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1. विद्युत आवेश तथा क्षेत्र ( Short Answer Type Question )


Q.1. आवेश का संरक्षण सिद्धान्त क्या है ? समझाएँ।

Ans ⇒ आवेश का संरक्षण सिद्धान्त – “किसी संकाय का कुल आवेश नियत होता है।अर्थात् आवेश न तो नष्ट किया जा सकता है और न ही इनकी सृष्टि की जा सकती है। किसी भी प्रक्रिया के पहले निकाय का जो नेट आवेश होता है, वही प्रक्रिया के बाद भी रहता है। यही आवेश का संरक्षण सिद्धान्त है।


Q.2. विद्युत क्षेत्र तथा उसकी तीव्रता से आप क्या समझते हैं ?

आवेश का संरक्षण सिद्धान्त क्या है

Ans ⇒ विद्युत क्षेत्र – विद्युत क्षेत्र किसी आवेश के चारों तरफ का वह आकाश है जहाँ विद्युत बल का अनुभव किया जा सकता है। एक-दूसरे से r दूरी पर स्थित दो आवेश q तथा q0 के बीच पारस्परिक क्रिया इस प्रकार होती है कि आवेश q0 अपने चारों तरफ एक विद्युत क्षेत्र उत्पन्न करता है,
जिसका अस्तित्व दूसरे आवेशों की उपस्थिति से मुक्त होता है। उपस्थिति की जॉच भी होती है जब एक दूसरे आवेश q0 इस क्षेत्र में लाया जाता है। आवेश q0 का क्षेत्र        जाँच–आवेश से पारस्परिक क्रिया कर विद्युत बल विद्युत क्षेत्र उत्पन्न करता है। बल विद्युत क्षेत्र का परिमाण दोनों आवेशों के बीच की दूरी पर निर्भर करता है। आवेश q के कारण r दुरी पर स्थित विधुत क्षेत्र की तीव्रता  है, जहाँ विद्युत क्षेत्र आवेश q के कारण q0 पर लगता हुआ बल है।
इस प्रकार विद्युत क्षेत्र में किसी बिन्दु पर एकांक धनावेश पर क्रियाशील बल को उसकी तीव्रता कहते हैं। विद्युत तीव्रता एक सदिश राशि है। इसकी दिशा बल विद्युत क्षेत्र की दिशा होती है।
इस प्रकार विद्युत क्षेत्र में किसी बिन्दु पर एकांक धनावेश

विद्युत क्षेत्र की तीव्रता, E का S.I. मात्रक न्यूटन/ कूलम्ब है।


Q.3. विद्युत द्विध्रुव तथा द्विध्रुव आघूर्ण क्या है ?

Ans ⇒ विद्युत द्विध्रुव – दो बराबर तथा विपरीत बिन्दु आवेश के किसी अल्प दूरी पर स्थित होने की स्थिति में उस निकाय को विद्युत द्विध्रुव कहते हैं।

द्विधव आघूर्ण

द्विधव आघूर्ण – किसी विद्युत द्विध्रुव का द्विध्रुव आघूर्ण किसी एक आवेश का मान तथा दोनों आवेशों के बीच की दूरी का गुणनफल है।
माना कि A तथा B बिन्दु पर स्थित दो आवेश (-q) तथा (+q) परस्पर 2l दूरी पर स्थित हैं, तो उस विद्युत द्विध्रुव का द्विध्रुव 

आघूर्ण, P = q x 2l = 2ql है। यह एक सदिश राशि है। इसकी दिशा द्विध्रुव की अक्ष के अनुदिश ऋण आवेश से धन आवेश की तरफ होती है। इसका मात्रक कूलम्ब-मीटर तथा विमीय सूत्र [M0L/T] है।


Q.4. विद्युत क्षेत्र की तीव्रता तथा विभव में सम्बन्ध स्थापित करें।

विद्युत क्षेत्र की तीव्रता
विद्युत क्षेत्र की तीव्रता तथा विभव में सम्बन्ध स्थापित करें

Ans ⇒ विद्युत क्षेत्र की तीव्रता तथा विभव में सम्बन्ध – माना कि A तथा B दो बिन्दु अत्यल्प दूरी Δr से अलग हैं जिनके बीच विभवान्तर AV तथा विद्युत क्षेत्र की तीव्रता E है। आवेश q0 को B से A तक लाने में संपादित कार्य ΔW है, तो हम पाते हैं कि
क्योंकि F = -q0E है, जहाँ q0 के विरुद्ध बल F को लगाना नितांत आवश्यक है।
विद्युत क्षेत्र में किसी बिन्दु पर किसी दिशा में उसकी तीव्रता का घटक उस दिशा

अतः विद्युत क्षेत्र में किसी बिन्दु पर किसी दिशा में उसकी तीव्रता का घटक उस दिशा में ऋणात्मक विभव प्रवणता के बराबर है। ऋणात्मक चिह्न यह बताता है कि विद्युत क्षेत्र की तीव्रता E तक धनात्मक होता है जब dV/dr ऋणात्मक होता है। विद्युत तीव्रता का मात्रक वोल्ट/मीटर है।


Q.5. समविद्युत् क्षेत्र में विद्युत द्विध्रुव पर लगने वाले बलयुग्म का व्यंजक प्राप्त करें।

समविद्युत् क्षेत्र में विद्युत द्विध्रुव पर लगने वाले बलयुग्म

Ans ⇒ बलयुग्म का व्यंजक – माना कि एक विद्युत द्विध्रुव AB है जिसका आवेश -q व +q कूलम्ब है तथा इनके बीच की दूरी 21 है। द्विध्रुव एकसमान विधुत क्षेत्र E में विद्युत क्षेत्र की दिशा से कोण 0 बनाते हैं। विद्युत क्षेत्र E के कारण +q आवेश पर बल F = qE (विद्युत क्षेत्र E की दिशा में) तथा q आवेश पर बल F = qE (विद्यत क्षेत्र E की दिशा के विपरीत दिशा में लगता है)
चूकि ये दोनों बल परस्पर बराबर तथा विपरीत हैं। अतः इनका परिणामी बल शून्य है। लेकिन ये दोनों बल एक बलयुग्म बनाते हैं जो द्विध्रुव को घुमाकर विद्युत क्षेत्र E की दिशा में लाने का प्रयत्न करता है। इस प्रत्यानयन बलयुग्म का आघूर्ण

                τ  = बल x लम्बवत् दूरी = qE x BC
                लेकिन समकोण Δ/i CB में,
                            BC = ABsinθ = 2lsinθ
                      ∴    τ = qE x 2lsinθ = pEsinθ                                     (क्योंकि q x 2l = p)


Q.6. कूलम्ब के प्रमेय को लिखें तथा प्रमाणित करें।
अथवा, आवेशित समतल चालक के नजदीक किसी बिन्दु पर विद्युतीय तीव्रता का व्यंजक ज्ञात करें।
अथवा, प्रमाणित करें कि   है, जहाँ σ आवेश का तलीय घनत्व, ε0 वायु की विद्युतशीलता तथा K माध्यम की पराविधुत स्थिरांक है।

Ans ⇒ कुलम्ब के प्रमेय – किसी आवेशित समतल चालक के बाहर किसी बिन्दु पर विद्युतीय तीव्रता, उसके तलीय घनत्व का 4π/K गुणा है, जहाँ K माध्यम का पराविद्युत स्थिरांक है।
अथवा, “किसी आवेशित समतल चालक के बाहर किसी बिन्दु पर विद्युतीय तीव्रता आवेश के तलीय घनत्व तथा वायु की विद्युतशीलता ε0 का अनुपात होता है।

विद्युतीय बल रेखाएँ अर्थात् विद्युतीय फ्लक्स

प्रमाण – माना कि x एक समतल चालक है, जिसका तलीय घनत्व AB समल पर σ है, जो K पराविद्युत स्थिरांक के माध्यम में है। ε0 इसके वायु में विद्युतशीलता है। P बिन्दु चालक के बाहर तथा नजदीक है जिस पर विद्यतीय तीव्रता का मान ज्ञात करना है।अब ds अनुप्रस्थ–परिच्छेद का वैसा बेलन खींचा जिसमें ab तथा cd, AB के समानान्तर है। P, AB समतल में ab तथा cd पर है । विद्युतीय बल रेखाएँ अर्थात् विद्युतीय फ्लक्स AB के अभिलम्बवत् है, तब बेलन के वक्र समतल पर अभिलम्ब विद्युत प्रेरण = 0 (शून्य) होता है।

       ∴ P बिन्दु पर अभिलम्ब विद्युत प्रेरण = K x P बिन्दु पर विद्युतीय तीव्रता x ab का क्षेत्रफल।
        = KE ds या, E. ds
पराविद्युत स्थिरांक के वायु में होने की स्थिति में

पराविद्युत स्थिरांक के वायु में होने की स्थिति में K = 1
∴   E = 4πσ होता है।


Q.7. समान रूप से आवेशित गोला के कारण किसी बिन्दु पर विद्युतीय तीव्रता का व्यंजक प्राप्त करें।

जब आवेशित चालक के बाहर बिन्दु स्थित हो

Ans ⇒ आवेशित गोला के कारण किसी बिन्दु के लिए विद्युतीय तीव्रता का व्यंजक
(a) जब आवेशित चालक के बाहर बिन्दु स्थित हो :मान लिया कि R त्रिज्या तथा O केन्द्र का एक गोला है जिसे +q आवेश से आवेशित किया गया है । O से r दूरी पर स्थित P एक बिन्दु है। O केन्द्र के साथ r त्रिज्या का एक गोला B खींचा।
         ∴ B गोला का क्षेत्रफल = 4πr2
माना कि P बिन्दु पर विद्युतीय तीव्रता E है।
∴ B तल पर कुल विद्युतीय तीव्रता फ्लक्स = E x 4πr2
गॉस के प्रमेय से, कुल विद्युतीय फ्लक्स सतह के अन्दर कुल आवेशों तथा निर्वात की विद्युतशीलता के अनुपात के बराबर होता है।
जब P बिन्दु आवेशित चालक की सतह पर हो

(b) जब P बिन्दु आवेशित चालक की सतह पर हो :
इस स्थिति में, r = R
अत:                      

(c) जब बिन्दु आवेशित चालक के अन्दर है –
गोला के अन्दर कोई आवेश नहीं होता है।
∴                          E = 0


Q.8. गॉस के प्रमेय की सहायता से आवेश की समतल चादर के समीप विद्युत क्षेत्र की तीव्रता का व्यंजक प्राप्त करें।

गॉस के प्रमेय की सहायता से आवेश की समतल चादर के

Ans ⇒ मान लिया कि एक समतल चादर AB है जिस पर आवेश का पृष्ठ घनत्व σ है । इस समतल चादर के समीप कोई बिंदु P है जहाँ विद्युत क्षेत्र की तीव्रता E का मान ज्ञात करना है।             

             समतल चादर के पृष्ठ के लंबवत एक बेलनाकार तल abcd की कल्पना करें जिसका अक्ष तल के लंबवत है तथा सिरे ab और cd चादर के पृष्ठ के समानांतर है। लिया गया बिन्दु P पृष्ठ ab पर स्थित है।
             अब चूंकि विद्युत तीव्रता की दिशा AB के लंबवत अर्थात् बेलन abcd के अक्ष के समानांतर है, अतः विद्युत फ्लक्स का योगदान केवल बेलन के समतल सिरों (ab और cd) पर होगा। यदि हो, तो ab और cd सिरों पर विद्युत फ्लक्स = EdA + EdA = 2EdA
                अतः बेलनाकार तल पर कुल विद्युतीय फ्लक्स = 2 EdA
                अब, चूँकि इस बेलनाकार तल के अंदर आवेश की समतल चादर dA क्षेत्रफल स्थित है इसलिए बेलनाकार तल के भीतर कुल आवेश σdA होगा। अतः गॉस के प्रमेय से तल पर कुल विद्युत फ्लक्स
तल के भीतर कुल आवेश


Q.9. विद्युत आवेश का क्वाण्टीकरण क्या है ?

