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1. जैव प्रक्रम ( लघु उत्तरीय प्रश्न )


1. उत्सर्जन क्या है ? उत्सर्जन में भाग लेने वाले वृक्क से संबंधित अन्य रचनाओं को सूचीबद्ध करें।

उत्तर ⇒ शरीर से अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकलना उत्सर्जन कहलाता है। मनुष्य में उत्सर्जन से संबंधित महत्त्वपूर्ण रचनाएँ निम्नांकित हैं –
(i) वृक्क

(ii) मूत्रवाहिनी

(iii) मूत्राशय 

(iv) मूत्रमार्ग


2. परपोषण किसे कहते हैं? ये कितने प्रकार के होते हैं ?

उत्तर ⇒ जिसमें जीव अपना भोजन स्वयं संश्लेषित नहीं करते हैं अपितु किसी-न-किसी रूप में अन्य स्रोतों से प्राप्त करते हैं। परपोषण निम्नांकित चार प्रकार
के होते हैं –

(i) प्राणिसम पोषण

(ii)मृतजीवी पोषण

(iii) परजीवी पोषण

(iv) परासरणी पोषण।


3. पोषण क्या है ? इनके विभिन्न चरण कौन-कौन से हैं ?

उत्तर ⇒ पोषण एक जटिल प्रक्रम है जिसके अंतर्गत कोई जीवधारी भोजन ग्रहण करता है, जिसके द्वारा शरीर-रचना, टूट-फूट की मरम्मत एवं अन्य सभी जैविक क्रियाओं का संचालन एवं नियमन होता है ।
मुख, आहार नली, आमाशय, क्षुद्रांत्र आंत की भित्ति। बिना पचा भोजन वृहदांत्र में भेज दिया जाता है।


4. स्वपोषी पोषण के लिए आवश्यक परिस्थितियाँ कौन-सी हैं और उसके उपोत्पाद क्या हैं ?

उत्तर ⇒ स्वपोषी पोषण हरे पौधों में पाया जाता है जो कि अपना भोजन स्वयं तैयार करते हैं । स्वपोषी पोषण के लिए प्रकाशसंश्लेषण आवश्यक है। हरे पौधे सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में क्लोरोफिल नामक वर्णक से CO, और जल द्वारा कार्बोहाइड्रेट का निर्माण करते हैं। इस क्रिया में ऑक्सीजन गैस बाहर निकलती है।

जैव प्रक्रम

सूर्य का प्रकाश, क्लोरोफिल, कार्बन डाइऑक्साइड और जल स्वपोषी पोषण के लिए आवश्यक परिस्थितियाँ हैं। इसके उपोत्पाद आणविक ऑक्सीजन है।


5. श्वसन के लिए ऑक्सीजन प्राप्त करने की दिशा में एक जलीय जीव की अपेक्षा स्थलीय जीव किस प्रकार लाभप्रद है ?

उत्तर ⇒ जलीय जीव जल में विलेय ऑक्सीजन का उपयोग करते हैं। क्योंकि जल में विलेय ऑक्सीजन की मात्रा वायु में ऑक्सीजन की मात्रा की तुलना में बहुत कम है, इसलिए जलीय जीवों की श्वास दर स्थलीय जीवों की अपेक्षा द्रुत होती है। स्थलीय जीव श्वसन के लिए वायुमंडल के ऑक्सीजन का उपयोग करते हैं। श्वसन के लिए ऑक्सीजन प्राप्त करने की दिशा में एक जलीय जीव की अपेक्षा स्थलीय जीव इस प्रकार लाभप्रद है।


6. श्वसन क्या है ?

उत्तर ⇒ शरीर के बाहर से ऑक्सीजन को ग्रहण करना तथा कोशिकीय आवश्यकता के अनुसार खाद्य स्रोत के विघटन में उसका उपयोग श्वसन कहलाता है। इसे निम्न समीकरण द्वारा समझा जा सकता है –

C6H120 + 602 → 6CO2 + 6H2O + 673 k cal.


7. स्वपोषण की आवश्यक शर्ते क्या है? इसके उपोत्पाद क्या हैं ?

उत्तर ⇒ स्वपोषण के लिए निम्न शर्तों को पूरा करना आवश्यक है –
(A) पर्णहरित या क्लोरोफिल की उपस्थिति
(B) कार्बन डाइऑक्साइड (CO2)की उपस्थिति
(C) जल (H2O) की उपस्थिति

पर्णहरित या क्लोरोफिल सूर्य से विकिरण ऊर्जा को अवशोषित करते हैं। जिसके द्वारा CO2 एवं H2O का स्थिरीकरण कर अपने भोजन कार्बोहाइट्रेट का निर्माण करते हैं। उपोत्पाद के रूप में ग्लूकोज एवं ऑक्सीजन प्राप्त होते हैं। ग्लूकोज अंततः स्टार्च में बदल जाता है।


8. परिसंचरण तंत्र से आप क्या समझते हैं ?

उत्तर ⇒ उच्च श्रेणी के जंतुओं में एक विशेष प्रकार का परिवहन तंत्र होता है जो ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड, पोषक तत्वों, हार्मोन, उत्सर्जी पदार्थों या अन्य उपापचयी क्रियाओं के फलस्वरूप उत्पन्न विभिन्न पदार्थों को शरीर के एक भाग से दूसरे भाग में ले जाता है, जिसे परिसंचरण तंत्र कहते हैं। इस तंत्र के तीन प्रमुख अवयव हैं –

(i) रक्त या रुधिर

(ii) हृदय

(iii) रक्त वाहिनियाँ


9. उत्सर्जन क्या है? मानव में इसके दो प्रमुख अंगों के नाम लिखें।

उत्तर ⇒ जीवों के शरीर से उपापचयी क्रियाओं के फलस्वरूप उत्पन्न अपशिष्ट पदार्थों को शरीर से बाहर निष्कासन की क्रिया को उत्सर्जन कहते हैं। मानव में इसके दो प्रमुख अंग के नाम निम्नलिखित हैं —
(i) वृक्क (Kidney) – जो रक्त में द्रव्य के रूप में अपशिष्ट पदार्थों (liquid waste product) को मूत्र के रूप में शरीर से बाहर निकालता है।
(ii) फेफड़ा (Lungs)  जो रक्त में गैसीय अपशिष्ट पदार्थों (gaseous waste product) को शरीर से बाहर निकालता है।


10. वाष्पोत्सर्जन क्रिया का पौधों के लिए क्या महत्त्व है ?

उत्तर ⇒ वाष्पोत्सर्जन क्रिया का पौधों के लिए निम्नलिखित महत्त्व हैं –

(i) यह पौधों के मूलरोम द्वारा खनिज लवणों के अवशोषण एवं जड़ से पत्तियों तक उनके परिवहन में सहायक होता है।
(ii) यह पौधों में तापक्रम संतुलन बनाये रखता है।
(iii) वाष्पोत्सर्जन के कारण ही पौधों की जड़ों से चोटी तक जल की निश्चित धारा बनी रहती है।
(iv) दिन में रंध्रों के खुले रहने पर वाष्पोत्सर्जन कर्षण; ही जाइलम में जल की गति के लिए मुख्य प्रेरक बल का कार्य करता है।


11. मूत्र बनने की मात्रा का नियमन किस प्रकार होता है ?

उत्तर ⇒ जल की मात्रा पुनरावशोषण, शरीर में उपलब्ध अतिरिक्त जल की मात्रा पर तथा कितना विलेय वय॑ उत्सर्जित करना है, पर निर्भर करता है। अगर अधिक मात्रा में जल या अन्य द्रव्य का सेवन किया जाये तो रक्त का दाब बढ़ जाता है व अधिक मात्रा में मूत्र बनती है। मूत्र की मात्रा भोजन में लिये गए खनिज लवण व दूसरे ठोस आहार पर भी निर्भर करता है। उदाहरण के लिए अगर खाने में नमक की मात्रा अधिक है तो वृक्क से उचित मात्रा में लवण मूत्र के साथ ही बनता है जिससे रक्त में विसरण दाब सही रहता है। मूत्राशय पेशीय होता है। अत: यह तंत्रिका नियंत्रण में है और हम इसी कारणवश मूत्र निकासी को नियंत्रित कर लेते हैं।


12. वाष्पोत्सर्जन को परिभाषित करें।

उत्तर ⇒ द्रव का कमरे के ताप या द्रव के क्वथनांक के नीचे के तापों पर वाष्प बनकर धीरे-धीरे वायुमंडल में जाने की प्रक्रिया वाष्पोत्सर्जन कहलाती है।


13. क्या शाकाहारी एवं मांसाहारी जंतुओं में छोटी आंत की लंबाई में भिन्नता होती है? यदि हाँ तो क्यों ?

उत्तर ⇒ छोटी आंत की लंबाई भोजन के प्रकार पर निर्भर करती है। शाकाहारी जंतओं में छोटी आंत की लंबाई अधिक होती है जिससे कि सेल्यूलोज का पाचन सही ढंग से हो सके। इसके विपरीत मांसाहारी जंतुओं में छोटी आंत की लंबाई छोटी होतो है, क्योंकि मांसाहारी भोजन का पाचन अपेक्षाकृत सरल होता है।


14. मनुष्य में दंतक्षरण का क्या कारण है ?

उत्तर ⇒ दंतक्षरण या दंतक्षय इनैमल तथा डेंटीन के शनैः-शनैः मृदुकरण के कारण होता है। अनेक जीवाणु कोशिका खाद्य कणों के साथ मिलकर दाँतों पर चिपककर दंत प्लाक बना देते हैं। प्लाक दाँत को ढक लेता है। इसलिए लार अम्ल को उदासीन करने के लिए दंत सतह तक नहीं पहुँच पाती है। यही दंतक्षरण का कारण है।


15. दंत प्लाक एवं दंत अस्थिक्षय से क्या समझते हैं ?

उत्तर ⇒ यदि मीठी चीजें खाने के उपरान्त हम अपनी दाँतों की सफाई ठीक से नहीं करते हैं तब ये हमारे दाँतों पर बैठ जाती है एवं दंत प्लाक बनाते हैं। शक्कर पर बैक्टीरिया रासायनिक क्रिया कर अम्ल बनाते हैं । यह अम्ल दाँत के इनामेल से रासायनिक प्रतिक्रिया कर उसे नरम बना देता है तथा उस स्थान पर धीरे-धीरे एक छिद्र बन जाता है जिसे दंत अस्थिक्षय कहते हैं।


16. विषमपोषी पोषण से आप क्या समझते हैं ?

उत्तर ⇒ विषमपोषी पोषण वह प्रक्रिया है, जिसमें जीव अपना भोजन स्वयं संश्लेषित न कर किसी अन्य स्रोतों पर निर्भर करते हैं। जैसे—सभी जन्तु, अहरित पौधे (कवक)। इसके तीन प्रकार हैं—

(i) मृतजीवी पोषण

(ii) परजीवी पोषण

(iii) प्राणिसम पोषण।


17. सजीव के मुख्य चार लक्षण लिखें।

उत्तर ⇒ सजीवों के मुख्य चार लक्षण निम्नलिखित हैं –

(i) पोषण

(ii) श्वसन

(iii) प्रजनन

(iv) वृद्धि एवं विकास।


18. जीवों में पोषण की अनिवार्यता की सार्थकता साबित करें ।

उत्तर ⇒ जैविक प्रक्रमों के संचालन, वृद्धि, अनुरक्षण आदि कार्यों के निष्पादन हतु जावा का मूलभूत आवश्यकता ऊर्जा है । ऊर्जा की प्राप्ति हेतु खाद्य पदाथा का जरूरत होती है । अत: जीवों में पोषण अनिवार्य है।


19. हमारे आमाशय में अम्ल की भमिका क्या है ?

उत्तर ⇒ हमारे आमाशय में अम्ल की भूमिका निम्नलिखित हैं

(i) यह जीवाणुनाशक की तरह कार्य कर भोजन के साथ आनेवाले बैक्टीरिया को नष्ट कर देता है

(ii) भोजन इसके कारण शीघ्रता से नहीं पचता है।


20. कोशिका के चार कोशिकांग का नाम लिखें।

उत्तर ⇒ कोशिका के चार कोशिकांग का नाम निम्नलिखित है –

(i) माइटोकॉण्ड्रिया

(ii) लाइसोसोम

(iii) गॉल्जी उपकरण

(iv) अंतः प्रद्रव्या जालिका।


21. मनुष्य में कितने प्रकार के दाँत पाये जाते हैं ? उनके नाम तथा कार्य लिखें।

उत्तर ⇒ मनुष्य में दाँत चार प्रकार के होते हैं-कतर्नक या इन्साइजर, भेदक या कैनाइन, अग्रचवर्णक या प्रीमोलर तथा चवर्णक या मोलर। कतर्नक को काटने वाला दाँत कहते हैं, भेदक-चिरने या फाड़ने वाला दाँत होता है। अग्रचवर्णक एवं चवर्णक को चबाने एवं पीसने वाला दाँत कहा जाता है।


22. उत्सर्जी पदार्थों के निष्कासन हेतु पौधों द्वारा उपयुक्त विधियों का नाम लिखें।

उत्तर ⇒ पौधों में उत्सर्जन के लिए जंतुओं की तुलना में कोई विशिष्ट अंग का प्रयोजन नहीं हैं। पौधे भिन्न-भिन्न तरीके से उत्सर्जी पदार्थों को निष्कासित करते हैं. पत्तियों के रंध्रों एवं तनों के वातरंध्रों द्वारा विसरण की प्रक्रिया से CO,को निष्कासित करते हैं। आवश्यकता से अधिक जल वाष्पोत्सर्जन द्वारा उत्सर्जित होता है। कुछ उत्सर्जी पदार्थ पत्तियों एवं छालों में संचित रहते हैं, जो निश्चित समयांतराल पर निष्कासित होते हैं।


23. हमारे शरीर में वसा का पाचन कैसे होता है? यह प्रक्रम कहाँ होता है ?

उत्तर ⇒ हमारे शरीर में वसा का पाचन आहारनाल की क्षुद्रांत्र में होता है। यकृत से निकलनेवाला क्षारीय पित्तरस, आए हुए भोजन के साथ मिलकर, उसकी अम्लीयता को निष्क्रिय करके उसे क्षारीय बना देता है, जिसकी इसी प्रकृति पर अग्न्याशयिक रस सक्रियता से कार्य करता है। पित्तरस वसा को सूक्ष्म कणों में तोड़ देता है। इस क्रिया को इमल्सीकरण क्रिया कहते हैं । लाइपेज एंजाइम, जो कि अग्न्याशयिक रस में पाया जाता है, इमल्सीफाइड वसा को वसीय अम्ल तथा ग्लिसरॉल में परिवर्तित कर देता।


24. किसी जीव द्वारा किन कच्ची सामग्रियों का उपयोग किया जाता है ?

उत्तर ⇒ किसी भी जीव में शारीरिक वृद्धि के लिए उसे बाहर से अतिरिक्त कच्ची सामग्री की भी आवश्यकता होती है। पृथ्वी पर जीवन कार्बन आधारित अणुओं पर निर्भर है, अतः अधिकांशतः, खाद्य पदार्थ भी कार्बन आधारित हैं। इन कार्बन स्रोतों की जटिलता के अनुसार विभिन्न जीव भिन्न प्रकार के पोषण प्रक्रम को प्रयुक्त करते हैं।


25. किण्वन क्रिया क्या है? इथेनॉल की प्राप्ति में किण्वन का अनुप्रयोग किस प्रकार होता है ?

उत्तर ⇒ गन्ने के रस को सूर्य के प्रकाश में रख देने पर यह रासायनिक ऊज का उपयोग कर किण्वित हो जाता है जिससे ऐल्कोहॉल का निर्माण होता है व्यापारिक विधि में एथेनॉल को चीनी के किण्वन द्वारा प्राप्त किया जाता है।

जैव प्रक्रम

26. पचे हुए भोजन को अवशोषित करने के लिए क्षद्रांत्र को कैसे अभिकल्पित किया गया है ?

उत्तर ⇒ पचे हुए भोजन का अवशोषण ज्यादा हो सके तथा सतही क्षेत्रफल अधिक हो इसके लिए क्षुद्रांत्र के आंतरिक स्तर पर अनेक अंगुली जैसे प्रवर्ध होते हैं जिन्हें दीर्घरोम कहते हैं । दीर्घरोम में रुधिरवाहिकाओं की बहुतायत होती है जो भोजन को अवशोषित करके शरीर की प्रत्येक कोशिका तक पहुँचाती हैं। इन । कोशिकाओं में भोजन का प्रयोग ऊर्जा प्राप्ति के लिए किया जाता है तथा नये ऊतकों के निर्माण तथा टूटे हुए ऊतकों की मरम्मत हेतु होता है ।


27. प्रकाश संश्लेषण क्या है? इसे रासायनिक समीकरण में व्यक्त करें।

उत्तर ⇒ हरे पौधों द्वारा सूर्य के प्रकाश से ऊर्जा प्राप्त कर क्लोरोफिल की उपस्थिति में कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) तथा जल (H2O) के द्वारा अपने भोजन काबोहाइड्रेट (कार्बनिक पदार्थ) का संश्लेषण करना ही प्रकाशसंश्लेषण (Photosyn thesis) की प्रक्रिया कहलाता है।

इसका रासायनिक समीकरण है –

जैव प्रक्रम

28. रक्त की संरचना को समझाएँ।

उत्तर ⇒ रक्त लाल रंग का गाढ़ा, क्षारीय तरल पदार्थ है, जो मुख्य रूप से कोशिका एवं प्लाज्मा से बना है। रक्त कोशिका तीन प्रकार की होती है—लाल रक्त कोशिका, श्वेत रक्त कोशिका एवं पट्टिकाणु।

प्लाज्मा (50-55%) में 90-92% जल, 6-8% प्लाज्मा प्रोटीन एवं 1-2%अकार्बनिक लवण पाये जाते है। इसमें ग्लूकोज, अमीनो अम्ल, वसा आदि पाये जाते हैं।


29. रक्त पट्टिकाणु की क्या उपयोगिता है ?

उत्तर ⇒ रक्त पट्टिकाणु सबसे छोटे आकार की रक्त कोशिकाएँ हैं, इसे विषाणु या थ्रोम्बोसाइटस भी कहते हैं। ये अस्थिमज्जा के मैगाकैरिओसाइट्स द्वारा निर्मित होते हैं। ये रक्त को थक्का बनाने में मदद करता है।


30. मृतजीवी पोषण क्या है ?

उत्तर ⇒ जीव मृत जंतुओं और पौधों के शरीर से अपना भोजन, अपने शरीर की सतह से, घुलित कार्बनिक पदार्थों के रूप में अवशोषित करते हैं। यही मृतजीवी – पोषण है। मृतजीवी अपना भोजन मुख्यतः तरल अवस्था में अवशोषण द्वारा ग्रहण करते हैं। जंतुओं और पौधों की मृत्यु के पश्चात् उनके मृत शरीर को मृतजीवी अपघटित कर, अर्थात् सड़ा-गलाकर उनके मूल तत्त्वों में बदल देते हैं। ऐसे मूल तत्त्व पुनः मिट्टी में प्रतिस्थापित हो जाते हैं और उत्पन्न गैस वातावरण में मिल जाते हैं। इन तत्त्वों को फिर से हरे पौधे मिट्टी से ग्रहण कर अपने उपयोग में लाते हैं। यही चक्र पृथ्वी में निरंतर चलता रहता है।


31. जीवन के अनुरक्षण के लिए आप किन प्रक्रमों को आवश्यक मानेंगे ?

उत्तर ⇒ जीवन के अनुरक्षण के लिए हम निम्नलिखित प्रक्रमों को आवश्यक मानेंगे –

(i) पोषण

(ii) श्वसन

(iii) परिवहन एवं

(iv) उत्सर्जन इत्यादि ।

पर इन जैव प्रक्रमों के अतिरिक्त सभी जीवधारी जनन (reproduction) द्वारा अपनी संख्या में वृद्धि करते हैं । ये क्रियाएँ जीवन के लिए अति आवश्यक हैं।


32. प्रछली, मच्छर, केंचुआ और मनुष्य के मुख्य श्वसन अंगों के नाम लिखें।

उत्तर ⇒ मछली में मुख्य श्वसन अंग क्लोम (Gill) होता है। मच्छर में मुख्य श्वसन अंग श्वासनली या ट्रैकिया है, केंचुआ में मुख्य श्वसन अंग त्वचा है, जबकि मनुष्य में फेफड़ा है।


33. प्रकाशसंश्लेषण के लिए आवश्यक कच्ची सामग्री पौधे कहाँ से प्राप्त करते हैं ?

उत्तर ⇒ प्रकाशसंश्लेषण के लिए पौधे कच्ची सामग्री निम्नांकित जगहों से प्राप्त करते हैं –

(i) कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) – इसे बायुमंडल से प्राप्त किया जाता है।
(iii) जल – भूमि से पौधे जड़ों द्वारा प्राप्त करते हैं।
(iii) पर्णहरित – यह पौधों के कोशिकाओं में स्थित हरित लवक होते हैं।
(iv) सूर्य का प्रकाश – सूर्य के प्रकाश से पौधे, फोटोन ऊर्जा कणों के रूप में प्राप्त करते हैं जो क्लोरोफिल में संचित होकर आवश्यकतानुसार प्रयोग में लाये जाते हैं।


34. श्वसन के लिए ऑक्सीजन प्राप्त करने की दिशा में एक जलीय जीव की अपेक्षा स्थलीय जीव किस प्रकार लाभप्रद होते हैं ?

उत्तर ⇒ जल में ऑक्सीजन काफी कम घुलित होते हैं, जबकि अधिक जैव ऊर्जा के उत्पादन के लिए अधिक ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है। जलीय जीव – (मछलियाँ) सर्वप्रथम मुख के द्वारा घुलित ऑक्सीजन को लेती हैं तथा विमाण के द्वारा क्लोम की कोशिकाओं में अवशेषित कर लेती हैं। जबकि स्थलीय जीव फेफड़ा
के द्वारा आसानी से ऑक्सीजन ले पाते हैं।


35. पौधों में गैसों का आदान-प्रदान कैसे होता है ?

उत्तर ⇒ पौधों में गैसों का आदान-प्रदान विसरण की क्रिया के द्वारा पौधों की पत्तियों पर स्थित रंध्रों (stomata) पुराने वृक्षों के तनों की कड़ी त्वचा (bark) पर स्थित वातरंध्रों (lenticels) एवं अंतरकोशिकीय स्थानों (intercellular spaces) के द्वारा होती है। इस क्रिया में पौधो की आवश्यकताओं एवं पर्यावरणीय अवस्था का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है।


36. आमाशय में पाचक रस की क्या भूमिका है ?

उत्तर ⇒ पाचक रस (आमाशय) में HCL पाया जाता है जो निष्क्रिय पेप्सिनोजेन को सक्रिय पेप्सिन नामक एंजाइम में बदल देता है। पेप्सिन भोजन के प्रीटीन पर कार्य कर उसे पैप्टोन (Peptone) में बदल देता है। HCL भोजन के साथ आनेवाले बैक्टीरिया को नष्ट कर देता है। इसके अतिरिक्त गैस्टिक लाइपेज एंजाइम भी पाचक रस में होता है, जो वसा के आंशिक पाचने में मदद करता है।


37 ग्लोमेरुलर फिल्ट्रेशन से’आप क्या समझते हैं ?

उत्तर ⇒ अभिवाही एवं अपवाही धमनिका के संयोग को ग्लोमेरुलर कहते हैं । अपवाही धमनिका का व्यास कम होने के कारण ग्लोमेरुलस के अन्दर रक्त पर दबाव अधिक बढ़ जाता है तथा इस उच्च दबाव पर रक्त के छनने की प्रक्रिया होती है, जिसे ग्लोमेरुलर फिल्ट्रेशन या अल्ट्राफिल्ट्रेशन कहते हैं। इसके कारण प्रतिदिन 150-180 लीटर रक्त का वृक्कीय निस्पंद होता है, जिनमें 168.5 लीटर जल अवशोषित कर लिया जाता है एवं 1.5 से 1.8 लीटर मूत्र बनता है ।


38. विभिन्न प्रकार के प्राणिसमभोजी सजीवों का उल्लेख करें ।

उत्तर ⇒ प्राणिसमभोजी सजीव अपना भोजन ठोस या तरल के रूप में जंतुओं के भोजन ग्रहण करने की विधि द्वारा ग्रहण करते हैं । ऐसे प्राणियों का भोजन संपूर्ण पादप या अन्य प्राणि अथवा उनके कुछ भाग होते हैं । भोजन के स्रोतों के आधार पर प्राणिसमभोजी निम्न प्रकार के होते हैं— शाकाहारी, मांसाहारी, सर्वाहारी, स्वजातिभक्षक, अपशिष्टभोजी, परभक्षी, कीटभक्षी, अपघटक, मत्स्यभक्षी, धान्यपोषी ।


39. पत्तियों को प्रकाशसंश्लेषी अंग क्यों कहा जाता है ?

उत्तर ⇒ पत्तियों में अंदर हरे वर्णक पर्णहरित या क्लोरोफिल की उपस्थिति होती है और प्रकाशसंश्लेषण प्रक्रम केवल क्लोरोफिल की उपस्थिति में संभव होता है । इसलिए पत्तियों को प्रकाशसंश्लेषी अंग कहा जाता है ।


40. पित्त क्या है? मनुष्य के पाचन में इसका क्या महत्त्व है ?

उत्तर ⇒ पित्त यकृत ग्रंथि से स्रावित होने वाला (श्राव) द्रव्य है जो छोटी आँत में भोजन के पाचन में मदद करता है। मनुष्य के पाचन क्रिया में इसका निम्नलिखित महत्त्व है।
(i) पित्त आमाशय से ग्रहणी में आए अम्लीय काइम की अम्लीयता को नष्ट कर उसे क्षारीय बना देता है ताकि अग्न्याशयी रस के एंजाइम उस पर क्रिया कर सके।
(ii) पित्त भोजन में वसा के बड़े कण को सूक्ष्म कण में तोड़ने में (emulsification) मदद करता है, ताकि लाइपेज एंजाइम उस पर क्रिया कर वसा अम्ल एवं ग्लिसरॉल में परिवर्तित कर सके। इस प्रकार वसा के पाचन में पित्त का महत्त्व है।


41. हमारे शरीर में हीमोग्लोबिन की कमी के क्या परिणाम हो सकते हैं ?

उत्तर ⇒ हीमोग्लोबिन, लाल रक्त कोशिकाओं में पायी जाती है, यह ऑक्सीजन के साथ मिलकर ऑक्सीहीमोग्लोबिन का निर्माण करती है। यह कोशिका में ऑक्सीजन को विसरित कर देती है, जिससे कोशिकीय श्वसन हो सके। हमारे शरीर में हीमोग्लोबिन की कमी से एनिमिया नामक बीमारी हो जाती है। लाल रक्त कोशिकाओं की संख्या कम हो जाती है। कोशिका को पूरी तरह ऑक्सीजन नहीं मिल पाता है, जिसके कारण कोशिकीय श्वसन बाधित हो जाता है।


42. लसीका की क्या उपयोगिता है ? प्रकाश डालें।

उत्तर ⇒ लसीका श्वेत संवहनी संयोजी ऊतक है। रक्त प्लाज्मा की कुछ मात्रा कोशिकाओं से विसरित होकर ऊतकों में स्थित कोशिकाओं के बीच के रिक्त स्थानों में प्रविष्ट हो जाती है। ये विसरित प्लाज्मा को ऊतक द्रव या लसीका कहते हैं। लसीका के द्वारा कोशिकाओं में ऑक्सीजन सरलतम भोज्य पदार्थों तथा हार्मोन का विसरण होता है। इसके द्वारा CO2 जल तथा अपशिष्टों का भी विसरण होता है।


43. पौधों में मूलरोमों की कोशिकाओं में जल के पहँचने की विधि का उल्लेख करें।

उत्तर ⇒ मृदा से जल का अवशोषण जलीय पौधों में मूलरोमों के द्वारा होता है। मृदा से जल मूलतः विसरण की प्रक्रिया से मलरोम की कोशिकाओं में प्रवश कर जाता है। चूंकि मूलरोम की कोशिकाओं में कोशिका द्रव का परासरण दाब भूमि जल के दाब से अधिक होता है। अतः सांद्रता प्रवणता के अनुसार भूमि से मूलरामा का कोशिकाओं की ओर जल का बहाव होता है।


44. गैसों के अधिकतम विनिमय के लिए कूपिकाएँ किस प्रकार अभिकल्पित हैं ?

उत्तर ⇒ हमारे मानव शरीर में दो फेफड़े होते हैं। प्रत्येक फेफड़ा लाखों सूक्ष्म कपिकाओं में विभाजित होता है। वायु की अनुपस्थिति में कूपिका बहुत कम स्थान घेरती है जबकि वायु की उपस्थिति में कूपिका बहुत स्थान घेरती है। इनके कारण श्वसन क्रिया में बहुत सहायता मिलती है।


45. पाचन किसे कहते हैं ? मनुष्य के आहारनाल के विभिन्न भागों का नाम बताएँ।

उत्तर ⇒ वह क्रिया जिसमें एंजाइमों की सहायता से जटिल भोज्य पदार्थों को सरल अणुओं में अपघटित किया जाता है, जिससे ये अवशोषित होकर हमारी कोशिकाओं में प्रवेश कर सके, पाचन कहलाती है।
मनुष्य के आहारनाल में निम्नलिखित भाग होते हैं।मुखगुहा, ग्रसनी, ग्रासनली, आमाशय, छोटी आँत, बड़ी आँत, मलाशय एवं मलद्वार।


46. उच्च संगठित पादप में वहनतंत्र के घटक क्या हैं ?

उत्तर ⇒ उच्च संगठित पादप में वहनतंत्र के घटक हैं –

(i) एक जाइलम है, जो मृदा से प्राप्त जल और खनिज लवणों को वहन करता है। दूसरा फ्लोएम, पत्तियों से जहाँ प्रकाशसंश्लेषण के उत्पाद संश्लेषित होते हैं, पौधे के अन्य भागों तक वहन करता है।


47. क्या होगा अगर मानव शरीर से दोनों वृक्क को हटा दिया जाय ?

उत्तर ⇒ मनुष्य जीवित नहीं रह सकता है क्योंकि अपशिष्ट पदार्थ रक्त में जमा होना शुरू हो जाएँगे, तथा रक्त विषाक्त हो जाएगा ।


48. कठोर परिश्रम या अभ्यास करते समय साँस लेने की क्रिया पर क्या प्रभाव पड़ता है और क्यों ?

उत्तर ⇒ कठोर परिश्रम या अभ्यास करते समय हमारे मांसपेशियों में संकुचन और फैलाव बढ़ जाता है इसलिए साँस लेने में कठिनाई होने लगती है।


49. हमारे जैसे बहुकोशिकीय जीवों में ऑक्सीजन की आवश्यकता पूरी करने में विसरण क्यों अपर्याप्त है ?

उत्तर ⇒ बड़े आकार वाले हमारे जैसे बहकोशिकीय जीव में सभी कोशिकाएँ अपने आस-पास के पर्यावरण के सीधे संपर्क में नहीं रह सकती। अतः साधारण विसरण सभी कोशिकाओं की आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर सकता।


50. मनुष्य के आमाशय में जो HCL अम्ल स्त्रावित होता है, वह कैसे कार्य करता है ?

उत्तर ⇒ गैस्ट्रिक HCL अम्लीय माध्यम प्रदान करता है जो गैस्ट्रिक खमीर पेप्सीन को सक्रिय करता है। यह सक्रिय होकर भोजन में पाए जाने वाले विभिन्न कीटाणओं को मारता है।


57. एक सामूहिक भोज में खाने के पश्चात् 30 लोग बीमार हो गये। उन्हें कै-दस्त तथा बुखार हो गया। आप बतायें कि उन्हें कौन-सी बीमारी हुई? इसमें किस जीवाणु का योगदान है? आप उन्हें किस तरह प्राथमिक उपचार सुझायेंगे ?

उत्तर ⇒ जैसा कि लक्षण से स्पष्ट हो रहा है कि उन बीमार व्यक्तियों को भोजन विषाक्तन की शिकायत थी । यह बीमारी एक खास जीवाणु बैक्टेरियम बौटोलिज्म की वजह से होता है । रोगी को प्राथमिक उपचार के तौर पर नमक-चीनी और पानी का घोल समय-समय पर देंगे ताकि निर्जलीकरन नहीं हो पाए ।


52. कीटों में ऑक्सीजन सीधे ऊतकों को क्यों पहुँचाया जाता है ? इस विधि में प्रयुक्त रचनाओं का वर्णन कार्यविधि के साथ करें।

उत्तर ⇒ कीटों में श्वसन ट्रैकिया के द्वारा होता है। ट्रैकिया शरीर के भीतर स्थित अत्यंत शाखित हवा-भरी नलिकाएँ हैं जो एक ओर सीधे ऊतकों के संपर्क में होती है तथा दूसरी ओर शरीर की सतह पर श्वासरंध्र नामक छिद्रों के द्वारा खुलती है। कीटों में ट्रैकिया के द्वारा श्वसन में गैसों का आदान-प्रदान रक्त के माध्यम से नहीं होता है । इसका कारण यह है कि कीटों के रक्त में हीमोग्लोबिन या उसके जैसे कोई रंजक जिसमें ऑक्सीजन को बाँधने की क्षमता हो, नहीं पाए जाते है ।


53. वाष्पोत्सर्जन एवं स्थानांतरण में अंतर स्पष्ट करें।

उत्तर ⇒ पौधों के वायवीय भागों (स्टोमाटा, क्यूटिकल एवं लेंटीसेल्स) द्वारा वाष्प के रूप में जल के निष्कासन की क्रिया वाष्पोत्सर्जन कहलाती है। यह एक शारीरिक क्रिया है, एवं अलग-अलग पादपों में इस क्रिया से निष्कासित जल की मात्रा में भिन्नता होती है। है लेकिन स्थानांतरण में पौधों में जल, खनिज लवण एवं खाद्य-पदार्थों का बहुत ऊँचाई तक संचलन होता है। इस स्थानांतरण की क्रिया में वाष्पोत्सर्जन की भूमिका होती है। यह फ्लोएम की चालनी नलिकाओं द्वारा होता है।


54. पौधों में स्टोमाटा कहाँ पाए जाते हैं? इनसे CO,पत्ती कोशिकाओं में कैसे पहुँचता है ?

उत्तर ⇒ पत्तियों की बाह्य त्वचा या एपिडर्मिस के पृष्ठ पर स्टोमाटा पाई जाती है। ये स्टोमाटा दो द्वार-कोशिकाओं द्वारा घिरी होती है। स्टोमाटा का खुलना व बंद होना द्वार-कोशिकाओं की स्थिति पर निर्भर करता है। जब द्वार कोशिकाएँ जल अवशोषित कर फूल जाती हैं, तो स्टोमाटा खुल जाते हैं, और वायुमंडल से Co. विसरण द्वारा पत्ती-कोशिकाएँ में पहुँच जाता है। इसके विपरीत जब द्वार कोशिकाओं का जल बाहर निकल जाता है, तब ये सिकुड़ जाती है और रंध्र बंद हो जाते हैं।


55. किण्वन किस प्रकार का श्वसन है ? यह कहाँ होता है ?

उत्तर ⇒ किण्वन एक प्रकार का अवायवीय श्वसन है, जिसमें यीस्ट द्वारा, पायरुवेट को एथेनॉल एवं कार्बन डाइऑक्साइड में परिवर्तित कर दिया जाता है। यह अभिक्रिया यीस्ट कोशिकाओं के बाहर स्रावित जाइमेज एंजाइम द्वारा शर्करा के अपघटन के फलस्वरूप संपन्न होता है।


56. नासिका वेश्म किस प्रकार हवा के साथ अंदर प्रवेश करनेवाले धूलकणों के साथ रोगाणुओं की रोकथाम करता है ?

उत्तर ⇒ नासिका वेश्मों में महीन म्यूकस मेम्ब्रेन का स्तर होता है, जो म्यूकस नावित करता है। विभिन्न रोगाणु या अन्य हानिकारक पदार्थ लसलसे म्यकस में फंसकर प्रकोष्ठ के बालों में चिपक जाते हैं और ये अंदर की ओर प्रवेश नहीं कर पाते हैं।


57. हृदय में कपाटों की क्या आवश्यकता है ?

उत्तर ⇒ मनुष्य तथा मैमेलिया वर्ग के अन्य जंतुओं के हृदय में चार वेश्म दो बायाँ एवं दायाँ अलिंद तथा दो बायाँ एवं दायाँ निलय होते हैं। दायाँ अलिंद, दाएँ निलय में तथा बायाँ अलिद बाए निलय में खुलता है। इनके खलने के स्थान से त्रिदली एवं द्विदली कपाट क्रमशः लगे होते हैं, जो पुनः रक्त को वापस नहीं आने देते तथा उनमें शद्ध एवं अशुद्ध रक्त को आपस में मिलने से रोकते हैं। अतः शद्ध एवं अशद्ध रक्त आपस में मिले नहीं इसके लिए हृदय में कपाटों की आवश्यकता अनिवार्य है।


58. श्वसन और दहन में दो अंतर लिखें।

उत्तर ⇒ श्वसन एवं दहन में निम्न अंतर हैं –

                    लक्षण                      श्वसन                    दहन
(i) प्रक्रिया की प्रवृत्तिजैव रासायनिक एवं क्रमबद्ध प्रक्रिया  है।भौतिकीय रासायनिक अभिक्रिया है जो अचानक होती है।
 (ii) उपस्थिति का स्थलकोशिकीय स्तर पर होता है।कोशिकीय स्तर पर नहीं होती है।

59. श्वसन एवं प्रकाश संश्लेषण में क्या अंतर है ?

उत्तर ⇒

                                  श्वसन                          प्रकाशसंश्लेषण
(i) श्वसन एक विखंडात्मक प्रक्रिया है (i) प्रकाश संश्लेषण एक रचनात्मकअभिक्रिया है।
(ii) श्वसन में ग्लूकोज एवं ऑक्सीजन को सब्सट्रैट के रूप  उपयोग करते हैं।(ii) प्रकाश संश्लेषण में Co एवं जल को सब्सट्रैट के रूप में में उपयोग करते है।
(iii) श्वसन में Co एवं H2अंतोत्पाद के रूप में बनेंगे।(iii) प्रकाश संश्लेषण में ग्लूकोज एवं co 2 अंतोत्पाद के रूप में बनेंगे।

60. वायवीय तथा अवायवीय श्वसन में क्या अंतर है? कुछ जीवों के नाम लिखिए जिसमें अवायवीय श्वसन होता है।

उत्तर ⇒

                             वायवीय  श्वसन                          अवायवीय   श्वसन
(i) इसमें ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है।(i) इसमें ऑक्सीजन की आवश्यकता नहीं होती है।
(ii) कोशिका के कोशिका द्रव्य व माइटोकॉण्ड्रिया में होता है (ii) यह क्रिया केवल कोशिका द्रव्यव  में ही होती है।
(iii) इस क्रिया में आतम उपाय CO2  तथा जल होते हैं।(iii) इस क्रिया अंतिम उत्पाद इथाइल अल्कोहल तथा कार्बन डाईऑक्साइड  है 
(iv) यह क्रिया सभी जीवधारियों में पायी जाती है (iv) यह क्रिया केवल कुछ ही जीवधारियों में पायी जाती है 

61. श्वसन एवं श्वासोच्छ्वास में क्या अंतर है ?

उत्तर ⇒ श्वसन एवं श्वासोच्छ्वास में निम्नलिखित अंतर हैं

                  श्वसन                श्वासोच्छ्वास
 (i) श्वसन एक जैव रासायनिक प्रक्रम है।(i) श्वसोच्छवास एक भौतिक क्रिया है 
(ii) इसमें ऊर्जा का निर्माण होता (ii) इसमें ऊर्जा का निर्माण नहीं होताहै।
(iii) यह कोशिका में संपन्न होती है   (iii) यह फेफड़े में होती है।   

62. जाइलम तथा फ्लोएम में पदार्थों के संवहन में दो अंतर लिखें।

उत्तर ⇒

                       जाइलम                  फ्लोएम
1. इसकी कोशिकाएँ मृत होती हैं।1. इसकी कोशिकाएँ जीवित होती हैं।
2. यह जल एवं घुलित खनिज लवण का स्थानांतरण करता है। 2. यह खाद्य पदार्थों का स्थानांतरण करता है।

63. एकदिशीय तथा द्विदिशीय स्थानान्तरण में विभेद करें ।

उत्तर ⇒

                   एकदिशीय स्थानांतरण                     द्विदिशीय स्थानान्तरण
पौधों के जड़ से ऊपरी भागों की ओर जल तथा खनिज लवणों का परिवहन एक स्वतंत्र विशेष तंत्र द्वारा होता है, इसे एकदिशीय स्थानांतरण कहते हैं ।खाद्य पदार्थों का स्थानान्तरण पत्तियों से नीचे एवं ऊपर की ओर एक विशेष तंत्र फ्लोएम के द्वारा होता है । इसे द्विदिशीय स्थानांतरण कहते हैं ।

64. लगातार दौड़ते रहने से मनुष्य की माँसपेशियों में दर्द हो जाता है। इसके पीछे जैव वैज्ञानिक कारण क्या है ?

उत्तर ⇒ लगातार दौड़ते रहने से मनुष्य की माँसपेशियों में लैक्टिक अम्ल का निर्माण होता है। यह मांसपेशियों में जमा हो जाता है, जिसके कारण मांसपेशियों में असह्य दर्द की अनुभूति होती है। यह दर्दयुक्त कैम्पस उत्पन्न करती है। यह एक प्रकार का अवायवीय श्वसन है।

2. नियत्रण एवं समन्वय ( लघु उत्तरीय प्रश्न )


1. पादप हॉर्मोन क्या हैं ?

उत्तर ⇒  पादप (पौधे) में कुछ रासायनिक पदार्थों की वृद्धि होती है । ये उनकी गतिविधि को नियंत्रण तथा समन्वय करते हैं । वे ही रसायन पादप हॉर्मोन कहलाते हैं।


2. प्रकाशानुवर्तन और गुरुत्वानुवर्तन में क्या अंतर है ?

उत्तर ⇒  प्रकाशानुवर्तन – पौधे के शीर्ष प्रकाश की दिशा में अग्रसर होते हैं । इसे प्रकाशानुवर्तन कहा जाता है।
गुरुत्वानुवर्तन – पौधे के जड़ गुरुत्वाकर्षण की दिशा में अग्रसर होते हैं इसे गुरुत्वानुवर्तन कहा जाता है।


3. प्रतिवर्ती क्रिया तथा प्रतिवर्ती चाप में अंतर स्पष्ट करें।

उत्तर ⇒  प्रतिवर्ती क्रिया-वह क्रिया है जिसे मेरूरज्जू नियंत्रित करता है तथा यह क्रिया हमारी इच्छा से नियंत्रित नहीं होती । इसके विषय में हम सोच नहीं सकते।प्रतिवती चाप न्यूरॉनों में आवेग संचरण एक निश्चित पथ में होता है। इस पथ को प्रतिवर्ती चाप कहते हैं।


4. मनुष्य में चीनी के पाचन में कौन-सा हॉर्मोन सहायक है ?

उत्तर ⇒  चीनी के पाचन में इन्सलिन सहायक है, जिसकी कमी से मधुमेह हो जाता है।


5. पीयूष ग्रंथि को ‘मास्टर ग्रंथि’ क्यों कहते हैं ?

