र, पूँजीवादी अर्थतंत्र वाले देशों के बीच बनने वाले अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संबंधों के विकास के अंतर्गत आता है। यह क्षेत्र पूर्णत: संयुक्त राज्य अमेरिका के द्वारा संचालित हो रहा था। इसका प्रमुख उद्देश्य साम्यवादी अर्थतंत्र के विचार के बढ़ते प्रभाव को रोकना था। संयुक्त राज्य अमेरिका ने विश्व के दो क्षेत्रों दक्षिण अमेरिकी और मध्य तथा पश्चिम एशिया के तेल संपदा संपन्न देशों (इराक, इरान, सऊदी अरब, जार्डन, यमन, सीरिया, लेबनान) में जबरन अपनी नीतियों को थोपने का काम किया। वस्तुत: अमेरिका यह जानता था कि बाजार आधारित व्यवस्था के आधुनिक रूप की रीढ़ तेल और गैस नामक ऊर्जा स्रोत है, जिसकी कमी उसके सहयोगी अधिकांश पूँजीवादी अर्थव्यवस्था वाले देशों में थी। एक तीसरा क्षेत्र भी था जहाँ नवीन आर्थिक संबंध विकसित हुआ था, वह क्षेत्र था एशिया और अफ्रीका के नवस्वतंत्र देशों का। इन देशों पर तत्कालीन विश्व के दोनों महत्त्वपूर्ण आर्थिक शक्ति अमेरिका और सोवियत रूस अपना प्रभाव स्थापित करना चाहते थे। चूँकि ये सभी नवस्वतंत्र देश लंबे औपनिवेशिक शासन के दौरान आर्थिक रूप से बिलकुल विपन्न हो गए थे और अपनी स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए उन्हें इन दोनों देशों से आर्थिक और राजनीतिक दोनों प्रकार के सहयोग चाहिए था।


6. 1950 के दशक के बाद अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संबंधों की विवेचना . करें।

उत्तर ⇒ 1950 के दशक के बाद अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संबंधों की व्याख्या विभिन्न दृष्टिकोण के आधार पर की जा सकती है

(i) साम्यवादी विकास- 1945 के बाद के विश्व अर्थव्यवस्था और अंतर्राष्ट्रीय सबधों का क्रमशः साम्यवादी राज्य नियंत्रित अर्थव्यवस्था और बाजार तथा मुनाफा आधारित पूँजीवादी अर्थव्यवस्था ने नियंत्रित किया। दोनों एक-दूसरे के विरोधी और प्रातस्पर्धी थे। साम्यवादी सोवियत रूस ने अपना प्रभाव पूर्वी यूरोपीय राष्ट्रा जस हगरी, रोमानिया, बुल्गारिया, पोलैंड, पूर्वी जर्मनी एवं भारत सहित नवस्वतंत्र एशियाई देशों को भी अपने प्रभाव में लेने का प्रयास किया।

(ii) पूँजीवादी विकास- जिस प्रकार साम्यवादी गुट का नेतृत्व सोवियत संघ ने किया उसी प्रकार पूँजीवादी गुट की अगुआई अमेरिका ने की। अमेरिका साम्यवादी विचारधारा और अर्थतंत्र के प्रसार को रोकने का प्रयास किया। उसन दक्षिण अफ्रीका तथा मध्य एवं पश्चिम एशिया के तेल संपन्न राष्ट्रों में जबरदस्ती अपनी आर्थिक नीतियों को कार्यान्वित किया।

(iii) पश्चिमी यरोप में आर्थिक विकास एवं अंतर्राष्ट्रीय संबंध –1947 60 के मध्य पश्चिमी यूरोपीय देशों ब्रिटेन, फ्रांस, पश्चिमी जर्मनी, स्पेन इत्यादि में अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संबंधों का विकास हआ। तथापि विश्व राजनीति और आथिक क्षेत्र में इन देशों का महत्त्व कमजोर पर्ट गया। इसका प्रमुख कारण था । अवधि में इनके उपनिवेश स्वतंत्र होते चले गए। इससे इन देशों की आर्थिक विपन्नता बढ़ गई। इस संकट से उबरने एवं साम्यवाद के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए इन राष्ट्रों ने समन्वय और सहयोग के एक नवीन युग की शुरुआत की।

(iv) एशिया और अफ्रीका के नवस्वतंत्र राष्ट- 1947 में भारत अग्रजी औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्र हुआ। इसका अनुकरण करते हए अन्य देशों में भी स्वतंत्रता संघर्ष हुए, जिसके परिणामस्वरूप अगले दशक में लगभग सभी एशियाई और अफ्रीकी राष्ट्र साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद के चंगुल से मुक्त हो गए। इन राष्ट्रों पर सोवियत रूस और अमेरिका अपना प्रभाव स्थापित करने में प्रयासशील हो गए।


7. विश्व बाजार की क्या उपयोगिता है ? इससे क्या हानियाँ हुई है ?