Ans ⇒ आवेशों का क्वाण्टीकरण (Quantised electric charge)- प्रत्येक पदार्थ सामान्य रूप में आवेशहीन होता है, परन्तु इन पर आवेशों का आदान-प्रदान इलेक्ट्रॉन के रूप में करने पर ये आवेशित होते हैं। अतः किसी पिण्ड पर आवेश Q = ±ne होता है।
जहाँ n = 1, 2, 3, … अर्थात् पूर्णांक संख्या होगी न कि अपूर्णांक संख्या।
अतः किसी पिण्ड पर आवेश का परिमाण हमेशा electric charge (e) का पूर्णांक संख्या के गुणक के रूप में होता है।
यही आवेशों का क्वाण्टीकरण कहलाता है।


Q.10. एकांक आवेश या एक कूलाम्ब आवेश को परिभाषित करें।

Ans ⇒ एकांक आवेश या एक कूलाम्ब आवेश (Unit charge or charge of one coulomb) – माना कि q1 तथा q2 परिमाण के दो आवेश हवा में एक- दूसरे से एक मीटर की दूरी पर रखे गये हैं। कूलाम्ब के नियम से इनके बीच लगा विद्युतीय विकर्षण बल्ब
एकांक आवेश या एक कूलाम्ब आवेश को परिभाषित करें

“अतः अगर हवा में एक मीटर की दूरी पर स्थित दो आवेशों के बीच 9 x 109 N का विकर्षण बल लगता हो तब प्रत्येक आवेश को 1 कूलाम्ब का आवेश या एकांक आवेश कहा जाता है।”


Q.11. क्या विद्युतीय क्षेत्र एक संरक्षी बल है ?

अंतिम बिन्दु पर निर्भर करता है

Ans ⇒ संरक्षी बल वह बल होता है जिसके प्रभाव में दो बिन्दुओं के बीच सम्पादित कार्य केवल उसके प्रारंभिक तथा अंतिम बिन्दु पर निर्भर करता है, तय किए गए पथ से स्वतंत्र हो। या बल के प्रभाव में एक पूर्ण चक्र में किया गया कार्य शून्य हो।
माना कि समरूप विद्युतीय क्षेत्र माना कि समरूप विद्युतीय क्षेत्र में r दूरी पर A तथा B दो बिन्दु हैं। अत: A से B तक एकांक धन आवेश को लाने में किया गया कार्य
किया गया कार्य


Q.12. विद्युतीय बल रेखाएँ क्या हैं ? इसके मुख्य गुण क्या है ?

Electric line of forces

Ans ⇒ विद्युत बल रेखाएँ (Electric line of forces) – किसी क्षेत्र में विद्युतीय बल रेखाएँ वे काल्पनिक रेखाएँ हैं जिस पथ पर कोई स्वतंत्र एकांक धन आवेश बंद करता है।
विद्युतीय बल रेखाओं के गुण –
(i) विद्युतीय बल रेखाएँ +ve आवेश से निकलती हैं तथा –ve आवेश पर बन्द होती है। (ii) विद्युतीय बल रेखाओं के प्रत्येक बिन्दु पर खींची गई स्पेर्श रेखा के दिशा में विद्युतीय क्षेत्र की दिशा होती है।
(iii) दो विद्युतीय बल रेखाएँ एक-दूसरे को नहीं काटती है।


Q.13. मुक्त अवस्था की विद्युतशीलता का मात्रक एवं विमा लिखें।

Ans ⇒ विद्युतशीलता का SI मात्रक C2N-1m-2 है। विद्युतशीलता की विमा [M-1L-3T4A2] है।


Q.14. किसी गॉसीय पृष्ठ में (-q), (+2q) तथा (-q) आवेश हैं। पृष्ठ में से परिणामी विद्युत फ्लक्स की गणना करें।

Ans ⇒ गौसीय पृष्ठ के अन्दर कुल आवेश Q = (-q) + (+2q) + (-q) = 0 (Zero)
∴         विद्युत क्षेत्र E = 0
∴         विद्युत फ्लक्स = φ = किसी गॉसीय पृष्ठ
= 0. विद्युत फ्लक्स = 0 (zero)


Q.15. (a) स्थिर वैद्युत क्षेत्र रेखा पर संतत वक्र होती है अर्थात् कोई क्षेत्र रेखा एकाएक नहीं टूट सकती। क्यों ?
(b) स्पष्ट कीजिए कि दो क्षेत्र रेखाएँ कभी भी एक-दूसरे का प्रतिच्छेदन क्यों नहीं करतीं ?

किसी बिन्दु पर स्थिर विद्युत बल रेखा

Ans ⇒ (a) किसी बिन्दु पर स्थिर विद्युत बल रेखा वह पथ है जिसके प्रत्येक बिन्दु पर स्पर्शज्या उस बिन्दु पर विद्युत क्षेत्र की दिशा बताती है। विद्युत-क्षेत्र की दिशा एक बिन्दु से दूसरे बिन्दु पर बदल जाती है। अतः बल रेखाएँ आमतौर पर वक्र रेखाएँ होती हैं। इसके अतिरिक्त वह सतत वक्र
होती हैं जो अचानक नहीं टूटती क्योंकि यदि ऐसा है तो टूटने के स्थान पर यह कोई विद्युत क्षेत्र नहीं दर्शाएँगी।

(b) विद्युत-बल रेखाएँ एक-दूसरे को नहीं काटती क्योंकि यदि ऐसा है तो काट बिन्दु पर हम दो स्पर्शज्याएँ खींच सकते हैं जो उस बिन्द पर विद्युत क्षेत्र की दो दिशाएँ दर्शाएँगी जो संभव नहीं है।


चित्र में दर्शाए गए वक्र स्थिर वैद्युत क्षेत्र रेखाएँ निरूपित करता है या नहीं

Q.16. चित्र में दर्शाए गए वक्र स्थिर वैद्युत क्षेत्र रेखाएँ निरूपित करता है या नहीं ?
Ans ⇒ यह चित्र वैद्युत बल रेखाएँ दर्शाता है। इसमें बिन्दु आवेश लिए हैं।


चित्र में किसी एकसमान स्थिर वैद्यत क्षेत्र में तीन आवेशित कणों के पथचिह्न

Q.17. चित्र में किसी एकसमान स्थिर वैद्यत क्षेत्र में तीन आवेशित कणों के पथचिह्न (Tracks) दर्शाए गए हैं। तीनों आवेशों के चिह्न लिखिए। इनमें किस कण का आवेश संहति अनुपात अधिकतम है ?
Ans ⇒ चूँकि कण (1) और कण (2) धनावेशित प्लेट की ओर विक्षेपित होता है इसलिए इस पर ऋण आवेश है। कण (3) ऋणावेशित प्लेट की ओर विक्षेपित होता है इसलिए इस धन आवेश है।
कण (3) में विक्षेप अधिकतम होता है, इसलिए इस पर आवेश अधिकतम तथा द्रव्यमान न्यूनतम है। अतः कण (3) का आवेश संहति अनुपात अधिकतम है।


Q.18. (a) किसी चालक A जिसमें चित्र में दर्शाए अनुसार कोई कोटर (cavity) है, को Q आवेश दिया गया है। दिखाएँ कि समस्त आवेश चालक के बाह्य पृष्ठ पर प्रतीत होना चाहिए।
           (b) उपर्युक्त प्रश्न में अन्य चालक B जिसपर q आवेश है, कोटर में चित्रानुसार धंसा दिया जाता है कि B चालक A से विद्युतरोधी रहे। दिखाएँ कि चालक A के बाहरी सतह पर कुल आवेश Q + q है।
           (c) किसी सुग्राही उपकरण को उसके पर्यावरण के प्रबल स्थिर विद्युत क्षेत्रों से परिरक्षित किया जाना है। संभावित उपाय लिखें।

Ans ⇒ (a) माना कि चालक A के अन्दर में कोटर है जिसमें आवेश नही है। कोटर के घेरते हुए चालक के अन्दर गाउसीय सतह की कल्पना किया। गाउसीय सतह से जाने वाला विद्युत फ्लक्स φ = 0
           q/ε = 0        ∴    q = 0
अतः चालक के अन्दर आवेश नहीं है। सम्पूर्ण आवेश चालक के बाहरी सतह पर है।

किसी चालक A जिसमें चित्र में दर्शाए अनुसार कोई कोटर

(b) जब कोटर में +q आवेश रखा जाता है तब प्रेरण से A के अन्दर के सतह पर -q आवेश उत्पन्न होता है तथा बाहरी सतह पर +q आवेश उत्पन्न होता है। कोटर के अन्दर कुल आवेश = 0
चालक A के बाहरी सतह पर कुल आवेश = Q + q.

उपकरण को धात्विक पृष्ठ

(c) उपकरण को धात्विक पृष्ठ के पूर्णतः अन्दर रखा जा सकता है। ऐसा करने पर उपकरण विद्युत प्रभाव से परिरक्षित होता है क्योंकि धात्विक पृष्ठ के अन्दर स्थिर विद्युत क्षेत्र नहीं होता है। इस घटना को स्थिर विद्युत परिरक्षित कहते हैं।


Q.19. (a) किसी यादृच्छिक स्थिरवैद्युत क्षेत्र विन्यास पर विचार कीजिए। इस विन्यास की किसी शून्य-विक्षेप स्थिति (null-point, अर्थात् जहाँ E = 0) पर कोई छोटा परीक्षण आवेश रेखा गया है। यह दर्शाइए कि परीक्षण का संतुलन आवश्यक रूप से अस्थायी है।
(b) इस परिणाम का समान परिणाम तथा चिहों के दो आवेशों (जो एक-दूसरे से किसी दूरी पर रखे हैं) के सरल विन्यास के लिए सत्यापन कीजिए।

इस परिणाम का समान परिणाम तथा चिहों के दो आवेशों

Ans ⇒ (a) माना कि संतुलन स्थायी है। परीक्षण आवेश को शून्य विक्षेप स्थिति सेकिसी भी दिशा में थोड़ा विस्थापित करने पर शून्य विक्षेप स्थिति की ओर परीक्षण आवेश प्रत्यानयन बल अनुभव करेगा। अर्थात् शून्य विक्षेप स्थिति के समीप सभी विद्युत क्षेत्र रेखाएँ शून्य विक्षेप स्थिति के चारों ओर बंद सतह की कल्पना किया जाए तो बंद सतह से होकर नेट विद्युत फ्लक्स अन्दर की ओर होना चाहिए। परन्तु बंद सतह के भीतर ओवश नहीं हो तब विद्युत फ्लक्स शून्य होता है। अतः संतुलन स्थायी नहीं है।