उत्तर ⇒  पीयूष ग्रंथि मस्तिष्क के आधार तल पर ऑप्टिक काइज्मा के पीछे सेलाटर्सिका गुहा में बन्द रहती है। शरीर का शायद ही कोई ऐसा अंग हो जो पीयूष ग्रंथि से प्रभावित न होता हो। इसी कारण इसे ‘मास्टर ग्रंथि’ भी कहते हैं।


6. आयोडीन की कमी से कौन-सी बीमारी होती है तथा कैसे ?

उत्तर ⇒  आयोडीन की कमी से घेघा (Goitre) रोग होता है। आयोडीन की कमी के कारण थायरॉक्सिन नामक हार्मोन उचित मात्रा में स्रावित नहीं हो पाता है, जिससे थॉयराइड ग्रंथि का आकार काफी बढ़ जाता है, जिसके फलस्वरूप गले में सूजन हो जाता है। शरीर की इस अवस्था को घंघा रोग के नाम से जाना जाता है।


7. गुरुत्वानुवर्तन का प्रदर्शन चित्र के द्वारा करें।

उत्तर ⇒  पौधों की वह गति जो पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण की दिशा में होती है, गुरुत्वानुवर्तन कहलाती है।


8. पिट्यूटरी ग्रंथि के मध्य पिंडक से कौन-सा हार्मोन स्रावित होता है ? इसके क्या कार्य हैं ?

उत्तर ⇒  मध्य पिंडक हमेशा अग्र पिंडक से ढंका होता है, जिसके द्वारा मेलेनोसाइट स्टीमलेटिंग हॉर्मोन स्रावित होता है। यह शरीर के रंग को निर्धारित करता है।


9. मादा में प्रसव के समय कौन-सा हार्मोन स्रावित होता है ? इसका क्या कार्य है ?

उत्तर ⇒  मादा में प्रसव से पूर्व रीलैक्सिन नामक हार्मोन स्रावित होता है। यह नन स्टीरॉयड हार्मान है, जो प्यूबिक सिम्फैसिस को रीलैक्स करता है।


10. रवत में ग्लूकोज की मात्रा को नियंत्रित करने वाला हॉर्मोन किस ग्रंथि द्वारा स्त्रावित होते हैं ?

उत्तर ⇒  रक्त में ग्लूकोज की मात्रा को नियंत्रित करने वाला हॉर्मोन अग्न्याशय में विशिष्ट प्रकार की कोशिकाओं के समूह, लैंगरहैंस की द्वीपिकाएँ (Islets of Langerhans) द्वारा स्रावित होते हैं।


11. मनुष्य के मस्तिष्क को कितने भाग में बाँटा गया है, नाम सहित बताएँ।

उत्तर ⇒  मनुष्य के मस्तिष्क को तीन भागों में बाँटा गया है।

(i) अग्रमस्तिष्क (Fore Brain)

(ii) मध्यमस्तिष्क (Mid Brain)

(iii) पश्चमस्तिष्क (Hind Brain)


12. पेरूरज्जु आघात में किन संकेतों के आने में व्यवधान होगा ?

उत्तर ⇒  मेरूरज्ज आघात के कारण विभिन्न प्रकार के आतरिक संवेदना या उद्दीपनों को ग्रहण करना मश्किल हो जाता है। भौतिक, रासायनिक एव यात्रिक आदि को ग्रहण कर उनका संवहन शरीर के विभिन्न भागों में करना असंभव हो जाता है। इसके कारण शरीर कोई प्रतिक्रिया नहीं दे पाती है।


13. मानव शरीर में कैल्सियम-फॉस्फोरस सामंजन हेतु आवश्यक दो हॉर्मोन का नाम लिखें।

उत्तर ⇒  पाराथायरायड ग्रंथि से पाराथार्मोन तथा कैल्सिटोनिन नामक दो हॉर्मोन निकलते हैं, जो कैल्सियम फास्फोरस, सामंजन हेतु आवश्यक है ।


14. मस्तिष्क के महत्त्वपूर्ण कार्यों का वर्णन करें ।

उत्तर ⇒  मस्तिष्क के महत्त्वपूर्ण कार्य निम्नलिखित हैं –

(i) आवेग ग्रहण करना तथा मस्तिष्क में ग्रहण किये गये आवेगों का विश्लेषण करना।
(ii) ग्रहण किये गये आवेगों की अनुक्रिया।
(iii) विभिन्न आवेगों का सहबंधन कर विभिन्न शारीरिक कार्यों का कुशलतापूर्वक समन्वय करना।

(iv) सूचनाओं का भंडारण करना। मस्तिष्क में अनेक सूचनाएँ चेतना या ज्ञान के रूप में रहती है। इसी कारणवश, मानव मस्तिष्क को चेतना या ज्ञान का भंडार भी कहा गया है।


15. पादप में रासायनिक समन्वय किस प्रकार होता है ?

उत्तर ⇒  पादपों में रासायनिक समन्वय पादप हॉर्मोनों के कारण होता है। अपने कछ विशिष्ट भागों को प्रभावित करने के लिए पादप विशिष्ट हॉर्मोनों को उत्पन्न करते हैं। पादपों में प्रकाश जिस ओर रहेगा उसी दिशा की ओर प्ररोह बढेगा। पादपों में जलानवर्तन और रसायनावर्तन इसी प्रकार होता है। गुरुत्वानुवर्तन जड़ों को नीचे की ओर मोडकर अनुक्रिया करता है। परागनलिका का बीजांड की ओर वृद्धि करना रसायनावर्तन का ही उदाहरण है।


16. एक जीव में नियंत्रण एवं समन्वय के तंत्र की क्या आवश्यकता है ?

उत्तर ⇒  अंगतंत्रों के विभिन्न अंगों के बीच समन्वय स्थापित करने के लिए नियंत्रण की आवश्यकता होती है। बिना नियंत्रण के अंगों के कार्य करने का समय एक नहीं होता एवं वे व्यवस्थित ढंग से अपने कार्य का संपादन नहीं कर सकेंगे। इसलिए, जीवों के विभिन्न अंगों एवं अंगतंत्रों का समन्वय एवं नियंत्रण उनके विभिन्न कार्यों के कुशल संचालन के लिए आवश्यक है।


17. हॉर्मोन थाइरॉक्सिन का क्या महत्त्व है ?

उत्तर ⇒  हॉर्मोन थाइरॉक्सिन कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन तथा वसा के सामान्य उपापचय (general metabolism) का नियंत्रण करता है। अतः यह शरीर की सामान्य वृद्धि, विशेषकर हड्डियों, बालों इत्यादि के विकास के लिए आवश्यक है। आयोडिन की कमी से थायरॉइड ग्रंथि द्वारा बननेवाला हॉर्मोन कम बनता है जिसकी गति को बढ़ाने के प्रयास में कभी-कभी थायरॉइड ग्रंथि बढ़ जाती है जिसे घेघा या गलगंड (goitre) कहते हैं। थायरॉक्सिन मानसिक व शारीरिक वृद्धि को प्रभावित करता है।


18. नर तथा मादा जनन हार्मोन के नाम एवं कार्य लिखें।

उत्तर ⇒  नर तथा मादा जनन हार्मोनों के नाम एवं कार्य निम्नलिखित हैं –

(i) नर जनन हार्मान (Testosterone/Androgen)

(ii) मादा जनन हार्मोन (Progesterone and Estrogen)

कार्य:

(i) हार्मोन के निर्माण में सहायक होना।
(ii) द्वितीय जनन लक्षण को नियंत्रित करना।
(iii) गर्भावस्था में होने वाली क्रियाओं में सहायक होना।


19. जंतुओं में रासायनिक समन्वय कैसे होता है ?

उत्तर ⇒  अंगतंत्रों के विभिन्न अंगों के बीच समन्वय स्थापित करने के लिए नियंत्रण की आवश्यकता होती है । बिना नियंत्रण के अंगों के कार्य करने का समय एक नहीं होता एवं वे व्यवस्थित ढंग से अपने कार्य का संपादन नहीं कर सकेंगे। इसलिए, जीवों के विभिन्न अंगों एवं अंगतंत्रों का समन्वय एवं नियंत्रण उनके विभिन्न कार्यों के कुशल संचालन के लिए आवश्यक है।


20. जिबरेलिन्स की मुख्य उपयोगिता क्या है ?

उत्तर ⇒  जिबरेलिन्स नामक पादप हॉर्मोन एक जटिल कार्बनिक यौगिक है। कोशिका-विभाजन एवं दीर्घन द्वारा ये पौधे के स्तंभ की लंबाई में वृद्धि करते हैं । इनके उपयोग से बड़े आकार के फलों एवं फूलों का उत्पादन किया जाता है। बीजरहित फलों के उत्पादन में ये ऑक्जिन की तरह सहायक होते हैं ।


21. कोई व्यक्ति अनजाने में जब किसी गर्म सतह को स्पर्श करता है, तो अचानक अपना हाथ पीछे खींच लेता है, इस प्रतिक्रिया का क्या कहते हैं ?

उत्तर ⇒  जब कोई व्यक्ति गर्म सतह को अचानक स्पर्श करने के बाद हाथ पाछ खींच लेता है, तो इसे प्रतिवर्ती क्रिया कहते हैं । यह हमें विभिन्न घटनाओ से बचाता है।


22. साइटोकाइनिन के प्रमुख कार्य की चर्चा करें।

उत्तर ⇒  साइटोकाइनिन एक पादप हार्मोन है, जिनके मुख्य कार्य हैं –

(i) कोशिकाद्रव का विभाजन
(ii) बीज की प्रसप्ति को खत्म कर उसकी अंकरण को प्रात्साहित करता है।
(iii) पौधों की पत्तियों को अधिक समय तक हरी एवं ताजी बनाये रखता है।
(iv) पत्तियों में जीर्णता को रोकता है।


23. मनष्य के शरीर में पायी जाने वाली अंतःस्त्रावी ग्रंथियों के नाम लिखे।

उत्तर ⇒  मनुष्य के शरीर में पायी जाने वाली अंत:स्रावी ग्रंथियाँ निम्नलिखित है –

(i) पिट्यूटरी ग्रंथि (pituitary gland)
(ii) थायरॉइड ग्रंथि (thyroid gland)
(iii) पाराथायरॉइड ग्रंथि (parathyroid gland)
(iv) एड्रीनल ग्रंथि (adrenal gland)
(v) अग्न्याशय की लैंगरहैंस की द्वीपिकाएँ (Islets of Langerhans)
(vi) जनन ग्रंथियाँ (gonads) : अंडाशय (ovary) व वृषण (testes)


24. साइटोकाइनिन कोशिका विभाजन में कौन-सी भूमिका अदा करती है ?

उत्तर ⇒  साइटोकाइनिन एक प्रकार का पादप हार्मोन है, जो कोशिका द्रव के विभाजन को प्रोन्नत करता है। यह कभी भी अकेले कार्य नहीं करता है, हमेशा ऑक्जिन के साथ मिलकर यह कोशिका विभाजन को प्रोत्साहित करता है। यह पत्तियों में जीर्णता को भी रोकता है।


25. आयोडीनयुक्त नमक लेने की सलाह क्यों दी जाती है ?

उत्तर ⇒  थायरायड ग्रंथि के द्वारा थाइरॉक्सिन नामक हॉमोन का स्राव होता है। थाइरॉक्सिन के संश्लेषण के लिए आयोडीन का होना आवश्यक है। यह कार्बोहाइटेट प्रोटीन तथा वसा के सामान्य उपापचय को नियंत्रित करता है।


26. वृद्धि नियंत्रक पदार्थ किसे कहते हैं? उदाहरण सहित समझाएँ।

उत्तर ⇒  जो पदार्थ बहुत अल्प मात्रा में स्रावित होकर विसरण के द्वारा पौधों के विभिन्न अंगों में पहुँचते हैं, वे उनकी वृद्धि एवं कई उपापचयी क्रियाओं का नियंत्रण एवं समन्वय करते हैं। इन पदार्थों को वृद्धि नियंत्रक पदार्थ कहते हैं। ये कार्बनिक यौगिक हैं, जो पौधों से तो उत्पन्न नहीं होते हैं परंतु पादप-हार्मोन की तरह व्यवहृत होते हैं। उदाहरण के लिए ऑक्जिन, जिबरैलिन, साइटोकाइनिन इत्यादि।


27. प्रतिवर्ती क्रिया में मस्तिष्क की क्या भूमिका है ?

उत्तर ⇒  मस्तिष्क का मुख्य सोचने वाला भाग अग्र-मस्तिष्क है । इसमें विभिन्न ग्राही संवेदी आवेग प्राप्त करने के लिए क्षेत्र होते हैं । सामान्य प्रतिवर्ती क्रिया जैसे पतली के आकार में परिवर्तन तथा कोई सोची क्रिया जैसे की खिसकाना’ के मध्य एक पेशी गति का सेट है जिसपर हमारे सोचने का कोई नियंत्रण नहीं है । क्रियाओं में से कई मध्य मस्तिष्क तथा पश्च मस्तिष्क से नियंत्रित होती है


28. स्पर्शानुकुंचन क्या है? छुईमई की पत्तियों में कौन-सी गति प्रदर्शित होती है ?

उत्तर ⇒  पौधों में बाह्य उद्दीपनों को ग्रहण करने की विशेष क्षमता होती है। स्पर्श के प्रति अनुक्रिया को स्पर्शानुकुंचन कहते हैं। छईमई की पत्तियों को स्पर्श के कारण जल की मात्रा में परिवर्तन हो जाता है। जिसके कारण इनकी आकृति बदल जाती है तथा ये नीचे झुक जाती है।


29. तंत्रिका ऊतक कैसे क्रिया करता है ?

उत्तर ⇒  मनुष्य में केंद्रीय तंत्रिका तंत्र बहुत विकसित होता है। इसमें

(i) मस्तिष्क,

(ii) मेरुरज्जु तथा

(iii) संबंधित तंत्रिकाएँ होती हैं। 

मस्तिष्क तंत्रिका तंत्र का मुख्य केंद्र होता है और शरीर के सभी अंगों का समन्वयन करता है। यह खोपड़ी में स्थित होता है। मेरुरज्जु, रीढ़ की हड्डी के बीच में स्थित होता है। तंत्रिकायें महीन धागे के आकार की संरचनायें होती हैं जो मस्तिष्क और मेरुरज्जु से जुड़ी होती हैं और शरीर की प्रत्येक कोशिकाओं से जुड़ी होती हैं। कार्य के आधार पर तंत्रिकाओं को दो भागों में बाँटा गया है
(i) संवेदी तंत्रिकायें – संवेदी तंत्रिकायें वे होती हैं जो उद्दीपन को प्रभावी भागों से मस्तिष्क और मेरुरज्जु को ले जाती हैं।
(ii) प्रेरक तंत्रिकायें – प्रेरक तंत्रिकायें वे होती हैं जो उद्दीपन का उत्तर प्रभावित भागों तक ले जाते हैं।


30. मनष्य में कौन-सी ऐसी ग्रंथि है, जिससे इंजाइम तथा हॉर्मोन दोनों स्त्रावित होता है ?

उत्तर ⇒  अग्न्याशय (Pancreas) एक ऐसी ग्रंथि है जिससे इंजाइम तथा हॉर्मोन दोनों स्रावित होते हैं। यह छोटी आँत के पास पायी जाती है।


31. हम एक अगरबत्ती की गंध का पता कैसे लगाते हैं ?

उत्तर ⇒  अगरबत्ती या किसी गंध का पता हम अग्रमस्तिष्क से करते हैं। गंध का पता करने के लिए संवेदी केन्द्र होता है, जिससे गंध की सुचना प्राप्त होती है। नासिका में उपस्थित घ्राण ग्राही के कारण हम एक अगरबती की गंध का पता लगाते हैं।


32. पौधों में प्रकाशानवर्तन का चित्र बनाकर ऋणात्मक और धनात्मक प्रकाशानुवर्तन को दिखायें।

उत्तर ⇒  पौधों में बाह्य उद्यीपनों को ग्रहण करने की क्षमता होता है तथा उसके अनुसार उसमें गति भी होती है। प्रकाशानुवर्तन में पौधों के अंग प्रकाश की ओर गति करते हैं। इस प्रकार की गति तने के शीर्ष भाग या पत्तियों में स्पष्ट दिखती है जो धनात्मक है। जड़ प्रकाश से दूर मुड़कर अनुक्रिया करती है जो ऋणात्मक है।

नियत्रण एवं समन्वय

33. जलानुवर्तन दर्शाने के लिए अभिकल्पना की संक्षिप्त चर्चा कीजिए।

उत्तर ⇒  जलानुवर्तन दर्शाने के लिए हम लकडी का ऊपर से खुला बक्सा लेंगे। इसमें मिट्टी व खाद्य का मिश्रण डालेंगे । इसके एक सिरे पर हम एक पौधा लगाएँगे। बक्से में पौधे की विपरीत दिशा में एक कीप मिट्टी में गाड़ देंगे, पौधों को उसी कीप से प्रतिदिन पानी डालेंगे। लगभग एक हफ्ते के बाद पौधे के निकट की मिट्टी हटाकर हम ध्यान से देखेंगे। पौधे की जड़ों की वृद्धि उसी दिशा में दिखेगी जिस दिशा से कीप द्वारा पौधे की सिंचाई की जाती थी।

3. जीव जनन कैसे करते हैं ( लघु उत्तरीय प्रश्न )


1. अलैंगिक जनन की मुख्य विशेषता क्या है ?

उत्तर ⇒  अलैंगिक जनन की मुख्य विशेषता है –

अलैंगिक जनन से पैदा होनेवाली संतानें आनुवंशिक गुणों में ठीक जनकों की तरह होती हैं, क्योंकि इसमें युग्मकों का संगलन नहीं होता है । इसमें निषेचन की जरूरत नहीं पड़ती है, क्योंकि युग्मकों का संगलन (fusion) नहीं होता ।


2. नर जनन तंत्र के सभी संरचनाओं के नाम लिखें।

उत्तर ⇒  नर जनन तंत्र में निम्नांकित संरचनाएँ पायी जाती हैं—दो वृषण, दो अधिवृषण, दो शुक्रवाहिनी, दो शुक्राशय एवं एक मूत्रमार्ग तथा शिश्न।


3. लैंगिक जनन का क्या महत्त्व है ?

उत्तर ⇒  सभी जीवों में गुणसूत्रों की एक संख्या निश्चित होती है। अलैंगिक जनन करने वाले में असमसूत्री या समसूत्री प्रकार का कोशिका विभाजन होता है, जिसके कारण उनमें कोई विभिन्नता नहीं आती। प्रत्येक पीढ़ी में क्रोमोसोम की संख्या भी निश्चित रहती है। लैंगिक जनन करने वालों में अर्द्धसूत्री कोशिका विभाजन होता है, जिससे उसमें भिन्नता आ जाती है। यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी बढ़ती जाती है।


4. पौधों में लैंगिक जनन कैसे होता है ?

उत्तर ⇒  पौधों में लैंगिक जनन – एन्जिओस्पर्मस (पुष्पी पौधे) में अधिकांश पुष्प द्विलिंगी होते हैं। इनमें दोनों प्रकार के जननांग होते हैं। पुमंग को नर जननांग या जायांग तथा कारपल को मादा जननांग कहते हैं। पुमंग में परागकण बनते हैं जिसे माइक्रोस्पोर भी कहते हैं। जायांग में बीजाण्ड या मेगास्पोर बनते हैं। ये अर्धसूत्री विभाजन द्वारा बनते हैं। इनके निषेचन के बाद फल तथा बीज बनते हैं। बीज के अंकुरण के बाद नन्हा पौधा बनता है।


5. शुक्रजनन नलिका के बारे में बताएँ।

उत्तर ⇒  प्रत्येक वृषण में 900 शुक्रजनन नलिका होती है, जिसके अंदर शुक्राणु का निर्माण होता है। नर्स कोशिका, शुक्राण को पोषण प्रदान करती है।


6. जनन किसी जीव की समष्टि के स्थायित्व में किस प्रकार सहायक है ?

उत्तर ⇒  किसी भी स्पीशीज़ की समष्टि के स्थायित्व में जनन और मृत्यु दर में लगभग बराबरी की दर हो तो स्थायित्व बना रहता है । एक समष्टि में जन्म दर और मृत्यु दर ही उसके आधार पर निर्धारण करते हैं।


7. परागण से क्या समझते हैं ? परागण कितने प्रकार के होते हैं ?

उत्तर ⇒  नर जनन अंग से परागकण का गमन मादा जनन अंग पर होना परागण कहलाता है । इसमें कीडे, जानवर, हवा तथा पानी सहायक होते हैं। परागण दो प्रकार के होते हैं

(i) स्वपरागण

(ii) परपरागण


8. ऋतुस्त्राव क्यों होता है ?

उत्तर ⇒  यदि अंडकोशिका का निषेचन नहीं हो तो यह लगभग एक दिन तक जीवित रहती है। गर्भाशय भी प्रतिमाह निषेचित अंड की प्राप्ति हेत तैयारी करता है। अत: इसकी अंत:भित्ति मांसल एवं स्पॉनजी हो जाती है जो कि अंड के निषेचन होने की अवस्था में उसके पोषण के लिए आवश्यक है। परंतु निषेचन न होने की अवस्था में इस पर्त की भी आवश्यकता नहीं रहती। अतः यह पर्त धीरे-धीरे टटकर योनि मार्ग से रुधिर एवं म्यूकस के रूप में निष्कासित होती है। इस चक्र में लगभग एक मास का समय लगता है तथा इसे ऋतुस्राव या रजोधर्म कहते हैं।


9. युग्मनज से क्या समझते हैं ?

उत्तर ⇒  परिपक्व शुक्राणु, अंडाणु में पूरी तरह मिलकर युग्मनज का निर्माण करती है।


10. वर्षा होने के समय मक्का के परागण क्रिया में क्या-क्या प्रभाव पड़ सकता है ?

उत्तर ⇒  इन पौधों में आनुवंशिक विभिन्नता नहीं होती है. जिसके कारण ये पौधे पर्यावरण के उतार-चढ़ाव को झेल नहीं पाते हैं। ऐसे पौधे में पर्यावरण के साथ अनुकूलित होने की झमता कम होती है जिसके कारण उत्पादन कम होने, बीमारियाँ होने तथा मर जाने की संभावना बढ़ जाती है।


11. मानव में वृषण के क्या कार्य हैं ?

उत्तर ⇒  मानव में वृषण के मुख्य कार्य निम्नलिखित हैं –
(i) वृषण में शुक्राणु उत्पन्न होते हैं जो लैंगिक जनन क्रिया में सक्रिय भाग लेकर भावी पीढ़ी को जन्म देने में सहायक होते हैं।

(ii) वषण में उत्पन्न हॉर्मोन जिसे टैस्टोस्टीरोन कहते हैं, मानव शरीर में द्वितीयक जनन लक्षणों को स्थापित करने के लिए उत्तरदायी होता है ।


12. कार्पसल्यूटियम का कार्य समझाएँ।

उत्तर ⇒  कार्पसल्यूटियम प्रोजेस्टेरोन नामक हार्मोन का स्राव करता है, जो गर्भाशय की दीवारों को काफी मोटा करता है तथा गर्भधारण में मदद करता है।


13. जीवों में विभिन्नता स्पीशीज के लिए ही लाभदायक है, परंतु व्यष्टि के लिए आवश्यक नहीं है, क्यों ?

उत्तर ⇒  जीवों में पायी जानेवाली विभिन्नता, नई जाति के प्रादुर्भाव में मदद करता है। नये वातावरण एवं प्रतिकूल परिस्थिति में स्थायित्व कायम रखता है। यह विभिन्नता व्यष्टि के लिए लाभदायक नहीं होती है। क्योंकि किसी निश्चित स्थान पर प्राकृतिक आपदाएँ इसे नष्ट कर देती हैं।


14. गर्भ निरोधक गोलियों के बारे में बताएँ।

उत्तर ⇒  परिवार नियोजन के कई उपायों में गर्भ निरोधक गोलियाँ भी एक उपाय है। इनमें कृत्रिम प्रोजेस्टेरॉन तथा एस्ट्रोजन डाला जाता है। यह ESH एवं LH के स्राव पर प्रतिबंध लगा देता है। जिसके कारण अंडोत्सर्ग की क्रिया नहीं होती है।


15. परागण क्या है ? परागण में कीटों की क्या भूमिका होती है ?

उत्तर ⇒  परागकोष से परागकणों का प्रकीर्णन वर्तिकाग्र तक होने की प्रक्रिया को परागण कहते हैं । कीटों के द्वार पर-परागण की क्रिया होती है ।


16. द्विलिंगी जीव कौन-से होते हैं? उदाहरण लिखें।

उत्तर ⇒  वे जीव जिनमें नर तथा मादा दोनों अंग होते हैं तथा वे नर तथा मादा दोनों प्रकार के युग्मों को उत्पन्न करते हैं, उभयलिंगी अथवा द्विलिंगी जीव कहलाते हैं।
जैसे-केंचुआ।


17. डी०एन०ए० की प्रतिकृति बनाना जनन के लिए क्यों आवश्यक है ?

उत्तर ⇒  एक पीढी से दूसरी पीढी में आनवंशिक गणों का वाहक क्रोमोसोम होता है, जो D.N.A. से बना होता है। अतः इसकी प्रतिकृति बनाना जनन के लिए आवश्यक है।


18. परागण क्रिया निषेचन क्रिया से किस प्रकार भिन्न है ?

उत्तर ⇒  परागकणों के परागकोश से निकलकर उसी पुष्प या उस जाति के दूसरे पुष्पों के वर्तिकान तक पहुँचने की क्रिया को परागण कहते हैं। निषेचन के अंतर्गत परागकणों के वर्तिकान तक पहुँचने के बाद निषेचन की क्रिया होती है। नर युग्मक और मादा युग्मक के संगलन को निषेचन कहा जाता है।


19. लैंगिक जनन संचारित रोगों के बारे में लिखें।

उत्तर ⇒  लैंगिक जनन संचारित रोग (sexually transmitted disease, STD) यौन संबंध से होनेवाले संक्रामक रोग को कहा जाता है । यह रोग कई तरह के रोगाणुओं, जैसे—बैक्टीरिया, वाइरस, परजीवी प्रोटोजोआ, यीस्ट जैसे सूक्ष्मजीवों द्वारा होते हैं । मनुष्य में होनेवाले ऐसे प्रमुख रोग निम्नलिखित हैं –

बैक्टीरिया जनित रोग – गोनोरिया (Gonorrhoea), सिफलिस (Syphlis), यूरेथ्राइटिस (Urethrites) तथा सर्विसाइटिस (Cervicitis) बैक्टीरिया के संक्रमण से होनेवाले कुछ प्रमुख रोग हैं।

वायरस जनित रोग – सर्विक्स कैंसर (Cervix Carcinoma), हर्पिस (Herpes) तथा एड्स (Acquired Immune Deficiency Syndrome, AIDS), इत्यादि ।

प्रोटोजोआ जनित रोग — स्त्रियों के मूत्रजनन नलिकाओं, एक प्रकार के प्रोटोजोआ के संक्रमण से होनेवाला रोग ट्राइकोमोनिएसिस (Trichomoniasis) है ।


20. एकलिंगी (Asexual) तथा द्विलिंगी (Bisexual) की परिभाषा एक-एक उदाहरण देकर कीजिए।

उत्तर ⇒  एकलिंगी –वे जीव जिनमें नर और मादा स्पष्ट रूप से अलग-अलग हों उन्हें एकलिंगी जीव कहते हैं। उदाहरण—मनुष्य।

द्विलिंगी-वे जीव जिनमें नर और मादा लिंग एक साथ उपस्थित होते हैं उन्हें द्विलिंगी कहते हैं। उदाहरण केंचुआ।


21. कायिक प्रवर्धन को परिभाषित करें। यह किन पौधों में करते हैं ?

उत्तर ⇒  कायिक पादप शरीर का कोई भी कायिक या वर्षी भाग (जैसे—जड़, तना, पत्ती) विलग और परिवर्द्धित होकर नए पौधों का निर्माण करते हैं, कायिक प्रवर्धन कहलाता है। कायिक प्रवर्धन मुख्यतः गुलाब, आलू, ब्रायोफाइलम आदि में किया जाता है।


22. मुकुलन क्या है ?

उत्तर ⇒  मुकुलन एक प्रकार का अलैंगिक जनन है। जिसमें जीवों की उत्पति जनक के शरीर के धरातल से कलिका फूटने या प्रवर्ध निकलने के फलस्वरूप होता है।
इस प्रक्रिया में जीव शरीर के किसी भाग से एक या एक से अधिक कंदरूपी उभार निकलता है। जिसे मुकुल या बड (Bud) कहते हैं। उसके बाद जनक कोशिका केन्द्रक मुकुल में पहुँच जाता है। केन्द्रकयुक्त मुकुल जनक के शरीर से विलग होकर नए जीव का निर्माण करता है।

चित्र- यीस्ट में मुकुलन

चित्र – यीस्ट में मुकुलन


23. पौधों में लैंगिक जनन के लिए कौन-सा भाग उत्तरदायी है ? समझाएँ।

उत्तर ⇒  पौधों में लैंगिक जनन के लिए पुष्प उत्तरदायी होता है । पुष्प के चार भाग होते हैं, जिसमें नर जनन अंग तथा मादा जनन अंग दोनों पाए जाते हैं। नर जनन अंग को पुशंग तथा मादा जनन अंग को जायांग कहते हैं।


24. बहुखंडन किसे कहते हैं ?

उत्तर ⇒  एक कोशिकीय जीवों में कोशिका विभाजन द्वारा नए जीव की उत्पत्ति होती है इसमें कोशिका अनेक संतति कोशिकाओं में विभाजित हो जाते हैं । जैसे मलेरिया परजीवी, प्लैज्मोडियम ।


25. मासिक चक्र कब और क्यों होता है ?

उत्तर ⇒  जब परिपक्व अंडाणु, शुक्राणु से संयोजन नहीं कर पाता है, तो टूट जाता है, जिसके साथ आंतरिक दीवार एवं अन्य उत्सर्जी पदार्थ बाहर निकलते हैं, इसे मासिक चक्र कहते हैं। यह 28 दिनों के अंतराल पर होता है।


26. शुक्राणु का निर्माण कहाँ तथा कैसे होता है ?

उत्तर ⇒  शुक्राणु का निर्माण वृषण (testes) में होता है। यह लगातार कोशिका विभाजन के कारण होता है। संतति कोशिका धीरे-धीरे शुक्राणु में बदल जाती है।


27. एक प्ररूपी पुष्प के सहायक अंग एवं आवश्यक अंग में क्या भिन्नता है ?

उत्तर ⇒  एक प्ररूपी पुष्प (typical flower) में चार प्रकार के. पुष्पपत्र होते है

(i) बाह्यदलपुंज (Calyx),

(ii) दलपुंज (Corolla),

(iii) पुमंग (Androecium),

(iv) जायांग (Gynoecium) इनमें से दो बाहरी चक्रों यानी बाह्यदलपुंज एवं दलपुंज को सहायक अंग(accessory organs) एवं भीतरी दो चक्रों यानी पुमंग और जायांग को आवश्यक अंग (essential organs) कहा जाता है। सहायक अंग फूल को आकर्षक बनाने के साथ आवश्यक अंगों की रक्षा भी करते हैं तथा आवश्यक अंग जनन का कार्य करत हैं। इनमें यही भिन्नता है।

चित्र: पुष्प का अनुदैर्घ्य काट

चित्र पुष्प का अनुदैर्घ्य काट


28. एक-कोशिक एवं बहुकोशिक जीवों की जनन पद्धति में क्या अंतर है ?

उत्तर ⇒  एक कोशिकीय जीव अधिकतर विखंडन, मुकुलन, पुनरुद्भवन, बहुखंडन आदि विधियों से जनन करते हैं। इनमें सिर्फ एक कोशिका ही होता है। वे सरलता से काशिका विभाजन के द्वारा तेजी से जनन कर सकते हैं। बहकोशिकीय जीवों में जनन क्रिया जटिल होती है और वे मख्य रूप से लैंगिक जनन क्रिया ही होती है।


29. इस चित्र के विषय में टिप्पणी लिखें।

जीव जनन कैसे करते हैं

1. आनुवंशिकी से क्या समझते हैं ?

उत्तर ⇒  जीवविज्ञान की वह शाखा जिसके अंतर्गत संतति में जाने वाले लक्षण का अध्ययन करते हैं, आनुवंशिकी कहलाता है।


2. आनुवंशिक गुण से क्या समझते हैं ?

उत्तर ⇒  प्रकृति में कोई भी दो जीव बिलकुल एक समान नहीं होते हैं। इनमें कुछ-न-कुछ असमानताएँ अवश्य होती हैं। जीवों में विभिन्नताओं की अधिकता के फलस्वरूप जीवन के लिए संघर्ष शुरू हो जाता है। जीवन के लिए संघर्ष में वही जीव योग्यतम होते हैं जो सबसे अधिक योग्य गुणों वाले होते हैं, अर्थात् शक्तिशाली होते हैं। अयोग्य गुणों वाले जीव नष्ट हो जाते हैं। प्राकृतिक चुनाव द्वारा प्राप्त जीवों की उपयोगी भिन्नताएँ फिर दूसरी पीढ़ी में, उनके संतानों में वंशागत होती है। इस तरह ये भिन्नताएँ पीढ़ी दर पीढ़ी वंशागत होती हैं। यही आनुवंशिक गुण हैं।


3. जैव विकास किसे कहते हैं ?

उत्तर ⇒  ‘जीवविज्ञान की वह शाखा जिसमें जीवों की उत्पत्ति तथा उसके पूर्वजों का इतिहास तथा समय समय पर उनमें हुए क्रमिक परिवर्तनों का अध्ययन किया जाता हैं, जैव विकास कहलाता है ।


4. जैव विकास तथा वर्गीकरण का अध्ययन क्षेत्र किस प्रकार परस्पर संबंधित है ?

उत्तर ⇒  जीवों में वर्गीकरण का अध्ययन उनमें विद्यमान समानताओं और भेदों के आधार पर किया जाता है। उनमें समानता इसलिए प्रकट होती है कि वे किसी समान पूर्वज से उत्पन्न हुए हैं और उनमें भिन्नता विभिन्न प्रकार के पर्यावरणों में की जानेवाली अनुकूलता के कारण से है। उनमें बढ़ती जटिलता को जैव विकास के उत्तरोत्तर क्रमिक आधार पर स्थापित कर अंतसंबंधों का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।


5. जीवों में उत्परिवर्तन का मुख्य कारण क्या है ?

उत्तर ⇒  जीवों में उत्परिवर्तन का मुख्य कारण आनुवंशिक विभिन्नता है। यह अर्द्धसूत्री विभाजन के समय होता है, जो नई जाति के विकास में अहम भूमिका निभाता है।


6. हम अपने माता-पिता के समान क्यों होते हैं ?

उत्तर ⇒  प्रत्येक जीव में बहुत से ऐसे गण होते हैं जो पीढी दर पीढ़ी माता-पिता अर्थात् जनकों से उनके संतानों में संचरित होते रहते हैं। ऐसे गुणों को आनुवंशिक गुण या पैतृक गुण कहते हैं। इन्हीं गुणों के कारण हम अपने माता-पिता के समान होते हैं।


7. डार्विनवाद के बारे में बताएँ।

उत्तर ⇒  चार्ल्स डार्विन के अनुसार प्रत्येक जीव में प्रजनन की असीम क्षमता होती है, पर पृथ्वी पर भोजन एवं आवास नियत है। अतः जीवों में अपने अस्तित्व
को बचाने के लिए आपस में संघर्ष होता है।


8. जंतु वर्गीकरण के विभिन्न स्तरों का नाम लिखें।

उत्तर ⇒  जंतु वर्गीकरण के विभिन्न स्तरों के नाम निम्नलिखित हैं –

जगत (kingdom), उपजगत (subkingdom), फाइलम (phylum) या डिवीजन (division), वर्ग (class), गण (order), कुल (family), वंश (genus) तथा जाति (species)।
इस पदानुक्रम में जीवों के वर्गीकरण का आधार उनके गुणों में समानता तथा असमानता है ।


9. उपार्जित लक्षण क्या है ?

उत्तर ⇒  परिवर्तित वातावरण के कारण जीवों के अंगों का उपयोग ज्यादा या कम का उपयोग अधिक होता है वे अधिक विकसित हो जाते हैं तथा जिनका उपयोग नहीं होता है उनका धीरे-धीरे हास हो जाता है । वातावरण के सीधे प्रभाव से या अंगों के कम या अधिक उपयोग के कारण जंतु के शरीर में जो परिवर्तन होते हैं, उन्हें उपार्जित लक्षण (acquired character) कहते हैं।


10. पक्षियों का विकास डायनोसौर से क्यों माना जाता है ?

उत्तर ⇒  डायनासौर सरीसृप थे। उनके विभिन्न जीवाश्मों में अस्थियों के साथ पंखों की छाप भी स्पष्ट रूप से मिलती है। तब शायद वे सब इन पंखों की सहायता से उड़ नहीं पाते होंगे पर बाद में पक्षियों ने पंखों से उड़ना सीख लिया होगा। इसलिए पक्षियों की डायनोसौर से सर्बोधत मान लिया जाता है।


11. मेंडल के मटर के पौधों पर प्रयोग से क्या परिणाम निकला ?

उत्तर ⇒  मेंडल के मटर के पौधों पर किए प्रयोग से निम्नलिखित परिणाम निकलें –

(i) पौधों में लक्षण कुछ इकाइयों द्वारा नियंत्रित होते हैं। उन्हें कारक कहा जाता है। प्रत्येक लक्षण के लिए युग्मक में एक कारक होता है, जैसे लंबाई, फूल का रंग।
(ii) एक लक्षण को दो कारकों द्वारा ही व्यक्त किया जाता है, जैसे TT या tt.


12. मेंडल ने किन सात लक्षणों पर अपना प्रयोग किया था ?

उत्तर ⇒ मेंडल ने मटर के पौधे पर अपना प्रयोग किया था, जिनमें निम्न लक्षण को चुना गया था –

(i) पौधे की लंबाई

(ii) पुष्प का रंग

(iii) बीज का आकार

(iv) बीज का रंग

(v) फल का आकार

(vi) फल का रंग

(vii) फल की आकृति


13. मेंडल की सफलता का मुख्य कारण क्या है ?

उत्तर ⇒  मेंडल की सफलता का मुख्य कारण है कि उन्होंने मटर के पौधे पर प्रयोग किया था, जिसमें विभिन्न रंग एवं प्रकार के पुष्प होते हैं। इसके सारे क्रोमोसोम एक दूसरे से दूर स्थित थे, जिसके कारण मिश्रित नहीं हो पाते थे।


14. मेंडल का स्वतंत्र विन्यास का नियम (Mendels’s law of independent assortment) क्या है ?

उत्तर ⇒  मंडल का स्वतंत्र विन्यास का नियम (Mendels law of independent assortment) के अंतर्गत एक आनुवंशिक लक्षण का प्रभावी गुण दूसरे के प्रभावी गुण से ही नहीं, बल्कि अप्रभावी गुण से भी मिल सकता है। इसी प्रकार, एक का अप्रभावी गुण दूसरे के अप्रभावी गुण से ही नहीं, बल्कि प्रभावी गुण से भी मिल सकता है।


15. जीनप्ररूप या जीनोटाइप किसे कहते हैं ?

उत्तर ⇒  किसी जीव की जीनी संरचना (genetic coustitution) उस जीव का जीन प्ररूप या जीनोटाइप (genotype) कहलाता है । जीवों के गुणों (जैसे-शारीरिक गठन, लंबाई, त्वचा एवं बालों का रंग इत्यादि) का निर्धारण उनके जीन प्ररूपों के कारण ही होता है । जीन प्ररूप के कारण प्रकट होनेवाले गुणों की नींव का निर्धारण जनकों (माता-पिता) के युग्मकों के संयोजन के समय ही हो जाता है।


16. आण्विक जातिवृत्त क्या है ?

उत्तर ⇒  मानव सहित विभिन्न जीवों के पूर्वजों की खोज उनके DNA में हुए परिवर्तन का अध्ययन कर किया जा सकता है | DNA में परिवर्तन का अर्थ उसके प्रोटीन अनुक्रम (protein sequence) में परिवर्तन से है । DNA अनुक्रम (DNA sequence) के तुलनात्मक अध्ययन द्वारा किसी जीव के पूर्वजों की खोज आण्विक
जातिवृत्त (Imolecular phylogeny) कहलाता है।


17. वे कौन-से विभिन्न तरीके हैं जिनके द्वारा एक विशेष लक्षण वाले व्यष्टि जीवों की संख्या समष्टि में बढ़ सकती है।

उत्तर ⇒  वे विभिन्न तरीके जिनके द्वारा एक विशेष लक्षण वाले व्यष्टि जीवों की संख्या समष्टि में बढ़ सकती है, निम्नलिखित हैं –

(i) जीन कोश के कुछ जीन में वातावरणीय कारणों से कुछ बदलाव आ सकता है।
(ii) दूसरी स्थिति में आनुवंशिक विभिन्नता हो सकती है।
(iii) तीसरी स्थिति में आनुवंशिक विचलन (genetic drift -जीन की बारंबारता में निरुद्देश्य होनेवाला परिवर्तन) ।


18. क्रोमोसोम से क्या समझते हैं ?

उत्तर ⇒  नाभिक के अंदर क्रोमेटिन के धागे पाए जाते हैं, जो कोशिका विभाजन के समय संघनित होकर क्रोमोसोम का निर्माण करते हैं ।


19. जीन क्या है ? कोशिका में इसका उपस्थिति स्थल कहाँ है ?

उत्तर ⇒  सभी गणों का जनकों से अपनी संतति में संचरण का माध्यम जीन है। कोशिका में यह गुणसूत्र पर केंद्रक के अंदर पाया जाता है ।


20. विभिन्नता से क्या समझते हैं ?

उत्तर ⇒  वैसी विभिन्नताएँ जो गुणसूत्र या जीन के गुणों में विभिन्नता के कारण उत्पन्न नहीं होती है, वरन अन्य कारण जैसे जलवायु एवं वातावरण से उत्पन्न होती है कायिक विभिन्नता कहलाता है ।


21. वे कौन से कारक हैं जो नयी स्पीशीज के उद्भव में सहायक हैं ?

उत्तर ⇒  नई स्पीशीज के उद्भव में वर्तमान स्पीशीज के सदस्यों का परिवर्तनशील पर्यावरण में जीवित बने रहना है । इन सदस्यों को नये पर्यावरण में जीवित रहने
बाह्य लक्षणों में परिवर्तन करना पड़ता है । अत: भावी पीढ़ी के सदस्यों म.शारारिक लक्षणों में परिवर्तन दिखाई देने लगते हैं जो संभोग क्रिया के द्वारा अगली पढ़िी में हस्तांतरित हो जाते हैं परंतु यदि दुसरी कॉलोनी के नर एवं मादा जीव वर्तमान पयावरण में संभोग करेंगे तब उत्पन्न होने वाली पीढी के सदस्य जीवित नहीं रह सकेंगे


22. लिंग-क्रोमोसोम किसे कहते हैं ?