उत्तर ⇒ आर्थिक गतिविधियों के कार्यान्वयन में विश्व बाजार की महत्त्वपूर्ण उपयोगिता है। विश्व बाजार व्यापारियों, पूँजीपतियों, किसानों, श्रमिकों, मध्यम वर्ग तथा सामान्य उपभोक्ता वर्ग के हितों की सरक्षा करता है। विश्व बाजार का विकास होने से किसान अपने उत्पाद दूर-दूर के स्थानों और देशों में व्यापारियों के माध्यम से बेचकर अधिक धन प्राप्त करते हैं। कुशल श्रमिकों को विश्वस्तर पर पहचान और आर्थिक लाभ इसी बाजार से मिलता है। वैश्विक बाजार में नएं रोजगार के अवसर उपलब्ध होते हैं।
विश्व बाजार से हानियाँ – विश्व बाजार से जहाँ अनेक लाभ हुए, वहीं इससे अनेक नुकसानदेह परिणाम भी हुए। विश्व बाजार ने यूरोप में संपन्नता ला दी, लेकिन इसके साथ-साथ एशिया और अफ्रीका में साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद का नया युग आरंभ हुआ। औपनिवेशिक शक्तियों ने उपनिवेशों का आर्थिक शोषण बढ़ा दिया। भारत भी उपनिवेशवाद एवं साम्राज्यवाद का शिकार बना। सरकार ने ऐसी नीति बनायी जिससे यहाँ के कुटीर उद्योग नष्ट हो गए।
वैश्विक बाजार का एक दुष्परिणाम यह हुआ कि औपनिवेशिक देशों में रोजगार छिनने और खाद्यान्न के उत्पादन में कमी आने से गरीबी, अकाल और भूखमरी बढ़ गयी। विश्व बाजार के विकास से यूरोपीय राष्ट्रों में साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा भी बढ़ी। इससे उग्र राष्ट्रवादी भावना का विकास हुआ।


8. आधुनिक ग में विश्व अर्थव्यवस्था तथा विश्व बाजार के प्रभावों को स्पष्ट करें।

उत्तर ⇒आधुनिक युग में अर्थव्यवस्था के अंतर्गत विश्व अर्थतंत्र और विश्व बाजार ने आर्थिक के साथ-साथ राजनैतिक जीवन को भी गहराई से प्रभावित किया है। 1919 के बाद विश्वव्यापी अर्थतंत्र में यूरोप के स्थान पर संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत रूस का प्रभाव बढ़ा जो द्वितीय महायुद्ध के बाद विश्व व्यापार और राजनैतिक व्यवस्था में निर्णायक हो गया। 1991 के बाद विश्व बाजार के अंतर्गत एक नवीन आर्थिक प्रवृत्ति भूमंडलीकरण का उत्कर्ष हुआ जो निजीकरण और आर्थिक उदारीकरण से प्रत्यक्षतः जुड़ा था। भूमंडलीकरण ने संपूर्ण विश्व के अर्थतंत्र का केंद्र बिंदु संयुक्त राज्य अमेरिका को बना दिया। उसकी मुद्रा डॉलर पूरे विश्व की मानक मुद्रा बन गई। उसकी कंपनियों को पूरी दुनिया में कार्य करने की अनमति मिल गई अर्थात् भूमंडलीकरण, उदारीकरण और निजीकरण ने अमेरिका केंद्रित अर्थव्यवस्था को जन्म दिया। आज विश्व एकध्रुवीय स्वरूप में बदलकर प्रभावशाली देश संयुक्त राज्य अमेरिका के आर्थिक नीतियों के हिसाब से चल रहा है। आर्थिक क्षेत्र में भूमंडलीकरण ने अमेरिका के नवीन आर्थिक साम्राज्यवाद को जन्म दिया। इसका असर आज संपूर्ण विश्व में महसूस किया जा रहा है।