यदि परीक्षण आवेश को शून्य विक्षेप स्थिति

(b) यदि परीक्षण आवेश को शून्य विक्षेप स्थिति Nसे दायें या बायें खिसकाया जाए तो इस पर प्रत्यानयन बल लगेगा। जो परीक्षण आवेश को N की ओर लायेगा। यदि परीक्षण आवेश को N के ऊपर या नीचे की ओर विस्थापित किया जाए तब इर पर विद्युत बल लगता है जो परीक्षण आवेश को N से दूर ले जायेगा । अतः परीक्षण आवेश हमेशा सभी दिशाओं में प्रत्यानयन बल का अनुभव नहीं करेगा। अतः परीक्षण आवेश का संतुलन अस्थायी है।

2. स्थिर विद्युत विभव तथा धारिता ( Short Answer Type Question )


1. किसी बिन्दु पर विद्युत विभव तथा तीव्रता में अंतर स्पष्ट करें।

Ans ⇒ किसी बिन्दु पर विद्युत विभव तथा तीव्रता में निम्नलिखित अंतर हैं –

S.Nविभवविधुत
1.विद्युत क्षेत्र में किसी बिन्दु पर विभव वह कार्य है जो एकांक धनावेश को अनन्तर से उस बिन्दु तक लाने में करना पड़ता है।विद्युत क्षेत्र में किसी बिन्दु पर तीव्रता वह बल है जो उस बिन्दु पर रखे एकांक धनावेश पर लगता है।
2.यह एक अदिश राशि है।यह एक सदिश राशि है।
3.इसका मात्रक वोल्ट है।इसका मात्रक न्यूटन प्रति कूलम्ब है।
4.किसी बिन्दु पर विद्युत तीव्रता का आरेख समाकल विभव के बराबर होती है।             अर्थात् V = -∫E dx है।किसी बिन्दु पर ऋणात्मक विभव प्रवणता विद्युत तीव्रता के बराबर होती है।
अर्थात् E = -dV/dx है।

2. लम्बे आवेशित बेलनाकार चालक के कारण किसी बिन्दु पर विद्युतीय तीव्रता का व्यंजक प्राप्त करें।

लम्बे आवेशित बेलनाकार चालक के कारण किसी बिन्दु पर विद्युतीय तीव्रता

Ans ⇒ माना कि R त्रिज्या के AB एक लम्ब तथा एक समान आवेशित बेलन है जिसके एकांक लम्बाई में +q आवेश है।
बेलन के अक्ष से r दूरी पर स्थित P एक बिन्दु है जिस पर विद्युतीय तीव्रता, E का मान ज्ञात करना है।

फिर माना कि 1 लम्बाई के CDEG एक बेलन है, जिसकी त्रिज्या r है जो आवेशित बेलन 4B के समाक्षीय है तथा P बिन्दु से गुजरती है।
इस बेलन की सतह अक्ष के लंबवत है।
∴ बेलन CDEG का तलीय क्षेत्रफल = 2πrl
कुल विद्युतीय फ्लक्स φ = E.2πrl
किन्तु गॉस के प्रमेय से
किन्तु गॉस के प्रमेय से
फिर माना कि 1 लम्बाई के CDEG एक बेलन है


3. विद्युत फ्लक्स से आप क्या समझते हैं ?

Ans ⇒ विद्युत फ्लक्स – विद्युत क्षेत्र में स्थित किसी पृष्ठ से लम्बवत् दिशा में गुजरने वाली कुल विद्युत बल रेखाओं की संख्या को उस पृष्ठ से सम्बद्ध विद्युत फ्लक्स कहते हैं। इसे φ द्वारा व्यक्त किया जाता है।
माना कि किसी विद्युत क्षेत्र माना कि समरूप विद्युतीय क्षेत्र में किसी पृष्ठ S के छोटे से भाग का क्षेत्रफल सदिश छोटे से भाग का क्षेत्रफल सदिश विद्युत माना कि समरूप विद्युतीय क्षेत्र की दिशा से θ कोण बनाता है तो इस छोटे से भाग से सम्बद्ध फ्लक्स dφ = (Ecosθ)ds = विद्युत फ्लक्स  है।
अतः सम्पूर्ण पृष्ठ से सम्बद्ध विद्युत फ्लक्स φ = ∫∫विद्युत फ्लक्स  है।
विद्युत फ्लक्स का S.I. मात्रक न्यूटन मीटर2/कूलम्ब है।


4. विद्युत विभवान्तर तथा विद्युत विभव क्या है ?

Ans ⇒ विद्युत विभवान्तर – विद्युत क्षेत्र में एकांक धनावेश को साम्य में रखते हुए, एक बिन्दु से दूसरे बिन्दु तक उसकी तीव्रता के विरुद्ध ले जाने में संपादित कार्य को उन बिन्दुओं के बीच का विभवान्तर कहते हैं। विद्युत विभवान्तर,   होता है, जहाँ W संपादित कार्य है।
आवेश q0 मुक्त राशि पद में विद्युत क्षेत्र का वर्णन करने के लिए इसकी धारणा का प्रचलन हुआ। विभवान्तर का मात्रक वोल्ट है।

विद्युत विभव – विद्युत क्षेत्र में किसी बिन्दु पर अनन्त से एकांक धनावेश को लाने में संपादित कार्य को उस बिन्दु पर विद्युत विभव कहते हैं।
क्योंकि विद्युत क्षेत्र में किसी बिन्दु पर निरपेक्ष विभव के लिए किसी बिन्दु को निर्देश या मानक बिन्दु माना जाता है। इसको अनन्त पर माना जाता है जिसका विभव शून्य मानते हैं, क्योंकि आवेश विन्यास अनन्त पर शून्य क्षेत्र उत्पन्न करता है। अतः बिन्दु A के अनन्त होने पर B बिन्दु पर विद्युत विभव,  है। विद्युत विभव का मात्रक भी जूल/कूलम्ब = वोल्ट होता है।


5. संधारित्र क्या है ? इसकी धारिता से आप क्या समझते हैं ?

Ans ⇒ संधारित्र – यह वैसी व्यवस्था है जिसमें विद्युत ऊर्जा को संचित किया जाता है, जिससे उसके आकार या क्षेत्रफल में परिवर्तन के बिना ही उसकी धारिता घटायी या बढ़ायी जाती है।

धारिता – “किसी चालक की धारिता आवेश का वह परिमाण है जो उसके विभव को इकाई से बढ़ा देता है।”
अथवा, “किसी चालक की धारिता, आवेश तथा विभवान्तर का अनुपात होता है।”
धारिता = आवेश/विभवान्तर
जब किसी चालक में आवेश दिया जाता है तो उसका विभव उसमें दिये गये आवेश के परिमाण के समानुपाती बढ़ जाता है।
माना कि q आवेश के परिमाण चालक को दिया गया है, जिससे उसमें V विभव बढ़ता है तो q α V
या,             q = CV,
जहाँ C एक चालक का स्थिरांक है, जो आकार, रूप तथा घिरे हुए माध्यम पर निर्भर करता है तथा चालक की धारिता कहलाता है।
∴     C = q/V धारिता का मात्रक फैराड है। एक फैराड = कूलम्ब/ वोल्ट होता है। यह एक बड़ा मात्रक है। छोटे मात्रकों में माइक्रो फैराड (μF) या पिको फैराड (pF) का प्रयोग किया जाता है।
धारिता का विमासूत्र [M-1L-2T4A2] है।


6. प्रमाणित करें कि एक विलगित गोलाकार चालक की धारिता उसकी त्रिज्या के अनुक्रमानुपाती होती है।

Ans ⇒ माना कि r त्रिज्या का एक विलगित गोलाकार चालक +q आवेश से समान रूप से आवेशित है, तो उसकी सतह पर विद्युत विभव,  है।
अतः विलगित गोलाकार चालक की धारिता,
अतः विलगित गोलाकार चालक की धारिता


7. परावैद्युत पदार्थ से आप क्या समझते हैं ? अथवा, संधारित्र में परावैद्युत का क्या कार्य है ?

Ans ⇒ परावैद्युत पदार्थ – वैसे पदार्थ परावैद्युत कहलाते हैं, जिन्हें संधारित्र की प्लेटों के बीच रखने पर उन प्लेटों के बीच विभवान्तर का मान कम होता है अर्थात् उसकी धारिता बढ़ जाती है । परावैद्युत पदार्थ विद्युत विरोधी होता है। जैसे-काँच, अभ्रक, पैराफिन, मोम, तेल आदि।


8. दो चालकों की धारिताएँ C1 तथा C2 है और उनके विभव क्रमश: V1 तथा V2 हैं। इन्हें आपस में किसी तार द्वारा जोड़ देने पर उनके विभव में परिवर्तन क्रमश: ΔV1 तथा ΔV2 होता है, तो प्रमाणित करें कि 

Ans ⇒ प्रमाण : दोनों चालकों को एक तार से जोड़ने पर आवेश ऊँचे विभव वाले चालक से निम्न विभव वाले चालक की तरफ दोनों चालकों पर उभयनिष्ठ विभव (एक समान विभव) होने तक प्रवाहित होता है।
इन्हें आपस में किसी तार द्वारा जोड़ देने पर उनके विभव में परिवर्तन क्रमश


9. विद्युतशीलता या परावैद्युतता तथा पराविद्युत स्थिरांक या विशिष्ट प्रेरणधारिता से आप क्या समझते हैं ?

Ans ⇒ विद्युतशीलता या परावैद्युतता तथा पराविद्युत स्थिरांक या विशिष्ट प्रेरणधारिता किसी माध्यम की विद्युतशीलता आपेक्षिक विद्युतशीलता तथा निर्वात की विद्युतशीलता का गुणनफल होता है। माना कि किसी माध्यम की विद्युतशीलता आपेक्षिक विद्युतशीलता εr तथा निर्वात की विद्युतशीलता ε0 है तो हम पाते हैं कि ε = εrε0
या, 

माध्यम या निर्वात की विद्युतशीलता का मात्रक न्यूटन मीटर2/कूलम्ब2 है। किन्तु आपेक्षिक विद्युतशीलता का कोई मात्रक नहीं होता है। आपेक्षिक विद्युतशीलता को पराविद्युत स्थिरांक भी कहते हैं। इसे K द्वारा व्यक्त किया जाता है। इसलिए पराविद्युत स्थिरांक K का भी कोई मात्रक नहीं है।
.                           वायु या निर्वात के लिए

वायु या निर्वात के लिए εr या K का मान 1 (एक) है। पराविद्युत स्थिरांक को विशिष्ट प्रेरण धारिता भी कहते हैं।


10. विद्युत ध्रुवण तथा विद्युत विस्थापन से आप क्या समझते है ?