उत्तर ⇒  मनुष्य में 23 जोडे क्रोमोसोम होते हैं । इनमें 22 जोडे क्रोमोसोम एक ही प्रकार के होते हैं, जिसे ऑटोसोम (autosomes) कहते हैं । तेईसवाँ जोडा भिन्न आकार का होता है. जिसे लिंग क्रोमोसोम (sex chromosomes) कहते है । यह दी प्रकार के होते हैं-X और Y, Y कोमोसोम लंबा और छड़ के आकार का (rod shaped) होता है, Y क्रोमोसोम अपेक्षाकृत बहुत छोटे आकार का होता है । नर में X और Y दोनों लिंग-क्रोमोसोम मौजूद होते हैं, पर मादा में Y क्रोमोसोम अनुपस्थित होता है । उसके स्थान पर एक और X क्रोमोसोम होता है अर्थात मादा में दोनों X क्रोमोसोम होते हैं । ये X और Y क्रोमोसोम ही मनुष्य में लिंग-निर्धारण (sex determination) के लिए उत्तरदायी (responsible) होते हैं।


23. गुणसूत्र का स्वच्छ नामांकित चित्र बनाइए।

उत्तर ⇒  एक गुणसूत्र में एक या दो क्रोमेटिड होते हैं, जो सेन्ट्रोमियर से जुड़े होते हैं। गुणसूत्र DNA से बना होता है।

गुणसूत्र DNA से बना होता है।

24. जेनेटिक्स (genetics) या आनुवंशिकी किसे कहते हैं ?

उत्तर ⇒  जेनेटिक्स (genetics) या आनुवंशिकी, आनुवंशिकी एवं विभिन्नता का अध्ययन है जो कि जीवविज्ञान की एक विशेष शाखा के अंतर्गत होता है।


25. जीन कोश क्या है ?

उत्तर ⇒  किसी भी प्रजाति विशेष के एक समष्टि या आबादी में स्थित समस्त * जीन उस आबादी का जीन कोश (gene pool) कहलाता है ।जीन कोश के कुछ जीन में वातावरणीय कारणों से कुछ बदलाव आ सकला है । जीन में होनेवाले ऐसे चयनित बदलाव पीढ़ी-दर-पीढ़ी वंशागत होते रहते हैं ।


26. बाघों की संख्या में कमी आनुवंशिकता के दृष्टिकोण से चिंता का विषय क्यों है ?

उत्तर ⇒  पर्यावरण परिवर्तन में प्रतिकूलता ही बाघों की संख्या में कमी का मुख्य कारण है । जनन के कारण लक्षण प्रतिकूल वातावरण में भी यथावत् रहते हैं । परंतु अगर पर्यावरण व वातावरण बाघों के लिए अनुकूल न रहा हो और इस पर ध्यान न दिया गया तो इन्हें समाप्त होने या नष्ट होने से कोई नहीं बचा सकता।


27. जाति उद्भवन से क्या समझते हैं ? इसका क्या कारण है ?

उत्तर ⇒  नई प्रजातियों का निर्माण जाति उद्भवन कहलाता है। लैंगिक जनन करन वाले जीवों में अंत: प्रजनन, आनुवंशिक विचलन तथा प्राकृतिक चुनाव के द्वारा जाति उद्भवन होता है।


28. प्रभावी व अप्रभावी लक्षण किसे कहते हैं ?

उत्तर ⇒  लैंगिक जनन वाले जीवों में एक अभिलक्षण (Trait) के जीन के दो प्रतिरूप (copies) होते हैं । इन प्रतिरूपों के एकसमान न होने की स्थिति में जो भिलक्षण व्यक्त होता है उसे प्रभावी लक्षण तथा अन्य को अप्रभावी लक्षण कहते हैं।


29. क्या भौतिक पृथक्करण अलैंगिक जनन वाले जीवों के जाति-उद्भव का प्रमुख कारक हो सकता है ? क्यों या क्यों नहीं ?

उत्तर ⇒  भौतिक पृथक्करण अलैंगिक जनन वाले जीवों के जाति-उदभव का प्रमुख कारक है, विशेषकर अलैंगिक जनन कर रहे पादपों में । एक जीवधारी भौतिक परिस्थितियों में जीवित रहता है परंतु कुछ जीवधारी यदि निकटवर्ती भौगोलिक पर्यावरण में विस्थापित हो जाते हैं जिनमें विभिन्न भौतिक परिवर्तनीय लक्षण हों तो वे जीवित नहीं रहेंगे । यदि जीवित रह रहे जीवधारियों में अलैंगिक जनन होता है और फिर वे अन्य पर्यावरण में विस्थापित होते हैं तो वे भी भिन्न पर्यावरणीय परिस्थितियों में जीवित नहीं रह पायेंगे।


30. क्या एक तितली और चमगादड़ के पंखों को समजात अंग कहा जा सकता है । क्यों ? अथवा क्यो नही ?

उत्तर ⇒  एक तितली और चमगादड के पंखों को समजात अंग नहीं कहा जा सकता । हालांकि तितली तथा पक्षी (चमगादड़) के पंख (wings) उड़ने का कार्य करते हैं, परंतु इनकी मूल संरचना और उत्पत्ति अलग-अलग प्रकार की होती है । चमगादड़ के पंख में अस्थियाँ, त्वचा तथा पर (feathers) होते हैं, जबकि तितली या अन्य कीटों के पंख क्यूटिकल के परत से ढंके होते हैं तथा इनमें कुछ तंत्रिकीय पेशियाँ होती हैं।


31. यदि एक लक्षण (trait) A अलैंगिक प्रजनन वाली समष्टि के 10% सदस्यों में पाया जाता है तथा B उसी समष्टि में 90% जीवों में पाया जाता है, तो कौन-सा लक्षण पहले उत्पन्न होगा, और क्यों ?

उत्तर ⇒  अलैंगिक जनन के अन्तर्गत पीढ़ी-दर-पीढ़ी आपस में बहुत अधिक समानताएँ होती हैं। उनमें आपस में बहुत कम अन्तर होता है। इसी आधार पर जो लक्षण अधिक प्रतिशत मात्रा में समष्टि के सदस्यों में उपस्थित है वह लक्षण पहले भी उत्तेजित रहा होगा । अतः लक्षण B जो समष्टि 90% जीवों में है पहले उत्पन्न हुआ होगा।


32. संतति में नर तथा मादा जनकों द्वारा आनुवंशिक योगदान में बराबर की भागीदारी किस प्रकार सुनिश्चित की जाती है ?

उत्तर ⇒  एक स्पीशीज के प्रत्येक सदस्य की कोशिका में गुणसूत्रों की संख्या शुमान होती है । लैंगिक प्रजनन में प्रत्येक गुणसूत्र दो समान लंबाई वाले भागों में र जाता है । प्रत्येक क्रोमेटिड कहलाता है । हर क्रोमेटिड लैंगिक प्रजनन में सक्रिय ग लेता है जिन्हें नर तथा मादा युग्मक कहते हैं । केवल एक युग्मक ही लैंगिक में भाग नहीं ले सकता । अत: नर तथा मादा पिताओं के युग्मक लैंगिक जनन में सक्रिय भाग लेते हैं तथा आनुवंशिकता सुनिश्चित होती है।

5. हमारा पर्यावरण ( लघु उत्तरीय प्रश्न )


1. पर्यावरण किसे कहते हैं ?

उत्तर ⇒  किसी जीव के चारों ओर फैली हुई भौतिक या अजैव और जैव कारकों से निर्मित दुनिया जिसमें वह निवास करता है तथा जिससे वह प्रभावित होता है, उसे उसका पर्यावरण या वातावरण कहा जाता है । उदाहरण के तौर पर पौधे, जानवर किसा मनुष्य क पर्यावरण का जैविक हिस्सा हैं । जिस धरती पर वह रहता है एवं फसल उपजाता है, जल जो वह पीता है एवं सिंचाई के लिए उपयोग में लाता है, हवा जा उसकी प्राण वाय है, ये उसके भौतिक वातावरण का भाग है। इसके अलावा वायुमंडलीय कारक जैसे सूर्य की रोशनी, वर्षा, तापक्रम एवं नमी आदि भी भौतिक वातावरण के ही भाग हैं ।


2. वायु-प्रदूषण के कारक कौन-कौन से है ?

उत्तर ⇒  वायु प्रदूषण का मुख्य कारक है—कार्बन डाइऑक्साइड गैस, सल्फर डाइऑक्साइड गैस एवं कार्बन मोनोऑक्साइड गैस ।


3. प्रदूषण से क्या समझते हैं ?

उत्तर ⇒  पर्यावरण में अवांछनीय पदार्थों का मिलना प्रदूषण कहलाता है। यह वायु, जल तथा मिट्टी सबको प्रदूषित कर सकता है ।


4. ओजोन स्तर का क्या महत्त्व है ?

उत्तर ⇒  ओजोन स्तर सूर्य के प्रकाश में स्थित हानिकारक पराबैंगनी किरणों (ultravioletravs) का अवशोषण कर लेता है जो मनुष्य में त्वचा-कैंसर, मोतियाबिंद तथा अनेक प्रकार के उत्परिवर्तन (mutation) को जन्म देती है ।


5. उत्पादक से आप क्या समझते हैं ?

उत्तर ⇒  वैसे जीव जो अपना भोजन स्वयं बनाने की क्षमता रखते हैं. उत्पादक कहलाते हैं। ऐसे जीव सूर्य के प्रकाश ऊर्जा को विकिरण ऊर्जा के रूप में ग्रहण
कर क्लोरोफिल की उपस्थिति में रासायनिक स्थितिज ऊर्जा में परिवर्तित कर देते हैं । जो कार्बनिक यौगिक के रूप में हरे पौधों की उत्तकों में संचित रहता है। जैसे हरे पौधे। ये मिट्टी से प्रमुख तत्वों को अवशोषित करने में समर्थ हैं तथा साथ ही वायुमंडल में ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड के बीच संतुलन बनाए रखते हैं।


6. जैव अनिम्नीकरण अपशिष्टों से पर्यावरण को क्या हानि पहुँचती है ?

उत्तर ⇒  प्रदूषण के ऐसे कारक जिनका जैविक अपघटन नहीं हो पाता है तथा – जो अपने स्वरूप को हमेशा बनाए रखते हैं, अर्थात् प्राकृतिक विधियों द्वारा नष्ट नहीं होते हैं, जैव अनिम्नीकरणीय अपशिष्ट कहलाते हैं । विभिन्न प्रकार के रसायनों, जैसे काटनाशक एवं पीड़कनाशक DDT, शीशा, आर्सेनिक, ऐलमिनियम, प्लास्टिक, रेडियोधर्मी पदार्थ जैसे प्रदूषण के कारक पर्यावरण को अत्यधिक हानि पहुंचाते हैं। यह लंबे समय तक पर्यावरण में बने रहते हैं चूँकि यह अपघटित नहीं होते ।


7. पारिस्थितिक तंत्र में उत्पादकों के क्या कार्य हैं ?

उत्तर ⇒  पारिस्थितिक तंत्र में पौधे उत्पादक का कार्य करते हैं। इसके द्वारा निम्नलिखित कार्य होते हैं –

(i) किसी भी पारितंत्र में रहने वाले जीव की प्रकृति का निर्धारण हरे पौधों या उत्पादक के द्वारा होता है।
(ii) वायुमंडल में ऑक्सीजन एवं कार्बन डाइऑक्साइड के बीच का संतुलन हरे पौधों द्वारा ही होता है।
(iii) केवल हरे पौधे ही पारितंत्र के मूल ऊर्जा स्रोत सौर ऊर्जा का प्रग्रहण कर सकते हैं।


8. पारिस्थितिक तंत्र के विभिन्न घटकों को एक चित्र से दर्शाएँ।

उत्तर ⇒ 

पारिस्थितिक तंत्र के विभिन्न घटकों को एक चित्र से दर्शाएँ।

चित्र : रिस्थितिक तंत्र के घटक 


9. कृत्रिम पारिस्थितिक तंत्र का कोई दो उदाहरण दें।

उत्तर ⇒  कृत्रिम पारिस्थितिक तंत्र के दो उदाहरण हैं –

(j) फुलवारी और

(ii) जलजीवशाला या एक्वैरियम


10. मैदानी पारिस्थितिक में उत्पादक एवं उच्चतम श्रेणी के उपभोक्ता का नाम बताएँ ।

उत्तर ⇒  मैदानी ‘पारिस्थितिक में उत्पादक हरे घास’ होते हैं, तथा बाज ‘उच्चतम श्रेणी’ के उपभोक्ता ।


11. पारिस्थितिक तंत्र क्या है ? पारिस्थितिक तंत्र के किन्हीं दो जैव घटकों के नाम लिखें।

उत्तर ⇒  ‘जीवमंडल के विभिन्न घटक तथा उसके बीच ऊर्जा और पदार्थ का आदान प्रदान, सभी एकसाथ मिलकर पारिस्थितिक तंत्र का निर्माण करते हैं । ‘पारिस्थितिक तंत्र के दो जैव घटकों के नाम हैं-

(i) पौधे और (ii) जंतु


12. पारिस्थितिकी दक्षता को परिभाषित करें ।

उत्तर ⇒  किसी भी पारितंत्र में ऊर्जा का प्रवाह की दक्षता उसके भोज्य पदार्थ के सेवन तथा उसे जैव मात्रा में परिवर्तित करने की क्षमता पर निर्भर करता है, पारिस्थितिकी दक्षता कहलाता है ।


13. पोषी स्तर क्या है? एक आहार श्रृंखला का उदाहरण दीजिए।

उत्तर ⇒  पारितंत्र के आहार श्रृंखला में क्रमबद्ध तरीके से कई जीव एक दूसरे से जुड़े रहते हैं। जिस पारितंत्र के आहार श्रृंखला का प्रत्येक चरण एक पोषीस्तर को निरुपित करता है। पारिस्थितिक तंत्र में चार, पाँच या उससे भी अधिक पोषी स्तर की संभावनाएँ हो सकती हैं। इसे निम्न आहार श्रृंखला द्वारा समझा जा सकता है।
पेड़ → हिरण → बाघ →

यहाँ पेड़-पौधा प्रथम पोषी स्तर है, हिरण द्वितीय पोषी स्तर हैं तथा बाघ तृतीय – एवं उच्चतम श्रेणी के पोषी स्तर हैं।


14. यदि पीड़कनाशी अपघटित न हो तो आहार श्रृंखला के विभिन्न पोषी स्तर पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा ?

उत्तर ⇒  यदि पीड़कनाशी अपघटित न हो तो, यह फसलों में संचित होना शुरू होगा। फसल के द्वारा यह आहार-शृंखला के विभिन्न पोषी स्तर तक पहुंचने लगेगा जहाँ इसकी मात्रा बढ़ती चली जाएगी। अंततः सबसे अधिक मात्रा सर्वोच्च उपभोक्ता ग्रहण करेंगे। इसके कारण कई खतरनाक बीमारियों का सामना करना पड़ सकता है। इसमें मनुष्य की मृत्यु भी हो सकती है। अतः पीड़कनाशी का अपघटित न होना विभिन्न पोषी स्तर पर प्रतिकूल असर डालता है।


15. आहार श्रृंखला को परिभाषित करें।

उत्तर ⇒  पारिस्थितिक तंत्र के सभी जैव घटक शृंखलाबद्ध तरीके से एक-दूसरे से जुड़े होते हैं तथा अन्योन्याश्रय संबंध रखते हैं । यह श्रृंखला आहार श्रृंखला कहलाती है।

(सूर्य)       (पेड़-पौधे)        (हिरन)         (बाघ) 

सौर ऊर्जा → उत्पादक → प्राथमिक → द्वितीयक
उपभोक्ता    उपभोक्ता                                 


16. आहार-जाल से क्या समझते हैं ?

उत्तर ⇒  पारिस्थितिक तंत्र में सामान्यतः एक साथ कई आहार श्रृंखलाएँ हमेशा सीधी न होकर एक-दूसरे से आड़े-तिरछे जुड़कर एक जाल जैसी संरचना बनाती हैं। किसी भी पारितंत्र में आहार ‘शृंखला का यह जाल आहार-जाल कहलाता है।


17. ओजोन क्या है तथा यह किसी पारितंत्र को किस प्रकार प्रभावित करती है ?

उत्तर ⇒  ओजोन (03) के अणु ऑक्सीजन के तीन परमाणुओं से बनते हैं। यह वायुमंडल के ऊपरी सतह में पाया जाता है । यह सूर्य से आने वाली पराबैंगनी विकिरण से पृथ्वी को सुरक्षा प्रदान करती है । यही पराबैंगनी विकिरण जीवों के लिए अत्यंत हानिकारक है जिससे मानव में त्वचा का कैंसर हो जाता है। यह वायुमंडल में 15 km से लेकर 50 km ऊँचाई तक पाया जाता है । अतः यह हमारे पारितंत्र के लिए काफी लाभदायक है।


18. पारितंत्र में अपघटकों की भूमिका बताइए।

उत्तर ⇒  पारितंत्र में कुछ सूक्ष्म जीव जैसे बैक्टीरिया, कवक (Fungi) एवं प्रोटोजोआ पाये जाते हैं। ये सूक्ष्म जीव पौधों एवं जंतुओं के मृत शरीर एवं वयं पदार्थों (excretory substance) का अपघटन करते हैं। अतः ये अपघटक कहलाते हैं। ऐसे जीव पौधों एवं जंतुओं के मृत शरीर एवं वर्ण्य पदार्थों में उपस्थित जटिल कार्बनिक पदार्थों को अकार्बनिक तत्त्वों में विघटित कर देते हैं। इस अकार्बनिक पदार्थ को पौधे पुनः मिट्टी से ग्रहण करते हैं और वृद्धि करते हैं। अतः पारितंत्र में अपघटक की बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।


19. निचले पोषी स्तर पर सामान्यतः ऊपरी पोषी स्तर की तुलना में जीवों की संख्या अधिक क्यों रहती है ?

उत्तर ⇒  सामान्यत: उच्च पोषी स्तर के जीवों को अपनी आवश्यकताओं की आपति के लिए ज्यादा मात्रा में खाद्य-पदार्थों की जरूरत होती है, अतः निचले पोषी स्तर पर जीवों की संख्या अधिक होती है । अगर विभिन्न पोषी स्तर के जीवों की संख्या का अवलोकन किया जाए तो एक पिरामिड के सदृश आकृति बनती है ।


20. उपभोक्ता से क्या समझते हैं ? प्राथमिक तथा द्वितीयक उपभोक्ता का उदाहरण दें।

उत्तर ⇒  ऐसे जीव जो अपने पोषण के लिए पूर्णरूप से उत्पादकों पर निर्भर रहते हैं, उपभोक्ता कहलाते हैं । सभी जंतु उपभोक्ता की श्रेणी में आते हैं। गाय, भैंस प्राथमिक उपभोक्ता एवं शेर, बाघ द्वितीयक उपभोक्ता के उदाहरण हैं।


21. ऐरोसॉल रसायन के हानिकारक प्रभाव क्या हैं ?

उत्तर ⇒  कुछ सुगंध (perfumes), झागदार शेविंग क्रीम, कीटनाशी, गंधहारक (deodrant) आदि डिब्बों में आते हैं और फुहारा या झाग के रूप में निकलते हैं । इन्हें ऐरोसॉल कहते हैं । इनके उपयोग से वाष्पशील CFC (क्लोरोफ्लोरो कार्बन) वायुमंडल में पहुँचकर ओजोन स्तर को नष्ट करते हैं । CFC का उपयोग व्यापक तौर पर एयरकंडीशनरों, रेफ्रीजरेटरों, शीतलकों (coolants), जेट इंजनों, अग्निशामक उपकरणों आदि में होता है।


22. संख्या का पिरामिड किसे कहते हैं ?

उत्तर ⇒  अगर विभिन्न पोषी स्तर के जीवों की संख्या का अवलोकन किया जाय तो एक पिरामिड के सदृश आकृति बनती है जिसे संख्या का पिरामिड (pyramid of numbers) कहा जाता है। सामान्यतः उच्च पोषी स्तर के जीवों को अपनी आवश्यकताओं की आपूर्ति के लिए ज्यादा मात्रा में खाद्य पदार्थों की जरूरत होती है, अत: निचले पोषी स्तर पर जीवों की संख्या अधिक होती है ।

चित्र : घासस्थल में संख्या का पिरामिड

चित्र : घासस्थल में संख्या का पिरामिड


23. ऐसे दो तरीके बताइये जिनसे अजैव निम्नीकरणीय पदार्थ पर्यावरण को प्रभावित करते हैं।

उत्तर ⇒ 

(i) अजैव निम्नीकरणीय पदार्थों का अपघटन नहीं हो पाता है। यह पदार्थ सामान्यतः ‘अक्रिय’ (inert) हैं तथा पर्यावरण में लंबे समय तक बने रहते हैं अथवा पर्यावरण के अन्य सदस्यों को हानि पहुँचाते हैं।

(ii) वे खाद्य श्रृंखला में मिलकर जैव आवर्धन करते हैं और मानवों को कई प्रकार से हानि पहुँचाते हैं । यही उपरोक्त दो तरीके हैं जिनसे अजैव निम्नीकरणीय पदार्थ पर्यावरण को प्रभावित करते हैं।


24. अजैव निम्नीकरणीय पदार्थों का वातावरण में बढ़ने का मुख्य कारण क्या है ?

उत्तर ⇒  कल-कारखानों एवं उद्योगों के कारण अजैव निम्नीकरणीय पदार्थ वातावरण में काफी बढ़ गए हैं ।


25. किसी भी परितंत्र में जैव घटक कौन-कौन से हैं ? उत्पादक एवं उपभोक्ता में उदाहरण सहित विभेद करें।

उत्तर – किसी भी पारितंत्र में निम्न जैव घटक हैं
पेड़-पौधे, जंतु, सूक्ष्मजीव आदि। किसी भी पारितंत्र में हरे पौधे तथा प्रकाश-संश्लेषी बैक्टीरिया जो अपना भोजन प्रकाश-संश्लेषण के द्वारा बनाते हैं, उत्पादक कहलाते हैं। इन्हें स्वपोषी भी कहते हैं। किसी भी पारितंत्र में वैसे जीव जो अपने भोजन का संश्लेषण स्वयं नहीं कर पाते, अपितु प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उत्पादकों पर निर्भर करते हैं, उपभोक्ता कहलाते हैं।


26. पारिस्थितिक तंत्र एवं जीवोम या बायोम में अंतर स्पष्ट करें।

उत्तर ⇒  पारिस्थिति तंत्र एवं जीवोम या बायोम में अंतर इस प्रकार है

                             पारिस्थितिक तंत्र                              जीवोम या बायोम
           1. यह जैव जगत् की स्वयंधारी इकाई है।       1. यह बहुत से पारिस्थितिक तंत्रों का समूह है।
2. यह जैव जीवों और अजैव पर्यावरण से मिलकर बना है।2. इसमें समान जलवायु वाले एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र के अनेक पारिस्थितिक तंत्र होते है
3. यह जैव जगत् की अपेक्षाकृत छोटी इकाई है।3. यह जैव जगत् की एक बहुत बड़ी इकाई है।

27. जैव अनिम्नीकरणीय एवं जैव निम्नीकरणीय अपशिष्टों में क्या अंतर है ? उदाहरणसहित समझाएँ ।

उत्तर ⇒  अंतर निम्न है –

                  जैव-अनिम्नीकरणीय अपशिष्ट                    जैव निम्नीकरणीय अपशिष्ट
(i) ऐसे अवांछित पदार्थ, जिन्हें जैविक अपघटन के द्वारा पुनः उपयोग में नहीं लाया जाता है, जैव अनिम्नीकरणीय अपशिष्टकहलाता है।(i) ऐसे अवांछित पदार्थ, जिन्हें जैविक अपघटन के द्वारा पुन: उपयोग में आनेवाले पदार्थों में बदल दिया जाता है, जैव निम्नीकरणीय अपशिष्ट कहलाता है।
(ii) कीटनाशक, DDT, आर्सेनिक, प्लास्टिक आदि ।(ii) मल-मूत्र, मृत शरीर, घरेलू अपशिष्ट ।
(iii) कृषि द्वारा उत्पन्न अपशिष्ट  (iii) रेडियोधर्मी पदार्थ आदि ।

6. प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन ( लघु उत्तरीय प्रश्न )


1. अपने प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण हेतु पाँच कार्यों का उल्लेख करें।

उत्तर ⇒ 

(i) मितव्ययितापूर्वक उपयोग करके,

(ii) वृक्षारोपण द्वारा,

(iii) वैकल्पिक सात ,

(IV) समुचित रख-रखाव,

(v) नियंत्रित एवं दरगामी प्रयोग हतु जागरूक कर।


2. प्राकृतिक संसाधनों को उदाहरण सहित परिभाषित काजिए’।

उत्तर ⇒ प्रकृति में पाए जाने वाले मनष्य के लिए उपयोगी पदार्थों को प्राकृतिक संसाधन कहते हैं। उदाहरण—वायु, जल, मिट्टी, खनिज, कोयला, पेट्रोलियम आदि प्राकृतिक संसाधन हैं।


3. प्राकृतिक संसाधनों को किस तरह सुरक्षित रखा जा सकता है ?

उत्तर ⇒ प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग कम से कम करके या उसक बदल किसी अन्य स्रोत पर निर्भर करके प्राकृतिक संसाधनों को बचाया जा सकता है। कृत्रिम ससाधना को बढ़ावा देकर भी हम संसाधनों की सुरक्षा कर सकते हैं।


4. संसाधनों के दोहन के लिए लंबी अवधि को ध्यान में रखकर बनाई गई परियोजनाओं के लाभ क्या-क्या हो सकते हैं ?

उत्तर ⇒ संसाधनों के दोहन के लिए लंबी अवधि को ध्यान में रखकर बनाई गई परियोजनाओं से निम्नलिखित लाभ हो सकते हैं –
(i) यह दीर्घकालीन उद्देश्यों को ध्यान में रखकर बनायी जाती है ।
(ii) इनकी लागत अधिक होती है पर यह लाभ भी अधिक देते हैं ।
(iii) इन परियोजनाओं के प्रभाव व्यापक क्षेत्र पर पड़ते हैं ।


5. संसाधनों के दोहन के लिए कम अवधि के उद्देश्य के परियोजना से क्या लाभ हो सकते हैं ?

उत्तर ⇒ संसाधनों के दोहन के लिए कम अवधि के उद्देश्य के परियोजना से निम्नलिखित लाभ हो सकते हैं –

(i) संसाधनों पर कम दबाव तथा पर्यावरण की न्यूनतम क्षति ।

(ii) संसाधनों के पुनः पूरण के लिए पर्याप्त समय ।

(iii) प्रभावों को कम करने एवं पर्यावरण को सुधारने में सुविधा ।


6. नाभिकीय ऊर्जा किसे कहते हैं ?

उत्तर ⇒ यूरेनियम (भारी द्रव्यमान) पर निम्न ऊर्जा न्यूट्रॉन से बमबारी की जाती है और यह हल्के नाभिकों में टूट जाता है तथा विशाल मात्रा में ऊर्जा उत्पन्न होता है । इस ऊर्जा को नाभिकीय ऊर्जा कहते हैं।


7. जीवमंडल से क्या समझते हो ?

उत्तर ⇒ जीवमंडल जैव-व्यवस्था का सबसे बड़ा स्तर [Level] है। संसार के विभिन्न पारिस्थितिक तंत्र या पारितंत्र एक साथ मिलकर जीवमंडल का निर्माण करते हैं।


8. किन्हीं दो वन उत्पादों का पता लगाइये जो किसी उद्योग के आधार हैं ?

उत्तर ⇒ तेंदु पत्ती का उपयोग बीडी बनाने में व यूक्लिप्टस-बाँस के पेड़ों का कागज मिल में ये दो वन उत्पाद हैं जो कि इनके उद्योग के आधार हैं।


9. रेडियोधर्मिता किसे कहते हैं ?

उत्तर ⇒ ऐसी परिघटना है जिसमें कुछ तत्त्वों के परमाणु नाभिकों के विघटन के परिणामस्वरूप इलेक्ट्रॉन (बीटा कण) तथा गामा किरणों (वैद्युत चुंबकीय विकिरण) का स्वतः उत्सर्जन होता है।


10. जीवाश्म ईंधन किसे कहते हैं ? दो जीवाश्म ईंधन के नाम लिखें।

उत्तर ⇒ लाखों वर्ष पूर्व जैव मात्रा के अपघटन से प्राप्त होने वाले ईंधन को जीवाश्म ईंधन कहते हैं।
जैसे—कोयला और पेट्रोलियम ।


11. पर्यावरण को बचाने के लिए तीन प्रकार के ‘R’ का क्या उपयोग है ?

उत्तर ⇒ पर्यावरण को बचाने के लिए तीन प्रकार के ‘R’ का उपयोग हम करते हैं—’कम उपयोग’ (reduce), पुन: चक्रण (recycle) व पुन: उपयोग (reuse)।


12. मानव के किन क्रियाकलापों ने गंगा को प्रदूषित किया है ?

उत्तर ⇒  नहाना, कपड़े धोना, मृत व्यक्तियों की राख व शवों को बहाना, उद्योगों द्वारा उत्पन्न रासायनिक उत्सर्जन आदि मानव के क्रिया-कलाप हैं जिनसे गंगा प्रदूषित हो गयी है।


13. “ग्रीन हाउस प्रभाव” से हमारे ऊपर क्या असर पड़ेगा ?

उत्तर ⇒ 

(i) अत्यधिक ग्रीनहाउस प्रभाव होने से पृथ्वी की सतह तथा उसके वायुमंडल का ताप बहुत अधिक बढ़ जाएगा। वायुमंडल का ताप अत्यधिक बढ़ जाने से मानव तथा जंतुओं का जीवन कष्टदायक हो जाएगा तथा पेड़-पौधों के स्वास्थ्य पर भी बुरा प्रभाव पड़ेगा।(ii): वायुमंडल का ताप अत्यधिक बढ़ने से पर्वतों की बर्फ शीघ्रता से पिघल जाएगी, जिससे नदियों में बाढ़ आ सकती है तथा जान-माल की हानि हो । सकती है।
(ii) कार्बन डाइऑक्साइड के अणु अवरक्त विकिरणों का शोषण कर – सकते हैं। वायुमंडल में Co2 की परत अवरक्त मिश्रण का अवशोषण कर लेती है तथा उन्हें पृथ्वी के पर्यावरण से नहीं जाने देती। फलस्वरूप वायुमंडल का ताप बढ़ जाता है।


14. पर्यावरण को बचाने का मुख्य उपाय क्या है ?

उत्तर ⇒  पर्यावरण को बचाने का मुख्य उपाय है—वृक्षारोपण, C.N.G., धुआँरहित – चिमनी इत्यादि। इससे प्रदूषित हवा, पानी एवं मिट्टी को नियंत्रित किया जा सकता है।


15. जीवाश्म ईंधन जैसे संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग की आवश्यकता क्यों है ?

उत्तर ⇒  जीवाश्म ईंधन जैसे संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग का आवश्यकता – है क्योंकि इनकी मात्रा सीमित है और इनके दहन से पर्यावरण प्रदूषित होता है ।


16. बाघ संरक्षण योजना क्या है ? इसे कब लागू किया गया था ?

उत्तर ⇒  जंगल के लगातार कटने के कारण बाघ की संख्या घटती जा रहा है, – इसे बचाने के लिए बाघ संरक्षण योजना तैयार किया गया है । जिसके अतर्गत
28 टाइगर रिजर्व भारत में खोला गया है । यह योजना भारत सरकार के साथ WWF (World Wild life Fund) का भी है । इसे भारत में 1995 में लागू किया गया था ।


17. विभिन्न वन उत्पादों के दावेदार कौन हैं ?

उत्तर ⇒  विभिन्न वन उत्पादों के दावेदार निम्नलिखित हैं

(i) वन के अंदर एवं इसके निकट रहने वाले अपनी अनेक आवश्यकताओं के लिए वन पर निर्भर रहते हैं।

(ii) सरकार का वन विभाग जिनके पास वनों का स्वामित्व है तथा वे वनों से प्राप्त संसाधनों का नियंत्रण करते हैं।

(iii) उद्योगपति जो तेंदू पत्तों का उपयोग बीड़ी बनाने से लेकर कागज मिल तक विभिन्न वन उत्पादों का उपयोग करते हैं। परंतु वे वनों के किसी भी एक क्षेत्र पर निर्भर नहीं रहते ।

(iv) वन्य जीवन एवं प्रकृति प्रेमी जो प्रकृति का संरक्षण इसकी आद्य अवस्था में करना चाहते हैं ।


18. घुमंतु चरवाहों को विशाल हिमालय राष्ट्रीय उद्यान में रोकने का क्या नतीजा हुआ ?

उत्तर ⇒  घुमंतु चरवाहों को विशाल हिमालय राष्ट्रीय उद्यान में रोकने से वहाँ घास पहले बहुत लंबी हो जाती है, फिर लंबाई के कारण जमीन पर गिर जाती है जिससे नयी घास की वृद्धि रुक जाती है ।


19. राष्ट्रीय पुरस्कार ‘अमृता देवी विश्नोई पुरस्कार’ किनकी स्मृति में दिया जाता है ?

उत्तर ⇒  राष्ट्रीय पुरस्कार ‘अमृता देवी विश्नोई पुरस्कार’ अमृता देवी विश्नोई की स्मृति में दिया जाता है जिन्होंने 1731 में जोधपुर के पास खेजराल गाँव में ‘खेजरी वृक्षों को बचाने हेतु 363 लोगों के साथ अपने आपको बलिदान कर दिया था ।


20. ‘गंगा का प्रदूषण’ पर टिप्पणी लिखें।

उत्तर ⇒ गंगा हिमालय में स्थित अपने उद्गम गंगोत्री से बंगाल की खाड़ी में गंगा सागर तक 2500 km तक की यात्रा करती है । इसके किनारे स्थित नगरों ने इसमें उत्सर्जित कचरा एवं मल प्रवाहित कर इसे एक नाले में परिवर्तित कर दिया है । मानव के अन्य क्रियाकलाप जैसे—नहाना, कपड़े धोना, मृत व्यक्तियों की राख एवं शवों को बहाना, उद्योगों द्वारा उत्पादित रासायनिक उत्सर्जन ने गंगा का प्रदूषण बढ़ाकर इसमें कोलिफार्म जीवाणु उपस्थिति द्वारा जल को संदूषित कर दिया है । जल में इन सबके विषैले प्रभाव के कारण जल में मछलियाँ मरने लगी हैं।


21. कैसे कहा जा सकता है कि वन ‘जैव विविधता के विशिष्ट (Hotspots) स्थल’ हैं ?

उत्तर ⇒  वन ‘जैव विविधता के विशिष्ट (hotspots) स्थल हैं । जैव विविधता का एक आधार उस क्षेत्र में पायी जानेवाली विभिन्न स्पीशीज़ की संख्या है। परंत जीवों के विभिन्न स्वरूप (जीवाणु, कवक, फर्न, पुष्पी पादप, सूत्रकृमि, कीट, पक्षी, सरीसृप इत्यादि) भी महत्त्वपूर्ण हैं । वंशागत जैव विविधता को संरक्षित करने का प्रयास प्राकृतिक संरक्षण के मुख्य उद्देश्यों में से एक है। विभिन्न प्रकार के अध्ययन से हमें पता चलता है कि विविधता के नष्ट होने से पारिस्थितिक स्थायित्व के भी नष्ट होने की संभावना रहती है।


22. आप अपनी जीवन शैली में क्या परिवर्तन लाना चाहेंगे जिससे हमारे संसाधनों के संपोषण को प्रोत्साहन मिल सके ?

उत्तर ⇒  हम अपनी जीवन शैली में ऐसे अनेक परिवर्तन लाना चाहेंगे जिससे हमारे संसाधनों के संपोषण को प्रोत्साहन मिल सके. हम ‘कम उपयोग’, ‘पुनः उपयोग’ तथा ‘पुनः चक्रण’ की नीति अपनाएँगे, जीवाश्म ईंधन-कोयला एवं पेट्रोलियम का निम्नतम उपयोग करेंगे, जल की अतिव्ययता को रोकेंगे, बिजली का कम उपयोग करके, वन-संपदा को बचाने हतु उठाये गये कदम में सहयोग करके, लिफ्ट का प्रयोग न कर सीढ़ियों का प्रयोग करेंगे, जल संरक्षण में सहयोग देंगे इत्यादि।


23. पर्यावरण-मित्र बनने के लिए आप अपनी आदतों में कौन-कौन से परिवर्तन ला सकते हैं ?

उत्तर ⇒ 

(i) धुआँ रहित वाहनों का प्रयोग करके

(ii) पॉलीथीन का उपयोग न करक

(iii) जल संरक्षण को बढावा देकर

(iv) वनों की कटाई पर रोक लगाकर

(v) वृक्षारोपण करके

(vi) तेल से चालित वाहनों का कम-से-कम उपयोग करके।
उपरोक्त विभिन्न विधियों को अपनाकर हम पर्यावरण-संरक्षण में योगदान कर सकते हैं।


24. प्लास्टिक का पुनः चक्रण किस प्रकार होता है? क्या प्लास्टिक के पुनः चक्रण का पर्यावरण पर कोई समाघात होता है ?

उत्तर ⇒  प्लास्टिक के डिस्पोजेबुल कप एवं गिलास की जगह मिट्टी के कुल्हड़ या पेपर के डिस्पोजेबुल कप एवं गिलास का प्रयोग करना ज्यादा सही है। प्लास्टिक का पुनः चक्रण आसान नहीं है। इसे बार-बार उपयोग करना इसका जमाव पर्यावरण में अपेक्षाकृत कम हो जाता है। इससे पर्यावरण से प्लास्टिक समाप्त तो नहीं हो जाएगा, पर इसका जमाव कम हो सकता है।


25. जीवाश्म क्या है ? जैव विकास प्रक्रम के विषय में ये क्या बतलाता है ?

उत्तर ⇒  किसी जीव की मृत्यु के बाद उसके शरीर का अपघटन हो जाता है तथा वह समाप्त हो जाता है। परंतु कभी-कभी जीव अथवा उसके कुछ भाग ऐसे वातावरण में चले जाते हैं जिसके कारण इनका अपघटन पूरी तरह से नहीं हो पाता । जीव के इस प्रकार के परिरक्षित अवशेष जीवाश्म कहलाते हैं। जीवाश्मों के अध्ययन से जैव विकास के प्रमाण मिलते हैं। आर्कियोप्टेरिक्स (Archaeopteryx) एक ऐसा ही जीवाश्म है जिसमें रेप्टीलिया तथा एवीज (पक्षी) दोनों के गुण पाये जाते हैं। आर्कियोप्टेरिक्स में रेप्टीलिया की तरह जबड़ों में दाँत तथा अंगुलियों में नख थे। पक्षियों की तरह इसमें डैने (wings) तथा पर या पंख (feathers) थे । इसके अध्ययन से इस बात की पुष्टि होती है कि रेप्टीलिया तथा एवीज का विकास एक ही पूर्वज से हुआ है । इसी तरह यह (जीवाश्म) जैव प्रक्रम है एक धीरे-धीरे होनेवाला जीवों के विकास का ।

जीवाश्म क्या है ? जैव विकास प्रक्रम के विषय में ये क्या बतलाता है ?

26. जल संग्रहण की पारंपरिक व्यवस्था-खादिन पद्धति का रेखांकित चित्र बनाइये ।

उत्तर ⇒ 

चित्र : जल संग्रहण की पारंपरिक व्यवस्था-खादिन पद्धति का आदर्श व्यवस्थापन

चित्र : जल संग्रहण की पारंपरिक व्यवस्था-खादिन पद्धति का आदर्श व्यवस्थापन


27. बड़े बाँध के विरोध में मुख्यतः किन समस्याओं का सामना करना पड़ता है ?

उत्तर ⇒  बड़े बाँध के विरोध में मुख्यतः तीन समस्याओं का सामना करना पड़ता है –

(i) सामाजिक समस्याएँ – इससे बड़ी संख्या में किसान और आदिवासी विस्थापित होते हैं, और इन्हें मुआवजा भी नहीं मिलता ।

(ii) आर्थिक समस्याएँ – इनमें जनता का बहुत अधिक धन लगता है और उस अनुपात में लाभ अपेक्षित नहीं है

(iii) पर्यावरणीय समस्याएँ – इससे बड़े स्तर पर वनों का विनाश होता है तथा जैव विविधता की क्षति होती है ।


28. यदि हमारे द्वारा उत्पादित सारे कचरे जैव निम्नीकरणीय हो तो क्या इनका हमारे पर्यावरण पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा ?

उत्तर ⇒  यदि हमारे द्वारा उत्पादित सारे कचरे. जैव निम्नीकरण हो तो, अपशिष्ट पदार्थ जमा नहीं होंगे। सारे पदार्थ को पुनः पर्यावरण में वापस भेज देते हैं। इसके कारण हमारा पर्यावरण हमेशा स्वच्छ रहेगा।


29. हमें वन एवं वन्य जीवन का संरक्षण क्यों करना चाहिए ?

