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भारत : संसाधन एवं उपयोग 

1.खनिजों के संरक्षण एवं पबंधन से आप क्या समझत है ?

उत्तर ⇒ ससाधना का विवेकपूर्ण उपयोग ही संरक्षण कहलाता है। क्योंकि किसी भी संसाधन को बनने में लाखों वर्षों का समय लगता हैइसके विपरीत संसाधन प्रबंधन एक जटिल प्रक्रिया है। इस उत्पादन से लेकर उपभोग तक शामिल किया जाता है।


2.खनिजों के आर्थिक महत्त्व का वर्णन करें।

उत्तर ⇒ खनिज एक प्राकतिक रूप से विद्यमान समरूप तत्त्व है, जिसका निश्चित आंतरिक संरचना है। हमारे जीवन में खनिजों का विशेष आर्थिक महत्व औद्योगिक उत्पादन के लिए खनिज एक आधारभुत जरूरत होती हैं। इसके अभाव में न तो किसी उद्योग एवं न किसी राष्ट्र के विकास की कल्पना की जा सकता है।


3. अधात्विक खनिज किसे कहते हैं ? उदाहरण देकर समझावे ।

उत्तर ⇒ वैसे खनिज जिनमें धातु अंश का अभाव होता है और भंगुर प्रकृति क होते हैं, अधात्विक खनिज कहलाते हैं। इन पर चोट मारने पर ये टूट जाते ह। डोलामाइट, हीरा, अभ्रक, चूना पत्थर इत्यादि इसी के उदाहरण हैं। इनमें लाइमस्टोन का सर्वाधिक औद्योगिक महत्त्व है।


4.धात्विक खनिज के दो प्रमुख पहचान क्या है ?

उत्तर ⇒ धात्विक खनिज के दो पहचान निम्नलिखित हैं-
(i) इनको गलाने पर धातु की प्राप्ति होती है।
(ii) इसे पीटकर तार बनाये जा सकते हैं।


5. खनिजों की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।

उत्तर ⇒ खनिज सभ्यता संस्कृति के आधारस्तंभ हैं। इनके बगैर उद्योगों का विकास नहीं किया जा सकता है। चट्टानों के निर्माण में इनकी भूमिका होती है। 2000 से भी अधिक खनिजों की पहचान हो चुकी है पर इनमें 30 खनिज का आर्थिक दृष्टि से विशेष महत्त्व है। धातु की उपलब्धता के आधार पर खनिज दो प्रकार के होते हैं।


6.मैंगनीज के उपयोग पर प्रकाश डालिए।

उत्तर ⇒ मैंगनीज एक अत्यंत उपयोगी खनिज पदार्थ है। इस्पात निर्माण सहित अनेक मिश्रधातु निर्माण में इसका उपयोग किया जाता है। इसकेअतिरिक्त सूखा-सेल बनाने में, फोटोग्राफी में, चमडा एवं माचिस उद्योग सहित रंग-रोगन को तैयार करने में यह उपयोगी है।


7. मोनाजाइट भारत में कहाँ-कहाँ उपलब्ध है ?

उत्तर ⇒ मोनाजाइट केरल राज्य में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। इसके अतिरिक्त तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, उड़ीसां आदि राज्यों के तटीय भागों में इस खनिज का उत्खनन हो रहा है।


8. जलोढ़ मृदा से क्या समझते हैं ? इस मृदा में कौन-कौन सी फसलें उगाई जा सकती है ?

उत्तर ⇒ वैसी मिट्टी जिसका निर्माण नदियों द्वारा लाए गये तलछट के निक्षेप से होता है, जलोढ़ मृदा कहलाती है। इस मिट्टी में पोटाश एवं चूने की अधिकता होती है तथा नाइट्रोजन एवं ह्यूमस की कमी होती है। यह मिट्टी धान, गेहूँ, गन्ना एवं दलहन के लिए काफी उपयोगी है। इसके साथ ही इस मिट्टी में आलू एवं विभिन्न प्रकार का सब्जियाँ भी काफी मात्रा में उत्पादित किये जाते हैं।


9. भू-क्षरण किसे कहते है ?

उत्तर ⇒ मृदा का अपने स्थान से विविध क्रियाओं द्वारा स्थानान्तरित होना क्षरण कहलाता है। यह भू-क्षरण कई प्राकृतिक कारकों यथा-गतिशील जल, 147, हिमानी तथा सामद्रिक लहरों द्वारा नियंत्रित तथा प्रभावित होती है।


10. जलोढ़ मृदा के विस्तार वाले राज्यों का नाम बतावें। इस मृदा में कौन-कौन सी फसलें लगायी जा सकती हैं ?

उत्तर ⇒ जलोढ़- मृदा के विस्तार वाले राज्य हैं उत्तरप्रदेश, बिहार, पंजाब, गुजरात, राजस्थान, हरियाणा, पश्चिम बंगाल तथा असम। इस मृदा में गन्ना, चावल, मक्का, दलहन जैसी फसलें उगाई जा सकती हैं।


11. मृदा-निर्माण के मुख्य घटक कौन-कौन से हैं ?

उत्तर ⇒ मृदा-निर्माण के पाँच मुख्य घटक हैं –
(i) स्थानीय जलवायु,
(ii) पूर्ववर्ती चट्टानें एवं खनिज कण,
(iii) वनस्पति एवं जीव,
(iv) भू-आकृतियाँ एवं ऊँचाई तथा
(v) मृदा निर्माण में लगा समय।


12. खादर और बांगर मिट्टी में अन्तर स्पष्ट करें।

उत्तर ⇒

 खादर मिट्टी –        बांगर मिट्टी –
(i) नवीन एवं उपजाऊ मिट्टी को खादर कहा जाता है।   (i) पुरानी जलोढ़ मिट्टी को बांगर कहा जाता है।
(ii) खादर मिट्टी में बाढ़ का प्रभाव होता है(ii) बांगर मिट्टी में बाढ़ का प्रभाव नहीं होता है।
(iii) उत्तरी बिहार एवं गंगा का मैदान इसका उदाहरण है(iii) महाराष्ट्र एवं पंजाब की भूमि इसका उदाहरण है।

13. मृदा संरक्षण के कोई प्रभावी उपाय बताएँ।

उत्तर ⇒ मृदा संरक्षण के प्रभावी उपाय निम्नलिखित हैं –

(i) फसल-चक्रण पद्धति अपनाकर मृदा के पोषनीय स्तर को बरकरार रखा जा सकता है।
(ii) रासायनिक उर्वरक की जगह जैविक व कंपोस्ट खाद का उपयोग करके मृदा संरक्षण किया जा सकता है।


14. फसल चक्रण मृदा संरक्षण में किस प्रकार सहायक है ?

उत्तर ⇒ फसल चक्रण द्वारा मृदा के पोषण स्तर को बरकरार रखा जा सकता है। गेहूँ, चावल, मक्का, आलू आदि के लगातार उगाने से मृदा के पोषक तत्त्व में कमी हो जाती है। इसे तिलहन एवं दलहन की खेती से पुनः प्राप्त किया जा सकता है। इससे नाइट्रोजन का स्थिरीकरण होता है इसलिए फसल चक्रण से मृदा संरक्षण में मदद मिलती है।


15. समोच्च कृषि से आप क्या समझते हैं  ?

उत्तर ⇒ जब पर्वतीय क्षेत्रों या ढलानों पर वृत्ताकार रूप में खेत की जुताई कर कृषि कार्य किया जाता है तो उसकी आकृति समोच्च रेखा की तरह दिखाई पड़ती है। इस प्रकार से खेतों के पोषणीय तत्त्व जलों के साथ नहीं बहते हैं। मृदा की उर्वरता बनी रहती है।


16. चिपको आंदोलन का वर्णन करें।

उत्तर ⇒ सुन्दर लाल बहुगुणा के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश के टेहरी-गढ़वाल पर्वतीय जिलों में अनपढ़ जनजातियों द्वारा सन् 1972 ई० में यह आन्दोलन चलाया गया था। इस आन्दोलन में स्थानीय लोग हरे-भरे पेड़-पौधों को कटने से बचाने के लिए अपने आगोश में घेर कर इसकी रक्षा करते थे।


17. वन का पर्यावरणीय महत्त्व का वर्णन कीजिए।

उत्तर ⇒ वन प्रकृति का अनुपम उपहार है, जिसके आँचल में मानव आदिकाल से पोषित होता रहा है। वन जलवायु का सच्चा मानक है। एक तरफ वन की भूमि जल का अवशोषण कर बाढ के खतरे को रोकती है तो दूसरी तरफ अच्छा वषा भी कराती है। यह वन्य प्राणियों को भी आश्रय प्रदान करती है तथा वन्य प्राणियों के साथ ही मानव को भी अनेक आवश्यक जीवनदायिनी वस्तएँ देती हैं। जीव मंडल म जावों और जलवाय को संतलित स्थिति प्रदान कर संतलित पारिस्थितिका तत्र क निर्माण में सर्वाधिक योगदान देता है।


18. पेट्रोलियम से किन-किन वस्तुओं का निर्माण होता है ?

उत्तर ⇒ पेट्रोलियम एक शक्ति संसाधन है जिसका हमारे जीवन में बहुत अधिक महत्त्व है। इसका मुख्य उपयोग यातायात के साधनों में ईंधन के रूप में है। इसके वा औद्योगिक मशीनों में स्नेहक के रूप में होता है। पेट्रोलियम का उपयोग वस्त्र, उर्वरक, रसायन उद्योग, कीटनाशक दवा एवं कृत्रिम रबर बनाने में भी किया जाता है।


19. जैव और अजैव संसाधनों से आप क्या समझते हैं ?

उत्तर ⇒ उत्पत्ति के आधार पर संसाधनों को दो वर्गों में बाँटा गया है-
     (i) जैव संसाधन           (ii) अजैव संसाधन।

(i) जैव संसाधन – जीवमंडल में विद्यमान जीव जैसे पक्षी, मछलियाँ, पेड़-पौध और स्वयं मनुष्य जैव संसाधन के अंतर्गत आते हैं। इनमें अनुकूल प्राकृतिक परिस्थितियों में संतान उत्पन्न करने की क्षमता होती है। ये सजीव होते हैं। इनमें वृद्धि की प्रक्रिया चलती रहती है।

(ii) अजैव संसाधन – वातावरण में पाये जाने वाले सभी निर्जीव पदार्थ जैसे खनिज, चट्टानें, मिट्टी, नदियाँ, पर्वत इत्यादि अजैविक संसाधन कहलाते हैं। इनमें वद्धि नहीं होती है, इनके उपयोग से इनका भंडार समाप्त होता है।


20. संसाधन-निर्माण में तकनीक की क्या भूमिका है ? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर ⇒ आज के वैज्ञानिक युग में तकनीक का महत्त्वपूर्ण स्थान है। तकनीक के बल पर प्राकृतिक संसाधनों की कमी होने पर भी कोई देश विकसित देशों की पंक्ति में खड़ा हो सकता है। उदाहरण के लिए जापान को लिया जा सकता है। प्राकृतिक संसाधन की कमी के बावजूद इस देश ने अपनी तकनीक एवं विवेक के आधार पर स्वयं को विकसित देशों की श्रेणी में ला खड़ा किया है। इससे संसाधन-निर्माण में तकनीक की भूमिका स्पष्ट हो जाती है।


21. ऊर्जा संसाधन के संरक्षण के उपाय बताएँ।

उत्तर ⇒ ऊर्जा संसाधन के संरक्षण के लिए निम्नांकित उपाय किए जा सकते हैं –

(i) ऊर्जा के गैर-परंपरागत स्रोतों को अधिक उपयोग में लाना चाहिए जिससे परंपरागत ऊर्जा के स्रोत का भंडार बचाया जा सकता है।

(ii) अनावश्यक उपयोग कम करना चाहिए।

(iii) सार्वजनिक परिवहन का ही उपयोग किया जाना चाहिए।

(iv) खान से कोयला और पेट्रोलियम निकालने के लिए तकनीक को विकसित करना चाहिए जिससे कि खनन के समय बड़ी मात्रा में ईंधन नष्ट न होने पाये।

(v) जहाँ तक संभव हो बिजली बचाने का प्रयास करें। ऊर्जा की बचत ही संरक्षण है।


22. भारत में विभिन्न प्रकार के वन क्यों पाए जाते है ? उनके नाम लिखें। किसी एक का वर्णन करें।

उत्तर ⇒ भारत में धरातलीय स्वरूप में अंतर, मिट्टी और जलवायु की विविधता के कारण विविध प्रकार के वन उगते हैं।
भारतीय वनों को निम्न प्रकार में बाँटते हैं –

(i) उष्णकटिबंधीय चिरहरित वन या सदाबहार वन
(ii) उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वन या पतझड वन
(iii) शीतोष्ण पर्वतीय वन या कोणधारी वन
(iv) डेल्टाई वन या ज्वारीय वन
(v) मरुस्थलीय वन या कँटीले वन

चिरहरित वन या सदाबहार वन – चिरहरित वन सघन होते हैं। इनकी लकड़ियाँ कड़ी होती हैं। अधिक तापमान, अधिक वर्षा और दलदली भागों में उगने के कारण इन्हें काटना और काम में लाना कठिन होता है। एबौनी और महोगनी इन वनों के महत्त्वपूर्ण वृक्ष है।


23. वन्य जीवों के ह्रास के चार प्रमुख कारकों का उल्लेख कीजिए।

उत्तर ⇒ वन्य जीवों के ह्रास के निम्न चार प्रमुख कारक हैं-

(i) वन्य प्रदेश के कटने के कारण वन्य जीवों का आवास कम होता जाना।
(ii) वन्य जीवों का लगातार शिकार किया जाना।
(iii) कषि में अनेक रसायनों के प्रयोग ने भी कई वन्य प्राणियों के अस्तित्व पर खतरा उत्पन्न कर दिया है।
(iv) प्रदषण के कारण भी वन एवं वन्य प्राणियों का ह्रास हआ है।


24.निम्नांकित से संबद्ध एक-एक खनिज का नाम लिखें।

(i) बाबाबूदन पहाड़ी (ii) बगरू पहाड़ी (iii) कोलार
(iv) दाली-राजहरा (v) घाटशिला (vi) वैलाडिला
(vii) कोडरमा (viii) रियासी क्षेत्र

उत्तर ⇒ (i) बाबाबूदन पहाड़ी – लौह-अयस्क
(ii) बगरू पहाड़ी – बॉक्साइट
(iii) कोलार – सोना
(iv) ढाली-राजहरा — लौह-अयस्क
(v) घाटशिला – ताँबा
(vi) वैलाडिला – लौह-अयस्क
(vii) कोडरमा – अभ्रक
(viii) रियासी क्षेत्र – ताँबा


25. लौह-अयस्कों के नाम लिखें।

उत्तर ⇒ लौह अयस्क मुख्य रूप से चार रूपों में पाये जाते हैं जो निम्न है-
(i) हेमाटाइट, (ii) मैग्नेटाइट, (iii) लिमोनाइट एवं (iv) अंडेराइट


26. अभ्रक का उपयोग क्या है ?

उत्तर ⇒ अभ्रक विद्युतरोधी खनिज है जिस कारण इलेक्ट्रॉनिक्स उपकरण नर्माण में इसका सर्वाधिक उपयोग होता है। इसके अतिरिक्त इसका अबीर-गुलाल बनाने तथा आयुर्वेदिक दवा निर्माण में भी होता है।


27. लोहे के प्रमुख उत्पादक राज्यों के नाम लिखिए।

उत्तर ⇒ लौह उत्पादक प्रमुख राज्य हैं — कर्नाटक, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, गोग झारखंड आदि।


28. कोयला के चार प्रकारों का नाम लिखिए।

उत्तर ⇒ कोयला के चार प्रमुख प्रकार हैं-
(i) एंथ्रासाइट, (ii) बिटुमिनस, (iii) लिग्नाइट एवं (iv) पीट।


29. गोंडवाना क्षेत्र के कोयले मुख्यतः किन क्षेत्रों में पाया जाता है।

उत्तर ⇒ इस समूह में 96% कोयले का भंडार शामिल है जो हमारे देश में मिला है। इसका निर्माण लगभग 20 करोड़ वर्ष पूर्व हुआ था। यह मुख्यतः चार नदी-घाटियों में पाये जाते हैं—
(i) दामोदर घाटी, (ii) सोन घाटी, (iii) महानदी घाटी एवं (iv) वर्धा-गोदावरी घाटी।


30. लौह-अलौह खनिज में अंतर बताएँ।

उत्तर ⇒

(i) लौह खनिज — इसमें लौह का अंश पाया जाता है। जैसे लौर अयस्क, मैंगनीज, क्रोमाईट, पाइराइट, टंगस्टन, निकिल और कोबाल्ट लौह खनिज के अंतर्गत आते हैं। इनका उपयोग विभिन्न प्रकार के इस्पात बनाने में किया जाता है।

(ii) अलौह खनिज—इसमें लौह अंश नहीं पाया जाता है जैसे सोना, चाँदी. ताँबा, जस्ता, अभ्रक, बाक्साइट, टिन, मैग्नीशियम आदि इसका उपयोग जेवर, सिक्के, बरतन, बक्सा, तार आदि बनाने में किया जाता है।


31. छोटानागपुर खनिज पेटी का क्या महत्त्व है ?

उत्तर ⇒ यह खनिज पेटी मुख्यतः नीस तथा ग्रेनाइट शैलों से युक्त है। यह देश का सबसे समृद्ध क्षेत्र है। यहाँ कोयला, अभ्रक, लौह अयस्क, यूरेनियम आदि मिलता है। इस पेटी के अंतर्गत झारखंड, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल शामिल है।

32. बॉक्साइट किस तरह एक उपयोगी खनिज है ? इसकी प्राप्ति किन चट्टानों से होती है ? झारखण्ड के किन जिलों में इसकी विकसित खाने हैं ?

उत्तर ⇒ बॉक्साइट से अल्युमिनियम निकाला जाता है। जिसका उपयोग वायुयान बनाने, बिजली का तार बनाने तथा बरतन में किया जाता है। इसका उपयोग सीमेंट बनाने और खनिज तेल साफ करने में भी किया जाने लगा है।
बॉक्साइट की प्राप्ति लैटेराइट चट्टान से होती है। बॉक्साइट का बड़ा भंडार झारखंड के पलामू और लोहरदगा जिले में पाया जाता है जहाँ से निकालकर रेलमार्ग द्वारा मूरी पहुँचाया जाता है। यहाँ की खाने विकसित हैं।भारत बॉक्साइट का निर्यात जापान, ब्रिटेन और जर्मनी को करता है।


33. भारत में कोयला उत्खनन कब प्रारंभ हुआ ?

उत्तर ⇒ भारत में कोयला उत्खनन 1774 में प्रारंभ हुआ, परंतु व्यावसायिक स्तर पर उत्पादन 1839 ई० से हो रहा है। स्वतंत्रता के बाद कोयले के उत्पादन में काफी वद्धि हुई है। अभी भारत का स्थान विश्व के कोयला उत्पादक देशों में 8वा है।


34. ऐलुमिनियम के उपयोग का उल्लेख कीजिए।

उत्तर ⇒

(i) वायुयान निर्माण में,
(ii) विद्युत उपकरण के निर्माण में,
(iii) घर साज-सज्जा के साधनों के निर्माण में,
(iv) बर्तन बनाने में,
(v) सफेद साम रासायनिक वस्तुएँ बनाने में।


35. भारत के किन भागों में नदी डेल्टा का विकास हुआ है ? यहा का मृदा की क्या विशेषता है ?

उत्तर ⇒ भारत के पर्वी तटीय भागों में नदी डेल्टा का विकास हुआ ह। म तटीय मैदान स्थित महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी नदियों द्वारा निर्मित डेल्टा जलोढ़ मिट्टी के क्षेत्र हैं।
यहाँ की मृदा बालू, सिल्ट एवं मृत्तिका के विभिन्न अनुपात से निर्मित है। इ रंग धुंधला से लेकर लालिमा लिये हुए भूरे रंग का होता है। यह उपजाऊ
मिट्टी होती है।


36 संरचनात्मक गुणों के आधार पर ऊर्जा स्त्रोतों को किस प्रकार से बाँटा गया है ?

उत्तर ⇒ संरचनात्मक गुणों के आधार पर ऊर्जा के दो स्रोत हैं_जैविक ऊर्जा तथा अजैविक ऊर्जा स्रोत। मानव एवं प्राणी शक्ति को जैविक तथा जल शक्ति, शक्ति आदि को अजैविक ऊर्जा शक्ति के स्रोत के अंतर्गत रखा जाता है।


37. हॉट स्पॉट्स के निर्धारण की मुख्य शर्ते क्या हैं ?

उत्तर ⇒ इसके निर्धारण की मुख्य शर्ते हैं –

(i) देशज प्रजातियों की संख्या का निर्धारण-ऐसी प्रजातियाँ जो अन्य और कहीं नहीं पायी जाती हैं।
(ii) अधिवास पास पर अतिक्रमण की सीमा निर्धारित करना।


38. भारत के किन-किन क्षेत्रों में पवन ऊर्जा के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ हैं ?

उत्तर ⇒ पवन ऊर्जा के विकास हेतु निम्नलिखित राज्यों में अनुकूल परिस्थितियाँ हैं-

(i) राजस्थान, (ii) गुजरात, (iii) महाराष्ट्र, (iv) कर्नाटक तथा (v) तमिलनाडु।


39. सागर सम्राट क्या है ?

उत्तर ⇒ सागर सम्राट मुंबई हाई पेट्रोलियम उत्खनन् क्षेत्र में कार्यरत एक जलयान है जो समुद्री क्षेत्र में जल के भीतर तेलकूप की खुदाई का कार्य करता है।


40. ताप शक्ति क्यों समाप्य संसाधन है ?

उत्तर ⇒ ताप शक्ति का स्रोत कोयला है। कोयला का निर्माण लंबी अवधि में जटिल प्रक्रिया द्वारा होता है जिसमें लाखों करोड़ों वर्ष लग जाते हैं। किंतु कोयले का उपयोग तेजी से हो रहा है। इनका भंडार सीमित है। अतः ताप शक्ति समाप्य संसाधन है।


41. निम्नलिखित नदी घाटी परियोजनाएँ किन-किन राज्यों में अवस्थित हैं – हीराकुंड, तुंगभद्रा एवं रिहन्द।

उत्तर ⇒ परियोजना – अवस्थिति वाले राज्य
1. हीराकुंड उड़ीसा
2. तुंगभद्रा आंध्रप्रदेश
3. रिहन्द उत्तरप्रदेश


42. वन्य जीवों के ह्रास में प्रदूषण जनित समस्याओं पर अपना विचार स्पष्ट कीजिए।

उत्तर ⇒ बढ़ते प्रदूषण ने भी वन्य जीवों के ह्रास में अपनी भूमिका निभाई है। पराबैंगनी किरणों, अम्ल वर्षा और हरित गृह प्रभाव द्वारा वन्य जीवों एवं वनों को नुकसान पहुंचा है। इसके अलावे वायु, जल एवं मृदा प्रदूषण ने भी वन एवं वन्य जीवों के जीवन को गंभीर संकट में डाल दिया है। इसलिए वन एवं वन्य जीवों की संख्या धीरे-धीरे घटते जा रही है।


43. भाखड़ा-नांगल परियोजना का क्या महत्त्व है ?

उत्तर ⇒ यह विश्व के सर्वोच्च बाँधों में से एक है। इस पर चार शक्ति-गृह बनाये गये हैं। एक भाखड़ा में, दो गंगुवाल में और एक कोटला में स्थापित है। यह 7 लाख किलोवाट विद्युत उत्पादन करता है। यह पंजाब, हरियाणा, हिमाचलप्रदेश इत्यादि राज्यों में कृषि एवं उद्योगों में क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिया है।


44. पारंपरिक ऊर्जा स्रोत किसे कहा जाता है ?

उत्तर ⇒ ऊर्जा के वे सभी पुराने स्रोत जिसे हम सैकड़ों वर्षों से प्रयोग कर रहे, ऊर्जा के पारंपरिक स्रोत कहलाते हैं। जैसे—कोयला, पेट्रोलियम तथा प्राकृतिक गैस। इसे जीवाश्म ईधन के नाम से भी जाना जाता है तथा ये समाप्य संसाधन है।


45. दस लुप्त होने वाले पशु-पक्षियों का नाम लिखिए।

उत्तर ⇒ दस लुप्त होने वाले पशु-पक्षियों के नाम हैं –
गिद्ध, गिर सिंह, धूसर बगुला, पर्वतीय बटेर, हरा सागर, कछुआ, लाल पाण्डा, भारतीय कुरंग, सारंग, श्वेत सारस और कृष्णा सारस।


46. चूना-पत्थर की क्या उपयोगिता है ?

उत्तर ⇒ चूना-पत्थर एक महत्त्वपूर्ण खनिज संसाधन है। इसका 76% उपयोग सीमेंट उद्योग में, 16% उपयोग लौह-इस्पात उद्योग में, 4% उपयोग रसायन उद्योग में तथा शेष 4% उपयोग उर्वरक, कागज तथा चीनी उद्योग में होता है।


47. परमाणु-शक्ति किन-किन खनिजों से प्राप्त होती है ?

उत्तर ⇒ वर्तमान समय में परमाणु शक्ति ऊर्जा के प्रमुख स्रोत है। यह विभिन्न खनिजों से प्राप्त होते हैं, जिसमें इल्मेनाइट, बैनेडियम, एंटीमनी, ग्रेफाइट, यूरेनियम, मोनोजाइट आदि आण्विक खनिज प्रमुख है।


48. कैंसर रोग के उपचार में वन का क्या योगदान है ?
उत्तर ⇒ हिमालय यव जो चीड़ के प्रकार का एक सदाबहार वृक्ष है, की पत्तियों, नियों छालों और जड़ों से ‘टैक्सोल’ नामक रसायन प्राप्त होता है। इस ‘टैक्सोल’ सायन से निर्मित दवा कैंसर रोग के उपचार के लिए प्रयुक्त होता है। इसलिए कैंसर रोग के उपचार में वन का महत्त्वपूर्ण योगदान है।


49. जल विद्युत उत्पादन के कौन-कौन से मुख्य कारक हैं ?

उत्तर ⇒ जल-विद्युत उत्पादन के प्रमुख कारक निम्न हैं –
(i) लगातार बहती हुई जल धारा,
(ii) नदी मार्ग में तीब्र ढाल,
(iii) जल की धारा में तेज गति
(iv) प्राकतिक जल प्रपात,
(v) सघन औद्योगिक एवं व्यापारिक केंद्र,
(vi) पर्याप्त पँजी निवेश,
(vii) परिवहन के साधन,
(viii) प्राविधिक ज्ञान एवं अमर ऊर्जा स्रोतों का अभाव।।


50. भारत की सबसे बड़ी नदी घाटी परियोजना कौन है ? यह किस नदी पर है ? इससे किस क्षेत्र का आर्थिक विकास हुआ है ?

उत्तर ⇒ भारत की सबसे बड़ी नदी घाटी परियोजना भाखड़ा नंगल परियोजना है। यह सतलज नदी पर बनायी गई है।
इस परियोजना से पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तराखंड, उत्तरप्रदेश, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान और जम्मू-काश्मीर राज्यों को लाभ मिला है। इससे कृषि और उद्योगों में क्रांतिकारी परिवर्तन आये हैं। इस परियोजना से 15 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई कर देश में हरित क्रांति लाने में मदद मिली है। जल विद्युत उत्पादन के द्वारा उन राज्यों में लघु एवं कुटीर उद्योग का जाल बिछ गया है।


51. नवीकरणीय और अनवीकरणीय संसाधन में अंतर स्पष्ट करें।

उत्तर ⇒ प्राप्ति के आधार पर संसाधनों को दो वर्गों में बाँटा गया है—

(i) नवीकरणीय संसाधन
(ii) अनवीकरणीय संसाधन

(i) नवीकरणीय संसाधन – वातावरण में पाये जाने वाले वे सभी संसाधन जो विभिन्न प्रकार की प्राकृतिक भौतिक, रासायनिक या जैविक प्रक्रियाओं से उत्पन्न होते रहते हैं जैसे सूर्य का प्रकाश, हवा, पानी, तालाब, झील, नदियाँ, मछलियाँ, पेड़-पौधे, वनजीव, पशु-पक्षी ये सभी नवीकरणीय संसाधन हैं

(ii) अनवीकरणीय संसाधन – इसके अन्तर्गत वे सभी संसाधनों को रखा गया है जो धात्विक हो या अधात्विक एक निश्चित भंडार के रूप में पृथ्वी के अन्दर जमा है इन्हें कृत्रिम रूप से पुनः बनाया जाना संभव नहीं है। अतः एक बार इनके भंडार समाप्त हो जाने पर कठिनाई होती है जैसे- कोयला पेट्रोलियम लौह-अयस्क, बॉक्साईट, मैंगनीज आदि। ये अनवीकरणीय संसाधन के अंतर्गत आते हैं।


52. वन महोत्सव और बाघ परियोजना क्या है ?

उत्तर ⇒ वन महोत्सव–वन संरक्षण और वन विकास की दिशा में उठाया गया एक महत्त्वपूर्ण कदम है। इसमें प्रतिवर्ष नए वन लगाए जाते हैं। 1952 ई० से प्रत्येक वर्ष वन महोत्सव मनाया जाता है। गोष्ठियाँ होती है। इसमें वन के महत्त्व पर चर्चा की जाती है। विचार विमर्श किया जाता है और आगे की योजना बनायी जाती है। बाघ परियोजना-बाघ जैसे महत्त्वपूर्ण वन्य जीव की सुरक्षा एवं वृद्धि के लिए बनायी गई योजना है। इसके अंतर्गत 27 बाघ अभयारण्य हैं जैसे उत्तराखंड में कार्बेट, झारखंड में बेतला, मध्यप्रदेश में कान्हा, उड़ीसा में नंदनकानन अभयारण्य बनाये गये हैं। जिसका परिणाम यह हुआ है कि दिनों-दिन बाघ की संख्या में वृद्धि होने लगी है। अच्छा परिणाम मिलने लगा है।


53. सौर ऊर्जा का उत्पादन कैसे होता है ?

उत्तर ⇒ सूर्य से आनेवाली किरणें जब फोटोवोल्टाइक सेलों पर पड़ती हैं तब सूर्य किरणें ऊर्जा में परिवर्तित हो जाती हैं जिसे सौर ऊर्जा कहा जाता है। कम लागत में अधिक ऊर्जा प्राप्त करने का एक अनोखा साधन है। भारत के पश्चिमी भाग गुजरात और राजस्थान में सौर ऊर्जा की अपार संभावनाएँ हैं।


54. भारत में नदियों के प्रदूषण के कारणों का वर्णन कीजिए।

उत्तर ⇒ भारत में प्राय: नगर एवं कल-कारखाने नदियों के किनारे अवस्थित हैं। इन नगरो के गंदे जल और कल कारखानों के कचडों को प्रायः नदियों में ही गिरा दिया जाता है। साथ ही कृषि में उपयोग किए जाने वाले रसायनों उर्वरकों, कीटनाशकों के जल में मिल जाने के कारण भी नदियों का जल प्रदूषित हुआ है।


55. भौतिक गुणों के आधार पर मिट्टी को कितने वर्गों में बाँटा गया है ? गंगा के मैदान में किस प्रकार की मिट्टी पाई जाती है ?

उत्तर ⇒ भौतिक गुणों के आधार पर मिट्टी को निम्न तीन वर्गों में रखा गया है-
(i) बलुई मिट्टी- इसमें पंक की अपेक्षा बालू का प्रतिशत अधिक होती है। यह जल अधिक सोखती है।
(ii) चिकनी मिट्टी- इसमें पंक का प्रतिशत अधिक होता है। यह मिट्टी सूखने पर कड़ी हो जाती है।
(iii) दोमट मिट्टी- इसमें बाल और पंक की मात्रा बराबर होती है। कृषि के लिए यह मिट्टी अच्छी मानी जाती है।

गंगा के मैदान में सामान्यत: यही मिट्टी पायी जाती है।


56. मुम्बई हाई तेल उत्पादक क्षेत्र का परिचय दें।

उत्तर ⇒ 1973 में बंबई (मुंबई) द्वीप के निकट अरब सागर में सागर तल का वेधन कर तेल निकाला गया। यह तेल क्षेत्र मम्बई हाई के नाम से प्रसिद्ध है जो समुद्र तट से 115 किमी० की दरी पर है। यहाँ ‘सागर सम्राट’ नामक जल मंच बनाया गया है, जिससे तेल की खुदाई में सविधा मिलती है। यह महाराष्ट्र का एक मात्र तेल उत्पादक केंद्र है। इसने 1974 से तेल उत्पादन शुरू किया। आज भारत के सर्वाधिक तेल उत्पादन क्षेत्र यहीं है।


57. नदी घाटी परियोजना के मुख्य उद्देश्य क्या हैं ?

उत्तर ⇒ इन परियोजनाओं का मुख्य उद्देश्य है समन्वित रूप से नदी-घाटियों से जुड़ी विभिन्न समस्याओं को हल करना। इनमें बाढ़ों का नियंत्रण, मृदा अपरदन पर रोक, सिंचाई एवं पीने के लिए पानी, उद्योगों, गाँवों और नगरों के जल विद्युत उत्पादन, अन्तःस्थलीय जल परिवहन और कई अन्य सुविधाएँ जैसे—मनोरंजन, वन्यजीव संरक्षण और मत्स्य के विकास शामिल है।


58. अभयारण्य क्या है ? किन्हीं दो के नाम लिखें और उनकी स्थिति बताएँ।

उत्तर ⇒ वन्य प्राणियों को संरक्षित रखने के लिए, उन्हें भविष्य में लुप्त होने से बचाने के लिए सरकारी स्तर पर कई प्रकार के प्रयास किए गये हैं। उन्हीं में एक, वन्य जीव अभयारण्य स्थापित किया जाता है। जिसमें सक्षम पदाधिकारी की अनुमति के बिना किसी भी पक्षी या पशु को मारना, शिकार करना या पकड़ना वर्जित होता है। भारतवर्ष में कुल 513 अभयारण्य स्थापित हैं। जिसमें असम राज्य का काजीरंगा और अरुणाचल प्रदेश राज्य में नामदाफा महत्त्वपूर्ण माना जाता है।


59.पृथ्वी को नीला ग्रह की संज्ञा क्यों दी जाती है ?

उत्तर ⇒ पृथ्वी के 71% भाग पर जल की उपस्थिति के कारण यह अंतरिक्ष से नीले रंग का दिखलाई पड़ता है। यही कारण है कि इसे नीला ग्रह कहा जाता है।


60. वन विनाश के दो मुख्य कारकों का उल्लेख करें।

उत्तर ⇒ वन विनाश के दो मुख्य कारक हैं-
(i) बढ़ती जनसंख्या – इसके कारण जलावन, फर्निचर, मकान निर्माण आदि में लकड़ी के लिए वनों का विनाश हो रहा है।
(ii) आवासीय क्षेत्रों का प्रसार – आवास का क्षेत्र इतना बढ़ गया है कि लोग अब जंगल के क्षेत्र में आवासों का विस्तार कर रहे हैं।


61. झारखंड राज्य के प्रमुख कोयला उत्पादक क्षेत्रों के नाम अंकित कीजिए।

उत्तर ⇒ झारखंड राज्य के प्रमुख कोयला क्षेत्र निम्नलिखित हैं –

(i) झरिया, (ii) बोकारो, (iii) गिरीडीह, (iv) कर्णपुरा तथा (v) रामगढ़।


62. किन्हीं चार तेलशोधक कारखाने का स्थान निर्दिष्ट कीजिए।

उत्तर ⇒ भारत स्थित चार तेलशोधक कारखाने निम्न हैं-

(i) डिगबोई

(ii) तारापुर

(iii) बरौनी

(iv) हल्दिया


63. पवन अपरदन वाले क्षेत्र में कृषि की कौन-कौन सी पर उपयोगी मानी जाती है ?

उत्तर ⇒ पवन अपरदन वाले क्षेत्रों में पट्टिका कृषि उपयोगी मानी जाती है। यह कृषि फसलों के बीच घास की पट्टियाँ विकसित कर की जाती है।


64. वनों के ह्रास (विनाश) के चार कारणों को लिखें।

उत्तर ⇒ पर्यावरण की दृष्टि से भारत में जितना वन रहना चाहिए उसका दो-तिहाई भाग ही बचा है। वन ह्रास के कई कारण देखने को मिलते हैं जैसे-
(i) पश्चिमोत्तर भारत में वर्षा की कमी के कारण वन क्षेत्र कम मिलता है।

(ii) पंजाब, हरियाणा के क्षेत्रों में बचे वनों को काटकर उसपर खेती जाती है।

(iii) पहाडी क्षेत्रों में झूम खेती के लिए बड़े पैमाने पर वन काटा जाता है ।

(iv) वनों में स्वतः आग लगने से भी बड़े पैमाने पर वनों का नाश हो ।


65. दो परंपरागत और दो गैर परंपरागत ऊर्जा स्रोतों के नाम लिखे और उनकी विशेषताएँ बताएँ।

उत्तर ⇒ ऊर्जा संसाधनों को दो वर्गों में बाँटा जाता हैं –
(i) परंपरागत ऊर्जा  (ii) गैर परंपरागत ऊर्जा
परंपरागत ऊर्जा के स्रोत हैं लकड़ी, उपले, कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक की तथा विद्युत। इनमें कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस के भंडार सीमित है। समाप्त हो जाने वाले शक्ति के साधन हैं और अनवीकरणीय हैं। दलिता उपयोग विवेकपूर्ण ढंग से किया जाना चाहिए।
दूसरी ओर गैर परंपरागत ऊर्जा के स्रोत हैं सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, ज्वारी ऊर्जा, परमाणु ऊर्जा और बायोगैस ऊर्जा। ये नवीकरणीय ऊर्जा के स्रोत हैं और आवश्यकता एवं क्षमता के अनुसार इनका उत्पादन बढ़ाया और उपयोग किया जा सकता है।


66. बहुउद्देशीय परियोजना से आप क्या समझते हैं ?

उत्तर ⇒ विकास की ऐसी परियोजना जिसमें विकास के कई उद्देश्यों की साथ-साथ पूर्ति हो सके बहुउद्देशीय परियोजना कही जाती है। आजादी के बाद देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए नदी घाटी परियोजनाओं पर बल दिया गया। इस परियोजना के कई उद्देश्य हैं। जैसे बाढ़ नियंत्रण, मृदा अपरदन पर रोक, सिंचाई एवं पीने योग्य जल की आपूर्ति, विद्युत उत्पादन, उद्योगों को जलापूर्ति, मत्स्य-पालन, वन्य जीव संरक्षण, पर्यटन, परिवहन आदि।


67. भू-क्षरण के क्षेत्र लिखिए।

उत्तर ⇒ भारत के मध्य प्रदेश में चंबल नदी की द्रोणी, उत्तर प्रदेश में आगरा, इटावा और जालौन जिलों में, तमिलनाडु के दक्षिण व उत्तरी अर्काट, कन्याकुमारी, तिरुचिरापल्ली, चिंग्लीपुट, सलेम और कोयम्बटूर जिलों में भू-क्षरण क्षेत्र अधिक है।


68. रेड डाटा बुक और ग्रीन बुक क्या है ?

उत्तर ⇒ भारत की दो संस्था वॉटिनिकल सर्वे ऑफ इंडिया और वन अनुसंधान ने मिलकर 1970 में भारत की संकटग्रस्त वन जीवों की प्रजातियों की एक सूची तैयार की थी। इस सूची को ही रेड डाटा बुक कहा जाता है। इसी प्रकार ऐसे पौधे जो कम संख्या में पाये जाते हैं या विलुप्त होते जा रहे हैं उनकी एक पुस्तक तैयार की गयी है जिसे ग्रीन बुक कहा जाता है। विलुप्त हो रहे या संकटग्रस्त वनजीवों या पौधों की जानकारी इसलिए की जाती है ताकि उन्हें संरक्षण प्रदान किया जा सके।


69. अंतर्राज्यीय जल विवाद के क्या कारण हैं ?

उत्तर ⇒भारत में अनेक ऐसी नदियाँ हैं जो एक से अधिक राज्यों के बीच से होकर बहती हैं। उत्तर भारत में गंगा, पूर्वी भारत में ब्रह्मपुत्र, दक्षिण भारत में कृष्णा-कावेरी आदि अनेक ऐसी ही नदियाँ है। विकास के इस दौर में सिंचाई, मत्स्य पालन बहुउद्देशीय परियोजना का निर्माण आदि कार्य नदी से ही जुड़ा है। एक से अधिक राज्यों के बीच नदी जल के इस उपयोग को लेकर कभी-कभी आपस में विवाद की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।


70. वन और वन्य प्राणियों के संरक्षण में सहयोगी रीति-रिवाजों का उल्लेख कीजिए।

उत्तर ⇒भारतीय परंपरा का वन और वन्य जीवों के साथ अभिन्न संबंध रहा है। पौराणिक ग्रंथों, कर्मकांडों में वनों और वन्य प्राणियों को काफी महत्त्व दिया गया है। धार्मिक अनुष्ठानों में लगभग एक सौ पौधे की प्रजातियों का प्रयोग हमारे रीति-रिवाजों में वनों की महत्ता को ही बताता है। सम्राट अशोक ने तो वन्य जीव-जंतुओं के शिकार पर रोक लगा दिया था। बाबर और जहाँगीर के आलेखों में भी प्रकृति संरक्षण का उल्लेख मिलता है। मुगल चित्रकला में भी वन एवं वन्य प्राणियों से प्रेम की बात पायी जाती है।


71. वन संरक्षण के चार उपाय बताएँ।

उत्तर ⇒वन के संरक्षण के लिए नम्नांकित चार उपाय किए जा सकते हैं –
(i) जिन क्षेत्रों से वन काटे गये हैं पुन: वृक्षारोपण किया जाय।
(ii) वन क्षेत्रों का विकास किया जाय अर्थात् नये क्षेत्रों में वृक्ष लगाए जायें।
(iii) वन संरक्षण के लिए एक निश्चित नीति हो और नियम का सही ढंग से पालन किया जाय।
(iv) वृक्षों में लगने वाले पर्यावरण को संतुलित बनाये रखने के में लगने वाले बीमारियों से बचाव की व्यवस्था की जानी चाहिए। संतुलित बनाये रखने के लिए किसी भी देश के कल सफल का 33.3% भाग पर वनों का विस्तार होना आवश्यक है।


72. जल प्रदूषण को रोकने के लिए कारगर उपाय क्या हो सकते हैं ? लिखें ।

उत्तर ⇒जल सभी जीव-जंतुओं के लिए आवश्यक संसाधन है। इसके प्रदूषित होने से सबका जीवन खतरे में पड़ सकता है।
अत: जल प्रदूषण को रोकने के लिए निम्नांकित कारगर उपाय किये जा सकते हैं –
(i) बडे-बड़े नगरों के कूड़ा-करकट, मल आदि को निकट में बहने वाली नदियों, तालाबों, झीलों या अन्य जलाशयों में न गिराया जाय।
(ii) कल-कारखानों के अपशिष्ट रासायनिक पदार्थ जलाशयों में न गिराया जाय।
(iii) तालाबों में कीटनाशक दवाएँ न छिडकी जाएँ।
(iv) अणु परीक्षण, परमाणु बम विस्फोट, रासायनिक अस्त्रों के प्रयोग पर प्रतिबंध लगना चाहिए। क्योंकि इसके कारण जल भी प्रदूषित होता है।


73. उपयोगिता के आधार पर ऊर्जा को कितने भागों में बाँटा गया है ?

उत्तर ⇒ उपयोगिता के आधार पर ऊर्जा को दो भागों में बाँटा गया है —

(i) प्राथमिक ऊर्जा—इसके अंतर्गत कोयला, पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस जैसे ऊर्जा स्रोतों को शामिल किया गया है ।

(ii) गौण ऊर्जा—इसके अंतर्गत ऐसे स्रोतों को शामिल किया जाता है जो प्राथमिक ऊर्जा से प्राप्त किये जाते हैं ।

कृषि 

1. भारत को कृषि प्रधान देश क्यों कहा जाता है ?