विद्युत ध्रुवण

Ans ⇒ विद्युत ध्रुवण – विधुत क्षेत्र में प्रति एकांक आयतन के द्विध्रुव आघूर्ण को विधुत द्विध्रुव कहते है। इसे P द्वारा व्यक्त किया जाता है।
माना कि विद्युत क्षेत्र में स्थित किसी भी पदार्थ के प्रत्येक अणु या परमाणु का द्विध्रुव आघूर्ण p है तथा प्रति एकांक आयतन में अणुओं या परमाणुओं की संख्या n है, तो माध्यम का ध्रुवण, P = np होता है।

ध्रुवण का S.I मात्रक कूलम्ब/मीटर² है।
माना कि किसी विद्युत क्षेत्र के लम्बवत् स्थित 1 मुटाई एवं α अनुप्रस्थ काट की एक पराविद्युत सिल्ली AB का ध्रुवण क्षेत्र की दिशा के अनुरेखा P है, तो सिल्ली का कुल विद्युत द्विध्रुव आघूर्ण, p = P (1∝) = (Pα)1 है। चूँकि सिल्ली की सतह A तथा B के बराबर एवं विपरीत आवेश एक-दूसरे से 1 दूरी पर स्थित होने के कारण ध्रुवित आवेश = Pα तथा उसका तलीय घनत्व, σp = P होता है।

विद्युत विस्थापन

विद्युत विस्थापन – जब आविष्ट चालक के सम्पर्क में किसी विद्युत माध्यम को लाया जाता है तो माध्य के ध्रुवण के कारण चालक का प्रभावी आवेश एवं विद्युत क्षेत्र कम हो जाता है । माना कि चालक के मुक्त आवेश का तलीय घनत्व σ तथा इसके सम्पर्क में स्थित माध्यम के पृष्ठ पर ध्रुवण के फलस्वरूप उत्पन्न विपरीत आवेश का तलीय घनत्व -σp है, तो चालक का प्रभावी तलीय घनत्व σ’= σ-σp है।
अतः कूलम्ब प्रमेय से पराविद्युत माध्यम में स्थित चालक के समीप विद्युत क्षेत्र की तीव्रता
जहाँ द्वारा परिभाषित राशि को विद्युत विस्थापन कहते हैं। पराविद्युत माध्यम में स्थित चालक की सतह के किसी बिन्दु से अभिलम्बवत् विद्युत विस्थापन का घटक चालक के मुक्त आवेश के तलीय घनत्व के बराबर है।
अतः किसी भी बंद पृष्ठ पर विद्युत विस्थापन का फ्लक्स उस पृष्ठ के अन्दर स्थित मुक्त आवेश के बराबर होता है।
अर्थात् 
जहाँ, ds चालक का अल्पांश पृष्ठ,  एकांक सदिश तथा  है।


11. (a) क्या r दूरी पर Q1 और Q2 आवेश से आवेशित दो बड़े गोले पर स्थिर वैद्युत बल का परिमाण निश्चित रूप से Q1Q2/4πε0r² द्वारा दर्शाया जाता है ?
(b) यदि कूलॉम के नियम में निर्भरता में 1/r³ हो तो क्या गाउस का नियम सत्य होगा ?
(c) स्थिर वैद्युत क्षेत्र विन्यास में एक छोटा परीक्षण आवेश किसी बिन्दु पर विराम में छोड़ा जाता है। क्या यह उस बिन्दु से होकर जाने वाली क्षेत्र रेखा के अनुदिश चलेगा?
(d) इलेक्ट्रॉन की पूर्ण वृत्तीय कक्षा में नाभिक के क्षेत्र द्वारा कितना कार्य किया जाता है ? यदि कक्षा दीर्घ वृत्ताकार हो तो क्या होगा ?
(e) आवेशित चालक के पृष्ठ पर वैद्युत क्षेत्र असतत होता है। क्या वहाँ वैद्युत विभव की असतत होगा ?
(f) किसी एकल चालक की धारिता से आपका क्या अभिप्राय है ?
(g) एक संभावित उत्तर की कल्पना कीजिए कि पानी का परावैद्युतांक (= 80) अभ्रक के परावैद्युतांक (= 6) से अधिक क्यों होता है ?

Ans ⇒ (a) स्थिर वैद्युत बल का परिमाण निश्चित रूप से Q1Q2/4πε0r² नहीं होगा क्योंकि गोले का आवेश का वितरण समान नहीं है।
(b) कूलॉम के नियम में निर्भरता 1/r³ हो तो गाउस का नियम सत्य नहीं होगा।
(c) जब क्षेत्र रेखा सरल रेखा हो तब परीक्षण आवेश क्षेत्र के अनुदिश चलेगा अन्यथा यह आवश्यक नहीं है।
(d) किया गया कार्य शून्य होगा तथा कक्षा की आकृति पर निर्भर नहीं करता है।
(e) आवेशित चालक के पृष्ठ पर वैद्युत विभव सतत होगा।
(f) एकल चालक पर संघारित्र है जिसका दूसरा प्लेट अनंत पर है।
(g) पानी के अणु ध्रुवीय होते हैं जबकि अभ्रक के अध्रुवीय, पानी के अणुओं में स्थायी द्विध्रुव आघूर्ण है। अतः पानी का परावैद्युतांक अभ्रक आदि के परावैद्युतांक से कहीं अधिक होता है।


12. निम्नलिखित में संगत समविभवी पृष्ठ को लिखें
(a) Z-दिशा में अचर वैद्युत क्षेत्र
(b) एक क्षेत्र जो समान रूप से बढ़ता है परन्तु एक ही दिशा (मान लीजिए Z-दिशा) में रहता है।
(c) मूल बिन्दु पर कोई एकल धनावेश और
(d) एक समतल में समान दूरी पर समांतर लम्बे आवेशित तारों से बने एकसमान जाल।

Ans ⇒ (a) X-Y तल के समांतर पृष्ठ ।
(b) समविभवी तल X-Y तल के समांतर होता है किन्तु ये एक-दूसरे के समीप होते हैं जब क्षेत्र बढ़ता है।
(c) सकेन्द्री गोले का केन्द्र मूल बिन्दु पर।
(d) ग्रीड के अतिसमीप विद्युत क्षेत्र असमान होने से समविभवी सतह बदलते हुए आकृति का होता है। ग्रीड से बहुत दूर विद्युत क्षेत्र समरूप और तल के समान्तर होता है। अतः समविभवी तल ग्रीड के तल के समांतर होती है।


13. त्रिज्या तथा q1 आवेश वाला एक छोटा गोला, r2 त्रिज्या और आवेश के गोलीय खोल (कोश) से घिरा है। दर्शाइए यदि q1 धनात्मक है तो (जब दोनों को एक तार द्वारा जोड़ दिया जाता है) आवश्यक रूप से आवेश, गोले से खोल की तरफ ही प्रवाहित होगा, चाहे खोल पर आवेश q2 कुछ भी हो।

इस प्रकार गाउस के सिद्धांत से
विद्युत क्षेत्र शून्य होता

Ans ⇒ यहाँ r2, r1 छोटे गोल और गोलीय खोल की क्रमशः त्रिज्याएँ हैं। खोल गोल को घेरे हुए हैं। +q1 आवेश गोल पर है तथा +q2 आवेश खोल पर। हमें ज्ञात है कि आवेशित चालक के भीतर विद्युत क्षेत्र शून्य होता है अर्थात् E = 0, इस प्रकार गाउस के सिद्धांत से

(गोलीय खोल में q2 = 0 क्योंकि E = 0 इसके अन्दर)
यहाँ q2 खोल के बाहरी पृष्ठ पर होना चाहिए। अब + q1 आवेश वाला गोल खोल अन्दर बन्द है। अतः खोल के आन्तरिक पृष्ठ पर  -q1 आवेश और बाहरी पृष्ठ पर +q1 आवेश उत्प्रेरित होंगे।
∴   खोल के बाहरी पृष्ठ पर कुल आवेश q2 + q1
आवेश सदैव बाहरी पृष्ठ पर रहता है। इसलिए q1 आवेश गोल के बाहरी पृष्ठ से खोल के बाहरी पृष्ठ की ओर उस सम प्रवाहित होगा जब उन्हें तार से जोड़ते हैं।


14. (a) पृथ्वी के सतह के समीप विद्युत तीव्रता 100 vm-1 है। जब हम घर से बाहर जाते हैं तो हमें विद्युत आघात क्यों लगता है ?

(b) एक व्यक्ति शाम के समय अपने घर से बाहर 2m ऊँचा अवरोधी पट्ट रखता है जिसके शिखर पर एक 1m2 क्षेत्रफल की बड़ी एल्युमिनियम की चादर है। अगली सुबह वह यदि धातु की चादर को छूता है तो क्या उसे विद्युत आघात    लगेगा ? 

(c) वायु की चालकता के कारण सारे संसार में औसतन वायुमंडल में विसर्जन धारा 1800 A है। तब यथासमय वातावरण स्वयं पूर्णतः विसर्जन द्वारा विद्युत उदासीन क्यों नहीं हो जाता है ? दूसरे शब्दों में वातावरण को कौन आवेशित        करता है ?

(d) तड़ित के दौरान वातावरण की वैद्युत ऊर्जाओं के रूप क्षय होती है।

Ans ⇒ (a) हमारा शरीर और पृथ्वी समविभवी सतह बनाता है। अतः हमारे सिर और पृथ्वी के बीच विद्युत क्षेत्र नहीं होता है जिसके कारण हमें विद्युत आघात नहीं लगता है।

(b) हाँ, यदि वह धातु की पट्टी को अगली सुबह छूता है तो उसे बिजली का झटका लगेगा। इसका कारण है कि एल्युमिनियम की पट्टी और पृथ्वी एक धारित बनाती है जिसमें अवरोधी पट्टी (स्लैब) एक परावैद्युत बनाती है। आवेश की नीचे की ओर वर्षा से एल्युमिनियम की पट्टी का विभव बढ़ जाता है अर्थात् 1800 A की अनावेशित धारा द्वारा यह आवेशित हो जाती है जो वायुमंडल से नीचे आ रही है (धारा)। जब हम एल्युमिनियम की पट्टी को छूते हैं तो धारा हमारे शरीर से होकर पृथ्वी में चली जाती है। यह आवेश प्रवाह एक विद्युत धारा बनाता है और हम झटका अनुभव करेंगे।

(c) वायु की थोड़ी चालकता के कारण पूरे संसार में प्रति सेकेण्ड 1800 C आवेश पृथ्वी में पंप होता है। तड़ित और तड़ित झंडा के लगातार होते रहने से पृथ्वी में प्रति सेकेण्ड – 1800 C आवेश भेजता है। यह पृथ्वी और समतापमंडल के बीच विद्युत विभव बनाये रखता है जिससे विद्युत विसर्जन द्वारा वातावरण उदासीन नहीं होता है।

(d) तड़ित के दौरान विद्युत ऊर्जा का ऊष्मा ऊर्जा और ध्वनि ऊर्जा के रूप में क्षय होता है।


चित्र में ऋण आवेश की क्षेत्र रेखाएँ दर्शायी गयी है

15. चित्र में ऋण आवेश की क्षेत्र रेखाएँ दर्शायी गयी है।
(a) VB – VA के चिह्न बतावें।
(b) A और B के बीच एक छोटे से ऋण आवेश की स्थितिज ऊर्जा में अंतर का चिह्न बतावें ।
(c) B से A तक छोटे से ऋण आवेश को ले जाने के लिए बाह्य साधन द्वारा किया गया कार्य का चिह्न बतावें।
(d) B से A तक ले जाने में क्या छोटे-से ऋणावेश की गतिज ऊर्जा बढ़ेगी या घटेगी ?