उत्तर ⇒  हमें वन एवं वन्य जीवन का संरक्षण इसलिए करना चाहिए क्योंकि वन ‘जैव विविधता के विशिष्ट (Hotspots) स्थल’ हैं। जैव विविधता का एक आधार उस क्षेत्र में पाई जानेवाली विभिन्न स्पशीज की संख्या है। परंतु जीवों के विभिन्न स्वरूप (जीवाणु, कवक, फर्न, पुष्पी पादप, सूक्ष्मकृमि, कीट, पक्षी, सरीसृप इत्यादि) भी महत्त्वपूर्ण हैं। वंशागत जैव विविधता को संरक्षित करने का प्रयास प्राकृतिक संरक्षण के मुख्य उद्देश्यों में से एक है। प्रयोगों एवं वस्तु स्थिति के अध्ययन से हमें पता चलता है कि विविधता के नष्ट होने से पारिस्थितिक स्थायित्व भी नष्ट हो सकता है। विभिन्न व्यक्ति फल, नट्स तथा औषधि एकत्र करने के साथ-साथ अपने पशुओं को वन में चराते हैं अथवा उनका चारा वनों में एकत्र करते हैं।

1. पोषण क्या है ? जीवों में होनेवाली विभिन्न पोषण विधियों का वर्णन करें।

उत्तर⇒ वह जैव प्रक्रम जिसमें जीव अपने जीवन के अस्तित्व को बनाए रखने लिए भोज्य पदार्थों के पोषक तत्त्वों को ग्रहण कर उनका उपयोग करते हैं, पोषण कहलाता है।
जीवों में पोषण मुख्यतः दो विधियों द्वारा होता है –

(I) स्वपोषण – वह विधि जिसमें सजीव भोजन के लिए किसी अन्य जीवों पर निर्भर न रहकर अपना भोजन स्वयं संश्लेषित कर लेते हैं, स्वपोषण कहलाती है। इस विधि द्वारा पोषण करनेवाले जीवों को स्वपोषी कहते हैं। सभी हरे पौधे स्वपोषी होते हैं।
(ii) परपोषण – परपोषण वह विधि है, जिसमें जीव अपना भोजन स्वयं संश्लेषित न कर किसी-न-किसी रूप में अन्य स्रोतों से प्राप्त करते हैं। इस विधि द्वारा पोषण करनेवाले जीवों को परपोषी कहते हैं। सभी जंतु, जीवाणु एवं कवक परपोषी कहलाते हैं।


2. परपोषण कितने प्रकार के होते हैं? वर्णन करें।

उत्तर⇒ परपोषण मुख्य रूप से तीन प्रकार का होता है –

(a) मृतजीवी पोषण – इसमें जीव मृत जंतुओं एवं पादपों के शरीर से अपना भोजन, अपने शरीर की सतह से, घुलित कार्बनिक पदार्थों के रूप में अवशोषित करते हैं। ऐसे जीवों को मृतजीवी या अपघटक भी कहते हैं, जैसे—कवक एवं बैक्टीरिया।

(b) परजीवी पोषण – इस प्रकार के पोषण में जीव दूसरे प्राणी के संपर्क में स्थायी या अस्थायी रूप से रहकर, उससे अपना भोजन प्राप्त करते हैं। भोजन प्राप्त करनेवाले जीव परजीवी एवं जिनके शरीर से परजीवी अपना भोजन प्राप्त करते हैं, उन्हें पोषी (hot) कहते हैं। उदाहरण के लिए एंटअमीबा हिस्टोलीटिका, मलेरिया परजीवी इत्यादि।

(c) प्राणिसम पोषण – जीवों में पोषण की वह विधि जिसमें प्राणी अपना भोजन ठोस या तरल रूप में जंतुओं के भोजन ग्रहण करने की विधि द्वारा ग्रहण करते हैं, प्राणिसम पोषण कहलाता है। इस विधि द्वारा जंतुओं (अमीबा, मेढक, मनुष्य) में पोषण होता है।


3. मनुष्य में दोहरा परिसंचरण की आवश्यकता क्यों होती है ? – व्याख्या करते हुए समझाएँ ।

उत्तर⇒रक्त हृदय में दो बार परिसंचरण के दौरान गुजरता है इसलिए इसे दोहरा परिसंचरण कहते हैं। हृदय के बायें आलिंद का संबंध फुफ्फुस शिरा से होता है जो फेफड़ों में ऑक्सीजनयुक्त रक्त को लाती है। बायें आलिन्द का संबंध एक दिकपाट द्वारा बायें निलय से होता है। अत: बायें आलिन्द का संबंध एक दिक्पाट बायें निलय से होता है। अत: बायें आलिन्द का ऑक्सीजन युक्त रक्त कपाट खोलकर बायें निलय में भरा जाता है। बायें निलय का संबंध एक महाधमनी से होता है। अत: बायें निलय का ऑक्सीजन युक्त रक्त इस महाधमनी से होकर पूरे शरीर में चला जाता है। फिर शरीर विभिन्न भागों से ऑक्सीजन विहीन अशुद्ध रक्त महाशिरा द्वारा दायें आलिन्द में आता है। दायें आलिंद और दायें निलय के बीच त्रि-कपाट होता है। अतः दायें आलिन्द का रक्त इस कपाट से होकर दायें निलय में आ जाता है । दायें निलय का संबंध फुफ्फुस धमनी से होता है जो फेफड़ों तक जाती है। वहाँ उसकी कार्बन डाइऑक्साइड फेफड़ों में चली जाती है और ऑक्सीजन रक्त में आ जाता है।


4. मानव के रक्त के कार्यों का वर्णन करें।

उत्तर⇒ रक्त के कार्य रक्त एक तरल संयोजी ऊतक है, क्योंकि वह अपने प्रवाह के दौरान शरीर के सभी ऊतकों का संयोजन करता है ।

(i) यह फेफड़े से ऑक्सीजन को शरीर के विभिन्न भागों में परिवहन करता है।
(ii) यह शरीर की कोशिकाओं से CO2को फेफड़े तक लाता है, जो श्वासोच्छ्वास के द्वारा बाहर निकल जाता है।
(iii) यह पचे भोजन को छोटी आँत से शरीर के विभिन्न भागों में पहँचाता है।
(iv) यह शरीर को विभिन्न रोगाणुओं के संक्रमण से सुरक्षा प्रदान करता है, क्योंकि रक्त के घटक WBC. शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र का निर्माण करते हैं।
(v) रक्त पट्टिकाणु, रक्त जमने में सहायक होते हैं ।


5. वृक्क का नामांकित चित्र बनाकर वर्णन करें।

उत्तर⇒ मनुष्य के वृक्क में निम्नलिखित रचनाएँ पाये जाते हैं।

(1) वृक्क (Kidney) :- मनुष्य में दो ववक होते हैं। यह गहरे भूरे-लाल रंग के होते हैं। दोनों वृक्क उदरगुहा की पष्ठीय देहभित्ति में कशेरूकदंड के दोनों ओर स्थित होते हैं। प्रत्येक वृक्क का बाहरी सतह उत्तल (Convex) तथा भीतरी सतह अवतल (Concave) होता है। वृक्क के आंतरिक अवतल सतह को हीलस (hilus) कहते हैं।

(2) मत्रवाहिनी (Ureters) :- प्रत्येक वृक्क के हीलस से 20-30 cm लंबी नली के आकार की रचना निकलती है, जिसे मत्रवाहिनी कहते हैं। प्रत्येक मूत्रवाहिनी आगे की ओर मूत्राशय में खुलती है।

(3) मूत्राशय (Urinary bladder) :- यह एक थैली के आकार की रचना है, जो उदरगुहा के पिछले भाग में रेक्टम के नीचे स्थित होती है। मूत्राशय का ऊपरी चौड़ा भाग मुख्य भाग होता है तथा पिछला भाग मूत्राशय की ग्रीवा कहलाती है। मूत्राशय में 0.5 से 1 लीटर तक पेशाब जमा रहता है।

(4) मूत्रमार्ग (Urethra) :- मूत्राशय की ग्रीवा से एक नली निकलती है जिसे मूत्रमार्ग कहते हैं।

वृक्क की रचना का चित्र

6. वृक्क के महत्त्वपूर्ण कार्य क्या हैं ?

उत्तर⇒ वृक्क रक्त में जल की उचित मात्रा को बनाए रखने में सहायक होता है। यह रक्त में खनिज की सही समानता बनाए रखता है। यह शरीर से दूषित पदार्थों का उत्सर्जन करते हैं अन्यथा अगर यह शरीर में रहे तो उस जीव के लिए खतरनाक साबित होते हैं। वृक्क रक्त के संपूर्ण आयतन को व्यवस्थित करता है। शरीर में अत्यधिक रक्तस्राव होने से रक्तचाप कम हो जाता है, जिससे कम मात्रा में ग्लोमेरुलर फिल्ट्रेट बनता है व वृक्क से निम्न मात्रा में मूत्र का उत्सर्जन होता है। इस प्रकार शरीर में तरल पदार्थ की अवस्था में सभी लवण, ग्लूकोज और अन्य पदार्थ संचित रहते हैं।


7. होमिओस्टेसिस क्या है ?

उत्तर⇒ वृक्क हमारे शरीर में जल, अम्ल, क्षार तथा लवणों को संतुलन बनाये रखने में मददगार होता है। मूत्र के निर्माण व उत्सर्जी पदार्थों को शरीर के बाहर निकालने के अतिरिक्त रुधिर में अतिरिक्त जल की मात्रा को मूत्र के रूप में शरीर से वृक्क बाहर निकालता है। इसी प्रकार वृक्क के कारण रुधिर में लवण सदैव एक निश्चित मात्रा में मिलते हैं। अमोनिया रुधिर के H की अधिकता को कम करके रुधिर में अम्ल-क्षार संतुलन बनाने में सहायता देती है। वृक्कों द्वारा ही विष, दवाइयाँ आदि हानिकारक पदार्थों का भी शरीर से विसर्जन होता है। अतः वे सारी क्रियाएँ जिनसे शरीर में एक स्थायी अवस्था बनी रहती है, होमिओस्टेसिस कहलाती हैं।


8. भोजन के पाचन में लार की क्या भूमिका है ?

उत्तर⇒ लार एक पाचक रस है जो कि तीन जोड़ी लार ग्रंथियों से स्रावित होती है। मुँह में भोजन के पाचन में लार की भूमिका निम्नलिखित हैं –

(i) यह मुख के खोल में चिकनाई पैदा करती है जिससे चबाते समय रगड़ कम होती है।
(ii) यह भोजन को चिकना एवं मुलायम बनाती है।
(iii) यह भोजन को पचाने में मदद करती है।
(iv) इसमें एमिलेस नामक एक एंजाइम होता है जो मंड जटिल अणु को व लार को पूरी तरह मिला देता है।
(v) इसमें विद्यमान टायलिन नामक एंजाइम स्टार्च का पाचन कर उसे माल्टोज में बदल देता है।


9. कोई वस्तु सजीव है, इसका निर्धारण करने के लिए हम किस मापदंड का उपयोग करेंगे ?

उत्तर⇒ जीवों का शरीर कोशिकाओं का बना हुआ होता है एवं इसके जीवद्रव्य में विभिन्न प्रकार के अणुओं का समायोजन होता है। सजीव और निर्जीव पदार्थों में अणुओं के विन्यास व संयोजन या व्यवस्था का सबसे बड़ा अंतर होता है। जीवित पदार्थों में अणुओं का विशेष प्रकार से संयोजन होने के कारण ही जीवों का निर्माण संभव हो पाता है। जीवन का मुख्य आधार है जीवद्रव्य (Protoplasm) जो कि न्यूक्लियोप्रोटीन (nucleo protein) अणुओं के साथ अन्य तत्त्वों के अणुओं के संयोजन से बनता है। जीवद्रव्य में सजीवों के सारे गुण पाये जाते हैं। इसमें उपस्थित विभिन्न अणुओं की विशेष व्यवस्था एवं गति आणविक गति कहलाती है जो निर्जीवों में नदारद होती है। इन्हीं मापदंडों का उपयोग हम किसी वस्तु के सजीव होने में करेंगे।


10. बीजाणुजनन से क्या समझते हैं ? सचित्र समझाएँ।

बीजाणुजनन से क्या समझते हैं

उत्तर⇒बीजाणुजनन अलैंगिक जनन की एक उन्नत विधि है। यह मुख्य रूप से निम्न श्रेणी के जीवों जैसे—जीवाणु, शैवाल एवं कवक आदि में पाई जाती है। बीजाणुधानियाँ एक सूक्ष्म थैली जैसी संरचनाएँ हैं जो प्रतिकूल परिस्थिति में निर्मित होती है। इनके अंदर असंख्य गोलाकार सूक्ष्म जीवाणु या स्वोर का निर्माण होता है। प्रतिकूल परिस्थितियों जैसे—उच्चतापमान, उच्च अम्लीयता या उच्च क्षारीयता सूखापन आदि में बीजाणुधानी के चारों ओर एक मोटे एवं कड़े आवरण का निर्माण हो जाता है। अनुकुल परिवेश में बीजाणु अंकुरित होने लगते हैं जिससे उनके भीतर की कोशिकीय रचनाएँ बाहर आ जाती हैं।


11. पौधे अपना उत्सर्जी पदार्थ किस रूप में निष्कासित करते हैं ?

उत्तर⇒ पौधे अपना उत्सर्जन जंतुओं से बिलकुल भिन्न रूप में युक्ति अपनाकर करते हैं । प्रकाशसंश्लेषण में जनित ऑक्सीजन भी एक अपशिष्ट उत्पाद है । पौधे अतिरिक्त जल से वाष्पोत्सर्जन द्वारा छुटकारा पा सकते हैं । पौधे अपने कुछ उत्पाद जैसे-पत्तियों का क्षय भी कर सकते हैं । बहुत से पादप अपशिष्ट उत्पाद कोशिका रिक्तिका में संचित रखते हैं । पौधों से गिरने वाली पत्तियों में भी अपशिष्ट उत्पाद संचित रहते हैं । अन्य अपशिष्ट उत्पाद रेजिन तथा गोंद के रूप में विशेषतया पुराने जाइलम में संचित रहते हैं । पादप भी कुछ अपशिष्ट पदार्थों को अपने आसपास की मृदा में उत्सर्जित करते हैं।


12. रक्तदाब क्या है ?

उत्तर⇒ रुधिर वाहिकाओं की भित्ति के विरुद्ध जो दाब लगता है उसे रक्तदाब कहते हैं । यह दाब शिराओं की अपेक्षा धमनियों में बहुत अधिक होता है । धमनी के अंदर रुधिर का दाब निलय प्रकुंचन (संकुचन) के दौरान प्रकुंचन दाब तथा निलय अनुशिथिलन (शिथिलन) के दौरान धमनी के अंदर का दाब अनुशिथिलन दाब कहलाता है । सामान्य प्रकुंचन दाब लगभग 120mm (पारा) तथा अनुशिथिलन दाब लगभग 80mm (पारा) होता है।

चित्र: रक्त दाब

13. रक्त क्या है? इसके घटकों का वर्णन करें।

उत्तर⇒रक्त-रक्त एक तरल संयोजी ऊतक है। यह लाल रंग का गाढ़ा क्षारीय (pH = 7.4) तरल पदार्थ है जो हृदय तथा रक्त वाहिनियों में प्रवाहित होता है।
रक्त के दो प्रमुख घटक होते हैं – (1) प्लाज्मा (2) रक्त कोशिकाएँ ।

(1) प्लाज्मा—यह रक्त का तरल भाग है। यह हल्के पीले रंग का चिपचिपा द्रव है जो आयतन के हिसाब से परे रक्त का करीब 55 प्रतिशत होता है। प्लाज्मा में करीब 90% जल, 7% प्रोटीन, 0.9%, अकार्बनिक लवण, 0.18% ग्लूकोज, 0.5% वसा शेष अन्य कार्बनिक पदार्थ होते हैं।

(2) रक्त कोशिकार –यह रक्त का ठोस भाग है जो कल रक्त का करीब 45 प्रतिशत है।
जिसमें मुख्य रूप से तीन प्रकार की कोशिकाएँ होती हैं –

(i) लाल रक्त कोशिकाएँ (R.B.C) – इसमें एक विशेष प्रकार का प्रोटीन वर्णक हीमोग्लोबिन (Haemoglobin) पाया जाता है। जिसके कारण रक्त का रंग लाल होता है।

(ii) श्वेत रक्त कोशिकाएँ (W.B.C) – ये अनियमित आकार की न्यूक्लियस युक्त कोशिकाएँ हैं। इनमें हीमोग्लोबिन नहीं रहने के कारण रंगहीन होते हैं।

(iii) रक्त पट्टिकाणु – ये बिंबाणु या थ्रोम्बोसाइट्स भी कहलाते हैं। इसका प्रमुख कार्य रक्त को थक्का बनने में सहायक होना है।


14. मानव नेफ्रॉन का स्वच्छ नामांकित चित्र बनाकर वर्णन करें।

उत्तर⇒प्रत्येक वृक्क में लगभग 10,00,000 वृक्क नलिकाएँ होती हैं जिसे नेफ्रॉन कहते हैं।
मानव नेफ्रॉन को निम्नलिखित प्रमुख भागों में बाँटा जा सकता है –

(i)बोमैन संपूट (Bowman’s Capsule) – यह वृक्क-नलिका के आरंभ में प्याले जैसी संरचना है जो कोशिका गुच्छ या Glomerulus नामक रक्त कोशिकाओं के एक जाल को घेरता है। Bowman’s capsule एवं Glomerulus को सम्मिलित रूप से Malpighian capsule कहते हैं।

(ii) कुंडलित नलिका – इसके दो प्रमुख भाग हैं— (क) हेनले का चाप (Henle’s loop), (ख) संग्राहक नलिका (Collecting tubule)

(iii) सामान्य संग्राहक नली (Common collecting duet) – जो अंत में मूत्र-वाहिनी से जुड़ा होता है। मानव नेफ्रॉन रक्त में मौजूद द्रव्य अपशिष्ट पदार्थों को मूत्र के रूप में निकालने में मदद करता है।

सामान्य संग्राहक नली

15.नलिकाओं द्वारा खाद पदार्थों का परिवहन को चित्र के द्वारा दर्शाएँ।

उत्तर⇒


16. मनुष्य में विभिन्न प्रकार की रक्त कोशिकाओं का चित्र बनाएँ।

उत्तर⇒

रक्त कोशिकाओं

17. प्रकाश-संश्लेषण क्रिया को कौन-कौन से कारक प्रभावित करने हैं? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर⇒ प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया को निम्न कारक प्रभावित करते हैं –

(i) प्रकाश – प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया सूर्य-प्रकाश में होती है, इसलिए । प्रकाश का प्रकार तथा उसकी तीव्रता इस क्रिया को प्रभावित करती हैं। प्रकाश की लाल एवं नीली किरणों तथा 100 फुट कैंडल से 3000 फुट कैंडल तक प्रकाश तीव्रता प्रकाश-संश्लेषण की दर को बढ़ाती है जबकि इससे उच्च तीव्रता पर यह क्रिया सका | जाती है।
in co2 वातावरण में Co2, की मात्रा 0.03% होती है। यदि एक सीमा तक Co2, की मात्रा बढ़ाई जाए तो प्रकाश-संश्लेषण दर भी बढ़ती है लेकिन अधिक होने से घटने लगती है।

(ii) तापमान प्रकाश-संश्लेषण के लिए 25-35°C का तापक्रम सबसे उपयुक्त होता है। इससे अधिक या कम होने पर दर घटती-बढ़ती रहती है।

(iv) जल – इस क्रिया के लिए जल एक महत्त्वपूर्ण यौगिक है। जल की कमी होने से प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया प्रभावित होती है क्योंकि जीवद्रव्य की सक्रियता घट जाती है, स्टोमेटा बंद हो जाते हैं और प्रकाश संश्लेषण दर घट जाती है।

(v) ऑक्सीजन – प्रत्यक्ष रूप से ऑक्सीजन की सांद्रता से प्रकाश संश्लेषण की क्रिया प्रभावित नहीं होती है लेकिन यह पाया गया है कि वायुमंडल में ), की मात्रा बढ़ने से प्रकाश-संश्लेषण की दर घटती है।


18. पौधों में प्रकाशसंश्लेषण की क्रिया को सचित्र दर्शाइए।

उत्तर⇒प्रकाशसंश्लेषण एक जटिल जैव प्रक्रम है जिसमें हरे पौधे सूर्य के विकिरण ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा में परिवर्तित कर देते हैं। हरी पत्तियों में अवस्थित क्लोरोफिल सूर्य के प्रकाश से उत्पन्न विकिरण ऊर्जा को अवशोषित कर इनके जल को H20एवं 02में विभक्त करती है। 02 रंधों द्वारा बाहर निकल जाता है। H2 C02 से संयोग कर ग्लूकोज बनाता है। इस प्रक्रम के दौरान तीन मुख्य रासायनिक घटनाएँ होती हैं –

(i) क्लोरोफिल द्वारा प्रकाश ऊर्जा का अवशोषण
(ii) प्रकाश ऊर्जा का रासायनिक ऊर्जा में रूपान्तरण तथा जल अणुओं का हाइड्रोजन एवं ऑक्सीजन में विघटन
(iii) कार्बन डाइऑक्साइड का कार्बोहाइड्रेट में अपचयन

कार्बन डाइऑक्साइड का कार्बोहाइड्रेट में अपचयन

19. प्रकाशसंश्लेषण के लिए पौधों को सूर्य की रोशनी की आवश्यकता होती है। प्रयोग द्वारा समझाइए।

उत्तर⇒उदेश्य – प्रकाशसंश्लेषण की अभिक्रिया में प्रकाश की अनिवार्यता प्रदर्शित करना।

आवश्यक उपकरण एवं सामग्री – गमला सहित एक स्वच्छ पौधा, गैनोंग का लाइटस्क्रीन अथवा काला कागज एवं क्लिप, चिमटी, त्रिपाद स्टैण्ड, तार की जाली, स्पिरिट लैम्प, पेट्रीडिश एवं बीकर, जल ऊष्मक, ऐल्कोहॉल एवं आयोडीन, माचिस।

सिद्धान्त – प्रकाशसंश्लेषण पौधों का एक महत्त्वपूर्ण जैविक प्रक्रम है जिसमें हरे पौधे अपनी पत्तियों में स्थित क्लोरोफिल की सहायता से वायुमंडलीय CO2, सूर्य का प्रकाश एवं जल (H2O) का उपयोग कर अपना भोजन (ग्लूकोज) संश्लेषित करते हैं।

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प्रकाशसंश्लेषण की अभिक्रिया में सूर्य का प्रकाश एक महत्त्वपूर्ण घटक है।

कार्यविधि –
(i) दो-तीन दिनों तक आप एक गमले को स्वच्छ पौधे के साथ अंधेरे में रखें। इससे उसकी पत्तियाँ पूरी तरह से स्टार्च रहित हो जाएगी।
(ii) इस पौधे के किसी एक पत्ती के बीचों-बीच का भाग गैनोंग लाइटस्क्रीन अथवा काला कागज द्वारा अच्छी तरह से ढंक दें।
(iii) अब इस पूरे गमले को 3-4 घंटों तक सूर्य के प्रकाश में छोड़ दें।
(iv) ढंकी हुई पत्ती को तोड़कर हटाने के उपरान्त गैनोंग का लाइटस्क्रीन या काला कागज हटा दें।
(v) अब इस पत्ती को बीकर में रखे पानी में लगभग 10 मिनट तक अच्छा तरह उबालें।
(vi) अब एक दूसरे बीकर में ताजा ऐल्कोहॉल लें तथा उबली हुई पत्ता का इसमें पूरी तरह डूबो दें।
(vii) अब ऐल्कोहॉल वाले बीकर को जलऊष्मक पर लगभग 15 मिनट तक अच्छी तरह उबालें। इससे पत्ती का संपूर्ण क्लोरोफिल बाहर निकल जाएगा तथा पत्ती रंगहीन हो जाएगी ।
(viii) पत्ती को ऐल्कोहॉल से निकालकर स्वच्छ जल से धो लें तथा पेट्रीडिश से सारा जल गिरा दें। अब इस पत्ते पर आयोडीन का विलयन डालें तथा रंग परिवर्तन का ध्यानपूर्वक देखें।

पत्ती को ऐल्कोहॉल से निकालकर स्वच्छ जल से धो लें

20. प्रायोगिक विवरण द्वारा बताएँ कि प्रकाश संश्लेषण की क्रिया में ऑक्सीजन गैस मुक्त होती है।

उत्तर⇒ उद्देश्य प्रयोग द्वारा यह दर्शाना कि प्रकाश संश्लेषण की क्रिया में ऑक्सीजन गैस मुक्त होती है।

आवश्यक उपकरण एवं सामग्री – एक बीकर, test tube, funnel और एक जलीय पौधे जैसे—हाइड्रिला।

सिद्धांत – प्रकाश संश्लेषण एक जैव रासायनिक प्रक्रिया है, जिसमें पौधे सूर्य के प्रकाश और क्लोरोफिल की उपस्थिति में कार्बनडाइऑक्साइड (CO2) और जल (H2O) का उपयोग कर अपना भोजन (ग्लूकोस) का निर्माण करते हैं।

पत्ती को ऐल्कोहॉल से निकालकर स्वच्छ जल से धो लें

इस प्रक्रिया के अंत में ऑक्सीजन गैस मुक्त होती है।

कार्यविधि –
(i) एक बीकर में 2/3 भाग पानी लेंगे।
(ii) हाइड्रिला के पौधे को पानी में डाल देंगे और उसे Funnel से ढंक देंगे।
(iii) एक test tube में पानी भरकर उसे funnel के ऊपर उल्टा रख देंगे।
(iv) इस पूरे उपकरण को सूर्य की रोशनी में रख देंगे।

अवलोकन –
(i) कुछ समय के बाद हम पाते हैं कि हाइड्रिला के कटे हुए भाग से गैस का बुलबुला निकल रहा है जो Test tube के ऊपरी भाग में एकत्रित हो रहा है। जिसके कारण पानी का स्तर test tube में नीचे की ओर चला जाता है।
(ii)एकत्रित गैस ऑक्सीजन है अथवा नहीं, इसे जानने के लिए जलती हुई माचिस की तीली ले जाते हैं तो हम पाते हैं कि तीली तेजी से जलने लगती है।

निष्कर्ष – इस प्रयोग से साबित होता है कि प्रकाश संश्लेषण की क्रिया ऑक्सीजन गैस मुक्त होती है।

अवलोकन

चित्र: प्रकाश संश्लेषणकी क्रिया से ओक्सीजन गैस मुक्त होती है ।


21. स्तनधारी तथा पक्षियों में ऑक्सीजनित तथा विऑक्सीजनित रुधिर को अलग करना क्यों आवश्यक है ?

उत्तर⇒ स्तनधारी तथा पक्षियों का हृदय चार वेश्मी होता है। ऊपरी दो कक्ष दायाँ व बायाँ अलिन्द तथा निचले दोनों कक्ष दाहिना व बायाँ निलय कहलाते हैं। दाहिने अलिन्द में शरीर से आनेवाला अशुद्ध रुधिर एकत्र होता है जबकि बाएँ अलिन्द में फेफड़ों से आनेवाला शुद्ध रक्त एकत्र होता है। इस प्रकार से शुद्ध रुधिर व अशुद्ध रुधिर आपस में मिल नहीं पाते। रुधिर के दोनों प्रकार के न मिलने से ऑक्सीजन का वितरण सही तरीके से संभव हो पाता है। इस प्रकार का रुधिर संचरण विशेष रूप से उन जंतुओं के लिए अधिक लाभदायी है जिन्हें दैनिक कार्यों के लिए अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। ऊर्जा की अधिक आवश्यकता शरीर के तापक्रम को सम बनाए रखने के लिए होती है।


22. वायवीय तथा अवायवीय श्वसन में क्या अंतर जीवों के नाम लिखिए जिनमें अवायवीय श्वसन होता है।

अथवा, ऑक्सी एवं अनॉक्सी श्वसन में अन्तर लिखें एवं अनॉक्सी श्वसन की क्रियाविधि लिखें।

उत्तर ⇒

वायवीय श्वसनअवायवीय श्वसन
(i) खाद्य पदार्थों के विश्लेषण के लिए ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है।(i) इस प्रकार के श्वसन में ऑक्सीजन की आवश्यकता नहीं होती।
(ii) कोशिका के कोशिका द्रव्य में वाली क्रिया ग्लाइकोलिसिस कहलाती है जबकि माइटोकॉण्ड्यिा में होने वाली श्वसनीय क्रियाक्रैब चक्र कहलाती है।(ii) यह क्रिया केवल कोशिका द्रव्य में होने ही होती है।
(iii) इस क्रिया में 38 ATP अणु निर्मित होते हैं।(iii) इस क्रिया में A.T.P के केवल दो अणु ही बनते हैं।
(iv) इस क्रिया में अन्तिम उत्पाद CO2तथा जल होता है।(iv) इस क्रिया के अन्तिम उत्पाद इथाइल ऐल्कोहॉल तथा कार्बन डाइऑक्साइड है।
(v) यह क्रिया सभी जीवधारियों में पायी जाती है(v) यह क्रिया कुछ ही जीवधारियो जी पायी जाती है।
(vi) इस क्रिया में खाद्य पदार्थ का पूर्णरूप से अपचयन होता है।(vi) इस क्रिया में भोजन रूप से अपचयन होता है।

23. डायलिसिस की प्रक्रिया को चित्र सहित समझाएँ।

उत्तर⇒कई बार विपरीत परिस्थितियों के कारण गुर्दे अपना कार्य सही ढंग से नहीं कर पाते हैं। शरीर में बनने वाला यूरिया तथा अन्य उत्सर्जी पदार्थों को यह रक्त से छानने में समर्थ नहीं होते जिससे रक्त में विषैले पदार्थ बढ़ने लगते हैं। तब हम डायलिसिस यंत्र का प्रयोग करना पड़ता है जिससे रक्त का शुद्धिकरण किया जाता है। इस यंत्र में रक्त सेलोफोन झिल्ली की बनी नलिकाओं में बहता है। इन नलिकाआ के बाहर रक्त का समपरासी लवण द्रव को बहाया जाता है। तब नलिकाओं के अंदर बहते रक्त से उत्सर्जी पदार्थ अलग होकर यंत्र के द्रव में आ जाते हैं और रक्त यूरिया व अन्य उत्सर्जी पदार्थों से मुक्त हो जाता है। इस क्रिया के बाद रक्त को शरीर में वापस भेज दिया जाता है ।

रक्त कोशिकाओं

24. मधुमेह के कुछ रोगियों की चिकित्सा इंसलिन का इंजेक्शन देकर क्यों की जाती है ?

उत्तर⇒ यह अति आवश्यक है कि हॉर्मोन का स्रावण परिशुद्ध मात्रा में हो। इसके लिए एक सही क्रियाविधि की आवश्यकता होती है जिससे यह कार्य संपन्न हो। स्रावित होने वाले हॉर्मोन का समय और मात्रा का नियंत्रण पुनर्भरण क्रियाविधि (leedback mechanism) द्वारा किया जाता है। इसलिए इससे रुधिर में शर्करा स्तर बढ़ जाता है तो इसे अग्न्याशय (pancreas) की कोशिका संसूचित कर लेती है तथा इसकी अनुक्रिया में अधिक इंसुलिन नावित करती है। जब रुधिर में शर्करा स्तर कम हो जाता है तो इंसुलिन का स्रवण कम हो जाता है। अग्न्याशय (pancreas) की कोशिकाएँ-लैंगरहैंस द्वीपिकाओं (Islets of Langerhans) के हॉर्मोन रक्त में ग्लूकोज की उचित मात्रा को जब नहीं नियंत्रित कर पाते तब मधुमेह नामक रोग हो जाता है। इसीलिए रक्त में ग्लूकोज की उचित मात्रा हेतु कुछ रोगियों को मधुमेह में इंसुलिन का इंजेक्शन देकर चिकित्सा की जाती है।


25. फुफ्फुस में कूपिकाओं की तथा वृक्क में वृक्काणु (नेफ्रॉन) की रचना तथा क्रियाविधि की तुलना कीजिये।

उत्तर⇒ फुफ्फुस की कूपिकाओं की व वृक्क में वृक्काणु की रचना तथा क्रियाविधि का तुलनात्मक अंतर –

फुफ्फुस की कूपिकावृक्क के वृक्काणु
(i) एक वयस्क फुफ्फुस में लगभग 30 करोड़ कूपिकाएँ होती है।(i) एक वृक्क में लगभग दस लाख वृक्काणु है।
(ii) कूपिकाएँ गैसीय विनिमय के लिए वृहद् सतह बनाती हैं।(ii) वृक्काणु रुधिर को शुद्ध करने लिए एक वृहद् सतह बनाती हैं।
(iii) कूपिकाओं में फैली हुई रुधिर कोशिकाओं के जाल से CO2 और 02 का आदान – प्रदान होता है।(iii) वृक्काणु के बोमैन संपुट में रुधिर छनता है जिसमें कि जल और लवणों की सांघ्रता का नियमन होता है।

26. (i) अत्यधिक व्यायाम के दौरान खिलाड़ी के शरीर में क्रैंप होने लगता है। क्यों ?
      (ii) जब एड्रिनलीन हारमोन रुधिर में मिल जाता है, तो शरीर में क्या अनुक्रिया होती है ?

उत्तर⇒ (i) अत्यधिक व्यायाम के समय खिलाड़ियों की मांसपेशियों में कैम्प होने का कारण यह है कि अत्यधिक व्यायाम के कारण मांसपेशियों में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है जिससे ग्लूकोज के विघटन से प्राप्त प्रथम उत्पाद पायरुवेट तीन कार्बन युक्त लैक्टिक अम्ल में परिवर्तित हो जाता है । इसी लैक्टिक अम्ल.के मांसपेशियों में एकत्रित होने के कारण क्रेम्प उत्पन्न होने लगते हैं।

(ii) एड्रीनलीन रुधिर में स्रावित हो जाता हैं और शरीर के विभिन्न भागों तक पहुँचा दिया जाता है । हृदय सहित, अन्य अंगों तक तथा विशिष्ट ऊतकों पर यह कार्य करता है । इस कारणवश हृदय की धड़कन बढ़ जाती है, ताकि हमारी पेशियों में अधिक ऑक्सीजन की आपूर्ति हो सके। पाचन तंत्र तथा त्वचा में रुधिर की आपूर्ति कम हो जाती है, क्योंकि इन अंगों की छोटी धमनियों के आसपास की पेशियाँ सिकुड़ जाती हैं । यह रुधिर की दिशा हमारी कंकाल पेशियों की ओर कर देता है। डायफ्राम तथा पसलियों की पेशी के संकुचन से श्वसन दर भी बढ़ जाती है। यह सभी अनुक्रियाएँ मिलकर जंतु शरीर को स्थिति से निपटने के लिए तैयार करती हैं। ये जंतु हॉर्मोन अंतःस्रावी ग्रंथियों का भाग हैं जो हमारे शरीर में नियंत्रण एवं समन्वय का दूसरा मार्ग है।


27. मनुष्य के कतर्नक दाँत का चित्र बनाएँ।

मनुष्य के कतर्नक दाँत का चित्र बनाएँ

उत्तर⇒


28. मानव हृदय का एक स्वच्छ नामांकित चित्र बनाएँ। वर्णन की आवश्यकता नहीं है।

उत्तर⇒

चित्र: मनुष्य के हृदय की आंतरिक रचना


चित्र: मनुष्य के हृदय की आंतरिक रचना


29. अमीबा में पोषण की प्रक्रिया को चित्र के साथ समझाइए।

उत्तर⇒अमीबा में भोजन का अंतर्ग्रहण शरीर की किसी भी सतह से हो सकता है। अमीबा का शरीर जैसे ही किसी भोजन के संपर्क में आता है, उस दिशा में कूटपाद (Pseudopodia) तेजी से बढ़ने लगते हैं, तथा भोजन को चारों तरफ घेर लेते हैं।

 चित्र अमीबा में अपचे भोजन का बहिष्करण

धीरे-धीरे कूटपादों के शीर्ष तथा पार्श्व आपस में युग्मित हो जाते हैं तथा एक पर्ण भोजन रसधानी का निर्माण होता है। अमीबा में अंतः कोशिकीय पाचन होता बीपचा हआ भोज्य पदार्थ भोजन रसधानी से कोशिका द्रव्य में विसरित हो जाता है तथा पूरे शरीर में स्वांगीकृत हो जाता है


30: मनुष्यों में ऑक्सीजन तथा कार्बन डाइऑक्साइड का परिवहन कैसे होता है?

उत्तर⇒ श्वसन की दो अवस्थाएं प्रश्वास (inspiration) तथा उच्छवास (expiration) मिलकर श्वासोच्छ्वास (breathing) कहलाते हैं। प्रश्वास द्वारा वायमंडलीय हवा नासिका तथा श्वसन से होती हुई फफड़ों की वायु कोष्ठिकाओं में पहुँच जाती के विभिन्न भागों में अनाक्साकृत रक्त (deoxygenated blood) पहले हृदय में पहुंचता है जहाँ से इसे फेफड़े में भेज दिया जाता है। यह रक्त शिरीय रक्त (Tvenous blood) भी कहलाता ह। शिराय रक्त फेफडे की वाय कोशिकाओं के चारों ओर स्थित रक्त कोशिकाओं में पहुंच जाता है। रक्त कोशिकाओं में शिरीय रक्त में वायमण्डलीय हवा से जो कि वायु कोष्ठिकाओं में होता है, ऑक्सीजन की मात्रा बहत कम होती है। अतः यहाँ ऑक्सीजन का आंशिक दबाव बहत अधिक होता है जिसके फलस्वरूप ऑक्सीजन का विसरण (diffusion) वाय कोष्ठिकाओं से शिरीय रक्त में हो जाता है। यहाँ लाल रुधिर कोशिकाओं (RBC) के हीमोग्लोबिन (haemoglobin) ऑक्सीजन से संयोजन कर ऑक्सीहीमोग्लोबिन (oxyhaemoglobin) परिवर्तित हो जाते हैं और यह रुधिर संचरण द्वारा शरीर के विभिन्न भागा मस्थित कोशिकाओं में पहुँच जाते हैं। ऑक्सीहीमोग्लोबिन पुनः टूटकर हीमोग्लोबिन और ऑक्सीजन बनाता है। यह ऑक्सीजन भोजन अणुओं को ऑक्सीकृत कर ऊर्जा उत्पादन करता है। इधर उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड विसरण द्वारा कोशाओं से रुधिर कोशिकाआ के रक्त में पहुँचता है। यह रुधिर के हीमोग्लोबिन से संयोजन कर कार्बोक्सीहीमोग्लोबिन (carboxyhaemoglobin) बनाते हैं जो परिसंचरण द्वारा इसी रूप में फेफड़ों में पहँचता है। फेफड़ों की शिरीय रुधिर कोशिकाओं में कार्बन डाइऑक्साइड के आंशिक दबाव अधिक होने के कारण इसका विसरण वायु कोष्ठिकाओं में हो जाता है। यहाँ से उच्छ्वास द्वारा इसे श्वासनली तथा नासिका द्वारा बाहर निकाल दिया जाता है।

ऑक्सीजन तथा कार्बन डाइऑक्साइड के परिवहन तथा विनिमय का व्यवस्थात्मक निरूपण

चित्र: ऑक्सीजन तथा कार्बन डाइऑक्साइड के परिवहन तथा विनिमय का व्यवस्थात्मक निरूपण


31. रक्त और लसिका में अंतर लिखें।

उत्तर⇒ रक्त और लसिका में निम्नलिखित अंतर हैं-

रक्त (Blood)लसीका (Lymph)
(i) रक्त का रंग लाल होता है।(i) लसीका रंगहीन या हल्के पीले रंग की होती है।
(ii) रक्त में लाल रक्त कोशिकाएँ (RBC) पाई जाती हैं।(ii) लसीका में लाल रक्त कोशिकाएँ (RBC) नहीं पाई जाती हैं।
(iii) रक्त वाहिनियाँ में प्रवाहित होती है।(iii) लसीका कोशिकाओं के बीच स्थित स्थानों में प्रवाहित होती है।
(iv) रक्त में प्रोटीन की मात्रा ज्यादा होती है।(iv) लसीका में रक्त की अपेक्षा प्रोटीन की मात्रा कम होती है।

32. उत्सर्जी उत्पाद से छुटकारा पाने के लिए पादप किन विधियों का उपयोग करते हैं ?

उत्तर⇒ पौधों में उत्सर्जन के लिए विभिन्न तरीके होते हैं । जैसे-

(i) श्वसन क्रिया से निष्कासित कार्बन डाइऑक्साइड गैस व प्रकाशसंश्लेसन से निष्कासित ऑक्सीजन गैस विसरण क्रिया द्वारा पत्तियों के रंध्रो एवं अन्य भागों में स्थित वातरंध्रों द्वारा उत्सर्जित होती है।

(ii) बहुत से पौधे कार्बनिक अपशिष्टों या उत्सर्जी पदार्थों को बनाते हैं जो उनकी मृत कोशिकाओं (जैसे-अंतः काष्ठ) में संचयित रहते हैं। जैसे—रेजिन एवं गोंद पुराने जाइलम में होता है।

(iii) कुछ पधि उत्सर्जी पदार्थों को अपनी पत्तियों व छाल में भी संचित करते हैं। जैसे-टैनिन वृक्षों की छाल में संचित रहता है।

(iv) कुछ पौधों में उत्सर्जी पदार्थ गाढे, दधिया तरल के रूप में संचित रहता है जिसे लैटेक्स (latex) कहते हैं। उदाहरण पीपल, बरगद, कनेर इत्यादि।
(v) जलीय पौधे उत्सर्जी पदार्थों को विसरण द्वारा सीधे जल में निष्कासित करते हैं।


33. जल-संतुलन क्या है ? यह मनष्य में कैसे होता है ?

उत्तर⇒ शरीर में जल की संतुलित मात्रा का होना भी अनिवार्य है। शरीर में जल की मात्रा का संतुलन जिस क्रिया के द्वारा होता है, उसे ‘जल-संतुलन’ कहते हैं।
वृक्क शरीर के उत्सर्जन के साथ-साथ शरीर के प्रयोजन के अनुसार मूत्र को हाइपोटॉनिक या हाइपरटोनिक बनाकर जल तथा लवणों की मात्रा का नियंत्रण करता है, क्योंकि जब शरीर में जल की मात्रा अधिक हो जाती है तब वृक्क को हाइपोटोनिक मूत्र त्याग करना होता है। जब शरीर में जल-संरक्षण करना होता है, तब इसे हाइपरटोनिक मूत्र त्याग करना होता है। यह क्रिया वृक्क के द्वारा संपन्न होती है।


34. ग्लूकोज के ऑक्सीकरण से विभिन्न जीवों में ऊर्जा प्राप्त करने के विभिन्न मार्ग क्या हैं ?

उत्तर⇒ ग्लूकोज के ऑक्सीकरण से भिन्न जीवों में ऊर्जा प्राप्त करने की दो परिस्थितियाँ संभव हैं –
(i) अवायवीय (anaerobic)-ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में ।
(ii) वायवीय (aerobic)-ऑक्सीजन की उपस्थिति में ।

सर्वप्रथम, इसे समझने के लिए हम एक चार्ट की मदद ले सकते हैं

ऑक्सीजन का

सभी अवस्थाओं में पहला चरण ग्लूकोज, एक छ: कार्बन वाले अणु का तीन कार्बन वाले अणु पायरुवेट में विखंडन है। यह प्रक्रम कोशिकाद्रव्य में होता है । इसके पश्चात् पायरुवेट इथेनॉल तथा कार्बन डायऑक्साइड में बदल सकता है । यह प्रक्रिया किण्वन के समय होता है व वायु (ऑक्सीजन) की अनुपस्थिति में होता है। इसे इसलिए अवायवीय (anaerobic) श्वसन कहते हैं। पायरुवेट का विखंडन ऑक्सीजन का उपयोग करके माइट्रोकोण्ड्रिया में होता है । चूँकि यह वायु की उपस्थिति में होता है, इसलिए इसे वायवीय (aerobic) श्वसन कहते हैं । कोशिकीय श्वसन द्वारा मोचित ऊर्जा तत्काल ही ए०टी०पी० (ATP) नामक अणु के संश्लेषण में प्रयुक्त हो जाती है जो कि अन्य क्रियाओं के लिए ईंधन की तरह प्रयुक्त होती है।

35. जीवधारियों में पोषण की आवश्यकता क्यों होती है ? कोई पाँच कारण लिखिए ।

उत्तर ⇒ वह विधि जिसके द्वारा पोषक तत्वों को ग्रहण कर उसका उपयोग करते हैं पोषण कहलाता है।

जीवधारियों में पोषण की आवश्यकता निम्नलिखित कारण से जरूरी है –

(i) ऊर्जा – पोषण से जीवों को ऊर्जा की वाद्य आपूर्ति होना आवश्यक है, नहीं तो जीवों का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा।

(ii) जैविक क्रियाओं – जैविक क्रियाओं के संपादन हेतु ऊर्जा की आवश्यकता होती है। यह ऊर्जा की प्राप्ति पोषण के द्वारा होता है।

(iii) कोशिकाओं के निर्माण एवं मरम्मत – नई कोशिकाओं और ऊतकों के निर्माण एवं ऊतकों की टूट-फूट की मरम्मत हेतु नये जैव पदार्थों का संश्लेषण भी भोजन के द्वारा ही प्राप्त होता है।

(iv) स्व-पोषण – स्व-पोषण में जीव सरल अकार्बनिक तत्वों से प्रकाश संश्लेषण प्रक्रम द्वारा अपने भोजन का संश्लेषण स्वयं करते हैं।

(v) पर-पोषण-पर –पोषण में जीव अपना भोजन अन्य जीवों से जटिल और ठोस पदार्थ के रूप में प्राप्त करते हैं।


36. मनष्य के उत्सर्जी तंत्र का सचित्र वर्णन कीजिए।

वायवीय श्वसन (ऑक्सी श्वसन)—इस प्रकार के श्वसन में अधिकांश प्राणी ऑक्सीजन का उपयोग करके

उत्तर ⇒ वृक्क एवं इसके अनेक सहायक अंग मनुष्य के उत्सर्जी तंत्र कहते हैं वृक्क उत्सर्जन तंत्र का प्रमुख अंग है जो केवल उत्सर्जी पदार्थों को उपयोग पदार्थों से छानकर अलग कर देता है । वृक्क भूरे रंग का, सेम के बीज के आकारकी संरचनाएँ हैं, जो कि उदरगुहा में कशेरूक दंड के बायाँ वृक्क धमनी दोनों तरफ होती है। प्रत्येक वृक्क लगभग 10 सेमी लंबा, 6 सेमी चौड़ा और 2.5 सेमी० बायाँ वृक्क मोटा होता है । यकृत की वजह बायीं वृक्क शिरा से दायाँ वृक्क का बाहरी महाधमनी किनारा उभरा हुआ होता है बायीं जबकि भीतरी किनारा सा महाशिरा मूत्रवाहिनी होता है जिसे हाइलम कहते हैं और इसमें से मूत्र नलिका निकलती है। मूल नलिका जाकर एक पेशीय थैले जैसी (शिश्न में) संरचना में खुलती है जिसे मूत्राशय कहते हैं।


37. ग्लूकोज के ऑक्सीकरण से भिन्न जीवों में ऊर्जा प्राप्त करने के विभिन्न पथ क्या हैं ?