उत्तर ⇒ भारत की 51 प्रतिशत जनसंख्या कृषि पर ही निर्भर है। सकल घरेलू उत्पादन में भी इसका योगदान लगभग 13.7 प्रतिशत है। यह भारतीय अर्थव्यवस्था के रीढ़ की हड्डी मानी जाती है। यही कारण है कि भारत को कृषि प्रधान देश कहा जाता है।


2. भारतीय कृषि की विविधता को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक कौन-से हैं ? समझावें।

उत्तर ⇒भारतीय कृषि की विविधता को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक हैं—

वर्षा की मात्रा-इसके आधार पर अलग – अलग जगहों पर अलग-अलग फसलें उपजाई जाती हैं। मिट्टी के प्रकार विविधता को मृदा भी प्रभावित करती है, जैसे—काली मृदा में कपास, जलोढ़ में धान इत्यादि।

कृषि-पद्धति की विविधता – प्रत्येक स्थान पर कृषि कार्य की पद्धति अलग-अलग होती है। ये सभी विविधता प्रदान करती हैं।


3. कृषि को भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ क्यों कहा जाता है ?

उत्तर ⇒भारतीय अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि पर आधारित है। देश की कुल जनसंख्या का 70% लोग कृषि से जुड़े हैं। इनका जीवन-यापन कृषि से होता है। खाद्यान्न की आपूर्ति कृषि उपज से होती है।भारत की राष्ट्रीय आय का बड़ा भाग कृषि से प्राप्त होती है। उद्योगों के लिए कच्चे माल की प्राप्ति कृषि से होती है। जैसे कपास, जूट, गन्ना, चाय, दलहन, तेलहन आदि। इस प्रकार कृषि देश के औद्योगिक विकास का आधार भी है।


4. भारतीय कृषि की निम्न उत्पादकता के किन्हीं चार कारणों का उल्लेख करें।

उत्तर ⇒ भारतीय कृषि की निम्न उत्पादकता के निम्नलिखित कारण हैं –

(i) अधिकतर क्षेत्रों में अभी भी कृषि परंपरागत तरीकों से ही किए जाते हैं।
(ii) कृषि का मानसूनी वर्षा पर निर्भर रहना, फलतः कभी अतिवृष्टि तो कभी अनावृष्टि से उत्पादकता प्रभावित होती है।

(iii) भारत के अनेक भागों में अभी भी कषि के अत्याधुनिक तकनीक, रासायनिक उर्वरक आदि का कम प्रयोग होने से उत्पादन कम होता है।
(iv) भारत में जनसंख्या अधिक होने के कारण निर्वाह कषि की जाती है। कृषि पर अधिक जनसंख्या का बोझ रहते हए भी उत्पादन नहीं हो पाता है।


5. भारतीय कृषि की दो सबसे बड़ी समस्या लिखें ।

उत्तर ⇒भारतीय कृषि की दो सबसे बड़ी समस्याएँ हैं-

(i) वैज्ञानिक पद्धति का कुछ ही क्षेत्रों में प्रसार
(ii) फसलों का प्रति एकड़ कम उत्पादन।


6. प्रारंभिक जीविका कृषि किसे कहते हैं ?

उत्तर ⇒ इस प्रकार के कृषि पद्धति में किसान सिर्फ इतने ही फसल का उत्पादन करता है जिससे उसका एवं उसके परिवार का भरण-पोषण हो सके।


7. जीवन निर्वाह कृषि से आप क्या समझते हैं ?

उत्तर ⇒ जीवन निर्वाह कृषि उस कृषि को कहते हैं, जिसमें उत्पादन का लक्ष्य अपना तथा अपने परिवार का करण पोषण मात्र है। इस प्रकार की कृषि मुख्य रूप से विकासशील देश तथा पिछड़े देशों में देखने को मिलती है। इस प्रकार की कृषि में सुविधाओं की नमी के कारण प्रति हेक्टर उत्पादन काफी कम होता है।


8. भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का क्या महत्त्व है ?

उत्तर ⇒भारतीय अर्थव्यवस्था पूर्णत: कृषि पर आधारित है। कृषि से ही देश को विभिन्न प्रकार के खाद्य सामग्री प्राप्त होती है। इसी से विभिन्न प्रकार के उद्योगों के लिए कच्चा माल प्राप्त होता है। इसके अलावा कपि से रोजगार एवं विदेशी मुद्रा की भी प्राप्ति होती है। अत: हम कह सकते हैं कि कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है।


9. भारत में गहन कृषि के लिए कौन-सी सुविधा पाई जाती है ? समझावें।

उत्तर ⇒भारत में तेजी से बढ़ती जनसंख्या का दबाव और सीमित कृषि योग्य भूमि के कारण गहन कृषि अपनाई गयी है।
भारत मानसूनी वर्षा वाला देश है। वर्षा एक विशेष मौसम में होती है और अनियमित रूप से होती है कहीं बाढ जैसी समस्या उत्पन्न हो जाती है और कहीं वर्षा का अभाव देखने को मिलता है। ऐसे क्षेत्रों में सिंचाई का सहारा लिया जाता है। हिमालय से निकलने वाली नदियाँ सदा जलपरित रहती हैं। उन नदियों पर बांध बनाकर नहरें निकाली गयी है और उनसे जलाभाव क्षेत्रों की सिंचाई की सुविधा प्रदान की गयी है। भारत के मैदानी भागों में जलोढ़ मिट्टी पायी जाती है जो अत्यंत उपजाऊ है इन्हीं कारणों से भारत में गहन कृषि की जाती है।


10. कृषि कार्य का मुख्य उद्देश्य क्या हैं ? समझावें।

उत्तर ⇒कृषि कार्य का मुख्य उद्देश्य है भोजन उपलब्ध कराना। यह कृषि आधारित उद्योगों को कच्चा माल उपलब्ध कराता है। कृषि कार्य से जो उपज प्राप्त होता है उसके निर्यात से विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है। देश का 24% आय कृषि कार्य से ही प्राप्त होता है। राष्ट्रीय आय में कृषि का एक महत्त्वपूर्ण योगदान है। आज भी ग्रामीण लोगों को रोजगार प्रदान करना इसका मुख्य उद्देश्य है।


11. व्यापारिक कृषि और निर्वाह कृषि में अंतर स्पष्ट करें।

उत्तर ⇒ व्यापारिक कृषि – व्यापारिक दृष्टिकोण से की जाने वाली कृषि व्यापारिक कृषि कही जाती है। इस कृषि में अत्याधुनिक कृषि तकनीक, रासायनिक खाद, परिष्कत बीज, सिंचाई, कीटनाशक आदि का उपयोग किया जाता है। जैसे -गन्ना, जूट, मूंगफली आदि।
निर्वाह कृषि–परंपरागत तरीकों से जैसे हल, बैल, कुदाल आदि की सहायता से की जाने वाली कृषि जिसमें फसल उत्पादन जीविका निर्वाह के लिए किया जाता है निर्वाह कृषि कहलाती है। इस कृषि पर जनसंख्या का बोझ अधिक होता है एवं आधुनिक तकनीक का प्रयोग कम किया जाता है।जैसे चावल, गेहूँ, मकई आदि।


12. गहन कृषि की विशेषताओं को लिखें।

उत्तर ⇒ गहन या सघन कृषि की मुख्य विशेषताएँ हैं –

(i) कृषि की उन्नत तकनीक के प्रयोग के कारण प्रतिहेक्टेयर उत्पादन अधिक होता है।
(ii) नमी की अधिकता के कारण निचली जमीन में सघन कृषि की जाती है।
(iii) इस कृषि के तहत धान एवं गेहूँ सहित अन्य खाद्यान्नों की खेती की जाती है।
(iv) इस कृषि पद्धति में उर्वरकों का कम उपयोग किया जाता है।
(v) अधिक खर्च करके कम जमीन से अधिक उत्पादन प्राप्त करना इस खेती की मुख्य विशेषता है।


13. शुद्ध राष्ट्रीय आय में कृषि उत्पाद के योगदान की चर्चा कीजिए।

उत्तर ⇒शुद्ध राष्ट्रीय आय में भारतीय कृषि उत्पाद का महत्त्वपूर्ण योगदान है। देश की 24% आय कृषि उत्पाद से प्राप्त होती है। आंतरिक एवं अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में भी कृषि की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। आंतरिक व्यापार से रेल की आय एवं विदेशी व्यापार से तटकर की आय बढ़ती है। इस प्रकार भारतीय कृषि यहाँ की जनसंख्या को भोजन प्रदान करते हए उद्योग धंधों के लिए कच्चा माल उपलब्ध कराती है। साथ ही कृषि उपज के निर्यात से विदेशी मुद्रा की प्राप्ति भी होती है।


14. हरित क्रांति से आप क्या समझते हैं ?

उत्तर ⇒ सन् 1960 के दशक में पंजाब, हरियाणा तथा पश्चिमी उत्तरप्रदेश में कृषि के क्षेत्र में एक क्रांति हुई थी जिसे हरित क्रांति कहते हैं। यह भारत को कृषि के मामले में आत्मनिर्भर बनाया। इसमें सर्वाधिक उपज गेहूँ की हुई थी। इस क्रांति के जनक डॉ० एम०एस० स्वामीनाथन थे। इसमें उत्तम बीजों एवं खाद का प्रयोग किया गया था।


15. भारत विश्व का एक अग्रणी चाय निर्यातक देश है क्यों ? कारण बताएँ।

उत्तर ⇒ भारत में चाय उत्पादन के लिए अनुकूल भौगोलिक परिस्थितियाँ पायी जाती है और चाय का उत्पादन भी भरपूर किया जाता है। परंतु भारत एक गर्म देश है जहाँ इसकी खपत ठंडे देशों की तुलना में कम है। यहाँ की चाय उत्तम किस्म की होती है, जिसका विश्व बाजार में अत्यधिक माँग है। इसीलिए भारत चाय के निर्यात में अग्रणी है।


16. शुष्क क्षेत्र से आपका क्या अभिप्राय है ?

उत्तर ⇒जिस स्थान पर 75 सेमी० से कम वर्षा होती है, उस स्थान को शुष्क क्षेत्र के अंतर्गत रखा जाता है। शुष्क क्षेत्र की कृषि को ‘शुष्क भूमि कृषि’ कहा जाता है।


17. जल दुर्लभता  (Water scarcity)  क्या है? जल दुर्लभता के लिए उत्तरदायी किन्हीं चार कारकों का उल्लेख करें।

उत्तर ⇒ माँग की तुलना में जल की कमी को जल दुर्लभता कहा जाता है।

उत्तरदायी कारक
(i) अति शोषण, (ii) अनुचित प्रबन्धन, (iii) समाज के विभिन्न वर्गों में जल का असमान वितरण, (iv) औद्योगिकीकरण तथा शहरीकरण।


18. नगदी और रोपण फसल में अंतर बताएँ।

उत्तर ⇒नगदी फसल-छोटे या बड़े आकार के भूखंड पर अधिक से अधिक मुद्रा की प्राप्ति के उद्देश्य से इस प्रकार के फसल उगाए जाते हैं। जैसे—तंबाकू, मसाला आदि। के रोपण फसल-रोपन कृषि भी एक प्रकार की व्यापारिक कृषि ही है। इस कृषि में उद्योग की तरह ही मैनेजर एवं मजदूर की व्यवस्था होती है और मिल मालिक की तरह इसमें कृषक की स्थिति होती है। ऐसी कृषि बड़े-बड़े फार्मों में यंत्रों एवं अन्य आधुनिक तकनीक से की जाती है।


19. मनुष्यों की मूलभूत आवश्यकताएँ क्या हैं ?

उत्तर ⇒वे सभी आवश्यकताएँ जो मानव के अस्तित्व के लिए अत्यंत आवश्यक हैं मूलभूत आवश्यकताएँ कहलाती हैं।जैसे—रोटी, कपड़ा और मकान।


20.भारतीय लोगों के आजीविका का मुख्य आधार क्या है ?

उत्तर ⇒भारत की लगभग दो तिहाई आबादी प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से कृषि कार्य में लगी है। यही उसकी आजीविका का मुख्य आधार है। देश के किसान इस पर सर्वाधिक निर्भर हैं। कृषि का राष्ट्रीय उत्पादन में भी काफी बड़ा योगदान है।


21. स्वतंत्रता के बाद पंचवर्षीय योजनाओं में कृषि के विकास के लिए कौन-से महत्त्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं ?

उत्तर ⇒इसके अंतर्गत खेती में उन्नत तकनीक अपनाई गई है. उत्तम बीज का विकास किया गया है तथा रासायनिक उर्वरक का तेजी से प्रयोग होने लगा है। हरित क्रांति के लिए प्रयास कर सफल बनाया गया। किसान क्रेडिट कार्ड इत्यादि नवीन योजनाएँ लायी गई हैं।


22. भारत में उपजाए जानेवाले प्रमुख खाद्य और व्यावसायिक फसलों के नाम लिखिए।

उत्तर ⇒प्रमुख खाद्य फसल-धान, गेहूँ, मक्का, दलहन, तेलहन, ज्वार, बाजरा, रागी। प्रमख व्यावसायिक फसल-गन्ना, चाय, कॉफी, गर्म मसाले रबर आदि।


23. रबी फसलें क्या हैं ? चार उदाहरण दें।

उत्तर ⇒रबी फसलें को शीत ऋतु में अक्टूबर से दिसम्बर के मध्य बोया जाता है तथा ग्रीष्म ऋतु में अप्रैल से जून के मध्य काटा जाता है। (i) गेहँ, (ii) जो (iii) चना तथा (iv) मटर।


24. फसल प्रारूप किसे कहते हैं ?

उत्तर ⇒फसलों को मौसम के अनुरूप उपजाया जाता है। भारत में कृषि के र प्रमुख फसलें हैं-

(i) खरीफ मानसून पूर्व में। (ii) रबी वर्षा के बाद जाडा के प्रारंभ में। (iii) जायद यह ग्रीष्म में अल्पावधि के लिए होता था।


25. अजैव संसाधन किसे कहते हैं ?

उत्तर ⇒ वे सभी संसाधन जिनका निर्माण निर्जीव पदार्थों से हुआ है। अजैव संसाधन कहलाते हैं। जैसे-चट्टानें।


26. बफर स्टॉक क्या है ?

उत्तर ⇒सरकार विभिन्न कार्यक्रम जो गरीबों की सहायता के लिए चलाती है तथा आपदा के समय उपयोग के लिए जो अनाज संग्रह करके रखती है उसे बफर स्टॉक कहते हैं। यह कार्य भारत में फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया द्वारा होता है।


27. ऑपरेशन फ्लड क्या है ?

उत्तर ⇒दुग्ध उत्पादन में वृद्धि के लिए श्वेत क्रांति के माध्यम से चलाया गया एक अभियान था। इसके प्रणेता थे डॉ० वर्गीज कुरियन।


28. श्वेत क्रांति किसे कहते हैं ?

उत्तर ⇒श्वेत क्रांति अथवा ऑपरेशन फ्लड का संबंध दुग्ध उत्पादन से है। इसको दुग्ध के अधिक मात्रा में उत्पादन के लिए चलाया गया था ।


29. भारत में उपजने वाली दो खाद्य, नकदी एवं रेशेवाली फसलों के नाम लिखें।
उत्तर ⇒खाद्य फसल – धान, गेहूँ
नकदी फसल – चाय, कहवा
रेशेदार फसल – कपास, जूट।


30. जायद फसल किसे कहते हैं ?

उत्तर ⇒खरीफ तथा रबी फसलों के बीच ग्रीष्म ऋतु में उपजाये जाने वाली फसलों को जायद फसल कहा जाता है। इसे गर्मा फसल भी कहा जाता है। उदाहरण—खीरा, ककड़ी।


31, धान, गेहूँ, गन्ना, चाय, कपास, जूट फसलों के उत्पादन करने वाले दो प्रमुख राज्यों के नाम लिखें।

उत्तर ⇒ धान – पश्चिम बंगाल, बिहार
गेहूँ – पंजाब, उत्तरप्रदेश
गन्ना – उत्तरप्रदेश, पंजाब
चाय – असम, पश्चिम बंगाल
कपास – महाराष्ट्र, गुजरात
जूट – पश्चिम बंगाल, बिहार।


32. खाद्य सुरक्षा किसे कहा जाता है ?

उत्तर ⇒ मानव की मूलभूत आवश्यकता है, रोटी, कपड़ा और मकान। प्रत्येक नागरिक के लिए भोजन के साथ-साथ पोषण प्रदान करना, खाद्य सुरक्षा कहलाता है। इसे सरकार जन वितरण प्रणाली के माध्यम से करती है।


33. भारत कपास का आयातक एवं निर्यातक दोनों है क्यों ? कारण बताएँ।

उत्तर ⇒ भारत विश्व का एक प्रमुख कपास उत्पादक देश है। कपास का अधिक उत्पादन होने के कारण भारत कपास का निर्यात करता है। साथ ही भारत में वस्त्रोद्योग अधिक संख्या में स्थापित हैं जिसके लिए अच्छे किस्म की कपास की जरूरत होती है जो भारत में उपलब्ध नहीं है। इसलिए अच्छे किस्म का कपास भारत को आयात करना पड़ता है। यही कारण है कि भारत कपास का आयातक और निर्यातक दोनों है।


34. गन्ने की उपज उत्तरी भारत की अपेक्षा दक्षिण भारत में अधिक है क्यों ? कारण बताएँ।

उत्तर ⇒ गन्ना एक ऊष्ण एवं उपोष्ण कटिबंधीय फसल है। जिसके लिए 21°C से 27°C तापमान और 75 cm से 100 cm वार्षिक वर्षा की जरूरत पड़ती है। दक्षिण भारत में उत्तर भारत के तुलना में ये सारी अनुकूल परिस्थितियाँ अधिक उपलब्ध हैं। साथ ही दक्षिण भारत के गन्ना उत्पादक राज्य तटीय भाग में पड़ने के कारण जलवाय में आर्द्रता अधिक होती है जो अधिक उपज में सहायक होती है। इसीलिए गन्ने की उपज दक्षिण भारत में अधिक है।


35. कपास की खेती दक्कन प्रदेश की काली मिट्टी में अधिकांशतः होती है क्यों ? कारण बताएँ।

उत्तर ⇒ कपास की खेती के लिए लावानिर्मित काली मिट्टी बहुत उपयक्त होती है। क्योंकि इसमें नमी बनाये रखने की क्षमता होती है। पुनः तेज व चमकीली धुप कपास के पौधों को बढ़ने में मदद पहुंचाती है। ये भौगोलिक परिस्थितियाँ दक्षिण भारत में मिलती है। इसीलिए दक्कन प्रदेश की काली मिट्टी में अधिकांशतः कपास की खेती की जाती है।


36. वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा का सामना करने के लिए भारत को क्या कदम उठाना होगा ?

उत्तर ⇒वैश्विक प्रतिस्पर्धा का सामना करने के लिए भारत को अपनी कृषि सम्बंधित क्षमताओं को सुनियोजित ढंग से उपयोग करना होगा। जैव प्रौद्योगिकी के उपयोग के अलावा राष्ट्रीय बाजार का एकीकरण इस दिशा में एक महत्त्वपर्ण कदम सकता है। इसके लिए सड़क, बिजली, सिंचाई, ऋण की सुविधा आदि उपलब्ध करना परम आवश्यक है। इसके बिना कृषि को वैश्वीकरण के अनुचित प्रभाव से बचा पाना संभव नहीं है।

निर्माण उद्योग

1. विनिर्माण से आप क्या समझते हैं ?

उत्तर–उपलब्ध कच्चे मालों का प्रसंस्करण कर जीवनोपयोगी वस्तुएँ तैयार करना विनिर्माण कहलाता है।


2. उद्योगों के स्थानीयकरण के तीन कारकों को लिखिए।

उत्तर ⇒ उद्योगों के स्थानीयकरण के तीन कारक निम्न हैं-

(i) कच्चा माल की आपूर्ति

(ii) शक्ति के साधनों की सुलब्धता

(iii) यातायात की सुविधा 

(iv) पूँजी।


3. नई औद्योगिक नीति के मुख्य बिंदुओं का वर्णन करें।

उत्तर ⇒ नई औद्योगिक नीति के मुख्य बिंदु इस प्रकार से हैं –
(i) यह विश्वव्यापीकरण प्रक्रिया पर जोर देता है।
(ii) इससे निजीकरण को बढ़ावा मिला है।
(iii) इससे निवेश को बढ़ावा मिला एवं अधिक स्वतंत्रता के कारण विदेशी कंपनियाँ भारत आई हैं।


4. कृषि आधारित उद्योग किसे कहते हैं ?

उत्तर ⇒वे सभी उद्योग जिनके लिए कच्चे माल कृषि क्षेत्र से प्राप्त होता है, कृषि आधारित उद्योग कहलाता है जैसे—चीनी उद्योग।


5. सार्वजनिक उद्योग किसे कहते हैं ?

उत्तर ⇒वे समस्त उद्योग जिनका संचालन सरकार स्वयं करती है, सार्वजनिक उद्योग कहलाते हैं। जैसे—दुर्गापुर, भिलाई एवं राउरकेला का कारखाना।


6. वस्त्र उद्योग का अर्थव्यवस्था में क्या योगदान है ?

उत्तर ⇒ भारत में वस्त्र उद्योग का औद्योगिक उत्पादन में 14 प्रतिशत, विदेशी मुद्रा में 17 प्रतिशत एवं सकल घरेलू उत्पादन में 4 प्रतिशत है। यह 3.5 करोड़ लोगों को रोजगार प्रदान करता है। वस्त्र उद्योग कृषि के बाद रोजगार उपलब्ध कराने वाला दूसरा बड़ा क्षेत्र है।


7. संयुक्त अथवा सहकारी उद्योग क्या है ?

उत्तर ⇒ जब उद्योगों को दो या दो से अधिक व्यक्तियों या सहकारी समितियों की सहायता से चलाया जा रहा हो तो उसे संयुक्त अथवा सहकारी उद्योग कहते हैं। गुजरात का अमूल दूध उद्योग इसी का एक उदाहरण है।


8. सार्वजनिक और निजी उद्योग में अन्तर स्पष्ट करें।

उत्तर ⇒ सार्वजनिक उद्योग-ऐसे उद्योग जिसके संचालन की जिम्मेवारी सरकार के हाथ में होती है। जिसमें प्रायः भारी उद्योग एवं आधारभूत उद्योग को सम्मिलित किया जाता है। दुर्गापुर, भिलाई, राउरकेला, बोकारो जैसे इस्पात उद्योग सार्वजनिक उद्योग के उदाहरण हैं।
निजी उद्योग ऐसे उद्योग का स्वामित्व किसी व्यक्ति विशेष या सहकारी समिति के हाथ में होता है निजी उद्योग कहलाते हैं, जैसे. टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी, जमशेदपुर इसी प्रकार का कारखाना है।


9. सूती वस्त्र उद्योग की प्रमुख समस्याएँ क्या है ?

उत्तर ⇒सूती वस्त्र उद्योग की समस्याएँ निम्नलिखित हैं –

(i) पुरानी मिलों में पुरानी प्रौद्योगिकी का प्रयोग।
(ii) उत्तम कपड़ों का उत्पादन बढ़ाने में उदासीनता।
(iii) कृत्रिम कपड़ों की माँग का बढ़ना।
(iv) विद्युत आपूर्ति में बाधा।
(v) राजनीतिक माहौल का बिगड़ना, कारखाने में हड़ताल होना।
(vi) कर्मचारियों के समयानुकूल प्रशिक्षण और आधुनिक तकनीकों की जानकारी देने की व्यवस्था न होने के कारण उत्पाद की गुणवत्ता और मात्रा प्रभावित होती है।


10. औद्योगिक क्षेत्रों में पर्यावरण प्रदूषण रोकथाम हेतु कोई तीन उपयुक्त सुझाव दें।

उत्तर ⇒औद्योगिक क्षेत्रों में पर्यावरण प्रदूषण की रोकथाम के लिए तीन मुख्य सुझाव हैं-

(i) कारखानों में ऊँची चिमनियों को लगाना एवं चिमनियों में प्रदूषक पदार्थों को अलग करनेवाले उपकरणों को लगाना चाहिए।
(ii) अपशिष्ट पदार्थों को शोधित कर पानी में गिराना चाहिए तथा गंदे मल-जल का शोधन कर पुनः उद्योग लायक बनाया जाना चाहिए।
(iii) ध्वनि प्रदूषक नियंत्रण यंत्र का प्रयोग करना चाहिए।


11. स्वामित्व के आधार पर उद्योगों को उदाहरण सहित वर्गीकृत कीजिए।

उत्तर- स्वामित्व के आधार पर उद्योगों को निम्न वर्गों में वर्गीकृत किया जाता कीजिए-

(i) सार्वजनिक क्षेत्र का उद्योग – भिलाई लौह इस्पात उद्योग, भारत हेवी इलेक्ट्रीक लिमिटेड (BHEL)
(ii) निजी क्षेत्र का उद्योग – टाटा लौह-इस्पात उद्योग।
(iii) सहकारी क्षेत्र का उद्योग – दक्षिण भारत की अधिकतर चीनी मिलें।
(iv) संयुक्त क्षेत्र का उद्योग – ऑयल इण्डिया लिमिटेड।


12. सिले-सिलाए वस्त्रों का उद्योग कहाँ विकसित है ?

उत्तर ⇒तैयार वस्त्रों का उद्योग हलके उद्योग के रूप में पूरे भारत में फैला हुआ है। जयपुर, सूरत, लखनऊ, लुधियाना, श्रीनगर, कोलकाता में इसका सर्वाधिक प्रसार हुआ है। मेरठ, मुरादाबाद, आगरा, बुलंदशहर इत्यादि में होजरी एवं सिले-सिलाये वस्त्र के लिए प्रसिद्ध है।


13. वैश्वीकरण का लघु उद्योगों पर क्या प्रभाव पड़ा है ?

उत्तर ⇒वैश्वीकरण के कारण देशी एवं लघु उद्योगों के सामने एक कड़ी चुनौती खड़ी हो गई जिससे उन्हें अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ा। आज मध्यम तथा उच्च वर्ग के लोग ब्रांड वाले वस्तुओं को अधिक खरीदते हैं। परिणामस्वरूप उद्योग या तो बंद हो गये हैं या फिर भारी मात्रा में कर्मचारियों की छटनी की है। अतः हम कह सकते हैं कि इसका विपरीत प्रभाव पड़ा है।


14. अल्युमिनियम उद्योग की स्थापना के लिए सस्ती विद्युत आपूर्ति आवश्यक है, क्यों ?

उत्तर ⇒प्रति टन अल्युमिनियम निर्माण के लिए 18,600 किलोवाट विद्युत की आवश्यकता पड़ती है। जब अल्युमिनियम तैयार किया जाता है तो उसके कुल खर्चे का 30 से 40 प्रतिशत तक विद्युत पर होती है। इससे स्पष्ट है कि इस उद्योग के लिए सस्ती विद्युत आपूर्ति अतिआवश्यक है।


15. बहुराष्ट्रीय कंपनी किसे कहते हैं ?

उत्तर ⇒ऐसी कंपनियाँ जो किसी एक देश में स्थित मुख्यालय से अनेक देशों में उत्पादन और सेवाओं का नियंत्रण करती है और अरबों रुपयों की पूँजी वाली हो बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ कहलाती हैं। नोकिया, पेप्सी इत्यादि इसके उदाहरण है।

16. भारत में रेडिमेड वस्त्र पार्क की स्थापना क्यों की गई ?

उत्तर ⇒भारत में रेडिमेड कपड़ों के निर्यात को प्रोत्साहित करने के लिए तमिलनाडु में तिरुपुर के एट्टीवरम्पलायम गाँव में देश का पहला रेडिमेड वस्त्र पार्क .. स्थापित किया गया है।


17. उपभोक्ता उद्योग से आप क्या समझते हैं ?

उत्तर ⇒ ऐसे उद्योग जो उत्पादन उपभोक्ता के सीधे उपयोग के लिए आते हैं, उपभोक्ता उद्योग कहलाते हैं, जैसे दंतमंजन, कागज, पंखा इत्यादि।


18. भारत में पटसन (जूट) उद्योग को कौन-कौन सी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है ? किन्हीं तीन का वर्णन करें।

उत्तर ⇒समस्याएँ-

(i) जूट से बने कालीनों तथा टाट-बोरियों की माँग निरतर कम हो रही है।
(ii) जूट से बनी वस्तुओं का मूल्य अधिक होता है। इसलिए नियात बाजार में इन्हें कड़ी प्रतियोगिता का सामना करना पड़ता है।
(iii) कृत्रिम धागा सबन सामान के बढ़ते हुए प्रचलन ने भी जूट उद्योग के लिए समस्या उत्पन्न कर दी है।


19. पसमीना ऊन किस प्रकार तैयार होता है ?

उत्तर ⇒पसमीना ऊन एक विशेष नस्ल की बकरियों के बालों (रोए) से तैयार किया जाता है, जो बहुत ही नरम एवं मुलायम होता है और बहुत गरमी देता है।


20. तापीय प्रदूषण क्या है ?

उत्तर ⇒जब उद्योगों तथा तापघरों से गर्म पानी को बिना ठंढा किए ही नदियों तथा तालाबों में छोड़ दिया जाता है, तो जलीय जीव-जंतु मरने लगते हैं, इस प्रकार से उत्पन्न प्रदूषण तापीय प्रदूषण कहलाता है। इसकी वजह से सबसे ज्यादा प्रभावित सूक्ष्म जीव-जंतु एवं जलीय वनस्पतियाँ होती है जो सीधे जलकर नष्ट हो जाती हैं।


21. झारखंड और पश्चिम बंगाल में लोहा इस्पात के कारखाने कहाँ-कहाँ स्थापित हैं ? किसी एक की सुविधाओं का उल्लेख करें।

उत्तर ⇒झारखंड में जमशेदपुर और बोकारो में लोहा-इस्पात का कारखाना स्थापित है। पश्चिमी बंगाल में कुल्टी, बर्नपुर और दुर्गापुर में लोहा-इस्पात के कारखाने स्थापित हैं।

जमशेदपुर के लोहा-इस्पात कारखाने को प्राप्त सुविधाएँ-

(i) लौह-अयस्क की आपूर्ति नोआमंडी, सुलेपत, गुरुमहिसानी और बदाम पहाड़ी से होती है।
(ii) कोयला की प्राप्ति झरिया और रानीगंज से होती है।
(iii) वीरमित्रापुर और पानपोश की खानों से चूना-पत्थर और डोलोमाइट की प्राप्ति होती है।
(iv) स्वर्ण रेखा और खरकई नदियों से जल की प्राप्ति की जाती है।
(v) कोलकाता-मुंबई रेलमार्ग पर होने से यातायात सुविधा उपलब्ध है।


22. पश्चिम बंगाल में जूट उद्योग किस क्षेत्र में विकसित है ?

उत्तर ⇒पश्चिम बंगाल में अधिकांश मिलें हुगली नदी के किनारे पर 98 किलोमीटर लंबी तथा 3 किलोमीटर एक संकरी मेखला में स्थित है।


23. लौह एवं इस्पात उद्योग को आधारभूत उद्योग क्यों कहा जाता है ?

उत्तर ⇒लौह एवं इस्पात उद्योग की सहायता से ही सभी उद्योगों को मशीने एवं संरचना प्राप्त होती है, इसी पर सभी हलके एवं भारी उद्योग निर्भर करते हैं। इसे अन्य उद्योगों का जनक भी कहा जाता है।

परिवहन, संचार एवं व्यापार

1. संचार किसे कहते हैं ?

उत्तर ⇒ संदेशों के आदान-प्रदान को संचार कहते हैं। इसके माध्यम से किसी सूचना एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँचाया जाता है। दूरभाष, इंटरनेट, पत्र इत्यादि इसके उदाहरण हैं।


 2. जनसंचार के दो महत्त्वपूर्ण माध्यम कौन-से हैं ?

उत्तर ⇒ जनसंचार एक ऐसा माध्यम है, जिसकी सहायता से हम घर बैठे-बैठे संदेशों का आदान-प्रदान कर लेते हैं। वर्तमान समय में जनसंचार के दो महत्त्वपूर्ण माध्यम है—इलेक्ट्रॉनिक माध्यम जिसमें रेडियो, टेलीविजन, फिल्म, कम्प्यूटर इत्यादि को शामिल किया जाता है, दूसरी ओर मुद्रण माध्यम है जिसमें समाचार पत्र, पत्रिकाएँ, पुस्तक इत्यादि को शामिल करते हैं।


3. भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सूचना प्रौद्योगिकी का क्या महत्त्व है ?

उत्तर ⇒

(i) इसने 10 लाख से अधिक लोगों को रोजगार दिए हैं।
(ii) यह उद्योग विदेशी मुद्रा प्राप्त करने का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत बन गया है।
(iii) इसने सेवा क्षेत्र के विकास में मदद की है।
(iv) इसने महिलाओं को रोजगार दिए हैं।


4. भारत में कौन-कौन से राज्यों ने पर्यटन को उद्योग का दर्जा दिया है ?

उत्तर ⇒ जम्मू-कश्मीर एवं पंजाब ने तो पहले से ही पर्यटन को उद्योगों का दर्जा देया है। अन्य राज्य भी इस दिशा में प्रयास कर रहे हैं क्योंकि इससे राज्यों को आर्थिक लाभ प्राप्त होती है।


5. वायु परिवहन का क्या लाभ है ?

उत्तर ⇒ वायु परिवहन एक ऐसा परिवहन साधन है जिसके द्वारा जंगल, पठार, नदी, झील, सागर सभी को पार किया जा सकता है एवं यात्रा भी तीव्र एवं अत्यंत सुखद होती है।


6. आयात तथा निर्यात में क्या अंतर है ?

उत्तर ⇒ जब कोई सामान दूसरे या बाहरी देशों से अपने देश में मँगाया जाता है, तब इसे आयात कहते हैं। जब कोई सामान अपने देश से दूसरे या बाहरी देशों को भेजा जाता है, तब इसे निर्यात कहते हैं। ये दोनों विदेश व्यापार की प्रक्रियाएँ हैं।


7. भारत के अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व के चार पत्तनों का उल्लेख करें।

उत्तर ⇒ भारत का अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का लगभग 95% माल का परिवहन समुद्री रास्ते से होता है। अर्थात् पत्तन अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के मार्ग हैं। इनमें चार महत्त्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय पत्तन निम्नलिखित हैं-

कोलकाता पत्तन – कोलकाता पत्तन कृषि, खनिज तथा औद्योगिक उत्पादों के व्यापार के चलते भारत का सबसे बड़ा और व्यस्त पत्तन है।
मुंबई पत्तन – मुंबई पत्तन स्वेज नहर के समुद्री मार्ग के सामने पड़ने के कारण विकसित है। यह वृहत औद्योगिक केंद्र और महानगर के रूप में भी विकसित है। आज सबसे अधिक विदेशी व्यापार इसी पत्तन से हो रहा है।
विशाखापत्तनम – यह समीपवर्ती लौह-अयस्क के निर्यात के लिए विकसित हुआ है। यहाँ जलयान-निर्माण आदि कई उद्योग स्थापित हैं।
पाराद्वीप–इसका निर्माण उड़ीसा तट पर कोलकाता का व्यापार-भार कम करने के लिए किया गया है। इस क्षेत्र से लौह-अयस्क के व्यापार के लिए विकसित किया गया है।


8. वायु परिवहन की प्रमुख विशेषताओं को लिखें।

उत्तर ⇒ वायु परिवहन की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं –

(i) यह यातायात का सबसे तीव्रगामी साधन है।
(ii) इसके लिए मार्ग का निर्माण और रख-रखाव नहीं करना पड़ता है।
(iii) अत्यधिक ऊँचाई पर उड़ने के कारण इसे प्राकृतिक बाधाओं का सामना नहीं करना पड़ता है। इससे पहाड़ों, मरुस्थलों, गहरे महासागरों और घने वनों को आसानी से पार कर लिया जाता है।
(iv) परिवहन के अन्य साधनों की अपेक्षा इसका मार्ग छोटा होता है। इस कारण समय की बचत होती है


9. भारत में पवन हंस के द्वारा किस प्रकार की सेवा दी जा रही है ?

उत्तर ⇒ पवन हंस के द्वारा दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों में हेलिकॉप्टर सेवा उपलब्ध कराई जा रही है। यह मुख्यतः पेट्रोलियम के उत्पादन में सहायता प्रदान करने के लिए तेल एवं प्राकृतिक गैस आयोग को हेलिकॉप्टर सेवा प्रदान करती रही है। जम्मू से वैष्णवदेवी तथा देहरादून से बद्रीकाश्रम के लिए भी यह सेवा प्राप्त है।


10. राष्ट्रीय राजमार्ग क्या हैं? उनका महत्त्व क्या है ?

उत्तर ⇒ ये प्राथमिक सड़क तंत्र हैं जिनका निर्माण व रख-रखाव केंद्रीय लोक निर्माण विभाग के अधिकार क्षेत्र में हैं। ये सड़कें राज्य की राजधानियों, बड़े शहर तथा महत्त्वपूर्ण पत्तनों को आपस में जोड़ती हैं।
महत्त्व-
(i) राष्ट्रीय राजमार्गों के माध्यम से आवश्यक वस्तुएँ उपलब्ध होते हैं। इन्हीं के कारण एक राज्य का दूसरे राज्य से व्यापार संभव है।
(ii) सभी आवश्यक वस्तुओं, जैसे – कच्चा माल, तैयार माल, सब्जियाँ, खाद्यान्न आदि की ढुलाई इन्हीं मार्गों के द्वारा होती है।


11. भारत में सड़कों के प्रादेशिक वितरण का वर्णन प्रस्तुत कीजिए।

उत्तर ⇒ भारत में सड़कों के प्रादेशिक वितरण में काफी विषमता है। पक्की सड़कों के वितरण को देखा जाए तो महाराष्ट्र का स्थान प्रथम है। उत्तरप्रदेश दूसरे और उड़ीसा तीसरे स्थान पर है। लक्षद्वीप में सबसे कम पक्की सड़क पायी जाती है। सड़क घनत्व की दृष्टि से केरल, गोवा और उड़ीसा पहले, दूसरे और तीसरे स्थान पर है।


12. कोंकण रेलमार्ग परियोजना का वर्णन करें।

उत्तर ⇒ यह देश के पश्चिमी तट के किनारे महाराष्ट्र के रोहा से गोआ के मडगाँव तक जाती है। इस परियोजना की व्यवस्था कोंकण रेलवे निगम द्वारा की गई है। यहाँ नियमित यात्री रेल सेवा प्रारम्भ की जा चुकी है। इसकी लम्बाई 741 कि०मी० है।


13. ‘पूरब-पश्चिम एवं उत्तर-दक्षिण गलियारा’ से आप क्या समझते हैं ?

उत्तर ⇒ पूरब में सिलचर और पश्चिम में पोरबंदर को जोड़नेवाली सड़क को ‘पूरब-पश्चिम गलियारा’ कहते हैं। इसकी लम्बाई 3640 कि०मी० है। उत्तर में श्रीनगरऔर दक्षिण में कन्याकुमारी को जोड़नेवाली सड़क को उत्तर-दक्षिण गलियारा कहते हैं। इसकी कुल लम्बाई 4016 कि०मी० है।


14. राष्ट्रीय महामार्ग क्या है ?

उत्तर ⇒ राष्ट्रीय महत्त्व की सड़कों को राष्ट्रीय महामार्ग कहा जाता है। वे एक राज्य को दूसरे राज्य से मिलाती हैं। इनका निर्माण कार्य एवं रख-रखाव केंद्रीय सरकार करती है।


15. सीमांत सड़क किसे कहा जाता है ?

उत्तर ⇒ देश की सीमा पर रक्षा एवं विदेश व्यापार के लिए भारतीय सीमा सड़क संगठन द्वारा सड़कों को बनाया जाता है जिसे सीमांत सड़क कहते हैं।


16. ‘स्वर्णिम चतुर्भुज राजमार्ग’ का वर्णन करें।

उत्तर ⇒ भारत के चार प्रमुख महानगरों दिल्ली, मुम्बई, चेन्नई तथा कोलकाता को जोड़नेवाली राजमार्ग को स्वर्णिम चतुर्भुज राजमार्ग कहते हैं। इसका दायित्व केन्द्र सरकार पर है और यह 6 लेनवाली लगभग 5846 कि०मी० लम्बी सड़क है।


17. एशिया का पहला निर्यात संवर्द्धन क्षेत्र कहाँ बनाया गया ?

उत्तर ⇒ यह भारत में कांडला नामक स्थान पर बनाया गया। जो गुजरात राज्य में स्थित है। इससे देश की आर्थिक प्रगति तीव्र हुई है।


18. भारत के पूर्वी तट पर मुख्य पत्तन कौन-कौन से हैं ?

उत्तर ⇒ भारत के पूर्वी तट पर प्रमुख पत्तन हैं—चेन्नई, तुतीकोरीन, विशाखापत्तनम, पारादीप एवं हल्दिया-कोलकाता पत्तन। इसमें कोलकाता एक नदी पत्तन है।


19. राजधानी चैनल क्या है ?

उत्तर ⇒ भारत की राजधानी नई दिल्ली से 6 विशेष राज्यों की राजधानियों के लिए यह डाक सेवा है। इसके लिए पीले रंग की पेटियों का उपयोग किया जाता है। अर्थात् पीले रंग की पेटियों में डाले गए पत्र सीधे दिल्ली भेज दी जाती है।


20. पाइपलाइन मार्ग का उपयोग कहाँ होता है ?

उत्तर ⇒ पाइपलाइन मार्ग का उपयोग तरल पदार्थों जैसे जल, पेट्रोलियम, गैस इत्यादि के परिवहन के लिए होता है। गुजरात के हजीरा नामक स्थान पर इसी के माध्यम से कारखानों में गैस का परिवहन होता है।


21. पाइपलाइनों की जंग से सुरक्षा किस प्रकार की जाती है ?

उत्तर ⇒ पाइपलाइन बिछाने के पहले स्टील पाइप को बिटुमिन की एक परत से ढंक दिया जाता है। फिर उसके ऊपर ग्लास फाइबर की परत चढ़ा दी जाती है। इससे पाइप की जंग से रक्षा हो जाती है।


22. भारत की निर्यात एवं आयात वाली वस्तुओं का उल्लेख करें।

उत्तर ⇒ भारत की निर्यात वाली वस्तुएँ—इंजीनियरिंग सामान, पेट्रोलियम उत्पाद, रत्न-आभूषण, रसायन उत्पाद, वस्त्र, कृषि आधारित उत्पाद, अयस्क एवं खनिजआदि। भारत की आयात वाली वस्तुएँ-पेट्रोलियम एवं पेट्रोलियम उत्पाद, मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक सामान, सोना और चाँदी, उर्वरक एवं रसायन, अलौह धातु आदि।


23. भारत में डाक सेवा कब और किसके द्वारा शुरू की गई ?

उत्तर ⇒ भारत में इसकी शुरुआत 1837 ई० में ईस्ट इंडिया कंपनी के द्वारा हुई श्री। परंतु सन् 1854 ई० में भारतीय डाक विभाग की स्थापना की गई।


24. गुजरात के हजीरा गैस पाइप लाइन का क्या आर्थिक महत्त्व है ?

उत्तर ⇒ गुजरात में हजीरा से शुरू होने वाली गैस पाइप लाइन, मध्यप्रदेश में विजापुर होकर उत्तरप्रदेश के जगदीशपुर तक जाती है। इसे हजीरा-बीजापुर-जगदीशपुरअथवा एच०बी०जे० गैस पाइप लाइन के नाम से शाखाएँ राजस्थान कोटा तक फैली हुई हैं। इसके माध्यम से वहाँ विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों में गैसें पहुँचाई जाती है, इस प्रकार इन क्षेत्रों के आर्थिक विकास में इसका एक महत्त्वपूर्ण स्थान है।


25. ‘पिनकोड’ से आप क्या समझते हैं ?