Ans ⇒ (a) A और B पर विद्युत विभव –ve होता है।
∴   rB > rA
इसलिए B पर विद्युत विभव का मान A पर के विद्युत विभव से कम ऋणात्मक होगा।
∴   VB – VA > 0

(b) दोनों ऋण आवेश के कारण स्थितिज ऊर्जा धनात्मक होता है।
अतः (P.E.)A > (P.E.)B या, – (P.E.)A – (P.E.)B > 0
(c) ऋण आवेश को B से A तक लाने में विकर्षण बल के विरुद्ध किया गया कार्य धनात्मक होगा।
(d) B से A तक ऋण आवेश को लाने में स्थितिज ऊर्जा बढ़ती है। अतः B से A तक ले जोने में गतिज ऊर्जा घटेगी।


16. विद्युत क्षेत्र के किसी बिन्दु पर विभव एवं तीव्रता के बीच सम्बन्ध स्थापित करें।

Ans ⇒ माना कि O पर + qआवेश है। इस आवेश के विद्युत क्षेत्र A और B दो बिन्दु एक दूसरे के समीप Δx दूरी पर है, माना कि A और B पर विद्युत विभव क्रमशः V + ΔV और V है।
A और B के बीच विभवान्तर = V + ΔV – V = ΔV
A और B के बीच विद्युत तीव्रता E है।
एकांक धन आवेश को B से A तक लाने में किया गया कार्य ΔW = -EΔX
ऋणात्मक चिह्न का अर्थ कि विद्युत तीव्रता E की दिशा विस्थापन Δx के विपरीत है। यह किया गया कार्य ΔW विभवान्तर ΔV के बराबर होता है।
ऋणात्मक चिह्न का अर्थ कि विद्युत तीव्रता

अतः विद्युत क्षेत्र में किसी बिन्दु पर विद्युत तीव्रता विभव प्रवणता के ऋणात्मक मान बराबर होता है।


17. (i) साधारण रबर विद्युतरोधी है। परंतु वायुयान के विशेष रबर के पहिए हल्के चालक बनाए जाते हैं। क्यों ?
(i) जो वाहन ज्वलनशील पदार्थ ले जाते हैं उनकी धातु की रस्सियाँ वाहन के गतिमय होते धरती को छती रहती है, क्यों ?
(iii) एक चिडिया एक उच्च शक्ति के खले बिजली के तार पर बैठी है, और उसको कछ नहीं होता। धरती पर खड़ा व्यक्ति उसी तार को छता है, तो उसे घातक धक्का लगता है, क्यों ?

Ans ⇒ (i) वायुयान के उतरते समय टायर और धरती के बीच घर्षण से बडी परिमाण में आवेश उत्पन्न होता है। टायर को हल्का चालक बनाने से आवेश टायर पर जमा नहीं होता है अपितु धरती में चला जाता है।

(ii) वाहन के गति के दरम्यान हवा के घर्षण वाहन आवेशित हो जाता है। यदि आवेश अधिक परिमाण में हो तो स्पार्क उत्पन्न हो सकता जो वाहन को जला सकता है। इसे रोकने के लिए धातु की रस्सी वाहन से धरती को । छूता रहता है जिससे वाहन पर आवेश संचित नहीं होता है।

(iii) जब चिड़ियाँ उच्च शक्ति के खुले तार पर बैठती है तब उसे कुछ नहीं होता है क्योंकि चिड़िया और पृथ्वी के बीच परिपथ पूरा नहीं होता है। यदि आदमी तार को छूता है तब पृथ्वी से इसके शरीर के द्वारा परिपथ पूरा हो जाता है और उच्च धारा शरीर से बहने लगती है जिससे जोर का धक्का लगता है।


18. समविभवी तल से क्या समझते हैं ?

Ans ⇒ विद्युत क्षेत्र में समविभवी तल एक ऐसा तल है जिसके सभी बिन्दुओं पर विद्युत विभव का मान समान होता है।
समविभवी तल में धन आवेश को एक बिन्दु से दूसरे बिन्दु तक लाने में किया गया कार्य शून्य होता है।
समविभवी तल में प्रत्येक बिन्दु पर विद्युत क्षेत्र की दिशा तल के लम्बवत् होती है।

3. विद्युत धारा ( Short Answer Type Question )


1. किसी धातु में मुक्त इलेक्ट्रॉन तथा मुक्त इलेक्ट्रॉनों के अनुगमन वेग से आप क्या समझते हैं ?

Ans ⇒ धातुओं में मुक्त इलेक्ट्रॉन – किसी पदार्थ के परमाणुओं में जो इलेक्ट्रॉन नाभिक के समीप की कक्षाओं में होता है वह नाभिक के धनावेश के द्वारा प्रबल आकर्षण बल से बँधे रहते हैं। किन्तु नाभिक से दूरी वाली कक्षाओं के इलेक्ट्रॉनों पर यह बल बहत होता है। इसलिए इनमें से अनेक इलेक्टॉन अपने परमाणुओं से अलग होकर पूरे पदार्थ से स्वतन्त्रतापूर्वक घूमते रहते हैं, जिन्हें मुक्त इलेक्ट्रॉन कहते हैं।
यही इलेक्ट्रॉन आवेश को पदार्थ के एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाता है। अतः किसी ठोस पदार्थ की विद्युत् चालकता उसमें मुक्त इलेक्ट्रॉनों की संख्या पर निर्भर करती है। जिन धातुओं में मुक्त इलेक्ट्रॉनों की संख्या अधिक होती है वह विद्युत का अच्छा चालक होती है। चाँदी, ताँबा, सोना, ऐल्युमिनियम इत्यादि विद्युत् का अच्छा चालक है। जिन धातुओं में मुक्त इलेक्ट्रॉनों की संख्या कम या शून्य होती है उसमें विद्युत् का प्रवाह नहीं होता है तथा वे विद्युत् अचालक कहलाते हैं।

अनुगमन वेग – जब किसी चालक के सिरों पर विभवान्तर आरोपित किया जाता है तो वे इलेक्ट्रॉन को त्वरित गति न देकर तार की लम्बाई की दिशा में एक अल्प नियत वेग दे पाता है, इलेक्ट्रॉन के उस निश्चित वेग को अनुगमन वेग कहते हैं। इसे vd द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।।


2. विद्युतधारा तथा अनुगमन वेग में क्या सम्बन्ध है ? वर्णन करें।

विद्युतधारा तथा अनुगमन वेग में सम्बन्ध

Ans ⇒ विद्युतधारा तथा अनुगमन वेग में सम्बन्ध – किसी चालक में प्रवाहित धारा की प्रबलता चालक के किसी अनुप्रस्थ परिच्छेद में प्रति संकेण्ड गुजरने वाली विद्युत् आवेशों के परिमाण से मापी जाती है। माना कि किसी धातु के तार के सिरों पर कोई विभवान्तर आरोपित करने से उसमें F प्रबलता का विद्युतीय क्षेत्र स्थापित हो जाता है तो धातु के मुक्त इलेक्ट्रॉन इससे विपरीत दिशा में vd अनुगमन वेग से चलने लगते हैं। तार के किसी परिच्छेद से t सेकेण्ड गुजरने वाले मुक्त इलेक्ट्रॉनों द्वारा प्रवाहित आवेश q होने पर उस तार में विद्युत्धारा की प्रबलता, i = q/t ।
माना कि तार के अनुप्रस्थ परिच्छेद का क्षेत्रफल A, उसके प्रति इकाई आयतन में मुक्त इलेक्ट्रॉनों की संख्या n तथा इलेक्ट्रॉन का अनुगमन वेग vd है, तो इकाई सेकेण्ड में तार के अनुप्रस्थ परिच्छेद में से गुजरने वाली इलेक्ट्रॉनों की संख्या, n = Avd। इस प्रकार t से. में तार के अनुप्रस्थ परिच्छेद से गुजरने वाले इलेक्ट्रॉनों की संख्या = (nAvd)t। 1 इलेक्ट्रॉन पर आवेश e है तो t से. में तार के अनुप्रस्थ परिच्छेद से गुजरने वाले आवेश का परिमाण q = (nAvd)t x e


3. धारा घनत्व से आप क्या समझते हैं ? धारा घनत्व तथा अनुगमन वेग में सम्बन्ध स्थापित करें।

Ans ⇒ धारा घनत्व – किसी चालक तार के प्रति इकाई अनुप्रस्थ परिच्छेद के क्षेत्रफल में से गुजरने वाली धारा चालक का धारा घनत्व कहलाता है। इसे J द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। अतः  इसका मात्रक ऐम्पियर/मी.² तथा विमा सूत्र [IL²] है।
धारा घनत्व तथा अनुगमन वेग में सम्बन्ध – हम जानते हैं कि i = neAvd
धारा घनत्व तथा अनुगमन वेग में सम्बन्ध स्थापित करें


4. प्रतिरोध पर तापक्रम का क्या प्रभाव होता है ? प्रतिरोध तापक्रम गुणांक क्या है ?

Ans ⇒ प्रतिरोध पर तापक्रम का प्रभाव – तापक्रम बढ़ने से धातु का प्रतिरोध बढ़ता है, क्योंकि तापक्रम के बढ़ने से धातु के धनायनों का कम्पन आयाम बढ़ जाता है और वह मुक्त इलेक्ट्रॉनों के मार्ग को अधिक अवरुद्ध कर देता है।
माना कि °C पर ताप का प्रतिरोध R0 तथा t°C पर तार का प्रतिरोध R1 है तो R1 = R0(I + αt) जहाँ α एक नियतांक है, जिसे धातु की तार का प्रतिरोध तापक्रम गुणांक कहते हैं।
प्रतिरोध पर तापक्रम का प्रभाव
तार के प्रतिरोध में आंशिक वृद्धि ।
अतः प्रति एकांक तापक्रम वृद्धि के कारण चालक के प्रतिरोध में जो आंशिक वृद्धि होती है, उसे चालक का तापक्रम गुणांक कहते हैं।


5. किसी पदार्थ के विशिष्ट प्रतिरोध से आप क्या समझते हैं ? इसका S.I. मात्रक लिखें।

Ans ⇒ विशिष्ट प्रतिरोध – किसी तार के पदार्थ का विशिष्ट प्रतिरोध उसके एकांक परिच्छेद क्षेत्रफल वाले एकांक लम्बाई के तार का प्रतिरोध है।
माना कि किसी तार के पदार्थ का प्रतिरोध R, प्रतिच्छेद का क्षेत्रफल A, लम्बाई 1 है, तो  जहाँ ρ उस पदार्थ का विशिष्ट प्रतिरोध है।
जब 1 = I और A = 1 जो ρ = R।
किसी तापक्रम और समान लम्बाई एवं क्षेत्रफल के अनुप्रस्थ परिच्छेद के तारों का प्रतिरोध भिन्न-भिन्न होता है। अतः विशिष्ट प्रतिरोध चालक पदार्थ का लाक्षणिक गुण है। विशिष्ट प्रतिरोध का S.I. मात्रक ओम मीटर (π – m) है।
इसका विमीय सूत्र [ML3T-31-2] है।


6. किसी पदार्थ की विशिष्ट विद्युतीय चालकता क्या है ?