उत्तर ⇒ श्वसन एक जटिल पर अति आवश्यक प्रक्रिया है । इसमें ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड का आदान-प्रदान होता है तथा ऊर्जा मुक्त करने के लिए खाद्य का ऑक्सीकरण होता है।

C6H120+60→ 6C02 +6H20 + ऊर्जा

श्वसन एक जैव रासायनिक प्रक्रिया है । श्वसन क्रिया दो प्रकार की होती है—

(i) वायवीय श्वसन (ऑक्सी श्वसन) – इस प्रकार के श्वसन में अधिकांश प्राणी ऑक्सीजन का उपयोग करके श्वसन करते हैं। इस प्रक्रिया में ग्लूकोज पूरी तरह से कार्बन डाइऑक्साइड और जल में विखंडित हो जाता है।

वायवीय श्वसन (ऑक्सी श्वसन)—इस प्रकार के श्वसन में अधि

चूँकि यह प्रक्रिया वायु की उपस्थिति में होती है, इसलिए इसे वायवीय श्वस कहते हैं।

(ii) अवायवीय श्वसन (अनॉक्सी श्वसन) –यह श्वसन प्रक्रिया ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में होती है । जीवाणु और यीस्ट इस क्रिया से श्वसन करते हैं। इस प्रक्रिया में इथाइल ऐल्कोहॉल CO, तथा ऊर्जा उत्पन्न होती है।

इड और जल में विखंडित हो जाता है।
अवायवीय श्वसन (अनॉक्सी श्वसन) -यह श्वसन प्रक्रिया ऑक्सीजन की अ

(iii) ऑक्सीजन की कमी हो जाने पर कभी – कभी हमारी पेशी कोशिकाओं में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। पायरूवेट के विखंडन के लिए दूसरा रास्ता अपनाया जाता है। तब पायरूवेट एक अन्य तीन कार्बन वाले अणु लैक्टिक अम्ल में बदल जाता है। इसके कारण कैम्प हो जाता है।


38. मनुष्य के हृदय की संरचना और क्रिया विधि समझाइए।

मनुष्य के हृदय की संरचना और क्रिया विधि समझाइए।

उत्तर ⇒

संरचना – मनुष्य का हृदय चार भागों में कोष्ठों में बँटा रहता है-अग्र दो भाग आलिंद कहलाते हैं। इनसे एक बायाँ आलिंद तथा दूसरा दायाँ आलिंद होता है। पश्व दो भाग निलय कहलाता है जिनमें एक बायाँ निलय तथा दूसरा दायाँ निलय होता है । बाँयें आलिंद एवं बाँयें निलय के बीच त्रिवलनी कपाट तथा दाएँ आलिंद एवं दाएँ निलय के बीच त्रिवलीन कपाट होते हैं। ये वाल्व निलय की ओर खुलते हैं । बाएँ निलय का संबंध अर्द्धचंद्राकार द्वारा महाधमनी से तथा दाएँ निलय का संबंध अर्द्धचंद्राकार कपाट द्वारा फुफ्फुस धमनी से होता है। दाएँ आलिंद से महाशिरा आकर मिलती है तथा बाएँ आलिंद से फुफ्फुस शिरा आकर मिलती है।

हृदय की क्रियाविधि – हृदय के आलिंद व निलय में संकुचन व शिथिलन दोनों क्रियाएँ होती हैं। यह क्रियाएँ एक निश्चित क्रम में निरंतर होती हैं। हृदय की एक धड़कन या स्पंदन के साथ एक कर्डियक चक्र पूर्ण होता है।

एक चक्र में निम्नलिखित चार अवस्थाएँ होती हैं –

(i) शिथिलन –इस अवस्था में दोनों आलिंद शिथिलन अवस्था में रहते हैं और रुधिर दोनों आलिंदों में एकत्रित होता है।

(i) आलिंद संकुचन – आलिंदों के संकुचित होने को आलिंद संकुचन कहते हैं । इस अवस्था में आलिंद निलय कपाट खुल जाते हैं और आलिंदों से रुधिर निलयों में जाता है। दायाँ आलिंद सदैव बाँयें आलिंद से कुछ पहले संकुचित होता है।

(iii) निलय संकुचन – निलयों के संकुचन को निलय संकुचन कहते हैं, जिसके फलस्वरूप आलिंद-निलय कपाट बंद हो जाते हैं एवं महाधमनियों के अर्द्धचंद्राकार कपाट खुल जाते हैं और रुधिर महाधमनियों में चला जाता है।

(iv) निलय शिथिलन – संकुचन के पश्चात् निलयों में शिथिलन होता है और अर्द्धचंद्राकार कपाट बंद हो जाते हैं। निलयों के भीतर रुधिर दाब कम हो जाता है जिससे आलिंद निलय कपाट खुल जाते हैं।


39. मनुष्यों में पाचन की प्रक्रिया का विवरण दीजिए।

उत्तर ⇒ मनुष्यों में पाचन क्रिया मनुष्य की पाचन क्रिया निम्नलिखित चरणों में विभिन्न अंगों में पूर्ण होती है

(i) मुखगुहा में पाचन – मनुष्य मुख के द्वारा भोजन ग्रहण करता है । मुख में स्थित दाँत भोजन के कणों को चबाते हैं जिससे भोज्य पदार्थ छोटे-छोटे कणों में विभक्त हो जाता है। लार-ग्रंथियों से निकली लार भोजन में अच्छी तरह से मिल जाती है। लार में उपस्थित एंजाइम भोज्य पदार्थ में उपस्थित मंड (स्टार्च) को शर्करा (ग्लूकोज) में बदल देता है। लार भोजन को लसदार चिकना और लुग्दीदार बना देती है, जिससे भोजन ग्रसिका में से होकर आसानी से आमाशय में पहुंच जाता है ।

(ii) आमाशय में पाचन क्रिया – जब भोजन आमाशय में पहुँचता है तो वहाँ भोजन का मंथन होता है जिससे भोजन और छोटे-छोटे कणों में टूट जाता है। भोजन में नमक का अम्ल मिलता है जो माध्यम को अम्लीय बनाता है तथा भोजन को सडने से रोकता है। आमाशयी पाचक रस में उपस्थित एंजाइम प्रोटीन को छोटे-छोटे अणुओं में तोड़ देते हैं।

आमाशय में पाचन क्रिया - जब भोजन आमाशय में पहुँचता है

(iii) ग्रहणी में पाचन – आमाशय में पाचन के बाद जब भोजन ग्रहणी में पहुँचता है तो यकृत में आया पित्त रस भोजन से अभिक्रिया करके वसा का पायसीकरण कर देता है तथा माध्यम को क्षारीय बनाता है जिससे अग्नाशय से आये पाचक रस में उपस्थित एंजाइम क्रियाशील हो जाते हैं और भोजन में उपस्थित प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट एवं वसा का पाचन कर देते हैं।

(iv) क्षुद्रात्र में पाचन – ग्रहणी में पाचन के बाद जब भोजन क्षुद्रांत्र में पहुँचता है तो वहाँ आंत्र रस में उपस्थित एंजाइम बचे हुए अपचित प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट तथा वसा का पाचन कर देते हैं। आस्त्र की विलाई द्वारा पचे हुए भोजन का अवशोषण कर लिया जाता है तथा अवशोषित भोजन रक्त में पहुंचा दिया जाता है।

(v) बड़ी आंत्र (मलाशय) में पाचन – क्षुद्रांत्र में भोजन के पाचन एवं अवशोषण के बाद जब भोजन बडी आंत्र में पहुँचता है तो वहाँ पर अतिरिक्त जल का अवशोषण कर लिया जाता है. बडी आंत्र में भोजन का पाचन नहीं होता। भोजन का अपाशष्ट (अतिरिक्त) भाग यहाँ पर एकत्रित होता रहता है तथा समय-समय पर मल द्वारा शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है।


40. स्टोमेटा के खुलने और बंद होने की प्रक्रिया का सचित्र वर्णन कीजिए।

उत्तर ⇒ रुधिरों का खुलना एवं बंद होना रक्षक कोशिकाओं की सक्रियता पर निर्भर करता है। इसकी कोशिका भित्ति असमान मोटाई की होती है। जब यह कोशिका स्फीति दशा में होती है तो छिद्र खलता है व इसके ढीली हो जाने पर यह बंद हो जाता है। ऐसा इसलिए होता है कि क्योंकि द्वार कोशिकाएं आस-पास की कोशिकाओं से पानी को अवशोषित कर स्फीति की जाती है। इस अवस्था में कोशिकाओं में पतली भित्तियां फैलती हैं, जिसके कारण छिद्र के पास मोटी भित्ति बाहर का और खिंचती है, फलतः रंध्र खल जाता है। जब इसमें पानी की कमी हो जाती है तो तनाव मुक्त पतली भित्ति पनः अपनी पुरानी अवस्था में आ जाता है, फलस्वरूप छिद्र बंद हो जाता है।
प्रकाश-संश्लेषण के दौरान पत्तियों में कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर गिरता जाता है और शर्करा का स्तर रक्षक कोशिकाओं के कोशिका द्रव्य में बढ़ता जाता है। फलस्वरूप परासरण दाब और स्फीति दाब में परिवर्तन हो जाता है । इससे रक्षक कोशिकाओं में एक कसाव आता है जिससे बाहर की भित्ति बाहर की ओर खिंचती है। इससे अंदर की भित्ति भी खिंच जाती है। इस प्रकार स्टोमेटा चौड़ा हो जाता है अर्थात् खुल जाता है।
अंधकार में शर्करा स्टार्च में बदल जाती है जो अविलेय होती है। रक्षक कोशिकाओं को कोशिका द्रव्य में शर्करा का स्तर गिर जाता है। इससे रक्षक कोशिकाएँ ढीली पड़ जाती हैं। इससे स्टोमेटा बंद हो जाता है।

है। इससे रक्षक कोशिकाएँ ढीली पड़ जाती हैं। इससे स्टोमेटा बंद हो जाता है।

41. मानव श्वसन तंत्र का सचित्र वर्णन कीजिए।

उत्तर ⇒– मानव के श्वसन तंत्र का कार्य शुद्ध वायु को शरीर के भीतर भोजन तथा अशुद्ध वायु को बाहर निकलना हैं।

इसके प्रमुख भाग निम्नलिखित हैं –

(i) नासाद्वार एवं नासागहा – नासाद्वार से वायु शरीर के भीतर प्रवेश करती है । नाक में छोटे-छोटे और बारीक बाल होते हैं जिनसे वायु छन जाती है। उसकी धूल उनसे स्पर्श कर वहीं रुक जाती है इस मार्ग में श्लेष्मा की परत इस कार्य में सहायता करती है। वायु नम हो जाती है। ..

(ii) ग्रसनी – ग्रसनी ग्लॉटिस नामक छिद्र से श्वासनली में खुलती है। जब हम भोजन करते हैं तो ग्लॉटिस त्वचा के एक उपास्थियुक्त कपाट एपिग्लाटिस से ढंका रहता है।

(iii) श्वास नली – उपास्थित से बनी हुई श्वासनली गर्दन से नीचे आकर श्वसनी बनाती है। यह वलयों से बनी होती है तो सुनिश्चित करते हैं कि वायु मार्ग में रुकावट उत्पन्न न हो।

(iv) फुफ्फुस – फुफ्फुस के अंदर मार्ग छोटी और छोटी नलिकाओं में विभाजित हो जाते हैं जो गुब्बारे जैसी रचना में बदल जाता है। इसे कूपिका कहते हैं। कूपिका एक सतह उपलब्ध कराती है जिससे गैसों का विनिमय हो सकता है। कूपिकाओं । की भित्ति में रुधिर वाहिकाओं का विस्तीर्ण जाल होता है।

(v) कार्य – जब हम श्वास अंदर लेते हैं, हमारी पसलियाँ ऊर उठती हैं और १. हमारा डायाफ्राम चपटा हो जाता है। इससे वक्षगुहिका बड़ी हो जाती है और वायु फुफ्फुस के भीतर चूस ली जाती है । वह विस्तृत कूपिकाओं को ढक लेती है । रुधिर शेष शरीर से कार्बन डाइऑक्साइड कूपिकाओं में छोड़ने के लिए लाता है। कूपिका

रुधिर वाहिका का रुधिर कूपिका वायु से ऑक्सीजन लेकर शरीर की सभी कोशिकाओं तक पहुँचाता है । श्वास चक्र के समय जब वायु अंदर और बाहर होती । है, फफ्फस सदैव वायु का विशेष आयतन रखते हैं जिससे ऑक्सीजन के अवशोषण । तथा कार्बन डाइऑक्साइड के मोचन के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है।


42. पादप में जल और खनिज लवण का वहन कैसे होता है ?

अथवा, पादप में भोजन का स्थानांतरण कैसे होता है ?

उत्तर ⇒ पादप शरीर के निर्माण के लिए आवश्यक जल और खनिज लवणा को अपने निकट विद्यमान मिट्टी से प्राप्त करते हैं

(i) जल – हर प्राणी के लिए जल जीवन का आधार है। पौधों में जल जाइलम ऊतकों के द्वारा अन्य भागों में जाता है। जड़ों में धागे जैसी बारीक रचनाओं की बहुत बड़ी संख्या होती है। इन्हें मलरोम कहते हैं। ये मिटटी में उपस्थित पानी से साध संबंधित होते हैं । मलरोग में जीव द्रव्य की सांद्रता मिटटी में जल के घोल की अपक्षा आधक होती है । परासरण के कारण पानी मलरोमों में चला जाता है पर इसस मूलराम के जीव द्रव्य की सांद्रता में कमी आ जाती है और वह अगली कोशिका म चला जाता है। यह क्रम निरंतर चलता रहता है जिस कारण पानी जाइलम वाहिकाओं में पहुँच जाता है। कुछ पौधों में पानी 10 सेमी. से 10) सेमी प्रति मिनट की गति से ऊपर चढ़ जाता है ।

पादप शरीर के निर्माण के लिए आवश्यक जल और

(ii) खनिज – पेड़-पौधों को खनिजों की प्राप्ति अजैविक रूप में करनी होती है। नाइट्रेट, फॉस्फेट आदि पानी में घुल जाते हैं और जड़ों के माध्यम से पौधों में प्रविष्ट हो जाते हैं। वे पानी के माध्यम से सीधा जड़ों से संपर्क में रहते हैं। पानी । और खनिज मिलकर जाइलम ऊतक में पहुँच जाते हैं और वहाँ से शेष भागों में चले जाते हैं। जल तथा अन्य खनिज-लवण जाइलम के दो प्रकार के अवयवों वाहिनिकाओं एवं वाहिकाओं से जड़ों से पत्तियों तक पहुंचाए जाते हैं। ये दोनों मृत तथा स्थूल कोशिका भित्ति से युक्त होती हैं । वाहिनिकाएँ लंबी, पतली, तुर्क सम कोशिकाएँ हैं जिनमें गर्त होते हैं। जल इन्हीं में से होकर एक वाहिनिका से दुसरी वाहिनिका में जाता है। पादपों के लिए वांछित खनिज, नाइट्रेट तथा फॉस्फेट अकार्बनिक लवणों के रूप में मूलरोम द्वारा घुलित अवस्था में अवशोषित कर जड़ में पहुंचाए जाते हैं। यही जड़ें जाइलम ऊतकों से उन्हें पत्तियों तक पहुँचाते हैं।

खनिज-पेड़-पौधों को खनिजों की प्राप्ति अजैविक रूप

43. रक्त क्या है? इसके संघटन का वर्णन कार्य के साथ करें।

उत्तर ⇒ रक्त एक तरल संयोजी ऊतक है जो उच्च बहकोशिकीय जन्तओं में एक तरल परिवहन माध्यम है, जिसके द्वारा शरीर के भीतर एक स्थान से दूसरे स्थानों में पदार्थों का परिवहन होता है।

मानव रक्त के दो प्रमुख घटक होते हैं –

(a) द्रव घटक, जिस प्लाज्मा कहते हैं एवं
(b) प्लाज्मा : यह हल्के पीले रंग का चिपचिपा द्रव है, जो आयतन के हिसाब सेपो रक्त का 55 प्रतिशत होता है। इसमें करीब 90% जल, 7% प्रोटीन,0.09% अकार्बनिक लवण, 0.18% ग्लूकोज, 0.5% वसा तथा शेष अन्य कार्बनिक पदार्थ विद्यमान होते हैं।
इनमें उपस्थित प्रोटीन को प्लाज्मा प्रोटीन कहते हैं, जिनमें प्रमुख हैं-फाइब्रिनोजन, प्रोओबिन तथा हिपैरिन। फाइब्रिनोजनरहित प्लाज्मा को सीरम कहते हैं।

(b) रक्त कोशिकाएँ : आयतन के हिसाब से रक्त कोशिकाएँ कुल रक्त का 45 प्रतिशत भाग हैं।

ये तीन प्रकार की होती हैं

(i) लाल रक्त कोशिका
(ii) श्वेत रक्त कोशिका तथा
(iii) रक्त पटिटकाण ।

(i) लाल रक्त कोशिका (Red Blood Cell/RBC) : इन्हें एरीथ्रोसाइट्स (erythrocytes) भी कहते हैं, जो उभयनतोदर डिस्क की तरह रचना होती हैं। इनमें केन्द्रक, माइटोकॉण्ड्रिया एवं अंतर्द्रव्यजालिका जैसे कोशिकांगों का अभाव होता है। इनमें एक प्रोटीन वर्णक हीमोग्लोबिन पाया जाता है, जिसके कारण रक्त का रंग लाल होता है। इसके एक अणु की क्षमता ऑक्सीजन के चार अणुओं से संयोजन की होती है। इसके इस विलक्षण गुण के कारण इसे ऑक्सीजन का वाहक कहते हैं। मनुष्य में इनकी जीवन अवधि 120 दिनों की होती है, और इनका निर्माण अस्थि-मज्जा में होता है। मानव के प्रति मिलीलीटर रक्त में इनकी संख्या 5-5.5 मिलियन तक होती है।

(ii) श्वेत रक्त कोशिका (White Blood Cell/WBC) : ये अनियमित आकार की न्यूक्लियसयुक्त कोशिकाएँ हैं। इनमें हीमोग्लोबिन जैसे वर्णक नहीं पाये जाते हैं, जिसके कारण ये रंगहीन होती हैं। इन्हें ल्यूकोसाइट्स (leucocytes) भी कहते हैं। मानव के प्रति मिलीलीटर में इनकी संख्या 5000-6000 होती है। संक्रमण की स्थिति में इनकी संख्या में वृद्धि हो जाती है।

ये दो प्रकार की होती है –

(a) ग्रैनुलोसाइट्स एवं  (b) एग्रैनुलोसाइट्स।

(a) ग्रैनुलोसाइट्स अपने अभिरंजन गुण के कारण तीन प्रकार की होती हैं –

(i) इयोसिनोफिल (ii) बसोफिल एवं (iii) न्यूट्रोफिल।

इनकी कोशिकाद्रव्य कणिकामय होती है। इयोसिनोफिल एवं न्यूट्रोफिल्स
फैगोसाइटोसिस द्वारा हानिकारक जीवाणुओं का भक्षण करते हैं।

(b) एग्रैनुलोसाइट्स दो प्रकार के होते हैं –

(i) मोनोसाइट्स एवं (ii) लिम्फोसाइट्स।

इनमें उपस्थित केन्द्रक में अनेक धुंडियाँ पाई जाती हैं। इनमें मोनोसाइट्स का कार्य भक्षण करना एवं लिम्फोसाइट्स का काम एंटिबॉडी का निर्माण करना होता है।

(iii) रक्त पट्टिकाणु (Blood Platlets) : ये बिम्बाणु या ओम्बोसाइट्स भी कहलाते हैं। ये रक्त का थक्का बनने (blood clotting) में सहायक होते हैं।

रक्त के कार्य – रक्त एक तरल संयोजी ऊतक है, क्योंकि वह अपने प्रवाह के दौरान शरीर के सभी ऊतकों का संयोजन करता है।

वैसे रक्त के तीन प्रमुख कार्य हैं –

(a) पदार्थों का परिवहन, (b) संक्रमण से शरीर की सुरक्षा एवं (c) शरीर के तापमान का नियंत्रण करना।

रक्त के निम्नलिखित अन्य कार्य हैं –

(a) यह फेफड़े से ऑक्सीजन को शरीर के विभिन्न भागों में परिवहन करता है।

(b) यह शरीर की कोशिकाओं से CO,को फेफड़े तक लाता है, जो श्वासोच्छ्वास के द्वारा बाहर निकल जाता है।


44. अग्न्याशय द्वारा स्त्रावित सभी पाचक रस की चर्चा करें।

उत्तर⇒ अग्न्याशय द्वारा निम्नलिखित पाचक एंजाइम स्रावित होते है— ट्रिप्सिन, काइमोट्रिप्सिन, एमाइलेज, लाइपेज तथा न्यूक्लियेज। ये सभी भोजन के पाचन में अहम भूमिका निभाते हैं

चित्र: 🔥🔥🔥🔥🔥
1. जंतुओं में नियंत्रण एवं समन्वय के लिए तंत्रिका तथा हॉर्मोन क्रियाविधि की तुलना तथा व्यतिरेक (contrast) कीजिये। 
उत्तर ⇒ जतुओं में नियंत्रण एवं समन्वय के लिए तंत्रिका तथा हॉर्मोन क्रियाविधि तुलना 
तंत्रिका क्रियाविधि 
हॉर्मोन क्रियाविधि
(i) एक एक्सॉन के अंत में विधुत आवेग का परिणाम है जो कुछ रसायनों का विमोचन कराता है।
(i) यह रक्त द्वारा भेजा गया रासायनिक संदेश है
(ii) सूचना अति तीव्र गति से आगे बढ़ती है
(ii) सूचना धीरे-धीरे गति करती है।
(iii) सूचना विशिष्ट एक या अनेक तंत्र कोशिकाओं, न्यूरॉनों आदि को प्राप्त होती है।
(iii) सूचना सारे शरीर को रक्त के माध्यम से प्राप्त हो जाती है जिसे कोई विशेष कोशिका या तंत्रों स्वयं प्राप्त कर लेता है।
(iv) इसे उत्तर शीघ्र मिल जाता है।
(iv) इसे उत्तर प्रायः धीरे-धीरे प्राप्त होता है।
(v) इसका प्रभाव कम समय तक रहता है। 
(v) इसका प्रभाव प्रायः देर तक रहता है।
 

2. जंतुओं में रासायनिक समन्वय कैसे होता है ? 
उत्तर⇒ जंतुओं में रासायनिक समन्वय कुछ रासायनिक यौगिकों द्वारा होता है जिन्हें हॉर्मोन कहते हैं। इनका स्राव शरीर की कुछ विशेष ग्रंथियों द्वारा होता है जिन्हें अंतःस्रावी ग्रंथियाँ (endocrine glands) कहते हैं। अंतःस्रावी ग्रंथियाँ नलिकाविहीन ग्रथियाँ (ductless glands) भी कहलाती हैं चूँकि इनमें नलिकाएँ नहीं होती। नलिकाविहीन होने के कारण ये ग्रंथियाँ अपने स्राव हॉर्मोन्स को सीधे रक्त परिसंचरण में मुक्त करती हैं। इन ग्रंथियों से स्रावित हॉर्मोन पहले ऊतक द्रव (tissue fluid) में विसरित हो जाता है। यहाँ से यह फिर रक्त कोशिकाओं (blood capillaries) में पहुँचता है और इस तरह रक्त परिसंचरण के द्वारा उन अंगों में पहुँच जाता है जहाँ इनकी जरूरत होती है। हॉर्मोन प्रेरक का कार्य करता है और जब यह रक्त परिसंचरण द्वारा अपने लक्ष्य अंगों तक पहुँचता है, तब यह उन अंगों में से कुछ विशेष परिवर्तनों को प्रेरित करता है। हॉर्मोन-नियंत्रण एवं समन्वय का प्रभाव अपेक्षाकृत धीरे–धीरे होता है, परंतु इससे उत्पन्न प्रभाव देर तक टिकता है। इनकी रासायनिक रचना जटिल होती है।

3. जब एडीनलीन रुधिर में स्त्रावित होती है तो हमारे शरीर में क्या अनुक्रिया होती है ? 
उत्तर⇒ एड्रीनलीन रुधिर में स्रावित हो जाता है और शरीर के विभिन्न भागों तक पहुँचा दिया जाता है। हृदय सहित, लक्ष्य अंगों तक तथा विशिष्ट ऊतकों पर यह कार्य करता है। इस कारणवश हृदय की धड़कन बढ़ जाती है, ताकि हमारी पेशियों में अधिक ऑक्सीजन की आपूर्ति हो सके। पाचन तंत्र तथा त्वचा में रुधिर की आपूर्ति कम हो जाती है, क्योंकि इन अंगों की छोटी धमनियों के आसपास की पेशियाँ सिकुड़ जाती हैं। यह रुधिर की दिशा हमारी कंकाल पेशियों की ओर कर देता है। डायफ्राम तथा पसलियों की पेशी के संकुचन से श्वसन दर भी बढ़ जाती है। ये सभी अनुक्रियाएँ मिलकर जंतु शरीर को स्थिति से निपटने के लिए तैयार करती हैं। ये जंतु हॉर्मोन अंत:स्रावी ग्रंथियों का भाग हैं जो हमारे शरीर में नियंत्रण एवं समन्वय का दूसरा मार्ग है। 

क्लास 10th विज्ञान नियंत्रण एवं समन्वय प्रश्न उत्तर
4. साइटोकाइनिन तथा एबिसिसिक एसिड के कार्यों की विवेचना करें। 
उत्तर⇒ साइटोकाइनिन के प्रमुख कार्य हैं
(i) यह कोशिका द्रव के विभाजन को प्रोन्नत करता है।
(ii) ये पत्तियों में जीर्णता को रोकते हैं। 
(iii) ये पौधों की पत्तियों को अधिक समय तक हरी तथा ताजी बनाये रखने में मदद करता है।
(iv) यह बीज प्रसुप्ति को खत्म कर बीज अंकुरण को प्रोत्साहित करता है। एबिसिसिक एसिड के प्रमुख कार्य हैं
(i) यह पौधों के फूलों, फलों एवं पत्तियों में विलगन को प्रोत्साहित करता है।
(ii) पत्तियों का मुरझाना एवं विलगन इसके द्वारा नित्रित होता है। 
(iii) यह कलियों की वृद्धि और बीजों का अंकुरण नहीं होने देता है।
(iv) इससे कोशिका विभाजन एवं कोशिका दीर्घन दोनों ही अवरुद्ध होता है।

5. थायरायड ग्रंथि की संरचना तथा उससे निकलने वाले हार्मोन के कार्यों का उल्लेख करें।
उत्तर ⇒ थायरायड ग्रंथि श्वास नली के दोनों ओर लैटिक्स के नीचे अवस्थित होती है। इस ग्रंथि के दोनों पिंड एक संयोजी ऊतक के साथ बँधे रहते हैं, जिसे इस्थमस कहते हैं। 
थायरायड ग्रंथि की संरचना तथा उससे निकलने वाले हार्मोन के कार्यों का उल्लेख करें।
चित्र : थायरायड ग्रंथि
थायरायड ग्रंथि से थाइराक्सिन नामक हार्मोन निकलता है। यह हमारे शरीर में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन एवं वसा के सामान्य उपापचय को नियंत्रित करता है। यह शरीर में ग्लाइकोलिसिस एवं ग्लूकोनियोजिनेसिस की प्रक्रिया को बढ़ाता है। 

6. तंत्रिका ऊतक कैसे क्रिया करता है ?
उत्तर ⇒क्लास 10th विज्ञान नियंत्रण एवं समन्वय प्रश्न उत्तर
चित्र : तंत्रिका कोशिका का चित्र
न्यूरॉन की संरचना – न्यूरॉन में एक तारा आकार कोशिकाय होता है जिसे साइटॉन कहते हैं। साइटॉन के अनेक पतले तंतुओं में से एक जो सबसे लंबा होता है, अक्ष या एक्सॉन (axon) कहलाता है। इसके अन्य शाखित व छोटे प्रवर्धन डेंड्राइट्स (dendrites) कहलाते हैं। एक्सॉन अपने अंतिम छोर पर स्वयं शाखित हो जाते हैं जो कि सूक्ष्म गाँठ जैसी रचना में समाप्त होती है, जिसे सूत्रयुग्मन गाँठे या साइनैप्टिक नॉब्स (synaptic knobs) कहते हैं। एक्सॉन के चारों ओर श्वेत चर्बीदार पदार्थों का (fatty substances) का आवरण होता है जिसे मेडुलरी या मायलिन शीथ कहते हैं। जहाँ मायलिन शीथ (Medullary or Mvelin sheath) नहीं होते, रेनवियर के नोड (nodes of Ranvier) कहलाते हैं। दो नोड्स के बीच के भाग को इंटरनोड कहते हैं। मायलिन शीथ के ऊपर एक पतली झिल्ली होती है जिसे न्यूरिलेमा (neurilemma) कहते हैं । यह चपटी तथा लंबवत् कोशिकाओं की बनी होती है जिन्हें श्वान कोशिका (Schwann cells) कहते हैं। जब एक्सॉन बहुत लंबा होता है तो वह तंत्रिका तंतु (nerve fibre) कहलाता है। 

7. छुई-मुई पादप की पत्तियों की गति, प्रकाश की ओर प्रवाह की गति से किस प्रकार भिन्न है ? 
उत्तर ⇒ छुई–मुई पौधों पर प्रकाशानुवर्तन गति का प्रभाव पड़ता है। पौधे का प्ररोह बहत धीमी गति से प्रकाश आने की दिशा में वृद्धि करते हैं लेकिन इसक पत्त स्पर्श की अनक्रिया के प्रति बहत अधिक संवेदनशील हैं। स्पर्श होने की सूचना इसक विभिन्न भागों को बहुत तेजी से प्राप्त हो जाती है। पादप इस सूचना को एक कोशिका से दूसरी कोशिका तक संचारित करने के लिए वैद्युत–रसायन साधन का उपयोग करते हैं। उसमें सूचनाओं के साधन के लिए कोई विशिष्टीकृत ऊतक नहीं होते इसलिए वे जल की मात्रा में परिवर्तन करके अपने पत्तों को सिकुड़कर उनका आकार बदल लेते हैं। 
छुई-मुई पादप की पत्तियों की गति, प्रकाश की ओर प्रवाह की गति से किस प्रकार भिन्न है  
चित्र : छुई–मुई का पौधा

8. छुई – मुई पादप में गति तथा हमारी टाँग में होने वाली गति के तरीके में क्या अंतर है ?
उत्तर ⇒ छुई–मुई में जंतु पेशी कोशिकाओं की तरह विशिष्टीकृत प्रोटीन तो नहीं होती लेकिन वे जल की मात्रा में परिवर्तन करके अपनी आकृति बदल लेती हैं, परिणामस्वरूप फूलने या सिकड़ने में उनका आकार बदल जाता है। अतः पौधा म केवल रासायनिक नियंत्रण होता है एवं तंत्रिकीय नियंत्रण बिलकुल भी नहीं पाया जाता है। मस्तिष्क के अग्रमस्तिष्क में साहचर्य के क्षेत्र पथक होते हैं जहा सवदा सूचनाओं का, अन्य ग्राही सूचनाओं एवं पहले से मस्तिष्क में एकत्र सूचनाओं का अथ लगाया जाता है। फिर निर्णय कर अनक्रिया तथा सचनाएँ प्रेरक क्षेत्र तक ऐच्छिक पेशी की गति को नियंत्रित करती हैं जैसे—हमारी टाँग की पेशियाँ। 

9. दो तंत्रिका कोशिकाओं (न्यरॉन) के मध्य अंतर्ग्रथन (सिनेप्स) में क्या होता है ?
उत्तर ⇒ हमारे पर्यावरण से सभी सचनाओं का पता कछ तंत्रिका कोशिकाओं के विशिष्टीकृत सिरों द्वारा लगाया जाता है। यह सूचना एक तंत्रिका कोशिका के द्रुमाकृतिक सिरे द्वारा उपार्जित की जाती है और एक रासायनिक क्रिया द्वारा यह एक विद्युत आवेग पैदा करती है। यह आवेग द्रमिका से कोशिकाकाय तथा वहाँ से तत्रिकाक्ष (एक्सॉन) में होता हुआ एक्सॉन के अंत में विद्युत आवेग कुछ रसायनों का विमोचन कराता है। यह रसायन रिक्त स्थान या सिनेप्स (सिनेप्टिक दरार) को पार करते हैं और अगली तंत्रिका कोशिका की द्रमिका में इसी तरह का विद्युत आवेग प्रारंभ करते हैं। इसी तरह का एक अंतर्ग्रथन (सिनेप्स) अंततः ऐसे आवेगों को तंत्रिका कोशिका से अन्य कोशिकाओं, जैसे कि पेशी कोशिकाओं या ग्रंथि तक ले जाता है एवं यह. शरीर में तंत्रिका आवेग की मात्रा की सामान्य योजना है। 
दो तंत्रिका कोशिकाओं (न्यरॉन) के मध्य अंतर्ग्रथन (सिनेप्स) में क्या होता है
चित्र : तंत्रिका पेशीय संधि

10. हमारे शरीर. में ग्राही का क्या कार्य है? ऐसी स्थिति पर विचार कीजिए जहाँ ग्राही उचित प्रकार से कार्य नहीं कर रहा हो, वहाँ क्या समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं ?
उत्तर ⇒ हमारे शरीर में त्वचा, पेशियों तथा अन्य अंगों को ग्राही अंग कहते हैं। इसका मुख्य कार्य विभिन्न प्रकार के उद्दीपनों को ग्रहण करना है। ये उद्दीपन संवेदना मार्ग से होते हुए तंत्रिका केंद्र के पास पहुँचता है, जहाँ प्रेरक मार्ग एवं अभिवाही अंग से होते हुए अनुक्रिया प्रदर्शित करता है। हमारे शरीर. में ग्राही का क्या कार्य है
यदि ग्राही अंग ठीक से काम नहीं करता है, तो उद्दीपन के प्रति किसी भी प्रकार की अनुक्रिया नहीं होती है।

11. किसी सहारे के चारों ओर एक प्रतान की वृद्धि में ऑक्सिन किस प्रकार सहायक है ?
उत्तर ⇒ मटर के पौधे की तरह कुछ पादप या बाड़ पर प्रतान की सहायता से ऊपर चढ़ते हैं। परंतु यह प्रतान स्पर्श के लिए संवेदनशील हैं। सूर्य का प्रकाश प्रतान के जिस ओर पड़ता है; ऑक्सिन उसकी विपरीत दिशा में चला जाता है। ऑक्सिन कोशिकाओं की वृद्धि को प्रेरित करता है। इसी कारणवश प्रतान वृद्धि करता हुआ मुड़ जाता है। इस प्रकार प्रतान सहारे को चारों ओर जकड़ लेता है। किसी सहारे के चारों ओर एक प्रतान की वृद्धि में ऑक्सिन किस प्रकार सहायक है
चित्र : मटर के पौधा में वृद्धि 

class 10 science niyantran evam samanvay
12. एक पादप हॉर्मोन का उदाहरण दीजिए जो वृद्धि को बढ़ाता है। 
उत्तर ⇒ पौधों की जैविक क्रियाओं के बीच समन्वय स्थापित करने वाले रासायनिक पदार्थ को पादप हॉर्मोन या फाइटोहॉर्मोन कहते हैं। इन्हीं में से एक महत्त्वपूर्ण पादप हॉर्मोन है—ऑक्जिन (Auxin)। ऑक्जिन पौधों के स्तंभ शीर्ष (stem tip) पर मुख्यतः संश्लेषित होने वाले ये कार्बनिक यौगिक कोशिका–विभाजन (cell division) एवं कोशिका–दीर्घन (cell elongation) में सहायता करते हैं। जब पौधों पर प्रकाश पड़ता है तो ऑक्जिन प्ररोह के छायावाले भाग की ओर विसरित हो जाता है।  कोशिका–दीर्घन द्वारा यह ऑक्जिन तने की वृद्धि में सहायक होते हैं। यदि स्तंभ का शीर्ष काट दिया जाए तो पौधे की लंबाई में वृद्धि रुक जाती है व पार्श्वशाखाएँ निकलने लगती हैं। यह अधिकतर बीजरहित फलों के उत्पादन में सहायक होते हैं।

13. मानव शरीर का रेखाचित्र बनाकर अंत: स्रावी ग्रंथियों को दर्शाइये। 
उत्तर ⇒class 10th science niyantran evam samanvay question answer
चित्र: मानव की अंत: स्रावी ग्रंथियाँ (a) नर, (b) मादा 

14. एड्रीनल कार्टेक्स और एड्रीनल मेडुला में अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर ⇒ एड्रीनल कार्टेक्स और एड्रीनल मेडुला में निम्नलिखित अंतर हैं। 
एड्रीनल कार्टेक्स
एड्रीनल मेडुला
1. ये हल्के पीले या गुलाबी रंग के होते हैं
1. ये गहरे भूरे रंग के होते हैं।
2. ये एड्रीनल ग्रंथि के बाह्य भाग होते हैं।
2. ये एड्रीनल के आन्तरिक केन्द्रीय भाग हैं।
3. ये तंतु पट से ढकी रहती है।
3. ये भी तंतु पट से ढके होते हैं
4. ये मीसोडर्म से उत्पन्न होते हैं।
4. ये एन्डोडर्म से उत्पन्न होते हैं।
5. खनिज कोर्टिकाइड, ग्लूको कोर्टिकोइड और कोर्टिकोइड आदि स्रावित होते हैं।
5. एड्रीनलिन तथा नॉन-एड्रीनलिन आदि हार्मोन्स स्रावित होते हैं।
 

 15. अतःस्रावी और बहिःस्रावी ग्रंथियों में अंतर लिखें।
उत्तर ⇒ (i) अंतः स्रावी और बहिः स्रावी ग्रंथियाँ। 
अंतःस्रावी ग्रंथियाँ 
बहिःस्रावी ग्रंथियाँ
1. ये नलिका विहीन होती हैं।
1. इनकी अपनी नलिकाएँ होती हैं।
2. इनका स्राव रक्त द्वारा संकेतित अंग तक पहुँचाया जाता है।
2. ये अपने स्राव शरीर के भीतरी भागों में पहुँचाती हैं।
3. ये विशेष अंगों की उचित वृद्धि, और कार्यों के लिए उत्तरदायी होती है।
3. ये भोजन और बाह्य पदार्थों पर कार्य करने में निपुणता रखती है।

1. अलैंगिक जनन की अपेक्षा लैंगिक जनन के क्या लाभ हैं ?

उत्तर⇒अलैंगिक जनन की अपेक्षा लैंगिक जनन अधिक श्रेष्ठ है। इसके मुख्य लाभ हैं –

(i) लैंगिक जनन में शुक्राणु तथा अंडाणु के सायुजन के कारण डी० एन० ए० द्वारा पैतृक गुण वर्तमान पीढ़ी के सदस्य में हस्तान्तरित हो जाते हैं, जो जीवित रहने के लिए अधिक शक्तिशाली होते हैं जबकि अलैंगिक जनन में एकल डी० एन० ए० होने के कारण जीवित रहने के लिए संभावना कम हो जाती है।

(ii) लैंगिक जनन में डी० एन० ए० की दोनों प्रतिकृतियों में कुछ न कुछ अंतर अवश्य होते हैं जिनके परिणामस्वरूप नई पीढ़ी के सदस्य जीव में भिन्नता अवश्य दिखाई देती है जबकि अलैंगिक जनन में भिन्नता नहीं दिखाई देती है। यदि उसमें किसी कारण से भिन्नता आ जाती है तो जीव की मृत्यु हो जाती है।

(iii) लैंगिक जनन उद्विकास में बहुत सहायक है जबकि अलैंगिक जनन उदविकास में सहायक नहीं है।


2. पुनरुद्भवन (पुनर्जनन) किसे कहते हैं ? प्लेनेरिया में पुरुद्भवन की क्रिया चित्र द्वारा प्रस्तुत करें।

उत्तर⇒इस प्रकार के जनन में किसी कारण से जीवों का शरीर—प्राकृतिक कारण या कृत्रिम कारण से—दो या दो से अधिक टुकड़ों में खंडित हो जाता है तथा प्रत्येक खंड अपने खोये हुए भागों का विकास कर पूर्ण विकसित नये जीव में परिवर्तित हो जाता है और सामान्य जीवनयापन करता है। उदाहरण—स्पाइरोगाइरा (Spirogyra), हाइड्रा (Hydra) तथा प्लेनेरिया (Planaria) आदि में इस प्रकार का जनन पाया जाता है।

चित्र : प्लेनेरिया में पुनरुद्भवन

3. जनन कितने प्रकार का होता है ?

उत्तर⇒जनन दो प्रकार का होता है- (1) अलैंगिक जनन (2) लैंगिक जनन

(1) अलैंगिक जनन- इस विधि में जीवों का सिर्फ एक व्यष्टि भाग लेता है तथा इसमें युग्मक भाग नहीं लेते हैं। इस विधि द्वारा उत्पन्न जीव आनुवंशिक गुणों में ठीक जनकों के समान होते हैं। इस प्रकार का प्रजनन मुख्य रूप से निम्न कोटि के पौधों तथा जंतुओं में होता है।
इसके निम्नलिखित प्रकार हैं-
(i) विखंडन—द्विखंडन, बहुखंडन, (ii) मुकुलन, (iii) अपखंडन या पुनर्जनन, (iv) बीजानुजनन, (v) कायिक प्रवर्धन।

(2) लैंगिक जनन – इस विधि में दो भिन्न लिंग अर्थात् नर और मादा भाग लेते हैं। जिसमें नर युग्मक (शुक्राणु) एवं मादा युग्मक (अंडाणु) के संगलन (निषेचन) के फलस्वरूप युग्मनज का निर्माण होता है। यही युग्मनज विकसित, विभाजित एवं विभेदित होकर वयस्क जीव में परिवर्तित हो जाता है जो जनकों से भिन्न होते हैं।


4. लैंगिक तथा अलैंगिक जनन में अंतर लिखें।

उत्तर⇒अलैंगिक तथा लैंगिक जनन में निम्नलिखित अन्तर हैं-

अलैंगिक जननलैंगिक जनन
(i) इस प्रक्रिया में एक कोशिका अथवा एक जनक ही भाग लेते है।(i) इस प्रक्रिया में दो कोशिकाओं अथवा दो युग्मकों, जो एक जनक अथवा दो विभिन्न जनकों से उत्पन्न हों, की साझेदारी होती है।
(ii) जनक का पूरा शरीर अथवा एक कोशिका या प्रवर्ध जनन इकाई हो सकती है। (ii) इसमें जनन इकाई को युग्मक (gamete) कहते हैं जो एक कोशिकीय तथा हैप्लायड (haploid) होता है।
(iii) इस प्रक्रिया से उत्पन्न संतति आनुवंशिकी रूप से जनकों के समान होते हैं।(iii) इनमें संतति प्रायः अपने जनकों से भिन्न होते हैं।
(iv) इस प्रक्रिया में केवल समसूत्री विभाजन ही होता है।(iv) इस प्रक्रिया में अर्द्धसूत्री विभाजन तथा निषेचन अहम् है।
(v) इसमें जननांग का निर्माण नहीं होता है।(v) इसमें जननांग का निर्माण मुख्य रूप से होता है।

5. बाह्य निषेचन तथा आंतरिक निषेचन का क्या अर्थ है ?