उत्तर ⇒ डाक विभाग ने अपने पत्र वितरण कार्य में तेजी और सुधार लाने के लिए पूरे देश को 8 डाक क्षेत्रों में बाँटा है। 6 अंक वाले इस अंक में पहला अंक जोन के लिए, बाद के दो अंक उपजोन के लिए और अंतिम तीन अंक गंतव्य डाकघर के लिए निर्धारित किए गए हैं। इन्हें ‘पिनकोड’ कहा जाता है।


26. व्यापार संतुलन से क्या समझते हैं ? अनुकूल व्यापार संतुलन और प्रतिकूल व्यापार संतुलन में क्या अंतर है ? स्पष्ट करें।

उत्तर-आज कोई भी देश अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के बिना प्रगति नहीं कर सकता है। क्योंकि साधनों की उपलब्धता असमान है। इसलिए व्यापार आवश्यक हो जाता है। व्यापार के दो पहलू हैं (i) आयात (ii) निर्यात। आयात और निर्यात का अन्तर देश के व्यापार संतुलन को निर्धारित करता है। जब निर्यात मूल्य आयात मूल्य से अधिक होता है तो उसे अनुकूल व्यापार संतुलन कहा जाता है। दूसरी ओर जब निर्यात का मूल्य आयात मूल्य से कम होता है तब उसे व्यापार का प्रतिकूल संतुलन कहते हैं।


27. पटरियों के बीच दूरी के अनुसार रेलमार्गों को किस प्रकार बाँटा गया है ?

उत्तर ⇒ पटरियों के बीच दूरी के अनुसार इस समय भारत में तीन प्रकार के रेलमार्ग हैं –
(i) बड़ी लाइने या ब्राडगेज-74% रेल लाइने इसी प्रकार की हैं।
(ii) छोटी लाइने या स्मालगेज—21% रेल लाइने इसी प्रकार की हैं।
(iii) संकरी लाइने–5% लाइने इस प्रकार की हैं।


28. स्थानीय व्यापार और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में अंतर स्पष्ट करें।

उत्तर ⇒ किसी देश का व्यापार उसकी आर्थिक प्रगति का द्योतक एवं सभ्यता के विकास का मापदंड होता है। यदि एक देश में एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र या एक राज्य से दूसरे राज्य में वस्तुओं का लेन-देन या व्यापार होता है तो उसे स्थानीय व्यापार कहा जाता है। परंतु दूसरी ओर जब दो देशों के बीच वस्तुओं का लेन-देन या व्यापार होता है तो उसे अंतर्राष्ट्रीय व्यापार कहा जाता है। इसमें परिवहन का माध्यम स्थल मार्ग, जलमार्ग या वायुमार्ग कोई भी हो सकता है।


29. दक्षिण भारत के किस राज्य में रेलमार्ग की सघनता पायी जाती है ? और क्यों ?

उत्तर ⇒ दक्षिण भारत के महाराष्ट्र राज्य में रेलमार्ग की सघनता पायी जाती है। इसका कारण यह है कि यहाँ समतल उपजाऊ भूमि अधिक पायी जाती है। वहा कृषि के अतिरिक्त खनिज पर आधारित उद्योग भी बहुत ही विकसित हैं। तटीय मैदान होने के कारण विदेशी व्यापार की सुविधाएँ भी प्राप्त हैं। मुंबई बन्दरगाह से विदेशों में आने जाने की सुविधा भी है। अत: इन्हीं कारणों से वहाँ रेलमार्ग की सघनता पायी जाती है।


30. एयर इंडिया तथा इंडियन एयरलाइंस की सेवाओं में क्या अंतर है ?

उत्तर ⇒ एयर इंडिया अंतर्राष्ट्रीय वायु सेवा प्रदान करती है। यह भारत से विश्व के अधिकतर देशों के लिए उड़ाने भरती है। इसके द्वारा यात्री एवं वस्तुओं दोनों का परिवहन होता है। भारत का 103 देशों के साथ द्विपक्षीय विमान सेवा समझौता है।
इंडियन एयरलाइंस जिसे इंडियन भी कहा जाता है वह घरेलू सेवाएँ उपलब्ध कराती हैं। घरेलू उड़ानों के अलावा यह नेपाल, भूटान, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, म्यंमार के लिए भी वायु सेवाएँ प्रदान करता है।

बिहार : कृषि एवं वन संसाधन

1. बिहार की कृषि संबंधी किन्हीं तीन समस्याओं का उल्लेख करें।

उत्तर ⇒ बिहार में कृषि संबंधी तीन समस्याएँ निम्नलिखित हैं –

(i) सिंचाई की समस्या – बिहार की कृषि, मानसून पर निर्भर है। यहाँ न तो नहरों का पूर्णतः विकास हुआ है और न ही विद्युत संचालित नलकूप का।
(ii) खेतों का छोटा आकार – बिहार में सामाजिक कारणों से खेतों का आकार छोटा हो रहा है। परिवार में विभाजन होते ही खेतों का विभाजन हो जाता है। छोटे खेत को यंत्रों से जुताई एवं सिंचाई काफी महँगी एवं कठिन होती है।
(iii) उन्नत किस्म के कृषि यंत्रों का अभाव- बिहार में ज्यादातर किसान सीमांत एवं लघु है पूँजी की कमी के कारण ये उन्नत किस्म के कृषि यंत्र खरीदने में असमर्थ है।


2. बिहार की मुख्य फसलें क्या हैं ?

उत्तर ⇒ बिहार की प्रमुख फसलों में धान, गेहूँ, मकई, गन्ना, तम्बाकू, महुआ, ज्वार, दलहन और तिलहन हैं।


3. बिहार में धान की फसल के लिए उपयुक्त भौगोलिक दशाओं का उल्लेख करें।

उत्तर ⇒ बिहार में धान की फसल के लिए भौगोलिक दशाएँ –

(i) उष्णार्द्र जलवायु
(ii) तापमान 22°C-32°C के बीच
(iii) वर्षा-150 cm से 200cm के बीच
(iv) मिट्टी—जलोढ़ चिकनी
(v) बोआई-जून से अगस्त, कटाई-सितंबर से नवंबर


4. बिहार में गेहूँ के पाँच प्रमुख उत्पादक जिलों का नाम लिखें।

उत्तर ⇒ बिहार में गेहूँ उत्पादन करने वाले जिले हैं दरभंगा, रोहतास, गया, सीवान, सारण, भोजपुर और औरंगाबाद।


5. बिहार में दलहन के उत्पादन एवं वितरण का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत कीजिए।

उत्तर ⇒ बिहार में दलहन के फसलों में चना, मसूर, खेसारी, मटर, मूंग, अरहर, उरद तथा कुरथी प्रमुख हैं। इनमें अरहर एवं मूंग खरीफ दलहन है। जबकि शेष सभी रबी फसल है। 2006-07 के आँकड़े के अनुसार यहाँ रबी दलहन की खेती 519.6 हजार हेक्टेयर भूमि पर की गयी जिससे 372 हजार मैट्रिक टन दलहन उत्पादित हुआ जबकि खरीफ दलहन की खेती 87.26 हजार हेक्टेयर में किया गया और इससे 74 हजार मैट्रिक टन दलहन का उत्पादन हुआ। दलहन उत्पादन जिलों में पटना, औरंगाबाद एवं कैमूर प्रमुख है।


6. बिहार में जूट उद्योग पर टिप्पणी लिखें।

उत्तर ⇒ बिहार के उत्तरी-पूर्वी भागों में जूट उद्योग के विकास के लिए आवश्यक दशाएँ उपलब्ध हैं। इस क्षेत्र में अधिक वर्षा, उच्च आर्द्रता, अधिक तापमान, जलोढ़ मिट्टी और बाढ़ग्रस्त खादर का मैदान जूट की खेती के लिए आदर्श भौगोलिक दशा उत्पन्न करते हैं। अतः पूर्णिया, कटिहार, किशनगंज, अररिया, समस्तीपुर आदि जिले जूट उत्पादन के लिए प्रसिद्ध हैं। इनमें कटिहार जूट मिल्स लिमिटेड, समस्तीपुर की रामेश्वर जूट मिल्स और नालन्दा की मौर्य जूट इण्डस्ट्रीज प्रा० लि. विशेष उल्लेखनीय हैं।


7. अगहनी फसल किसे कहा जाता है ?

उत्तर ⇒ यह फसल मध्य जून से अगस्त तक लगाई जाती है तथा नवंबर-दिसंबर तक काट ली जाती है। यह बिहार में सर्वाधिक प्रचलित फसल है। धान, अरहर गन्ना इत्यादि इसके मुख्य पैदावार हैं।


8. बिहार में जूट का उत्पादन किन-किन जिलों में होता है ?

उत्तर ⇒ पूर्णिया, कटिहार, मधेपुरा, किशनगंज, सहरसा, दरभंगा और समस्तीपर जिलों में जूट का उत्पादन मुख्य रूप से होता है।


9. बिहार में अभ्रक कहाँ-कहाँ मिलता है ? इसका क्या उपयोग है।

उत्तर ⇒ बिहार में अभ्रक झारखंड की सीमावती क्षेत्रों में नवादा जमई – जिलों में पाये जाते हैं। यहाँ का अभ्रक सर्वोच्च कोटि का है। इसका अधिकतर उपयोग विद्युत कुचालक होने के कारण विद्युत उपकरण निर्माण में होता है। इसके अलावे वस्त्र निर्माण, रंग-रोगन, गुलाल-अबीर में इसका उपयोग होता है।


10. बिहार की प्रमुख दलहन फसलों के नाम बताएँ और उत्पादक जिलों का नाम लिखें।

उत्तर ⇒ -बिहार की प्रमुख दलहन फसलें हैं चना, मटर, मसूर, खेसारी, अरहर मूंग और उड़द। चना की खेती मुख्य रूप से बाँका, भागलपुर और लखीसराय जिलों में की जाती है। मूंग-मसूर की खेती मुंगेर, शेखपुरा, लखीसराय और भागलपुर जिले में होती है। खेसारी का उत्पादन पूर्णिया, कटिहार, सुपौल, सहरसा, अररिया एवं शिवा | जिलों में की जाती है। अरहर की खेती पूर्वी चंपारण, गोपालगंज तथा मुजफरपुर जिलों में की जाती है।


11. बिहार में रेल-परिवहन की शुरुआत कब हुई ?

उत्तर ⇒ बिहार में रेल-परिवहन की शुरुआत ब्रिटिश युग में 1860 ई० में हुई। ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1860-62 की अवधि में गंगा के किनारे कोलकाता तक पहली रेल लाइन बिछाया। यह रेलमार्ग राजमहल, भागलपुर, जमालपुर, पटना, आरा और बक्सर होते हुए मुगलसराय तक बनाया गया।


12. बिहार में नहरों के विकास से संबंधित समस्याओं को लिखिए।

उत्तर ⇒ बिहार में नहरों के विकास की निम्नलिखित समस्याएँ हैं –

(i) राज्य सरकार की उदासीनता,
(ii) नहर विकास हेतु पूँजी का अभाव,
(iii) बारहमासी नदियों का अभाव,


13. बिहार में वन संपदा की वर्तमान स्थिति का वर्णन करें।

उत्तर ⇒ विभाजन के बाद बिहार वन-सम्पदा में निर्धन हो गया। इस प्रदेश के 6,21,635 हेक्टेयर या 6216 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में ही जंगल फैले हुए हैं। जो प्रदेश के कुल क्षेत्रफल का केवल 6.60 प्रतिशत है। यह देश के औसत 19 प्रतिशत वन-क्षेत्र की तुलना में बहुत कम है। बिहाई में वनों का वितरण बहुत ही असमान है। इस प्रदेश के अधिकांश वन दक्षिणी पठारी भागों एवं उत्तरी-पश्चिमी उप-हिमालय क्षेत्र में ही फैले हुए हैं। मैदानी भाग के बहुत से जिले की दशा दयनीय है। पर्यावरण-संतुलन के लिए अनुसंशित 33 प्रतिशत वन-क्षेत्र से बहुत कम है।


14. उत्तर बिहार की नदियाँ दक्षिण बिहार की नदियों से किस प्रकार भिन्न है ? स्पष्ट करें।

उत्तर ⇒ उत्तर बिहार की गंडक, बागमती, कमला-बलान, कोसी, महानंदा आदि नदियाँ हिमालय से निकलकर गंगा नदी में गिरती है। यह सब गंगा की सहायक नदी कहलाती है। ढाल की तीव्रता के कारण इन नदियों में तेज धारा होती है। हिमालय के बर्फ पिघलने से और अधिक वर्षा के कारण बाढ़ की स्थिति बनी रहती है। इन नदियों में वर्ष भर जल बहाव होता रहता है। कोसी नदी को ‘बिहार का शोक’ कहा जाता था परंतु अब इस पर बाँध बनाकर इसे नियंत्रित किया गया है।


15. बिहार में वन विनाश के दो मुख्य कारकों को लिखें।

उत्तर ⇒ वन विनाश के दो प्रमुख कारक हैं –

(i) मानव का हस्तक्षेप वन-सम्पदा के विनाश में सबसे महत्त्वपूर्ण कारण रहा है।
(ii) बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए कृषि-भूमि के विस्तार, मानव-अधिवास क्षेत्र के विकास तथा जलावन और फर्नीचर के लिए लकड़ी की आवश्यकताओं के कारण तो वनों का ह्रास हो रहा है।
(iii) कुछ नदियों द्वारा तीव्र मार्ग परिवर्तन,
(iv) केन्द्र सरकार की उपेक्षा आदि।


16. बिहार में जनसंख्या सभी जगह एक समान नहीं है। स्पष्ट करें।

उत्तर ⇒ बिहार राज्य की जनसंख्या एक समान नहीं है। जनसंख्या वितरण पर राज्य की धरातलीय उच्चावच का प्रभाव पड़ता है। बिहार के मैदानी क्षेत्रों में जहाँ कृषि, सिंचाई, उपजाऊ मिट्टी एवं नगरीकरण का प्रभाव है। वहाँ जनसंख्या अत्यंत घनी पायी जाती है। जबकि पहाड़ी, उर्वर मिट्टी का अभाव, सिंचाई की कमी आदि के कारण जनसंख्या विरल पायी जाती है। पटना, दरभंगा, गया, मुजफ्फरपुर जिलों में जनसंख्या घनी पायी जाती है। जबकि पश्चिमी चंपारण, बाँका, कैमूर जिलों में जनसंख्या कम घनी पायी जाती है।


17. बिहार के औद्योगिक पिछड़ेपन के किन्हीं चार प्रमुख कारणों का उल्लेख करें।

उत्तर ⇒ (i) बिहार के औद्योगिक पिछड़ापन का गाख कारण है – कच्च गाल की कमी। यहाँ खनिजों का अभाव है। इसके साथ-साथ गन्ना और जूट के अन्तर्गत कृषि क्षेत्र में कमी आने से इसके कच्चे माल की कमी है।
(ii) यहाँ संरचनात्मक सुविधाओं की कमी है। परिवहन, ऊर्जा, भण्डारण, की कमी के कारण उद्योगों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
(iii) पूँजी एवं तकनीक की कमी भी उद्योगों के पतन का प्रमुख कारण है।
(iv) विदेशी निवेश की कमी-प्रस्ताव MON पर समझौता हुआ परन्तु वास्तविक निवेश नहीं है उपभोक्ता का उद्योग में रुचि है जबकि आधारभूत उद्योगों में कोई रुचि नहीं है।


18. बिहार के पर्यटन उद्योग को संक्षिप्त जानकारी दें।

उत्तर ⇒ बिहार का पर्यटन उद्योग एक उभरता हुआ प्रमुख उद्योग है। इस राज्य में ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, धार्मिक तथा प्राकृतिक सौंदर्य के महत्त्ववाले कई पर्यटन स्थल हैं। राजधानी पटना सहित राज्य में गया, वैशाली, बोधगया, नालंदा, पावापुरी, सासाराम, मनेर, बिहारशरीफ, देव इत्यादि जैसे कुछ महत्त्वपूर्ण पर्यटन स्थल हैं फलस्वरूप 2003 में लगभग 60 देशी एवं 60 हजार से अधिक विदेशी पर्यटक आये। इनकी संख्या बढ़कर 2006 में क्रमश: एक करोड़ 94 हजार से ऊपर हो गई। इन पर्यटकों के आगमन से राज्य को अभूतपूर्व राजस्व की प्राप्ति हुई हैं।


19. बिहार में किस प्रकार की सड़कों का विस्तार अधिक है ?

उत्तर ⇒ राज्य में सबसे अधिक विस्तार ग्रामीण सड़कों का है। इसकी कुल लंबाई 83261.36 किमी० है। यह राज्य के कुल सड़कों का 77.46 प्रतिशत है।


20. बिहार की अधिकतर चीनी मिलें कहाँ स्थित हैं ?

उत्तर ⇒ बिहार की अधिकतर चीनी मिलें उत्तरी-पश्चिमी क्षेत्र में विकसित हैं। पश्चिमी चंपारण, पूर्वी चंपारण, सीवान, गोपालगंज और सारण जिले में चीनी मिलें केंद्रित हैं; क्योंकि यहाँ गन्ना अधिक उपजाया जाता है।


21. बिहार में सीमेंट उद्योग कहाँ-कहाँ स्थापित हैं ? वर्णन करें।

उत्तर ⇒ सीमेंट उद्योग अधात्विक खनिज पर आधारित उद्योग है। चूना- पत्थर इसका कच्चा माल है। सोन नदी के तट पर कैमूर की पहाड़ियों में चूना- पत्थर पर्याप्त मात्रा में मिलता है। अतः कल्याणपुर, बनजारी, जपला और डालमियानगर में सीमेंट के कारखाने हैं। वर्तमान में डालमियानगर में उत्पादन बंद है।


22. बिहार में जलविद्युत विकास पर प्रकाश डालें।

उत्तर ⇒ बिहार में जल विद्युत का विकास किया जा रहा है। यहाँ लगभग 44.10 मेगावाट जल विद्युत का उत्पादन डेहरी, बारूण, पश्चिमी चम्पारण, कटैया विद्युत केंद्रों से हो रहे हैं। इसके अतिरिक्त बिहार की अन्य नदियाँ गंडक, बागमती पर जल विद्युत केंद्र निर्माणाधीन हैं।


23 नई औद्योगिक नीति के मुख्य बिंदुओं का वर्णन कीजिए।

उत्तर ⇒ नई औद्योगिक नीति, 2006 के आने से वर्तमान राज्य सरकार द्वारा नए निवेशों को प्रोत्साहित करने के लिए उठाए गए कदम के बाद इस प्रक्षेत्र में काफी उत्साह बढ़ा है। राज्य में निवेश के 245 प्रस्ताव हुए हैं, जिनमें 57.84 हजार करोड रु० निवेश प्रस्तावित है। राज्य निवेश प्रोत्साहन बोर्ड इनमें से 115 प्रस्तावों को अनुमोदित भी कर चुका है, जिसमें कुल 40.72 हजार करोड़ रु० का निवेश प्रस्तावित है।


24. जमालपुर में किस चीज का वर्कशॉप है और क्यों प्रसिद्ध हैं ?

उत्तर ⇒ बिहार के मुंगेर जिला में जमालपुर में डीजल इंजन बनाया जाता है। यहाँ डीजल इंजन का सभी प्रकार का कार्य होता है। भारत के गैर विद्यतीकरण रेलवे क्षेत्रों में डीजल इंजन का उपयोग होता है। जमालपुर रेल इंजन से संबंधित वर्कशॉप कारखाना के रूप में विकास किया है।


25. गंगा के दक्षिणा के मैदान की मिट्टी का संक्षिप्त वर्णन करें।

उत्तर ⇒ गंगा के दक्षिणी मैदान में केवाली मिट्टी पायी जाती है। बक्सर, भोजपुर, राहतास, औरंगाबाद, जहानाबाद, पटना, नालंदा, बाढ, मुंगेर और भागलपुर के मैदानी भाग में बाँगर या परानी जलोढ मिट्टी पायी जाती है। कछ स्थानों पर तीन-चार महीने बाढ़ का पानी एकत्र हो जाने से विशाल ‘ताल’ का रूप ले लेता है। इसमें बड़हिया ताल सबसे बड़ा है। इसमें पानी सूखने पर दलहन की अच्छी उपज ली जाती है। ताल के ऊपर के क्षेत्र केवाली मिट्टी के हैं। इसमें समचित वर्षा के अभाव में सिंचाई का सहारा लिया जाता है और अच्छी उपज ली जाती है।


26. सोन-नदी घाटी परियोजना से उत्पादित जल विद्युत का वर्णन कीजिए।

उत्तर ⇒ सोन परियोजना के अन्तर्गत जलविद्युत उत्पादन के लिए दो शक्ति ग्रहों की स्थापना की गयी है। पहला पश्चिमी ऊँचे जल-पता की नहर पर डेहरी के समीप बनाया गया है, जिसकी उत्पादन क्षपता 6.6 मेगावाट है। दूसरा पूर्वी ऊंचे जल स्तर की नहर वारूण में बनाया गया है, जिसकी उत्पादन क्षमता 3.3 मेगावाट है।


27. बिहार में जल-परिवहन के विकास के लिए उपाए बताएं।

उत्तर ⇒ बिहार में जल-परिवहन के विकास के लिए जल की अपेक्षित गहराई बनाये रखने के लिए नदियों के तल की खदाई, नये किस्म के जलयानों को चलाना तथा विभिन्न नहरों को एक-दूसरे से जोड़ना आवश्यक है।


28. बिहार के किस भाग में सिंचाई की आवश्यकता है और क्यो ?

उत्तर ⇒ बिहार के किशनगंज, शिवहर, दरभंगा, अररिया, मधुवनी जिले सिंचित क्षेत्रों की दृष्टि से काफी पीछे है। इस जिलों की सिंचाई की आवश्यकता सर्वाधिक है। किशनगंज के 21.81% फसल क्षेत्र ही सिंचित है। इसके कारण इस क्षेत्र में कृषि में काफी पिछड़ा हुआ है। बिहार राज्य कृषि प्रधान राज्य है। ये राज्य बाढ़ प्रभावित
क्षेत्र है। यहाँ स्थायी सिंचाई की आवश्यकता काफी अधिक है।


29. बिहार में अत्यंत कम घनत्व वाले जिले कौन-कौन हैं ?

उत्तर ⇒ बिहार राज्य में अत्यंत कम घनत्व वाले जिले क्रमशः पश्चिमी चंपारण, बॉका, जमुई एवं कैमूर हैं। इन जिलों में जनसंख्या का घनत्व 600 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी० से भी कम है।


30. बिहार में किन स्थानों पर सर्वाधिक वर्षा होती है ?

उत्तर ⇒ बिहार के उत्तर-पूर्वी, पूर्वी एवं उत्तर-पश्चिमी भागों में सर्वाधिक वर्षा होती है। इसमें सबसे अधिक वर्षा किशनगंज जिले में होती है। इसके बाद कटिहार एवं प० चंपारण का स्थान आता है।


31. बिहार की कोई दो जल विद्युत परियोजनाओं के नाम लिखें।

उत्तर ⇒ बिहार की दो जल विद्युत परियोजनाएँ :

(i) पश्चिमी सोन नहर जल विद्युत परियोजना – जो डेहरी (रोहतास जिले) में सोन नहर पर बनी है।
(ii) कटैया जल विद्युत परियोजना — जो कोसी की सहायक कटैया नदी पर सुपौल जिले में स्थित है।


32. बिहार में रज्जू मार्गों का उपयोग कहाँ होता है ?

उत्तर ⇒ इसका उपयोग मुख्यतः राजगीर के गृद्धकूट पर्वत पर बौध शान्ति स्तूप पर. जाने के लिए रज्जू मार्ग का विकास किया गया है। इसका निर्माण सन् 1972 में जापान सरकार द्वारा की गई थी।


33. बिहार में रेशमी वस्त्रों का उद्योग कहाँ विकसित है ?

उत्तर ⇒ बिहार में रेशमी वस्त्र उद्योग का विकास मुख्य रूप से भागलपुर एवं उसके आस-पास के इलाकों में हुआ है। उद्योग के विकास के लिए हस्तकरघा एवं रेशमी वस्त्र निदेशालय की स्थापना की गई है । भागलपुर के अलावा भभुआ, नवादा एवं नालंदा में भी रेशमी वस्त्र उद्योग का विकास हुआ है।


34. बिहार में ऐसे जिलों का नाम लिखिए जहाँ वन विस्तार एक प्रतिशत से भी कम है।

उत्तर ⇒ बिहार में कई ऐसे जिले हैं जहाँ वन का विस्तार एक प्रतिशत से भी कम है जो निम्न हैं — सीवान, सारण, बक्सर, पटना, गोपालगंज, वैशाली, मुजफ्फरपुर, मोतीहारी, दरभंगा, मधुबनी, सगस्तीपुर, बेगूसराय, मधेपुरा, खगड़िया, नालंदा आदि।


35. बिहार में किस नदी को ‘बिहार का शोक’ कहा जाता है, और क्यों ?

उत्तर ⇒ कोसी नदी को बिहार का शोक कहा जाता है, क्योंकि बिहार में सर्वाधिक बाढ़ इसी नदी के कारण आता है। यह नदी देश की सबसे तेजी से मार्ग बदलने वाली नदी भी है।


36. सूखा से बिहार किस प्रकार प्रभावित होता है ?

उत्तर ⇒ सूखे से न केवल फसलों को हानि पहुँचती है, बल्कि खाद्यान्नों की आपूर्ति भी कठिन हो जाती है। मवेशी के लिए चारे की कमी हो जाती है। जलस्तर नीचे चला जाता है। पेयजल की भी गंभीर समस्या उत्पन्न हो जाती है। बाढ़ के समान ही सूखा भी बिहार को बहुत प्रभावित करती है। यह एक प्राकृतिक प्रकोप है।


37.बिहार के प्रमुख हवाई अड्डों का नाम लिखिए और वह कहाँ स्थित है ?

उत्तर ⇒ -बिहार का प्रमुख हवाई अड्डा निम्नलिखित है –

(i) जग प्रकाश अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा – पटना
(ii)बोधगया हिवाई अड्डा – बोधगया
(iii) बिहटा हवाई अड्डा – बिहटा
(iv) भागलपुर हवाई अड्डा – भागलपुर
(v) गुजपफरपुर हवाई अड्डा – मुजपफरपुर
(vi) रक्सौल हवाई अड्डा – रक्सौल


38. ‘ बिहार में नदियों का परिवहन क्षेत्र में क्या योगदान है ?

उत्तर ⇒ बिहार राज्य की प्रमुख नदी गंगा, घाघरा, कोसी, गंडक, सोन वर्ष भर प्रवाहित रहती है। जिससे परिवहन का विकास हुआ है। घाघरा नदी से खाद्यान्न, गंडक से लकड़ी, फल, सन्जी, सोन नदी से बालू और पुनपुन नदी से बाँस ढोने का कार्य होता है। वर्तमान समय में पटना के महेन्द्र घाट में गंगा नदी पर हल्दिया-इलाहाबाद राष्ट्रीय जलमार्ग का विकास किया गया है। जिससे सामानों और यात्रियों के ढोने का कार्य किया जाता है।


39. तसर रेशम का उत्पादन बिहार के किस जिले में अधिक होता है ?
उत्तर ⇒ तसर किस्म के रेशम के उत्पादन में भागलपुर जिला प्रसिद्ध है। यहाँ रेशम की मिलें भी हैं। बुनाई और कताई का काम भी यहाँ होता है।


40. मौसम के अनुसार बिहार की फसलों को कितने भागों में बाँटा गया है ? लिखें।

उत्तर ⇒ मौसम के अनुसार बिहार की फसलों को चार भागों में बाँटा गया हैं-

(i) भदई फसलें – यह मई-जून में बोई जाती है और अगस्त-सितंबर में काट ली जाती है। इसमें भदई धान, ज्वार, बाजरा, मकई और जूट की खेती की जाती है।

(ii) ‘अगहनी फसलें – मध्य जून से अगस्त तक रोपी जाती हैं और नवंबर-दिसंबर में काट ली जाती है। इसमें अगहनी धान, अरहर, गन्ना और ज्वार-बाजरा की खेती की जाती है।

(iii) रबी फसल – अक्टूबर-नवंबर में बोयी जाती है और ग्रीष्म ऋत के आरंभ में काट ली जाती है। इसमें गेहूँ, दलहन और तेलहन की खेती की जाती है।

(iv) गरमा फसल – सिंचाई की सुविधा रहने पर ग्रीष्म ऋतु में गरमा धान य सब्जियों की खेती की जाती है।


41. दुर्गावती जलाशय परियोजना का मुख्य उद्देश्य क्या है ?

उत्तर ⇒ इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य कैमूर एवं रोहतास जिले के सूखाग्रस्त क्षेत्रों की सिंचाई एवं बाढ़ नियंत्रण है।

 मानचित्र अध्ययन 

1. उच्चावच निरूपण किसे कहते हैं ?

उत्तर ⇒ मानचित्रण की वह विधि जिसके द्वारा धरातल पर पाई जाने वाली त्रिविमिय आकृति का समतल सतह पर प्रदर्शन किया जाता है।


2. स्थानिक ऊँचाई (Spot Height) किसे कहा जाता है ?

उत्तर ⇒ तल चिह्न की सहायता से किसी स्थान विशेष की मापी गई ऊँचाई को स्थानिक ऊँचाई कहा जाता है। इस विधि में सर्वेक्षण द्वारा प्राप्त की गई समुद्र तल से किसी स्थान की वास्तविक ऊँचाई प्रकट की जाती है।


3. तल चिह्न क्या है ?

उत्तर ⇒ वास्तविक सर्वेक्षण के द्वारा भवनों, पुलों, खंभों, पत्थरों जैसे स्थाई वस्तुओं पर समुद्र तल से मापी गई ऊँचाई को प्रदर्शित करने वाले चिह्न को तल चिह्न कहते हैं। इसे बेंच मार्क भी कहा जाता है।


4. स्तर रंजन या रंग विधि क्या है ?

उत्तर ⇒किसी क्षेत्र के मानचित्र में विविध सूचनाओं के साथ-साथ उच्चावच प्रदर्शन करने की यह एक उत्तम एवं सरल विधि है। इसमें समुद्र तल से किसी स्थान की ऊँचाई दिखाने के लिए एक स्पष्ट बिंदु के समीप अंक लिख दिए जाते हैं। अंकों से बनी संख्या उस स्थान की समुद्र तल से ऊँचाई प्रदर्शित करती है। यह तल चिह्न की सहायता से चिह्नित की जाती है।


5. समोच्च रेखा से आप क्या समझते हैं ?

उत्तर ⇒समोच्च रेखाएँ उच्चावच प्रदर्शन की सर्वश्रेष्ठ तकनीक मानी जाती वस्तुतः समोच्च रेखाएँ भूतल पर समुद्र तल से एक समान ऊँचाई वाले विकार मिलाकर खींची जाने वाली काल्पनिक रेखाएँ हैं जिन्हें वास्तविक सर्वेक्षण के खींची जाती है। प्रत्येक समोच्च रेखाओं के साथ उसकी ऊँचाई का मान लिख दिया जाता है। इन रेखाओं को मानचित्र पर बादामी रंग से दिखाया जाता है। यह मानचित्र निरूपण की एक मानक विधि हैं।


6. समोच्च रेखाओं द्वारा शंक्वाकार पहाड़ी का प्रदर्शन किस प्रकार किया जाता है ?

उत्तर ⇒समोच्च रेखा समूह जल तल से एक समान ऊँचाई वाले स्थानों के बिंदुओं को मिलाकर मानचित्र पर खींची गई काल्पनिक रेखा है। समोच्च रेखा द्वारा शंक्वाकार पहाड़ी को दिखाने के लिए समोच्च रेखाओं को लगभग वृत्ताकार रूप में बनाया जाता है, जिसमें अंदर से बाहर की ओर मान क्रमशः घटता जाता है।


7. पठारों को किस प्रकार प्रदर्शित किया जाता है ?

उत्तर ⇒पठारों को प्रदर्शित करने के लिए समोच्च रेखा किनारों पर पास-पास तथा भीतर की ओर दूर-दूर होती हैं। प्रत्येक समोच्च रेखा लंबाकार बंद आकृति में बनायी जाती है। मध्यवर्ती समोच्च रेखा भी चौड़ी होती है।


8. पर्वतीय छायाकरण विधि का वर्णन करें।

उत्तर ⇒उच्चावच-प्रदर्शन की वह विधि जिसमें भू-आकृतियों पर उत्तर पश्चिम कोने पर ऊपर से प्रकाश पड़ने की कल्पना की जाती है। इसके कारण अंधेरे में पड़ने वाले हिस्से को या ढाल को गहरी आभा से भर देते हैं जबकि प्रकाश वाले हिस्से या कम ढाल को हल्की आभा से भरते हैं या खाली ही छोड़ देते हैं। इस विधि से पर्वतीय क्षेत्रों के उच्चावच को प्रभावशाली ढंग से दिखाना संभव होता है।


9. निम्नलिखित को किस रंग से दिखाया जाता है ? बतावें-

(क) जलीय भाग (ख) मैदान, पर्वत।

उत्तर ⇒जलीय भागों को नीले, मैदानों को हरे तथा पर्वतों को बादामी हल्का कत्थई रंग से दिखाया जाता है।


10. लेहमान कौन थे ?

उत्तर ⇒ यह एक सैन्य अधिकारी थे जिन्होंने ऑस्ट्रिया में काम करते हुए मानचित्रों के विकास में योगदान दिया। हैश्यूर विधि इन्हीं की देन है।


11. उच्चावच प्रदर्शन के लिए कौन-सी विधि श्रेष्ठ है ?

उत्तर ⇒ उच्चावच प्रदर्शन के लिए वह विधि सर्वश्रेष्ठ है जिसमें समोच्च रेखाओं का उपयोग किया जाता है। ये रेखाएँ समुद्र तल से एक समान ऊँचाई पर खींची जाने वाली काल्पनिक रेखाएँ हैं।


12. ‘v’ वी आकार की घाटी को किस प्रकार प्रदर्शित किया जाता है ?

उत्तर ⇒इसके लिए समोच्च रेखाओं को अंग्रेजी के ‘V’ अक्षर की उलटी आकृति बनाई जाती है। इसमें समोच्च रेखाओं का मान बाहर से अंदर की ओर क्रमशः घटता जाता है।


13. त्रिभुजन विधि क्या है ?

उत्तर ⇒यह सर्वेक्षण की एक विधि है जिसमें मानचित्र पर त्रिभुज बनाकर उसके बगल में धरातल की समुद्र तल से ऊँचाई लिख दी जाती है।


14. जल प्रपातों को किस प्रकार चित्रण किया जाता है ?

उत्तर ⇒जल प्रपातों के प्रदर्शन के लिए पहले समोच्च रेखाओं द्वारा नदी-घाटी बनाया जाता है। फिर उनमें किन्हीं दो या तीन समोच्च रेखाओं को एक जगह मिलाकर आगे बढ़ा दिया जाता है।


15. त्रिकोणमितीय स्टेशन क्या है ?

उत्तर ⇒वे सभी बिन्दु जिनका उपयोग त्रिभुजन विधि (एक प्रकार का सर्वेक्षण) द्वारा सर्वेक्षण करते समय स्टेशन के रूप में हुआ था। मानचित्र पर त्रिभुज बनाकर उसके बगल में धरातल की समुद्र तल से ऊँचाई लिखी जाती है।


16. पृथ्वी पर भू-आकृति कितनी आकृति की होती है ?

उत्तर ⇒विभिन्न प्रकार की भू-आकृतियाँ होती हैं। जैसे-शंक्वाकार पहाड़ा, पठार, V-आकार की घाटी, जलप्रपात, झील आदि।

1. भारत : संसाधन एवं उपयोग ( दीर्घ उत्तरीय प्रश्न )


1. संसाधनों के विकास में ‘सतत् विकास’ की अवधारणा की व्याख्या करें।

उत्तर ⇒ संसाधन मनुष्य की जीविका का आधार है। जीवन की गुणवत्ता को बनाये रखने के लिए संसाधनों के सतत विकास की अवधारणा आवश्यक है। संसाधन का प्रकृति का उपहार मानकर मानव ने इसका अंधा-धुंध उपयोग करना शरू किया, जिसके कारण पर्यावरणीय समस्याएँ भी उत्पन्न हो गयी है। ससाधना के भण्डार में चिंतनीय ह्रास ला दिया है।
शक्ति सम्पन्न लोगों ने अपने स्वार्थ में संसाधनों का विवेकहीन दोहन किया जिससे विश्व पारिस्थितिकी में घोर संकट पैदा हो गया। भूमंडलीय तापन, ओजोन परत में क्षय, पर्यावरण-प्रदूषण, अम्लीय वर्षा, ऋतु-परिवर्तन जैसे संकट पैदा होते जा रहे हैं। अगर ये परिस्थिति बनी रही तो संसार के सभी मानव का जीवन संकट में पड़ जायेगा।
इन परिस्थितियों से बचने के लिए संसाधनों का नियोजित उपयोग जरूरी है। इससे पर्यावरण को बिना क्षति पहुँचाए भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर वर्तमान विकास को कायम रखा जा सकता है। ऐसी सोच ही सतत् विकास कही जाती है। इससे वर्तमान विकास के साथ भावी पीढ़ी की आवश्यकताएँ भी पूरी होगी और भविष्य भी सुरक्षित रह सकेगा।


2. स्वामित्व के आधार पर संसाधन के विविध स्वरूपों का वर्णन कीजिए।

उत्तर ⇒ स्वामित्व के आधार पर संसाधन के चार प्रकार होते हैं –

(i). व्यक्तिगत संसाधन- ऐसे संसाधन किसी खास व्यक्ति के अधिकार क्षेत्र में होता है। जिसके बदले में वह व्यक्ति सरकार को लगान भी चुकाते हैं, जैसे खेती की जमीन, घर, बाग-बगीचा, तालाब आदि ऐसे संसाधन हैं जिसपर व्यक्ति निजी स्वामित्व रखता है।

(ii) सामुदायिक संसाधन- ऐसे संसाधन किसी खास समुदाय के अधीन है होता है जिसका लाभ विशेष समुदाय के लोगों के लिए सुलभ होता है, जैसे चरागाह, श्मशान घाट, मंदिर, मस्जिद, सामुदायिक भवन, तालाब आदि।

(ii) राष्ट्रीय संसाधन- कानूनी तौर पर देश या राष्ट्र के अंतर्गत सभी उपलब्ध. संसाधन राष्ट्रीय हैं। सरकार को यह वैधानिक हक है कि वह व्यक्तिगत संसाधनों का अधिग्रहण आम जनता के हित में कर सकती है। सरकार को अधिग्रहित संसाधन का मुआवजा देना पड़ता है।

(iv) अंतर्राष्ट्रीय संसाधन- ऐसे संसाधनों का नियंत्रण अंतर्राष्ट्रीय संस्था करती है। तट रेखा से 200 किमी० की दूरी को छोड़कर खुले महासागरीय संसाधनों पर किसी देश का आधिपत्य नहीं होता है। ऐसे संसाधनों का उपयोग सिर्फ अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की सहमति से किसी राष्ट्र द्वारा किया जा सकता है।


3. “संसाधन हुआ नहीं करते, बना करते हैं। इस कथन की व्याख्या करें।

उत्तर ⇒ संसार में अनकों प्राकृतिक पदार्थ बिखरे पड़े हैं जब तक उनका उपयोग नहीं किया जाता है वे संसाधन नहीं बन पाते।
मनुष्य उन्हें पता लगाता है, फिर अपनी बुद्धि, विवेक, क्षमता, तकनीक और कुशलता का प्रयोग कर अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिए, आर्थिक विकास के लिए उनके उपयोग की योजना बनाता है और उपयोग में लाकर वह उन्हें संसाधन बनाता है। मनुष्य के आर्थिक विकास के लिए संसाधन अति आवश्यक होता है।
नदियाँ तभी संसाधन बन पाती हैं जब मानव उनका उपयोग सिंचाई में, जल विद्युत उत्पादन में, मत्स्यपालन में एवं जलीय यातायात के रूप में और अनेक आर्थिक कार्यों में न किया जाय। सदियों से शोक का कारण बनने वाली नदी, विनाशकारी बाढ़ लाने वाली नदी, हजारों हजार की संख्या में जान माल का क्षति पहुंचाने वाली नदी पर योजना बनाकर बाँध बनाया गया, नहरें निकाली गयी, सिंचाई का काम लिया, विद्युत उत्पादन किए गये जिससे सिंचाई और उद्योग के विकास में मदद मिलने लगी तो वही शोक पैदा करने वाली नदी प्राकृतिक संसाधन बन गई, खुशहाली का कारण बनी। इसीलिए एक भूगोलवेत्ता जिम्मरमैन ने ठीक ही कहा है कि संसाधन हुआ नहीं करते, बना करते हैं।


4. संसाधन से क्या समझते हैं? उदाहरण देकर स्पष्ट करें।

उत्तर ⇒ वातावरण में पाये जाने वाले वे सभी पदार्थ जो हमें उपलब्ध है और हमारे जीवन की विभिन्न आवश्यकताओं को पूरी करे संसाधन कहलाते हैं। परंतु संसाधन तभी कहे जायेंगे जब हमें उन तक पहुँचने की तकनीक की जानकारी हो साथ ही उनके प्राप्त करने, उपयोग करने पर होने वाले खर्च वहन करने की क्षमता हो, श्रम शक्ति हो।
परंतु इसके उपयोग में व्यापक समझ और सूझबूझ की आवश्यकता होती है से वातावरण प्रभावित न हो और प्रकृति के साथ सामंजस्य बना रहे तभी प्रकृति के सभी पदार्थ संसाधन कहे जाते हैं।
उदाहरणस्वरूप छोटानागपुर पठार के खनिज भंडार का युगों तक कोई महत्त्व न था। अतः वे खनिज पदार्थ संसाधन न बन सके। परंतु जब खनिजों का महत्त्व समझा जाने लगा और लोगों ने अपनी कुशलता का प्रदर्शन कर उनको निकालना आरंभ किया तथा उपयोग में लाया गया तो वे खनिज पदार्थ खनिज संसाधन बन गये। जिसने छोटानागपुर क्षेत्र की आर्थिक विकास का अवसर प्रदान किया।


5. संसाधनों के संरक्षण से क्या तात्पर्य है? यह संरक्षण किस प्रकार किया जा सकता है ?

उत्तर ⇒ मानव प्राकृतिक संसाधनों का सृष्टिकर्ता नहीं है इसलिए मानव प्राकृतिक संसाधन को पूँजी समझकर उपयोग करे। इसका तात्पर्य यह है कि संसाधनों के उपयोग में कम-से-कम दुरुपयोग हो, उनकी कम-से-कम बर्बादी हो। मिट्टी जैसी संपदा की उर्वरता बनी रहे, उसे निम्नीकरण या कटाव से बचाया जाय। वन सम्पदा के अत्यधिक उपयोग में लाए जाने पर पुनः स्थापन पर बल देना उनका संरक्षण कहलाता है। अतः संरक्षण से तात्पर्य है संसाधनों का अधिकाधिक समय तक अधिक लोगों के लिए आवश्यकता की पूर्ति हेतु उपयोग हो।
संसार की आबादी का बड़ा भाग कृषि पर आश्रित है और कृषि कार्य के लिए मानव भूमि और मिट्टी का उपयोग करता है। इन संसाधनों का मूल्यांकण किया जाना चाहिए। यदि इनमें कोई कमी है तो उसे पूरा कर उपयुक्त बनाया जाए। यदि वह बर्बाद हो रही है तो किस तरह उसका संरक्षण किया जाए। इसके लिए भूमि का उपयोग इस प्रकार होना चाहिए कि मिट्टी के प्रकार के अनुसार फसलें उगानी चाहिए ताकि भूमि की उत्पादकता बनी रहे और मिट्टी की गुणवत्ता नष्ट न हो।
इस प्रकार जल संरक्षण, वन एवं वन्य प्राणी संरक्षण, खनिज संपदा संरक्षण के लिए भी योजनाबद्ध और विवेकपूर्ण उपयोग किया जाए तो उनसे अधिक से अधिक समय तक लाभ उठाया जा सकता है तथा वे मानव जगत के लिए संरक्षित रह सकते हैं। संसाधनों का योजनाबद्ध, समुचित और विवेकपूर्ण उपयोग ही उनका संरक्षण है। संरक्षण का तात्पर्य कदापि यह नहीं कि प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग न कर उनकी रक्षा की जाए उनके खर्च की आवश्यकता के बावजूद उन्हें बचाकर भविष्य के लिए रखा जाए।


6. शक्ति संसाधनों के संरक्षण हेतु कौन-कौन से उपाय किये जा सकते हैं ? आप इसमें कैसे मदद पहुँचा सकते हैं ?