Ans ⇒ विशिष्ट चालकता – किसी पदार्थ के विशिष्ट प्रतिरोध के व्युत्क्रम को उस पदार्थ की विशिष्ट चालकता कहते हैं। इसे प्रायः द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।
विशिष्ट चालकता

S.I. में इसका मात्रक ओम-1 मीटर-1 = महो/मीटर = साइमेन/मीटर है।


7. पदार्थ की प्रतिरोधकता पर ताप का क्या प्रभाव है ? ताप बढ़ने से पदार्थ की विद्युत् चालकता क्यों घटती है ?

Ans ⇒ प्रतिरोधकता और श्रांतिकाल आपस में निम्न रूप से सम्बन्धित है –
.                         प्रतिरोधकता और श्रांतिकाल आपस में निम्न रूप से सम्बन्धित है
जिसके अनुसार प्रतिरोधकता श्रान्तिकाल के व्युत्क्रमानुपाती होती है। l लम्बाई तथा A अनुप्रस्थ काट के क्षेत्रफल के तार का प्रतिरोध
.                       जिसके अनुसार प्रतिरोधकता श्रान्तिकाल के व्युत्क्रमानुपाती होती है
किसी दिए गए तार के लिए l, A तथा n नियतांक हैं, अतः प्रतिरोध
.                        किसी दिए गए तार के लिए
श्रान्तिकाल इलेक्ट्रॉनों के लैटिस आयनों धातु के धनात्मक आयन के साथ दो लगातार संघट्टों के बीच का औसत समय होता है। यदि इलेक्ट्रॉन का माध्य मुक्त पथ (दो लगातार संघट्टों के मध्य औसत दूरी) λ है तथा वर्ग

श्रान्तिकाल इलेक्ट्रॉनों के लैटिस आयनों धातु

ताप बढ़ने के साथ इलेक्ट्रॉन की वर्ग माध्य मूल चाल बढ़ जाती है (vrms ∝ T) तथा माध्यम मुक्त पथ घट जाता है (लैटिस के दोलन का आयाम बढ़ जाता है) इसलिए लैटिस से इलेक्ट्रॉनों के संघट्ट आदि सहजता से होने लगते हैं। इसके परिणामस्वरूप ताप बढ़ने से तार की प्रतिरोधकता और इसलिए प्रतिरोध बढ़ जाता है। दूसरे शब्दों में, ताप बढ़ने से चालक की चालकता घट जाती है।


8. इलेक्ट्रॉनों का अनुगमन वेग से क्या तात्पर्य है ? व्याख्या कीजिए।

लैटिस

Ans ⇒ ठोस चालक में आयनों का एक नियमित विन्यास ही है और मुक्त इलेक्ट्रॉन किसी एक परमाणु से बंधे नहीं होते हैं। मुक्त इलेक्ट्रॉन पदार्थ के सम्पूर्ण आयतन में इधर-इधर घूम सकते हैं।
आयन जो इलेक्ट्रॉनों से अत्यधिक भारी होते हैं, निश्चित स्थिति के परितः दोलन करते हैं, आयनों की माध्य से एक नियमित आवर्ती प्रारूप (Regular Periodic Pattern) बनता है, जिसे लैटिस कहते हैं। मुक्त इलेक्ट्रॉन लैटिस स्थितियों पर आयनों से टकराते हैं या पारस्परिक बलों से प्रभावित होते हैं। प्रत्येक ऐसी घटना पर इलेक्ट्रॉन की चाल एवं दिशा अव्यवस्थित रूप से बढ़ जाती है। इसके परिणामस्वरूप इलेक्ट्रॉन टेढ़े-मेढ़े पथ (Zig-Zag Path) पर गति करता है।
इलेक्ट्रॉन का अनुगमन 1 हो, तो अनुगमन वेग Vd = 1/t
अनुगमन वेग वह औसत घटक है, जिससे इलेक्ट्रॉन विद्युत् क्षेत्र के विपरीत दिशा में अनुगमन करते हैं।
मान लीजिए τ लगातार संघट्टों के बीच इलेक्ट्रॉन का माध्य मुक्त समय (mean free time) है तथा विद्युत् क्षेत्र E के कारण उसमें उत्पन्न त्वरण a है।
mean free time
संघट्टों के बीच इलेक्ट्रॉन का माध्य मुक्त समय

इससे स्पष्ट होता है कि इलेक्ट्रॉन का अनुगमन वेग विद्युत क्षेत्र के अनुक्रमानुपाती होता है।


9. सेल के आन्तरिक प्रतिरोध का व्यंजक प्राप्त करें।


10. तापक्रम के साथ कुचालक और अर्द्धचालक की प्रतिरोधकता में बदलाव के लिए संबंध स्थापित करें।

तापक्रम के साथ कुचालक और अर्द्धचालक की प्रतिरोधकता

11. प्रतिरोधों के समूहीकरण में समतुल्य प्रतिरोध के लिए व्यंजक प्राप्त करें।

Ans ⇒ प्रतिरोध का समूहीकरण दो तरह से किया जाता है –
(i) श्रेणीक्रम में (ii) समानान्तर क्रम में।

प्रतिरोधों के समूहीकरण में समतुल्य प्रतिरोध के लिए व्यंजक प्राप्त करें

(i) श्रेणीक्रम में – दो प्रतिरोधक श्रेणीक्रम में कहा जाता है, यदि उनमें से केवल एक अंत्य बिन्दु संयोजित होता है। यदि एक तीसरा प्रतिरोधक दोनों के श्रेणी संयोजन से जोड़ा जाता है तो तीनों को श्रेणीक्रम में संयोजित कहते हैं।
मान लिया कि R1, R2 तथा R3 तीन प्रतिरोध श्रेणीक्रम में जुड़े हैं तथा 1 धारा इससे प्रवाहित हो रही है।
इस तरह के संयोजन में प्रत्येक प्रतिरोध से धारा समान रूप से प्रवाहित होती है लेकिन विभवान्तर अलग-अलग होता है।

यदि V1, V2 तथा V3 क्रमशः R1, R2, R3, के बीच विभवान्तर हो तो
V1 = IR1, V2 = IR2, V3 = IR3
यदि समतुल्य विभव V हो तो
V = V1 + V2 + V3
IR = IR1 + IR2 + IR3
R = R1 + R2 + R3
यदि n बराबर प्रतिरोध श्रेणीक्रम में जुड़े हों, तो समतुल्य प्रतिरोध
Rs = nR

(ii) समानान्तर क्रम में – दो या दो से अधिक पार्श्व में संयोजित कहे जाते हैं यदि सभी प्रतिरोधकों के एक सिरे आपस में जुड़े हों और उसी दूसरे सिरे भी आपस में संबंधित हों।
मान लिया कि R1, R2 तथा R3 तीन प्रतिरोध श्रेणीक्रम में जुड़े हैं। इस तरह के संयोजन में विभवान्तर समान रहता है किन्तु धारा अलग-अलग होती हैं। मानलिया कि धारा I1, I2 तथा I3 है और विभवान्तर V है।
समानान्तर क्रम में


12. विद्युतीय कार्य, ऊर्जा तथा शक्ति से क्या समझते हैं ?

Ans ⇒ विद्युतीय कार्य – किसी चालक के एक सिरे से दूसरे सिरे तक Q आवेश को ले जाने में किया गया कार्य W = VQ होता है। जहाँ V = विभव कार्य करने की क्षमता को ऊर्जा कहते हैं। इसका मात्रक जूल होता है।                                                                 q जूल = 1 वोल्ट × कूलम्ब

विद्युतीय शक्ति – कार्य करने की दर को शक्ति कहते हैं। यदि किसी परिपथ में एक जूल प्रति सेकेण्ड कार्य होता है तो परिपथ की शक्ति एक वाट होती है।
विद्युतीय शक्ति

शक्ति के बड़े मात्रक – 1 किलोवाट = 103 वाट
1 मेगावाट = 106 वाट
1 अश्वशक्ति = 746 वाट ।


13. एक विभवमापी विभवांतर और धारा दोनों माप सकता है, कैसे ? समझावें।

Ans ⇒ विभवमापी एक ऐसा यंत्र है जो किसी सेल का वि० वा० बल या धारावाही चालक के दो छोरों के बीच का विभवांतर, बिना उससे धारा खींचे, मापता है। यह इस सिद्धान्त पर काम करता है कि किसी वि० वा० बल या विभवांतर को किसी दूसरे वि० वा० बल या विभवांतर से संतुलित किया जा सकता है। विभवमापी में एक वाहक सेल का वि० वा० बल एक लंबे समरूप तार पर वितरित रहता है। इसके दो बिंदुओं के बीच के विभवांतर को मापनेवाले वि० वा० बल या विभवांतर के आर-पार लगाया जाता है। जॉकी को खिसकाया जाता है ताकि दोनों एक-दूसरे को संतुलित करे। उस समय गैलवेनोमीटर में धारा का मान शून्य होता है। यदि 1 – संतुलित लंबाई, r = तार की एकांक लंबाई का प्रतिरोध, i = विभवमापी तार में धारा, तो मापे जानेवाले वि० वा० बल (विभवांतर) e = lri                                                                                                                                                     फिर जिस धारा को मापना है उसके परिपथ में एक मानक प्रतिरोधक का मान कम होना चाहिए ताकि परिपथ में धारा का मान परिवर्तित माना जाए। प्रतिरोध s के आर-पार विभवांतर को मानक कैडमियम सेल के वि० वा० बल से तुलना की जाती है। यदि s के आर-पार विभवांतर V हो और 11 संतुलित लंबाई हो तो V = l1ri ।
यदि कैडमियम सेल के वि० वा० बल के लिए संतुलित लंबाई I2 हो तो                                                                                                                 1.018 = l2ri

यदि कैडमियम सेल के वि० वा० बल के लिए संतुलित लंबाई I

14. किर्कहॉफ के नियमों को लिखें तथा समझावें।

Ans ⇒ किर्कहॉफ के निम्नलिखित दो नियम हैं-

(a) संधि नियम (प्रथम नियम) – किसी खुले परिपथ में या किसी विद्युतीय परिपथ के किसी भी संधि पर मिलने वाली समस्त धाराओं का बीजगणितीय योग शून्य होता है। इसे बिन्दु नियम भी कहा जाता है।

संधि नियम (प्रथम नियम)

माना कि I1 तथा I2 धाराएँ O बिंदु पर AO तथा BO दिशा में और I3, I4 तथा I5 धाराएँ O बिंदु से OC, OD तथा OE दिशाओं में बाहर निकल रही हैं।

O संधि पर पहुँचने वाली धारा को धनात्मक तथा O संधि से बाहर निकलने वाली धाराओं को ऋणात्मक, तो प्रथम नियम को O संधि पर चित्रानुसार लागू करने पर हम पाते हैं कि
I1 + I2 + (-I3) + (-I4) + (-I5) = O
या, I1 + I2 – I3 – I4 – I5 = O

लूप नियम

(b) लूप नियम (द्वितीय नियम) – किसी बंद परिपथ में लूप के विभिन्न भागों की धाराओं तथा प्रतिरोधों के गुणनफल का बीजगणितीय योग उस लूप के विद्युत लूप के विद्युत वाहक बल के बराबर होता है।
माना कि ABCA एक बंद परिपथ या लूप है। इसके AB, BC तथा AC भुजाओं में क्रमशः धाराओं का मान I1, I2, तथा I3, है, जिसका प्रतिरोध R1, R2, और R3 है। BC भुजा में E विद्युत वाहक बल से एक बैटरी जुड़ा है । द्वितीय नियम को लागू करने पर हम पाते हैं कि I1R1 + I2R2 – I3R3 = E होता है।


15. समझाएँ कि किसी सेल को वि. वा. बल वोल्टमीटर क्यों नहीं माप सकता है ?