9. ब्रेटन वुड्स समझौता की व्याख्या करें।

उत्तर ⇒ इस प्रकार आर्थिक स्थिरता और पूर्ण रोजगार की गारंटी के लिए सरकारी हस्तक्षेप को कार्यान्वित करने की प्रक्रिया पर विचार विमर्श करने के लिए जुलाई, 1944 में अमेरिका के न्यू हैम्पशायर में ब्रेटन वुड्स नामक स्थान पर एक सम्मेलन आयोजित किया गया। विचार-विमर्श करने के बाद दो संस्थानों का गठन किया गया। इनमें पहला अंतर्राष्टीय मद्रा कोष (IMF) था और दूसरा अतराष्ट्रीय पुनर्निर्माण एवं विकास बैंक अथवा विश्व बैंक (World Bank)। इन दोनों संस्थानों को ‘ब्रेटन वडस टिवन’ या ‘ब्रेटन वडस की जुड़वाँ संतान’ कहा गया। आई० एम० एफ० ने अंतर्राष्ट्रीय मौद्रिक व्यवस्था और राष्ट्रीय मुद्राओं तथा मौद्रिक व्यवस्थाओं को जोड़ने की व्यवस्था की। इसमें राष्ट्रीय मुद्राओं के विनिमय की दर अमेरिकी मुद्रा ‘डॉलर’ के मूल्य पर निर्धारित की गई। विश्व बैंक ने विकसित देशों को पुनर्निर्माण के लिए कर्ज के रूप में पूँजी उपलब्ध कराने की व्यवस्था की। इसी आधार पर अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था को नियमित करने का प्रयास किया गया। संयुक्त राष्ट्र की सहयोगी संस्थाओं ने पुनर्निर्माण का दायित्व संभाला।


10. कैरीबियाई क्षेत्र में काम करनेवाले गिरमिटिया मजदूरों की जिंदगी पर प्रकाश डालें। अपनी पहचान बनाए ररने के लिए उन लोगों ने क्या किया ?

उत्तर ⇒ भारत से अधिकतर गिरमिटिया मजदूरों को कैरीबियाई द्वीप समूह में स्थित त्रिनिदाद, गुयाना और सूरीनाम ले जाया गया। बहुतेरे जमैका, मॉरीशस एवं फिजी भी ले जाए गए। गिरमिटिया मजदूर सुखी-संपन्न जीवन की उम्मीद में अपना घर द्वार छोड़कर काम करने जाते थे। कार्यस्थल पर पहुँचकर उनका स्वप्न भंग हो जाता था। बागानों अथवा अन्य कार्यस्थलों का जीवन कष्टदायक था। उनके रहने खाने का समुचित प्रबंध नहीं था। उन पर विभिन्न प्रकार की बंदिशें लगाई गई थी। अनुबंध के द्वारा उन्हें एक प्रकार से दासता की जंजीरों में जकड़ दिया गया था। उन्हें न तो किसी प्रकार की स्वतंत्रता थी और न ही कोई कानूनी अधिकार। इस स्थिति में रहते-रहते अप्रवासी भारतीय श्रमिकों ने जीवन की राह ढूँढी जिससे वे सहजता से नए परिवेश में खप सकें। इसके लिए उन लोगों ने अपनी मूल संस्कृति के तत्त्वों तथा नए स्थान के सांस्कृतिक तत्त्वों का सम्मिश्रण कर एक नई संस्कृति का विकास कर लिया। इसके द्वारा उन लोगों ने अपनी व्यक्तिगत और सामूहिक पहचान बनाए रखने का प्रयास किया।


11. अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक विनिमय के तीन प्रवाहों का उल्लेख करें। भारत से संबद्ध तीनों प्रवाहों का उदाहरण दें।

उत्तर ⇒19वीं शताब्दी से नई विश्व अर्थव्यवस्था का विकास हुआ। इसमें आर्थिक विनिमयों की प्रमुख भूमिका थी। अर्थशास्त्रियों के अनुसार आर्थिक विनिमय तीन प्रकार के प्रवाहों पर आधारित है। ये हैं – (i) व्यापार, (ii) श्रम तथा (iii) पूँजी। 19 वीं सदी से अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का तेजी से विकास हुआ। परंतु यह व्यापार मुख्यतः कपड़ा और गेहूँ जैसे खाद्यान्नों तक ही सीमित थे। दूसरा प्रवाह श्रम का भार इसके अंतर्गत रोजगार की तलाश में बड़ी संख्या में लोग एक स्थान या देश से दूसरे स्थान और देश को जाने लगे। इसी प्रकार कम अथवा अधिक अवधि के लिए दूर-दूर के क्षेत्रों में पूँजी निवेश किया गया। विनिमय के ये तीनों प्रवाह के एक-दूसरे से जुड़े हुए थे, यद्यपि कभी-कभी ये संबंध टूटते भी थे। इसके बावजूद अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक विनिमय में इन तीनों प्रवाहों की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। भारत से संबंधित तीनों प्रवाह का उदाहरण इस प्रकार हैं –