उत्तर ⇒  शक्ति संसाधन के संरक्षण के लिए निम्न उपाय किए जा सकते हैं –

(i) ऊर्जा के उपयोग में मितव्ययिता- ऊर्जा का उचित एवं आदर्शतम उपयोग होने से ऊर्जा का दुरुपयोग नहीं होता है।

(ii) ऊर्जा के नवीन क्षेत्रों की खोज- ऊर्जा संकट का समाधान नवीन ऊर्जा स्रोतों में निहित होते हैं। इसके लिए सुदूर संवेदी प्रणाली का भी प्रयोग हो रहा है।

(iii) ऊर्जा के नवीन वैकल्पिक साधनों का उपयोग- जो संसाधन समाप्त होने वाले हैं जिनकी पुनरावृत्ति संभव नहीं है, उस संसाधन को संरक्षित करना चाहिए। बदले में ऐसे स्रोत जो न समाप्त होने वाले हैं, ऐसे वैकल्पिक साधनों का प्रयोग किया जाए जैसे जल विद्युत, पवन ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा, जैव ऊर्जा, सौर ऊर्जा आदि। ये सभी नवीकरणीय ऊर्जा के स्रोत भी कहे जाते हैं।

(iv) अंतर्राष्ट्रीय सहयोग- ऊर्जा संकट एक वैश्विक समस्या है। जिसे विश्व के देशों को आपसी मतभेद भुलाकर सहयोग एवं समाधान करना चाहिए। आज UNO, OPEC, WTO, G8 जैसे देश इस क्षेत्र में सराहनीय कार्य कर रहे हैं। ऊर्जा का उपयोग हम अपनी जरूरत के हिसाब से करके एवं वेवजह उसका उपयोग न करके शक्ति के संसाधनों का संरक्षण कर सकते हैं।


7. संसाधन के नियोजन से आप क्या समझते हैं? इसकी आवश्यकता पर प्रकाश डालें।

उत्तर ⇒ संसार में संसाधनों का वितरण असमान रूप से फैला हुआ है। किसी। क्षेत्र में यह आवश्यकता से अधिक तो किसी क्षेत्र में आवश्यकता से कम मात्रा में। पाई जाती है। – भारत में तो यह क्षेत्रीय विविधता और भी अधिक है। अतः पूरे देश के विकास के लिए संसाधनों का नियोजन आवश्यक है। मानव की अपने भौतिकवादी जीवन की आवश्यकताएँ बढ़ती जा रही है और उनकी आपूर्ति में संसाधनों का अत्यधिक शोषण करता जा रहा है जिससे अनेकों संसाधन समाप्ति के कगार पर हैं जिसस प्राकृतिक संतुलन बिगड़ता जा रहा है। यदि संतुलन नष्ट हआ तो मानव का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। इसलिए संसाधन नियोजन की आवश्यकता और भी बढ़ जाती है।
संसाधन नियोजन की कुछ प्रक्रियाएँ निम्नलिखित हैं –

(i) देश के विभिन्न क्षेत्रों में पाये जाने वाले संसाधनों की पहचान करना,
(ii) संसाधन की मात्रा एवं गुणात्मक स्तर का निर्धारण करना,
(iii) विकास की योजना को चरणबद्ध रूप से तैयार करना,
(iv) समुचित विकास के लिए उचित तकनीक अपनाना,
(v) मजदूरों को प्रशिक्षित करना और सही तकनीक का ज्ञान देना, ”
(vi) राष्ट्रीय स्तर पर योजनाओं का निर्धारण करना जिससे देश की आर्थिक समद्धि हो और नागरिकों का कल्याण हो सके।


8. ऊर्जा संसाधन के महत्त्व पर प्रकाश डालें।

उत्तर ⇒ शक्ति के साधन को ऊर्जा संसाधन भी कहा जाता है। ऊर्जा आधुनिक जीवन की अनिवार्य आवश्यकता है। ये आर्थिक क्रियाओं के लिए अनिवार्य हो गई है। किसी भी देश के औद्योगिक, कृषि, यातायात के विकास के लिए ऊजो अथ शक्ति के साधनों की आवश्यकता होती है। शक्ति के साधन ही आधुनिक युग में आधार माना जाता है। आर्थिक विकास का सचक होता है। अतः जिन संसाधनों का प्रयोग करके हम मशीनों को चलाते हैं, यातायात के साधनों को गति प्रदान करते हैं, कृषि को यांत्रिक बनाते हैं, घरेलू कार्यों में उपयोग करते हैं, उन्हें ऊर्जा संसाधन कहा जाता है। इसके अभाव में आर्थिक विकास की कल्पना नहीं की जा सकती है।


9. वन को ‘अनुपम संसाधन’ क्यों कहा गया है?

उत्तर ⇒ वन राष्ट्रीय संपत्ति है। एक महत्त्वपूर्ण नवीकरणीय संसाधन है। इससे तापमान में कमी और वर्षा की मात्रा में वृद्धि होती है। जिससे जलवायु अनुकूल बनीं रहती है। वनों से भूमि कटाव कम होता है और नदियों में जल प्रवाह सामान्य बना रहता है। पशु पक्षियों के लिए आवास, चारा और प्राकृतिक वातावरण प्राप्त होता है। वनों से ईंधन, इमारती लकड़ियों के अतिरिस्त उद्योगों के लिए कच्चा माल की प्राप्ति होती है। वन से हमें फल-फूल, कंद-मूल तथा औषधियों की प्राप्ति होती है। जीवन में वनों से अनेकों प्रकार के लाभ उठाते हैं। इसलिए वन को ‘अनुपम संसाधन’ कहा गया है।


10. भारत के आर्थिक विकास में जल संसाधन का योगदान बताएँ।

उत्तर ⇒ भारत के आर्थिक विकास में जल संसाधन का योगदान महत्त्वपूर्ण माना जाता है। घरेल उपयोग से लेकर उद्योग धंधे तथा कृषि कार्य एवं यातायात, जल विद्युत उत्पादन में इसका उपयोग किया जाता है। उद्योग धंधे जैसे—लोहा-इस्पात उद्योग, रसायन उद्योग, कपड़ा उद्योग आदि में ज़ल की अधिक आवश्यकता होती है। जल का सबसे अधिक उपयोग कृषि कार्य में सिंचाई के रूप में किया जाता है। समय पर पर्याप्त मात्रा में सिंचाई फसल के उत्पादकता को बढ़ाता है। इसके लिए धरातलीय और भूमिगत दोनों सिंचाई का सहारा लिया जाता है। पंजाब हरियाणा, राजस्थान और पश्चिम उत्तरप्रदेश में हरित क्रांति की सफलता मूलतः सिंचाई पर ही आधारित है। जल का उपयोग आंतरिक जल मार्ग जैसे-नदी, नहर, झील के रूप में भी किया जाता है। इस तरह जल एक महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय संसाधन है जिसका उपयोग हर क्षेत्र में बढ़ता जा रहा है। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि भारत के आर्थिक विकास में जल संसाधन का अत्यधिक योगदान है।


11. मानव किन गुणों के कारण सारे प्राकृतिक संसाधनों के मूल्य में परिवर्तन लाता है ?

उत्तर ⇒ मनुष्य अपनी बुद्धि, प्रतिभा, क्षमता, तकनीकी ज्ञान और कार्य-कुशलता जैसे गुणों का प्रयोग करके प्राकृतिक संसाधनों के मूल्य में परिवर्तन लाता है। मानव अपने साहस, संघर्षशीलता, ज्ञान और सूझबूझ का प्रयोग कर संसाधनों के मल्यो परिवर्तन लाता है। जैसे छोटानागपुर के खनिज भंडार का युगों तक कोई महत्व था, उसका कोई मल्य न था। परंतु जब खनिजों का महत्त्व समझ में आया. उस उपयोगिता समझ में आयी, उसे निकालना आरंभ किया गया और उपयोग में लाया गया तो वही खनिज सम्पदा मल्यवान हो गए। इसी प्रकार नदिया तभी संसाधन बन पायी जब उनका उपयोग सिंचाई में, जल विद्युत उत्पादन में, मत्स्यपालन के लिए एव यातायात के लिए किया जाने लगा। एक भूगोलवेत्ता ने कहा है, “संसाधन की नहीं करते, बना करते हैं।


12. मानव के लिए संसाधन क्यों आवश्यक है ?

उत्तर ⇒ प्रकृति प्रदत्त वस्तुएँ हवा, पानी, वन, वन्य जीव, भूमि, मिट्टी, खनिज संपदा एवं शक्ति के साधन या स्वयं मनुष्य द्वारा निर्मित संसाधन के बिना मनुष्य की जरूरतें पूरी नहीं हो सकती हैं तथा सुख सुविधा नहीं मिल सकती है। मनुष्य का आर्थिक विकास संसाधनों की उपलब्धि. पर ही निर्भर करता है। संसाधनों का महत्त्व इस बात से लगता है कि इनकी प्राप्ति के लिए मनुष्य कठिन से कठिन परिश्रम करता है, साहसिक यात्राएँ करता है, फिर अपनी बुद्धि, प्रतिभा, क्षमता, तकनीकी ज्ञान और कुशलताओं का प्रयोग करके उनके उपयोग की योजना बनाता है, उन्हें उपयोग में लाकर अपना आर्थिक विकास करता है। इसलिए मनुष्य के लिए संसाधन बहुत आवश्यक है। इसके बिना मनुष्य का जीवन एक क्षण भी नहीं चल सकता है।


13. ऊर्जा के गैर-परंपरागत स्रोतों का उल्लेख करें और यह बताएँ कि भारत इस दिशा में किस तरह आगे बढ़ रहा है ?

उत्तर ⇒ ऊर्जा के गैर-परंपरागत स्रोतों में –

(i)पवन ऊर्जा, (ii) ज्वारीय ऊर्जा, (i) सौर-ऊर्जा, (iv) भूताप ऊर्जा एवं (v) जैव पदार्थ ऊर्जा आते हैं। ऊर्जा विशेषज्ञों के अनुसार, गैर-परंपरागत ऊर्जा से भारत 95,000 मेगावाट बिजली उत्पन्न कर सकता है। अभी इस दिशा में कुछ का ही उपयोग किया जा रहा है।

पवन ऊर्जा- पवन चक्की द्वारा भूमिगत जल निकालकर देहातों में सिंचाई के अलावा पवन से विद्युत भी उत्पन्न की जाती है। उदाहरण के लिए गुजरात, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, उड़ीसा में जहाँ पवन तेज गति से चला करती है। लगभग 2 हजार पवन चक्कियाँ लगाई गई हैं और 5 लाख यूनिट विद्युत उत्पन्न किया जाता है।

ज्वारीय ऊर्जा- कच्छ और खंभात की खाड़ी में जहाँ ऊँचे ज्वार उठते हैं ज्वारीय ऊर्जा उत्पन्न की जाती है।

सौर-ऊर्जा-भारत उष्णकटिबंध में स्थित होने के कारण असीम सौर ऊर्जा उत्पन्न कर सकता है। अभी गुजरात में भुज के पास इसका सबसे बड़ा संयंत्र लगाया गया है। थार मरुस्थल में भी इसकी असीम सम्भावनाएँ हैं।

बायो गैस ऊर्जा- गोबर और मल-मूत्र से उत्पन्न ऊर्जा गोबर गैस संयंत्र लगाकर प्राप्त किया जा सकता हैं, इससे गाँव में विद्युत की आवश्यकता पूरी की जा सकता है।


14. भारत में सौर ऊर्जा का भविष्य उज्ज्वल है। इस कथन की पुष्टि करें।

उत्तर ⇒ भारत ऊष्ण कटिबंधिय देश है, यहाँ अधिक समय धूप मिलती है। इसलिए सौर ऊर्जा उत्पन्न करने की यहाँ असीम संभावनाएं हैं। यहाँ प्रतिवर्ग किलोमीटर क्षेत्र में 20 मेगावाट सौर ऊर्जा उत्पन्न की जा सकती है। _ फोटोवोल्टाइक प्रौद्योगिकी द्वारा धूप को सीधे विद्युत में बदला जा सकता है। सूर्य की ऊर्जा से विद्युत उत्पन्न कर सौर चूल्हे और सौर विद्युत गृह का निर्माण किया जा सकता है।
सीजियम और कुछ अन्य धातुओं में यह विशेषता पायी जाती है कि थोड़ा गम होने पर भी उनमें से इलेक्ट्रॉन बाहर निकलने लगते हैं, इसी प्रवाह को बिजली कहत हैं। सूर्य के प्रकाश में यह क्रिया बिना खर्च के हो सकती है। जिन स्थानों पर दिन के समय आसमान खुला रहता है वहाँ आसानी से सौर ऊर्जा प्राप्त किया जा सकता है। ऐसे गाँव में जहाँ बिजली का अभाव रहता है सरकार द्वारा ग्रामीणों को साला लैंप, सोलर चूल्हे उपलब्ध कराये जा रहे हैं।
अभी भारत के गुजरात राज्य में भुज के निकट इसका सबसे बड़ा संयंत्र लगाया गया है। थार मरुस्थल में भी इसका बड़ा संयंत्र स्थापित किया जा सकता है।


15. ऊर्जा संकट दूर करने के लिए ऊर्जा के किन स्रोतों को विकास करने की आवश्यकता है ? इसके लिए कौन से प्रयास किया रहे हैं ?

उत्तर ⇒ भारत में परंपरागत ऊर्जा के साधन सीमित हैं और दिनों दिन विधुत की माँग कृषि , उद्योग परिवहन तथा दैनिक जीवन में बढ़ती जा रही है। अत: विधुत का उत्पादन बढ़ाना आवश्यक हो गया है। इसके लिए उर्जा के गैर-परंपरागत स्रोतों को विकसित करने कीआवश्यकता है। इसके लिए आयोग बनाये गये और परागत ऊर्जा स्रोत विभाग स्थापित किए गए हैं। इस दिशा में अन्य ऊर्जा जों की खोज की जा रही है। इसमें सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा, जैविक उर्जा तथा अपशिष्ट पदार्थ से उत्पन्न ऊर्जा को विकसित करने पर बल दिया जा रहा है। भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में गोबर गैस प्लांट स्थापित कर ऊर्जा की प्राप्ति जाती हैं । आजकल शहरों में भी सड़कों पर रोशनी के लिए बायोगैस का प्रयोग किया जा रहा है।


16. खनिज कितने प्रकार के होते हैं? प्रत्येक का सोदाहरण परिचय दीजिए।

उत्तर ⇒ सामान्यतः खनिजों को दो वर्गों में बाँटा जाता है-

(i) धात्विक खनिज- ऐसे खनिजों में धातु मौजूद रहते हैं। ये धातु किसी-न-किसी धातु के साथ मिले होते हैं। जैसे लौह अयस्क, ताँबा, निकेल आदि। नह धातु की उपस्थिति के आधार पर धात्विक खनिज को भी दो उप-भाग में बाँटा जाता है।
(क) लौह युक्त धातु (ख) अलौह युक्त धातु

  • लौह युक्त धातु में लोहा के अंश अधिक होते हैं, जैसे-लौह अयस्क, मैंगनीज, निकेल, टंगस्टन आदि।
  • अलौह धातु में लोहा के अंश बहुत कम होते हैं, जैसे—सोना, चाँदी, बॉक्साइट, टिन, ताँबा आदि।

(ii) अधात्विक खनिज-ऐसे खनिजों में धातु नहीं होते हैं, जैसे चूना पत्थर, डोलोमाइट, अभ्रक, जिप्सम आदि। जीवाश्म की उपस्थिति के आधार पर अधात्विक खनिज को भी दो भागों में बाँटा जाता है ।

  • (क) कार्बनिक खनिज—ऐसे खनिज का निर्माण भू-गर्भ में प्राणी एवं पेड़-पौधों के दबने से होता है। जैसे—कोयला, पेट्रोलियम, चूना पत्थर आदि।
  • (ख) अकार्बनिक खनिज—ऐसे खनिजों में जीवाश्म की मात्रा नहीं होते हैं, जैसे—अभ्रक, ग्रेफाइट आदि।

17. भारत के प्रमुख तीन धात्विक खनिजों का विवरण बताएँ।

उत्तर ⇒ धात्विक खनिज ऐसे खनिज होते हैं जिन्हें शुद्ध करने के बाद इच्छित रूप में ढाला जाता है। धात्विक खनिज को लौह तथा अलौह खनिजों में बाँटा जाता है। प्रमुख धात्विक खनिजों में लोहा, मैंगनीज, बॉक्साइट और ताँबा है। इनका विवरण इस प्रकार हैं –

(i) लौह अयस्क- भारत में लौह अयस्क का संचितं भंडार बहुत अधिक है। यहाँ उच्च कोटि के हेमाटाइट और मैग्नेटाइट लौह अयस्क पाये जाते हैं। . भारत का सर्वप्रमुख लौह क्षेत्र झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, गोवा इत्यादि राज्यों में है।

(ii) मैंगनीज अयस्क- भारत में मैंगनीज का भंडार विश्व के भंडार का 20% पाया जाता है। इस खनिज के प्रमुख भंडार उड़ीसा, कर्नाटक, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और गोवा राज्य में हैं। भारत का मैंगनीज उच्च कोटि का है, यह धात्विक खनिज जो इस्पात बनाने में काम आता है।

(iii) बॉक्साइट अयस्क- एक अनुमान के अनुसार भारत में बॉक्साइट का विशाल भंडार है। इस खनिज से एलुमिनियम निकाला जाता है। भारत में इसके भंडार झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, उड़ीसा, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक राज्य में पाये जाते हैं।


18. कोयले का वर्गीकरण कर उनकी विशेषताओं को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर ⇒ कार्बन की मात्रा के आधार पर कोयले को चार वर्गों में रखा जाता हैं –

(i) एंथासाइट- यह सर्वोच्च कोटि का कोयला है जिसमें कार्बन की मात्रा 90% तक पायी जाती है। जलने पर धुआँ नहीं देता और देर तक ऊष्मा देता है। इसे कोकिंग कोयला भी कहा जाता है। इसे धातु गलाने में प्रयोग किया जाता है।

(ii) बिटुमिनस- इस प्रकार के कोयला में कार्बन की मात्रा 70 से 90% तक पाया जाता है। इसे परिष्कृत कर कोकिंग कोयला बनाया जाता है। भारत में अधिकतर इसी प्रकार का कोयला मिलता है।

(iii) लिगनाइट- यह निम्न कोटि का कोयला है। इसमें 30 से 70% तक कार्बन पाया जाता है। इसमें ऊष्मा कम और धुआँ अधिक होता है। इसे भूरा कोयला भी कहते हैं।

(iv) पीट-इसमें कार्बन की मात्रा 30% से भी कम पायी जाती है। इस प्रकार | का कोयला पूर्व के दलदली भागों में मिलता है।


19. अभ्रक की उपयोगिता एवं वितरण पर प्रकाश डालें ।

उत्तर ⇒

अभ्रक की उपयोगिता- अभ्रक एक विद्यतरोधी अधात्विक खनिज है। विधुतरोधी होने के कारण इस खनिज का सबसे अधिक प्रयोग विद्युत उपकरण क निर्माण में किया जाता है। इसके अतिरिक्त इसका उपयोग साज-सज्जा सामग्रियाँ,
रोगन की वस्तुओं के निर्माण में भी होता है।

अभ्रक का वितरण- अभ्रक के उत्पादन में भारत विश्व में प्रथम स्थान रखता है। भारत में अभ्रक की तीन पट्टियाँ हैं जो बिहार, झारखण्ड, आंध्रप्रदेश तथा राजस्थान राज्यों में विस्तृत हैं। भारत में अभ्रक का कुल भंडार 59,065 टन है। बिहार झारखण्ड में उत्तम कोटि का ‘रूबी अभ्रक’ का उत्पादन होता है। बिहार में गया, गेर भागलपुर, नवादा जिलों में इसका उत्पादन होता है। झारखंड में हजारीबाग, बाद पलाम, राँची और सिंहभूम जिलों में अभ्रक की खाने हैं। बिहार और झारखण्ड मिलकर देश का 80% अभ्रक का उत्पादन करता है। आंध्रप्रदेश के नेल्लूर जिला, राजस्थान अंतर्गत उदयपुर, जयपुर, भीलवाड़ा, अजमेर आदि जिलों में अभ्रक निकाला जाता है ।


20. लौह-अयस्क का वर्गीकरण एवं उनकी विशेषताओं को लिखिए।

उत्तर ⇒ लौह-अयस्क में उपस्थित लौहांश की मात्रा के आधार पर लौह अयस्क को तीन भागों में वर्गीकृत किया जाता है-

(i) हेमेटाइट (ii) मैग्नेटाइट. (i) लिमोनाइट .

(i) हेमेटाइट- इस लौह-अयस्क में लौहांश सबसे अधिक 70% तक पाया । जाता है। इससे लकीर खींचने पर लाल उगता है जिसके कारण इसे लाल अयस्क भी कहा जाता है। भारत में लगभग 12,317 मिलियन टन इसका भंडार उपलब्ध है।

(ii) मैग्नेटाइट- इसमें लौहांश की मात्रा 60% होती हैं। घिसने पर काला रंग दिखता है। अतः इसे काला अयस्क के नाम से जाना जाता है। भारत में इसके 540 मिलियन टन भंडार उपलब्ध हैं।

(iii) लिमोनाइट- यह सबसे घटिया किस्म का लौह-अयस्क है जिसमें लौहांश की मात्रा 40% से भी कम होता है। इसे पीला अयस्क के नाम से जाना जाता है। भंडार का आकलन उपलब्ध नहीं है।


21. ताँबा भारत के किन-किन क्षेत्रों में मिलता है? इसके वितरण और उपयोग पर प्रकाश डालें।

उत्तर ⇒ भारत में ताँबा मुख्य रूप से मध्यप्रदेश, झारखंड, राजस्थान, आंध्रप्रदेश, सिक्किम राज्यों में मिलता है। इसका सर्वाधिक उत्पादन झारखंड और राजस्थान में किया जा रहा है। झारखंड में इसकी खाने सिंहभूम जिले के घाटशिला के पास है। पलामू जिले में भी इसके विशाल भंडार मिले हैं। राजमहल क्षेत्र में भी ताँबे के भंडार का पता चला है। राजस्थान में झुनझुन और अलवर जिले में ताँबे की खानें हैं। भारत ताँबा उत्पादन में आत्मनिर्भर नहीं है। भारत ताँबा का आयातक देश हैं।ताँबा बिजली का सुचालक है अतः बिजली के तार, बल्ब, मोटर इंजन, रेडियो आदि में इसका उपयोग किया जाता है। पहले घरेलू बरतन और सिक्के भी बनाये जाते थे। ताँबा और जस्ता मिलाकर पीतल बनाया जाता है। साथ ही ताँबा में टिन मिलाने पर काँसा तैयार होता है।


22. भारत में खनिज तेल के वितरण का वर्णन कीजिए।

उत्तर ⇒ भारत में मुख्यतः पाँच तेल उत्पादक क्षेत्र हैं –

(i) उत्तर -पूर्वी प्रदेश–भारत का यह सबसे पुराना तेल उत्पादक क्षेत्र है। ऊपरी असम घाटी, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड के तेल क्षेत्र इसके अंतर्गत आते हैं। असम, डिगबोई, नहरकटिया, मोरान, रूद्रसागर और अरुणाचल प्रदेश में निगरू, नागालैंड का बोरहोल्ला प्रमुख उत्पादक क्षेत्र हैं।

(ii) गुजरात क्षेत्र-यहाँ खंभात के बेसीन और मैदानी क्षेत्र में तेल का क्षेत्र फैला हुआ है। यहाँ अंकलेश्वर, कलोल, नवगाँव, कोसाबा, मेहसाना से तेल निकाला जाता हैं।

(iii) मुंबई हाई क्षेत्र- यह. क्षेत्र मुंबई तट से 176 किमी० दूर उत्तर ⇒पश्चिम दिशा में अरब सागर में स्थित है। यहाँ समुद्र में सागर सम्राट मंच बनाकर तेल निकालने का कार्य किया जाता है।

(iv) पूर्वी तट प्रदेश- कृष्णा, गोदावरी, कावेरी नदियों के बेसीन में भी तेल की खोज की गई है।

(v) बाड़मेर बेसिन- इस बेसीन के मंगला तेल क्षेत्र से हाल ही में तेल उत्पादन शुरू हुआ है। यहाँ प्रतिदिन 56,000 बैरल तेल का उत्पादन हो रहा है। 2012 तक यह क्षेत्र भारत का 20% तेल उत्पादन करने लगेगा।


23. भारत में कोयला का कुल भंडार कितना है? कोयला का वार्षिक उत्पादन क्या है ? इसके दो महत्त्वपूर्ण उत्पादक क्षेत्रों का विवरण दें तथा दो उपयोग बताएँ।

उत्तर ⇒ भारतीय भू-गर्भ सर्वेक्षण विभाग के अनुसार भारत में कोयला का . भंडार 264.45 अरब टन है। इनमें 98% कोयला का भंडार प्राचीन गोंडवाना काल
का है और 2% टर्शियरी काल का। गोंडवाना काल का भंडार झारखंड, पश्चिमा बंगाल, उड़ीसा; आंध्रप्रदेश, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र की गोंडवाना चट्टानों में मिलती है और टर्शियरी काल का भंडार असम, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड तथा जम्मू-कश्मीर की टर्शियरी काल की चट्टानों में पाया जाता है।
वर्तमान समय में भारत में 45.6 करोड़ टन वार्षिक कोयले का उत्पादन किया जा रहा है। भारत में दामोदर घाटी के रानीगंज, झरिया, गिरिडीह, बोकारो, कर्णपुरा स कोयले का उत्पादन किया जा रहा है। यहाँ भारत का आधे से अधिक कोयला निकाला जाता है। यहाँ उच्च काट का कोयला प्राप्त होता है। कोयले का दूसरा मुख्य उत्पादक क्षेत्र मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और उडीसा राज्यों में है। ये पहाडी और दुर्गम क्षेत्र है। यहाँ मध्यप्रद में सिंगरौली, छत्तीसगढ़ में कोरबा, उड़ीसा में तालचर उत्पादन के लिए प्रमुख है।

कोयले का उपयोग- कोयले का सबसे अधिक उपयोग ताप विद्युत् उत्पा में किया जाता है और कोयले का दूसरा बड़ा उपयोग लौह इस्पात उद्योग में होता है।


24. प्रदूषण को नियंत्रित करने के उपायों का वर्णन कीजिए।

उत्तर ⇒ पर्यावरण का दूषित होना ही प्रदूषण कहलाता है। वर्तमान समय में दश में बढ़ते औद्योगिकरण ने प्रदूषण को बढावा दिया है। प्रदूषण के अन्तर्गत जल-प्रदूषण, वाय प्रदषण, भमि प्रदषण, ध्वनि प्रदषण आदि को शामिल किया जाता है। प्रदूषण हमार स्वास्थ्य एवं पर्यावरण के लिए हानिकारक होते हैं अतः इसे नियंत्रित किया जाना चाहिए।
प्रदूषण को निम्न तरीके से नियंत्रित किया जा सकता है –

(i) उद्योगों को निर्धारित क्षेत्रों में स्थापित करके।
(ii) उपकरणों की गुणवत्ता को बनाये रखकर।
(iii) धुआँ रोकने के लिए कोयले के स्थान पर तेल का प्रयोग करके।
(iv) प्रदूषित जल को नदियों में छोड़ने से पहले उपचारित करना।
(v) औद्योगिक कचरे को पृथक करके।

इस तरह से हम ऊपर लिखित तरीकों को अपनाकर प्रदूषण को नियंत्रित कर सकते हैं।


25. भूमि किस प्रकार महत्त्वपूर्ण संसाधन है ?

उत्तर ⇒ हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भूमि एक महत्त्वपूर्ण संसाधन है। आवास बनाने के लिए यातायात के साधन के लिए, कृषि के लिए, पशुपालन के लिए चारागाह, खनिज क्षेत्र, उद्योग क्षेत्र, व्यापार केंद्र, शिक्षा के लिए विद्यालय, महाविद्यालय, स्वास्थ्य के लिए हॉस्पिटल आदि कार्यों के लिए भूमि की आवश्यकता होती है।
भूमि की प्रकृति हमारे क्रियाकलापों को प्रभावित करती है। पठारी भूमि खनिजों से भरी होती है तो यहाँ खनन कार्य किया जाता है। खनिजों पर आधारित उद्योग स्थापित किए जाते हैं। समतल मैदानी भाग में वर्षा जल या सिंचाई की सुविधा होने पर अच्छी फसल उत्पादन किया जाता है। पहाड़ी भागों से वन उत्पाद प्राप्त किए जाते हैं और सीढ़ीनुमा खेत बनाकर उत्पादन लिया जाता है। इस प्रकार भूमि महत्त्वपूर्ण संसाधन है।


26. आर्थिक विकास के साधन के रूप में मानव के महत्त्व पर प्रकाश डालें।

उत्तर ⇒ मानव अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिए स्वयं अपना और अपनी विभिन्न तकनीकों का उपयोग करता है तथा प्रकृति की अन्य वस्तओं का उपयोग में लान का याग्यता मानव म हा है। मानव खोज करने की क्षमता का न रहे तो सारे प्राकृतिक पदार्थ यों ही पड़े रह जाए। इस तरह यह कहा जा सकता है कि सभी प्राकृतिक वस्तुएँ मानव की क्षमता के बिना अविकसित रह जा सकती है।
निःसंदेह, मानव ही अपने सांस्कृतिक एवं तकनीकी के सहारे सभी प्राकृतिक साधनों के मल्य में परिवर्तन लाता है। इसके लिए औद्योगिकीकरण की आवश्यकता होती है। औद्योगिक विकास मानव की क्षमता और तकनीकी कुशलता पर निर्भर करता है। वर्तमान समय में औद्योगिक विकास के कारण प्राकृतिक संसाधनों का अधिक उपयोग किया जा रहा है।
अतः स्पष्ट है कि आर्थिक विकास में मानव का महत्त्व सर्वाधिक है इसके बिना आर्थिक विकास की गाड़ी आगे नहीं बढ़ सकती।


27. नदी घाटी परियोजनाओं को बहुउद्देशीय परियोजना क्यों कहा जाता है ?

उत्तर ⇒ निम्नलिखित कारणों से नदी घाटी परियोजनाओं को बहुउद्देशीय परिवार हा जाता है-

(i) सूखे से प्रभावित क्षेत्रों में नदी के जल को नियंत्रित करके खेतों की सिंचाई की जाती है।
(ii) नदियों पर बाँध बनाकर बाढ़ की विभीषिका से लोगों को बचाया जाता है।
(iii) नदी-घाटी योजनाओं से जल-विद्युत उत्पन्न किया जाता है।
(iv) जलाशयों में मछली पालन को वृहत रूप से विकसित किया जाता है।
(v) नदी के संचित जल को कारखानों में उपयोग किया जाता है।
(vi) जल को शुद्ध कर पाइपों द्वारा शहरों में लाया जाता है और उसका दैनिक उपयोग किया जाता है।
(vii) गहरे जल में नाव चलाए जाते हैं जो यातायात एवं माल ढोने में सहयोग देता है।
(viii) नदी में बाँध बनाकर नहरें निकाली जाती हैं। उसके दोनों किनारे पर उपयोगी वृक्षों को लगाया जाता है और भूमि पर पशुचारण के लिए उपयोग किया जाता है।


28. मृदा संरक्षण पर एक निबंध लिखिए।

उत्तर ⇒ मृदा प्रकृति का एक महत्त्वपूर्ण संसाधन है। यह न केवल पौधों का विकास करती है बल्कि धरती पर के विविध प्रकार के प्राणियों को भोजन प्रदान कर जिन्दा रखती है। मृदा की उर्वरता मानव के आर्थिक क्रियाकलाप को प्रभावित करती और देश की योजनाओं को सफल बनाने में सहायक होती है। इसके नष्ट होने से प्रकृति की एक बहुमूल्य सम्पत्ति समाप्त हो जाएगी। इसलिए इसका संरक्षण जरूरी है।
किंतु जो मृदा मानवीय जीवन के सहारा का साधन बना, उसी मिट्टी का मानव ने अत्यधिक लालच के चक्कर में पड़कर शोषण और दोहन करना शुरू कर दिया। वनों की कटाई, अति पशुचारण, उर्वरकों का अत्यधिक प्रयोग, कीटनाशकों का प्रयोग, अत्यधिक सिंचाई, खनन के बाद गड्ढों को खुला छोड़ देना आदि अनेक मानवीय क्रियाकलापों से मिट्टी का क्षरण होता जा रहा है और भूमि अपरदन को बढ़ावा मिल रहा है। अतः मृदा जैसी महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक संपदा नष्ट होती जा रही है।
अतः मानव सभ्यता एवं संस्कृति को बचाने हेतु मृदा संरक्षण आवश्यक है। इसके लिए फसल चक्रण, पहाड़ी क्षेत्रों में खेतों की समोच्च जुताई, वर्षा जल संचयन, जल का संरक्षण, भूमिगत जल की पुनर्पूर्ति आदि करके मृदा को बर्बाद होने से बचाया जा सकता है।


29. विस्तारपूर्वक बताएँ कि मानव क्रियाएँ किस प्रकार प्राकृतिक वनस्पति और वन्यजीवों के ह्रास के कारक हैं ?

उत्तर ⇒ वनस्पति, मानव को दिया गया प्रकृति का एक अमूल्य उपहार है। ये वनस्पतियाँ कई प्रकार से मनुष्य के जीवन की रक्षा करते हुए विकास को गतिशील बनाने में सहायक होती हैं। विकास के इस दौर में मानव प्रकृति के इस अमूल्य योगदान को भूलता जा रहा है।
मानव ने विकास के नाम पर सड़कों, रेलमार्गों, शहरों का निर्माण करना शुरू किया। इसके लिए पेड़ों की अंधाधुंध कटाई की गयी। जिससे वनों का नाश होने लगा, वन्य प्राणियों का आश्रय स्थल ही उजड़ने लगा।
कृषि से अत्यधिक उपज के लिए अत्यधिक सिंचाई, रासायनिक खाद का प्रयोग किया गया। इसके कारण एक ओर भूमि निम्नीकरण से वनों को नुकसान हुआ तो दूसरी ओर जलों के दुषित होने से जीव-जंतु के अस्तित्व पर ही खतरा मंडराने लगा। कल-कारखाने स्थापित करने के लिए वनों की कटाई की गयी। पुनः इन कल-कारखानों से निकलने वाले धुआँ और कचरों ने वायु और जल को दुषित किया, जिससे अम्लीय वर्षा के कारण वन और वन्य प्राणियों पर खराब प्रभाव पड़ा।
वनों के ह्रास ने प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ दिया, जिससे जलवायु पारखा जैसी समस्या सामने आने लगी है।


30. विभिन्न प्रकार के भारतीय वनों का तलनात्मक विवरण परस्तुत करें। इनमें किसे सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण माना गया है ? और क्यों ?

उत्तर ⇒ धरातलीय स्वरूप, मिट्टी और जलवायु की दशाओं में विविधता कारण भारत में विभिन्न प्रकार के वन पाये जाते हैं जो निम्न प्रकार के है।

(i) चिरहरित वन या सदाबहार वन ।
(ii) पर्णपाती वन या पतझड़ वन ।
(iii) पर्वतीय वन या कोणधारी वन ।
(iv) डेल्टाई वन या ज्वारीय वन ।
(v) कटीले वन या मरुस्थलीय वन ।

(i) सदाबहार वन- भारत में सदाबहार वन सघन होते हैं। इन्हें काटना, वनों बाहर निकालना और उपयोग में लाना कठिन होता है। इनकी लकड़ी कड़ी होती है। इनमे कई जाति के वृक्ष एक साथ मिलते हैं। अधिक वर्षा और दलदली भमि के कारण यातायात में कठिनाई होती है। इसलिए लकड़ियों का सही उपयोग नहीं हो पाता है। इनमें एबॉनी और महोगनी मुख्य वक्ष पाये जाते हैं।

(ii) पतझड़ वन- ये आर्थिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं। इनमें सागवान और साल मुख्य वृक्ष पाये जाते हैं। अन्य वक्षों में अंजन चंदन चिरौंजी हरें-वडेटा आँवला, शहतूत, बरगद, पीपल, कटहल, आम, जामन, नीम, नारियल, बाँस मानसूनी न के रूप में पाये जाते हैं। ये न तो अधिक घने होते हैं और न इनकी लकड़ी अधिक कठोर ही। इनकी लकड़ियाँ उपयोगी होती है।

(iii) कोणधारी वन- यह वन पर्वत के अधिक ऊँचाई पर पाए जाते हैं। इनमें देवदार, चीड़, हेमलॉक स्प्रुस जाति के पेड़ पाए जाते हैं। इनकी लकड़ियाँ मुलायम होती है। इन्हें काटना और उपयोग में लाना आसान होता है।

(iv) ज्वारीय वन- तटीय भागों में इस प्रकार के वन पाए जाते हैं। इनमें वृक्षों की बहुतायत रहती है। लकड़ियाँ जलावन और छोटी नाव बनाने के काम आती है। इनमें सुंदरी वृक्ष, केवड़ा, मैंग्रोव, हिरिटिरा गरोन आदि मुख्य वृक्ष हैं, ताड़ और नारियल के पेड़ भी मिलते हैं।

(v) मरुस्थलीय वन- कम वर्षा वाले क्षेत्रों में पाये जाते हैं। इनमें बबूल एवं खजूर के पेड़ पाए जाते हैं। नागफनी और कैकटस जाति की झाड़ियाँ भी पायी जाती है। भौगोलिक दृष्टिकोण से सभी प्रकार के वनों का महत्त्व है। परन्तु इनमें से पतझड़ वन का सर्वाधिक महत्व है क्योंकि इस वन की लकड़ियाँ आर्थिक दृष्टिकोण से काफी महत्वपूर्ण एवं उपयोगी है।


31. भारत में पायी जाने वाली मिट्टी को कितने वर्गों में बाँटा गया है ?किन्हीं तीन प्रकार की मिट्टी की विशेषताओं और उनके क्षेत्र को लिखें।

उत्तर ⇒ भारत की मिट्टी को आठ मुख्य वर्गों में बाँटा है। जो निम्न प्रकार हैं –

(i) जलोढ़ मिट्टी, (ii) काली मिट्टी, (iii) लाल मिट्टी, (iv) लैटेराइट मिट्टी, (v) पहाड़ी मिट्टी, (vi) मरुस्थलीय मिट्टी, (vii) लवणीय एवं क्षारीय मिट्टी, (viii) जैविक मिट्टी।

(i) जलोढ मिटी- यह मिट्टी नदियों द्वारा बहाकर लायी गई और नदियों के बेसीन में जमा की गई मिट्टी है। समुद्री लहरों के द्वारा भी ऐसी मिट्टी तटों पर जमा की जाती है।
भारत में जलोढ़ मिट्टी मुख्य रूप से गंगा-ब्रह्मपुत्र नदी बेसिन एवं पूर्वी तटीय भागों में पाई जाती है। इस मिट्टी की विशेषता यह है कि इसमें सभी प्रकार के खाद्यान्न, दलहन, तेलहन, कपास, गन्ना, जूट और सब्जियाँ ऊगाई जाती हैं। इसमें नाइट्रोजन और फॉसफोरस की कमी पायी जाती है जिसके लिए उर्वरक का सहारा लेना पड़ता है। आयु के आधार पर इसे बांगर और खादर के रूप में बाँटा जाता है।

(ii) काली मिट्टी – स्थानीय स्तर पर इसे रेगुर भी कहा जाता है। इसका निर्माण दक्षिण के लावा (बेसाल्ट क्षेत्र) वाले भागों में हुआ है। कपास और गन्ने के उत्पादन के लिए यह मिट्टी अच्छी मानी जाती है। इसका बड़ा क्षेत्र महाराष्ट्र, सौराष्ट्र, मध्यप्रदेश, कर्नाटक में पाया जाता है। इसमें नमी बनाये रखने की क्षमता होती है और सूखने पर बहुत कड़ी हो जाती है।

(iii) लाल मिट्टी- यह ग्रेनाइट चट्टान के टूटने से बनी मिट्टी है। यह मिट्टी दक्षिण के पठार और कम वर्षा वाले क्षेत्रों में मिलता है। तमिलनाडु के दो-तिहाई भाग में यह मिट्टी पायी जाती है। यह कम उपजाऊ मिट्टी होती है। इसमें सिंचाई का अधिक आवश्यकता पड़ती है। इसमें विशेषकर मोटे किस्म के अनाज उत्पादन किए जाते हैं।


32. वृक्षों के घनत्व के आधार पर वनों का वर्गीकरण कीजिए और सभी वनों का वर्णन विस्तार से कीजिए।

उत्तर ⇒ वृक्षों के घनत्व के आधार पर वनों को पाँच वर्गों में बाँटा गया हैं-

(i) अत्यंत सघन वन- ऐसे वन अत्यधिक घने होते हैं। भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्र के 1.66% भाग पर इस प्रकार के वन पाये जाते है। मेघालय, मणिपुर, त्रिपुरा, मेजोरम, अरुणालच प्रदेश में मुख्य रूप प्रकार के वन पाये जाते हैं। इन्हें चिरहरित वन या सदाबहार वन भी कहा जाता है।

(ii) सघन वन- इस प्रकार के वनों में वक्षों का घनत्व 40 से 70% तक पाया जाता है। हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, मध्यप्रदेश, जम्मू-कश्मीर, महाराष्ट्र एवं उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में इसी प्रकार के वन पाये जाते हैं। कुल भौगोलिक क्षेत्र के 3% भाग में यह वन फैला हुआ है। खले वन इन वनों में वृक्षों का घनत्व 10 से 40% तक पाया जाता है। इस प्रकार के वृक्ष कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल, आंध्रप्रदेश, उड़ीसा के कुछ भाग में मिलता है। भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल के 7.12% भू-भाग पर खुले वन का फैलाव है।

(iv) झाड़ियाँ एवं अन्य वन- ऐसे वनों में वृक्षों का घनापन 10% से कम होता है। राजस्थान एवं अन्य अर्द्धशुष्क प्रदेशों में इस प्रकार के वन मिलते हैं। भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 8.68% क्षेत्र पर इसी प्रकार के वन मिलते हैं। .