Ans ⇒ किसी सेल से जुड़े वोल्टमीटर का पाठ्यांक उस सेल का विद्युत् वाहक बल नहीं देता है, क्योंकि उच्च प्रतिरोध वोल्टमीटर भी कुछ-न-कुछ धारा खींचता है। अतः वोल्टमीटर किसी सेल का वि. वा. बल नहीं माप सकता है। ज्ञात वि. वा. बल के मानक सेल के साथ तुलना कर किसी सेल का वि. वा. बल विभवमापी द्वारा निर्धारित किया जा सकता है।


16. एक तार धारा बहती है। क्या यह आवेशित हो जाता है ? अपने उत्तर का कारण दें।

Ans ⇒ तार आवेशित नहीं होती है। स्वतंत्र इलेक्ट्रॉन को निश्चित दिशा में बहने के कारण तार में धारा उत्पन्न होती है। किन्तु तार में प्रोटॉनों की संख्या किसी क्षण इलेक्ट्रॉनों की संख्या के बराबर होता है। इलेक्ट्रॉनों पर आवेश प्रोटॉन पर के आवेश के बराबर एवं विपरीत प्रकृति के होने से तार में परिणामी आवेश शून्य होता है।


17. अतिचालकता क्या है ? इसके दो उपयोग लिखें।

Ans ⇒ क्रान्तिक ताप पर चालक का प्रतिरोध समाप्त होना अतिचालकता की घटना है। विद्युत शक्ति को अतिचालक के तार से बिना ऊर्जा क्षय के अधिक दूरी तक संचारित किया जाता है। अतिचालक से बहुत तेजी से चलने वाला कम्प्यूटर बनाया जा सकता है।


18. दो विद्युत क्षेत्र रेखाएँ क्यों एक-दूसरे को काट नहीं सकती है? क्या दो समविभव सतह काट सकती हैं ?

Ans ⇒ दो विद्युत क्षेत्र रेखाएँ कभी भी एक-दूसरे को काट नहीं सकती है क्योंकि यदि काटती तो प्रतिच्छेद बिन्दु पर दो स्पर्श रेखाएँ होंगी जो कि एक बिन्दु पर विद्युत क्षेत्र के दो मान संभव नहीं है। दो समविभव सतह एक-दूसरे को नहीं काट सकती हैं।


19. धारावाही चालक में वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता एवं समविभवी तल को परिभाषित करें।

Ans ⇒ वैद्युत क्षेत्र के किसी बिन्दु पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता के उस बिन्दु पर रखे इकाई पर धनावेश आवेश पर लगने वाला बल है
.                                              धारावाही चालक में वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता एवं समविभवी तल को परिभाषित करें

समविभवी तल : वैसा तल जिसके सभी बिन्दुओं पर विभव का मान समान हो अर्थात् समविभवती तल के किन्हीं दो बिन्दुओं के बीच विभवांतर शून्य होता है।


20. प्रतिरोधकता का व्यंजक किसी चालक के लिए लिखें तथा व्यंजक के प्रत्येक अवयव को समझाइए।

प्रतिरोधकता का व्यंजक किसी चालक

जहाँ ρ = प्रतिरोधकता (resistivity)
R = चालक का प्रतिरोध (resistance)
A = चालक का अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल (area)
t = चालक की लम्बाई (length)

4. गतिमान आवेश और चुम्बकत्व ( Short Answer Type Question )


1. समानांतर धाराओं के बीच लगते हुए आकर्षण बल से ऐम्पियर की परिभाषा दें।

Ans ⇒ यदि दो समानांतर धाराएँ I1 तथा I2 प्रवाहित हैं, जिनके बीच की दूरी r है, तो तार के प्रति मीटर लम्बाई पर लगने वाला आकर्षण बल,  न्यूटन/मीटर (निर्वात) है।
यदि,                                I1 = I2 = I, r = 1 मीटर
तथा,                                F = 2 x 10-7 न्यूटन/मीटर
माना जाए तो हम पाते हैं कि
समानांतर धाराओं के बीच लगते हुए आकर्षण बल Download Question PDF

अतः यदि दो समानांतर धारावाही तार निर्वात में एक मीटर की दूरी पर रखे जाएँ जिनसे समान प्रबलता की इतनी धारा प्रवाहित की जाए कि तार के प्रति मीटर लम्बाई पर 2 x 10-7 न्यूटन का बल लगे, तो प्रत्येक तार से प्रवाहित धारा का मान एक ऐम्पियर कहलाता है।


2. धारा सुग्राहिता से आप क्या समझते हैं ? किसी चलकुण्डली गैलवेनोमापी की सुग्राहिता किन तथ्यों पर निर्भर करती है ?

Ans ⇒ धारा सुग्राहिता – एक माइक्रो-ऐम्पियर की धारा द्वारा एक मीटर दूर स्थित स्केल पर उत्पन्न मिलीमीटर में जितना विक्षेप होता है, उसे धारा सुग्राहित कहते हैं।
चलकुण्डली गैलवेनोमापी की सुग्राहिता – हम जानते हैं कि i = Kθ =  किसी दिये गये धारा के लिए जितना अधिक विक्षेप होगा, उतना ही कम परिवर्तन गुणांक  का मान होगा। अतः गैलवेनोमापी की सुग्राहिता परिवर्तन गुणांक के व्युत्क्रमानुपाती होती है। अतः धारा सुग्राहिता  जहाँ n कुण्डली में लपेटों की संख्याएँ A कुण्डली का क्षेत्रफल, H चुम्बकीय क्षेत्र तथा C उत्पन्न बलयुग्म है।
इस प्रकार, सुग्राहिता निम्न तथ्यों पर आधारित है –
(i) सुग्राहिता लपेटों की संख्या, कुण्डली का क्षेत्रफल तथा चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता के समानुपाती होती है।
(ii) सुग्राहिता प्रति इकाई परोड़ के ऐंठन बल आघूर्ण अर्थात् बल-युग्म C के व्युत्क्रमानुपाती होती है, जहाँ  जिसमे η फास्फर ब्रॉज की दृढ़ता गुणांक, r फास्फर ब्रॉज तार की त्रिज्या तथा 1 फास्फर ब्रौंज तार की लम्बाई है।
उपर्युक्त सभी तथ्य सुग्राहिता के अत्यधिक होने की पुष्टि करता है। इसीलिए निलम्बित चल कुण्डली गैलवेनोमापी अत्यधिक सुग्राही है।


3. गैल्वेनोमापी को आम्मापी में कैसे बदला जाता है ?

Ans ⇒ गैल्वेनोमापी के समानान्तर क्रम में बहुत कम प्रतिरोध के एक मोटे तार को शंट के रूप में जोड़कर आम्मापी के रूप में व्यवहार किया जा सकता है। फिर एक मानक यंत्र से मिलाकर गैल्वेनोमापी के स्केल को ऐम्पियर में अंशांकित कर लिया जाता है।


4. गैल्वेनोमापी को वोल्टमापी में कैसे बदला जाता है ?

Ans ⇒ गैल्वेनोमापी के श्रेणीक्रम में बाह्य रूप से उपयुक्त उच्च प्रतिरोध जोड़कर वोल्टमापी के रूप में व्यवहार किया जाता है। फिर एक मानक यत्र से मिलाकर गैल्वेनोमापी के स्केल को वोल्ट में अशांकित कर लिया जाता है।


5. ऐम्पियर का परिपथीय नियम की व्याख्या कीजिए।

Ans ⇒ ऐम्पियर के परिपथीय नियम के अनुसार किसी बन्द परिपथ के लिए चुम्बकीय क्षेत्र का रेखीय समाकलन, उस परिपथ से गुजरने वाली धारा और μ0 के गुणनफल के बराबर होता है। गणितीय रूप में इसे निम्न प्रकार लिखा जा सकता है –
ऐम्पियर का परिपथीय नियम की व्याख्या कीजिए                                                                                                                                        ∮B.dl = μ0I

यह बन्द पथ या परिपथ के आकार या आकृति पर निर्भर नहीं करता है।
इसको समझने के लिए अनन्त लम्बाई का एक धारावाही चालक लीजिए, जिसमें I धारा प्रवाहित हो रही हो। r त्रिज्या का एक वृत्ताकर लूप लीजिए। हम जानते हैं कि तार के चारों तरफ वृत्ताकार चुम्बकीय क्षेत्र रेखाएँ होती हैं। इस प्रकार लूप के प्रत्येक बिन्दु पर चुम्बकीय क्षेत्र dl के समान्तर होता है। B का परिमाण भी लूप के प्रत्येक बिन्दु पर समान होता है।
          ∮ B.dl = B∑dl                                 (∵ θ = 0)
अब वृत्ताकार लूप के अनुदिश ∑B.dl = B.2πr परन्तु बायो-सेवार्ट नियम के अनुसार

इस प्रकार बायो-सेवार्ट के नियम से ऐम्पियर के नियम को व्युत्पन्न किया गया है।
         परन्तु dl = rd
        चित्र में ऐसे ही एक बन्द लूप को दिखाया गया है। तार बिन्दु O से होकर गुजरता है। बन्द लूप को अनेक छोटे-छोटे अवयवों dl में बाँट कर,
                ∑B.dl = B∑dl
       चूँकि प्रत्येक छोटे अवयव के लिए, B dl के समान्तर है।
यह नियम धारा के किसी भी संयोजन

चूंकि पूरे लूप के लिए केन्द्र पर ∑dθ = 2π
यह नियम धारा के किसी भी संयोजन तथा किसी भी बन्द परिपथ के लिए लागू होता है।


6. चुम्बकीय द्विध्रुव से आप क्या समझते हैं ?

Ans ⇒ चुम्बकीय द्विध्रुव-एक-दूसरे से बहुत कम दूरी पर स्थित बराबर परिमाण के विपरीत ध्रुवों के संयोग को चुम्बकीय द्विध्रुव कहते हैं। छोटे (अत्यल्प) छड़ चुम्बक को चुम्बकीय द्विध्रुव कहा जा सकता है।
वैसी सभी संरचनाएँ जिसे किसी बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र में रखने से बल-युग्म का अनुभव करता है, जिससे वह क्षेत्र की दिशा में संरेखित होने की प्रवृति रखती है, चुम्बकीय द्विध्रुव कहलाते हैं। चुम्बकीय द्विध्रुव की चुम्बकीय लम्बाई अत्यल्प होती है क्योंकि इसके ध्रुवों को अलग नहीं किया जा सकता है। वास्तव में चुम्बकीय द्विध्रुव एक धारा लूप भी होता है।


7. चुम्बकीय द्विध्रुव आघूर्ण की परिभाषा चुम्बकीय बल क्षेत्र में चुम्बकीय द्विध्रुव पर लगने वाले यांत्रिक आघूर्ण के आधार पर करें।

Ans ⇒ चुम्बकीय द्विध्रुव आघूर्ण – किसी चुम्बकीय क्षेत्र में स्थित धारा-लूप (चुम्बकीय द्विध्रुव) पर लगने वाले बल-युग्म की तुलना विद्युतीय क्षेत्र में स्थित विद्युतीय द्विध्रुव पर लगने वाले बल-युग्म से की जाती है। हम जानते हैं कि चुम्बकीय क्षेत्र B में क्षेत्रफल A की धारा लूप पर लगने वाला बल आघूर्ण τ = iABsinθ जहाँ θ क्षेत्र की दिशा तथा लूप-तल के अभिलम्ब के बीच का कोण है। एक लूप के स्थान पर N लूपों से बनी धारावाही कुण्डली होने पर कार्यकारी बल-आघूर्ण τ = pEsinθ.
किसी विद्युतीय क्षेत्र E में क्षेत्र की दिशा से θ कोण पर स्थित किसी विद्युतीय द्विध्रुव पर कार्यकारी बल-आघूर्ण τ = pEsinθ.