(i) भारत से श्रम का प्रवाह – अंतर्राष्ट्रीय बाजार की माँग के अनुरूप उत्पादन बढ़ाने के लिए 19 वीं शताब्दी से श्रम का प्रवाह भारत से दूसरे देशों की ओर हुआ।

(ii) वैश्विक बाजार में भारतीय पूँजीपति- विश्व बाजार के लिए बड़े स्तर पर कृषि उत्पादों के लिए पूँजी की आवश्यकता थी। इससे महाजनी और साहूकारी का व्यवसाय चल निकला।

(iii) भारतीय व्यापार- कृषि के विकास होने से ब्रिटेन में कपास का उत्पादन बढ़ गया। साथ ही सरकार ने भारतीय सूती वस्त्र पर इंगलैंड में भारी आयात शुल्क लगा दिया। इसका असर भारतीय निर्यात पर पड़ा। सूती वस्त्र एवं कपास का निर्यात घट गया दूसरी ओर मैनचेस्टर में बने वस्त्र का आयात भारत में बढ गया।

8. प्रेस-संस्कृति एवं राष्ट्रवाद ( दीर्घ उत्तरीय प्रश्न )


1. वर्तमान समय (स्वतंत्र भारत) में प्रेस की भूमिका का वर्णन करें।

उत्तर ⇒ स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद और वर्तमान समय में भी प्रेस भारतीय राजनीति समाज, आर्थिक और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के विकास में महत्त्वपूर्ण एवं प्रभावशाली भूमिका का निर्वहन कर रहा है। इसका प्रभाव प्रत्येक क्षेत्र में देखा जा सकता है। वह सूचना, मनोरंजन, शिक्षा, खेलकट सिनेमा, रंगमंच, अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं, सरकारी नीतियों, प्रादेशिक क्षेत्रीय और स्थानीय घटनाओं की जानकारी देनेवाला मुख्य माध्यम बन गया है। समाचारपत्रों ने साहित्यिक एवं सांस्कृतिक अभिरुचि जगाने में भी योगदान किया है। इसने सामाजिक सुधार कार्यक्रमों को भी प्रोत्साहित किया है। वर्तमान संदर्भ में प्रेस रचनात्मक भूमिका का भी निर्वहन कर रहा है। समाज के समक्ष आधुनिक वैज्ञानिक और दार्शनिक उपलब्धियों को रखकर यह नई चेतना और विश्वबंधुत्व की भावना जागृत कर रही है। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करने में मानवाधिकारों की सुरक्षा करने में तथा प्रशासनिक भ्रष्टाचारों को उजागर करने में प्रेस की प्रभावशाली भूमिका है। आज प्रेस स्वतंत्र है। यह सरकार पर नियंत्रण रखने का प्रभावशाली अस्त्र बन गया है।


2. आज के परिवर्तनकारी यग स्वातंत्र्योत्तर भारत में प्रेस की भूमिका की व्याख्या करें।

उत्तर ⇒ वैश्विक स्तर पर मुद्रण अपने आदिकाल से भारत में स्वाधीनता आंदोलन तक भिन्न-भिन्न परिस्थितियों से गुजरते हुए आज अपनी उपादेयता के कारण ऐसी स्थिति में पहुँच गया है जिससे ज्ञान जगत की हर गतिविधियाँ प्रभावित हो रही हैं। आज पत्रकारिता साहित्य, मनोरंजन, ज्ञान-विज्ञान, प्रशासन, राजनीति आदि को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित कर रहा है।
स्वातंत्र्योत्तर भारत में पत्र-पत्रिकाओं का उद्देश्य भले ही व्यावसायिक रहा हो, किंतु इसने साहित्यिक एवं सांस्कृतिक अभिरुचि जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया है। पत्र-पत्रिकाओं ने दिन-प्रतिदिन घटनेवाली घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में नई और सहज शब्दावली का प्रयोग करते हुए भाषाशास्त्र के विकास में भी महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। प्रेस ने समाज में नवचेतना पैदाकर सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक एवं दैनिक जीवन में क्रांति का सूत्रपात किया। प्रेस ने लदेव सामाजिक बुराइयों जैसे दहेज प्रथा, विधवा विवाह, वालिका विवाह, वालिकावधु, बाल हत्या, शिशु विवाह जैसे मुद्दों को उठाकर समाज की कुप्रथाओं को दूर करने में मदद की तथा व्याप्त अंधविश्वास को दूर करने का प्रयास किया
आज प्रेस समाज में रचनात्मकता का प्रतीक भी बनता जा रहा है। यह समाज की नित्यप्रति की उपलब्धियों, वैज्ञानिक अनुसंधानों, वैज्ञानिक उपकरणों एवं साधनों से परिचित कराता है। आज के आधुनिक दौर में प्रेस साहित्य और समाज की समद्ध चेतना की घरोहर है। प्रेस लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करने हेतु सजग प्रहरी के रूप में हमारे सामने खड़ा है।


3. भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में प्रेस की भूमिका एवं प्रभाव की विवेचना कीजिए। अथवा, राष्ट्रीय आंदोलन को भारतीय प्रेस ने कैसे प्रभावित किया ?

उत्तर ⇒ भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के उद्भव एवं विकास में प्रेस की प्रभावशाली भूमिका रही। इसने राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं अन्य मुद्दों को उठाकर, उन्हें जनता के समक्ष लाकर उनमें राष्ट्रवादी भावना का विकास किया तथा लोगों में जागृति ला दी।
प्रेस में प्रकाशित लेखों और समाचार-पत्रों से भारतीय औपनिवेशिक शासन के वास्तविक स्वरूप से परिचित हुए। वे अंग्रेजों की प्रजातीय विभेद और शोषण की नीतियों से परिचित हुए। समाचार-पत्रों ने उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद के घिनौने मुखौटा का पर्दाफाश कर दिया तथा इनके विरुद्ध लोकमत को संगठित किया। जनता को राजनीतिक शिक्षा देने का दायित्व समाचार-पत्रों ने अपने ऊपर ले लिया। समाचार-पत्रों ने देश में चलने वाले विभिन्न आंदोलनों एवं राजनीतिक कार्यक्रमों से जनता को परिचित कराया। कांग्रेस के कार्यक्रम हों या उसके अधिवेशन, बंग-भंग आदोलन अथवा असहयोग आंदोलन, नमक सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन समाचार पत्रों द्वारा लोगों को इनमें भाग लेने की प्रेरणा मिलती थी। कांग्रेस की भिक्षाटन की नीति का प्रेस ने विरोध किया तथा स्वदेशी और बहिष्कार की भावना को बढ़ावा देकर राष्ट्रवाद का प्रसार किया। इस प्रकार समाचार-पत्रों ने राष्ट्रीय आंदोलन को नई दिशा दी। तिलक, ऐनीबेसेंट, महात्मा गाँधी और अन्य प्रभावशाली नेता प्रेस के माध्यम से ही जनता तक पहुँच सके। समाचार-पत्रों के माध्यम से आम जनता भी प्रेस और राष्ट्रवाद से जुड़ गयी।


4. मद्रण क्रांति ने आधुनिक विश्व को कैसे प्रभावित किया।

उत्तर ⇒ मुद्रण क्रांति ने आम लोगों को जिन्दगी ही बदल दी मुद्रण क्रांति के करण छापाखानों की संख्या में भारी वृद्धि हुई। जिसके परिणामस्वरूप पर निर्माण में अप्रत्याशित वृद्धि हुई।
मुद्रण क्रांति के फलस्वरूप किताबें समाज के हर तबकों के बीच पहुँच पायी। किताबों की पहुंच आसान होने से पढ़ने की एक नई संस्कृति विकसित हुई। एक नया पाठक वर्ग पैदा हुआ तथा पढ़ने के कारण उनके अंदर तार्किक क्षमता का विकास हुआ। पठन-पाठन से विचारों का व्यापक प्रचार-प्रसार हुआ तथा तर्कवाद और मानवतावाद का द्वार खुला। धर्म सुधारक मार्टिन लूथर ने रोमन कैथोलिक चर्च की कुरीतियों की आलोचना करते हुए अपनी पिच्चानवें स्थापनाएँ लिखी। फलस्वरूप चर्च में विभाजन हुआ और प्रोटेस्टेंटवाद की स्थापना हुई। इस तरह छपाई से नए बौद्धिक माहौल का निर्माण हुआ एवं धर्म सुधार आंदोलन के नए विचारों का फैलाव बड़ी तेजी से आम लोगों तक हुआ। वैज्ञानिक एवं दार्शनिक बातें भी आम जनता की पहुँच से बाहर नहीं रही। न्यूटन, टामसपेन, वाल्तेयर और रूसो की पुस्तकें भारी मात्रा में छपने और पढ़ी जाने लगी।
मुद्रण क्रांति के फलस्वरूप प्रगति और ज्ञानोदय का प्रकाश यूरोप में फैल चुका था। लोगों में निरंकुश सत्ता से लड़ने हेतु नैतिक साहस का संचार होने लगा था। फलस्वरूप मुद्रण संस्कृति ने फ्रांसीसी क्रांति के लिए अनुकूल परिस्थितियों का निर्माण किया।