उत्तर⇒बाह्य निषेचन – जब नर तथा मादा युग्मकों का संलयन मादा के शरीर के बाहर होता है तो इस संलयन को बाह्य निषेचन कहते हैं, जैसे मेंढक में नर तथा मादा दोनों जीव संभोग करते हैं और अपने-अपने युग्मकों को पानी में छोड़ देते हैं, शुक्राणु अंडों को पानी में ही निषेचित करता है।
बाह्य निषेचन में अंडाणुओं को आंतरिक सुरक्षा की अनुपस्थिति के कारण नष्ट होने के अवसर अधिक होते हैं, इसलिए इस बात की निश्चितता के लिए कुछ अण्डाणु निषेचित हो सकें, मादा अधिक अण्डाणु उत्पन्न करती है।
आन्तरिक निषेचन – बहुत-से जीवों, जैसे कुत्ता, बिल्ली, गाय, कीट, मनुष्य, सरीसृप, पक्षी तथा स्तनधारियों आदि में नर अपने शुक्राणुओं को मादा के शरीर के अन्दर छोड़ते हैं। शुक्राणु अंडों को मादा के शरीर के अन्दर ही निषेचित करते हैं। ऐसे निषेचन को आन्तरिक निषेचन कहते हैं।


6. माँ के शरीर में गर्भस्थ भ्रंण को पोषण किस प्रकार प्राप्त होता है ?

उत्तर⇒मैथुन के समय शुक्राणु योनि मार्ग में स्थापित होते हैं वहाँ से अंडकोशिका में मिलने के बाद निषेचित अंड गर्भाशय में स्थापित हो जाता है तथा विभाजित होने लगता है। गर्भाशय की आंतरिक परत मोटी हो जाती है तथा भ्रूण पोषण हेतु रुधिर प्रवाह भी बढ़ जाता है। भ्रूण को माँ के रुधिर से ही पोषण मिलता है, इसके लिए एक विशेष संरचना होती है, जिसे प्लेसेंटा कहते हैं। यह एक तश्तरीनुमा संरचना है जो गर्भाशय की भित्ति में धंसी होती है। इसमें भ्रूण की ओर क ऊतक में प्रवर्ध होते हैं। माँ के ऊतकों में रक्त स्थान होते हैं जो प्रवर्ध को आच्छादित करते हैं। यह माँ से भ्रूण को ग्लूकोज, ऑक्सीजन एवं अन्य पदार्थों के
स्थानांतरण हेतु एक वृहद क्षेत्र प्रदान करते हैं। विकासशील भ्रूण द्वारा अपशिष्ट पदार्थ उत्पन्न होते हैं जिनका निपटान उन्हें प्लेसेंटा के माध्यम से माँ के रुधिर में स्थानांतरण द्वारा होता है। इस तरह से माँ के शरीर में गर्भस्थ भ्रूण को पोषण प्राप्त होता है।


7. जनसंख्या नियंत्रण के लिए व्यवहार में लाये जानेवाले विभिन्न उपायों का वर्णन करें।गर्भ निरोधन की विभिन्न विधियाँ कौन-सी हैं ?

उत्तर⇒जनसंख्या नियंत्रण के लिए व्यवहार में लाए जानेवाले विभिन्न उपाय निम्नलिखित हैं –

प्राकृतिक विधि –अगर कुछ दिनों तक संभोग रोक दिया जाए तब उस दौरान स्त्री की योनि में वीर्य का प्रवेश नहीं होगा जिससे अंडाणु-निषेचन की संभावना नहीं रहेगी।

यांत्रिक विधियाँ – पुरुष के लिए कंडोम (condom) का उपयोग सबसे अधिक प्रभावी उपाय है। इससे नर-नारी AIDS जैसे जानलेवा लैंगीय संचारित रोगों से भी बचते हैं। स्त्रियों के लिए डायाफ्राम, कॉपर-T तथा लूप जैसे परिवार नियोजन के साधन उपलब्ध हैं।

रासायनिक विधियाँ – ऐसी विधियों में विभिन्न रसायनों से निर्मित साधनों का उपयोग किया जाता है।

सर्जिकल विधियाँ – इसके अंतर्गत पुरुष नसबंदी किया जाता है। स्त्रियों में होनेवाली इसी प्रकार की शल्य क्रिया स्त्री नसबंदी कहलाती है।

सामाजिक जागरूकता – जनसंख्या-वृद्धि का मानव समाज पर प्रभाव तथा इसके नियंत्रण के लिए विभिन्न साधनों के उपयोग का प्रचार समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, दूरदर्शन, पोस्टर या अन्य प्रचार के सशक्त माध्यमों द्वारा किये जाने से जनसंख्या नियंत्रण के प्रति मानव की जागरूकता बढ़ेगी।


8. फैलोपियन नलिका की संरचना का वर्णन करें ।

उत्तर⇒फैलोपियन नलिका एक जोड़ी नलिकाएँ हैं जो अंडाशय के ऊपरी भाग से शुरू होकर नीचे की ओर जाती हैं और अंत में गर्भाशय से जुड़ जाती हैं । प्रत्येक फैलोपियन नलिका का शीर्षभाग एक चौड़े कीप के समान होता है जो अंडाणु को फैलोपियन नलिका में प्रवेश करने में सहायता करते हैं । फैलोपियन नलिका की दीवार मांसल एवं संकुचनशील होती है । इसकी भीतरी सतह पर सीलिया लगी होती है, जो अंडाणु को फैलोपियन नलिका के द्वारा अंडाणु गर्भाशय में पहुँचाते हैं ।

मानव का मादा जनन तंत्र

9. मादा जननतंत्र का नामांकित चित्र बनाएँ।

मानव का मादा जनन तंत्र

उत्तर⇒


10. शुक्राशय एवं प्रोस्टेट ग्रंथि की क्या भूमिका है ?

उत्तर⇒ प्रोस्टेट ग्रंथि मूत्राशय के आधार पर स्थित एक छोटी लगभग गोलाका ग्रंथि है। पुरस्थ ग्रंथि से पुरस्थ द्रव (prostatic fluid) स्रावित होता है। पुरःस्थ दत शुक्राणु द्रव (spermatic fluid) तथा शुक्राशय द्रव (seminal fluid) मिलकर वीर्य (semen) बनाते हैं। पुरस्थ द्रव के कारण ही वीर्य में विशेष गंध होती है। पुरस्थ द्रव वीर के शुक्राणुओं (नर युग्मक) को उत्तेजित करता है। प्रोस्टेट तथा शुक्राशय अपने स्राव शुक्रवाहिका में डालते हैं जिससे शुक्राणु एक तरल माध्यम में आ जाते हैं इसके कारण इनका स्थानांतरण सरलता से होता है साथ ही उन्हें यह स्राव पोषण भी प्रदान करता है। शुक्राणु सूक्ष्म संरचनाएँ हैं जिनमें मुख्यतः आनुवंशिक पदार्थ होते हैं तथा एक लंबी पूँछ होती है जो उन्हें मादा जनन-कोशिका की ओर तैरने में सहायता करती है।

मानव का नर जनन तंत्र

11. गर्भ निरोध की विधियों का वर्णन करें।

उत्तर⇒ गर्भ निरोध के निम्नलिखित उपाय हैं –

महिलाओं में –

(i) अन्तः गर्भाशय युक्ति,
(ii) योनि डायाफ्राम्स, कीम-जैली आदि,
(iii) ऑपरेशन विधि,
(iv) हॉर्मोन्स से तैयार गर्भ निरोधक गोलियाँ,
(v) गर्भाशय में कॉपर-टी के रोपण से भ्रूण का पोषण नहीं हो पाता है।

 टयूबैक्टोमी (नसबंदी)

पुरुष में 

 टयूबैक्टोमी (नसबंदी)

(i) नसबंदी
(ii) कंडोम, इत्यादि का प्रयोग होता है गर्भ निरोध के लिए।
ऑपरेशन द्वारा जन्म नियमन किया जाता है। स्त्रियों में नसबन्दी (फैलोपियन नलिकाएँ काटकर बाँधना) तथा पुरुषों में नसबन्दी (शुक्राणु नलिका काटकर बाँधना) द्वारा जनसंख्या नियंत्रण करते हैं।


12. द्विखंडन बहुखंडन से किस प्रकार भिन्न है ?

अमीबा में द्विखंडन

उत्तर⇒द्विखंडन विखंडन में एक व्यष्टि से खंडित होकर दो का निर्माण होता है। इस विधि में कोशिका या शरीर वृद्धि कर दो बराबर भागों में विभाजित हो जाता है। पहले केंद्रक समसूत्री विभाजन (mitosis) या असमसूत्री विभाजन (amitosis) द्वारा दो समान संतति केंद्रकों (daughter nuclei) में विभाजित हो जाता है व अंततः कोशिका द्रव्य (cytoplasm) भी दो बराबर भागों में बँट जाता है। इससे दो संतति जीवों की उत्पत्ति होती है। उदाहरण—जीवाणु, पैरामीशियम, अमीबा, क्लेमाइडोमोनास, यूग्लीना, यीस्ट, आदि।

बहुखंडन में एक व्यष्टि खंडित होकर अनेक व्यष्टियों की उत्पत्ति करता है। इनमें प्रतिकूल परिस्थितियों में कुछ एककोशीय जीव अपने शरीर या कोशिका के चारों ओर एक कड़ी भित्ति, पुटि या सिस्ट (cyst) का निर्माण करते हैं। कोशिका के भीतर केंद्रक बार-बार विभाजित होकर संतति केंद्रकों का निर्माण करता है। इसके बाद इन केंद्रकों के चारों ओर कोशिका द्रव्य का आवरण बन जाता है। इस प्रकार पुटी.के अंदर कई संतति कोशिकाओं की उत्पत्ति हो जाती है। अनुकूल परिस्थितियों के आगमन पर पुटि फट जाती है और संतति कोशिकाएँ बाहर निकलकर विकसित होती हैं। उदाहरण—अमीबा, प्लैज्मोडियम, निम्न कोटि के शैवाल आदि

अमीबा में बहुखंडन

अतः द्विखंडन बहुखंडन से इस प्रकार भिन्न है।


13. एक प्ररूपी पुष्प के सहायक अंग एवं आवश्यक अंग में क्या भिन्नता है ?

उत्तर⇒एक प्ररूपी पुष्प (typical flower) में चार प्रकार के पुष्पपत्र होते हैं –
(i) बाह्यदलपुंज (Calyx)
(ii) दलपुंज (Corolla)
(iii) पुमंग (Androecium)
(iv) जायांग (Gynoecium)

इनमें से दो बाहरी चक्रों यानी बाह्यदलपुंज एवं दलपुंज को सहायक अंग (accessory organs) एवं भीतरी दो चक्रों यानी पुमंग और जायांग को आवश्यक अंग (essential organs) कहा जाता है। सहायक अंग फूल को आकर्षक बनाने के साथ आवश्यक अंगों की रक्षा भी करते हैं तथा आवश्यक अंग जनन का कार्य करते हैं। इनमें यही भिन्नता है।

पुष्प का अनुदैर्घ्य काट

14. एक प्रारूपिक पुष्पी पौधे में परागण से बीज के निर्माण तक की संपूर्ण प्रक्रियाओं को सूचीबद्ध करें।

वर्तिकान पर परागकणों का अंकरण

उत्तर⇒परागण के बाद परागकण वर्तिकाग्र तक पहुँचते हैं, जहाँ पोषक तत्त्वों का अवशोषण कर वृद्धि करते हैं। परागकण से परागनलिका निकलती है, जो वर्तिका से होते हुए बीजांड में प्रविष्ट हो जाती है। बीजांड में अंडाणु से संयुग्मित होकर नरयुग्मक, युग्मनज या जाइगोट बनाता है, जो अंततः भ्रूण का निर्माण करते हैं। निषेचन के उपरांत अंडाशय एवं बीजांड क्रमशः फल एवं बीज में विकसित हो जाते हैं।


15. परागण क्रिया निषेचन से किस प्रकार भिन्न है ?

उत्तर⇒परागण में परागकणों के परागकोश से निकलकर उसी पुष्प या उस जाति के दूसरे पुष्पों के वर्तिकान तक पहुँचने की क्रिया होती है। यह दो प्रकार से होता है-स्व-परागण द्वारा तथा पर-परागण द्वारा। स्व-परागण केवल उभयलिंगी (hermaphrodate) पौधों में ही होता है, जैसे—सूर्यमुखी, बालसम, पोर्चुलाका आदि । इसके लिए किसी बाहरी कारक या बाह्यकर्ता (agent) की जरूरत होती है जो किसी एक पौधे के पुष्प परागकोश से परागकणों को अन्य किसी पुष्प के वर्तिकान तक पहुँचाने का कार्य करता है। ये बाहरी कारक कीट, पक्षी, चमगादड़, मनुष्य, वायु, जल आदि कोई भी हो सकते हैं। पर-परागण के लिए पुष्पों में कुछ विशेष अवस्थाएँ. होती हैं जिनसे उनमें पर-परागण ही संभव हो पाता है। यह है परागण की क्रिया।
निषेचन की क्रिया परागकणों के वर्तिकाग्र पहुँचने के बाद होती है। नर युग्मक व मादा युग्मक के संगलन (fusion) को निषेचन (fertilization) कहते हैं। इसमें परागकण से एक नलिका विकसित होती है तथा वर्तिका से होती हुई बीजांड तक पहुँचती है।

 वर्तिकाग्र पर परागकणों का अंकुरण

16. पुष्पी पौधों में निषेचन क्रिया का सचित्र वर्णन करें।

 पुष्पी पौधे में निषेचन

उत्तर⇒ पुष्पी पौधों में परागकणों के वर्तिकार तक पहुँचने की क्रिया (परागण) के बाद. निषेचन की क्रिया होती है। नर युग्मक और मादा युग्मक के संगलन को निषेचन कहते हैं। परागकण वर्तिकाग्र तक पहुँचने के बाद वर्तिकाग्र की सतह से पोषक पदार्थ अवशोषित कर परागनलिका विकसित करता है। ये परागनलिका वृद्धि कर वर्तिका से होते हुए बीजांड में प्रवेश करती है।परागनलिका से नर युग्मक निकलकर बीजांड में अवस्थित मादा युग्मक से संगलित हो जाता है। निषेचन के बाद युग्मनज विभाजित होकर भ्रूण के रूप में विकसित हो जाता है। निषेचन के उपरांत अंडाशय फल में तथा बीजांड बीजों में विकसित हो जाते हैं।


17. परागण किसे कहते हैं ? वर्षा होने पर परागण पर क्या प्रभाव पड़ेगा।

उत्तर⇒पुंकेसर के परागकोश से स्त्रीकेसर के वर्तिकान पर परागकणों के स्थानांतरण को परागण कहते हैं। परागकणों का यह स्थानांतरण जब एक ही फूल के अथवा एक ही पौधे के दो फूल के बीच होता है तब इसे स्वपरागण कहते हैं। स्वपरागण करने वाले फूल अधिकतर सफेद होते हैं। जब परागण क्रिया एक ही जाती के दो अलग-अलग पौधों के फूलों के बीच संपन्न होती है तब इसे पर परागण कहते हैं। पर परागण करने वाले फूल रंगीन तथा चमकदार होते हैं। परपरागण में परागकणों का स्थानांतरण, कीट द्वारा, हवा द्वारा और पानी द्वारा होता है। परागण के फलस्वरूप बीज और फल बनते हैं। वर्षा होने पर परागण की क्रिया मंद हो जाती है।


18. डॉ०एन०ए० की प्रतिकृति बनाना जनन के लिये आवश्यक क्यों है ?

उत्तर⇒ डी०एन०ए० की प्रतिकति बनाना जनन के लिये आवश्यक है क्योंकि ये जनन की विशेष सूचना को धारण करने वाली प्रोटीन के निर्माण के लिये उत्तरदायी होते हैं। डी०एन०ए० गुणसूत्रों पर स्थित होते हैं जो कोशिका के केन्द्रक में उपस्थित होते हैं। प्रत्येक प्रकार की विशेष सूचना के लिये विशिष्ट प्रकार की प्रोटीन उत्तरदायी होती है। डी०एन०ए० के अणुओं में आनुवंशिक गुणों का संदेश होता है जो जनक से संतति पीढ़ी में, जाता है।


19. डी०एन०ए० प्रतिकृति का प्रजनन में क्या महत्त्व है ?

उत्तर⇒जनन कोशिका में डी०एन०ए० की दो प्रतिकृतियाँ बनती हैं तथा उनका एक-दूसरे से अलग होना आवश्यक है। डी०एन०ए० की एक प्रतिकृति का मूल काशिका में रखकर दूसरी प्रतिकंति को उससे बाहर नहीं निकाला जा सकता क्याक दूसरी प्रतिकृति के पास जैव-प्रक्रमों के अनुरक्षण हेतु संगठीय कोशिकीय संरचना नहीं होगी। इसलिए डी०एन०ए० की प्रतिकृति बनने के साथ-साथ दूसरी कोशिकीय सरचनाओं का सृजन भी होता रहता है। इसके बाद डी०एन०ए० की प्रतिकृतियाँ विलग हो जाती हैं। परिणामतः एक कोशिका विभाजित होकर दो कोशिकाएँ बनाती हैं। संतति कोशिकाएँ समान होते हुए भी किसी-न-किसी रूप में एक-दूसरे से भिन्न हाता है। जनन में होनेवाली यह विभिन्न्ताएँ जैव विकास का आधार है एवं प्रजनन में इसका यही महत्त्व है।


20. कुछ पौधों को उगाने के लिए कायिक प्रवर्धन का उपयोग क्यों किया जाता है ?

उत्तर⇒पौधों के कुछ भाग जैसे जड़, तना तथा पत्तियाँ उपयुक्त परिस्थितियों म विकसित होकर नया पौधा उत्पन्न करते हैं। अधिकतर जंतुओं के विपरीत, एकल पौधे इस क्षमता का उपयोग जनन की विधि के रूप में करते हैं। परन्तु, कलम अथवा रोपण जैसी कायिक प्रवर्धन की तकनीक का उपयोग कृषि में भी किया जाता है। गन्ना, गुलाब अथवा अंगूर इसके कुछ उदाहरण हैं। कायिक प्रवर्धन द्वारा उगाये गये पौधों में बीज द्वारा उगाये गये पौधों की अपेक्षा पुष्प एवं फल कम समय में लगने लगते हैं। यह पद्धति केला, संतरा, गुलाब एवं चमेली जैसे पौधों को उगाने के लिए उपयोगी है जो बीज उत्पन्न करने की क्षमता खो चुके हैं। कायिक प्रवर्धन का दूसरा लाभ यह भी है कि इस प्रकार उत्पन्न सभी पौधे आनुवंशिक रूप से जनक पौधे के समान होते हैं, क्योंकि इनमें लैंगिक जनन की आवश्यकता नहीं होती है जिसके चलते विभिन्नता पैदा नहीं होती है। इसी प्रकार ब्रायोफाइलम की पत्तियों की कोर पर कुछ कलिकाएँ विकसित होकर मृदा में गिर जाती है तथा नए पौधे के रूप में विकसित हो जाती हैं।

कलिकाओं के साथ ब्रायोफाइलम की पत्ती

21. यौवनारंभ के समय लड़कियों में कौन से परिवर्तन दिखाई पड़ते हैं ?

उत्तर⇒यौवनारंभ अर्थात् किशोरावस्था (adolescence) लड़कियों के काँख (armpit) एवं दोनों जंघाओं के बीच तथा बाह्य जननांग के समीप बाल आने लगते हैं। टाँगों तथा बाहुओं पर कोमल बाल उगने लगते हैं। त्वचा कुछ तैलीय (oily) होने लगती है। इस अवस्था में चेहरे पर फुसियों (pimples) का निकलना भी प्रारंभ हो जाता है। स्तनों में उभार आने लगता है। स्तन के केन्द्र में स्थित स्तनाग्र (nipple) के चारों ओर की त्वचा का रंग गाढ़ा होने लगता है। मासिक चक्र प्रारंभ हो जाता है। इस अवस्था में अपने जैसे विपरीत लिंग वाले व्यक्तियों के प्रति आकर्षण होने लगता है। यौवनारंभ की इस अवस्था को प्यूबर्टी (puberty) कहते हैं।


22. जीवों में विभिन्नता स्पीशीज के लिए तो लाभदायक है परन्तु व्यष्टि के लिए आवश्यक नहीं है, क्यों ?

उत्तर⇒अपनी जनन क्षमता का उपयोग कर जीवों की समष्टि पारितंत्र में अपना स्थान अथवा निकेत ग्रहण करते हैं। जनन के दौरान डी० एन० ए० प्रतिकृति का अविरोध जीव की शारीरिक संरचना एवं डिजाइन के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं जा उसे विशिष्ट निकेत के योग्य बनाती है। अतः किसी प्रजाति (स्पीशीज) की समष्टि के स्थायित्व का संबंध जनन से है।
परंतु, निकेत में अनेक परिवर्तन आ सकते हैं जो जीवों के नियंत्रण से बाहर हैं। पृथ्वी का ताप कम या अधिक हो सकता है, जल स्तर में परिवर्तन अथवा किसी उल्का पिण्ड का टकराना इसके कुछ उदाहरण हैं। यदि एक समष्टि अपने निकेत के अनुकूल है तथा निकेत में कछ उग्र परिवर्तन आते हैं तो ऐसी अवस्था में समाष्ट का समूल विनाश भी संभव है। परंतु यदि समष्टि के जीवों में विभिन्नता होगी तो उनके जीवित रहने की कुछ संभावना है। अतः यदि शीतोष्ण जल में पाए जाने वाले जीवाणुओं की कोई समष्टि है तथा वैश्विक ऊष्मीकरण (global warming) के कारण जल का ताप बढ़ जाता है तो अधिकतर जीवाणु व्यष्टि मर जाएँगे, परंतु ऊष्ण प्रतिरोधी क्षमता वाले कुछ परिवर्त ही जीवित रहते हैं तथा वृद्धि करते हैं। अतः विभिन्नताएँ स्पीशीज की उत्तरजीविता बनाए रखने में उपयोगी हैं।

23. प्रतिवर्ती क्रिया क्या है ? चित्र की सहायता से इसका वर्णन करिए।

हैण्ड वश

उत्तर⇒प्रतिवर्ती क्रियाएँ स्वायत्त प्रेरक के प्रत्युत्तर हैं। ये क्रियाएँ मस्तिष्क की इच्छा के बिना होती हैं। इसलिए ये अनैच्छिक क्रियाएँ हैं। यह बहुत स्पट आर यांत्रिक प्रकार की हैं। जैसे-जब हमारी आँखों पर तेज रोशनी पड़ती है तो हमारी आँख की पतली अचानक छोटी होने लगती है । यह क्रिया तुरंत और हमारे मस्तिष्क की इच्छा के बिना होती है।
प्रतिवर्ती क्रियाएँ मेरुरज्जु द्वारा नियंत्रित पेशियों द्वारा अनैच्छिक क्रियाएँ होती हैं जो प्रेरक के प्रत्युत्तर में होती हैं। यदि शरीर के किसी भाग में अचानक एक पिनचुभोया जाए तो संवेदियों द्वारा प्राप्त यह उद्दीपक इस प्रेरक तंतु क्षेत्र के एफैरेंट तंत्रिका तंतु को उद्दीपित करता है। तंत्रिका तंतु मेरु तंत्रिका के पृष्ठीय पथ द्वारा इस उद्दीपक को मेरुरज्जु तक ले जाता है।
मेरुरज्जु से यह उद्दीपन के अधरीय पथ द्वारा एक या अधिक इफरेंट (Efferent) तंत्रिका तंतु में पहुँचता है । इफैरेंट तंत्रिका तंतु प्रभावी अंगों को उद्दीपित करता है। पिन चुभोने के । तुरंत बाद इसी कारण प्राणी प्रभावी भाग हटा लेता है। उद्दीपक का संवेदी अंग से प्रभावी अंग तक का पथ प्रतिवर्ती चाप कहलाता है।
प्रतिवर्ती चाप तंत्रिका तंत्र की क्रियात्मक इकाई बनाती है।

प्रतिवर्ती चाप में होता है ।

(i) संवेदी अंग – वह अंग या स्थान जो प्रेरक को प्राप्त करता है।

(ii)एफैरेंट तंत्रिका तन्तु (Afferent Nerve Fibre)-यह संवेदक प्रेरणा को संवेदी अंग से केंद्रीय तंत्र तक ले जाता है, जैसे मस्तिष्क यामेरुरज्जु ।
(ii) केंद्रीय तंत्रिका तंत्र-मस्तिष्क या मेरुरज्जु का कुछ भाग ।

(iv) इफैरेंट अथवा मोटर तंत्रिका (Efferent or Motor Nerve)- यह केंद्रीय तंत्रिका तंत्र से मोटर प्रेरणाओं को प्रभावी अंगों तक लाता है, जैसे पेशियाँ अथवा ग्रंथियाँ।

(v) प्रभावी अंग (Effector)-यह तंत्रिका विहीन भाग जैसे ग्रंथियों की पेशियाँ जहाँ मोटर प्रेरणा खत्म होती है और प्रत्युत्तर दिया जाता है। कार्य-प्रतिवर्ती क्रिया प्रेरक को तुरंत प्रत्युत्तर देने में सहायता करती है और मस्तिष्क को भी अधिक कार्य से मुक्त करती है।


24. मानव मस्तिष्क का एक स्वच्छ नामांकित चित्र बनाइए।

मस्तक

उत्तर⇒


25. मेरुरज्जु का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।

मेरुरज्जु

उत्तर⇒मेडूला ऑब्लाँगेटा खोपड़ी के महारंध्र से निकल कर रीढ़ की हड्डी की कशेरुकाओं के बीच में से निकल कर नीचे तक फैली रहती है।

इसी को मेरुरज्जु या रीढ़ रज्जु कहते हैं। इसके ऊपर डयरामेटर, ऐरेक्रॉइड और पिओमेट नामक तीन झिल्लियाँ उसी प्रकार होती हैं जैसी मस्तिष्क में ऊपर होती हैं। मेरुरज्जु से निश्चित दूरियों पर 31 जोड़े मेरू तंत्रिकाएँ निकलती हैं। इसकी लम्बाई लगभग 45 सेमी होती है।
मेरुरज्जु के कार्य
(i) यह साधारण प्रतिवर्ती क्रियाओं जैसे घुटने के झटके का प्रत्युत्तर, स्वयं मेरुरज्जु चालित प्रतिक्रियाएँ जैसे मूत्राशय का सिकुड़न आदि के समन्वय केंद्र काकार्य करती है।
(ii) यह मस्तिष्क और सुषुम्ना के मध्य संचार का कार्य करती है।


26. मानव नर जननांगों का वर्णन करें।

उत्तर⇒ मनुष्य केनर जनन तंत्र में निम्नलिखित अंग आते हैं-
(i) वृषण – मनुष्य में एक जोड़ी वृषण होते हैं जो वृषण कोश में बन्द रहते हैं। वृषण में शुक्राणु उत्पन्न होते हैं। वृषण से शुक्राणु निकलने के बाद लगभग 48 घन्टे तक जीवित रहते हैं। शुक्राणुओं का निर्माण शुक्रजनन कहलाता है। वृषण कोष शुक्राणुओं को शरीर के ताप से 1-3°C निम्न ताप प्रदान करते हैं।

वृषण के कार्य हैं—

(क) शुक्राणु उत्पन्न करना, तथा (ख) नर लिंग, हारमोन-टेस्टोस्टीरोन की उत्पत्ति तथा स्रावण ।
यदि वृषण देहगुहा में ही रह जाते हैं तो बन्ध्यता उत्पन्न होती है।

(ii) एपीडिडिमिस – यह एक नलिकाकार संरचना होती है जो वृषण के साथ मजबूती से जुड़ी रहती है। यह सेमिनीफेरस नलिकाओं से जुड़ी रहती है ओर शुक्राणुओं के लिए एक संचय घर का कार्य करती है।

(iii) शक्राशय – एपीडिडिमिस से शुक्राणु वाहिनी द्वारा शुक्राणु शुक्राशय में आते हैं जहाँ ये पूरी तरह परिपक्व होते हैं तथा इनमें कुछ स्राव मिल जाते है।

(iv) प्रोस्टेट ग्रन्थि – यह ग्रन्थि कुछ विशिष्ट गंध या स्राव स्रावित करती है जो कि शुक्र रस में मिल जाते हैं।

(v) मन्त्र मार्ग – यह वह मार्ग है जिसमें से होकर मूत्र बाहर आता है। यह मूत्र मार्ग एक पेशीय अंग से निकलता है जिसे शिश्न कहते हैं। शिश्न का उपयोग मूत्र करने के साथ-साथ शुक्राणुओं (शुक्ररस) को निकालने के लिये भी किया जाता है।


27. पौधों में कायिक प्रवर्धन की किन्हीं तीन कृत्रिम विधियों का वर्णन कीजिए।

कलम का टुकड़ा लगाना

उत्तर⇒कायिक जनन की तीन कृत्रिम विधियाँ कायिक प्रवर्धन की कृत्रिम विधियों में रोपण, कलम लगाना, दाब कलम तथा ऊतक संवर्धन प्रमख हैं।
(i) कलम लगाना – इस विधि म राना, पात्तया तथा जड़ों का प्रयोग किय बनाकर जिसमें दो पर्वसन्धियाँ होती हैं, भूमि में गाड़ देते हैं। कुछ समय बाद उनसे जड़ें तथा प्ररोह विकसित हो जाते हैं । उदाहरण गुलाब तथा गन्ना, गुड़हल व अंगूर । कक्षस्थ कलिकाओं सहित तने के टुकड़ों को मातृ पौधे से अलग कर लेते हैं।

पत्तिय

(ii) दाब लगाना  – इसे गूटी लगाना भी कहा जाता है। कुछ पौधों के तने के भाग भूमि के समीप होते हैं। उन्हें झुकाकर ज़मीन में मिट्टी में दबा देते हैं। वहीं . पर कुछ समय बाद जड़ें निकल आती हैं। उसे मातृ पौधे से अलग कर लेते हैं। इस प्रकार नया पौधा प्राप्त होता है। उदाहरण-नींबू, मोगरा, अमरूद, गुड़हल,जैसमीन, बोगेनविलिया आदि।

कली

(iii) कली लगाना – इस विधि में साधारण जाति के पौधे के तने पर छाल की गहराई तक एक तिरछा काट लगा देते हैं। उसी काट में एक अच्छे पौधे की कलिका को उसी जाति के पौधे से रोपित कर देते हैं । कुछ समय बाद कलिका पौधे से जुड़ जाती है और नई शाखा बन जाती है। इसे काट कर अलग कर देते हैं। यह विधि गुलाब, अंगुर, शरीफा, संतरा आदि में अपनाई जाती है।


28. रजोधर्म का वर्णन कीजिए।

उत्तर⇒ स्त्रियों में मासिक धर्म-स्त्रियों में यह चक्र 13-15 वर्ष की आयु में ‘प्रारम्भ होता है। यह यौवनावस्था होती है। स्त्रियों में मासिक धर्म 28 दिन का होताहै। यही समय अण्डाणु का पूर्ण जीवन काल होता है।
इसकी अवस्थायें निम्नलिखित हैं-
(i) 1-5 वें दिन तक पुराना अंडाणु रजोधर्म के समय बाहर आता है।अंडाशय में नये अंडाणु की वृद्धि प्रारम्भ हो जाती है ।

(ii) 6-12वें दिन तक अंडाशय से अंडाणु परिपक्व होकर ग्रेफियन फालिकिल बन जाता है।

(iii) 13-14वें दिन में ग्रफियन फालिकिल अंडाशय से बाहर आकर अंडवाहिनी में पहुँच जाता है। ये अंडोत्सर्ग कहलाता है।

(iv) 15-16वें दिन अंडाणु अंडवाहिनी और फिर गर्भाशय में आकर शुक्राणु से मिलने की प्रतीक्षा करता है। यदि इस बीच निषेचन होता है हो अंडाणु युग्मनज में परिवर्तित हो जाता है, जो विकास करके 9 माह में शिशु बनकर जन्म लेता है।

(v) निषेचन नहीं होता है तो 17-28वें दिन तक यह निष्क्रिय हो जाता है। 28 दिन बाद रजोधर्म से बाहर आता है।

(vi) यह चक्र एस्ट्रोजन तथा प्रोजेस्टीरोन हार्मोन्स द्वारा नियंत्रित रहता है।स्त्रियों में रजोनिवृत्ति 45-50 वर्ष तक होती है। लड़कों में किशोरावस्थाका प्रारम्भ 13 से 15 वर्ष में होता है। इनमें कोई चक्र नहीं होता है। शुक्राणओं का निर्माण जीवन भर होता है ।


29. मुकुलन क्या है ? हाइड्रा तथा स्पंज में मुकुलन द्वारा जनन कैसे होता है ?

मुकुल

उत्तर⇒ शरीर पर एक ऊर्ध्व संरचना बनती है जिसे मुकुल कहते हैं। शरीर का केन्द्रक दो भागों में विभक्त हो जाता है और उनमें से एक केन्द्रक मुकुल में आ जाता है। मुकुल पैतृक जीव से अलग होकर वृद्धि करता है और पूर्ण विकसित जीव बन जाता है। जैसे यीस्ट, हाइड्रा तथा ल्यूकोसोलिनिया (स्पंज) आदि ।


30. गर्भनिरोधन की विभिन्न विधियाँ कौन-सी हैं ?

रासायनिक बिधि

उत्तर⇒बच्चों के जन्म को नियमित करने के लिए आवश्यक है कि मादा का निषेचन न हो।
इसके लिए मुख्य गर्भ निरोधक विधियाँ निम्नलिखित हैं –
(i) रासायनिक विधि—अनेक प्रकार के रासायनिक पदार्थ मादा निषेचन को रोक सकते हैं। स्त्रियों के द्वारा गर्म-निरोधक गोलियाँ प्रयुक्त की जाती हैं। झाग की गोली, जैली, विभिन्न प्रकार की क्रीमें आदि यह कार्य करती हैं।

(ii)शल्य – पुरुषों में नसबंदी तथा स्त्रियों में भी नसबंदी के द्वारा निषेचन रोका जाता है। पुरुषों की । शल्य चिकित्सा में शुक्र वाहिनियों को काटकर बाँध दिया जाता है जिससे वृषण में बनने वाले शुक्राणु बाहर नहीं आ पाते । स्त्रियों में अंडवाहिनी को काटकर बाँध देते हैं जिससे अंडाशय में बने अंडे गर्भाशय में नहीं आ पाते।

मुत्रसय

(iii) भौतिक विधि – विभिन्न भौतिक विधियों से शुक्राणुओं को स्त्री के गर्भाशय में जाने से रोक दिया जाता है । लैंगिक संपर्क में निरोध आदि प्रयोग इसी के अंतर्गत आता है।

1. जैव विकास क्या है ? लामार्कवाद का वर्णन करें

उत्तर ⇒ पृथ्वी पर वर्तमान जटिल प्राणियों का विकास प्रारंभ में पाये जाने वाले सरल प्राणियों से परिस्थिति और वातावरण के अनुसार होने वाले परिवर्तनों के कारण हुआ। सजीव जगत में होनेवाले इस परिवर्तन को जैव विकास (organic evolution) कहते हैं। फ्रांसीसी प्रकृति वैज्ञानिक लामार्क (Jean Baptiste Lamarck, 1744-1829) न सबसे पहले 1809 में जैव विकास के अपने विचारों को अपनी पुस्तक फिलॉसफिक जूलौजिक (Philosophic Zoologique) में प्रकाशित किया । यही लामार्कवाद या उपार्जित लक्षणों का वंशागति सिद्धांत (theory of inheritance of acquired characters) है। लामार्क के अनुसार जीवों की संरचना, कायिकी, उनके व्यवहार पर वातावरण के परिवर्तन का सीधा असर पड़ता है। इसके कारण जीवों के अंगों का उपयोग ज्यादा या कम होता है। जिन अंगों का उपयोग अधिक होता है वे अधिक विकसित हो जाते हैं तथा जिनका उपयोग नहीं होता है, धीरे-धीरे उनका ह्रास हो जाता है। वातावरण के सीधे प्रभाव से या अंगों में कम या अधिक उपयोग के कारण जंतु के शरीर में जो परिवर्तन आते हैं उन्हें उपार्जित लक्षण (acquired character) कहते हैं। यह लक्षण एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में प्रजनन द्वारा चले जाते हैं । ऐसा लगातार होने से कुछ पीढ़ियों के बाद उनकी शारीरिक रचना बदल जाती है तथा एक नई प्रजाति का विकास हो जाता है।


2. आनुवंशिकी की परिभाषा दीजिए। जीव विज्ञान की इस शाखा को मेण्डल का क्या योगदान है ?

उत्तर ⇒ आनुवंशिकी जीव विज्ञान की वह शाखा है जिसके अन्तर्गत आनुवंशिकता और विभिन्नताओं का अध्ययन किया जाता है।
मेण्डल को आनुवंशिकी का जनक माना जाता है। उन्होंने मटर के पौधों पर. संकरण सम्बन्धी तरह-तरह के प्रयोग किए थे और तीन नियमों को प्रतिपादित किया।

(i) प्रभाविता का नियम (Law of dominance)- संकरण में भाग लेने वाले पौधों का प्रभावी गुण प्रकट होता है और अप्रभावी गुण छिप जाता है।

(ii) पृथक्करण का नियम (Law of segregation)- युग्मकों की रचना के समय कारकों (Genes) के जोड़े अलग-अलग हो जाते हैं। इन दोनों में से केवल एक ही युग्मक के पास पहुँचता है। दोनों कारक कभी भी एक साथ युग्मक में नहीं जाते।

(iii) स्वतंत्र अपव्यूहन का नियम (Law of independent assortment) – कारक एक-दूसरे को प्रभावित किये बिना उन्मुक्त रूप से युग्मकों में जाते हैं और प्रकट होते हैं। उदाहरण के लिए द्विसंकर क्रॉस की दूसरी पीढ़ी की संतानों में सभी कारकों के गुण अलग-अलग दिखाई देते हैं पर पहली पीढ़ी में प्रभावी गुण ही प्रकट होता है।


3. आनुवंशिक विभिन्नता के स्रोतों का वर्णन करें।

उत्तर ⇒ जीवों में आनुवंशिक विभिन्नता उत्परिवर्तन के कारण होता है तथा नई जाति (species) के विकास में इसका योगदान हो सकता है । क्रोमोसोम पर स्थित जीन की संरचना तथा स्थिति में परिवर्तन ही उत्परिवर्तन के कारण है । आनवंशिक विभिन्नता का दूसरा कारण है आनुवंशिक पुनर्योग (genetic recombination) भी है। आनुवंशिक पुनर्योग के कारण संतानों के क्रोमोसोम में जीन के गुण (संरचना तथा ‘क्रोमोसोम पर उनकी स्थिति) अपने जनकों के. जीन से भिन्न हो सकते हैं । अतः उत्परिवर्तन तथा आनुवंशिक पुनर्योग जीव में नए गुणों की उत्पत्ति के कारण हो सकते हैं । ऐसे नए गण जीवों को अपने वातावरण के अनसार अनुकूलन में सहायक हो सकते हैं । कभी-कभी ऐसे नए गण जीवों को वातावरण में अनुकूलित होने में सहायक नहीं भी होते हैं । ऐसी स्थिति में आपसी स्पर्धा, रोग इत्यादि कारणों से वैसे जीव विकास की दौड में विलप्त हो जाते हैं । बचे हुए जीव ऐसे लाभदायक गुणों को अपने संतानों में संचरित करते हैं। इस तरह प्रकृति नए गुणों वाले जीवा का चयन कर लेती है तथा कुछ को निष्कासित कर देती है । प्राकृतिक चयन (natural selection) द्वारा नए गुणों वाले जीवों का विकास इसी प्रकार होता है।


4. डार्विन के प्राकृतिक चयन के सिद्धांत की व्याख्या करें।

उत्तर ⇒ डार्विन के अनुसार प्रत्येक जीव में प्रजनन की असीम क्षमता होती है तथा प्रत्येक जीव ज्यामितीय अनक्रम द्वारा अपनी जनसंख्या में वृद्धि करते हैं। प्रत्येक जीव में अत्यधिक प्रजनन दर की तलना में पथ्वी पर भोजन तथा आवास नियत है। अतः जीवों में अपने अस्तित्व को बचाने के लिए आपस में संघर्ष होता रहता है। ये संघर्ष मुख्यतः तीन प्रकार के होते हैं।

(क) अपनी एक ही समष्टि के व्यष्टियों के बीच का संघर्ष
(ख) एक ही जाति के विभिन्न समष्टियों के बीच का संघर्ष तथा
(ग) जीवों का प्रतिकूल वातावरणीय परिस्थितियों में संघर्ष।

प्राकृतिक वरण द्वारा चयनित विभिन्नताएँ दूसरी पीढी में उनके संतानों में वंशागत होती है तथा पीढ़ी-दर-पीढ़ी इनके प्राकृतिक वरण से ही नये प्रजाति का निर्माण होता है।


5. क्या कारण है कि आकृति, आकार, रंग-रूप में इतने भिन्न दिखाई पड़ने वाले मानव एक ही स्पीशीज के सदस्य हैं ?

उत्तर ⇒ सभी दिशाओं में मानव का प्रव्रजन हुआ। आकृति, आकार, रंग-रूप में इतने भिन्न दिखाई पड़नेवाले मानव एक ही स्पीशीज के सदस्य हैं, मानव के DNA अनुक्रम तथा Y क्रोमोसोम तथा उनमें हुए उत्परिवर्तनों के अध्ययन से ही संभव हुआ है। आज रक्त के एक नमूने के विश्लेषण से किसी व्यक्ति के पूर्वजों की खोज की जा सकती है। इस विश्लेषण से यह भी जाना जा सकता है कि किसी व्यक्ति विशेष के पूर्वज संसार के किस भाग के मूल निवासी थे। ऐसा माइटोकॉण्डिया के DNA तथा क्रोमोसोम के अध्ययन से ही संभव हो पाया है। वर्तमान समय के सभी मानवों के जीन कोश (gene pool) एक समान होने के कारण सभी मानव एक ही प्रजाति (Homo sapiens) कहलाते हैं। हालाँकि विभिन्न क्षेत्रों के मानवों के गुणों की तुलना करने पर उनमें कई प्रकार की व्यक्तिगत विभिन्नताएँ पायी जाती हैं, जैसे त्वचा तथा बालों के रंग, शरीर की लंबाई एवं गठन इत्यादि।


6. जाति उद्भवन क्या है ?