(iv) मैंग्रोव वन- भारत के तटीय राज्यों में इस प्रकार का वन पाया जाता है। इसका आधार क्षेत्र पश्चिम बंगाल के सुंदरवन में है। देश के कुल भौगोलिक, क्षेत्र का 0.14% भाग मैंग्रोव वन के अंतर्गत है।


33. जल विद्युत उत्पादन हेतु अनुकूल भौगोलिक एवं आर्थिक कारकों का विवेचना करें।

उत्तर ⇒ जल विद्युत उत्पादन हेतु अनुकूल भौगोलिक कारक निम्नलिखित हैं –

(i) प्रचुर जल राशि का उपलब्ध होना,
(ii) नदी भाग में ढाल का होना,
(iii) जल का बहाव तेज होना,
(iv) प्राकृतिक जलप्रपात का होना आदि।

आर्थिक कारक –

(i) सघन औद्योगिक आबादी क्षेत्र,
(ii) बाजार,
(iii) प्रर्याप्त पूँजी निवेश, |
(iv)परिवहन का साधन,
(v) प्राविधिक ज्ञान,
(vi) अन्य ऊर्जा स्रोत का अभाव।


34. .भारत की किन्ही चार परमाणु विद्युत गृह का उल्लेख कीजिए एवं उनकी विशेषताओं को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर ⇒ भारत के चार परमाणु विद्युत गृह निम्न प्रकार हैं

(i) तारापुर परमाणु विद्युत गृह – यह एशिया का सबसे बड़ा परमाणु विद्युत गृह है। यहाँ जल उबालने वाली दो परमाणु भट्टियाँ हैं। प्रत्येक का उत्पादन क्षमता 200 मेगावाट से अधिक है। यहाँ थोरियम से प्लूटोनियम बनाकर विद्युत उत्पन्न किया जाता है।

(ii) राणा प्रताप सागर परमाणु विद्युत-  यह राजस्थान स्थित कोटा में है। इसे चंबल नदी से जल प्राप्त होता है। कनाडा के सहयोग से इसका निर्माण हआ है। इसकी उत्पादन क्षमता 100 मेगावाट है। हाल ही में 235 मेगावाट की दो इकाइयाँ शुरू की गयी हैं।

(ii) कलपक्कम परमाणु विद्युत गृह– स्वदेशनिर्मित इस परमाणु विद्युत गृह की स्थापना तमिलनाडु में की गयी है। यहाँ 335 मेगावाट के दो रिएक्टर कार्य कर

(iv) नरौरा परमाणु विद्युत गृह- यह उत्तरप्रदेश के बुलंदशहर के समीप | स्थित है। यहाँ भी 235 मेगावाट की दो रिएक्टर हैं।


35. संक्षिप्त भौगोलिक टिप्पणी लिखें। भाखड़ा नांगल परियोजना, दामोदर घाटी परियोजना, कोसी परियोजना और तुंगभद्रा परियोजना।

उत्तर ⇒

भाखड़ा नांगल परियोजना- यह सतलज नदी पर बनायी गयी भारत | की सबसे बडी नदी परियोजना है। यह विश्व का सबसे ऊँचा बाँध है। इसपर चार शक्ति गृह स्थापित हैं, जिससे 7 लाख किलोवाट विद्युत उत्पन्न किया जाता है। पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तरांचल, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान तथा जम्मू-कश्मीर, राज्यों के कृषि एवं औद्योगिक विकास में सहायक हुआ है।
दामोदर घाटी -परियोजना-झारखंड एवं पश्चिमी बंगाल को दामोदर नदी की। प्रलयंकारी बाढ़ से बचाने के लिए एवं जल विद्युत उत्पन्न करने के लिए तिलैया. मैथन, कोनार और पंचेत पहाड़ी में बाँध बनाकर इस परियोजना का विकास किया गया है। यहाँ 1300 मेगावाट जल विद्युत उत्पन्न किया जाता है। इससे बिहार झारखण्ड एवं पश्चिमी बंगाल को लाभ पहुँचता है।

कोसी परियोजना – उत्तरी बिहार की अभिशाप कोसी नदी पर हनुमान नगर । में बाँध बनाकर इस परियोजना से 20,000 किलोवाट बिजली पैदा की जाती है। इसकी आधी बिजली नेपाल देश को और बाकी बिहार राज्य में खपत होती है।

तुंगभद्रा परियोजना- आंध्रप्रदेश स्थित दक्षिणी भारत की यह सबसे बड़ी परियोजना है जो कृष्णा की सहायक नदी तुंगभद्रा पर बनाया गया है। इसकी विद्युत उत्पादन क्षमता एक लाख किलोवाट है। इसका निर्माण कर्नाटक एवं आंध्रप्रदेश राज्य के सहयोग से हुआ है।


36. वन एवं वन्य प्राणियों के महत्त्व का विस्तार से वर्णन कीजिए।

उत्तर ⇒ वन एवं वन्य प्राणी न केवल प्राकृतिक संसाधन है, बल्कि पारिस्थितिका तंत्र निर्माण के प्रमुख घटक है। मानव का इससे बडा गहरा संबंध है। वास्तव में वन प्रकति का एक अमूल्य उपहार है। वन और वन्य प्राणी मानव के लिए प्रतिस्थापित होने वाला संसाधन है। जीवमंडल में सभी जीवों को संतुलित स्थिति म जीने के लिए आवश्यक संतलित पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण में वनों का सवाधिक योगदान रहा है।
मानव जीवन की तीन मूल आवश्यकताएँ होती हैं-भोजन, वस्त्र और आवास. इन तीनों आवश्यकताओं की पर्ति के लिए मानव प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से वनों पर ही निर्भर रहता है।
इतना ही नहीं वन जलवायु को भी प्रभावित करता है। वन अपने आसपास क्षेत्रों में वर्षा करवाकर कषि को उन्नत बनाता है। यह बाढ को नियात्रत करता है , यह मिट्टी कटाव को रोकता है, मिट्टी को उर्वर बनाता है। वन्य जीवों का शरणस्थल होता है साथ ही अनेक मानवीय आवश्यकताओं की पति को भी सुलभ बनाता है। इस प्रकार यह कह सकते हैं कि प्रकति का अनपम उपहार वन एवं वन्य जाव मानक के लिए अत्यधिक महत्त्वपूर्ण संसाधन है।


37. हिमालय की नदियों से सदा जल मिलता है, पर प्रायद्वीपीय भारत की नदियाँ ऋतु विशेष में ही जलापूरित रहती हैं। क्यों ?

उत्तर ⇒ हिमालय से निकलने वाली नदियों में सदा जल इसलिए मिलता है कि हिमालय का ऊपरी शिखर बर्फ से ढका है। वर्षा जल के अतिरिक्त बफ क पिला से वर्ष भर उन नदियों में जल प्रवाहित होता रहता है। हिमालय से निकलन वाला नदियों का उदगम हिमानी से है इसलिए जल की आपर्ति होती रहती है।
जबकि दूसरी ओर प्रायद्वीपीय पठार में बहने वाली नदियाँ बरसाती है, उसमें केवल वर्षा का जल ही प्रवाहित होता है और भारत में वर्षा कुछ महीने ही होती है, शेष समय नदियाँ सूख जाती है। उसमें जल की आपूर्ति नहीं होती और जल प्रवाहित नहीं होता।


38. बायोगैस ऊर्जा पर टिप्पणी लिखें।

उत्तर ⇒ भारत एक कृषि प्रधान देश है। यहाँ बड़े पैमाने पर पशुओं को पाला जाता है। उनके गोबर, मल-मूत्र, गन्ना की खोई, धान की भूसी, कृषि के कूड़े-कचड़े, वृक्षों की झाड़ियाँ, घास-फूस से हजारों मेगावाट विद्युत उत्पन्न किया जा सकता है। गोबर गैस संयंत्र लगाकर ग्रामीण क्षेत्रों में गोबर गैस का उत्पादन भी किया जा रहा है। बड़े नगरों में भी बायोगैस संयंत्र लगाकर जरूरत पूरी की जाती है। जैसे दिल्ली नगर के ओखला में इस प्रकार का कार्य किया जा रहा है। इस गैस की तापीय क्षमता मिट्टी के तेल, उपला और लकड़ी के कोयले की तापीय क्षमता से अधिक होती है। ग्रामीण क्षेत्रों में बायोगैस का उपयोग खाना पकाने, घरों में रोशनी करने एवं सिंचाई करने में किया जाता है, शहरी क्षेत्रों में भी सडकों की रोशनी के लिए बायोगैस का प्रयोग किया जा रहा है।


39: शुष्क प्रदेशों में वर्षा जल का भंडारण किस प्रकार किया जाता है ? यह किस प्रकार उपयोगी है ?

उत्तर ⇒ धरातल पर उपयोगी जल की कमी और भूमिगत जल के स्तर में लगातार गिरावट होने के कारण वर्षा जल की महत्ता बढ़ जाती है। देश भर में वा जल का वितरण भी असामान्य है। इसलिए शुष्क प्रदेशों में जहाँ वर्षा कम होती है। वर्षा के जल संग्रह कर उपयोग में लाना और भी आवश्यक हो जाता है।
भारतवर्ष में प्राचीन काल से ही वर्षा जल के संग्रह एवं उपयोग का प्रचलन रहा है। परंत स्थानीय स्तर पर जल के संग्रह के तौर तरीके भिन्न-भिन्न हैं। भारत के पश्चिम भाग में खासकर राजस्थान में पेयजल हेतु वर्षा जल का संग्रह छतों पर किया जाता है। शुष्क एवं अद्धशुष्क प्रदेशों में वर्षा जल को गदों में जाता है जिसस सिचाइ का जा सका राजस्थान के बाडमेर और पयजल का सग्रह भामगत-टक म किया जाता है जिसे टाँका कला आगन म हआ करता हा जिस छत पर सनाहत जल को पाप जाता है। मेघालय के शिलांग में छत पर वर्षा जल के संग्रह की प्रथा आज भी प्रचलित है।
वर्तमान समय में महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, राजस्थान एवं गुजरात सहित कई राज्यों में वर्षाजल संग्रह एवं पुनः चक्रण किया जा रहा है।


40 भारत की चार प्रमख नदी घाटी परियोजनाओं का वर्णन करे।

उत्तर ⇒ भारत में एक साथ कई उद्देश्यों की पूर्ति के लिए कई नदी पार परियोजनाएँ बनाई गई है। इनमें चार मुख्य नदी घाटी परियोजना निम्नलिखित है-

(i) दामोदर नदी घाटी परियोजना- पहले दामोदर नदी विनाश लाने वाली ‘शोक नदी’ के रूप में जानी जाती थी। ये छोटानागपुर (झारखंड निकलकर पश्चिम बंगाल में हुगली नदी तक जाती है। इसके निकट कोयला और लौह-अयस्क का भंडार पाया जाता है। इस परियोजना से दामोदर और उसकी सहायक नदियों पर बाँध बनाये गये जिससे बाढ़ पर नियंत्रण किया गया, जल वित का उत्पादन किया जाने लगा, सिंचाई के लिए नहरें बनायी गई। जल विद्यत ” से छोटानागपुर और पश्चिम बंगाल के उद्योगों का भरपूर विकास हुआ।

(ii)भाखड़ा नांगल परियोजना- यह सतलज नदी पर दुनिया का सबसे ऊँचा बाँध बनाया गया है। यह भारत की सबसे बड़ी परियोजना है। इस परियोजना से 18 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई की जाती है। इससे कृषि और उद्योग में क्रांति आयी है। पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तराखंड, राजस्थान राज्य मुख्य रूप से लाभांवित है।

(iii) हीराकण्ड परियोजना- उड़ीसा राज्य के महानदी पर ससार का सबसे लंबा बाँध बनाया गया है। इससे सिंचाई और बिजली उत्पादन कर कृषि एवं उद्योग
को विकास किया गया है।

(iv) कोसी परियोजना- यह उत्तर बिहार की कोसी नदी पर बनायी गयी परियोजना है। इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य बाढ़ नियंत्रण, सिंचाई, भूमि संरक्षण, जल विद्युत उत्पादन करना है। इस परियोजना से बिहार राज्य और नेपाल देश को लाभ मिला है।


41. जल किस प्रकार एक दुर्लभ संसाधन है ?

उत्तर ⇒ पृथ्वी को जल ग्रह कहा जाता है। परंतु 96.5% जल सात महासागरों में पाया जाता है, जो यातायात को छोड़कर उपयोगी नहीं है। यह हमारी बुनियादी जरूरतों को पूरा नहीं कर सकता क्योंकि यह खारा जल है। धरती पर पाये जाने वाले जल में मात्र 2.5% भाग ही उपयोगी है। इसमें भी 70% भाग बर्फ के रूप में । ग्रीनलैंड, अंटार्कटिका महादेश तथा हिमालय के शिखरों एवं हिसदों में पाये जाते हैं शेष 30% जल ही नदी, तालाबों, भूमिगत जल के रूप में पाया जाता है। वर्षा का जल मीठा जल है। विश्व की कुल वर्षा का 4% जल ही भारत में उपलब्ध होता है। भारत में अधिक जनसंख्या के कारण प्रतिव्यक्ति प्रतिवर्ष जल उपलब्धता की दृष्टि । से भारत का विश्व में 133 वाँ स्थान है। एक अंदाजे के मुताबिक 2025 ई० तक विश्व के अनेक देशों में जल का अभाव होने लगेगा। भारत को भी इस संकट का सामना करना पड़ेगा। इस प्रकार यह कह सकते हैं कि जल एक दुर्लभ संसाधन है।


42. बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजना क्या है? इसके लाभ/ हानि को बताएँ।

उत्तर ⇒ नदी संबंधी ऐसी योजना बनाया जाना जो एक साथ कई उद्देश्यों की पूर्ति करता हो नदी घाटी बहुउद्देशीय परियोजना कहा जाता है। इस परियोजना से निम्न प्रकार के लाभ होते हैं

लाभ- 

(i) नदियों पर बाँध (बराज) बनाकर नहरें निकाली जाती है जिससे वर्षाभाव के क्षेत्र में सिंचाई की जाती है।
(ii) जल विद्युत उत्पन्न किया जाता है।
(iii) बाढ़ की रोकथाम करना, मिट्टी के कटाव को रोकना।
(iv) मछलीपालन, यातायात की सुविधा प्राप्त करना।
(v) पर्यटकों के लिए आकर्षण केंद्र बनाना आदि।

इस प्रकार के परियोजना के कुछ दुष्परिणाम भी देखे गये हैं जो निम्न है।

हानि- 

(i) नदियों पर बाँध बनाने से स्वाभाविक प्रवाह अवरुद्ध हो जाता है। नदी की तली में कचड़े जमा हो जाता है और प्रत्येक वर्ष बाद का इस बनता रहता है।
(ii) जल प्रदूषण की संभावना बढ़ जाती है इसका दष्प्रभाव जलीय जावा पड़ता है।
(iii) इस प्रकार की परियोजना से बड़े पैमाने पर विस्थापन की समस्या उत्पन्न हो जाती है।
(iv) नहरों से अधिक सिंचाई करने पर भमि की उर्वरता घटने लगती है।


43. बढ़ती जनसंख्या, औद्योगिकीकरण तथा शहरीकरण के कारण जल-दुर्लभता कैसे होती है ? व्याख्या करें।

उत्तर ⇒ (i) बढ़ती जनसंख्या- बढ़ती जनसंख्या जल दुर्लभता के उत्तरदायी एक प्रमुख कारक है। बढ़ती जनसंख्या के कारण ही अधिकतर शहरों का का सामना करना पड़ रहा है। अधिक जनसंख्या के लिए जल घरेलू उपयोग में नहीं बल्कि अधिक अनाज उगाने के लिए भी चाहिए।

(ii) कृषि का व्यवसायीकरण- हरित क्रांति की सफलता के बाद हमारे किसान वाणिज्यिक फसलों का उत्पादन कर रहे हैं। वाणिज्यिक फसलों के लिए अधिक जल तथा निवेश की आवश्यकता होती है। नलकूल तथा कुओं जैसे मनिश्चित सिंचाई के साधन भौम जलस्तर के नीचे गिरने के लिए उत्तरदायी हैं।

(iii) औद्योगिकीकरण- स्वतंत्रता के बाद भारत में तेजी से औद्योगिकीकरण और शहरीकरण हुआ। आजकल हर जगह बहुराष्ट्रीय कंपनियों बड़े औद्योगिक घरानों के रूप में फैली हुई हैं। उद्योगों की बढ़ती हुई संख्या के कारण अलवणीय जल संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है। उद्योगों को अत्यधिक जल के अलावा उनकी जलाने के लिए ऊर्जा की भी आवश्यकता होती है और इसकी पूर्ति जल विद्युत से होती है।

(iv) शहरीकरण- शहरीकरण ने भी जल दुर्लभता की समस्या में बढ़ोतरी की है। हमारे अधिकांश शहरों में जनसंख्या की अधिकता है। अधिक जनसंख्या जल संसाधनों का अति उपयोग कर रही है तथा उपलब्ध संसाधनों को प्रदूषित कर रही है।


44. भारत में पारंपरिक शक्ति के विभिन्न स्रोतों का विवरण प्रस्तुत करें।

उत्तर ⇒ भारत में पारंपरिक शक्ति के विभिन्न स्रोत निम्न प्रकार हैं –

(i) कोयला– यह ऊर्जा का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है। 2008 तक भारत में कोयला का अनुमानित भंडार 26,454.करोड़ टन का अंदाजा था और कुल उत्पादन 456.37 मिलियन टन हुआ था। यहाँ दो समूहों के कोयले का निक्षेप पाया जाता है जिसमें 96% कोयला गोंडवाना समूह का है जिसका विस्तार झारखंड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, पश्चिम बंगाल राज्यों में पाया जाता है। दूसरे प्रकार के कोयला में टर्शियरी युगीन कोयला आता है। यह नया और घटिया किस्म का कोयला है जो असम, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय और नागालैंड में मिलता है।

(ii) पेट्रोलियम- यह सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण एवं उपयोगी शक्ति का साधन है। यह अनेक उद्योगों का कच्चा माल भी है। यह गैसोलीन, डीजल, किरासन तेल. रंग-रोगन, कृत्रिम रेशा, प्लास्टिक, साबुन आदि के निर्माण में काम आता है।
भारत में पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस का भंडार 17 अरब टन है। यहाँ विश्व के कुल उत्पादन का मात्र 1% उत्पादन होता है, जो देश में खपत से बहुत कम है।

भारत में पाँच तेल उत्पादक क्षेत्र हैं। उत्तरी पूर्वी प्रदेश में असम घाटी, अरुणाचल प्रदेश के क्षेत्र आते हैं। गुजरात क्षेत्र में खंभात की खाड़ी एवं मैदानी भाग आता है। मंबई हाई क्षेत्र, पर्वी तटीय प्रदेश में, कृष्णा, गोदावरी और कावेरी की घाटियों में पाया जाता है, बाड़मेरी बेसीन से भी तेल प्राप्त किया जा रहा है।

(iii) प्राकृतिक गैस- एक अनुमान के अनुसार भारत में 700 अरब घनमीटर प्राकृतिक गैस का भंडार संचित है। 2004-05 में इसका उत्पादन 3082 करोड़ घन’ मीटर हुआ था। इसके अतिरिक्त जल विद्युत, ताप शीक्त और परमाणु शक्ति के रूप में भी पारंपरिक ऊर्जा के साधन भारत में पाये जाते हैं।


45. जल संरक्षण से क्या समझते हैं? इसके क्या उपाय हैं ?

उत्तर ⇒ मानव को प्रकृति से अनेक उपहार मिले हैं जिससे मानवीय जीवन की आवश्यकताएं पूरी होती हैं, इसलिए इनका संरक्षण आवश्यक है। इन संसाधनों में जल एक ऐसा संसाधन है जिसका फैलाव पृथ्वी के दो-तिहाई भाग पर पाया जाता है। परंतु उपयोगी जल बहुत कम है। इसलिए इसके उचित प्रबंधन एवं संरक्षण की आवश्यकता है, ताकि जल संकट दूर हो सके। जल संरक्षण के लिए सरकारी स्तर पर लगातार प्रयास जारी है। भारत सरकार ने 1987 ई० में राष्ट्रीय जल नीति बनायी थी जिसे 2002 में पुनः संशोधित कर लागू किया गया।
जल संरक्षण के लिए निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं-

(i) भूमिगत जल की पुन: पूर्ति – भूमिगतजल के स्तर में लगातार हो रहे गिरावट को नियंत्रित करने के लिए वृक्षारोपन, जैविक व कंपोस्ट का उपयोग, वेटलैंडस का संरक्षण, वर्षा जल का संचयन जैसे कार्यक्रम को चलाना उपयोगी सिद्ध होगा।
 

(ii) जल संभर प्रबंधन- जल प्रवाह या जल जमाव का उपयोग कर उद्यान, कृषि वानिकी, जल कृषि, कृषि उत्पादन को बढ़ावा दिया जा सकता है इससे पेयजल की आपूर्ति भी की जा सकती है।

(iii) तकनीकी विकास- तकनीकी के माध्यम से जल को कम-से-कम उपयोग कर अधिकाधिक लाभ लेकर भी जल संरक्षण किया जा सकता है। ड्रिप सिंचाई-लिफ्टसिंचाई, सूक्ष्म फुहारों द्वारा सिंचाई, सीढ़ीनुमा खेती से जल का संरक्षण किया जा सकता है।


46. सतत पोषणीय विकास क्या है? लिखें।

उत्तर ⇒ सतत पोषणीय विकास एक ऐसा विकास है जिसमें भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकता की पूर्ति को ध्यान में रखते हए वर्तमान पीढी अपनी आवश्यकता पूरी करे ऐसा न हो कि आर्थिक विकास की लालसा में प्राकृतिक संसाधनों का अँधाधुंध दोहन किया जाय। अधिक-से-अधिक उत्पादन के लिए कोयला, पेट्रोलियम कोअधिक-से-अधिक निकाला जाय और भविष्य के लिए कुछ बचे ही नहीं।इस संबंध में भारत और विशेष कर बिहार के संदर्भ में सतत पोषणीय विकास के अंतर्गत निम्न सुझाव समय के अनुकूल है –

(i) नहरी क्षेत्रों में अधिक सिंचाई पर बल नहीं दिया जाना चाहिए इससे पानी की बर्बादी और भूमि की उर्वरता घट जाती है।
(ii) कम वर्षा वाले क्षेत्रों में चना, बाजरा, मूंग की खेती करनी चाहिए। असमतल भमि को समतल बनाकर खेती करनी चाहिए। इसमें जल की आवश्यकता कम होती है।
(iii) सिंचाई के लिए नई तकनीक को अपनाया जाना चाहिए।
(iv) खनिज संपदा एवं खनिज तेल निकालने में आधुनिक उपक्रम एवं नई तकनीक प्रयोग में लाना चाहिए ताकि निकालने के क्रम में कम-से-कम , बर्बादी हो।
(v) वृक्षारोपण को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।


47. भारत में अत्यधिक पशुधन होने के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था में इसका योगदान लगभग नगण्य है। स्पष्ट करें।

उत्तर ⇒ पशुपालन के मामले में भारत को विश्व में अग्रणी माना जाता है। परंतु इतने पशुधन के बावजूद अर्थव्यवस्था में इसका योगदान लगभग नगण्य है। इसके निम्न कारण हैं भारत में स्थायी चरागाह की बहुत कमी है। मात्र 4% भूमि पर चरागाह बचा है। वह भी धीरे-धीरे खेती में बदलता जा रहा है। इससे पशुपालन पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। पशुओं के लिए चारा की समस्या हमेशा बनी रहती है। भारत के जिन भागों में पशुओं की संख्या अधिक मिलती है वह क्षेत्र प्राकृतिक आपदा से प्रभावित रहता है। इससे पशुओं का चारा उपलब्ध होने में कठिनाई होती है। चारे की कमी का सीधा प्रभाव दुग्ध उत्पादन पर पड़ता है, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था में पशुधन का योगदान बहुत कम हो पाता है।
भारत में पशओं के उत्तम नस्ल और उन्हें पालने के वैज्ञानिक तरीके का भी अभाव देखने को मिलता है। हालाँकि इस दिशा में सरकारी स्तर पर कई प्रयास किए गये हैं, कुछ सफलता मिली है। परंतु जितना इस दिशा में कार्य करना चाहिए उतना नहीं हो पाया है।
अतएव उत्तम नस्ल के पशुओं का अभाव, चारा का अभाव, बीमार पड़ने पर इलाज का अभाव, रख रखाव आदि में कमी, पशुपालन की वैज्ञानिक तकनीक की कमी के कारण दुग्ध उत्पादन कम हो पाता है और पशुधन अधिक होने पर भी इसका भारतीय अर्थव्यवस्था में योगदान नगण्य है।


48. भारत में जनसंख्या वृद्धि से किस प्रकार भूमि का ह्रास हो रहा है ? उन्हें रोकने के लिए सहयाद लें।

उत्तर ⇒ भारत का जनसख्याम लगातार वाद्ध स प्रातव्यक्ति भमि कम पानी जा रही है। कल-कारखानों के बढ़ने तथा नगरों के विकास से भी भूमि का ह्रास हआ है। वन क्षेत्र घटता जा रहा है। चरागाह भी समाप्त होते जा रहे हैं। का फैलाव बढ़ता जा रहा है। इसलिए भूमि के हास को रोकना जरूरी हो गया है।
अधिक सिंचाई से भी समस्या उत्पन्न हो रही है। जल जमाव के कारण निचली भमि बेकार हो जाती है। गुजरात में नमक के प्रभाव से ऊँची भूमि खेती के लायक नहीं रह गयी है। हिमाचल प्रदेश बर्फ के जमाव के कारण राज्य का चौथाई भाग खेती के योग नहीं है। भूमि के कटाव से भी भूमि-क्षेत्र घटता जा रहा है। पहाड़ी ढालों पर वर्षा जल से, शुष्क क्षेत्रों में वायु अपरदन से भी भूमि का ह्रास होता जा रहा है।

भूमि-हास को रोकने के लिए निम्नांकित सुझाव दिए जाते हैं –

(i) उपजाऊ भूमि को गैर कृषि कार्य में न उपयोग किया जाए।
(ii) जनसंख्या वृद्धि दर में कमी लायी जाए।
(iii) पहाड़ी भागों में सीढ़ीनुमा खेत बनाकर और वृक्षारोपन करके भूमि क्षरण को रोका जाय।
(iv) मरुस्थल की सीमावर्ती क्षेत्र में झाड़ियाँ लगाकर मरुभूमि के प्रसार को रोका जाए।
(v) कारखानों के आसपास औद्योगिक कचरों को फैलाने से रोका जाए।
(vi) देश में उद्योग का विकास किया जाए इससे कृषि भूमि पर पड़ रहे बोझ को कम किया जा सकता है।
(vii) प्राकृतिक आपदा से देश की रक्षा की जाए।
(viii) वायु अपरदन को रोकने के लिए पशुचारण पर रोक लगाना चाहिए।


49. भारत की जल विद्यत परियोजनाओं का विवरण प्रस्तुत करें।

उत्तर ⇒ सर्वप्रथम दक्षिण भारत में कोयला और खनिज तेल के अभाव में कर्नाटक के शिवसमुद्रम में जल शक्ति गृह स्थापित किया गया। इसके बाद बंबई, पूणे क्षेत्र में टाटा जल विद्युत परियोजना बनी। इसके बाद दक्षिण भारत में पायकारा योजना बनी जिससे कोयंबटूर, तिरूचिरापल्ली, मदुरै आदि नगरों को जल बिधुत की आपूर्ति की गयी।
हिमालय क्षेत्र में प्रथम जल विद्युत केन्द्र मंडी है। इसके बाद गंगा नहर की जिला विद्युत-ग्रिड स्थापित की गई। इसके बाद भाखड़ा नांगल योजना बनी। आज देशभर में 80 जल विद्युत केंद्र स्थापित हैं। इनमें अधिक केंद्र बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजना के अंतर्गत आते हैं जैसे महाराष्ट्र में टाटा जलविद्युत तथा कोयना-काकरापाड़ा परियोजनाएँ, कर्नाटक में शिवसमुद्रम, शिमोगा, शरावती एवं भद्रा परियोजनाएँ, केरल में पल्लीवासल आदि, तमिलनाडु में पापनशम आदि, आंध्रप्रदेश में तुंगभद्रा, नागार्जुन आदि, उड़ीसा में हीराकुण्ड, बिहार में कोसी, गंडक, झारखंड में दामोदर, पश्चिमी बंगाल में मयूराक्षी, उत्तर प्रदेश में गंगा-ग्रिड, शारदा रिहंद, हिमाचल प्रदेश में मंडी, भाखड़ा-नांगल, कश्मीर में बारामुला, निम्न झेलम आदि परियोजनाएँ हैं।
उत्तराखंड में टिहरी बाँध परियोजना और मध्यप्रदेश में नर्मदा घाटी परियोजनाएँ भी बनायी गई है जो विवाद के घेरे में हैं। आशा है विवाद खत्म होगी और परियोजनाएँ काम करने लगेगी।

2. कृषि ( दीर्घ उत्तरीय प्रश्न )


1. भारतीय अर्थतंत्र में कषि का क्या महत्त्व है ? कषि की विशेषताओं पर प्रकाश डालें।

उत्तर -भारतीय अर्थतंत्र में कृषि का निम्नलिखित महत्त्व हैं –

(i) भारत की 70% आबादी रोजगार और आजीविका के लिए कृषि पर आश्रित है।

(ii) देश के सकल राष्ट्रीय उत्पाद में कृषि का योगदान 22% ही है। फिर भी, बहुत सारे उद्योगों को कच्चा माल कृषि उत्पाद से ही मिलता है।

(iii)कृषि उत्पाद से ही देश की इतनी बड़ी जनसंख्या को खाद्यान्न की आपूर्ति होती है।

(iv) अनेक कृषि उत्पाद का भारत निर्यातक है जिससे विदेशी मुद्रा की प्राप्ति होती है।

(v)कृषि ने अनेक उद्योगों को विकसित होने का अवसर प्रदान किया है।

भारतीय कृषि की विशेषताएँ.-

भारत का एक बड़ा भू-भाग कृषि योग्य है। यहाँ की जलवायु और उपजाऊ मिट्टी कृषि कार्य को बढ़ावा प्रदान करते हैं। भारत में कहीं एक फसल, कहीं दो फसल और कहीं तीन-तीन फसल तक उगायी जाती है।
भारत में फसलों की अदला-बदली भी की जाती है, यहाँ अनाज की फसलों के बाद दलहन की खेती की जाती है। इससे मिट्टी में उर्वरा शक्ति बनी रहती है। यहाँ मिश्रित कृषि का भी प्रचलन है जिसमें गेहूँ, चना और सरसों की खेती एक साथ की जाती है।


2. भारत में कृषि के विभिन्न प्रकारों का वर्णन करें।

उत्तर- कृषि आदिकाल से किया जानेवाला आर्थिक क्रियाकलाप है। भारत में पायी जानेवाली विविध भौगोलिक एवं सांस्कृतिक परिवेश ने कृषि तंत्र को समय के अनुरूप प्रभावित किया है। भारतीय कृषि के प्रकार निम्नलिखित हैं –

(i) प्रारंभिक जीविका निर्वाह कृषि- यह अति प्राचीन काल से की जानेवाली कृषि का तरीका है। इसमें परंपरागत तरीके से भूमि पर खेती की जाती है। खेती के औजार भी काफी परंपरागत होते हैं जैसे लकड़ी का हल, कुदाल, खुरपी। इसमें जमीन की जुताई गहराई से नहीं हो पाती है। कृषि में आधुनिक तकनीक के निवेश का अभाव रहता है। इसलिए उपज कम होती है और भूमि की उत्पादकता कम होने के कारण फसल का प्रति इकाई उत्पादन भी कम होता है। देश के विभिन्न भागों में इस प्रकार की कृषि को विभिन्न नामों से पुकारा जाता है।
(ii) गहन जीविका कृषि-  इस कृषि पद्धति को ऐसी जगह अपनाया जा है जहाँ भमि पर जनसंख्या का प्रभाव अधिक है। इसमें श्रम की आवश्यकता और है। परंपरागत कृषि कौशल का भी इसमें भरपूर उपयोग किया जाता है। भमि की उर्वरता को बनाए रखने के लिए परंपरागत ज्ञान, बीजों के रख-रखाव एवं मौसा
संधी अनेक ज्ञान का इसमें उपयोग किया जाता है। जनसंख्या बढ़ने से जोतों का आकार काफी छोटा हो गया है। वैकल्पिक रोजगार के अभाव में भी जरूरत से ज्यादा जनसंख्या इस प्रकार की कृषि में संलग्न है।
(iii)व्यापारिक कृषि- व्यापारिक कृषि में अधिक पूँजी, आधुनिक कृषि तकनीक का निवेश किया जाता है। अत: किसान अपनी लगाई गई पूँजी से अधिकाधिक लाभ प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। आधुनिक कृषि तकनीक से अधिक पैदावार देनेवाले परिष्कृत बीज, रासायनिक खाद, सिंचाई, रासायनिक कीटनाशक आदि का उपयोग किया जाता है। इस कृषि पद्धति को भारत में हरित क्रांति के फलस्वरूप व्यापक रूप से पंजाब एवं हरियाणा में अपनाया गया। भारत में चाय, कॉफी, रबड़, गन्ना, केला आदि फसलें मुख्यतः व्यापार के लिए उपजाई जाती है।


3. भारतीय कृषि में उत्पादन को बढ़ाने के उपायों को सुझावें।

उत्तर -भारत में विश्व की दूसरी सबसे बड़ी जनसंख्या का वास हैं। तेजी से बढ़ती जनसंख्या और औद्योगिक क्षेत्रों के विस्तार के कारण कृषि योग्य भूमि को लगातार कमी हो रही है। मानसून की अनिश्चितता से भी कृषि उत्पादन की कमी हो रही है।
उत्पादन की वृद्धि के लिए निम्न उपाए किये जा सकते हैं-

(i) मानसून की अनिश्चितता के कारण उन्नत सिंचाई नहीं हो पाती है। इसके . लिए पंपसेटों, नहरों इत्यादि से सिंचाई की समुचित व्यवस्था करनी चाहिए।

(ii) उर्वरक तथा कीटनाशकों को ग्रामीण इलाकों तक सस्ते दर पर उपलब्ध करानी चाहिए ताकि फसलों की अच्छी प्रगति हो।

(iii) उन्नत बीजों—सामान्य बीजों से प्रति हेक्टेयर उत्पादन कम होता है। अत: उन्नत बीजों का प्रयोग करनी चाहिए। हरित क्रांति में उन्नत बीजों का महत्त्वपूर्ण योगदान है।

(iv) शस्य गहनता अर्थात् एक ही कृषि वर्ष में एक ही भूमि पर एक से अधिक फसलों के उत्पादन की क्रिया होनी चाहिए।

(v)कृषि के नवीन एवं वैज्ञानिक तरीकों को अपनाना चाहिए।


4. भारतीय कृषि पर भूमंडलीकरण के प्रभाव की व्याख्या करें।

उत्तर- भूमंडलीकरण का उद्देश्य है हमारे राष्ट्रीय अर्थतंत्र का विश्व अर्थतंत्र से जुड़ना। विश्व का बाजार सबके लिए मुक्त हो। इससे अच्छे किस्म का सामान उचित मूल्य पर कहीं भी पहुँचाया जा सकेगा।
भारतीय कृषि के विकास के लिए उपयुक्त जलवायु मिट्टी और श्रमिकों का । सहारा लेकर किसान उन्नत किस्म के खाद्यान्नों तथा अन्य कृषि उत्पादों को विश्वबाजार में प्रवेश करा सकेंगे। इसमें प्रतिस्पर्धा का सामना होगा। सामना करने के लिए उन्नत तकनीकी उपायों का सहारा लेना होगा। भारतीय कृषि में अधिकाधिक विकास करने की आवश्यकता है।
भूमंडलीकरण भारत के लिए कोई नया कार्य नहीं है। प्राचीन समय से ही | भारतीय सामान विदेशों में जाया करता था और विदेशों से आवश्यक सामग्री । भारतीय बाजारों में बिकते थे। परंतु 1990 से. वैधानिक रूप से भूमंडलीकरण और उदारीकरण की नीति अपनाने के बाद विश्वबाजार में प्रतिस्पर्धा के कारण कृषि के क्षेत्र में उन्नत तकनीक और मशीनों का प्रयोग बढ़ रहा है। साथ ही खाद्यान्नों की । अपेक्षा व्यापारिक फसल के उत्पादन को बढ़ावा मिल रहा है।


5. भारतीय कृषि पर वैश्वीकरण के प्रभावों का वर्णन करें।

उत्तर- वैश्वीकरण का अर्थ राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का विश्व की अर्थव्यवस्था से जुड़ना है। भारतीय कृषि भी 1991 के बाद से इस वैश्वीकरण की नीति से प्रभावित हुई है। विश्व बाजार की मांग के अनुरूप भारतीय किसान फसलों की खता कर विश्व बाजार में प्रवेश करने में सक्षम हो रहा हैं। भारतीय कृषि में कई उल्लेखनीय एवं सकारात्मक परिवर्तन आने लगे हैं। इनमें कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं।-

(i) महिन्द्रा एंड महिंद्रा ग्रुप अपनी मुक्त सेवा प्रारंभ कर छोटे किसानों को बड़ी कंपनियों से जोड़ने का काम कर रहा है।

(ii) पेरिस्क कंपनी पंजाब विश्वविद्यालय के साथ मिलकर राज्य में निर्यात के लिए उत्तम किस्म के टमाटर एवं आलू उत्पादन की योजनाओं पर कार्य कर रही है।

(iii) कई देशी एवं विदेशी निजी कंपनियाँ कपि एवं इसके उत्पादों के विक्रय एवं व्यापार से सक्रिय हो गई है। जैसे—रिलायंस कंपनी।

(iv) विश्व बैंक की सहायता से चार क्षेत्रों के 7 राज्यों में प्रशिक्षण एव कृषि प्रबंधन संस्थाएँ खोली गई हैं।

(v) देश में चावल और गेहँ के साथ ही साथ अन्य कई उत्पादों को बढ़ाने के लिए कार्यक्रम खोली गई हैं।


6. शुष्क भूमि कृषि की विशेषताओं का वर्णन कर।

उत्तर- शुष्क भूमि कृषि की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं-

(i) इन क्षेत्रों में प्राय: गरीब किसान रहते हैं जो पंजी के अभाव में उन्नत बीज, उर्वरक इत्यादि नहीं खरीद सकते हैं। यही कारण है कि यहा उत्पादन भी कम होता है।

(ii) यहाँ पर शुष्क समय में उपयोग हेतु वर्षा जल के संग्रहण विधि का प्रयोग किया जाता है।

(iii) आर्द्रता की कमी के कारण शुष्क भूमि के क्षेत्रों की मिट्टी में जावाश (ह्यूमस) की मात्रा कम होती है।

(iv) शुष्कता के कारण तेज हवा और आँधी से मिट्टी की ऊपरी परत का कटाव अधिक होता है।

(v) भूमिगत जल के पुनः भरण के लिए तालाबों और छोटे-छोटे अवरोधों से वर्षा जल को व्यर्थ बहने से रोका जाता है।

(vi) कृषि-उत्पादन से आय की जो कमी होती है उसे गाय, बकरी, मुर्गीपालन, रेशम उत्पादन इत्यादि से पूरा किया जाता है।


7. चावल की फसल के लिए उपयुक्त भौगोलिक दशाओं का उल्लेख करें।

उत्तर-चावल के उत्पादन की उपयुक्त दशाएँ- धान से चावल बनाया जाता है। धान मानसूनी जलवायु का फसल है जिसके लिए निम्नांकित दशाएँ उपयुक्त होती हैं –

(i) उच्च तापमान (20°C से 30°C के बीच),

(ii) पर्याप्त वर्षा (200 cm वार्षिक वर्षा) कम वर्षा वाले क्षेत्रों में उत्तम सिंचाई की व्यवस्था आवश्यक होती है,

(iii) समतल भूमि ताकि खेतों में पानी जमा रह सके,

(iv) जलोढ़ दोमट मिट्टी धान की खेती के लिए उपयुक्त मानी जाती है,

(v) पर्याप्त सस्ते श्रमिक।

प्रमख उत्पादन क्षेत्र – धान की खेती मुख्यतः गंगा, ब्रह्मपुत्र के मैदान में और डेल्टाई तथा तटीय भागों में की जाती है। इसके प्रमुख उत्पादक राज्य हैं पश्चिम बंगाल, उत्तरप्रदेश, आंध्रप्रदेश, पंजाब, बिहार, छत्तीसगढ़, तमिलनाडु, उड़ीसा, असम, हरियाणा और केरल। इसकी खेती में लगी सर्वाधिक भूमि पश्चिम बंगाल और बिहार में है। परंतु सिंचाई और खाद के बल पर पंजाब धान का प्रति हेक्टेयर उत्पादन सबसे अधिक करता है। दक्षिण भारत में इसकी खेती में सिंचाई का सहारा लेना पड़ता है। कावेरी, कृष्णा. गोदावरी और महानदी के डेल्टाओं में नहरों का जाल बिछा है जिससे इस क्षेत्र में कहीं दो फसल और कहीं तीन फसल तक धान की खेती की जाती है। प्रति हेक्टेयर उत्पादन अधिक है। इसलिए यहाँ से दूसरे राज्यों को चावल भेजा जाता है।


8. गेहँ उत्पादन हेतु मुख्य भौगोलिक दशाओं का उल्लेख करते हए भारत के गेहूँ उत्पादक क्षेत्रों के नाम लिखें।

उत्तर – गेहूं भारत की दूसरी सबसे महत्त्वपूर्ण खाद्य फसल है। भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा गेहूँ उत्पादक राज्य है। इसके उत्पादन हेतु मुख्य भौगोलिक दशाएँ इस प्रकार से हैं –

तापमान – बोते समय 10° – 15° सें ग्रे०

पकते समय 20° – 25° सें ग्रे० .