5. 19वीं शताब्दी में भारत में प्रेस के विकास को रेखांकित करें।

उत्तर ⇒ 19वीं शताब्दी में प्रेस ज्वलंत राजनीतिक एवं सामाजिक प्रश्नों को उठानेवाला एक सशक्त माध्यम बन गया ।
आधुनिक भारतीय प्रेस का आरंभ 1766 में विलियम बोल्टस द्वारा प्रकाशित समाचार-पत्र से माना जाता है। 1780 में जेम्स आगस्टस हिक्की ने अंग्रेजी भाषा में ‘बंगाल गजट’ नामक पत्रिका का प्रकाशन आरंभ किया। हिक्की के प्रेस को कंपनी ने जब्त कर लिया। नवम्बर, 1780 में प्रकाशित ‘इंडिया गजट’ दूसरा भारतीय पत्र था।
भारतीयों द्वारा प्रकाशित प्रथम समाचार-पत्र 1816 में गंगाधर भट्टाचार्य का साप्ताहिक ‘बंगाल गजट’ था।
1821 में बंगाली में संवाद कौमुदी तथा 1822 में फारसी में प्रकाशित मिरातुल अखबार के साथ प्रगतिशील राष्ट्रीय प्रवृत्ति के समाचार-पत्रों का प्रकाशन आरंभ हुआ। इन समाचार पत्रों के संस्थापक राममोहन राय थे जो अंग्रेजी में ब्राझिनिकल मैंगजीन भी निकाला। 1822 में बंबई से गुजराती भाषा में दैनिक बंबई समाचार निकलने लगे। द्वारकानाथ टैगोर, प्रसन्न कुमार टैगोर तथा राममोहन राय के प्रयास से 1830 में बंगदत्त की स्थापना हुई। 1831 में जामे जमशेद, 1851 में गोफ्तार तथा अखबारें सौदागर का प्रकाशन आरंभ हुआ। ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी भारतीय समाचार-पत्रों द्वारा सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक चेतना के विकास को शंका की दृष्टि से देखते थे। इसलिए 19वीं शताब्दी में भारतीय प्रेस को प्रतिबंधित करने का कुत्सित प्रयास किया।


6. मुद्रण यंत्र की विकास यात्रा को रेखांकित करें। यह आधुनिक स्वरूप में कैसे पहुँचा?

उत्तर ⇒ मुद्रण कला के आविष्कार और विकास का श्रेय चीन को जाता है। 1041 ई० में एक चीनी व्यक्ति पि-शेंग ने मिट्टी के मुद्रा बनाए। इन अक्षर मुद्रों को साजन कर छाप लिया जा सकता था। इस पद्धति ने ब्लॉक प्रिंटिंग का स्थान ले लिया। धातु के मुवेबल टाइप द्वारा प्रथम पुस्तक 13वीं सदी के पूर्वार्द्ध में मध्य
कोरिया में छापी गई। यद्यपि मवेबल टाइपों द्वारा मुद्रण कला का आविष्कार ता पूरख में ही हुआ, परंतु इस कला का विकास यूरोप में अधिक हुआ। 13वीं सदी के आतम में रोमन मिशनरी एवं मार्कोपोलो द्वारा ब्लॉक प्रिंटिंग के नमनं यरोप पहुँचे। रोमन लिपि में अक्षरों की संख्या कम होने के कारण लकड़ी तथा धातु के बने मूर्वबल टाइम का प्रसार तेजी से हुआ। इसी काल में शिक्षा के प्रसार, व्यापार एवं मिशनारया का बढ़ती गतिविधियों से सस्ती मुद्रित सामग्रियों की माँग तेजी से बढ़ी। इस मांग की पति के लिए तेज और सस्ती मद्रण तकनीकी की आवश्यकता थी, जिसे (14304 दशक में) स्ट्रेसवर्ग के योहान गुटेन्वर्ग ने पूरा कर दिखाया।
18वीं सदी के अंतिम चरण तक धातु के बने छापाखानं काम करने लगे। 19वीं-20वीं सदी में छापाखाना में और अधिक तकनीकी सुधार किए गए। 19वा शताब्दी में न्यूयार्क निवासी एम० ए० हो ने शक्ति-चालित बेलनाकार प्रेस का निर्माण किया। इसके द्वारा प्रतिघंटा आठ हजार ताव छापे जाने लगे। इससे मुद्रण में तेजी आई। 20वीं सदी के आरंभ से बिजली संचालित प्रेस व्यवहार में आया। इसने छपाई को और गति प्रदान की। प्रेस में अन्य तकनीकी बदलाव भी लाए गए।