उत्तर ⇒ जब दो उप-आबादियों के बीच जीन प्रवाह (gene flow), अर्थात् आनुवंशिक पदार्थों के आदान-प्रदान की संभावना कम होगी, तब वे अपनी ही उप-आबादी के सदस्यों के साथ लैंगिक प्रजनन कर पायेंगे। ऐसी स्थिति में एक उप आबादी के दोनों जनकों के अप्रभावी उत्परिवर्तित जीनों (recessive mutant genes) के संयोजन की संभावना अधिक होगी। ऐसे जीन इस स्थिति में अब प्रभावी उत्परिवर्तित जीन (dominant mutant genes) की तरह व्यवहार करेंगे । इससे उत्पन्न गुण (traits) अब संतानों में परिलक्षित होंगे। इस तरह के गुण लाभदायक होने पर प्रकृति द्वारा उनका चुनाव होता है तथा एक नई उपप्रजाति का उद्भव होता है । यदि मूल प्रजाति से इनका लैंगिक प्रजनन संभव हो भी गया तो उत्पन्न संतानों में जनन क्षमता नहीं होगी। इससे एक या एक से अधिक उपप्रजातियाँ बन जाएँगी। यही जाति – उद्भवन (speciation) कहलाता है।


7. मेंडल के प्रयोगों द्वारा कैसे पता चला कि लक्षण प्रभावी अथवा अप्रभावी होते हैं ?

उत्तर ⇒ मेंडल ने मटर के पौधे के अनेक विकल्पी लक्षणों का अध्ययन किया जो स्थूल दिखते हैं। उदाहरणतः गोल/झुरींदार बीज, लंबे/बौने पौधे, सफेद बैंगनी फूल इत्यादि। उसने विभिन्न लक्षणों वाले मटर के पौधों को लिया जैसे कि लंबे पौधे तथा बौने पौधे। इससे प्राप्त संतति पीढ़ी में लंबे एवं बौने पौधों के प्रतिशत की गणना की। मेंडल के अपने प्रयोगों में दोनों प्रकार के पैतृक पौधों एवं F पीढ़ी के लंबे पौधों की दूसरी पीढ़ी; अर्थात् F, पीढ़ी के सभी पौधे लंबे नहीं थे वरन् उनमें से एक चौथाई संतति बौने पौधे थे । यह इंगित करता है कि F. पौधों द्वारा लंबाई एवं बौनेपन दोनों विशेषकों (लक्षणों) की वंशानुगति हुई। परंतु केवल लंबाई वाला लक्षण ही व्यक्त हो पाया। अतः लैंगिक जनन द्वारा उत्पन्न होनेवाले जीवों में किसी भी लक्षण की दो प्रतिकृतियों की वंशानुगति होती है। ये दोनों एक समान हो सकते हैं अथवा भिन्न हो सकते हैं जो उनके जनक पर निर्भर करता है।

मेंडल के प्रयोगों द्वारा कैसे पता चला कि लक्षण प्रभावी अथवा अप्रभावी होते हैं

चित्र : दो पीढ़ियों तक लक्षणों की वंशानुगति ।


8. मेंडल का प्रथम नियम या पृथक्करण का नियम क्या है ?

उत्तर ⇒ मेंडल ने एकसंकर संकरण (monohybrid cross) में केवल एक जोड़े विपरीत गुणों की वंशागति का अध्ययन कर यह निष्कर्ष निकाला कि अप्रभावी गुण (बौनापन—recessive trait) में न तो कोई बदलाव आता है और न ही ऐसा गुण लुप्त होता है। संकर नस्ल की पीढ़ी में दोनों विपरीत गुण (opposite traits) साथ-साथ होते हैं। परंतु अगली पीढ़ियों में पृथक, अर्थात् अलग-अलग हो जाते हैं। यह निष्कर्ष मेंडल का प्रथम नियम या पृथक्करण का नियम (Mendel’s first law of segregation) कहलाता है।

दो पीढ़ियों तक एक जोड़े विपरीत गुणों की वंशागति

मेंडल का प्रथम नियम या पृथक्करण का नियम क्या है

चित्र : दो पीढ़ियों तक एक जोड़े विपरीत गुणों की वंशागति


9. मानव में लिंग निर्धारण आनुवंशिक आधार पर होता है, चित्र द्वारा – समझाएँ।

उत्तर ⇒ मानव के सभी गुणसूत्र पूर्णरूपेण युग्म नहीं होते। मानव में अधिकतर गुणसूत्र माता और पिता के गुणसूत्रों के प्रतिरूप होते हैं। इनकी संख्या 22 जोड़े हैं। परन्तु एक युग्म जिसे लिंग सूत्र कहते हैं वह पूर्ण जोड़े में नहीं होते। स्त्री में गुणसूत्र का पूर्ण युग्म होता है तथा दोनों ‘X’ कहलाते हैं। लेकिन पुरुष (नर) में यह जोड़ा परिपूर्ण जोड़ा नहीं होता, जिसमें एक गुणसूत्र सामान्य आकार का ‘X’ होता है तथा दूसरा गुणसूत्र छोटा होता है जिसे ‘गुणसूत्र कहते हैं । अतः स्त्रियों में ‘XX’ तथा पुरुष में :xr गुणसूत्र होते हैं। इसमें सामान्यत: आधे बच्चे लड़के एवं आधे लड़की हो सकते हैं। सभी को चाहे वह लड़का हो अथवा लड़की, अपनी माता से ‘X गुणसूत्र प्राप्त करते हैं। बच्चों का लिंग निर्धारण इस बात पर निर्भर करता है कि उन्हें अपने पिता से कि प्रकार गणसूत्र प्राप्त हुआ है। जिसे अपने पिता से ‘X’ गुणसत्र वंशानगत हुआ लडकी एवं जिसे पिता से ‘Y गुणूसत्र वंशानुगत होता है वह लड़का होता है। .

मानव में लिंग निर्धारण आनुवंशिक आधार पर होता है, चित्र द्वारा - समझाएँ

10. अलैंगिक जनन की अपेक्षा लैंगिक जनन द्वारा उत्पन्न विभिन्नताएँ अधिक स्थायी होती हैं, व्याख्या कीजिये। यह लैंगिक प्रजनन करने वाले जीवों के विकास को किस प्रकार प्रभावित करता है ?

उत्तर ⇒ अलैंगिक जनन की अपेक्षा लैंगिक जनन द्वारा उत्पन्न विभिन्नताएँ अधिक स्थायी होती हैं। अलैंगिक जनन एक ही जीव से होने के कारण केवल उसी के गुण उसकी संतान में जाते हैं और वे बिना परिवर्तन हुए पीढ़ी दर पीढ़ी समान ही रहते हैं। लैंगिक जनन नर और मादा के युग्मकों के संयोग से होता है जिसमें भिन्न-भिन्न जीन होने के कारण संकरण के समय विभिन्नता वाली संतान उत्पन्न होती है। जैसे सभी मानव युगों पहले अफ्रीका में उत्पन्न हुए थे पर जब उनमें से अनेक ने अफ्रीका छोड़ दिया और धीरे-धीरे सारे संसार में फैल गए। इस कारणवश लैंगिक जनन से उत्पन्न विभिन्नताओं के कारण उनकी त्वचा का रंग, कद, आकार आदि में परिवर्तन आ गया।


11. क्या भौगोलिक पृथक्करण स्वपरागित स्पीशीज के पौधों के जाति-उद्भव का प्रमुख कारण हो सकता है। क्यों या क्यों नहीं ?

उत्तर ⇒ भौगोलिक पृथक्करण स्वपरागित स्पीशीज के पौधों के जाति-उद्भव का प्रमुख कारण हो सकता है। जननीय लक्षण तथा भौतिक लक्षण पौधों में दो प्रकार के पाये जाते हैं। जननीय लक्षण गुणसूत्रों पर उपस्थित डी० एन० ए० के द्वारा हस्तान्तरित होते हैं। भौतिक लक्षण भौगोलिक परिस्थितियों से प्रभावित होते हैं परन्तु गुणसूत्रों की संख्या एवं आकृति ज्यों की त्यों बनी रहती है। जननीय लक्षण अनुकूल परिस्थितियों में क्रियान्वित रहते हैं। अतः भौतिक लक्षणों में भिन्नता ही स्व-परागित पौधों में विभेदन का प्रमुख कारण होती है।


12. विभिन्नता को परिभाषित करें। जननिक विभिन्नता एवं कायिक विभिन्नता में विभेद करें। जीवों में आनुवंशिक विभिन्नताओं का संचयन कैसे होता है ?

उत्तर ⇒ जीवों के ऐसे गुण जो उन्हें अपने जनकों अथवा अपनी ही जाति के अन्य सदस्यों के उसी गुण के मूल स्वरूप से भिन्नता दर्शाते हैं, विभिन्नता कहलाते हैं। जननिक विभिन्नता एवं कायिक विभिन्नता में निम्न अंतर हैं -जनन कोशिकाओं में होनेवाले परिवर्तन के कारण होनेवाली विभिन्नता, जननिक विभिन्नता या आनुवंशिक विभिन्नता कहलाती है। ऐसी विभिन्नताएँ एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में वंशागत होती है। वैसी विभिन्नताएँ जो गुणसूत्र सर जीन के गुणों में विभिन्नता के कारण उत्पन्न नहीं होती है वरन अन्य कई कारणों जैसे जलवायु एवं वातावरण का प्रभाव, उपलब्ध भोजन के प्रकार, अन्य उपस्थित जीवों के साथ परस्पर व्यवहार आदि के कारण उत्पन्न हो, कायिक विभिन्नताएँ कहलाती है। जीवों में आनुवंशिक विभिन्नताओं का संचयन जीन की प्रतिलिपि से बनती है।


13. मानव में बच्चे का लिंग निर्धारण कैसे होता है ?

उत्तर ⇒ मानव के सभी गुणसूत्र पूर्णरूपेण युग्म नहीं होते । मानव में अधिकतर गुणसूत्र माता और पिता के गुणसूत्रों के प्रतिरूप होते हैं । इनकी संख्या 22 जोड़े हैं । परंतु एक युग्म जिसे लिंग सूत्र कहते हैं वह पूर्ण जोड़े में नहीं होते । स्त्री में गुणसूत्र का पूर्ण युग्म होता है तथा दोनों ‘X’ कहलाते हैं। लेकिन पुरुष (नर) में यह जोड़ा परिपूर्ण जोड़ा नहीं होता, जिसमें एक गुणसूत्र सामान्य आकार का ‘X’ होता है तथा दूसरा गुणसूत्र छोटा होता है जिसे ‘Y’ गुणसूत्र कहते हैं । अतः स्त्रियों में XX’ तथा पुरुष में ‘XY’ गुणसूत्र होते हैं।

मानव में बच्चे का लिंग निर्धारण कैसे होता है

चित्र : मानव में लिंग निर्धारण

इसमें सामान्यत: आधे बच्चे लड़के एवं आधे लड़की हो सकते हैं । सभी बच्चे * चाहे वह लड़का हो अथवा लड़की, अपनी माता से ‘X’ गुणसूत्र प्राप्त करते हैं। अतः बच्चों का लिंग निर्धारण इस बात पर निर्भर करता है कि उन्हें अपने पिता से किस प्रकार का गुणसूत्र प्राप्त हुआ है। जिसे अपने पिता से ‘X’ गुणसूत्र वंशानुगत हुआ है वह लड़की एवं जिसे पिता से ‘Y’ गुणसूत्र वंशानुगत होता है वह लड़का होता है।


14. समजात अंग व असमजात अंग से क्या समझते हैं ?

समजात अंग व असमजात अंग से क्या समझते हैं

उत्तर ⇒ भिन्न-भिन्न वातावरण में रहनेवाले मेढकाली जंतुओं के कुछ ऐसे अंग होते हैं जो संरचना एवं उत्पत्ति के दृष्टिकोण से तो एक समान होते हैं, परंतु अपने वातावरण के अनुसार वे भिन्न कार्यों . का संपादन करते हैं। ऐसे अंग समजात अंग (homologous organs) कहलाते हैं । जैसे— मेढक, पक्षी, बिल्ली तथा मनुष्य के अग्रपादों (forelimbs) में पाये जाने वाले अस्थियों के अवयव पक्षी मानव प्रायः समान होते हैं, परंतु इन कशेरुक प्राणियों के अग्रपाद विभिन्न प्रकार के कार्यों का संपादन कर सकते हैं। समजात अंगों के विपरीत जंतुओं के कुछ अंग ऐसे होते हैं, जो रचना और उत्पत्ति या उद्भव के दृष्टिकोण से एक-दूसरे से भिन्न होते हैं, परंतु वह एक ही प्रकार का कार्य करते हैं। ऐसे अंग असमजात अंग (analogous organs) चित्र : समजात अंग कहलाते हैं। जैसे—तितली तथा पक्षी के पंख (wings) उड़ने का कार्य करते हैं परंतु इनकी मूल संरचना और उत्पत्ति अलग-अलग प्रकार की होती है।

चित्र समरूप अंग चमगादड़ एवं पक्षी के पंख

चित्र : समरूप अंग : चमगादड़ एवं पक्षी के पंख


15. उन अभिलक्षणों का एक उदाहरण दीजिये जिनका उपयोग हम लो स्पीशीज के विकासीय संबंध निर्धारण के लिए करते हैं।

उत्तर ⇒ बहूत अधिक भिन्न दिखने वाली संरचनाएँ एकसमान परिकल्प स विकसित हैं। जंगली गोभी इसका अच्छा उदाहरण है। दो हजार वर्ष पूर्व मनुष्य गाभा को एक खाद्य पौधे के रूप में उगाता था, तथा उसने चयन द्वारा इससे विभिन्न सब्जियाँ विकसित की।

उन अभिलक्षणों का एक उदाहरण दीजिये जिनका उपयोग हम लो स्पीशीज के विकासीय संबंध निर्धारण के लिए करते हैं

चित्र: जंगली गोभी का विकास
कुछ किसान इसकी पत्तियों के बीच की दूरी कम करना चाहते थे जिससे पत्तागोभी का विकास हुआ। बंध्य पुष्पों से फूलगोभी विकसित हुई ।


16. एक एकल जीव द्वारा उपार्जित लक्षण सामान्यतः अगली पीढ़ी में वंशानुगत नहीं होते । क्यों ?

उत्तर ⇒ वैसे जीव जिनमें लैंगिक जनन होता है, जनन कोशिकाओं (germ cells) का निर्माण उनके जनद या जनन ग्रंथि या गोनैड (genad) में होता है। शरीर की अन्य कोशिकाएँ कायिक या सोमैटिक सैल्स (Somatic cells) कहलाती है । वातावरण के प्रभाव के कारण कायिक कोशिकाओं में परिवर्तन, लोहार के हाथों की पेशियों का हथौड़ा चलाने के कारण मजबूत होता, चूहे की पूँछ काटने पर, इत्यादि गुण वंशागत नहीं होते अपितु इनकी अगली पीढ़ी सामान्य लक्षणों के साथ ही पैदा हुई जैसे लोहार की संतानों में मजबूत पेशियों का गुण वंशागत नहीं होता, कटे पूँछवाले चूहे की संतान पूँछ के साथ पैदा होती है, इत्यादि । यही कारण है कि एक एकल जीव द्वारा उपार्जित लक्षण सामान्यतः अगली पीढ़ी में वंशानुगत नहीं होते क्योंकि इससे जनन कोशिकाओं के जीन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता ।


17. एक ‘A’रुधिर वर्ग वाला पुरुष एक स्त्री जिसका रुधिर वर्ग ‘0’ है से विवाह करता है। उनकी पुत्री का रुधिर वर्ग ‘0’ है । क्या यह सूचना पर्याप्त है यदि आपसे कहा जाये कि कौन-सा विकल्प लक्षण रुधिर वर्ग-‘A’ अथवा ‘0’ प्रभावी लक्षण हैं? अपने उत्तर का स्पष्टीकरण दीजिये।

उत्तर ⇒ एक ‘A’ रुधिर वर्ग वाला पुरुष एक स्त्री जिसका रुधिर वर्ग :0′ है से विवाह करता है। उनकी पुत्री का रुधिर वर्ग ‘O’ है। यह सूचना पर्याप्त है यदि हमसे कहा जाये कि विकल्प लक्षण-रुधिर वर्ग- ‘A’ अथवा ‘0’ प्रभावी लक्षण है। क्योंकि लैंगिक जनन द्वारा उत्पन्न होने वाले जीवों में किसी भी लक्षण की दो प्रतिकृतियों की (स्वरूप) वंशानुगति होती हैं। ये दोनों एक समान हो सकते हैं अथवा भिन्न हो सकते हैं जो उनके जनक पर निर्भर करता है ।।


18. ‘किन प्रमाणों के आधार पर हम कह सकते हैं कि जीवन की उत्पत्ति अजैविक पदार्थों से हुई है ?

उत्तर ⇒ जे० बी० एस० हाल्डेन नामक एक ब्रिटिश वैज्ञानिक ने सर्वप्रथम सुझाव दिया कि जीवों की उत्पत्ति उन अजैविक पदार्थों से हुई होगी जो पृथ्वी की उत्पत्ति के समय बने थे। सन् 1953 ई० में स्टेनल, एल० मिलर और हेराल्ड सी० डरे ने ऐसे कृत्रिम वातावरण का निर्माण किया था जो प्राचीन वातावरण के समान था। इस वातावरण में ऑक्सीजन अनुपस्थित था। अमोनिया, मिथेन और हाइड्रोजन सल्फाइड इसमें थे। एक पात्र में जल भी था जिसका तापमान 100°C से कम रखा गया था। जब गैसों के मिश्रण से चिंगारियाँ उत्पन्न की गई जो आकाशीय बिजली के समान थीं, मिथेन से 15% कार्बन सरल कार्बनिक यौगिकों में बदल गए। इनमें अमीनो अम्ल भी संश्लेषित हुए जो प्रोटीन के अणुओं का निर्माण करते हैं। इसी आधार पर कहा जा सकता है कि जीवन की उत्पत्ति अजैविक पदार्थों से हुई है।


19. एकसंकर संकरण को F-पीढ़ी तक चित्र के द्वारा दर्शाएँ।

उत्तर ⇒ एक लंबा पौधा को बौना पौधा से संकरण को निम्न तरीके से दिखाया जा सकता है

एकसंकर संकरण को F,-पीढ़ी तक चित्र के द्वारा दर्शाएँ।

चित्र : मेंडल के एक संकर संकरण के आधार पर दो पीढ़ियों तक एक जोड़े विपरीत गुणों की वंशागति


20. जीवाश्म एक के बाद एक परत कैसे बनाते हैं ?

उत्तर ⇒ अगर दस करोड़ वर्ष पूर्व से प्रारंभ किया जाये तब हम देखेंगे कि जीवाश्म एक के बाद एक परत कैसे बनाते हैं।

एक के बाद एक परत बनना

आइए 10 करोड़ (100 मिलियन) वर्ष पहले से प्रारंभ करते हैं। समुद्र तल पर कुछ अकशेरुकीय जीवों की मृत्यु हो जाती है तथा वे रेत में अधिक दब जाते हैं। धीरे-धीरे और अधिक रेत एकत्र होती जाती है तथा अधिक दाब के कारण चट्टान बन जाती है।

कुछ मिलियन वर्षों बाद, क्षेत्र में रहने वाले डायनोसॉर मर जाते हैं तथा उनका शरीर भी मिट्टी में दब जाता है । यह मिट्टी भी दबकर चट्टान बन जाती है । जो पहले वाले अकशेरुकीय जीवाश्म वाली चट्टान के ऊपर बनती है ।

कुछ मिलियन वर्षों बाद, क्षेत्र में रहने वाले डायनोसॉर मर जाते हैं तथा

फिर इसके कुछ और मिलियन वर्षों बाद इस क्षेत्र में घोड़े के समान कुछ जीवों . के जीवाश्म चट्टानों में दब जाते हैं ।

फिर इसके कुछ और मिलियन वर्षों बाद इस क्षेत्र में घोड़े के समान कुछ जीवों . के जीवाश्म चट्टानों में दब जाते हैं

जल प्रवाह) के कारण कुछ चट्टानें फट जाती हैं तथा घोड़े के समान जीवाश्म प्रकट होते हैं। जैसे-जैसे हम गहरी खुदाई करते जाते हैं, वैसे-वैसे पुराने तथा और पुराने जीवाश्म प्राप्त होते हैं।

इसके काफी समय उपरांत मृदा अपरदन (मान लीजिए

हमारा पर्यावरण ( दीर्घ उत्तरीय प्रश्न ) Class 10th Science Hamara Paryavaran Subjective Question Answer For Matric Exam 2022


1. ओजोन क्या है ? ओजोन छिद्र कैसे उत्पन्न होता है ?

पराबैगनी

उत्तर ⇒ ओजोन ‘03‘ के अणु ऑक्सीजन के तीन परमाणुओं से बनते हैं। सामान्य ऑक्सीजन के अणु में दो परमाणु होते हैं। जहाँ ऑक्सीजन सभी प्रकार वायविकजीवों के लिए आवश्यक है, वहीं ओजोन एक घातक विष है।
वायुमंडल में ऑक्सीजन गैस के रूप में रहता है जो सभी जीवों के लिए आवश्यक है। सूर्य के प्रकाश में पाया जानेवाला पराबैंगनी विकिरण ऑक्सीजन को विघटित कर स्वतंत्र ऑक्सीजन परमाणु बनाता है, जो ऑक्सीजन अणुओं से संयक्त होकर ओजोन बनाता है ।

कुछ रसायन; जैसे फ्लोरोकार्बन (FC) एवं क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFC), ओजोन (O3) से अभिक्रिया कर, आण्विक (02) तथा परमाण्विक (O) ऑक्सीजन में विखण्डित कर ओजोन स्तर को अवक्षय (deplection) कर रहे हैं । कुछ सुगंध (सेंट), झागदार शेविंग क्रीम, कीटनाशी, गंधहारक (deodorant) आदि डिब्बों में आते हैं और फुहारा या झाग के रूप में निकलते हैं । इन्हें ऐरोसॉल कहते हैं । इनके उपयोग से वाष्पशील CFC वायुमंडल में पहुँचकर ओजोन स्तर को नष्ट करते हैं । CFC का व्यापक उपयोग एयरकंडीशनरों, रेफ्रीजरेटरों, शीतलकों, जेट इंजनों, अग्निशामक उपकरणों आदि में होता है । वैज्ञानिकों के अध्ययन से पता चला कि 1980 के बाद ओजोन स्तर में तीव्रता से गिरावट आई है । अंटार्कटिका के ऊपर ओजोन स्तर में इतनी कमी आई है कि इसे ओजोन छिद्र (ozone hole) की संज्ञा दी जाती है।


2. पारिस्थितिक तंत्र में ऊर्जा का प्रवाह किस प्रकार होता है ?

उत्तर ⇒ पारिस्थितिक तंत्र में ऊर्जा का मुख्य स्रोत सौर-ऊर्जा है, जिसका प्रवाह सदा एक दिशा में उत्पादकों से विभिन्न पोषी स्तरों तक उत्तरोतर ह्रासित होता हुआ प्रवाहित होता है। पृथ्वी तक पहुँचने वाली सौर ऊर्जा का एक छोटा भाग उत्पादक प्रकाश-संश्लेषण द्वारा रासायनिक ऊर्जा के रूप में संचित रखते हैं। इस संश्लेषित ऊर्जा में से कुछ का उपयोग स्वयं मेटाबोलिक क्रियाओं के संपदान में तथा कुछ श्वसन क्रिया में ऊष्मा ऊर्जा में परिवर्तित होकर वातावरण में मक्त हो जाता है। शेष संचित रासायनिक ऊर्जा हरे पौधों में ऊतकों में होती है, जो विभिन्न स्तर के उत्पादकों में चला जाता है और उनमें भी इस ऊर्जा का एक अंश मेटाबोलिक क्रियाओं में तथा एक अंश ऊष्मा ऊर्जा के रूप में मुक्त होकर वातावरण में चला जाता है। इस प्रकार अधिकतम ऊर्जा उत्पादक स्तर पर संचित है तथा इस ऊर्जा में हर पोषी स्तर पर लिंडमान के नियमानुसार उत्तरोत्तर कमी आती जाती है।


3. किसी पारिस्थितिक तंत्र के विभिन्न प्रकार के उपभोक्ता के बारे में समझाएँ ।

उत्तर ⇒ ऐसे जीव जो अपने पोषण के लिए पूर्ण रूप से उत्पादकों पर निर्भर रहते हैं, उपभोक्ता कहलाते हैं । सभी जंतु उपभोक्ता की श्रेणी में आते हैं क्योंकि क्लोरोफिल की अनुपस्थिति के कारण ये स्वयं भोजन का संश्लेषण नहीं कर पाते ।
उपभोक्ताओं को तीन श्रेणियों में बाँटा जा सकता है-
(i) प्राथमिक उपभोक्ता – (Primary consumers) ऐसे उपभोक्ता जो पोषण के लिए प्रत्यक्ष रूप से उत्पादक, अर्थात् हरे पौधों को खाते हैं, प्राथमिक उपभोक्ता कहलाते हैं । उदाहरण—गाय, भैंस, बकरी इत्यादि ।

(ii) द्वितीयक उपभोक्ता—(Secondary consumers) कुछ जंतु मांसाहारी (carnivorous) होते हैं तथा वे शाकाहारी प्राथमिक उपभोक्ताओं को खाते हैं, द्वितीयक उपभोक्ता कहलाते हैं। उदाहरण—शेर, बाघ, कुछ पक्षी, सर्प, मेढक इत्यादि।

(iii) तृतीयक उपभोक्ता—(Tertiary consumers) सर्प जब मेढक (द्वितीयक उपभोक्ता) को खाता है तब वह तृतीय श्रेणी का उपभोक्ता कहलाता है । तृतीयक उपभोक्ता सामान्यतः उच्चतम श्रेणी के उपभोक्ता हैं, जो दूसरे जंतुओं द्वारा मारे और खाए नहीं जाते हैं, जैसे—शेर, चीता, गिद्ध आदि ।


4. मैदानी पारिस्थितिक तंत्र की एक आहार श्रृंखला का रेखांकित चित्र बनायें।

मैदानी पारिस्थितिक तंत्र की एक आहार श्रृंखला

उत्तर ⇒


5. किसी भी पारिस्थितिक तंत्र में अपघटक का क्या कार्य है ? यदि किसी पारितंत्र से अपघटक विलग हो जाए तो पारितंत्र पर क्या प्रभाव पड़ेगा ?

उत्तर ⇒किसी भी पारितंत्र में अपघटक मृत उत्पादक एवं उपभोक्ता का अपघटन करते हैं तथा उनसे उत्पन्न मौलिक कार्बनिक एवं अकार्बनिक पदार्थों को वातावरण में पुनः छोड़ देते हैं।
यदि किसी पारितंत्र से अपघटक को हटा दिया जाए, तो मृत पदार्थों की मात्रा बढ़ती चली जाएगी, वायुमंडल में विभिन्न गैसों का चक्रीय परिवर्तन नहीं हो पाएगा, जिसके कारण गैसों की प्रतिशत मात्रा घट जाएगी। जिससे उस पारितंत्र में रहने वाले जीवों को कठिनाइयाँ होंगी।


6. परितंत्र में अपमार्जकों की क्या भूमिका है ?

उत्तर ⇒पौधों और जंतुओं (उत्पादक और उपभोक्ता) के मृत शरीर तथा जंतुओं के वर्ण्य पदार्थ का जीवाणुओं (bacteria) और कवकों (fungi) के द्वारा अपघटन (decompose) किया जाता है। अतः जीवाणु और कवक अपघटनकर्ता या अपमार्जक (decomposers) कहलाते हैं। यह अपघटन के द्वारा मृत जीवों के शरीर और वऱ्या पदार्थ में उपस्थित कार्बनिक पदार्थों को अकार्बनिक तत्त्वों में तोड़कर मुक्त कर देते हैं। गैसीय तत्त्व जैसे नाइट्रोजन, ऑक्सीजन आदि वायुमंडल में चले जाते हैं, जबकि अन्य ठोस एवं द्रव पदार्थ मिट्टी में मिल जाते हैं या फिर जलमंडल के भाग बन जाते हैं। जीवाणु और कवक जैसे सूक्ष्मजीव (microorganism) सूक्ष्म उपभोक्ता (microconsumers) या सैप्रोट्रॉफ (saprotrophs) भी कहलाते हैं।
पारिस्थितिक तंत्र के सभी स्तर एक-दूसरे पर निर्भर हैं तथा शृंखलाबद्ध तरीके से एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं। अगर यह तंत्र भलीभाँति संतुलित होता रहे तो कोई भी स्तर कभी समाप्त नहीं होगा।


7. हमारे द्वारा उत्पादित अजैव निम्नीकरणीय कचरे से कौन-सी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं ?

उत्तर ⇒हमारे द्वारा उत्पादित कचरे को हम दो वर्गों में वर्गीकृत करते हैं –

(i) जैव निम्नीकृत (ii) अजैव निम्नीकृत

अजैव निम्नीकरणीय कचरे से हमें अति गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
यह अजैव निम्नीकरणीय कचरा वायु, जल तथा मुदा को प्रदूषित करते हैं। इस परिणामस्वरूप अनगिनत मक्खियाँ, मच्छर, जीवाण तथा अन्य अनेको सूक्ष्मजीवों के आवास बन जाते हैं जिससे इन जीवों की संख्या में वृद्धि हो जाती है । इनसे मानव तथा अन्य जंतुओं में विभिन्न प्रकार के रोग फैल जाते हैं।
जल स्रोतों के प्रदूषित होने से जलीय प्राणियों एवं वनस्पतियों के शरीरों में जल उपस्थित रसायनों का जमाव हो जाता है । जब मानव इन जलीय पादपों एवं जंतुओं का भक्षण करता है तो मानव में अनेक रोगों का जन्म होता है।
कछ ऐसे भी रसायन हैं जो मृदा में मिश्रित होकर उसे विषाक्त कर देते हैं, जो पौधों द्वारा अवशोषित कर लिये जाते हैं । यह रसायन पादपों के शरीर में एकत्र हो जाते हैं और जब मनुष्य इन पादपों का प्रयोग अपने खाने में करता है तो यह सभी रसायन मानव के शरीर में पहुँच जाते हैं।


8. यदि हमारे द्वारा सारा कचरा जैव निम्नीकरणीय हो तो क्या इनका हमारे पर्यावरण पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा ?

उत्तर ⇒यदि हमारे द्वारा सारा कचरा जैव निम्नीकरण हो तो इनका हमारे पर्यावरण पर गलत प्रभाव पड़ेगा ।
जैव निम्नीकरणीय पदार्थ जीवाणुओं, कवक तथा अनेक अन्य सूक्ष्मजीवों द्वारा निम्नीकृत किये जाते हैं । यह सभी जीव इस प्रकार के कचरे को अपने भोजन के रूप में प्रयोग करके अपनी संख्या में वृद्धि करेंगे। कचरे के विश्लेषण से विभिन्न प्रकार की गैसें उत्पन्न होती हैं जो वायुमंडल में मिलकर उसे प्रदूषित करती हैं ।
अतः यह कचरा भी किसी न किसी प्रकार पर्यावरण को प्रदूषित करने का कारण होता है।


9. आहार श्रृंखला से आप क्या समझते हैं ? उदाहरणसहित एक आहार श्रृंखला के विभिन्न पोषी स्तर का वर्णन करें। आहार-जाल आहार-श्रृंखला से किस प्रकार भिन्न है ?

उत्तर ⇒किसी भी पारितंत्र में जीवों की यह श्रृंखला जिसमें भोजन के माध्यम से ऊर्जा का प्रवाह होता है, आहार-शृंखला कहलाता है। यह निम्न प्रकार का होता है, वन पारिस्थितिक तंत्र, घासस्थलीय पारिस्थितिक तंत्र इत्यादि। एक वन पारिस्थिति तंत्र में घास का भक्षण हिरण करते हैं। जिन्हें पुनः बाघ या शेर खाते हैं। यहाँ हिरण प्राथमिक उपभोक्ता एवं बाघ या शेर सर्वोच्च उपभोक्ता है।

वन-पारिस्थितिक तंत्र की एक आहार शृंखला

जब एक से ज्यादा आहार शृंखला एक दूसरे से आड़ी-तिरछी जुड़ती है तो जाल जैसी संरचना बनाती है, जिसे आहार जाल कहते हैं।


10. आहार-जाल का निर्माण कैसे होता है ?

उत्तर ⇒पारिस्थितिक तंत्र में एक साथ कई आहार श्रृंखलाएँ पायी जाती हैं। ये आहार श्रृंखलाएँ हमेशा सीधी न होकर एक-दूसरे से आड़े-तिरछे जुड़कर एक जाल-सा बनाते हैं। आहार श्रृंखलाओं के इस जाल को आहार-जाल (food went कहते हैं। ऐसा इसलिए कि पारिस्थितिक तंत्र का एक उपभोक्ता एक से अधिक भोजन स्रोत का उपयोग करता है।

अनेक आहार श्रृंखलाओं से बना आहार जाल

11. कचरा प्रबंधन कैसे किया जा सकता है ?

उत्तर ⇒कचरे को एक जगह एकत्र कर उसका वैज्ञानिक तरीके से समुचित निपटारा करने को कचरा प्रबंधन कहते हैं। भीड़-भाड़ वाले स्थानों पर कचरे को एकत्र करने के लिए बड़ी-बड़ी धानियाँ होनी चाहिए। ऐसे अपशिष्ट जिनका पुनः चक्रण संभव है, को अलग कर अन्य अपशिष्टों को इन धानियों में एकत्र करना चाहिए। पुनः चक्रण वाले कचरे को वैसे लोगों को दे देनी चाहिए जो इनका उपयोग करते हैं। कचरे को एकत्रित कर उसे शहर के बाहर जला देना चाहिए या गड्ढों को भरने के उपयोग में किया जाना चाहिए।ठोस कचरे के अलावा उद्योगों से निष्कासित तरल अपशिष्टों एवं विभिन्न प्रकार के मलजल (sewage) को भी पाइपों के द्वारा एक जगह एकत्रित कर समुचित निपटारा किया जाना चाहिए। इसके लिए जीवाणुओं का भी प्रयोग होता है। इस प्रकार से कचरा प्रबंधन किया जा सकता है।


12. पारितंत्र की उत्पादकता से क्या समझते हैं? यह किन कारकों पर निर्भर करती है ?

उत्तर ⇒किसी भी पारितंत्र में प्रकाशसंश्लेषण के द्वारा कार्बनिक पदार्थ के उत्पादन की दर पारितंत्र की उत्पादकता कहलाती है। इसे किलो कैलोरी मी वर्ष के रूप में व्यक्त करते हैं। कुल उत्पादकता में से कुछ ऊर्जा हरे पौधों के उपापचयी क्रियाओं में खर्च हो जाता है तथा कुछ ऊर्जा वातावरण में ऊष्मा के रूप में विमुक्त हो जाती है। पारितंत्र की उत्पादकता निम्न कारकों पर निर्भर करती है सूर्य की रोशनी, तापक्रम, वर्षा, पोषक पदार्थ की उपलब्धता आदि। ये कार्बनिक पदार्थ जैव संहति या जैव मात्रा कहलाती है।


13. क्या किसी पोषी स्तर के सभी सदस्यों को हटाने का प्रभाव भिन्न-भिन्न पोषी स्तरों के लिए अलग-अलग होगा? क्या किसी पोषी स्तर के जीवों को पारितंत्र को प्रभावित किए बिना हटाना संभव है ?

उत्तर ⇒किसी पोषी स्तर के सभी सदस्यों को हटाने का प्रभाव भिन्न-भिन्न पोषी स्तर के लिए अलग-अलग होगा –

त्रितय उपभोक्ता

(i) उत्पादकों को हटाने का प्रभाव – यदि उत्पादकों को पूर्ण रूप से नष्ट कर दिया तो सारा पारितंत्र ही नष्ट हो जायेगा । तब किसी प्रकार के जीव या जीवन ही गायब हो जायेगा ।

(ii) शाकाहारियों को हटाने का प्रभाव या प्राथमिक उपभोक्ता को हटाने का प्रभाव-शाकाहारियों को हटाने से उत्पादकों (पेड़-पौधों-वनस्पतियों) के जनन और वृद्धि पर रोक टोक समाप्त हो जाएगी और मांसाहारी भोजन के अभाव में मृत्य को प्राप्त होंगे।

(iii) मांसाहारियों को हटाने का प्रभाव-मांसाहारियों को हटा देने से शाकाहारियों की इतनी ज्यादा संख्या बढ़ जायेगी कि क्षेत्र की संपूर्ण वनस्पतियाँ समाप्त हो जायेंगी ।

(iv) अपघटकों का हटाने का प्रभाव-अपघटकों को हटा देने से मृतकों (जीव-जंतु) की अधिकता हो जायेगी । उनसे तरह-तरह के जीवाणुओं के उत्पन्न होने से कई बीमारियाँ फैलेंगी । मिट्टी भी पोषक तत्त्वों से विहीन हो जायेगी एवं उत्पादक भी धीरे-धीरे समाप्त हो जायेंगे ।
किसी पोषी स्तर के जीवों को पारितंत्र को प्रभावित किए बिना हटाना संभव नहीं है । अगर हम उत्पादकों को हटायेंगे तो शाकाहारी उनके अभाव में नष्ट हो जायेंगे व शाकाहारी के न रहने से मांसाहारी भी जीवित नहीं रहेंगे । अपघटकों को हटा देने से उत्पादकों को अपनी वृद्धि के लिए पोषक तत्त्व नहीं प्राप्त होंगे।


14. जैव संहति का पिरामिड को समझाएँ।

उत्तर ⇒किसी पारितंत्र के आहार श्रृंखला के पोषी स्तर पर निश्चित समय में पाये गए सभी सदस्यों की जैव मात्रा जैव संहति का पिरामिड बनाती है। जैव संहति के पिरामिड में भी आधार से शीर्ष की ओर प्रत्येक पोषी स्तर की जैव मात्रा घटती जाती है। यह पिरामिड एक उर्ध्वाधर पिरामिड है।

रक्त कोशिकाओं

1. अपने प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण हेतु पाँच कार्यों का उल्लेख करें।

उत्तर⇒अकेले व्यक्ति के रूप में हम निम्न के प्रबंधन में योगदान दे सकते हैं –

(i) वन एवं वन्य जंतु- वन संरक्षण एवं वन्य जंतुओं के संरक्षण के प्रति । लोगों में जागरूकता जगा सकते हैं व अपने क्षेत्र के उन क्रियाकलापों में भाग ले सकते हैं जो इनसे संबंधित हों। इन मसलों पर कार्य कर कमीटियों की सहायता कर भी हम इनके प्रबंधन में योगदान दे सकते हैं।

(ii) जल संसाधन – अपने घर तथा कार्य स्थल पर जल का अपव्यय रोककर तथा वर्षा के जल को अपने घर में संग्रहित करके।

(ii) कोयला एवं पेट्रोलियम- विधुतको रोककर व कम-से-कम बिजली का उपयोग करके हम इनके प्रबंधन में योगदान दे सकते हैं।

(iv) मिट्टी-मिट्टी के कटाव पर रोक लगना चाहिए।

(v) पहाड़ – अनियमित रूप में पहाड कटाव कम होना चाहिए।


2. प्राकृतिक संसाधनों के ह्रास में जनसंख्या वृद्धि का कितना हाथ है ?

उत्तर⇒जनसंख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है। जनसंख्या वृद्धि के साथ-साथ आवश्यकताओं भी उभर कर सामने आ रही हैं। इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए परकृतिक संपदाओं की कमी हो रही है। प्राकृतिक संपदाएँ अधिक मात्रा में सिमित हैं जबकि जनसंख्या चरम सीमा पर पहुँच गई है। बढ़ती हुई जनसँख्याओ आवश्यकताओं की पर्ति करने के लिए भी प्राप्त संसाधन सीमित दायरे सख्या वृद्धि का यह भूचाल अधिक बढ़ता ही गया तो प्राकृतिक ससाधना से प्राप्त संपदाएँ अपना संतूलन बनाए रखने में समर्थ नहीं होंगी ।


3. जैविक आवर्धन क्या है ? क्या पारितंत्र के विभिन्न स्तरों पर जावक आवर्धन का प्रभाव भी भिन्न होता है ? क्यों

उत्तर⇒हमारी आहार श्रृंखला में कल रासायनिक पदार्थ जो कि अजैव निम्नीकृत होते हैं, मिट्टी के माध्यम से पौधों में प्रवेश कर जाते हैं और हर उस जीव में प्रवेश कर जाते हैं जो पौधों पर आश्रित है।
क्योंकि ये पदार्थ अजैव निम्नीकत है, यह प्रत्येक पोषी स्तर पर उत्तरोत्तर संग्रहित होते जाते हैं और यह ही जैविक आवर्धन कहलाता हैं।जैविक आवर्धन का प्रभाव आहारशंखला के ऊपरी भाग में भयावह होता है क्योंकि सबसे अधिक संग्रहित रासायनिक पदार्थ वहीं पहँचता है क्योंकि मनुष्य श्रृंखला में शिर्सस्थ है। अतः हमारे शरीर में यह रसायन सर्वाधिक मात्रा में संचित होता है।


4. “चिपको आंदोलन’ क्या है ?

उत्तर⇒ चिपको आंदोलन’ हिमालय की ऊँची पर्वत श्रंखला में गढवाल के ‘रेनी’ नामक गाँव में एक घटना से 1970 के प्रारंभिक दशक में हुआ था। यह विवाद लकड़ी के ठेकेदार एवं स्थानीय लोगों के बीच प्रारंभ हआ क्योंकि गाँव के समीप के वृक्ष काटने का अधिकार उसे दे दिया गया था । एक निश्चित दिन ठेकेदार के आदमी वृक्ष काटने के लिए आए जबकि वहाँ के निवासी पुरुष वहाँ नहीं थे। बिना किसी डर के वहाँ की महिलाएँ फौरन वहाँ पहुँच गईं तथा उन्होंने पेड़ों को अपनी बाँहों में भरकर (चिपक कर) ठेकेदार के आदमियों को वृक्ष काटने से रोका। अंतत: ठेकेदार को अपना काम बंद करना पड़ा।


5. जल संग्रहण पर प्रकाश डालें।

उत्तर⇒जल संभर प्रबंधन में मिट्टी एवं जल संरक्षण पर जोर दिया जाता है जिससे कि ‘जैव-मात्रा’ उत्पादन में वृद्धि हो सके। इसका प्रमुख उद्देश्य भूमि एवं जल के प्राथमिक स्रोतों का विकास, द्वितीयक संसाधन पौधों एवं जंतुओं का उत्पादन इस प्रकार करना जिससे पारिस्थितिक असंतुलन पैदा न हो। जल संभर प्रबंधन न केवल जल संभर समुदाय का उत्पादन एवं आय बढ़ाता है वरन् सूखे एवं बाढ़ को भी शांत करता है तथा निचले बाँध एवं जलाशयों का सेवा काल भी बढ़ाता है। यथा छोटे-छोटे गड्ढे खोदना, झीलों का निर्माण, साधारण जल संभर व्यवस्था की स्थापना. मिट्टी के छोटे बाँध बनाना, रेत तथा चूने के पत्थर के संग्रहक बनाना तथा घर की छतों से जल एकत्र करना। इससे भूजल स्तर के संग्रहक बनाना तथा नदी भी पुनः जीवित हो जाती है।
जल संग्रहण (water harvesting) भारत में बहुत पुरानी संकल्पना है। राजस्थान में खादिन, बड़े पात्र एवं नाड़ी, महाराष्ट्र के बंधारस एवं ताल, मध्य प्रदेश एवं उत्तरप्रदेश में बंधिस, बिहार में आहर तथा पाइन, हिमाचल प्रदेश में कुल्ह, जम्म के काँदी क्षेत्र में तालाब तथा तमिलनाडु में एरिस (Tank), केरल में सुरंगम, कर्नाटक में कहा इत्यादि प्राचीन जल संग्रहण तथा जल परिवहन संरचनाएँ आज भी उपयोग में हैं।


6. वन एवं वन्य जीवन के संरक्षण के लिए कुछ उपाय सुझाइए ।

उत्तर⇒ वन एक प्राकृतिक एवं राष्ट्रीय संपदा है। वन एवं वन्य जीवन का संरक्षण पर्यावरण की दृष्टि से ‘प्रकृति में संतुलन बनाए रखने के लिए तथा स्वयं मानव के अस्तित्व की रक्षा के लिए अति आवश्यक है। वन एवं वन्य जीवन के संरक्षण के लिए उपाय निम्नलिखित हैं –

(i)स्वस्थाने संरक्षण (In Situ Conservation) – इस विधि में किसी विशेष क्षेत्र में पाई जाने वाली प्रजातियों का उनके प्राकृतिक एवं स्वाभाविक आवास में संरक्षण (Conservation) एवं परिरक्षण (Protection) किया जाता है। उदाहरण –
वन्यजीव अभयारण्य, राष्ट्रीय उद्यान, जीवमंडल रिजर्व आदि।

(ii) बाह्यस्थाने संरक्षण (Ex. Situ Conservation)- इस विधि में प्रजाति को उनके प्राकृतिक आवास से बाहर ले जाकर संरक्षण, परिरक्षण एवं संवर्द्धन कराया जाता है। उदाहरण-वनस्पति उद्यानों एवं चिड़ियाघरों में दुर्लभ वन्य-जीवों को लाकर उनका संरक्षण।

(iii) अधिक-से-अधिक वृक्षारोपण।

(iv) वनोपज में वृद्धि।

(v) उचित वन प्रबंधन।


7. जब हम वन एवं वन्य जंतुओं की बात करते हैं तो चार मुख्य दावेदार सामने आते हैं। इनमें से किसे वन उत्पाद प्रबंधन हेतु निर्णय लेने के अधिकार दिये जा सकते है ? आप ऐसा क्यों सोचते है ?