वर्षा- 75 सेमी०

मृदा – जलोढ़

गेहूँ एक रबी फसल है जो मुख्यतः निम्न क्षेत्रों में उपजाया जाता है। यह उत्तरप्रदेश, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और बिहार गहू के प्रमुख उत्पादक राज्य हैं। उत्तरप्रदेश भारत का सबसे बड़ा गेहूँ उत्पादक राज्य है।


9 .चाय उत्पादन के प्रमुख भौगोलिक दशाओं का वर्णन करें। भारत के चाय उत्पादक देशों का उल्लेख करें।

उत्तर- चाय मानसूनी जलवायु को चिरहरित झाड़ी है जो 3 मीटर तक ऊँची होती है। इसकी खेती के लिए आवश्यक भौगोलिक दशाएँ हैं –

(i) ग्रीष्म ऋतु के दौरान 24.30°C तापमान।

(ii) जड़ों में पानी नहीं जमने देने के लिए ढालू भूमि।

(iii) चाय की झाड़ियों को छाया देने के लिए बीच-बीच में छायादार वृक्ष लगाना।

(iv) गहरी दोमट मिट्टी जिसमें लोहांश, फॉस्फोरस एवं पोटाश की प्रधानता हो।

(v) ग्रीष्मकालीन रुक-रुक कर 150-500 सेमी० वर्षा।

(vi) स्त्री श्रमिकों की बहुलता।

उत्पादक क्षेत्र –

(i) उत्तर-पूर्वी राज्य असम, प. बंगाल (दार्जिलिंग)
(ii) दक्षिण का नीलगिरि पर्वतीय क्षेत्र और
(iii) उत्तर-पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र देहरादून, कांगड़ा घाटी एवं कश्मीर घाटी


10. चाय उत्पादन के प्रमुख भौगोलिक दशाओं का वर्णन करें। भारत में चाय उत्पादक तीन राज्यों के नाम लिखें।

उत्तर-चाय एक महत्त्वपूर्ण पेय फसलें है। यह झाड़ियों की कोमल पत्तियों को संसाधित करके प्राप्त की जाती है। चाय की कृषि के लिए निम्न भौगोलिक दशाएँ आवश्यक होती है –

(i) तापमान–चाय एक उष्ण एवं उपोष्ण फसल है। अतः इसके उत्पादन के लिए 20°C से 30°C तक की तापमान उपयुक्त मानी जाती है।

(ii) वर्षा- चाय के उत्पादन के लिए 150 cm से 200 cm तक की वर्षा उपयुक्त है।

(iii) आर्द्रता- चाय के पत्तियों के विकास के लिए उच्च आर्द्रता होनी चाहिए।

(iv) सस्ते श्रम– चाय की कृषि में पत्तियों को चुना जाता है, तोड़ा जाता है एवं सुखाया जाता है, जिसके लिए पर्याप्त मात्रा में सस्ते एवं कुशल श्रम की आवश्यकता पड़ती है।

(v) ढालू भूमि–चाय के पौधे के जड़ों में पानी नहीं लगना चाहिए। यही कारण है कि चाय की कृषि ढालू भूमि पर की जाती है। भारत में चाय का उत्पादन मुख्य रूप से असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु एवं केरल राज्य में किया जाता है।


11. मकई (उत्पादन) हेतु मुख्य भौगोलिक दशाओं का वर्णन करें।

उत्तर-मकई एक मोटा अनाज है जो मनुष्य के भोजन एवं पशुओं के चारे के रूप में प्रयोग होता है। इसके उत्पादन के लिए निम्नलिखित भौगोलिक दशाओं की आवश्यकता है-

(i) तापमान- 21 से 27° C तक।

(ii) वर्षा- 75 सेंटीमीटर।

(iii) मिट्टी- जलोढ़ इन सबके अलावा कुशल श्रमिकों की आवश्यकता होती है।


12. कपास की खेती के लिए उपयुक्त दशाओं और उत्पादक क्षेत्रों का वर्णन करें।

उत्तर -कपास की खेती के लिए निम्नांकित दशाएँ उपयुक्त मानी जाती हैं-

(i) उच्च तापमान (21°C से 30°C के बीच),

(ii) तेज धूप और पाला से बचाव (तेज धूप से रेशे चमकदार मजबूत और साफ निकलते हैं,

(iii) कम वर्षा (75 cm से 100 cm तक वर्षा प्रयाप्त है।

(iv) मिट्टी (लावा निर्मित काली मिट्टी सबसे अच्छी मानी जाती है। सिंचाई की सविधा होने पर जलोढ़ मिट्टी में भी इसकी अच्छी उपज होती है।

(v) सस्ते श्रमिक

प्रमुख उत्पादन क्षेत्र- भारत की काली मिट्टी के क्षेत्र में कपास की अच्छी खेती की जाती है। इस मिट्टी में नमी बनाये रखने की क्षमता होती है। यहाँ बिना सिंचाई के ही इसकी खेती की जाती है। इस क्षेत्र के कपास उत्पादक राज्य महाराष्ट्र, गजरात. कर्नाटक, मध्यप्रदेश और आंध्रप्रदेश हैं। महाराष्ट्र और गुजरात मिलकर देश का आधा कपास उत्पादन करते हैं।
पंजाब के आस-पास का क्षेत्र सिंचाई के बल पर कपास का उत्पादन करता है। उच्च कोटि के कपास के लिए यह क्षेत्र जाना जाता है। दक्षिण भारत में कावेरी नदी घाटी में सिंचाई की सुविधा. के कारण कपास की अच्छी ऊपज प्राप्त की जाती हैं।


14. मत्स्य पालन के आर्थिक महत्त्व को समझा।

उत्तर-मछलियाँ मनुष्य का एक महत्त्वपूर्ण खाद्य पदार्थ एवं प्रोटीन का स्रोत ह। मत्स्य पालन दो प्रकार से होता है समुद्री जल (खारे पानी का) एवं स्वच्छ जल का। यह भारत के विशेषकर तटीय क्षेत्रों के लोगों की जीविका का महत्त्वपूर्ण साधन है। इससे सकल घरेलू उत्पाद में वद्धि एवं विदेशी मुद्रा की प्राप्ति भी होती है। इसके विकास के लिए नीली क्रांति भी चलाई गई थी। बाद में झींगा मछली के विकास के लिए गुलाबी क्रांति भी चलाई गई।


15. भारत की प्रमुख फसलों का वर्णन करें।

उत्तर- भारत की विशालता एवं जलवायु की क्षेत्रीय विभिन्नता के कारण इसके विभिन्न भागों में विभिन्न प्रकार की फसलें उगाई जा रही हैं। जो इस प्रकार

(i) खाद्य फसलें- इसमें गेहूँ, चावल, मकई, ज्वार-बाजरा इत्यादि को रखा जाता है। कुल कृषि उत्पादन में इनका योगदान 50 प्रतिशत से भी अधिक है।

(ii) दलहन फसलों में प्रमुख रूप से अरहर, मसूर, उड़द, मूंग, मटर एवं चना प्रमुख हैं। अरहर, उड़द और मूंग खरीफ फसल हैं जबकि मसूर, मटर
और चना रबी फसलें हैं। यह भारतीयों के लिए प्रोटीन के मुख्य स्रोत हैं।

(iii) तिलहन फसलों में सरसों, अलसी, तोरी, तिल, अरंडी एवं मूंगफली को रखी गई है। इसके अलावा सोयाबीन, सूरजमुखी तथा कॉर्नफ्लावर से भी तेल निकाला जाता है। यह वसा तथा विटामिन के मुख्य स्रोत हैं।

(iv) पेय फसलों में चाय एवं कॉफी को रखा गया है। भारत चाय का विश्व में सबसे बड़ा उत्पादक एवं निर्यातक देश है। कहवा दूसरा महत्त्वपूर्ण पेय है जो अपनी गुणवत्ता के लिए विश्व प्रसिद्ध है।

(v) रेशेदार फसलें- कपास एवं जूट भारत की दो प्रमुख रेशेदार फसलें हैं। चीन एवं संयुक्त राज्य अमेरिका के बाद भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा कपास उत्पादक देश है।

(vi) नकदी फसलें- इसे व्यापारिक फसलें भी कहते हैं। इसका देश के कुल सकल घरेलू उत्पाद में 26 प्रतिशत योगदान है। भारत में नकदी फसलों के अंतर्गत गन्ना, रबर, तंबाकू, मसालें एवं फल प्रमुख हैं। भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा मसाला उत्पादक एवं निर्यातक देश है।


16. वर्षा जल की मानव जीवन में क्या भूमिका है? इसके संग्रहण एवं पुनः चक्रण की विधियों का उल्लेख करें।

उत्तर- हमारे लिए उपयोगी जल की एक बड़ी मात्रा वर्षा जल द्वारा ही पूरी होती है। खासकर हमारे देश की कृषि वर्षाजल पर ही आधारित होती है। पश्चिम भारत खासकर राजस्थान में पेयजल हेतु वर्षाजल का संग्रहण छत पर किया जाता था। प. बंगाल में बाढ़ मैदान में सिंचाई के लिए बाढ़ जल वाहिकाएँ बनाने का चलन था। शक एवं अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों में वर्षा जल को एकत्रित करने के लिए गड्ढों का निर्माण किया जाता था। जिससे मृदा सिंचित कर खेती की जा सके। इसे राजस्थान के जैसलमेर में ‘खरदीन’ तथा अन्य क्षेत्रों में ‘जोहड़’ के नाम से पुकारा जाता है। राजस्थान के वीरान फलोदी और बाड़मेर जैसे शुष्क क्षेत्रों में पेयजल का संचय भमिगत टैंक में किया जाता है। जिसे ‘टाँका’ कहा जाता है। यह प्रायः आँगन में हुआ करता है जिसमें छत पर संग्रहित जल को पाइप द्वारा जोड दिया जाता है। मेघालय के शिलांग में छत वर्षाजल का संग्रहण आज भी प्रचलित है। कर्नाटक के मैसर जिले में स्थित गंडाथूर गाँव में छत-जल संग्रहण की व्यवस्था 200 घरों में है जो जल संरक्षण की दिशा में एक मिसाल है। वर्तमान समय में महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, राजस्थान एवं गुजरात सहित कई राज्यों में वर्षा-जल संरक्षण एवं पुनः चक्रण किया जा रहा है।


17. भारतीय अर्थव्यवस्था में पशुपालन के महत्त्व को समझावें।

उत्तर- भारत एक कृषि प्रधान देश है। कृषि कार्य में पशओं महत्त्वपर्ण स्थान है। इनकी मदद से खेतों की जुताई, बुआई और कषि जसा ढलाई की जाती है। गाय, भैंस एवं बकरियों से दूध की भी प्राप्ति होती है। में विश्व का लगभग 57.1% भैंसें तथा 16.1% गोधन पाये जाते हैं। श्वेत बाद भारत विश्व का अग्रणी दुग्ध उत्पादक देश बन गया है। भारत में दा की वद्धि के लिए विश्व बैंक की सहायता से “ऑपरेशन पलड” नामक योजना आरंभ की गई है।
इस प्रकार पशुपालन कृषि कार्य, दुग्ध उत्पादन एवं ग्रामीणों की आय में वति करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।


18. भारत के सीमेंट उद्योग का वर्णन करें।

उत्तर- भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा सीमेंट उत्पादक देश है। यहाँ पर अनेक प्रकार के सीमेंट का उत्पादन होता है जैसे—पोर्टलैंड, सफेद सीमेंट, स्लैग सीमेंट, आयलवेल, पोर्टलैंड ब्लास्टफर्नेस इत्यादि। यह उद्योग कच्चे माल के निकट स्थापित किया जाता है।
सबसे पहला सीमेंट संयंत्र 1904 ई० में चेन्नई में स्थापित किया गया। यह उद्योग तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, गुजरात, छत्तीसगढ़, झारखंड, राजस्थान, मध्य प्रदेश में स्थापित है। आज भारत में 159 बड़े तथा 332 से अधिक छोटे सीमेंट संयंत्र है।
भारतीय सीमेंट की माँग विदेशों में काफी है क्योंकि यह उच्च गुणवत्ता वाला होता है। इसकी माँग दक्षिण एवं पूर्वी एशिया में काफी है। इस समय भारत में 20 करोड़ टन सीमेंट प्रतिवर्ष उत्पादन हो रहा है।


19. कृषि उत्पाद में वृद्धि सुनिश्चित करने के लिए सरकार द्वारा किये गये उपायों को लिखें।

उत्तर- कृषि उत्पाद में वृद्धि सुनिश्चित करने के लिए सरकारी स्तर पर कई प्रकार के उपाय किए गए। जो निम्न हैं –
1984 में विश्व बैंक की सहायता से नदियों के व्यर्थ बह जाने वाले जल को संग्रहित कर कृषि कार्य में उपयोग करने के लिए आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में कार्य प्रारंभ किया गया है। इसी प्रकार फसलों के उत्पादन बढाने के लिए नये प्रोग्राम बनाये गए हैं। जैसे –

(i) ICDP Wheat-इसके अंतर्गत गेहूँ के उत्पादन क्षेत्र और उत्पादकता बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है।

(ii) ICDP Rice- यह प्रोग्राम चावल के उत्पादन क्षेत्र और उत्पादकता बढ़ाने के लिए बनाया गया है।

(iii) ICDP-Coarse Cereals—यह मोटे अनाजों का उत्पादन बढ़ाने के लिए बनाया गया प्रोग्राम है।

(iv)SUBACS -गन्ना की खेती में निरंतर विकास के लिए यह प्रोग्राम चलाया जा रहा है।

(v)SJTP-पटसन की खेती के विशेष विकास के लिए यह प्रोग्राम है।

(vi) Mini-Kits—इसके अंतर्गत न और मोटे अनाजों की उत्तम किस्में किसानों को उपलब्ध करायी जाती है।

3. निर्माण उद्योग ( दीर्घ उत्तरीय प्रश्न )


1. उद्योगों का विकास क्यों आवश्यक है ?

उत्तर- उद्योगों के विकास से लोगों का जीवन स्तर ऊँचा उठता है। भारत में कृषि पर आधारित अनेक उद्योग स्थापित हैं। जैसे सूती-वस्त्र, चीनी उद्योग, चाय, कॉफी, जूट उद्योग आदि। कुछ उद्योग कृषि के विकास में लगे हैं, जैसे उर्वरक उद्योग। उद्योगों में आत्मनिर्भरता लाने के लिए उच्च कोटि की कार्यकुशलता और प्रतिस्पर्धा लाने की आवश्यकता है। जब तक औद्योगिक उत्पाद अंतर्राष्ट्रीय स्तर का नहीं होगा, तब तक अन्य देशों से हम प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकते। विदेशी मुदा अर्जित करने के लिए हमें ऐसा करना जरूरी है। विदेशी मुद्रा अर्जित कर राष्ट्रीय संपत्ति बढ़ा सकते हैं और देश को खुशहाल बना सकते हैं।


2. उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण से आप क्या समझते है ? वैश्वीकरण का भारतीय अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ा है। इसकी व्याख्या करें।

उत्तर- उदारीकरण- उद्योग को स्थापित करने के लिए एवं व्यापार को सरल एवं व्यापक बनाने के लिए नियमों एवं पाबंदियों को लचीला बनाना उदारीकरण है। इससे बाजार में प्रतिस्पर्धा उत्पन्न होती है, जिससे उपभोक्ता को सस्ता एवं गुणवत्तापूर्ण सामग्री की प्राप्ति सरल रूप में हो जाती है।

निजीकरण- जब किसी उद्योग का प्रबंधन का नियंत्रण किसी निजी व्यक्ति या सहकारी समिति के हाथ में होती है तो यह व्यवस्था निजीकरण कहलाती है। इससे किसी प्रतिष्टान पर सरकारी एकाधिकार कम या सीमित हो जाता है।

वैश्वीकरण- देश की अर्थव्यवस्था को विश्व की अर्थव्यवस्था के साथ जोड़ने की प्रक्रिया वैश्वीकरण कहलाती है। इससे प्रत्येक देश बिना किसी प्रतिबंध के पूँजी, तकनीक एवं व्यापारिक आदान-प्रदान करने में सक्षम हो पाता है। इस प्रक्रिया द्वारा भारत भी विश्व के विभिन्न देशों की अर्थव्यवस्था से जुड़ सकेगा।
वैश्वीकरण द्वारा भारत को किसी वस्तु के आयात-निर्यात में छूट, सीमा शुल्क में कमी, विदेशी पूँजी का मुक्त प्रवाह, बैंकिंग, बीमा, जहाजरानी क्षेत्रों में पूँजी निवेश, रुपयों को पूर्ण परिवर्तनशील बनाने जैसे लाभ मिल सकेंगे। इन उद्देश्यों की पूर्ति होने पर भारतीय अर्थव्यवस्था में कई सुधार हुए हैं। या यह कह सकते हैं कि वैश्वीकरण ने भारतीय अर्थव्यवस्था को काफी गतिशील बनाया है।


3. उद्योगों की स्थापना के विभिन्न कारकों का विस्तत वर्णन करें।

उत्तर-किसी स्थान पर उद्योगों को स्थापित करने के लिए कुछ अनिवार्य सुविधाओं की आवश्यकता होती है।
इन्हें उद्योग स्थापना के कारक कहते हैं, जैसे –

 (i) कच्चामाल-  इसे ही प्रयोग कर विभिन्न प्रकार की वस्तओं का उत्पादन किया जाता है। जैसे गन्ना से चीनी, कपास से सूती वस्त्र, बॉक्साइट से एलुमिनियम इत्यादि।

(ii) शक्ति के साधन-  इसके अंतर्गत ऊर्जा के स्रोतों को रखा जाता है जिसकी सहायता से मशीनें चलती हैं। इसमें ताप एवं जल विद्युत के स्रोतों – को रखा जाता है।

(iii) संचार के साधन – कच्चा माल को कारखाने तक एवं तैयार मालों को बाजार तक पहुँचाने के लिए सड़क, रेल एवं जल परिवहन का प्रयोग होता है।
 (iv) श्रमिक–  इसके विकास के लिए कुशल एवं सस्ते श्रमिकों की भी आवश्यकता पड़ती है।
(v) बाजार– बाजार में माँग के अनुसार ही वस्तुओं का उत्पादन तय किया जाता है।
(vi) पूँजी- मशीनों को लगाने, कच्चे माल खरीदने, श्रमिकों का वेतन देने तथा बाजार तक पहुँचाने के लिए एक बड़ी पूँजी की आवश्यकता पड़ती है।


4. भारत में औद्योगिक विकास की समस्याओं का उल्लेख करें।

उत्तर -कषि प्रधान भारतवर्ष में औद्योगिक विकास भी तेजी से हो रहा है। औद्योगिक विकास से कई समस्याएँ दूर हो सकती हैं। किंतु विकास के राह में अनेकों समस्याएँ सामने आती है। जिनमें कुछ समस्या निम्नलिखित हैं-

(i) कई ऐसे उद्योग है जिनमें आधुनिक संयंत्र नहीं हैं जिससे उत्पादन कम होता है। जैसे—उत्तर भारत की चीनी मिलें और पश्चिम बंगाल की जुट मिलों में।

(ii) कुछ उद्योगों के गौण उत्पादों का समुचित उपयोग होना चाहिए। जैसे- रबर की बढती माँग को देखकर खनिज तेल के अवांछनीय पदार्थों से रासायनिक रबर तैयार किये जा सकते हैं।

(iii) कुछ क्षेत्रों में प्राकृतिक संपदा का उपयोग उद्योगों के विकास में नहीं हो पा रहा है। जैसे उत्तरी-पूर्वी राज्यों में कागज़ बनाने की संपदा उपलब्ध है जिसका उपयोग न कर कागज का आयात किया जाता है।

(iv) कुंटीर उद्योग और लघु उद्योग का पुनर्गठन आधुनिक ढंग से नहीं किया जा रहा है।

(v) यातायात के साधनों का विकास होना चाहिए। अभी भी बहुत सारे क्षेत्र रेल साधनों से वंचित हैं।

(vi) औद्योगिक केंद्रों को भरपूर बिजली की आपूर्ति होनी चाहिए। ब्रेकडाउन पर नियंत्रण करना चाहिए।

(vii) औद्योगिक क्षेत्रों में राजनीतिक माहौल बिगड़ता जा रहा है जिससे श्रमिकों की समस्या उत्पन्न हो रही है। इसपर नियंत्रण की आवश्यकता है।


5.भारतीय अर्थव्यवस्था में उद्योगों के योगदान का विस्तार पूर्वक वर्णन करें।

उत्तर- भारत में सकल घरेलू उत्पाद में निर्माण उद्योग का योगदान 17% है। पिछले दशक में भारतीय निर्माण उद्योग में 7% की दर से वृद्धि हुई है। अगले दशक में यह वद्धि दर 12% होने की आशा है। 2007-2008 में विकास की दर 9-10 प्रतिवर्ष हो गई। 12 प्रतिशत वृद्धि की दर पूरा करने के लिए राष्ट्रीय विनिर्माण प्रतिस्पर्दा परिषद की स्थापना की गई है। अर्थशास्त्रियों के अनुमान के अनुसार (नई) औद्योगिक नीतियों से अगले दशक में वृद्धि दर और बढ़ने की आशा है।
किसी भी देश की प्रगति वहाँ के औद्योगिक विकास पर निर्भर करती है। उद्योग, प्राकृतिक संसाधन के मूल्य वृद्धि में सहायक होता है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत में औद्योगिकीकरण की ओर विशेष ध्यान दिया गया और कई बड़े-बड़े उद्योगों की स्थापना की गई। आज भारत कच्चा माल का निर्यातक नहीं, बल्कि निर्मित माल का निर्यातक बन गया है। राष्ट्रीय आय का बड़ा भाग उद्योग से प्राप्त होता है। उद्योगों में लाखों लोगों को रोजगार प्राप्त है। औद्योगिक प्रगति से कृषि का भी विकास हुआ है। आज हम अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करने में स्वयं सक्षम हैं। आज भारत इस स्थिति में है कि वह विदेशों में औद्योगिक इकाई स्थापित करने के लिए परामर्श सेवाओं के साथ प्रबंधक मुहैया करने में सक्षम है।


6. भारत में सूती वस्त्र उद्योग के वितरण का वर्णन करें।

उत्तर-सूती वस्त्र उद्योग देश का काफी प्राचीन उद्योग है जिसमें लगभग 3.5 करोड़ लोग लगे हुए हैं। इस उद्योग का पहला कारखाना 1854 में मुंबई में स्थापित किया गया। आज इस उद्योग के देश में लगभग 18,46 से अधिक मिले हैं। सर्वाधिक मिलें महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु एवं पश्चिम बंगाल में हैं। दक्षिण भारत में जलशक्ति के विकास के कारण इस उद्योग का विकेंद्रीकरण हुआ है। सूती-वस्त्र उद्योग के कारखाने आरंभ में कपास उत्पादक क्षेत्रों में लगाए गए, बाद में इसका विकेंद्रीकरण पूरे देश में हुआ है। 1950-51 में लगभग 4 अरब मीटर कपड़ा तैयार किया गया जो आजकल 53 अरब मीटर हो चुका है। वर्तमान में इस उद्योग के केंद्र मुंबई, अहमदाबाद, कोलकाता, कानपुर, चेन्नई, बड़ोदरा, कोयंबटूर, मदुरै, ग्वालियर, सूरत, मोदीनगर, शोलापुर, इंदौर, उज्जैन, नागपुर हैं। देश में कुल सूती वस्त्र मिलों का 80% निजी क्षेत्र में और शेष सार्वजनिक एवं सहकारी क्षेत्र में है। देश का 25% सूती-वस्त्र तैयार करने के कारण मुंबई को ‘कॉटनोपोलिस’ कहा जाता है।
देश के इस वृहत उद्योग का औद्योगिक उत्पादन में 14%, सकल घरेलू उत्पादन में 4% तथा विदेशी आय में 17% से अधिक योगदान है। इतना महत्त्वपूर्ण होते हुए भी आज यह उद्योग कई समस्याओं से गुजर रहा है। फिर भी, 1999-2000 में देश से 577 अरब रुपये मूल्य के सूती वस्त्र का निर्यात किया गया। कुल निर्यात में वस्त्र उद्योग की भागीदारी 30% है।


7. भारत में सूती वस्त्र उद्योग का विकास किन क्षेत्रों में और किन कारणों से हुआ है? विस्तृत विवरण दें।

उत्तर- भारत सूती वस्त्र का निर्माता प्राचीन काल से रहा है। वर्तमान समय में औद्योगिक उत्पादन में इसका 20% योगदान है। इस उद्योग में लगभग डेढ़ करोड़ लोग लगे हैं। भारत में कुल निर्यात में इसका योगदान 25% सूती वस्त्र उद्योग की स्थापना सबसे अधिक महाराष्ट्र और गुजरात राज्य में हुआ है। महाराष्ट्र में 122 कारखाने स्थापित है। केवल मुंबई महानगर में 62 कारखाने स्थापित है। गुजरात दूसरा बड़ा वस्त्र उत्पादक राज्य है। यहाँ 120 कारखाने स्थापित है जिनमें 72 कारखाने अहमदाबाद में स्थापित हैं।
महाराष्ट्र और गुजरात राज्य में वस्त्र उद्योग के विकास का मुख्य कारण है कपास की पर्याप्त उपलब्धता, कपास एवं मशीनरी के आयात निर्यात की सुविधा बंबई और कांडला बंदरगाह से प्राप्त है। कुशल कारीगर की उपलब्धता है। इसके अतिरिक्त मध्यप्रदेश, तमिलनाडु, उत्तरप्रदेश, पश्चिम बंगाल में भी सूती वस्त्र उद्योग का अच्छा विकास हुआ है। इन जगहों पर सस्ते श्रमिक, परिवहन के साधन, जल विद्युत की सुविधा उपलब्ध होने के कारण विकास में मदद मिला है।


8. भारत में चीनी उद्योग के विकास और कारणों पर प्रकाश डाले।

उत्तर -चीनी उद्योग कृषि पर आधारित उद्योग है। इसका कच्चा माल गन्ना है। अतः अधिकतर चीनी मिलें गन्ना उत्पादक राज्यों में मुख्य रूप से स्थापित की गयी है। उत्तर भारत में उत्तरप्रदेश, बिहार, पंजाब, हरियाणा राज्यों में चीनी की मिलें स्थापित की गयी हैं उत्तरप्रदेश में चीनी की लगभग 100 मिले हैं। यहाँ इसके लिए निम्नांकित सुविधा उपलब्ध हैं।

(i) गन्ने की अच्छी खेती,
(ii) परिवहन की अच्छी व्यवस्था, ‘
(iii) सस्ते श्रमिक और घरेलू बाजार।

1960 तक यह देश का प्रथम उत्पादक राज्य था। परंतु अब उत्पादन घट कर एक-चौथाई पर आ गया है।
बिहार राज्य में चीनी की बीसों मिलें स्थापित है, परंतु उत्पादन कम है। उत्तर भारत में पंजाब और हरियाणा राज्य में भी एक दर्जन से अधिक चीनी की मिलें स्थापित हैं।
दक्षिण भारत में महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश और तमिलनाडु में चीनी की मिलें स्थापित हैं। महाराष्ट्र में चीनी मिलों के लिए निम्नांकित सुविधाएँ प्राप्त हैं—

(i) गन्ने की प्रति हेक्टेयर ऊपज अधिक, रस का अधिक मीठा होना और रस अधिक निकलना।
(ii) उपयुक्त जलवायु
(iii) यहाँ चीनी की मिलें स्वयं गन्ने की खेती करती हैं।
(iv) समुद्री तट के कारण निर्यात की सुविधा।
चीनी उत्पादन में आज महाराष्ट्र देश में प्रथम स्थान प्राप्त कर चुका है।


9. भारत के रसायन उद्योग का वर्णन करें।

उत्तर- यह एक विकसित उद्योग में से एक है जो दवाएँ, कीटनाशक, कृत्रिम रबर, प्लास्टिक की वस्तुएँ आदि का निर्माण करती हैं। औषधी निर्माण में भी भारत का स्थान विकासशील देशों में अग्रणी है। आकार की दृष्टि से भारत का रसायन उद्योग एशिया में तीसरे तथा विश्व में 12वें स्थान पर है। भारत के औद्योगिक उत्पाद और निर्यात दोनों में इसका योगदान 14 प्रतिशत और सकल घरेलू उत्पाद में 3 प्रतिशत है। रसायन उद्योग के दो भागों में बाँटा गया है। कार्बनिक जिसमें कृत्रिम रेशें, कृत्रिम रबर, प्लास्टिक की वस्तुएँ एवं औषधियों को शामिल किया जाता है। इसकी स्थापना तेलशोधक संयंत्र तथा पेट्रोकेमिकल संयंत्र के निकट होता है। इसका सर्वाधिक संकेंद्रण मुंबई तथा बड़ोदरा के निकट है।
दूसरा अकार्बनिक रसायन उद्योग जिसमें कीटनाशक रसायन, नाइट्रिक एसिड, सोडा ऐश, सल्फ्यूरिक एसिड इत्यादि का उत्पादन होता है। इसमें गंधकाम्ल (सल्फ्यूरिक एसिड) तथा सोडा ऐश सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है।


10. भारत में सूचना और प्रौद्योगिकी उद्योग का विवरण दीजिए।

उत्तर- सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग को ज्ञान आधारित उद्योग भी कहा जाता है, क्योंकि इसमें उत्पादन के लिए विशिष्ट नये ज्ञान, उच्च प्रौद्योगिकी और निरंतर अनुसंधान की आवश्यकता रहती है। इस उद्योग के अन्तर्गत आने वाले उत्पादों में ट्रांजिस्टर, टेलीविजन, टेलीफोन, पेजर, राडार, मोबाइल फोन, जैव प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष उपकरण, कम्प्यूटर इत्यादि आते हैं। भारत में इसके प्रमुख उत्पादक केन्द्र बंगलूर, मुम्बई, दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई इत्यादि है। इसके अलावा देश में 20 साफ्टवेयर प्रौद्योगिकी पार्क स्थापित किये गये हैं। वर्तमान समय में यह अत्यधिक रोजगार उपलब्ध करवाने वाला उद्योग बन चुका है।


11. भारत में एलुमिनियम उद्योग का वर्णन करें ।

उत्तर- एलुमिनियम उद्योग भारत का दूसरा सबसे बड़ा धातु उद्योग है। एलुमिनियम का वायुयान, बर्तन, तार इत्यादि बनाने में प्रयोग किया जाता है। इसका कच्चा माल बॉक्साइट है। बॉक्साइट को गलाने में सर्वाधिक विद्युत ऊर्जा खर्च हो जाती है। अतः इसे वहीं लगाया जाता है जहाँ सस्ती पनबिजली उपलब्ध हो। एक टन एलुमिनियम बनाने के लिए 6 टन बॉक्साइट और 18,600 किलोवाट बिजली की जरूरत होती है। भारत में एलुमिनियम बनाने के 8 कारखाने हैं, जो उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, केरल, झारखंड, उत्तरप्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र एवं तमिलनाडु में स्थित है।


12. औद्योगिक प्रदूषण से क्या खतरा उत्पन्न हो रहा है ? इसके निराकरण के लिए सुझाव दें।

उत्तर- औद्योगिक गतिविधियों का सबसे खराब प्रभाव पर्यावरण पर पड़ा है। उद्योगों विशेषकर रासायनिक उद्योगों, सीमेंट, इस्पात, उर्वरक, चमड़ा उद्योग आदि से बड़ी मात्रा. में विषैले गैस निकलकर वायु को प्रदूषित करते हैं। इसी प्रकार कारखाने से निकलने वाले कचड़े को जलाशय में प्रवाहित करने से जल प्रदूषण की समस्या पैदा हो रही है। औद्योगिक प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए निम्न उपाय किए जा सकते हैं –

(i) कोयला और खनिज तेल के स्थान पर पनबिजली का उपयोग बढ़ाया जाए।
(ii) कारखाने के कचड़े को पहले उपचारित कर लिया जाए फिर विसर्जित किया जाए।
(iii) कारखाने से निकले प्रदूषित जल को रासायनिक प्रक्रिया से उसे साफ करने के बाद ही जलाशय में गिराना चाहिए।


13. भारत में लौह एवं इस्पात उद्योग के वितरण का वर्णन करें।

उत्तर- खनिज आधारित उद्योगों में लोहा एवं इस्पात का उद्योग काफी महत्त्वपूर्ण है। देश में आधुनिक ढंग का पहला सफल एवं छोटा कारखाना 1874 में कुल्टी (प०बंगाल) में लगाया गया था जबकि आधुनिक ढंग का बड़ा कारखाना 1907 में साकची (जमशेदपुर) नामक स्थान पर टिस्को नाम से खुला। इसके बाद 1919 में बर्नपुर (प०बंगाल) तथा 1923 में भद्रावती (कर्नाटक) में लौह-इस्पात कारखाने खोले गए। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद राउरकेला (उड़ीसा), दुर्गापुर (प०बंगाल) एवं भिलाई (छत्तीसगढ़) में इसके कारखाने लगाए गए। तृतीय पंचवर्षीय योजना में बोकारो (झारखंड) में इसका एक कारखाना लगाया गया जो 1974 से कार्यरत है। 20 वीं सदी के उत्तरार्द्ध में तीन और कारखाने सलेम, विशाखापत्तनम और विजयनगर में स्थापित किया गया। वर्तमान समय में लोहा एवं इस्पात के 10 बड़े एवं 200 से अधिक लघु कारखाने हैं। इनमें जमशेदपुर को भारत का बर्मिंघम कहा जाता है।देश में इस उद्योग के स्थानीयकरण की चार प्रवृत्तियाँ दिखती हैं—

(i) लौह-अयस्क क्षेत्र की निकटता

(ii) कोयला क्षेत्र की निकटता

(iii) दोनों की मध्यवर्ती स्थिति और

(iv) बंदरगाह की निकटता।


14. उत्तर भारत और दक्षिण भारत के चार-चार राज्यों का नाम लिखें ।जो चीनी उद्योग में विकसित हैं। इन उद्योगों की प्रमुख समस्या क्या है ?

उत्तर- चीनी उद्योग में विकसित उत्तर और दक्षिण भारत के चार-चार राज्य निम्न हैं।

  • उत्तर भारत के राज्य–(i) उत्तरप्रदेश, (ii) बिहार, (iii) पंजाब एवं (iv) हरियाणा।
  • दक्षिण भारत के राज्य–(i) महाराष्ट्र, (ii) कर्नाटक, (iii) आंध्रप्रदेश एवं (iv) तमिलनाडु।

चीनी उद्योग की वर्तमान समस्याएँ निम्नलिखित हैं –

(i) गन्ने की खेती का कम होता जाना जिसके कारण कच्चा माल गन्ना कारखाने को नहीं मिल पाता है।
(ii) उच्च कोटि के गन्ने की खेती की कमी,
(iii) उत्तर भारत की मिलें पुरानी हैं उसमें पुराने तकनीक का ही प्रयोग किया जा रहा है।
(iv) विद्युत आपूर्ति आवश्यकता के अनुसार नहीं मिलता है।
(v) गन्ने की खेती में समय अधिक लगता है। इसलिए किसान इसकी खेती करने को लाभप्रद नहीं मानते और नकदी फसल पैदा करने पर बल देते हैं।

4. परिवहन, संचार एवं व्यापार ( दीर्घ उत्तरीय प्रश्न )


1. भारतीय अर्थव्यवस्था में परिवहन एवं संचार साधनों की महत्ता को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर-परिवहन एवं संचार के साधन भारत की अर्थव्यवस्था में महत्त्वपूर्ण योगदान कर रहे हैं। इससे अर्थव्यवस्था को प्रगति की दिशा मिली है। परिवहन के साधन उपलब्ध रहने से कच्चे माल कारखाने तक एवं तैयार माल को बाजार तक पहुँचाने में आसानी होती है। संचार के माध्यम राष्टीय स्तर से लेकर सामाजिक स्तर तक शांतिपूर्ण माहौल बनाने में सहायक होते हैं। भारत एक विशाल भौगोलिक आकार एवं विविध संस्कृतियों वाला देश है, जिसे परिवहन एवं संचार के साधन एक-दूसरे को जोड़ने का कार्य करते हैं। यही नहीं संचार के साधन सामाजिक-सांस्कृतिक स्तर को ऊँचा उठाने में भी योगदान करते हैं। भारत, पाकिस्तान, नेपाल एवं बंगलादेश के साथ परिवहन संपर्क दो देशों के बीच की सामाजिक-सांस्कृतिक विकास का सूचक है।
परिवहन एवं संचार के बिना किसी भी प्रकार की आर्थिक प्रक्रिया लगभग असंभव है। ये साधन हमारे जैविक पक्ष को प्रभावित करती हैं। जन्म से लेकर मृत्यु तक हमारा जीवन इन्हीं साधनों पर आश्रित है। जीवन जीने के लिए अनाज, शाक-सब्जियों तथा फलों की आपूर्ति में इन्हीं साधनों का सहारा लेना पड़ता है। इसलिए यह स्पष्ट होता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में परिवहन एवं संचार के साधन का महत्त्व अत्यधिक है।


2. यातायात के साधनों को देश की ‘जीवन रेखा’ क्यों कहा जाता है ?

उत्तर-यातायात के आधुनिक साधन किसी भी राष्ट्र और उसकी अर्थव्यवस्था की जीवन रेखाएँ हैं। यातायात के विकसित साधनों के माध्यम से पूरी पृथ्वी घर-आँगन सी बन चुकी है। इन साधनों के माध्यम से एक स्थान से दूसरे स्थान पर कम समय में आसानी से पहुँचा जा सकता है। जो दरियाँ तय करने में हफ्तों-महीनों लगते थे। वह अब घंटों में तय हो जाती है। आज पर्वत, पठार, घाटियाँ, वन, सागर-महासागर बाधक नहीं रहे, आसानी से उन्हें पार किया जाता है।
परिवहन के सभी साधनों ने मिलकर सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक क्रांति पैदा कर दी है। परिवहन के साधनों द्वारा उपयोगी वस्तुएँ बाजार तथा उपभोक्ताओं तक शीघ्रता से पहुँचाई जाती है। देश के विभिन्न क्षेत्रों में अशांति, सूखा, बाढ़ अथवा । महामारी जैसी समस्या का आसानी से मुकाबला किया जा सकता है और तत्काल सहायता पहुँचाने में सक्षम है। यातायात के साधनों के विकास ने देश के विभिन्न भागों के लोगों में भाईचारगी पैदा की है, राष्ट्रीय एकता को मजबूत किया है और आर्थिक मजबूती प्रदान की है।औद्योगिक विकास मूलतः यातायात के साधनों पर ही निर्भर है। कच्चा माल कारखाने तक लाने और तैयार माल बाजार तक ले जाने में यातायात के साधन ही। सहायक होते हैं।


3. भारत में संचार के प्रमुख साधन कौन-कौन हैं ? उनका विवरण दें ।

उत्तर-भारत में संचार के साधन डाक सेवा, मोबाइल, इंटरनेट, टेलीफोन सेवा, रेडियो, टेलीविजन, सिनेमा एवं समाचार पत्र हैं।

डाक सेवा- भारत में डाकघरों का जाल संसार में सबसे बड़ा है। इस समय देश में लगभग 1.5 लाख डाकघर हैं। इनकी अधिक संख्या ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यरत है।

तार-टेलीफोन सेवाएँ- भारत में टेलीग्राम की सेवाएँ 1851 में आरंभ हुई और। टेलीफोन की सेवाएँ 1881 में आरंभ की गई। आज देश भर में 38338 टेलीफोन । एक्सचेंज काम कर रही है। भारत का दूरसंचार एशिया में सबसे आगे है। आज श-विदेश से संपर्क में इसका बड़ा योगदान है।

रेडियो टेलीविजन और सिनेमा- ये जनसंचार का इलेक्ट्रॉनिक माध्यम है। जिनसे मनोरंजन के साथ सूचनाओं और समाचारों का प्रसारण होता है। कम्प्यूटर और इंटरनेट की सविधाओं ने संचार में क्रांति उत्पन्न कर दी है। समाचार पत्रों और अन्य पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से संचार का महत्त्वपूर्ण कार्य किया जा रहा है। पुस्तक ज्ञान और सचना के माध्यम हैं।


4. 1991 की नई आर्थिक नीति की समीक्षा करें। क्या यह राष्ट्रहित के अनुकूल हुआ ?

उत्तर-1991 के आर्थिक संकट के बाद भारत ने आर्थिक सुधारों के लिए कई क्षेत्रों में नई-नई नीतियाँ बनायी जिसे सम्मिलित रूप से नई आर्थिक नीति के नाम से जाना जाता है।
भारत द्वारा विश्व व्यापार संगठन की सदस्यता स्वीकार करने के साथ ही भारतीय अर्थव्यवस्था पर वैश्वीकरण का प्रभाव पडना प्रारंभ हो गया। विश्व की बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए भारत के द्वार खुल गये और भारतीय कंपनियाँ भी पूरे विश्व में फैलकर व्यापार करने लगी। इसके पक्ष या विपक्ष में भारत के अर्थशास्त्रियों के विचार अलग-अलग हैं। कुछ इसे राष्ट्रहित में मानते हैं और कुछ इसे राष्ट्रहित में नहीं मानते।
राष्ट्रहित के अनुकूल मानने वालों का कहना है कि-

(i) इससे उत्पादकता बढ़ेगी।
(ii) लोगों का जीवन-स्तर सुधरेगा।
(iii) प्रतिस्पर्धा के कारण कार्यकुशलता में वृद्धि होगी।
(iv) अर्थव्यवस्था की संरचना में सुधार होगा।
(v) अच्छी वस्तुएँ भी कम मूल्य पर उपलब्ध हो सकेंगी।
(vi) राष्ट्रीय संसाधनों का समुचित उपयोग होगा।

राष्ट्रहित के प्रतिकूल मानने वालों का कहना है कि –

(i) पूँजी-प्रधान उद्योगों का महत्त्व बढ़ने से कंप्यूटर आदि का उपयोग बढ़ेगा और रोजगार का अवसर घटेगा। बेरोजगारी बढेगी।
(ii)भारत में लघु और कुटीर उद्योग की बहुलता है। विश्व बाजार की कड़ी प्रतिस्पर्धा में ये टिक नहीं पायेंगे और लघु एवं कुटीर उद्योग के लिए । वह शुभ घड़ी न होगी।
(iii) महँगाई बढ़ेगी, गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों के लिए कठिन घड़ी होगी। बाजार माँग के अनुसार नकदी फसल का उत्पादन बढ़ेगा और खाद्यान्न का उत्पादन कम हो सकेगा।


5. भारत के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

उत्तर-स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत में औद्योगिक एवं आर्थिक विकास तेजी है। अत: आज भारत का व्यापारिक संबंध विश्व के अनेक देशों के साथ गहरा है जो आर्थिक विकास के साथ लगातार विकसित होता जा रहा है। भारत का 1950-51 में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार 1,214 करोड़ रुपये का हुआ था जो 2007-08 में बढ़कर 16,053022 करोड़ रुपये तक पहुँच गया है। परंतु यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि व्यापार में वृद्धि के बावजूद निर्यात की दर आयात की अपेक्षा घट गया है। यह अंतर्राष्ट्रीय व्यापार, प्रतिकल व्यापार संतुलन का द्योतक है जो देश के हित में नहीं है। फिर भी इन दिनों भारत अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सॉफ्टवेयर महाशक्ति के रूप में उभर रहा है। जिसके परिणामस्वरूप सूचना-प्रौद्योगिकी के व्यापार से भी भारत अत्यधिक विदेशी मुद्रा अर्जित कर रहा है।


6. भारत में पाए जाने वाले विभिन्न प्रकार के सड़कों का विस्तत विवरण दें।

उत्तर-भारत में पाये जाने वाले विभिन्न प्रकार के सडकों का ब्योरा इस प्रकार है –

(i).राष्ट्रीय राजमार्ग- यह देश के विभिन्न राज्यों को आपस में जोड़ने का काम करता है। इस दृष्टि से राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 7 देश का सबसे लम्बा राष्ट्रीय राजमार्ग है। यह 2,369 किमी० की लम्बाई में वाराणसी, जबलपुर, नागपुर, हैदराबाद, बंगलूरू एवं मदुरै होते कन्याकुमारी तक जाता है। राष्ट्रीय राजमार्ग की देख-रेख | का दायित्व केंद्र सरकार पर है। देश भर में 228 राष्ट्रीय राजमार्ग 79,116 किमी० क्षेत्र में फैले हुए हैं।

(ii) राज्य राजमार्ग- यह राजमार्ग राज्यों की राजधानियों को विभिन्न जिला । मुख्यालयों को जोड़ने का काम करती हैं। इसके निर्माण एवं देख-रेख का दायित्व । राज्य सरकारों पर है। ये सभी राजमार्ग, राष्ट्रीय राजमार्ग से जुड़े होते हैं। कुल ल० . 1 24.65.877 कि०मी० है।

(ii) जिला सड़कें – जिला सड़कें राज्यों के विभिन्न जिला मुख्यालयों एवं । शहरों को जोड़ने का काम करती हैं। देश के कुल सड़कों का 14% जिला सड़कें । हैं। इनका देख-रेख व निर्माण की जिम्मेवारी राज्य सरकार का है। क्षेत्रीय विकास में इनका अधिक महत्त्व है।
(iv) ग्रामीण सड़कें –ये सड़कें विभिन्न गाँवों को एक-दूसरे से जोड़ने का काम करती है। देश के कुल सड़कों में इनका हिस्सा 14% है। क्षेत्रीय विकास में इन सड़कों की अहम भूमिका होती है। इनके निर्माण एवं देख-रेख की जिम्मेवारी राज्य सरकार की है।


7. अंतर्राष्ट्रीय व्यापार किसे कहते हैं? आजादी के बाद इसमें आयी प्रगति का वर्णन करें।

उत्तर-जब व्यापार दो या दो से अधिक देशों के बीच हो तो उसे अंतर्राष्ट्रीय व्यापार कहा जाता है। किसी देश का विकसित अंतर्राष्ट्रीय व्यापार उसकी आर्थिक सम्पन्नता का प्रतीक है। इसलिए किसी देश के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को उसका आर्थिक मापदंड कहते हैं। इस व्यापार के दो पहलू हैं-आयात एवं निर्यात।
आजादी के बाद भारत के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में उत्तरोत्तर वृद्धि हुई है। यह बढ़ोत्तरी व्यापार की मात्रा एवं मूल्य दोनों में हुई है। भारत का अंतर्राष्ट्रीय व्यापार सन् 1950-51 में मात्र 1,314 करोड़ रुपयों का था जो 2007-08 में बढ़कर 16,05,022 करोड़ रुपयों का हो गया। यह प्रगति संतोषजनक नहीं है क्योंकि कुल अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में भारत का योगदान 1% से भी कम है। भारत में निर्यात की अपेक्षा आयात अभी भी अधिक है। कार ने अंतर्राष्ट्रीय व्यापार एवं वृद्धि के लिए विदेश व्यापार नीति को उदार किया है एवं विशेष आर्थिक क्षेत्रों का निर्माण भी किया जा रहा है।


8. व्यापार में भाग लेने वाले भारत के प्रमुख पत्तनों का वर्णन करें।

उत्तर -भारत के पश्चिमी तट पर कांडला, मुंबई, मार्मगाओ, न्यू मंगलूर और कोच्चि पत्तन मुख्य रूप से अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में भाग लेते हैं। मुंबई में पंडित जवाहरलाल नेहरू के नाम पर एक और पत्तन का विकास किया गया है। मुंबई भारत का सबसे बड़ा पत्तन है, खनिज तेल का व्यापार यहीं से होता है। न्यू मंगलौर का विकास लौह-अयस्क के निर्यात के लिए हुआ है। कोच्चि का उपयोग रबर, कहवा, नारियल तथा गरम मसाले के लिए हैं। भारत के पूर्वी तट पर तूतीकोरिन, चेन्नई, विशाखापत्तनम, पाराद्वीप और कोलकात्ता-हल्दिया अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में भाग लेते हैं। तूतीकोरिन में कोयले से लदे जहाज पहुँचते हैं। चेन्नई खनिज तेल और लौह-अयस्क का व्यापार करता है। विशाखापत्तनम से मैंगनीज, लौह-अयस्क और पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात किया . जाता है। पाराद्वीप से लौह-अयस्क का निर्यात किया जाता है। कोलकाता से चाय, हल्दिया से कोयला और पेट्रोलियम उत्पादों का व्यापार किया जाता है।


9. भारत के आंतरिक जलमार्गों का वर्णन करें।

उत्तर-भारत में पाँच आंतरिक जलमार्गों को राष्ट्रीय जलमार्ग घोषित किया गया है। ये निम्नलिखित हैं –

(i) राष्ट्रीय जलमार्ग संख्या 1 – यह इलाहाबाद से हल्दिया तक पटना होकर जाती है। यह गंगा नदी पर है तथा इसकी कुल लंबाई 1,620 किमी० है।

(ii) राष्ट्रीय जलमार्ग संख्या 2- यह असम में ब्रह्मपुत्र नदी पर बनाई गई है जो असम के सदिया नामक स्थान से धुबरी तक जाती है। इसमें भारत के साथ बांग्लादेश की साझेदारी है। इसकी कुल लंबाई 891 किमी० है।

(iii) राष्ट्रीय जलमार्ग संख्या 3- यह पश्चिमी तट पर केरल में स्थित है। यह कोल्लम से कोट्टापुरम तक जाती है। यह 205 किमी० लंबा है।

(iv) राष्ट्रीय जलमार्ग संख्या- गोदावरी-कृष्णा नदियों तथा पुडुचेरी-काकीनाडा नहर द्वारा आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु और पुडुचेरी तक 1,095 किमी० लंबी है।

(v)राष्ट्रीय जलमार्ग संख्या 5- यह उड़िसा में इस्ट कोस्ट नहर, मताई नदी. – ब्राह्मणी नदी एतं महानदी डेल्टा के सहारे 623 किमी० लंबा निर्माणाधीन है।


10. भारत को रेलमार्गों से क्या लाभ मिला है ? पहाड़ी भागों की अपेक्षा मैदानी भागों में रेलमार्ग का अधिक विस्तार क्यों है ?