7. राष्ट्रवादी आंदोलन में उर्दू प्रेस या उर्दू पत्रकारिता की भूमिका की चर्चा करें।

उत्तर ⇒ भारत में 1910-1920 के बीच उर्दू पत्रकारिता का विकास हुआ। मौलाना आजाद के संपादन में 1912 में अल हिलाल तथा 1913 में अल बिलाग का कलकत्ता से प्रकाशन प्रारंभ हुआ। मो० अली ने अंग्रेजी में कामरेड तथा उर्दू में हमदर्द का प्रकाशन किया।
जहाँ तक उर्दू प्रेस का राष्ट्रवादी आंदोलन से संबंध की बात है, 1857 की क्रांति के दौरान एवं इसके पश्चात् यह अंग्रेजी राज की घोर आलोचक थी। लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में सर सैयद अहमद खाँ के बढ़ते प्रभाव ने इसे कांग्रेस समर्थित राष्ट्रीय आंदोलन एवं अंग्रेजी राज से मुसलमानों के संबंधों की नई व्यवस्था करने के लिए प्रेरित किया। हालाँकि उर्दू प्रेस ने सामान्य रूप से सर सैयद अहमद के विचारों से सहमति प्रकट नहीं की। मौलाना आजाद, मोहम्मद अली और अब्दुल बारी साहेब आदि के संपादन में प्रकाशित होने वाले पत्र पूर्णतः राष्ट्रवादी भावनाओं से ओत-प्रोत थे। इनमें से कई पत्रों के ग्राहक सर सैयद के अलीगढ़ जर्नल से कहीं अधिक थे।


8. फ्रांसीसी क्रांति की पृष्ठभूमि तैयार करने में मुद्रण की भूमिका की विवेचना करें।

उत्तर ⇒ फ्रांस की क्रांति में बौद्धिक कारणों का भी काफी महत्त्वपूर्ण योगदान था। फ्रांस के लेखकों और दार्शनिकों ने अपने लेखों और पुस्तकों द्वारा लोगों में नई चेतना जगाकर क्रांति की पृष्ठभूमि तैयार कर दी। मुद्रण ने निम्नलिखित प्रकारों से फ्रांसीसी क्रांति की पृष्ठभूमि तैयार करने में अपनी भूमिका निभाई।

(i) ज्ञानोदय के दार्शनिकों के विचारों का प्रसार—फ्रांसीसी दार्शनिकों ने रूढ़िगत सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक व्यवस्था की कटु आलोचना की। इन लोगों ने इस बात पर बल दिया कि अंधविश्वास और निरंकुशवाद के स्थान पर तर्क और विवेक पर आधारित व्यवस्था की स्थापना हो। चर्च और राज्य की निरंकुश सत्ता पर प्रहार किया गया। वाल्टेयर और रूसो ऐसे महान दार्शनिक थे जिनके लेखन का जनमानस पर गहरा प्रभाव पड़ा।

(ii) वाद-विवाद की संस्कृति— पुस्तकों और लेखों ने वाद-विवाद की संस्कृति को जन्म दिया। अब लोग पुरानी मान्यताओं की समीक्षा कर उन पर अपने विचार प्रकट करने लगे। इससे नई सोच उभरी। राजशाही, चर्च और सामाजिक व्यवस्था में बदलाव की आवश्यकता महसूस की जाने लगी। फलतः क्रांतिकारी विचारधारा का उदय हुआ।

(iii) राजशाही के विरुद्ध असंतोष- 1789 की क्रांति के पूर्व फ्रांस में बड़ी संख्या में ऐसा साहित्य प्रकाशित हो चुका था जिसमें तानाशाही, राजव्यवस्था और इसके नैतिक पतन की कट आलोचना की गयी थी। अनेक व्यंग्यात्मक चित्रा वारा यह दिखाया गया कि किस प्रकार आम जनता का जीवन कष्टों और अभावों से ग्रस्त था, जबकि राजा और उसके दरबारी विलासिता में लीन हैं। इससे जनता में राजतंत्र के विरुद्ध असंतोष बढ़ गया।


9. औपनिवेशिक सरकार ने भारतीय प्रेस को प्रतिबंधित करने के लिए क्या किया ?