उत्तर⇒जब हम वन एवं वन्य जंतुओं की बात करते हैं तो चार मुख्य दावेदार सामने आते हैं। वे हैं –

(i) वन के अंदर एवं इसके निकट रहने वाले लोग अपनी अनेक आवश्यकताओं के लिए वन पर निर्भर रहते हैं।

(ii) सरकार का वन विभाग जिनके पास वनों का स्वामित्व है तथा वे वनों से प्राप्त संसाधनों का नियंत्रण करते हैं।

(iii) उद्योगपति जो तेंदु पत्ती का उपयोग बीड़ी बनाने से लेकर कागज मिल तक विभिन्न वन उत्पादों का उपयोग करते हैं, परंतु वे वनों के किसी भी एक क्षेत्र पर निर्भर नहीं करते।

(iv) वन्य जीवन एवं प्रकृति प्रेमी जो प्रकृति का संरक्षण इसकी आद्य अवस्था में करना चाहते हैं। हमारे विचार से इनमें से वन उत्पाद प्रबंधन हेतु निर्णय लेने का अधिकार स्थानीय निवासियों को मिलना चाहिए। यह विकेंद्रीकरण की एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें आर्थिक विकास एवं पारिस्थितिक संरक्षण दोनों साथ-साथ चल सकते हैं ।


8. बड़े समतल भू-भाग में जल-संग्रहण स्थल की परंपरागत पद्धति क्या है ?

उत्तर⇒बड़े समतल भू-भाग में जल-संग्रहण स्थल मुख्यतः अर्द्धचंद्राकार मिट्टी के गड्ढे अथवा निचले स्थान, वर्षा ऋतु में पूरी तरह भर जाने वाली नालियाँ/प्राकृतिक जल मार्ग पर बनाए गये ‘चेक डैम’ हैं जो कंक्रीट अथवा छोटे कंकड़ पत्थरों द्वारा बनाए जाते हैं। इन छोटे बाँधों के अवरोध के कारण इनके पीछे मानसून का जल तालाबों में भर जाता है। केवल बड़े जलाशयों में जल पूरे वर्ष रहता है। परंतु छोटे जलाशयों में यह जल 6 महीने या उससे भी कम समय तक रहता है, उसके बाद यह सूख जाते हैं। इनका मुख्य उद्देश्य जल-भौम स्तर में सुधार करना है। भौम जल वाष्प बनकर उड़ता नहीं बल्कि आस-पास में फैल जाता है, बड़े क्षेत्र में वनस्पति को नमी प्रदान करता है। इससे मच्छरों के जनन की समस्या भी नहीं होती।


9. संपोषित विकास हेतु प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन किस प्रकार होना चाहिए ?

उत्तर⇒अकसर ही पर्यावरणीय समस्याओं से हम रू-बरू होते हैं। यह अधिकतर वैश्विक समस्याएँ हैं । इनके समाधान में हम अपने-आपको असहाय पाते हैं। इनके लिए अनेक अंतर्राष्ट्रीय कानून एवं विनियम हैं तथा हमारे देश में भी पर्यावरण संरक्षण हेतु अनेक कानून हैं। अनेक राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय संगठन भी पर्यावरण संरक्षण हेतु कार्य कर रहे हैं।
संसाधनों के अविवेकपूर्ण दोहन से (निःशेषण से) उत्पन्न समस्याओं के विषय में जागरूकता हमारे समाज में अपेक्षाकृत एक नया आयाम है। इसी का उदाहरण है ‘गंगा सफाई योजना’ जो करीब 1985 में प्रारंभ की गई क्योंकि गंगा के जल को गणवत्ता बहत कम हो गयी थी। प्राकतिक संसाधनों का प्रबंधन दीर्घकालिक दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हए करना होगा जिससे कि ये अगली कई पीढ़ियों तक उपलब्ध हो सके। इस प्रबंधन में इस बात का भी सनिश्चित करने की आवश्यकता है कि इनका वितरण सभी वर्गों में समान रूप से हो। सबसे मुख्य बात है कि संपोषित प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन में अपशिष्टों के सरक्षित निपटाने की भी व्यवस्था होनी चाहिए।


10. कुछ ऐसे सरल विकल्पों को लिखें जिनसे ऊर्जा की खपत में अंतर पड़ सकता है ?

उत्तर⇒कुछ ऐसे सरल विकल्प जिनसे ऊर्जा की खपत में अंतर पड़ सकता है, निम्नलिखित हैं –
(i) बस तथा अन्य पेट्रोल-डीजल से चलने वाले वाहनों का प्रयोग कम कर पैदल/साइकिल से चलना चाहिए।
(ii) अपने घरों में बल्ब की अपेक्षा फ्लोरोसेंट ट्यूब का प्रयोग करना।
(iii) लिफ्ट का प्रयोग न कर सीढ़ियों का प्रयोग करना।
(iv) सर्दी में अतिरिक्त स्वेटर पहनना, न कि हीटर अथवा सिगड़ी का प्रयोग करना।


11. क्या आपके विचार से संसाधनों का समान वितरण होना चाहिए ? संसाधनों के समान वितरण के विरुद्ध कौन-कौन-सी ताकतें कार्य कर सकती हैं ?

उत्तर⇒संसाधनों का समान वितरण होना चाहिए हमारे विचार से संसाधनों के प्रबंधन में दीर्घकालिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए तथा यह सुनिश्चित करना चाहिए संसाधनों का वितरण सभी वर्गों में समान हो। संसाधनों के समतामूलक वितरण को आज मानव के कल्याण का अनिवार्य अंग माना जाता है। संसाधनों के न्यायपूर्ण वितरण के अंतर्राष्ट्रीय, राष्ट्रीय और स्थानीय पहलू पर ध्यान देना होगा।
संसाधन जैसे-वन संसाधन के समान वितरण के विरुद्ध निम्नलिखित ताकतें काम कर सकती हैं –
(i) वनवासी या स्थानीय लोग।
(ii) वन विभाग
(iii) उद्योगपति
(iv) वन्य जीवन एवं प्रकृति प्रेमी।


12. हिमाचल प्रदेश में ‘कुल्ह’ पर टिप्पणी लिखें।

उत्तर⇒लगभग 400 वर्ष पूर्व हिमाचल प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में नहर सिंचाई की स्थानीय प्रणाली (व्यवस्था) का विकास हुआ। इन्हें ‘कुल्ह’ कहा जाता है। झरनों से बहने वाले जल को मानव-निर्मित छोटी-छोटी नालियों से पहाड़ी पर स्थित निचले गाँवों तक ले जाया जाता है। इस कुल्ह से प्राप्त जल का प्रबंधन क्षेत्र के सभी गाँवों की सहमति से किया जाता था। कृषि के मौसम में जल सर्वप्रथम दूरस्थ गाँव को दिया जाता था फिर उत्तरोत्तर ऊँचाई पर स्थित गाँव उस जल का उपयोग करते थे। कुल्ह की देख-रेख एवं प्रबंधन के लिए दो अथवा तीन लोग रखे जाते थे जिन्हें गाँव वाले वेतन देते थे। सिंचाई के अतिरिक्त इन कुल्ह से जल का भूमि में अंत:स्रवण भी होता रहता था जो विभिन्न स्थानों पर झरने को भी जल प्रदान करता था।


13. अकेले व्यक्ति के रूप में आप विभिन्न उत्पादों की खपत कम करने के लिए क्या कर सकते हैं ?

उत्तर⇒अकेले व्यक्ति के रूप में विभिन्न उत्पादों की खपत कम करने के लिए हम निम्नलिखित कार्य कर सकते हैं-
(i) विद्युत के अपव्यय को रोककर व इसका निम्नतम उपयोग कर।
(ii) रोशनी के लिए CFL’s का प्रयोग करके।
(iii) आने-जाने के लिए अपने वाहन की जगह सरकारी वाहनों का प्रयोग करके या जाने योग्य रास्तों पर पैदल या साइकिल का प्रयोग करके ।
(iv) जल का निम्नतम प्रयोग करके।
(v) पर्यावरण के संरक्षण से संबंधित जागरूकता अभियान में भाग लेकर।


14. गंगाजल में कोलिफॉर्म का संपूर्ण गणना स्तर (1993-1994 ग्राफ द्वारा दर्शाएँ।
उत्तर⇒


15. निम्न से संबंधित ऐसे पाँच कार्य लिखिए जो आपने पिछले सप्ताह में किये हैं –
(a) अपने प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण।
(b) अपने प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव को और बढ़ाया है।

उत्तर⇒(a) हमने पिछले सप्ताह अपने प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण किया है—
(i) विद्युत उपकरणों का व्यर्थ उपयोग नहीं किया है।
(ii) रोशनी के लिए CFL’s का प्रयोग किया है।
(iii) आने-जाने में पैदल या साइकिल से यात्रा की है।
(iv) कागजों का दुरुपयोग कम किया है।
(v) एयर कंडीशनर व फ्रिज का उपयोग कम किया है।

(b) अपने प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव को और बढ़ाया है ।

(i) कंप्यूटर पर प्रिंटिंग के लिए अधिक कागजों का प्रयोग करके।
(ii) पंखे का उपयोग ज्यादा किया।
(iii) आहार को व्यर्थ करके।
(iv) गर्मी में बार-बार नहाकर।
(v) टी०वी० का प्रयोग छुट्टियों में अत्यधिक किया।


16. अपने घर को पर्यावरण-मित्र बनाने के लिए आप उसमें कौन-कौन से परिवर्तन सुझा सकते हैं ? अथवा, पर्यावरण मित्र बनाने के लिए आप अपनी आदतों में कौन से परिवर्तन ला सकते हैं ?

उत्तर⇒ अपने आवास को पर्यानुकूलित बनाने के लिए निम्नलिखित परिवर्तन किये जा सकते हैं –

1. आवास में तथा उसके निकट जल का संग्रह नहीं किया जाना चाहिए जिससे जल में यदि कचरा उपस्थित हो तो सड़ने न पाए। मच्छर तथा जीवाणु जल को अपना आश्रय स्थल न बना लें।

2. पेय जल में कूड़ा-कचरा न डालें और न अन्य किसी को डालने दें।
3. जल के रिसाव को रोकना चाहिए।
4. जितने जल की आवश्यकता हो, उतना ही जल टोंटी से लें। व्यर्थ ही जल को न बहने दें।
5. जल का मितव्ययता से प्रयोग करें।
6. स्नान का जल, रसोई का प्रयोग किया हुआ जल व्यर्थ सीवर में न जाने दें वरन् उसका रसोई वाटिका में पौधों की सिंचाई हेतु प्रयोग करें।
7. आवास, गली एवं निकटवर्ती सड़क को साफ रखें। आवासीय कचरे को कूड़ेदान में एकत्र करें तत्पश्चात् उसका यथोचित स्थान पर निपटान करें।
8. आवश्यकतानुसार ही विद्युत का उपयोग करें। जरूरत न रहने पर पंखें. बल्ब, टी.वी. आदि बंद रखें।


17. मृदा अपरदन क्या है ? इसके कारण एवं प्रभाव क्या हैं ? उन विधियों का वर्णन करें जिनसे इसे रोका जा सके।

उत्तर⇒जल की तीव्रता तथा वायु की तीव्रता के कारण भूमि की ऊपर की परत के विनाश को मृदा अपरदन कहते हैं। – मृदा क्षरण के कारण—इसके मुख्य कारक वायु, जल तथा पेड़-पौधों द्वारा निरन्तर पृथ्वी से पोषक तत्वों का अवशोषण है। इस प्रक्रिया के कारण मृदा में निम्नलिखित हानियाँ दिखाई देती हैं –
1. मदा का अपरदन
2. मृदा की उर्वरा शक्ति का ह्रास।
उपक्त दोनों हानियाँ मानव के स्वार्थ द्वारा अधिक वनोन्मूलन तथा अल्पतम वृक्षारोपण के कारण हैं।

मृदा अपरदन पर निम्न प्रकार से नियंत्रण किया जा सकता है ।
1. भिन्न-भिन्न प्रकार की मृदा पर अनुकूलित फसलों का प्रबन्धन करना।
2. क्षरित मृदा के पुनःस्थापन हेतु अनुकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न करना ।
3. मृदा की ऊपरी परत के स्थानान्तरण की सुरक्षा हेतु उचित व्यवस्था करना जो निम्न प्रकार से की जा सकती है-
फसल चक्रण – इस प्रक्रिया में एक ही खेत में बदल-बदलकर फसलों दन करना। खाद्यान्न फसलों के उत्पादन के पश्चात भिन्न-भिन्न कल का फसला का उत्पादन एकान्तर क्रम में करना हो का द्वास न होने पाए। नाइट्रोजन तत्व की मात्रा को ही मृदा की उर्वरता कहते हैं।
एक फसल के उत्पादन के पश्चात् लम्बी अवधि के पश्चात् दूसरी फसल को उगाना जिससे मृदा को उर्वरता संचित करने हेतु पर्याप्त समय मिल जाता है। प्रत्येक फसल में भिन्न-भिन्न प्रकार के खरपतवार होते हैं । फसल चक्रण से खरपतवारों का प्रकोप कम हो जाता है। फसल चक्रण से जटिल पीड़कों तथा रोगों का भय कम होता है।
मिश्रित खेती में दो या दो से अधिक भिन्न प्रकार की विशेषताओं वाली फसलों को एक ही भूमि पर बारी-बारी से उगाना ।
रैखिक खेती से भी भमि की उर्वरा शक्ति कम नहीं होती। पहाड़ी क्षेत्रों में सीढ़ीनुमा खेती से भी मृदा अपरदन में ह्रास होता है।


18. मनुष्य पर विभिन्न गैसों के हानिकारक प्रभाव क्या होते हैं ?

उत्तर⇒गैसीय प्रदूषकों के हानिकारक प्रभाव –
(i) सल्फर डाइऑक्साइड (SO2)- सल्फर डाइऑक्साइड वायु की जलवाष्प में घुलकर सल्फ्यूरिक अम्ल बना देती है जो फेफड़ों तथा इमारतों को हानि पहुँचाता है।

(ii) हाइड्रोजन सल्फाइड (H2S)- यह सजीवों तथा पौधों को हान पहुँचाता है। लेड पेंटिंग काली हो जाती है।

(iii) कार्बन मोनोऑक्साइड (Co)-यह रक्त के लाल वर्णक से मिलकर ऑक्सी हीमोग्लोबिन के स्थान पर कार्बोक्सी हीमोग्लोबीन बनाती है। इससे फेफड़ों से ऊतकों तक ऑक्सीजन संवहन में बाधा होती है। इसके अधिक सेवन से मनुष्य की मृत्यु भी हो सकती है।

(iv) कार्बन डाइऑक्साइड (CO2)- इसकी अधिकतम मात्रा से ग्रीन हाउस प्रभाव होगा, जिससे कमरे का ताप बढ़ जायेगा।

(v) नाइट्रोजन के ऑक्साइड – नाइट्रोजन के ऑक्साइड फोटो रासायनिक धूम कोहरा बनाते हैं, जिससे आँखों में जलन होती है तथा पौधों को हानि पहुँचती है।


19. कृषि वानिकी से आपका क्या तात्पर्य है ? इसके लाभ बताइए।

उत्तर⇒ कृषि वानिकी सामाजिक वानिकी का ही परिवर्तित रूप है। कृषि वानिकी एक तंत्र है जिसमें भूमि का उपयोग वर्षानुवर्षीय उद्देश्य युक्त उसी भूमि का किया जाता है जिस पर वार्षिक कृषि एवं जन्तुओं को पाला जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य अधिकतम लाभ प्राप्त करना है जिससे जीवन के आधार को बने रहने में लाभ मिल सके। यह एक सत्य है कि प्राचीन भूमि का उपयोग कृषि वानिकी तथा पशुपालन में किया जाता है।

कृषि वानिकी के निम्नलिखित लाभ हैं –
1. यह जनसंख्या की आवश्यकता की पूर्ति करती है।
2. यह पर्यावरण को संरक्षित करती है। .
3. इससे पशुओं के लिए चारा प्राप्त होता है, ईंधन, फसलें तथा इमारती लकड़ी प्राप्त होती है।
4. यह कार्यक्रम रोजगार के अवसर प्रदान करता है।
5. कृषि वानिकी फार्म में अधिक उत्पादन पर बल देती है तथा खेतों में नाइट्रोजन डालकर उसकी उर्वरा शक्ति को बढ़ावा देती है।
6. कॉफी तथा कोको उत्पादन के लिए कृषि वानिकी बहुत उपयोगी है। कृषि वानिकी में बहुफसली कृषि की जाती है । इससे उत्पन्न होने वाले वृक्ष छाया देते हैं तथा वृक्षों के नीचे के स्थानों पर नकदी फसल उगाते हैं। कृषि वानिकी, सामाजिक वानिकी तथा सामुदायिक वानिकी बहुत ही सामान्य है।

1. अपने प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण हेतु पाँच कार्यों का उल्लेख करें।

उत्तर⇒अकेले व्यक्ति के रूप में हम निम्न के प्रबंधन में योगदान दे सकते हैं –

(i) वन एवं वन्य जंतु- वन संरक्षण एवं वन्य जंतुओं के संरक्षण के प्रति । लोगों में जागरूकता जगा सकते हैं व अपने क्षेत्र के उन क्रियाकलापों में भाग ले सकते हैं जो इनसे संबंधित हों। इन मसलों पर कार्य कर कमीटियों की सहायता कर भी हम इनके प्रबंधन में योगदान दे सकते हैं।

(ii) जल संसाधन – अपने घर तथा कार्य स्थल पर जल का अपव्यय रोककर तथा वर्षा के जल को अपने घर में संग्रहित करके।

(ii) कोयला एवं पेट्रोलियम- विधुतको रोककर व कम-से-कम बिजली का उपयोग करके हम इनके प्रबंधन में योगदान दे सकते हैं।

(iv) मिट्टी-मिट्टी के कटाव पर रोक लगना चाहिए।

(v) पहाड़ – अनियमित रूप में पहाड कटाव कम होना चाहिए।


2. प्राकृतिक संसाधनों के ह्रास में जनसंख्या वृद्धि का कितना हाथ है ?

उत्तर⇒जनसंख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है। जनसंख्या वृद्धि के साथ-साथ आवश्यकताओं भी उभर कर सामने आ रही हैं। इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए परकृतिक संपदाओं की कमी हो रही है। प्राकृतिक संपदाएँ अधिक मात्रा में सिमित हैं जबकि जनसंख्या चरम सीमा पर पहुँच गई है। बढ़ती हुई जनसँख्याओ आवश्यकताओं की पर्ति करने के लिए भी प्राप्त संसाधन सीमित दायरे सख्या वृद्धि का यह भूचाल अधिक बढ़ता ही गया तो प्राकृतिक ससाधना से प्राप्त संपदाएँ अपना संतूलन बनाए रखने में समर्थ नहीं होंगी ।


3. जैविक आवर्धन क्या है ? क्या पारितंत्र के विभिन्न स्तरों पर जावक आवर्धन का प्रभाव भी भिन्न होता है ? क्यों

उत्तर⇒हमारी आहार श्रृंखला में कल रासायनिक पदार्थ जो कि अजैव निम्नीकृत होते हैं, मिट्टी के माध्यम से पौधों में प्रवेश कर जाते हैं और हर उस जीव में प्रवेश कर जाते हैं जो पौधों पर आश्रित है।
क्योंकि ये पदार्थ अजैव निम्नीकत है, यह प्रत्येक पोषी स्तर पर उत्तरोत्तर संग्रहित होते जाते हैं और यह ही जैविक आवर्धन कहलाता हैं।जैविक आवर्धन का प्रभाव आहारशंखला के ऊपरी भाग में भयावह होता है क्योंकि सबसे अधिक संग्रहित रासायनिक पदार्थ वहीं पहँचता है क्योंकि मनुष्य श्रृंखला में शिर्सस्थ है। अतः हमारे शरीर में यह रसायन सर्वाधिक मात्रा में संचित होता है।


4. “चिपको आंदोलन’ क्या है ?

उत्तर⇒ चिपको आंदोलन’ हिमालय की ऊँची पर्वत श्रंखला में गढवाल के ‘रेनी’ नामक गाँव में एक घटना से 1970 के प्रारंभिक दशक में हुआ था। यह विवाद लकड़ी के ठेकेदार एवं स्थानीय लोगों के बीच प्रारंभ हआ क्योंकि गाँव के समीप के वृक्ष काटने का अधिकार उसे दे दिया गया था । एक निश्चित दिन ठेकेदार के आदमी वृक्ष काटने के लिए आए जबकि वहाँ के निवासी पुरुष वहाँ नहीं थे। बिना किसी डर के वहाँ की महिलाएँ फौरन वहाँ पहुँच गईं तथा उन्होंने पेड़ों को अपनी बाँहों में भरकर (चिपक कर) ठेकेदार के आदमियों को वृक्ष काटने से रोका। अंतत: ठेकेदार को अपना काम बंद करना पड़ा।


5. जल संग्रहण पर प्रकाश डालें।

उत्तर⇒जल संभर प्रबंधन में मिट्टी एवं जल संरक्षण पर जोर दिया जाता है जिससे कि ‘जैव-मात्रा’ उत्पादन में वृद्धि हो सके। इसका प्रमुख उद्देश्य भूमि एवं जल के प्राथमिक स्रोतों का विकास, द्वितीयक संसाधन पौधों एवं जंतुओं का उत्पादन इस प्रकार करना जिससे पारिस्थितिक असंतुलन पैदा न हो। जल संभर प्रबंधन न केवल जल संभर समुदाय का उत्पादन एवं आय बढ़ाता है वरन् सूखे एवं बाढ़ को भी शांत करता है तथा निचले बाँध एवं जलाशयों का सेवा काल भी बढ़ाता है। यथा छोटे-छोटे गड्ढे खोदना, झीलों का निर्माण, साधारण जल संभर व्यवस्था की स्थापना. मिट्टी के छोटे बाँध बनाना, रेत तथा चूने के पत्थर के संग्रहक बनाना तथा घर की छतों से जल एकत्र करना। इससे भूजल स्तर के संग्रहक बनाना तथा नदी भी पुनः जीवित हो जाती है।
जल संग्रहण (water harvesting) भारत में बहुत पुरानी संकल्पना है। राजस्थान में खादिन, बड़े पात्र एवं नाड़ी, महाराष्ट्र के बंधारस एवं ताल, मध्य प्रदेश एवं उत्तरप्रदेश में बंधिस, बिहार में आहर तथा पाइन, हिमाचल प्रदेश में कुल्ह, जम्म के काँदी क्षेत्र में तालाब तथा तमिलनाडु में एरिस (Tank), केरल में सुरंगम, कर्नाटक में कहा इत्यादि प्राचीन जल संग्रहण तथा जल परिवहन संरचनाएँ आज भी उपयोग में हैं।


6. वन एवं वन्य जीवन के संरक्षण के लिए कुछ उपाय सुझाइए ।

उत्तर⇒ वन एक प्राकृतिक एवं राष्ट्रीय संपदा है। वन एवं वन्य जीवन का संरक्षण पर्यावरण की दृष्टि से ‘प्रकृति में संतुलन बनाए रखने के लिए तथा स्वयं मानव के अस्तित्व की रक्षा के लिए अति आवश्यक है। वन एवं वन्य जीवन के संरक्षण के लिए उपाय निम्नलिखित हैं –

(i)स्वस्थाने संरक्षण (In Situ Conservation) – इस विधि में किसी विशेष क्षेत्र में पाई जाने वाली प्रजातियों का उनके प्राकृतिक एवं स्वाभाविक आवास में संरक्षण (Conservation) एवं परिरक्षण (Protection) किया जाता है। उदाहरण –
वन्यजीव अभयारण्य, राष्ट्रीय उद्यान, जीवमंडल रिजर्व आदि।

(ii) बाह्यस्थाने संरक्षण (Ex. Situ Conservation)- इस विधि में प्रजाति को उनके प्राकृतिक आवास से बाहर ले जाकर संरक्षण, परिरक्षण एवं संवर्द्धन कराया जाता है। उदाहरण-वनस्पति उद्यानों एवं चिड़ियाघरों में दुर्लभ वन्य-जीवों को लाकर उनका संरक्षण।

(iii) अधिक-से-अधिक वृक्षारोपण।

(iv) वनोपज में वृद्धि।

(v) उचित वन प्रबंधन।


7. जब हम वन एवं वन्य जंतुओं की बात करते हैं तो चार मुख्य दावेदार सामने आते हैं। इनमें से किसे वन उत्पाद प्रबंधन हेतु निर्णय लेने के अधिकार दिये जा सकते है ? आप ऐसा क्यों सोचते है ?

उत्तर⇒जब हम वन एवं वन्य जंतुओं की बात करते हैं तो चार मुख्य दावेदार सामने आते हैं। वे हैं –

(i) वन के अंदर एवं इसके निकट रहने वाले लोग अपनी अनेक आवश्यकताओं के लिए वन पर निर्भर रहते हैं।

(ii) सरकार का वन विभाग जिनके पास वनों का स्वामित्व है तथा वे वनों से प्राप्त संसाधनों का नियंत्रण करते हैं।

(iii) उद्योगपति जो तेंदु पत्ती का उपयोग बीड़ी बनाने से लेकर कागज मिल तक विभिन्न वन उत्पादों का उपयोग करते हैं, परंतु वे वनों के किसी भी एक क्षेत्र पर निर्भर नहीं करते।

(iv) वन्य जीवन एवं प्रकृति प्रेमी जो प्रकृति का संरक्षण इसकी आद्य अवस्था में करना चाहते हैं। हमारे विचार से इनमें से वन उत्पाद प्रबंधन हेतु निर्णय लेने का अधिकार स्थानीय निवासियों को मिलना चाहिए। यह विकेंद्रीकरण की एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें आर्थिक विकास एवं पारिस्थितिक संरक्षण दोनों साथ-साथ चल सकते हैं ।


8. बड़े समतल भू-भाग में जल-संग्रहण स्थल की परंपरागत पद्धति क्या है ?

उत्तर⇒बड़े समतल भू-भाग में जल-संग्रहण स्थल मुख्यतः अर्द्धचंद्राकार मिट्टी के गड्ढे अथवा निचले स्थान, वर्षा ऋतु में पूरी तरह भर जाने वाली नालियाँ/प्राकृतिक जल मार्ग पर बनाए गये ‘चेक डैम’ हैं जो कंक्रीट अथवा छोटे कंकड़ पत्थरों द्वारा बनाए जाते हैं। इन छोटे बाँधों के अवरोध के कारण इनके पीछे मानसून का जल तालाबों में भर जाता है। केवल बड़े जलाशयों में जल पूरे वर्ष रहता है। परंतु छोटे जलाशयों में यह जल 6 महीने या उससे भी कम समय तक रहता है, उसके बाद यह सूख जाते हैं। इनका मुख्य उद्देश्य जल-भौम स्तर में सुधार करना है। भौम जल वाष्प बनकर उड़ता नहीं बल्कि आस-पास में फैल जाता है, बड़े क्षेत्र में वनस्पति को नमी प्रदान करता है। इससे मच्छरों के जनन की समस्या भी नहीं होती।


9. संपोषित विकास हेतु प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन किस प्रकार होना चाहिए ?

उत्तर⇒अकसर ही पर्यावरणीय समस्याओं से हम रू-बरू होते हैं। यह अधिकतर वैश्विक समस्याएँ हैं । इनके समाधान में हम अपने-आपको असहाय पाते हैं। इनके लिए अनेक अंतर्राष्ट्रीय कानून एवं विनियम हैं तथा हमारे देश में भी पर्यावरण संरक्षण हेतु अनेक कानून हैं। अनेक राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय संगठन भी पर्यावरण संरक्षण हेतु कार्य कर रहे हैं।
संसाधनों के अविवेकपूर्ण दोहन से (निःशेषण से) उत्पन्न समस्याओं के विषय में जागरूकता हमारे समाज में अपेक्षाकृत एक नया आयाम है। इसी का उदाहरण है ‘गंगा सफाई योजना’ जो करीब 1985 में प्रारंभ की गई क्योंकि गंगा के जल को गणवत्ता बहत कम हो गयी थी। प्राकतिक संसाधनों का प्रबंधन दीर्घकालिक दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हए करना होगा जिससे कि ये अगली कई पीढ़ियों तक उपलब्ध हो सके। इस प्रबंधन में इस बात का भी सनिश्चित करने की आवश्यकता है कि इनका वितरण सभी वर्गों में समान रूप से हो। सबसे मुख्य बात है कि संपोषित प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन में अपशिष्टों के सरक्षित निपटाने की भी व्यवस्था होनी चाहिए।


10. कुछ ऐसे सरल विकल्पों को लिखें जिनसे ऊर्जा की खपत में अंतर पड़ सकता है ?

उत्तर⇒कुछ ऐसे सरल विकल्प जिनसे ऊर्जा की खपत में अंतर पड़ सकता है, निम्नलिखित हैं –
(i) बस तथा अन्य पेट्रोल-डीजल से चलने वाले वाहनों का प्रयोग कम कर पैदल/साइकिल से चलना चाहिए।
(ii) अपने घरों में बल्ब की अपेक्षा फ्लोरोसेंट ट्यूब का प्रयोग करना।
(iii) लिफ्ट का प्रयोग न कर सीढ़ियों का प्रयोग करना।
(iv) सर्दी में अतिरिक्त स्वेटर पहनना, न कि हीटर अथवा सिगड़ी का प्रयोग करना।


11. क्या आपके विचार से संसाधनों का समान वितरण होना चाहिए ? संसाधनों के समान वितरण के विरुद्ध कौन-कौन-सी ताकतें कार्य कर सकती हैं ?

उत्तर⇒संसाधनों का समान वितरण होना चाहिए हमारे विचार से संसाधनों के प्रबंधन में दीर्घकालिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए तथा यह सुनिश्चित करना चाहिए संसाधनों का वितरण सभी वर्गों में समान हो। संसाधनों के समतामूलक वितरण को आज मानव के कल्याण का अनिवार्य अंग माना जाता है। संसाधनों के न्यायपूर्ण वितरण के अंतर्राष्ट्रीय, राष्ट्रीय और स्थानीय पहलू पर ध्यान देना होगा।
संसाधन जैसे-वन संसाधन के समान वितरण के विरुद्ध निम्नलिखित ताकतें काम कर सकती हैं –
(i) वनवासी या स्थानीय लोग।
(ii) वन विभाग
(iii) उद्योगपति
(iv) वन्य जीवन एवं प्रकृति प्रेमी।


12. हिमाचल प्रदेश में ‘कुल्ह’ पर टिप्पणी लिखें।

उत्तर⇒लगभग 400 वर्ष पूर्व हिमाचल प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में नहर सिंचाई की स्थानीय प्रणाली (व्यवस्था) का विकास हुआ। इन्हें ‘कुल्ह’ कहा जाता है। झरनों से बहने वाले जल को मानव-निर्मित छोटी-छोटी नालियों से पहाड़ी पर स्थित निचले गाँवों तक ले जाया जाता है। इस कुल्ह से प्राप्त जल का प्रबंधन क्षेत्र के सभी गाँवों की सहमति से किया जाता था। कृषि के मौसम में जल सर्वप्रथम दूरस्थ गाँव को दिया जाता था फिर उत्तरोत्तर ऊँचाई पर स्थित गाँव उस जल का उपयोग करते थे। कुल्ह की देख-रेख एवं प्रबंधन के लिए दो अथवा तीन लोग रखे जाते थे जिन्हें गाँव वाले वेतन देते थे। सिंचाई के अतिरिक्त इन कुल्ह से जल का भूमि में अंत:स्रवण भी होता रहता था जो विभिन्न स्थानों पर झरने को भी जल प्रदान करता था।


13. अकेले व्यक्ति के रूप में आप विभिन्न उत्पादों की खपत कम करने के लिए क्या कर सकते हैं ?

उत्तर⇒अकेले व्यक्ति के रूप में विभिन्न उत्पादों की खपत कम करने के लिए हम निम्नलिखित कार्य कर सकते हैं-
(i) विद्युत के अपव्यय को रोककर व इसका निम्नतम उपयोग कर।
(ii) रोशनी के लिए CFL’s का प्रयोग करके।
(iii) आने-जाने के लिए अपने वाहन की जगह सरकारी वाहनों का प्रयोग करके या जाने योग्य रास्तों पर पैदल या साइकिल का प्रयोग करके ।
(iv) जल का निम्नतम प्रयोग करके।
(v) पर्यावरण के संरक्षण से संबंधित जागरूकता अभियान में भाग लेकर।


14. गंगाजल में कोलिफॉर्म का संपूर्ण गणना स्तर (1993-1994 ग्राफ द्वारा दर्शाएँ।
उत्तर⇒


15. निम्न से संबंधित ऐसे पाँच कार्य लिखिए जो आपने पिछले सप्ताह में किये हैं –
(a) अपने प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण।
(b) अपने प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव को और बढ़ाया है।

उत्तर⇒(a) हमने पिछले सप्ताह अपने प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण किया है—
(i) विद्युत उपकरणों का व्यर्थ उपयोग नहीं किया है।
(ii) रोशनी के लिए CFL’s का प्रयोग किया है।
(iii) आने-जाने में पैदल या साइकिल से यात्रा की है।
(iv) कागजों का दुरुपयोग कम किया है।
(v) एयर कंडीशनर व फ्रिज का उपयोग कम किया है।

(b) अपने प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव को और बढ़ाया है ।

(i) कंप्यूटर पर प्रिंटिंग के लिए अधिक कागजों का प्रयोग करके।
(ii) पंखे का उपयोग ज्यादा किया।
(iii) आहार को व्यर्थ करके।
(iv) गर्मी में बार-बार नहाकर।
(v) टी०वी० का प्रयोग छुट्टियों में अत्यधिक किया।


16. अपने घर को पर्यावरण-मित्र बनाने के लिए आप उसमें कौन-कौन से परिवर्तन सुझा सकते हैं ? अथवा, पर्यावरण मित्र बनाने के लिए आप अपनी आदतों में कौन से परिवर्तन ला सकते हैं ?

उत्तर⇒ अपने आवास को पर्यानुकूलित बनाने के लिए निम्नलिखित परिवर्तन किये जा सकते हैं –

1. आवास में तथा उसके निकट जल का संग्रह नहीं किया जाना चाहिए जिससे जल में यदि कचरा उपस्थित हो तो सड़ने न पाए। मच्छर तथा जीवाणु जल को अपना आश्रय स्थल न बना लें।

2. पेय जल में कूड़ा-कचरा न डालें और न अन्य किसी को डालने दें।
3. जल के रिसाव को रोकना चाहिए।
4. जितने जल की आवश्यकता हो, उतना ही जल टोंटी से लें। व्यर्थ ही जल को न बहने दें।
5. जल का मितव्ययता से प्रयोग करें।
6. स्नान का जल, रसोई का प्रयोग किया हुआ जल व्यर्थ सीवर में न जाने दें वरन् उसका रसोई वाटिका में पौधों की सिंचाई हेतु प्रयोग करें।
7. आवास, गली एवं निकटवर्ती सड़क को साफ रखें। आवासीय कचरे को कूड़ेदान में एकत्र करें तत्पश्चात् उसका यथोचित स्थान पर निपटान करें।
8. आवश्यकतानुसार ही विद्युत का उपयोग करें। जरूरत न रहने पर पंखें. बल्ब, टी.वी. आदि बंद रखें।


17. मृदा अपरदन क्या है ? इसके कारण एवं प्रभाव क्या हैं ? उन विधियों का वर्णन करें जिनसे इसे रोका जा सके।

उत्तर⇒जल की तीव्रता तथा वायु की तीव्रता के कारण भूमि की ऊपर की परत के विनाश को मृदा अपरदन कहते हैं। – मृदा क्षरण के कारण—इसके मुख्य कारक वायु, जल तथा पेड़-पौधों द्वारा निरन्तर पृथ्वी से पोषक तत्वों का अवशोषण है। इस प्रक्रिया के कारण मृदा में निम्नलिखित हानियाँ दिखाई देती हैं –
1. मदा का अपरदन
2. मृदा की उर्वरा शक्ति का ह्रास।
उपक्त दोनों हानियाँ मानव के स्वार्थ द्वारा अधिक वनोन्मूलन तथा अल्पतम वृक्षारोपण के कारण हैं।

मृदा अपरदन पर निम्न प्रकार से नियंत्रण किया जा सकता है ।
1. भिन्न-भिन्न प्रकार की मृदा पर अनुकूलित फसलों का प्रबन्धन करना।
2. क्षरित मृदा के पुनःस्थापन हेतु अनुकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न करना ।
3. मृदा की ऊपरी परत के स्थानान्तरण की सुरक्षा हेतु उचित व्यवस्था करना जो निम्न प्रकार से की जा सकती है-
फसल चक्रण – इस प्रक्रिया में एक ही खेत में बदल-बदलकर फसलों दन करना। खाद्यान्न फसलों के उत्पादन के पश्चात भिन्न-भिन्न कल का फसला का उत्पादन एकान्तर क्रम में करना हो का द्वास न होने पाए। नाइट्रोजन तत्व की मात्रा को ही मृदा की उर्वरता कहते हैं।
एक फसल के उत्पादन के पश्चात् लम्बी अवधि के पश्चात् दूसरी फसल को उगाना जिससे मृदा को उर्वरता संचित करने हेतु पर्याप्त समय मिल जाता है। प्रत्येक फसल में भिन्न-भिन्न प्रकार के खरपतवार होते हैं । फसल चक्रण से खरपतवारों का प्रकोप कम हो जाता है। फसल चक्रण से जटिल पीड़कों तथा रोगों का भय कम होता है।
मिश्रित खेती में दो या दो से अधिक भिन्न प्रकार की विशेषताओं वाली फसलों को एक ही भूमि पर बारी-बारी से उगाना ।
रैखिक खेती से भी भमि की उर्वरा शक्ति कम नहीं होती। पहाड़ी क्षेत्रों में सीढ़ीनुमा खेती से भी मृदा अपरदन में ह्रास होता है।


18. मनुष्य पर विभिन्न गैसों के हानिकारक प्रभाव क्या होते हैं ?

उत्तर⇒गैसीय प्रदूषकों के हानिकारक प्रभाव –
(i) सल्फर डाइऑक्साइड (SO2)- सल्फर डाइऑक्साइड वायु की जलवाष्प में घुलकर सल्फ्यूरिक अम्ल बना देती है जो फेफड़ों तथा इमारतों को हानि पहुँचाता है।

(ii) हाइड्रोजन सल्फाइड (H2S)- यह सजीवों तथा पौधों को हान पहुँचाता है। लेड पेंटिंग काली हो जाती है।

(iii) कार्बन मोनोऑक्साइड (Co)-यह रक्त के लाल वर्णक से मिलकर ऑक्सी हीमोग्लोबिन के स्थान पर कार्बोक्सी हीमोग्लोबीन बनाती है। इससे फेफड़ों से ऊतकों तक ऑक्सीजन संवहन में बाधा होती है। इसके अधिक सेवन से मनुष्य की मृत्यु भी हो सकती है।

(iv) कार्बन डाइऑक्साइड (CO2)- इसकी अधिकतम मात्रा से ग्रीन हाउस प्रभाव होगा, जिससे कमरे का ताप बढ़ जायेगा।

(v) नाइट्रोजन के ऑक्साइड – नाइट्रोजन के ऑक्साइड फोटो रासायनिक धूम कोहरा बनाते हैं, जिससे आँखों में जलन होती है तथा पौधों को हानि पहुँचती है।


19. कृषि वानिकी से आपका क्या तात्पर्य है ? इसके लाभ बताइए।

उत्तर⇒ कृषि वानिकी सामाजिक वानिकी का ही परिवर्तित रूप है। कृषि वानिकी एक तंत्र है जिसमें भूमि का उपयोग वर्षानुवर्षीय उद्देश्य युक्त उसी भूमि का किया जाता है जिस पर वार्षिक कृषि एवं जन्तुओं को पाला जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य अधिकतम लाभ प्राप्त करना है जिससे जीवन के आधार को बने रहने में लाभ मिल सके। यह एक सत्य है कि प्राचीन भूमि का उपयोग कृषि वानिकी तथा पशुपालन में किया जाता है।

कृषि वानिकी के निम्नलिखित लाभ हैं –
1. यह जनसंख्या की आवश्यकता की पूर्ति करती है।
2. यह पर्यावरण को संरक्षित करती है। .
3. इससे पशुओं के लिए चारा प्राप्त होता है, ईंधन, फसलें तथा इमारती लकड़ी प्राप्त होती है।
4. यह कार्यक्रम रोजगार के अवसर प्रदान करता है।
5. कृषि वानिकी फार्म में अधिक उत्पादन पर बल देती है तथा खेतों में नाइट्रोजन डालकर उसकी उर्वरा शक्ति को बढ़ावा देती है।
6. कॉफी तथा कोको उत्पादन के लिए कृषि वानिकी बहुत उपयोगी है। कृषि वानिकी में बहुफसली कृषि की जाती है । इससे उत्पन्न होने वाले वृक्ष छाया देते हैं तथा वृक्षों के नीचे के स्थानों पर नकदी फसल उगाते हैं। कृषि वानिकी, सामाजिक वानिकी तथा सामुदायिक वानिकी बहुत ही सामान्य है।

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examunlocker@gmail.com

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