उत्तर -भारत का रेलमार्ग राष्ट्रीय संपत्ति है। इससे माल ढोने, यात्रियों के आवागमन और देश के विभिन्न भागों में खाद्यान्न, उर्वरक, खनिज तेल, कोयला अन्य खनिजों तथा औद्योगिक उत्पादों को लाने ले जाने में बड़ा लाभ मिलता है। नित्य दिन 10 हजार से ऊपर रेलगाड़ियाँ चलती है।
मैदानी भाग उपजाऊ और समतल होने के कारण कृषि उत्पाद में आगे है। यहाँ कृषि पर आधारित उद्योग का विकास हुआ है। जनसंख्या भी मैदानी भाग में अधिक पायी जाती है। इसलिए मैदानी भाग में रेलमार्ग का विस्तार अधिक हुआ है।
दूसरी ओर पहाड़ी क्षेत्रों में रेलमार्ग के निर्माण में कठिनाई होती है क्योंकि यह समतल भूमि नहीं होती है। कृषि और उद्योग का विकास भी बहुत हुआ है और जनसंख्या भी मैदानी भाग की तुलना में कम पायी जाती है।


11. एक्सप्रेस-वे के अंतर्गत कौन-कौन से राज्यमागों को शामिल किया गया है ?

उत्तर-एक्सप्रेस-वे चार लेन वाली अत्याधुनिक सड़कों को बनाया गया है। इसके अंतर्गत कोलकाला-दमदम राजमार्ग, अहमदाबाद राजमार्ग, मुंबई पश्चिमी तटीय राजमार्ग शामिल हैं। मुंबई-पुणे राजमार्ग देश का पहला अंतर्राष्टीय स्तर का राजमार्ग है। इन सड़कों पर गाड़ियों की गति बहुत अधिक होती है और इन्हें अतिरिक्त टोल-टैक्स भी देना पड़ता है।


12. भारत में सड़कों की सघनता किन दो क्षेत्रों में अधिक है ? और क्यों ?

उत्तर-भारत में सड़कों की सघनता निम्न दो क्षेत्र में अधिक पायी जाती है।

(i) गंगा के मैदान में (बंगाल से लेकर पंजाब तक)
(ii) तमिलनाडु, केरल (पूर्वी तट से पश्चिमी तट तक)
उत्तरी मैदानी भाग में सड़कों का धनापन अधिक है। परंतु पक्की सडकों लंबाई कम है। परंतु दक्षिण भारत के तमिलनाडु राज्य और केरल राज्य में पानी सड़कें अधिक हैं।
इन क्षेत्रों में सड़कों का घनापन अधिक होने का कारण यह है कि उत्तर भारत का मैदानी क्षेत्र हो या दक्षिण का तमिलनाड या केरल राज्य हो, यह सभी क्षेत्र की प्रधान क्षेत्र है, समतल भूभाग है, अधिक जनसंख्या वाला क्षेत्र है इसलिए इन दो में सड़कों की सघनता अधिक पायी जाती है।


13. भारत में पाइपलाइन परिवहन का वर्णन कीजिए।

उत्तर-शहरी क्षेत्रों में घर-घर पानी पहुँचाने के लिए पाइप का प्रयोग पहले से ही प्रचलित है। परंतु वर्तमान समय में परिवहन के रूप में पाइपलाइन का महत्त्व दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। पाइपलाइन का उपयोग तरल पदार्थों जैसे पेट्रोलियम । के साथ ही गैस के परिवहन के लिए भी किया जाने लगा है। पाइपलाइनों के द्वारा
मरुस्थलों, जंगलों, पर्वतीय क्षेत्रों, मैदानी भागों और यहाँ तक कि समुद्र के नीचे से भी परिवहन किया जाना संभव है। इस परिवहन के साधन को बनाने में एक ही बार खर्च करना पड़ता है। रख-रखाव पर खर्च बहुत कम करना पड़ता है। यह अन्य परिवहन के साधनों से सस्ता साधन है। यहाँ इसका भविष्य तेल और प्राकृतिक गैस उद्योग पर निर्भर है। देश के कच्चे तेल का उत्पादन क्षेत्र से शोधन स्थल तक और शोधन स्थल से बाजार तक पाइपलाइन से ही भेजा जाता है।
देश में पेट्रोलियम उत्पादन क्षेत्रों में वृद्धि तथा आयात में वृद्धि के साथ ही । पाइपलाइन मार्ग का विस्तार भी क्रमशः होता जा रहा है। इसकी सघनता देश के
पश्चिमी भागों में ज्यादा है। 1985 ई० में देश में पाइपलाइनों का विस्तार मात्र 6535 किमी० था, जो 2004 ई० में 18546 किमी० हो गया है।
भारत के पाइपलाइनों को मुख्यतः दो वर्गों में रखा जाता है-
(I) तेल पाइपलाइन

(i) कच्चा तेल पाइपलाइन  (ii) तेल उत्पाद पाइपलाइन

(II) गैस पाइपलाइन

(i) एल०पी०जी० पाइपलाइन  (ii) एच०बी०जे० पाइपलाइन

5. बिहार : कृषि एवं वन संसाधन ( दीर्घ उत्तरीय प्रश्न )


1. “कृषि बिहार की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है।” इस कथन की व्याख्या कीजिए।

उत्तर-बिहार में 90% लोग गाँवों में रहते हैं और यहाँ की 80% आबादी कषि पर निर्भर है। यह एक कृषि प्रधान राज्य है। झारखण्ड के अलग हो जाने के बाद बिहार के लोगों के लिए जीविका का मुख्य आधार कृषि ही है अर्थात् कृषि का महत्त्व अधिक बढ़ गया है। 1990-91 ई० में यहाँ 48.88% भूमि पर कृषि की जाती थी। 2005-06 ई० में बढ़कर 59.37% हो गया। यहाँ भदई और अगहनी फसल धान, ज्वार, बाजरा, मकई, अरहर और गन्ना उपजाए जाते हैं। रबी फसल में गेहूँ, जौ, दलहन एवं तिलहन उपजाये जाते हैं और गरमा फसल, गरमा धान तथा विभिन्न प्रकार की सब्जियाँ उगाई जाती हैं। व्यावसायिक फसलों में गन्ना, जूट और तम्बाक प्रमुख हैं। सब्जियों के अंतर्गत आलू, प्याज, भिंडी, परोर, लौकी, पालक, लाल साग, लूबिया, फूलगोभी, पटल, पत्ता गोभी आदि उपजाये जाते हैं। मौसमी फलों में आम, अमरूद, केला, लीची, पपीता, सिंघाड़ा, मखाना आदि प्रमुख है। मसालों में मिर्च, हल्दी, अदरख, धनिया, सौंफ, लहसून आदि की खेती की जाती है। बिहार में विभिन्न प्रकार के खाद्यान्न, दलहन, तिलहन, व्यावसायिक फर ल, मसाले एवं फलों का उत्पादन किया जाता है जिसके फलस्वरूप बिहार की अर्थव्यवस्था की रीढ कषि है।


2. बिहार की कृषि की समस्याओं पर विस्तार से चर्चा कीजिए।

उत्तर-बिहार में कृषि संबंधी निम्नलिखित समस्याएँ देखने को मिलती है –

(i) मिट्टी कटाव एवं गुणवत्ता में हास- भारी वर्षा और बाढ़ के कारण मिट्टी का कटाव होता है। खेतों में वर्षा से लगातार रासायनिक पदार्थों के उपयोग से मिट्टी का ह्रास हो रहा है।

(ii) घटिया बीजों का उपयोग- उच्च कोटि के बीज का उपयोग नहीं होने से प्रति एकड़ उपज अन्य राज्यों की अपेक्षा कम है।

(iii) खेतों का छोटा आकार-  बिहार राज्य में खेतों का आकार छोटा है जिसके कारण वैज्ञानिक पद्धति से खेती संभव नहीं हो पाती है।
(iv) किसानों में रूढ़िवादिता की भावना-  यहाँ के किसान परिश्रम पर कम, भाग्य और रूढ़िवादिता पर अधिक भरोसा करते हैं।

(v) सिंचाई की समस्या-  यहाँ की कषि मानसून पर निर्भर है। बाढ़ और सुखाड़ यहाँ की नियति है। यहाँ खेती की गई भूमि के 46% भूमि पर सिंचाई की व्यवस्था हो पायी है। शेष भमि पर सिंचाई की व्यवस्था नहीं है। उपर्युक्त समस्याओं के अतिरिक्त और भी कई समस्याएँ हैं। जैसे पूँजी का अभाव, पशुओं की दयनीय दशा, जनसंख्या का बोझ, आर्थिक एवं सामाजिक समस्याएँ आदि।


3. बिहार में कृषि-कार्य के लिए सिंचाई की व्यवस्था क्यों आवश्यक है।

उत्तर -बिहार में कृषि कार्य के लिए सिंचाई की व्यवस्था इसलिए आवश्यक है कि-

(i) यहाँ मानसूनी जलवायु पायी जाती है जिसमें वर्षा का होना समय पर और सही मात्रा में निश्चित नहीं है।
(ii) वर्षा अवधि चार महीनों का ही है बाकी समय में सिंचाई ही सहारा है।
(iii)वर्षा का वितरण परे राज्य में असमान है अतः कम वर्षा वाले क्षेत्रो में सिंचाई के बिना खेती नहीं की जा सकती है।
(iv) रबी की फसल जाडे की ऋत में उगाई जाती है। इस ऋतु में वो नहीं होती है। सिंचाई की आवश्यकता है।
(v) गन्ना, आलू, प्याज जैसी फसलों के लिए जिनमें कई बार पानी देना पड़ता है, सिंचाई की आवश्यकता होती है।

गंगा के दक्षिण में सोन, पुनपुन, फल्गु, चानन प्रमुख नदियाँ हैं। यह सब बरसाती नदियाँ हैं जो वर्षा ऋतु में ही प्रवाहित रहती है और उत्तर की ओर बहते हुए गंगा से मिल जाती हैं। ये नदियाँ ग्रीष्म काल में सूख जाती है।


4. बिहार के कृषि-आधारित किसी एक उद्योग (चीनी उद्योग) के विकास एवं वितरण पर प्रकाश डालिए।

उत्तर-बिहार में कृषि पर आधारित उद्योग में चीनी उद्योग का स्थान प्रमुख है। बीसवीं सदी के मध्य तक भारत में चीनी उद्योग के क्षेत्र में बिहार का महत्त्वपूर्ण स्थान था। 1960 ई० के बाद उस उद्योग में ह्रास होने लगा और अब यह सातवें स्थान पर है। भारत की पहली चीनी मिल डच कंपनी द्वारा 1840 ई० में बेतिया में स्थापित किया गया था। पूर्व में यहाँ चीनी की मिलों की संख्या 29 थी परंतु 2006 07 ई० में घटकर केवल 09 रह गई है। वर्तमान समय में चीनी का कुल उत्पाद 4.52 मीट्रिक टन है। बिहार में चीनी की अधिकतर मिलें उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में है। पश्चिमी चम्पारण, पूर्वी चम्पारण, सिवान, गोपालगंज तथा सारण जिला में चीनी की मिलें केंद्रित है क्योंकि यह क्षेत्र गन्ना उत्पादन के लिए अत्यंत अनुकूल है। दरभंगा तथा मुजफ्फरपुर जिले में भी कुछ मिलें हैं। इसके अतिरिक्त राज्य के दक्षिणी भाग में विक्रमगंज, बिहटा और गुरारू में भी चीनी मिलें हैं।
राज्य में चीनी उत्पादन को बढ़ाने के लिए ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में विशेष बल दिया गया है। बंद चीनी मिलों को पुनः चालू करने के लिए कार्यक्रम बनाया गया है। राज्य सरकार ने निर्णय लिया है कि ग्यारह बंद चीनी मिलों का परिचालन की जिम्मेवारी रिलायन्स, हिन्दुस्तान पेट्रोलियम तथा बहुराष्ट्रीय कंपनियों को दे दी जायेगी।


5. बिहार की प्रमुख नदी घाटी परियोजनाओं के सम्बन्ध में संक्षेप में लिखें।

उत्तर- (i) सोन नदी घाटी परियोजना- यह परियोजना बिहार की सबसे पुरानी तथा पहली नदी घाटी परियोजना है। इस परियोजना का विकास अंग्रेज सरकार द्वारा 1874 ई० में हआ। इसमें डेहरी के निकट से पूरब एवं पश्चिम की ओर नहरें निकाली गई हैं। इसकी कल लम्बाई 130 कि०मी० है। इस नहर से पटना एवं गया जिले में कई शाखाएँ तथा उपशाखाएँ निकाली गई हैं जिससे औरंगाबाद, भोजपुर, बक्सर, रोहतास जिले की भमि सिंचित की जाती है। वर्तमान में इससे कुल 4.5 लाख हक्टयर खेतों की सिंचाई की जाती है। सूखा प्रभावित क्षेत्र की सिंचाई की सविधा प्राप्त होने से बिहार का दक्षिण-पश्चिम क्षेत्र का प्रति हेक्टेयर उत्पादन का व्यय बढ़ गया है और चावल की अधिक खेती होने लगी है। इस कारण से इस क्षेत्र को चावल का कटोरा कहते हैं।

(ii) गंडक नदी घाटी परियोजना- इस परियोजना का निर्माण गंडक नदी पर हुआ तथा इसका मुख्यालय वाल्मीकिनगर है। इस परियोजना द्वारा गंडक नदी क्षेत्र की विशाल भूमि पर सिंचाई तथा विद्यत उत्पादन होता है। इसमें मुख्यतः पूर्वी एवं पश्चिमी चम्पारण, भैंसालोटन (वाल्मीकिनगर), वीरपर आदि के क्षेत्र आते हैं। परियोजना से पूर्व यह क्षेत्र गंडक की व्यापक विनाशलीला से संत्रस्त था। परियोजना के निर्माण के बाद इस क्षेत्र की सर्वतोमुखी विकास हुआ है।

(iii) कोसी नदी घाटी परियोजना- इस परियोजना का प्रारंभ 1955 में बिहार के पूर्वांचल क्षेत्र में किया गया। कोसी नदी द्वारा इस क्षेत्र में भयानक बाढ़ एवं तबाही आती थी। कोसी नदी निरन्तर अपनी धारा बदलती रहती थी। अतः इसे ‘बिहार का शोक’ कहते थे। परियोजना के निर्माण के पश्चात कोसी नदी वरदान स्वरूप अपनी निर्मल धारा से कोशी क्षेत्र की समृद्धि में योगदान कर रही है। इसके अन्तर्गत पड़ने वाले क्षेत्र मुख्यतः पूर्णिया, मधेपुरा, सहरसा, अररिया, फारबिसगंज आदि अब निरंतर तीव्र विकास की ओर अग्रसर हैं। बिहार सरकार ने कोसी में नहरों तथा विद्युत उत्पादन की दिशा में व्यापक कार्ययोजना तैयार की है।


6. बिहार के प्रमुख सड़क मार्गों के विस्तार एवं विकास पर प्रकाश डालिए।

उत्तर—बिहार में सड़कों का विकास प्राचीनकाल से ही सम्राटों तथा बादशाहों द्वारा किया जाता रहा है। आजादी के समय बिहार की कुल सड़कों की कुल लंबाई 81,680 किमी० थी। वर्तमान सडक मार्ग को पाँच वर्गों में विभाजित किया गया है –

(i) राष्ट्रीय उच्चपथ

(ii) राज्य उच्चपथ

(iii) मुख्य जिला सड़क

(iv) अन्य जिला सड़कें और

(v) ग्रामीण सड़कें।

राष्ट्रीय उच्च मार्ग बिहार के अन्य राज्यों एवं क्षेत्रों से जोड़ता है। सबसे प्रमुख राष्ट्रीय उच्च मार्ग सं० 2 हैं जिसे ग्राण्ड ट्रंक रोड कहते हैं। इसकी कुल लंबाई 204 किमी० है। यह बिहार में शेरघाटी सासाराम-मोहनियाँ होकर गुजरती है। बिहार से राष्ट्रीय उच्च पथ की कुल लंबाई 3,734 किमी० है। इस समय यह सड़क चार लेन हो गया है। दूसरी राष्ट्रीय पथ सं० 28 है जो गोपालगंज, पिरापैती, मुजफ्फरपुर, बरौनी होकर गुजरती है। बिहार में यह 266.30 किमी० लंबी है। बिहार में सबसे लंबी उच्च पथ 398 किमी० लंबी उच्च पथ सं० 31 है यह रजौली घाटी-बख्तियारपुर, बरौनी सड़क है। बिहार में 3849.22 किमी० राज्य उच्च पथ का विस्तार है। इन सड़कों की देख-रेख बिहार सरकार करती है और यह मुख्य रूप से जिला मुख्यालयों को जोड़ता है। मुख्य जिला सड़कों की लंबाई 7,01,728 किमी० है। राज्य में सबसे अधिक विस्तार ग्रामीण सड़कों का है। इसका कुल लंबाई 63,261.63 किमी० है। जिसका रख-रखाव ग्राम पंचायत या प्रखण्ड विकास कार्यालय द्वारा होता है।


7. बिहार की नदियों का वर्णन करें।

उत्तर-बिहार की नदियों को जलापूर्ति के आधार पर दो वर्गों में रखा जाता है ।

(i) गंगा के उत्तरी मैदान की नदियाँ – इनमें गंडक, बूढ़ी गंडक, बागमती, लखनदेई, कमला, कोसी और महानंदा मुख्य है। इन नदियों की ढाल उत्तरी मैदान की ढाल के अनुसार है। ये सभी नदियाँ हिमालय पहाड़ से निकलती हैं। अतः इनमें वर्ष भर जल बहा करता है। ये बरसात में उफनने लगती है और आस-पास के क्षेत्रों में बाढ लाती है। ये नदियाँ अपना मार्ग भी बदलती रहती है। जिसके कारण अनेक झाड़न झीलों का निर्माण हुआ है। इस क्षेत्र में दलदल और चौर भूमि मिलती है। कोसी नदी अपने मार्ग-परिवर्तन और बाढ़ लाने के लिए बदनाम है। ये बिहार का शोक कहलाती थी। किंतु अब इसके दोनों किनारे पर बाँध बनाकर इसे नियंत्रित किया गया है। फिर भी 2008 में कुसहा बाँध तोड़कर इस नदी ने बड़ी तबाही मचायी है।

(ii) गंगा के दक्षिण मैदान की नदियाँ – इस क्षेत्र में मुख्यतः सोन, पनपन. फल्ग, चानन और चीर नदियाँ प्रवाहित हैं। ये सब नदियाँ दक्षिण से उत्तर की ओर प्रवाहित होकर गंगा से मिलती हैं। इन नदियों में केवल वर्षा का जल ही प्रवाहित होता है। इसलिए ग्रीष्मकाल में ये नदियाँ सूख जाती है। बरसात में ये नदियाँ भी उमड पडती है और आस-पास के क्षेत्रों में बाढ़ लाती है। कई भाग जल से भर कर ताल क्षेत्र बन जाती है, जैसे मोकामा या बड़हिया का ताल। पटना से लखीसराय तक का क्षेत्र जल्ला कहलाता है।


8. बिहार की जनसंख्या के घनत्व पर विस्तार से चर्चा करें।

उत्तर-बिहार राज्य में प्रतिवर्ग किमी० जनसंख्या का घनत्व 2011 ई० की जनगणना के अनुसार 1,106 व्यक्ति है। बिहार के विभिन्न भागों में जनसंख्या के घनत्व में अन्तर पाया जाता है। इसे निम्न प्रकार से देखा जा सकता है –

(i) अत्यधिक घनत्व वाले जिला- इसके अंतर्गत पटना, सीतामढ़ी, वैशाली, दरभंगा, सारण, पू० चम्पारण, मुजफ्फरपुर, मधुबनी, समस्तीपुर, सिवान, बेगूसराय, नालन्दा, गोपालगंज, जहानाबाद, शिवहर जिले आते हैं। जहाँ जनसंख्या का घनत्व 1200 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी० से अधिक पाया जाता है।

(ii) उच्च घनत्व वाले जिले- इसके अंतर्गत वे जिले आते हैं जिसका घनत्व 1000-1200 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी० है। इनमें पूर्णिया, कटिहार, भागलपुर, भोजपुर, मधेपुरा, सहरसा, बक्सर, खगड़िया, अरवल जिले आते हैं। मध्यम धनत्व वाले जिले-इसके अंतर्गत 800-1000 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी० जनसंख्या का घनत्व पाया जाता है। इसमें मुख्य रूप से गया, अररिया, सुपौल, नवादा, किशनगंज, मुंगेर, शेखपुरा जिले आते हैं।

(iv) कम घनत्व के जिले- यहाँ 600-800 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी० जनसंख्या का घनत्व पाया जाता है जिसमें पं० चम्पारण, रोहतास, औरंगाबाद, लखीसराय जिले आते हैं।

(v)अत्यंत कम घनत्व वाले जिले- जहाँ 600 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी० से भी कम जनसंख्या का घनत्व पाया जाता है। इसमें बाँका, जमुई एवं कैमूर जिले आते हैं।


9. बिहार के जल मार्ग पर अपना विचार प्रस्तुत करें।

उत्तर-बिहार एक भू-आवेशित राज्य होने के कारण इसका सम्पर्क समुद्री मार्ग से नहीं है। यहाँ जलमार्ग के लिए नदियों का उपयोग किया गया है। गंगा, घाघरा, कोसी, गंडक और सोन नदियाँ मख्य रूप से जल परिवहन के लिए उपयोग में लायी जाती है। घाघरा नदी से खाद्यान्न, गण्डक से लकड़ी फल, सब्जी, सान से बालू और पुनपुन नदी से बाँस ढोया जाता है। वर्तमान समय में जल परिवहन के लिए स्टीमर बड़ी-बड़ी नावें कार्यरत हैं।
           गंगा नदी में हल्दिया इलाहाबाद राष्ट्रीय जल मार्ग का विकास किया गया है। हाल में ही महेन्द्र घाट के पास एक राष्ट्रीय पोत संस्थान की स्थापना की गई है। बिहार में नदियों से संबंधित सिंचाई योजना के अंतर्गत नहरों के निर्माण में जल मार्ग के विकास की संभावनाएँ हैं। नहरों से परिवहन के लिए कई योजनाओं पर कार्य चल रहा है।


10. बिहार के औद्योगिक विकास की संभावना पर अपना विचार प्रस्तुत करें।

उत्तर-बिहार एक कृषि प्रधान राज्य है। यहाँ खनिज संपदा की कमी है। इसलिए यहाँ खनिज पर आधारित उद्योग का विकास बहुत अधिक नहीं किया जा सकता है। हाँ, कृषि से उत्पादित कच्चा माल और शक्ति के साधनों की कमी नहीं है। बिहार में गन्ना और जूट आदि का प्रमुख क्षेत्र है। शक्ति के साधनों के रूप में नदी घाटियाँ जल शक्ति प्रदान करने में सक्षम हैं। घनी जनसंख्या मिलने के कारण श्रमिकों का अभाव नहीं है। इसलिए बिहार में कृषि उत्पाद पर आधारित उद्योग को बढावा दिया जा सकता है। इस प्रकार हल्के उद्योगों में चीनी, सिगरेट, अभ्रक की छिलाई और वन उद्योग को बढ़ावा दिया जा सकता है।
          घरेलू उद्योग के रूप में चावल तैयार करने, दाल तैयार करने, तेल निकालने, रस्सी बनाने, बीड़ी बनाने, मधुमक्खी पालने, लाह तैयार करने और रेशम के कीडे पालने जैसे उद्योग को बढ़ावा दिया जा सकता है।
      इसके अतिरिक्त प्लास्टिक उद्योग, पेट्रो रसायन पदार्थ, गन्ने की खोई से कागज बनाने का उद्योग, धान की भूसी से बिजली उत्पादन करने की बड़ी सम्भावनाएँ हैं। सती वस्त्र उद्योग को भी बढ़ावा दिया जा सकता है। सरकार को इस दिशा में विचार करते हुए सहयोग करना चाहिए। जिससे रोजगार के अवसर भी उपलब्ध होंगे।


11. बिहार में पाए जाने वाले खनिजों को वर्गीकृत कर किसी एक वर्ग के खनिज का वितरण एवं उपयोगिता को लिखिए।

उत्तर-बिहार में पाए जाने वाले खनिज को निम्न रूप में वर्गीकत किया जा सकता है –

(i) धात्विक खनिज-बॉक्साइट, सोना, मैंगनेटाइट
(ii) अधात्विक खनिज-चूना-पत्थर, अभ्रक, डोलोमाइट, पाइराइट
(ii) परमाणु खनिज-ग्रेफाइट
(iv) ईंधन खनिज-पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस आदि।
धात्विक खनिज – के वितरण एवं उपयोगिता का वर्णन निम्नलिखित रूप में किया जाता है। बॉक्साइट – वितरण गया, जमुई, बाँका आदि जिलों में।

उपयोग – एलुमीनियम निकालकर वायुयान, बरतन, तार बनाने में किया जाता है।
मैग्नेटाइट-वितरण — बिहार के पहाड़ी क्षेत्र में।
उपयोगिता – लोहा निकालकर विभिन्न उपयोगी सामान बनाने में सोना-वितरण-बिहार की नदियों के रेतकण में ।
उपयोग – आभूषण निर्माण में प्रयोग होता है। बिहार में उत्पादन प्रारंभ नहीं हो सका है।


12. बिहार की किन्हीं पाँच प्रमख फसलों का नाम लिखें। उनमें से किसी एक के उत्पादन की भौगोलिक दशाओं एवं उत्पादन क्षेत्रों का वर्णन करें।

उत्तर-बिहार राज्य में जिन खाद्यान्न का उत्पादन कृषि द्वारा होता है उनमें प्रमख हैं चावल, गेहूँ, जौ, मकई, दलहन, तेलहन, सब्जी और विभिन्न प्रकार के फल। इनमें धान के उत्पादन के लिए निम्न भौगोलिक दशाएँ उपयुक्त होता है-

(i) मानसूनी जलवायु
(ii) उच्च तापमान (20°C से 30°C तक)
(iii) ग्रीष्मकालीन अधिक वर्षा (वार्षिक वर्षा 200 cm से अधिक) (कम वर्षा वाले क्षेत्रों में सिंचाई की उत्तम व्यवस्था)
(iv) समतल भूमि (ताकि खेतों में जल जमा रहे)
(v) जलोढ़ मिट्टी
(vi) पर्याप्त संख्या में सस्ते श्रमिक
बिहार में धान की खेती मुख्यतः उत्तर के मैदानी भाग में होती है जहाँ वर्षा से भरपूर जल की प्राप्ति होती हैं। बिहार में उत्तरी चम्पारण, रोहतास, औरंगाबाद, बक्सर और भोजपुर प्रमुख धान उत्पादक जिले हैं जहाँ सिंचाई और जलोढ़ मिट्टी की सुविधा प्राप्त है और मानसूनी जलवायु क्षेत्र में पड़ता है। फसलों की उपज बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक पद्धति अपनाई जा रही है। जिससे उत्पादन भी बढा है। वर्ष 2006-07 में बिहार में 50 लाख टन धान का उत्पादन हुआ था।


13. बिहार में वस्त्र उद्योग पर विस्तार से चर्चा कीजिए।

उत्तर- वस्त्र उद्योग बिहार का एक प्राचीन उद्योग हैं। इस उद्योग में एक विशेष समुदाय की भागीदारी रही है। भागलपुर के तसर के कपड़े, लूंगी एवं चादर देश-विदेश में प्रसिद्ध हैं। औरंगाबाद जिला के ओबरा तथा दाउदनगर के बने कालीन की माँग सारे भारत में है। यहाँ सूती, रेशमी और ऊन वस्त्र तैयार किया जाता है। कच्चे माल के अभाव के कारण बिहार में सूती वस्त्र उद्योग का विकास अधिक नहीं हुआ है। लेकिन सस्ते मजदूर एवं विस्तृत बाजार के कारण डुमराँव, गया, मोकामा, मुंगेर, फुलवारीशरीफ, ओरमाझी एवं भागलपुर में सूती वस्त्र बनाए जाते हैं। यहाँ छोटी-छोटी मिलें स्थापित हैं जो सूत कानपुर और अहमदाबाद से मँगाते हैं।
               भागलपुर रेशमी वस्त्र उद्योग के लिए प्रसिद्ध है। बिहार में एक हस्तकरघा एवं रेशमी वस्त्र निदेशालय की स्थापना हुई है। इसके द्वारा क्षेत्रीय स्तर पर भागलपुर, मुजफ्फरपुर, गया तथा दरभंगा में रेशमी वस्त्र उद्योग का विकास हआ है। इस निदेशालय के अधीन भभुआ में बनारसी साड़ी, नालंदा तथा नवादा में रेशमी वस्त्र उत्पादन को विकसित किया गया है।
              बिहार में ऊनी वस्त्र उद्योग का विकास नहीं के बराबर है। सिर्फ स्थानीय भेड़ों के ऊन से कंबल आदि बनाए जाते हैं। औरंगाबाद के ओबरा एवं दाऊदनगर क्षेत्र में कम्बल तथा कालीन तैयार किये जाते हैं।


14. ऊर्जा उत्पादन में बिहार की स्थिति पर प्रकाश डालें।

उत्तर-उद्योगों को चलाने, विकास की गाड़ी को आगे बढ़ाने में ऊर्जा साधन की आवश्यकता होती है। बिहार के पास 592.1 मेगावाट ताप विद्युत, 47.1 मेगावाट जलविद्युत तथा 5 मेगावाट नवीकरणीय ऊर्जा के रूप में उत्पादन है। परंतु तापविद्युत केंद्र की स्थिति अच्छी नहीं है। मुजफ्फरपुर का ताप विद्युत केंद्र बंद पड़ा है। बरौनी से भी 30 मेगावाट बिजली का उत्पादन होता है और लागत भी अधिक पड़ती है अर्थात् उत्पादन खर्च महँगा है।
           वर्तमान में बिहार को 900 मेगावाट बिजली की आवश्यकता है जो कभी-कभी 1.000 मेगावाट तक पहुँच जाती है। केंद्रीय क्षेत्रों से बिजली खरीद कर बिहार अपना काम चलाता है। नेशनल थर्मल पावर कॉरपोरेशन से 959 मेगावाट, चुखा पनबिजली से 80 मेगावाट तथा माँग बढ़ने पर रंगीत बिजली से 21 मेगावाट बिजली खरीदी जाती है। इस प्रकार राज्य कोष का बहुत धन इसी पर खर्च हो जाता है। वह भी इस स्थिति में जब बिहार में प्रतिव्यक्ति बिजली की खपत बहुत कम मात्र 60 किलोवाट प्रतिवर्ष है। जबकि राष्ट्रीय औसत खपत 354.75 किलोवाट प्रतिवर्ष है।


15. बिहार राज्य की स्थिति एवं विस्तार को समझावें।

उत्तर-बिहार एक भू-आवेशित प्रांत है, जिसके उत्तर में नेपाल, दक्षिण में झारखंड, पूर्व में पश्चिम बंगाल एवं पश्चिम में उत्तरप्रदेश है। यह गंगा के मध्यवर्ती मैदान में 24° 20′ उत्तरी अक्षांश से 27° 31′ 15″ उत्तरी भांश तक एवं 83° 19′ 50″ पूर्वी देशांतर से 88° 17′ 40″ पूर्वी देशांतर तक स्थित है।
             यह लगभग आयताकार है, जिसकी पूर्व से पश्चिम लंबाई 483 कि० मी० और जनर से दक्षिण चौड़ाई 345 किलोमीटर है। इसका क्षेत्रफल 94,163 वर्ग किलोमीटर जो भारत का 2.86 प्रतिशत है। यह देश का 12वाँ सबसे बडे क्षेत्रफल वाला राज्य है।


16. बिहार के गैर-परंपरागत ऊर्जा स्त्रोतों का वर्णन कीजिए और एक का विस्तार से चर्चा कीजिए।

उत्तर- बिहार में गैर-परंपरागत एवं नवीकरणीय ऊर्जा का भारी संभावनाएँ हैं। बहत वृहत जल ऊर्जा, बायोगैस ऊर्जा, सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में ऊर्जा की आवश्यकता की पूर्ति की जा सकती है। बिहार में नवीकरणीय ऊर्जा विकास को राज्य में ऊर्जा के गैर-पारंपारिक स्रोत के जरिए दूरस्थ गाँवों के विद्युतीकरण एवं नवीकरणीय ऊर्जा कार्यक्रमों के विकास के लिए नोडल एजेंसी बनाया गया है। यहाँ 92 सम्भावित स्थलों की पहचान की गई है जहाँ लघु जल-विद्यत परियोजनाओं का विकास किया जाएगा और जिसके कुल उत्पादन क्षमता 46% मेगावाट होगा।
           बिहार में यह उत्पादन योजना समेत बायोमास आधारित विद्युत परियोजनाओं की स्थापना के द्वारा 200 मेगावाट विद्युत उत्पादन की शक्ति संभव है। पवन ऊर्जा आधारित विद्युत परियोजनाओं की स्थापना के बिहार सरकार तत्पर है। संभावित स्थलों की पहचान की गयी है। राज्य की नोडल एजेंसी चेन्नई की सहयोग से पवन संसाधन आकलन कार्यक्रम हाथ में लेने के प्रयास में हैं। बायोगैस गाँव में भोजन बनाने संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। बिहार में अब तक इस क्षेत्र में 125 लाख संयंत्र स्थापित किए हैं।


17. बिहार में कौन-कौन फसलें उगाई जाती हैं? किसी एक फसल के मुख्य. उत्पादनों की व्याख्या करें।

उत्तर- बिहार में मौसम के अनुसार चार प्रकार की फसलें उगायी जाती है-
(i) भदई,
(ii) अगहनी,
(iii) रबी एवं
(iv) गरमा।
भदई फसल – भदई फसल की खेती मई-जून में शुरू की जाती है और अगस्त-सितंबर में फसल की कटाई कर ली जाती है। इस फसल में मुख्यतः भदई धान, ज्वार, बाजरा, मकई के अतिरिक्त जूट और सब्जी की खेती की जाती है।


18. बिहार में वन्यजीवों के संरक्षण पर विस्तार से चर्चा करे।

उत्तर-बिहार में वन्य जीवों के संरक्षण के लिए निम्नलिखित कदम उठाना जरूरी है-

(i) वन बिनाश पर जल्दी विराम लगाना चाहिए, जिससे वन्य जीवों का आश्रय स्थल सुरक्षित रूप में बना रहे।
(ii) आखेट पर पाबंदी लंगाया जाए।
(iii) वन्य प्राणियों के प्रजनन बढ़ाने के प्रयास किये जाएँ ।
(iv) रासायनिक दवाओं के प्रभाव से भी वन्यजीवों की प्रजनन क्षमता घट रही है। ऐसे दवाओं के प्रयोग पर प्रतिबंध लगाना चाहिए।
(v) इस संदर्भ में सरकार को ध्यान देने की आवश्यकता है। वन्यजीवों के संरक्षण में कई स्वयंसेवी संस्थाएँ कार्य कर रही है। इनमें प्रयास, तरूमित्र, प्रत्युष, मंदार, नेचर क्लब प्रमुख हैं। बेगूसराय जिला का कॉवर झील और दरभंगा जिला का कुशेश्वर स्थान वन्यजीवों के लिए प्रसिद्ध है जहाँ पहले पक्षियों का शिकार किया जाता था, लेकिन अब पूर्णतः शिकार करना वर्जित हो गया है।


19. बिहार में तापीय विद्युत-केन्द्रों का उल्लेख कीजिए ।

उत्तर – परम्परागत ऊर्जा स्रोतों में बिहार में कई तापीय विद्युत केन्द्र हैं। इनमें कहलगाँव, काँटी और बरौनी तापीय विद्युत-केन्द्र प्रमुख हैं। कहलगाँव सुपर थर्मल पावर बिहार की सबसे बड़ी तापीय विद्युत परियोजना है। उसकी स्थापना 1979 ई० में की गई है। इसकी उत्पादन क्षमता 840 मेगावाट है। काँटी तापीय केन्द्र मुजफ्फरपुर के समीप है। इसकी उत्पादन क्षमता 120 मेगावाट है। बरौनी ताप विद्युत परियोजना की उत्पादन क्षमता 145 मेगावाट है। इसकी स्थापना रूस की सहायता से की गई
                  इन परियोजनाओं के अलावे कुछ प्रस्तावित तापीय परियोजनाएँ भी हैं। इनमें बाढ़ और नवीनगर तापीय विद्युत परियोजना है। इसके कार्यान्वयन से दक्षिण बिहार का बिजली संकट दूर हो जाएगा। एन०टी०पी०सी० द्वारा इस तापीय विद्युत परियोजना का निर्माण कार्य हो रहा है। नवीनगर विद्युत परियोजना का निर्माण रेलवे और एन०टी०पी०सी० के संयुक्त प्रयास से हो रहा है।


20. बिहार में नगर विकास पर एक विश्लेषण प्रस्तुत कीजिए।

उत्तर- बिहार के अधिकांश प्रमुख नगर किसी न किसी नदी के किनारे विकसित हुए हैं। प्राचीन नगरों का विकास राजधानी शिक्षण संस्थान, धार्मिक स्थल अशा व्यापारिक केंद्र के रूप में हुआ है। इनमें पाटलिपुत्र, नालंदा, राजगीर, गया, वैशाली, बोधगया, उदवंतपुरी, सीतामढ़ी आदि प्राचीन नगरों के उदाहरण है। मध्यकाल में सासाराम, दरभंगा, पूर्णिया, छपरा, सिवान आदि शहरों का विकास सड़कों के विकास तथा प्रशासनिक कारणों से हुआ था। ब्रिटिशकाल में रेल एवं सडक मार्गों का विकास हुआ जिसके फलस्वरूप सड़कों के किनारे नगर विकसित होने लगे। कुछ नगरों का विकास उस समय रेल व्यवस्था के कारण भी हुआ। स्वतंत्रता के बाद बिहार में नगरों के विकास में तेजी आयी। राज्य में औद्योगिक विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा जीवन के मौलिक सुविधाओं के विकास के कारण कई नये नगर भी विकसित हुए। इनमें बरौनी, हाजीपुर, दानापुर, डालमियानगर, मुंगेर, जमालपुर, कटिहार आदि हैं। फिर भी आज के बिहार में नगरों का विकास भारत के अन्य राज्यों की अपेक्षा बहुत ही कम हुआ है। 2011 की जनगणना के अनुसार यहाँ की नगरीय आबादी मात्र 11.29 प्रतिशत है। जबकि भारत की नगरीय जनसंख्या 31.16 प्रतिशत है। वर्तमान समय में बिहार में एक लाख से अधिक आबादी वाले नगरों की संख्या केवल 28 है। दस लाख से ऊपर केवल पटना नगर की जनसंख्या है। यहाँ नगरीय बस्तियों की संख्या 131 है।


21. बिहार के तीन प्राकृतिक संसाधनों का नाम दें। किसी एक का बिहार में वितरण बताएँ।

उत्तर- बिहार के प्राकृतिक संसाधन निम्नलिखित हैं –

(i) मिट्टी
(ii) खनिज
(iii) वन और वन्य प्राणी तथा
(iv) जल या जलशक्ति

(i)मिट्टी का वितरण – बिहार के मैदानी भाग में सर्वत्र वाहित मिट्टियाँ पायी जाती हैं। जो नदियों के द्वारा लायी गई और जमा की गई है। यहाँ इस वाहित मिट्टी को जलोढ़ मिट्टी के नाम से पुकारा जाता है। इसे कई उपवर्गों में बाँटा गया है।

(क) तराई या दलदली क्षेत्र की जलोढ़ मिट्टी-इसका वितरण सबसे उत्तर में 5 से 10 किलोमीटर चौड़ी पट्टी में मिलता है। हिमालय की तराई होने, घनी वर्षा होने और घने पेड़-पौधों से भरा होने के कारण इस क्षेत्र में बहुत अधिक नमी बनी रहती है। इस मिट्टी में चूने का अंश कम होता है। रंग गाढ़ा भूरा होता है, यह बहुत उपजाऊ नहीं होती है। इसमें धान, जूट, गन्ना, आम और लीची की खेती की जाती है।

(ख) बाँगर या पुरानी जलोढ़ मिट्टी-इसका वितरण गंडक नदी के पूर्वी और पश्चिमी दोनों क्षेत्र में पाया जाता है। इस मिट्टी में चूना-कंकड़ अधिक मिलता है। मिट्टी का रंग भूरा और कालिमा लिए हुए होता है। यह गन्ने की खेती के लिए उपयुक्त मानी जाती है। इसमें मकई, जौ, गेहूँ का भी खेती की जाती है।

(ग) खादर या नई जलोढ़ मिट्टी-इसका वितरण बूढ़ी गंडक के पूरब में है। यह दोमट मिट्टी है। यह क्षेत्र बाढ़ग्रस्त रहा करता है। इसमें जूट की खेती की जाती है। इसके पश्चिमी भाग में गन्ने की खेती की जाती है। धान की भी अच्छी खेती की जाती है।

(घ) गंगा के दक्षिण मैदान की केवाल मिट्टी- यहाँ पश्चिमी भाग में बाँगर मिट्टी मिलती है। पूर्व के निम्न भागों में ताल जैसे बड़हिया का ताल मिलता है, जो दलहन की पैदावार के लिए विख्यात है। यही मिट्टी दोमट और केवाल किस्म की है।


22. आई पर्णपाती और शुष्क पर्णपाती वनों में क्या अंतर है ? इनके पेड़ों के तीन-तीन उदाहरण दें।

उत्तर-बिहार के वन मानसूनी प्रकार के हैं और पर्णपाती हैं। सामान्यतः 125 cm से अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में शुष्क पर्णपाती वन पाया जाता है। आंद्र पर्णपाती वनों के वृक्ष सदाबहार होते हैं जैसे आम, जामुन, कटहल, सखुआ, पलास, पीपल, सेमल, बरगद, करंग, गंभार आदि। वनों के अतिरिक्त साबेघास भी पाया जाता है। इस प्रकार के वृक्ष मुख्यतः चंपारण, सहरसा, पूर्णिया एवं अररिया के उत्तर भाग में पाये जाते हैं। शुष्क पर्णपाती वनों में भी वे सभी पेड उगते हैं जो आर्द्र पर्णपाती वनों में पाये जाते हैं। परंतु ये आकार में छोटे और कम घने होते हैं औरग्रीष्म काल के प्रारंभ में ही इनके पत्ते गिर जाते हैं। इनमें मुख्यतः शीशम, महुआ, पलास, बबूल, खजूर और बाँस के पेड़ मिलते हैं, आम, अमरूद, कटहल के पेड़ भी पाये जाते हैं। एस वन कृषि कार्य एवं आवास बनाने हेतु तेजी से काटे जा रहे हैं। फिर भी गया, दक्षिणा मुंगेर तथा दक्षिणी भागलपुर में इनकी सघनता पायी जाती है।
               नेपाल की सीमा से सटे तराई भागों में वर्षा की अधिकता के कारण आद्र पर्णपाती वन मिलते हैं जिसमें शीशम, सखुआ, सेमल तथा खैर के पेड़ों की प्रमुखता रहती है। कोसी क्षेत्र में नरकट जाति की झाडियाँ भी उगती है।


23. उच्चावच या धरातलीय रूप के आधार पर बिहार को किस प्रकार बाँटा गया है ? समझावें।

उत्तर-उच्चावच या धरातलीय रूप के आधार पर बिहार को तीन भागों में बाँटा जा सकता है –

(i) शिवालिक पर्वत श्रेणी — यह हिमालय पर्वत का निचला भाग है, जो बिहार के उत्तर-पश्चिमी भाग में पश्चिमी चंपारण जिला के उत्तरी भाग में स्थित है।

(ii) बिहार का मैदान – बिहार का मैदान बिहार की सबसे बड़ी प्राकृतिक इकाई है। यह 90,650 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में विस्तृत है, जो राज्य के कुल क्षेत्रफल का 96.27% है। यह गंगा के मध्यवर्ती मैदान का एक हिस्सा है, जिसका निर्माण गंगा तथा इसकी सहायक नदियों द्वारा निक्षेपित
जलोढ़ से बना है।

(iii) दक्षिण का संकीर्ण पठार – यह बिहार के सुदूर दक्षिण में पठारी भाग स्थित है, जो एक संकीर्ण पट्टी के रूप में पश्चिम में कैमूर जिले से लेकर पूर्व में मुंगेर और बाँका जिले तक विस्तृत है। यह वास्तव में प्रायद्वीपीय पठार का ही एक अंग है।

6. मानचित्र अध्ययन ( दीर्घ उत्तरीय प्रश्न )


1. हैश्यूर से आप क्या समझते हैं? इसका प्रयोग किस काम के लिए किया जाता है ?