उत्तर ⇒ औपनिवेशिक काल में प्रकाशन के विकास के साथ-साथ इसे नियंत्रित करने का भी प्रयास किया। ऐसा करने के पीछे दो कारण थे—पहला, सरकार वैसी कोई पत्र-पत्रिका अथवा समाचार पत्र मुक्त रूप से प्रकाशित नहीं होने देना चाहती थी जिसमें सरकारी व्यवस्था और नीतियों की आलोचना हो तथा दूसरा, जब अंगरेजी राज की स्थापना हुई उसी समय से भारतीय राष्ट्रवाद का विकास भी होने लगा। राष्ट्रवादी संदेश के प्रसार को रोकने के लिए प्रकाशन पर नियंत्रण लगाना सरकार के लिए आवश्यक था। भारतीय प्रेस को प्रतिबंधित करने के लिए औपनिवेशिक सरकार के द्वारा पारित विभिन्न अधिनियम उल्लेखनीय हैं –

(i) 1799 का अधिनियम- गवर्नर जनरल वेलेस्ली ने 1799 में एक अधिनियम पारित किया। इसके अनुसार समाचार-पत्रों पर सेंशरशिप लगा दिया गया।

(ii) 1823 का लाइसेंस अधिनियम- इस अधिनियम द्वारा प्रेस स्थापित करने से पहले सरकारी अनुमति लेना आवश्यक बना दिया गया।

(iii) 1867 का पंजीकरण अधिनियम – इस अधिनियम द्वारा यह आवश्यक बना दिया गया कि प्रत्येक पुस्तक, समाचार पत्र एवं पत्र-पत्रिका पर मुद्रक, प्रकाशक तथा मुद्रण के स्थान का नाम अनिवार्य रूप से दिया जाए। साथ ही प्रकाशित पुस्तक की एक प्रति सरकार के पास जमा करना आवश्यक बना दिया गया।

(iv) वाक्यूलर प्रेस एक्ट (1878) – लार्ड लिटन के शासनकाल में पारित प्रेस को प्रतिबंधित करने वाला सबसे विवादास्पद अधिनियम यही था। इसका उद्देश्य देशी भाषा के समाचार पत्रों पर कठोर अंकुश लगाना था। अधिनियम के अनुसार भारतीय समाचार पत्र ऐसा कोई समाचार प्रकाशित नहीं कर सकती थी जो अंगरेजी सरकार के प्रति दुर्भावना प्रकट करता हो। भारतीय राष्ट्रवादियों ने इस अधिनियम का बड़ा विरोध किया।


10. भारत में सामाजिक-धार्मिक सुधारों को पुस्तकों एवं पत्रिकाओं ने – किस प्रकार बढ़ावा दिया?

उत्तर ⇒ 18वीं तथा 19वीं शताब्दी में प्रेस ज्वलंत राजनीतिक, सामाजिक एवं धार्मिक प्रश्नों को उठानेवाला एक सशक्त माध्यम बन गया। 19वीं सदी में बंगाल में “भारतीय पुनर्जागरण” हुआ। इससे सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन का मार्ग प्रशस्त हुआ। परंपरावादी और नई विचारधारा रखनेवालों ने अपने-अपने विचारों का प्रचार करने के लिए पुस्तकों और पत्र-पत्रिकाओं का सहारा लिया। राजा राममोहन राय ने अपने विचारों को प्रचारित करने के लिए बंगाली भाषा में संवाद कौमुदी पत्रिका का प्रकाशन 1821 में किया। उनके विचारों का खंडन करने के लिए रूढ़िवादियों ने समाचार चंद्रिका नामक पत्रिका प्रकाशित की। राममोहन राय ने 1822 में फारसी भाषा में मिरातुल अखबार तथा अंग्रेजी भाषा में ब्राह्मनिकल मैगजीन भी प्रकाशित किया। उनके ये अखबार सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन के प्रभावशाली अस्त्र बन गए। भारतीय समाचार-पत्रों ने सामाजिक-धार्मिक समस्याओं से जुड़े ज्वलंत प्रश्नों को उठाया। समाचार-पत्रों ने न्यायिक निर्णयों में किए गए पक्षपातों, धार्मिक मामले में सरकारी हस्तक्षेप और औपनिवेशिक प्रजातीय विभेद की नीति की आलोचना कर राष्ट्रीय चेतना जगाने का प्रयास किया।

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