उत्तर- मानचित्र बनाने में भूमि की ढाल दिखाने के लिए छोटी-छोटी और सटी रेखाओं से काम लिया जाता है, जिन्हें हैश्यूर कहते हैं। खड़ी ढाल प्रदर्शित करने के लिए अधिक छोटी और सटी रेखाएँ तथा धीमी ढाल प्रदर्शित करने के लिए अपेक्षाकृत बड़े और दूर-दूर रेखा चिह्न खींचे जाते हैं। समतल भाग के लिए रेखा चिह्न नहीं खींचे जाते, ये भाग खाली छोड़ दिए जाते हैं। – इस विधि से स्थलाकृति का साधारण ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। ऊँचाई का सही ज्ञान नहीं हो पाता है। इस विधि में रेखाचिह्नों को खींचने में अधिक समय लगता है। समोच्च रेखा वाले मानचित्र में छोटी आकृतियों को प्रदर्शित करने के लिए यह विधि अपनायी जाती है। इस विधि का विकास आस्ट्रेलिया के एक सैन्य अधिकारी लेहमान ने किया था।


2. समोच्च रेखाओं द्वारा विभिन्न प्रकार की स्थलाकृति का प्रदर्शन करें।

उत्तर – भू-आकृतियों के अनुरूप ही समोच्च रेखाओं का प्रारूप बनता है और उन समोच्च रेखाओं पर संख्यात्मक मान ऊँचाई के अनुसार ही बैठाया जाता है। उदाहरण के लिए यदि वृत्ताकार प्रारूप में आठ दस समोच्च रेखाएँ खींचे जाते हैं तो इससे दो भू-आकृतियाँ दिखाई जा सकती है। प्रथम शंक्वाकार पहाड़ी और द्वितीय झील। शंक्वाकार पहाड़ी के लिए बनाए जानेवाले समोच्च रेखाओं का मान बाहर से अंदर की ओर बढ़ता जाता है। दूसरी ओर झील आकृति दिखाने के लिए समोच्च रेखाओं में बाहर की ओर अधिक मान वाली तथा अंदर की ओर बढ़ता जाता है। दूसरी ओर झील आकृति दिखाने के लिए समोच्च रेखाओं में बाहर की ओर अधिक मानवाली तथा अंदर की ओर कम मानवाली समोच्च रेखाएँ होती हैं।

पर्वत- पर्वत स्थल पर पाई जानेवाली वह आकति है जिसका आधार काफी पाहा तथा शिखर काफी पतला अथवा नकिला होता है। आसपास की स्थलाकृति स यह पर्याप्त ऊँची उठी हई होती है। इसका मप शंकनमा होता है। ज्वालामुखी से मित पहाड़ी शंकु आकृति की होती है। शंक्वाकार पहाड़ी की समोच्च रेखाओं को लगभग वृत्ताकार रूप में बनाया जाता है। बाहर से अंदर की ओर वृत्तों का आकार छोटा होता जाता है। बीच में सर्वाधिक ऊँचाई वाला वृत्त होता है।

पठार- इसका आकार और शिखर दोनों चौडा और विस्तृत होता है। इसका विस्तृत शिखर उबड़-खाबड़ होता है। इसलिए, पठारी ‘पाग को दिखाने के लिए समाच्च रेखाओं को लगभग लंबाकार आकति में बनाया जाता है। प्रत्येक समोच्च रखा बंद आकृति में बनाया जाता है। इसका मध्यवती समोच्च रेखा भी पर्याप्त चौड़ा बनाया जाता है।

जलप्रपात – जब किसी नदी का जल अपनी घाट से गुजरने के दौरान ऊपर से नीचे की ओर तीव्र ढाल पर अकस्मात गिरती है तब उसे जलप्रपात कहते हैं। इस आकृति को दिखाने के लिए खड़ी ढाल के पास कई समोच्च रेखाओं को एक स्थान पर मिला दिया जाता है और रेखाओं को ढाल के अनुरूप बनाया जाता है।

‘V’ आकार की घाटी – नदी के द्वारा उसके युवावस्था में इसका निर्माण होता है। इस आकृति को प्रदर्शित करने के लिए समोच्च रेखाओं को अंग्रेजी को ‘V’ अक्षर की उल्टी आकृति बनाई जाती है, जिसमें समोच्च रेखाओं का मान बाहर से अंदर की ओर क्रमशः घटता जाता है।


3. स्तर-रंजन अथवा रंग विधि का प्रयोग स्थलाकृतियों को दर्शाने ।में किस प्रकार किया जाता है ? समझायें।

उत्तर — इस विधि में सादे मानचित्र में काली स्याही के विभिन्न स्तरों के द्वारा किसी स्थान के उच्चावच को प्रदर्शित किया जाता है। रंगीन मानचित्र में विभिन्न स्थलाकृतियों को विभिन्न रंगों द्वारा दर्शाया जाता है। इन रंगों का एक मानक निश्चित किया गया है। उदाहरण के तौर पर, जलीय भाग को नीले रंग से, मरुभूमि को पीले रंग से, बर्फीले क्षेत्र को सफेद रंग से, मैदानों को हरे रंग से और पर्वतों एवं पठारों को भूरे रंग से दर्शाया जाता है।


4. उच्चावच-प्रदर्शन की प्रमुख विधियों का उल्लेख कीजिए ।

उत्तर—प्राचीन समय से ही मानचित्रों पर उच्चावच प्रदर्शित करने के लिए अनेक विधियों का उपयोग किया जाता रहा है, जो निम्न हैं-

(i) हैश्वर विधि या रेखा चिन्ह विधि — इस विधि का विकास आस्ट्रिया के एक सैन्य अधिकारी लेहमान द्वारा किया गया था। इस विधि से स्थलाकृति का साधारण ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। इस विधि द्वारा ऊँचाई का सही-सही पता नहीं लगाया जा सकता है।

(ii) पर्वतीय छायांकन विधि- इस विधि द्वारा उच्चावच का प्रदर्शन प्रकाश और छाया की सहायता से किया जाता है। इस विधि द्वारा भी स्थलाकृति
का साधारण ज्ञान प्राप्त किया जाता है।

(iii) तल चिन्ह विधि – इस विधि में उच्चावच का निरूपण समुद्र तल से ऊँचाई के आधार पर किया जाता है।

(iv) स्थानिक ऊँचाई- इस विधि में भी उच्चावच का निरूपण करने के लिए स्पष्ट बिन्दु के समीप अंक लिए जाते हैं, जो समुद्र तल से ऊँचाई को प्रदर्शित करती है।

(v) त्रिकोणमितीय स्टेशन- उच्चावच का प्रदर्शन करने के लिए विभिन्न स्थानों का चुनाव करते हैं और उस स्थानों पर त्रिभुज बनाकर उच्चावच का प्रदर्शन करते हैं।

(vi) स्तर रंजन- इस विधि में उच्चावच प्रदर्शन करने के क्रम में विभिन्न रंगों का प्रयोग किया जाता है। इस विधि से भी वास्तविक ढाल का ज्ञान प्राप्त नहीं किया जा सकता है।

प्राकृतिक आपदा : एक परिचय

1. आपदा से आप क्या समझते हैं ?

उत्तर – कुछ दुर्घटनाएँ ऐसी होती है जो बिना बुलाए अकस्मात आ धमकती है और अल्प समय में ही जन धन की अपार क्षति पहुँचा देती है। ये हमें संकट की स्थिति में ला देती है। संकट की स्थिति उत्पन्न करनेवाली ऐसी कोई भयावह घटना ‘आपदा’ कहलाती है। दूसरे शब्दों में, हमारे सामाजिक आर्थिक जीवन को भारी खतर में डालनेवाली अकस्मात घटना आपदा (disaster) है।

2. आपदा प्रबंधन की आवश्यकता क्यों है ?

उत्तर – आपदा प्रबंधन की आवश्यकता आपदा के पूर्व एवं पश्चात होने वाली क्षति को कम करने या बचने से है। प्राकृतिक आपदा या मानव निर्मित आपदा इत्यादि के घटित होने से अधिक मात्रा में जैविक एवं अजैविक संसाधनों का नुकसान होता है। इसी संदर्भ में लोगों को विशेष प्रशिक्षण देकर उसके प्रभाव को कम करना आपदा प्रबंधन कहलाता है।

3. आपदा प्रबंधन के उद्देश्यों की विवेचना करें।

उत्तर – आपदा कोई भी हो उसका प्रबंधन अनिवार्य है। आपदा से न केवल विकास कार्य अवरुद्ध होते हैं बल्कि विकास कार्यों में कई व्यवधान उपस्थित होते हैं। कोई भी प्रबंधन कार्य तब तक सफल नहीं हो सकता है जब तक उसमें आमलोगों की सहभागिता नहीं. होती है।आमलोगों की सहभागिता तथा पंचायत की मदद से ठोस प्रशासनिक निर्णय लिए जा सकते हैं और वे निर्णय की दीर्घकाल में प्रबंधन हेतु आवश्यक होते हैं। पूर्वानुमान या पूर्व जानकारी से अपने आसपास घटनेवाली किसी भी संभावित विनाश से बचा जा सकता है। उत्तर बिहार के लोग कोसी की विनाशलीला से बचने के लिए आपसी सहयोग से बाढ़ के अनुरूप जीवन शैली बना ली है।

4. आपदा प्रबंधन क्या है ?

उत्तर – आपदाएँ चाहे जिस प्रकार की हों, इनसे धन-जन एवं संसाधनों की अपार क्षति होती है। इस संभावित अपार क्षति को कम करने का उपाय ही आपदा प्रबंधन कहलाता है।

5.. आपदा प्रबंधन में ‘उपग्रह फोन’ का क्या उपयोग है ?

उत्तर – उपग्रह फोन आपदा प्रबंधन में सर्वाधिक प्रयोग में लाया जाने वाला साधन है। ऐसे फोनों के लिए उपग्रह ही टेलीफोन एक्सचेंज के रूप में कार्य करता है। ये फोन बहुत ही विश्वसनीय आवाज एवं डाटा संचार प्रदान करते हैं एवं इन्हें सुविधानुसार कहीं भी ले जाया जा सकता है।

6. आपदा प्रबंधन में सरकार की क्या भूमिका है ? स्पष्ट करें।

उत्तर – आपदा प्रबंधन में सरकार की अहम भूमिका है। सरकार को संबंधित । या क्षेत्र-विशेष में आनेवाली आपदा की पूर्व आशंका का ज्ञान होता है। अतः, आपदा आने के पूर्व एवं आपदा आने के पश्चात, दोनों ही स्थितियों के लिए सरकार द्वारा नीतिपरक एवं प्रशासनिक तैयारियाँ करना आवश्यक हो जाता है। इसके अन्तर्गत वैकल्पिक संचार-व्यवस्था, राहत कैंप की व्यवस्था, आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति एवं अन्य कार्यों को करना शामिल हैं।

7. प्राकृतिक आपदा एवं मानव जनित आपदा में अन्तर उदाहरण सहित प्रस्तुत करें।

उत्तर – प्राकृतिक आपदाएँ एवं मानव जनित आपदा में निम्न अंतर है –

(1) प्राकतिक आपदा – हमारे वातावरण में घटित होने वाली वैसी घटनाएँ जो प्राकतिक कारणों से उत्पन्न होती है प्राकृतिक आपदा कहलाती है। जैसे भकंप बाढ़, सूखा, सुनामी, भूस्खलन, चक्रवात आदि।

(2) मानव जनित आपदा – वैसी घटनाएं जिसकी उत्पत्ति में मानवीय कारकों जिसके घटित होने के फलस्वरूप अधिक संख्या में मानवों की को हानि पहुँचती हो मानव जनित आपदा कहलाती है। जैसे रेल. र या माग, युद्ध, आतंकवाद, महामारी,संप्रदायिक दंगे आदि |

8. बिहार एक सर्वाधिक आपदाग्रस्त राज्य है। कैसे ?

उत्तर- बिहार एक ऐसा राज्य है, जहाँ कई प्रकार का प्राकृतिक आपदाएँ आती रहती है। यहाँ मुख्य रूप से बाढ़, सूखा, तूफान, वज्रपात और भूकंपीय आपदा आती है। बाढ़ तो बिहार की नियत बन गयी है। उत्तर बिहार के लोग प्रत्येक वर्ष बाद की परेशानी को झेलते हैं। सूखा का प्रभाव दक्षिण, दक्षिण-पश्चिमी और मध्य-दक्षिणी बिहार में अधिक पड़ता है। तूफान का प्रभाव बिहार के उत्तरी-पूर्वी जिलों में अधिक पड़ता है। भूकंप का सर्वाधिक प्रभाव उत्तरी बिहार के सीमावर्ती क्षेत्र पर पड़ता है।

9. आग-आपदा के समय कौन से उपाय करना चाहिए ?

उत्तर – आग लगने की स्थिति में सबसे पहले आग में फंसे हुए लोगों को बाहर निकालना एवं घायल को तत्काल प्राथमिक उपचार देकर अस्पताल पहुँचाना चाहिए। प्राथमिक उपचार में ठंडा पानी डालना, बर्फ से सहलाना, बरनौल आदि का उपयोग करना। आग के फैलाव को रोकना, बालू, मिट्टी एवं तालाब के जल का उपयोग करना एवं यदि बिजली से आग लगी हो तो सबसे पहले बिजली का तार काट देना चाहिए।

10. भूकम्प के प्रभावों को कम करने वाले चार उपायों का उल्लेख करें।

उत्तर- भूकम्प के प्रभाव को कम करने वाले चार उपाय –

(i) भवनों को आयताकार होना चाहिए और नक्शा साधारण होना चाहिए।
(ii) लंबी दीवारों को सहारा देने के लिए ईंट-पत्थर या कंक्रीट के कालम
होने चाहिए।
(iii) नींव मजबूत एवं भूकम्परोधी होना चाहिए।
(iv) दरवाजे तथा खिड़की की स्थिति भूकम्परोधी होनी चाहिए।

11.तूफान महोर्मी क्या है ?

उत्तर – अक्टूबर-नवंबर महीने में बंगाल की खाड़ी में भयानक चक्रवात आता है, जिससे पश्चिम बंगाल और उड़ीसा जैसे तटीय राज्यों में तूफान महोर्मी आता है। इससे समुद्री लहरें बहुत अधिक मात्रा में जल नदियों के मुहाने से प्रेषित करता है। यह जल नदी में चढ़कर विस्तृत क्षेत्र को जलमग्न कर देता है, जिससे धन-जन की अत्यधिक हानि होती है। बहुत बड़े पैमाने पर तबाही होती है। पेड़ और मकान ध्वस्त हो जाते हैं।

12. भूकंप क्या है ? इसके बचाव के किन्हीं दो उपायों का उल्लेख करें।

उत्तर– जब किसी बाहरी या आंतरिक कारणों से पृथ्वी के भूपटल में कंपन उत्पन्न होता है, तो उसे भूकंप कहते हैं। इसके बचाव के निम्न उपाय हैं –

(i) भूकंप रोधी मकानों का निर्माण करना।
(ii) इससे सुरक्षा के लिए लोगों को प्रशिक्षित करना।

13. भूकम्प एवं सुनामी के विनाशकारी प्रभाव से बचने के उपायों का वर्णन करें।

उत्तर – भूकम्प एवं सुनामी एक प्राकृतिक आपदा है, जो काफी विनाशकारी होता है।

भूकम्प से बचाव के भिन्न तरीके हैं-

(i) भूकम्प का सटीक पूर्वानुमान लगाया जाना चाहिए। (ii) भूकम्पनिरोधी मकान बनाया जाना चाहिए।
(iii) जनता को जागरूक बनाया जाना चाहिए।
(iv) विद्यालय में बच्चों को भूकम्प की जानकारी दी जानी चाहिए।

सुनामी से बचने के भिन्न तरीके हैं-

(i) समुद्र के नजदीक तंटबंधों का निर्माण किया जाना चाहिए।
(ii) तटबंध के किनारे मैंग्रोव वनस्पति लगाया जाना चाहिए।
(iii) तटीय क्षेत्रों के नजदीक रहने वाले लोगों को प्रशिक्षित किया जाना चाहिए।
(iv) सुनामी से प्रभावित क्षेत्रों में तत्काल मदद पहुँचाना चाहिए।

14. भूकंप का अधिकतम प्रभाव क्षेत्र कौन सा है ?

उत्तर – यह भूकंप तीव्रता की दृष्टि से 9 से अधिक तीव्रता वाला क्षेत्र है इसमें भारत के सभी पूर्वोत्तर राज्य बिहार एवं नेपाल की सीमावर्ती क्षेत्र तथा गुजरात का कच्छ प्रदेश शामिल है इसे जोन 5 में रखा गया है |

15. भूकंप क्या है ? ‘भारत के प्रमुख पकंप क्षेत्रों विभाजित करने ‘ हुए सभी क्षेत्रों का संक्षिप्त विवरण दें।

उत्तर – पृथ्वी के आंतरिक भागों में अचानक उत्पन्न कंपन को भूकंप कहते हैं भूकंप की तीव्रता को सिस्मोग्राफ यंत्र द्वारा अध्यक्ष अखिल से मापते हैं |

भारत को निम्नांकित भूकंप क्षेत्रों में वर्गीकृत किया गया है –

(क) जोन-1 – इसके अंतर्गत भारत के दक्षिणी पठारी भाग आता है, जहां भूकंप का खतरा नहीं के बराबर है |
(ख) जोन-2- इसके अंतर्गत प्रायद्वीपीय भारत के तटीय मैदानी क्षेत्र आते हैं जहां भूकंप की तीव्रता कम होती है |
(ग) जोन-3 – इसके अंतर्गत मुख्यत: गंगा सिंधु का मैदान, राजस्थान तथा उत्तरी गुजरात के क्षेत्र आते हैं |
(घ) जोन-4 – इसके अंतर्गत शिवालिक हिमालय का क्षेत्र, पश्चिम बंगाल का उत्तरी भाग , असम घाटी एवं पूर्वोत्तर क्षेत्र अंडमान निकोबार द्वीप समूह यह सब क्षेत्र भूकंप के अधिक खतरनाक क्षेत्रों में आते हैं |
(घ) जोन-5 – इसके अंतर्गत गुजरात का कच्छ प्रदेश जम्मू-कश्मीर,हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड के पर्वतीय भाग, सिक्किम राज्य सम्मिलित है जो भूकंप के सर्वाधिक खतरनाक चित्र माने जाते हैं |

16. भूकंप केंद्र और अधिकेंद्र में अंतर स्पष्ट करें।

उत्तर – पृथ्वी की ऊपरी सतह का अचानक काँपना भूकंप कहलाता है। भूकंप का उदगम पृथ्वी की गहराई में स्थित एक विदय होता है उस ध्यान को ही कंप केंद्र कहत हैं। भकंप केंद्र अधिक गहराई में उत्पन्न होने पर उसका प्रभाव कम होता है। भूकंप केंद्र से उटन वाली तांग समकाण पर चलकर धगतल के जिस भाग पर सर्वप्रथम पहुँचती हैं, धरातल के उम भाग का अभिकेंद्र कहा जाता है। अभिकेंद्र पर भूकंप की तरंगों का प्रभाव अधिक मिलता है। अधिकंद्र में जैसे-जैस दूरी बढ़ती जाती है प्रभाव कम होता जाता है।

22. सुखाड़ का हमारे दैनिक जीवन पर पड़नेवाले प्रभावों का वर्णन करें।

उत्तर – सुखाड़ हमारे जीवन पर निम्नलिखित प्रभाव डालता है –

(i) सूखा से कृषि उत्पादन कम हो जाता है, क्योंकि इसके कारण कहीं तो फसलों को बआई नहीं हो पाती है या बुआई देर से हो पाती है।
(ii) सूखा की स्थिति में ग्रामीण क्षेत्र में बेरोजगारी बढ़ जाती है।
(iii) सूखा के कारण पशुचारे की कमी हो जाती है।
(iv) सूखा के कारण पेय जल की कमी हो जाती है।
(V) इससे खरीफ की फसल बहुत अधिक प्रभावित होती है।

23. सुखाड़ प्रबंधन का वर्णन करें।

उत्तर – निम्न उपायों द्वारा सुखाड़ प्रबंधन किया जा सकता है –
(i) जल-ग्रहण क्षेत्रों में बाँध बनाकर एवं छोटे-छोटे जलाशय बनाकर।
(ii) सुखाड़ क्षेत्र में वृक्षों की सघनता में वृद्धि कर।
(iii) शुष्क फसलों की बुआई एवं ड्रिप सिंचाई विधि को अपनाकर।
(iv) नहरों द्वारा सूखे क्षेत्र में जल पहुँचाकर।

24. सूखे के परिणामों का उल्लेख करें।

उत्तर – सूखे की स्थिति में फसलें नष्ट हो जाने से खाद्यान्न उत्पादन कम हो जाता है जिससे खाद्य समस्या उत्पन्न हो जाती है। राष्ट्रीय स्तर पर इस स्थिति को अकाल कहते हैं। फसलों के सूखने के कारण मवेशियों के लिए चारा का अकाल हो जाता है। साथ ही सभी जीवों के लिए जल का अभाव हो जाता है।

27. सुनामी से बचाव के उपायों का उल्लेख करें।

उत्तर – सुनामी से बचने के भिन्न तरीके हैं –
(i) समुद्र के नजदीक तटबंधों का निर्माण किया जाना चाहिए।
(ii) तटबंध के किनारे मैंग्रोव वनस्पति लगाया जाना चाहिए।
(iii) तटीय क्षेत्रों के नजदीक रहने वाले लोगों को प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। p
(iv) सुनामी से प्रभावित क्षेत्रों में तत्काल मदद पहुँचाना चाहिए।

30. सुनामी से आप क्या समझते हैं ? सुनामी से बचाव के उपायों को लिखें।

उत्तर – महासागरों के आंतरिक पृष्ठीय भागों में उत्पन्न हलचल को सुनामी कहते हैं। सुनामी एक प्राकृतिक आपदा है। जो समुद्र तटीय क्षेत्रों में मानव, जीव- जंतु बनस्पति, मकान, उद्योग आदि को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचाते हैं –

(i) समुद्र तटीय क्षेत्रों में मैंग्रोव वनस्पति को लगाना चाहिए।
(ii) समुद्र तटीय क्षेत्र में कंक्रीट के तटबंध बनाना चाहिए। (iii) समुद्री क्षेत्रों के समीप रहने वाले लोगों को प्रशिक्षित करना चाहिए।
(iv) समुद्र तटीय क्षेत्रों में सुनामी का पूर्वानुमान यंत्र के सहारे पहले ही सूचित किया जाना चाहिए।
(v) सरकारी एवं गैर सरकारी संगठनों की मदद से लोगों को जागरूक करना चाहिए।

33. सुनामी संभावित क्षेत्रों में गृह निर्माण पर अपना विचार प्रकट कीजिए।

उत्तर – सुनामी संभावित क्षेत्रों में गृह निर्माण तट से दूर किया जाना चाहिए। गृह निर्माण का कार्य समतल भागों की अपेक्षा सामान्यतः ऊँचे भागों पर किया जाना चाहिए तथा मकान निर्माण इस प्रकार हो कि भूकंप एवं सुनामी लहर का प्रभाव कम से कम हो।

37. बाढ़ की स्थिति में अपनाए जाने वाले आकस्मिक प्रबंधन का वर्णन करें।

उत्तर- बाढ़ एक ऐसी प्राकृतिक आपदा है, जिससे जान-माल एवं मवेशियों नीति पहुँचती है। बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होने पर आकस्मिक प्रबंधन के बात सबसे पहले जल से घिरे हुए व्यक्ति को निकालकर सुरक्षित स्थान पर ले जाना चाहिए। उसके बाद मवेशियों को तथा घर के आवश्यक सामग्रियों को सुरक्षित स्थान पर ले जाना चाहिए। सुरक्षित स्थान पर पहुँचाने के बाद भोजन, पेयजल, वस्त्र एवं समुचित दवाओं का प्रबंध किया जाना चाहिए।

39. बाढ़ कैसे आती है ? स्पष्ट करें।

उत्तर – अधिक वर्षा होने के कारण नदियों में जल का जमाव होता है। साथ ही अवसादों के जमा होने के फलस्वरूप नदी तल की गहराई में कमी आती है। नदी
तल के भरने के कारण जल का स्तर धीरे-धीरे ऊपर उठता है और नदी क तटवधा पर दबाव बढ़ता जाता है फलतः तटबंध टूट जाते हैं और नदी का जल विभिन्न क्षेत्रों में फैल जाता है जिससे बाढ़ आती है।

40. बाढ़ से बचाव के सुझावों को लिखें।

उत्तर-

(i) हाथों से स्ट्रैचर बनाना-इसे दो व्यक्ति एक-दूसरे की कलाई पकड़कर अस्थायी स्ट्रैचर बना लेते हैं।
(ii) ऊपरी कपड़ों द्वारा स्ट्रैचर बनाना—कमीज आदि का प्रयोग कर कपड़ों के दोनों तरफ डंडे डाल कर स्टैचर बनाकर घायल व्यक्ति को उठाकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया जा सकता है।
(iii) तैरने के लिए पीपों का प्रयोग किया जाता है।
(iv) ट्यब में हवा भरकर भी तैरने के लिए प्रयोग होता है।
(v) केले के पेड़ के तनों का प्रयोग भी बचाव के लिए किया जाता है।

41. बिहार में बाढ़ आने के चार कारणों को लिखिए।

उत्तर – बिहार में बाढ़ आने के कारण निम्न हैं –
(i) उत्तरी बिहार में हिमालय से निकलने वाली नदियों में अपार जल राशि के कारण बाढ़ आती है।
(ii) नदियों में सिल्ट के जमने से तली की गहराई कम हो जाती है।
(iii) बिहार में नदियाँ मार्ग परिवर्तित करती रहती है।
(iv) उत्तर बिहार के मैदानी भाग की छोटी-छोटी नदियाँ भी अतिवृष्टि से जल-प्लावित होकर बाढ़ का दृश्य उपस्थित करती है।

42. बाढ़ के कारण एवं सुरक्षा संबंधी उपाय का वर्णन करें।

उत्तर – बाढ़ एक प्राकृतिक आपदा है जिसके कारण अधिक संख्या में जान-माल का नुकसान होता है।

बाढ़ के निम्न कारण हैं –

(i) नदियों में अधिक मात्रा में वर्षा जल के पहुंचने से बाढ़ आती है।
(ii) वर्षा जल के साथ नदी की घाटी में मिट्टी के जमा होने से बाढ़ आती है।
(iii) वनस्पतियों की कटाई के कारण बाढ़ आती है।
(iv) कमजोर तटबंध के टूटने से बाढ़ आती है।

बाढ़ से सुरक्षा संबंधी निम्न उपायों को किया जा सकता है –

(a) बाढ की सूचना प्राप्त होते ही उस क्षेत्र के लोगों को हटा देना चाहिए।
(b) बाढ पूर्व ही दवा, खाद्य एवं पेयजल की सुविधा उपलब्ध कर लेनी चाहिए।
(c) नदियों के तटबंधों का नियमित मरम्मत कार्य होते रहना चाहिए।
(d) सरकारी एवं गैर सरकारी संगठनों द्वारा राहत कार्य किया जाना चाहिए।
(e) मानव समाज को इस दिशा में जागरूक करने की आवश्यकता है।

43. बिहार में बाढ़ की स्थिति का वर्णन करें।

उत्तर – बिहार के उत्तरी भाग में हिमालय से निकलने वाली नदियाँ यथा कोसी, गंडक, महानंदा आदि द्वारा प्रतिवर्ष बाढ़ लाया जाता है। जिससे मानव जीवन, पशु जीवन एवं फसलों को अपार क्षति पहुँचती है। यही कारण है कि कोसी को “बिहार का शोक” कहते हैं।

48. हिमस्खलन क्या है ? इसका प्रभाव किन-किन राज्यों पर पड़ता है ?

उत्तर- कुछ नदियों का स्रोत हिमाच्छादित होता है। बर्फ के बहुत अधिक मात्रा में पिघलने से नदियों में अचानक बहुत अधिक पानी बहने लगता है। मैदानी भागों में बहाव में अवरोध होने पर यह किनारों को तोड़कर अगल-बगल के क्षेत्रों को जलमग्न कर देता है।  हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड राज्य इसके प्रभाव में रहता है।

49. भूस्खलन के कितने रूप होते हैं?

उत्तर- भूस्खलन कई रूपों में होते हैं जिनमें प्रमुख हैं –

(i) शैल अथवा मृदा अवपतन इसमें अचानक टूट कर स्थानांतरित हो जाती है।

(ii) सर्पण-इसमें बड़े शैल टूट कर गतिमान होकर तेजी से गिरते हैं।

(i) प्रवाह इसमें लगातार शैलों का गिरना लंबे समय तक जारी रहता है।

(iv) वर्षा के पानी के साथ मिट्टी और कचड़े का नीचे आना।

50. संचार उपग्रह के क्या कार्य हैं ?

उत्तर- संचार उपग्रह अंतरिक्ष में स्थापित रेडियो रिले स्टेशन (कामसेट्स, सेटकाम्स, सेटफोन) ही है। इसमें ‘सेटकाम’ उपग्रह आधारित संचार के लिए और ‘सेटफोन’ उपग्रह आधारित फोन टर्मिनल के लिए प्रयोग किए जाते हैं। संचार उपग्रह का सबसे महत्वपूर्ण कार्य मोबाइल और c-कम्युनिकेशन होता है। ‘ट्रांसपोंडर’ निश्चित एक फ्रीक्वेंसी पर बातचीत को पकड़ता है और उसे विस्तारित कर अन्य फ्रीक्वेंसी की मदद से पृथ्वी पर वापस भेजता है।

51. प्राकृतिक आपदाकाल में वैकल्पिक संचार-संसाधन का वर्णन करें।

उत्तर- प्राकृतिक आपदाकाल में सड़क, रेल लाइन, टेलीफोन लाइन के टूट जाने से संचार व्यवस्था भंग हो जाती है। जिससे बचाव एवं सहायता कार्य में कठिनाई होती है। इस कठिनाई से बचने के लिए हेलीकॉप्टर, नावें, मोबाइल और वॉकी-टॉकी का सहारा लिया जाता है। वायरलेस और टेलीविजन भी मदद पहुँचाने में सहायक होते हैं। लाउडस्पीकर का भी सहारा लिया जाता है। वर्तमान में हैम-रेडियो वैकल्पिक व्यवस्था में उत्तम साधन है। इसमें टावर इत्यादि की आवश्यकता नहीं होती। इसमें संबंध बनाने का कार्य सेटेलाइट से होता है। संचार उपग्रह से भी आपदा संबंधी जानकारी मिलती है। संचार उपग्रह पर आपदा का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। अत: ऐसे समय में इनका महत्त्व और भी बढ़ जाता है।

53. सामान्य संचार व्यवस्था के बाधित होने के प्रमुख कारणों को लिखिए।

उत्तर- संचार व्यवस्था के बाधित होने के कई कारण है-

(i) केबुल टूट जाना।

(ii) बिजली आपूर्ति का बाधित होना।

(iii ) चार भवनों के ध्वस्त होने पर संचार यंत्रों का क्षतिग्रस्त हो जाता

(iv) ट्रांसमिशन टावर का क्षतिग्रस्त हो जाना आदि।

59. जीवन रक्षक आकस्मिक प्रबंधन से आप क्या समझते हैं ?

उत्तर-आपदा के दौरान प्रभावित लोगों को तत्काल आपदा प्रकट गनिजात दिलाने हेतु किए जाने वाले कार्य जीवन रक्षक आकरिमक प्रबंधन कहलात हैं। आकस्मिक प्रबंधन मुख्यत: बाल, सुनामी, ‘पूर्वपआग जैसी घटनाओं के समय किया जाता है। जिसमें प्रभावित लोगों को सुरक्षा प्रदान करना, भोजन, दवा गर्व प्राथमिक उपचार इत्यादि समिलित है। आकस्मिक प्रबंधन के फलावायलोगांक जान-माल के नुकसान को तत्काल कम किया जा सकता है।

60. आग लगने की स्थिति में क्या प्रबंधन काना चाहिए ? उल्लेख करें।

 उत्तर-आग लगने की स्थिति में सबसे पहले आग में यह लोगों को बाहर निकालना एवं घायल को तत्काल प्राथमिक उपचार देकर अस्पताल पहुँचाना चाहिए। प्राथमिक उपचार में ठंडा पानी डालना, बर्फ से सहलाना, बानील आदि का उपयोग करना। आग के फैलाव को रोकना, बाल, मिट्टी एवं तालाब के जल का उपयोग करना एवं यदि बिजली से आग लगी हो तो सबसे पहले बिजली का तार काट दला चाहिए।

61. नागरिक सुरक्षा के क्या उद्देश्य हो सकते हैं ? 

उत्तर- नागरिक सुरक्षा के निम्न उद्देश्य हो सकते हैं-

(i) नागरिकों को आपदा के संकट से बचाव करना।

(ii) उनका प्राथमिक उपचार करना।

(iii) खतरों के विषय में जानकारी देना तथा

(iv) जीवन को सामान्य करने में उन्हें सहायता प्रदान करना।

62. वज्रपात किसे कहते हैं ?

उत्तर- वर्षा के समय बादलों में अधिक हलचल होने और उनके आपस में घर्षण के कारण भूमि पर बिजली गिरती है, इसे वज्रपात कहते हैं। इससे पशु और मनुष्य मर जाते हैं, मकान टूट जाते हैं और पेड़ों की डालियाँ भी टूट जाती हैं।

65. आग लगने की स्थिति में क्या प्रबंधन करना चाहिए ? उल्लेख करें।

उत्तर-आग लगने की स्थिति में निम्न प्रबंधन की आवश्यकता होती है (i) आग पर सर्वप्रथम नियंत्रण करना, (ii) आग में फंसे हुए लोगों एवं मवेशियों को बाहर निकालना, (iii) आग से प्रभावित लोगों को तत्काल उपचार की व्यवस्था करना, (iv) आग के दौरान छत पर फंसे लोगों को सीढ़ी द्वारा उतारने का कार्य किया
जाना चाहिए।

66. आकस्मिक प्रबंधन के तीन प्रमुख घटक कौन-कौन हैं ?

उत्तर- आकस्मिक प्रबंधन के तीन प्रमुख घटक निम्न हैं
(i) स्थानीय प्रशासन- आकस्मिक प्रबंधन के ये सबसे प्रमुख घटक है। स्थानीय प्रशासन के द्वारा ही आपदा आने के पूर्व, आपदा के समय एवं आपदा के बाद विभिन्न प्रकार के कार्य करने पड़ते हैं।
(ii) स्वयं सेवी संगठन-आकस्मिक प्रबंधन का यह दूसरा घटक है। यह सरकार से सहायता प्राप्त कर अथवा अपने स्तर से आपदा के समय लोगों की मदद करता है।
(iii) गाँव अथवा मुहल्ले के लोग- आकस्मिक प्रबंधन के अंतर्गत यह तीसरा घटक है। यह आपदा आने पर तत्काल लोगों की मदद करता है।

67. अगस्त और फरवरी में किस महीने की ओलावृष्टि से अत्यधिक हानि होती है ?

उत्तर- कभी-कभी वर्षा के समय पानी से अधिक बर्फ के टुकड़े की बौछार होने लगती है। इसे ओलावृष्टि कहा जाता है। ओलावृष्टि तो कभी भी हो जाती है, परंतु खड़ी फसलों के समय की ओलावृष्टि से अत्यधिक बर्बादी होती है। सब्जियाँ और अनाज की फसल नष्ट होने से आर्थिक हानि उठानी पड़ती है। फरवरी महीना की ओलावृष्टि से अत्यधिक हानि होती है।

69. विश्व का कौन-सा क्षेत्र सनामी से प्रभावित है और क्यों ?

उत्तर- प्रशांत महासागर के चारों ओर का क्षत्र ज्वालामुखी पवता स भरा है। इसे अग्नि वलय के नाम से भी जाना जाता है। यह क्षेत्र प्लेट टक्टोनिक क्रिया से भी अत्यधिक प्रभावित है यही कारण है कि यह क्षत्र सुनामी से प्रभावित है। हाल में जापान में आयी सनामी इसका ज्वलंत उदाहरण है।

70. हैम रेडियो के उपयोग पर प्रकाश डालिए।

उत्तर- इसे एमेच्योर के नाम से भी जानते हैं। इसका प्रयोग गैर-वाणिज्यिक प्रयोजनों के लिए किया जाता है. जिसके संचालन में ऊर्जा की आवश्यकता जनरेटरों या बैटरियों के द्वारा पूर्ति किया जाता है। हैम रेडियो अंतर्राष्ट्रीय दूर-संचार नियमों क अनुसार कार्य करता है। इसका प्रयोग बड़ी-बड़ी प्राकृतिक आपदा वाले क्षेत्रों में किया जाता है। इस संचार प्रणाली में कोई भी बाहरी तार की आवश्यकता नहीं पड़ती है। आपदा के दौरान सूचना के प्रेषण में इसकी भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है।

71. चक्रवात किसे कहते हैं ?

उत्तर- जब किसी क्षेत्र में निम्न दबाव का केंद्र बनता है और उसके चारों ओर उच्च दबाव रहता है, तो बाहर से केंद्र की ओर बड़ी तेजी से वायु चलती है. इसे चक्रवात कहते हैं।

75. ओलावृष्टि किसे कहते हैं ?

उत्तर- वर्षा के साथ-साथ बर्फ के टुकड़ों की बौछार को ओलावृष्टि कहते हैं। खड़ी फसलों के समय ओलावृष्टि से फसलों की बर्बादी होती है।

76. आकस्मिक प्रबंधन को कैसे सफल बनाया जा सकता है ?

उत्तर- खाद्य पदार्थ, पशुचारा, महामारी आने से संबंधित जीवन रक्षक दवाई छिड़काव की सामग्री इत्यादि का पूर्व प्रबंधन आकस्मिक प्रबंधन को सफल बनाता है।

77. 1984 ई० में भोपाल स्थित यूनियन कार्बाइड के कारखाने से रिसने वाली किस गैस के कारण भयंकर दर्घटना हई थी ?

उत्तर – 1984 ई० में भोपाल स्थित यूनियन कार्बाइड के कारखाने से रिसने वाली मिथाइल आइसोसायनेट (MIC) गैस के निकलने से भयंकर दुर्घटना हुई थी।

78. बरनौल नामक दवाई किस काम में प्रयुक्त होती है ?

उत्तर- जले लोगों का प्राथमिक उपचार के रूप में जले भाग पर बरनौल मरहम का लेप लगाना उचित होता है।

79. ओला वृष्टि क्या है? इसके आर्थिक दुष्परिणाम बताएँ।

उत्तर – जब संघनन की क्रिया हिमांक से नीचे सम्पन्न होती है तब वाष्प हिमकणों के रूप में मटर के आकार से लेकर बड़े-बड़े गेंद के आकार में नीचे गिरता है। इसे ही ओला-वृष्टि कहते हैं। इससे फसलों एवं पशुधन की भारी क्षति होती है। खड़ी फसलों के अलावे । खेत-खलिहान में रखी फसल की भी हानि होती है।

80. मेघ-स्फोट क्यों और कहाँ होता है ?

उत्तर – गरम एवं आर्द्र पवन पर्वतीय ढालों से टकराकर तेजी से मेघ के रूप में घनीभत होकर तीव्र झंझावात का निर्माण करते हैं। इनमें मौजूद जलवाष्प तेजी स संघनित होकर मोटी धार के रूप में नीचे गिरता है। इसे ही मेघ-स्फोट (Cloudburst)कहते हैं। कभी-कभी तो यह वर्षा नदी की पतली धारा के समान होती है। 15-16 जून 2013 को उत्तराखण्ड में मेघ स्फोट के कारण हजारों लोग काल-कवलित हो गए।

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examunlocker@gmail.com

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