जहाँ p विद्युतीय द्विध्रुव आघूर्ण है। समीकरण (i) तथा (ii) से स्पष्ट है कि राशि NiA = p, इसे चुम्बकीय द्विध्रुव आघूर्ण कहते हैं। इसे M द्वारा सूचित किया जाता है।
जहाँ p विद्युतीय द्विध्रुव आघूर्ण है

अतः किसी चुम्बकीय द्विध्रुव का चुम्बकीय आघूर्ण वह बल-आघूर्ण है तो इस द्विध्रुव को इकाई तथा समान चुम्बकीय क्षेत्र में क्षेत्र की दिशा के लम्बवत् रखने पर द्विध्रुव पर लगता है।
चुम्बकीय द्विध्रुव का मात्रक ऐम्पियर-मीटर² है तथा विमा सूत्र [IL²] है।


8. चुम्बकीय द्विध्रुव को चुम्बकीय क्षेत्र में घुमाने के लिए किये गये कार्य का व्यंजक प्राप्त करें।

Ans ⇒ चुम्बकीय द्विध्रुव को चुम्बकीय क्षेत्र में घुमाने के लिए किये गये कार्य का व्यंजक – चुम्बकीय क्षेत्र में स्थित प्रत्येक चुम्बकीय द्विध्रुव पर एक बल-युग्म कार्य करता है जो कि द्विध्रुव को क्षेत्र की दिशा से संरेखित करने का प्रयत्न करता है। अतः द्विध्रुव को चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा से घुमाने के लिए कार्य करना पड़ता है।
माना कि किसी क्षण चुम्बकीय क्षेत्र B में स्थित चुम्बकीय द्विध्रुव क्षेत्र की दिशा से ए कोण बनाता है, तो इस पर लगने वाला बल-युग्म का आघूर्ण = MBsinθ, इस स्थिति में, द्विध्रुव को dθ कोण से विस्थापित करने के लिए आवश्यक कार्य dw = बल युग्म का आघूर्ण x विस्थापित कोण = MB sinθ x dθ
अतः चुम्बकीय द्विध्रुव को चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा से θ कोण घुमाने में किया गया कुल कार्य,
विशेष स्थिति

विशेष स्थिति : (a) चुम्बकीय द्विध्रुव को चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा से 180° घुमा देने पर किया गया कार्य,
w = MB (1 – cos180°) = MB[1 – (-1)] = 2MB है।

(b) चुम्बकीय द्विध्रुव को चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा से 90° घुमाने पर किया कार्य,
W = MB (1 – cos 90°) = MB (1 – 0) = MB है।


9. (a) किसी प्रकोष्ठ में एक ऐसा चुम्बकीय क्षेत्र स्थापित किया गया है जिसका परिणाम तो एक बिंदु पर बदलता है, पर दिशा निश्चित है पूर्व से पश्चिमी इस प्रकोष्ठ में एक आवेशित कण प्रवेश करता है। और अविचलित एक सरल रेखा में अचर वेग से चलता रहता है। आप कण के प्रारंभिक वेग के बारे में क्या कह सकते हैं ?
(b) एक आवेशित कण, एक ऐसे शक्तिशाली असमान चुम्बकीय क्षेत्र में प्रवेश करता है जिसका परिमाण एवं दिशा दोनों एक बिंदु स दूसरे बिंदु पर बदलते जाते हैं, और एक जटिल पथ पर चलते हुए इसके बाहर आ जाता है। यदि यह मान लें कि चुम्बकीय क्षेत्र इसका किसी भी दूसरे कण से कोई संघट्ट नहीं होता तो क्या इसकी अंतिम चाल, प्रारंभिक चाल के बराबर होगी?
(c) पश्चिम से पूर्व की ओर चलता हुआ एक इलेक्ट्रॉन एक ऐसे प्रकोष्ठ में प्रवेश करता है जिसमें उत्तर से दक्षिण दिशा की ओर एक समान वैधुत क्षेत्र है। वह दिशा बताइए जिसमें एक समान चुम्बकीय क्षेत्र स्थापित किया जाए ताकि इलेक्ट्रॉन को अपने सरल रेखीय पथ से विचलित होने से रोका जा सके।

Ans ⇒ (a) आवेशित कण का प्रारंभिक वेग की दिशा या तो चुम्बकीय क्षेत्र के समांतर या विपरीत दिशा में होता है क्योंकि अन्य दूसरे दिशा में इस क्रियाशील बल  होगा जो कण की दिशा को बदलता है।

(b) चुम्बकीय क्षेत्र के द्वारा आवेशित गतिशील कण पर बल उसके गति के लंबवत होता है और चुम्बकीय क्षेत्र के द्वारा कार्य नहीं किया जाता है। अतः आवेशित कण का प्रारंभिक चरण अंतिम चाल के बराबर होगा यदि कण का किसी दूसरे कण से टक्कर न हो।

(c) विद्युत क्षेत्र के कारण इलेक्ट्रॉन उत्तर की ओर विक्षेपित होता है। इलेक्ट्रॉन अविक्षेपित रहेगा यदि चुम्बकीय क्षेत्र के कारण बल दक्षिण की ओर हो। चुम्बकीय क्षेत्र के कारण बल दक्षिण की ओर हो। चूंकि इलेक्ट्रॉन पश्चिम से पूर्व की ओर गतिशील है अतः फ्लेमिंग के बायीं हाथ के नियम से चुम्बकीय क्षेत्र B उदग्र रूप से नीचे की ओर आरोपित होना चाहिए।


10. चल कुंडली गैल्वेनोमीटर में रेखीय चुंबकीय क्षेत्र का क्या महत्व है ?

Ans ⇒ विद्युत क्षेत्र के कारण इलेक्ट्रॉन उत्तर की ओर विक्षेपित होता है। इलेक्ट्रॉन अविक्षेपित रहेगा यदि चुम्बकीय क्षेत्र के कारण बल दक्षिण की ओर हो। चुम्बकीय क्षेत्र के कारण बल दक्षिण की ओर हो। चूँकि इलेक्ट्रॉन पश्चिम से पूर्व की ओर गतिशील है अतः फ्लेमिंग के बायीं हाथ के नियम से चुम्बकीय क्षेत्र उदग्र रूप से नीचे की ओर आरोपित होना चाहिए।


11. विद्युत चुम्बक तथा स्थायी चुम्बक के बीच दो अंतर लिखें।

Ans ⇒ विद्युत चुम्बक तथा स्थायी चुम्बक के बीच निम्नलिखित अंतर है –

S.L.विद्युत चुम्बकस्थायी चुम्बक
(i) यह अस्थायी प्रकृति का होता है।यह स्थायी प्रकृति का होता है।
(ii)इसकी चुम्बकीय दिशा परिवर्तित हो सकती है।इसकी चुम्बकीय दिशा परिवर्तित नहीं हो सकती है।

12. एक धारावाही वृत्ताकार लूप एक चिकने क्षैतिज तल पर रखा है। क्या एकसमान चुम्बकीय क्षेत्र इस प्रकार लगाया जा सकता है कि लूप अपनी ऊर्ध्वाधर अक्ष के चारों तरफ घूमने लगे।

Ans ⇒ नहीं। लूप को स्वयं के प्रति घूमाने के लिए चुम्बकीय क्षेत्र स्थापित नहीं हो सकता है क्योंकि इसके लिए उदग्र दिशा में आघूर्ण की आवश्यकता होती है।
किन्तु magnetic moment of magnet = l एक धारावाही वृत्ताकार लूप x due to infinite wire चूँकि क्षैतिज लूप का एक धारावाही वृत्ताकार लूप उदग्र दिशा में होता है। अत: τ लूप के तल में होना चाहिए।


13. क्या गतिशील आवेश पर चुम्बकीय क्षेत्र के द्वारा कार्य किया जाता है ?

Ans ⇒ चुम्बकीय क्षेत्र due to infinite wire  में क्या गतिशील आवेश पर चुम्बकीय क्षेत्र के द्वारा कार्य किया जाता है वेग से गतिशील आवेश q पर क्रियाशील बल
दिशा आवेश के वेग के लम्बवत m = q(क्या गतिशील आवेश पर चुम्बकीय क्षेत्र के द्वारा कार्य किया जाता है x due to infinite wire)
दिशा आवेश के वेग के लम्बवतm की दिशा आवेश के वेग के लम्बवत हैं।
चुम्बकीय क्षेत्र के द्वारा किया गया कार्य W =  दिशा आवेश के वेग के लम्बवतचुम्बकीय क्षेत्र के द्वारा किया गया कार्य cos90 = 0 चुम्बकीय क्षेत्र के द्वारा गतिशील आवेश पर किया गया कार्य = O.


14. गॉस के नियम और एम्पियर के नियम की तुलना करें।

Ans ⇒ गॉस के नियम से 
ऐम्पियर के नियम से 
अतः वि. क्षेत्र E के सतह समाकलन को आवेश से सम्बन्ध बताने वाला नियम गॉस नियम है। ऐम्पियर नियम चुम्बकीय क्षेत्र के रेखा समाकलन और धारा को संबंधित करता है।


15. एक धारावाही वृत्ताकार लूप एक समान बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र में रखा है। यदि लूप घूमने के लिए स्वतंत्र हो तो इसके स्थायी संतुलन का दिक विन्यास क्या होगा ? दर्शाइए कि इसमें कुल क्षेत्र (बाह्य क्षेत्र + लूप द्वारा उत्पन्न क्षेत्र) का फ्लक्स अधिकतम होगा।

Ans ⇒ लूप का सदिश क्षेत्रफल एक धारावाही वृत्ताकार लूप और बाह्य क्षेत्र की दिशा समान होने पर लूप स्थायी संतुलन में होता है। अतः ऐसी स्थिति में चुम्बकीय फ्लक्स महत्तम होगा।


16. समरूप चुम्बकीय क्षेत्र के लम्बवत गतिशील आवेशित कण लेड में प्रवेश करता है और इस प्रकार अपना आधा गतिज ऊर्जा क्षय करता है। आवेशित कण के गति पथ का त्रिज्या बदलकर कितना होता है ?

Ans ⇒ चुम्बकीय क्षेत्र B में V वेग से गतिशील आवेश q के पथ का
त्रिज्या r = mv/qB
यदि आवेशित कण की गतिज ऊर्जा E हो तो
यदि आवेशित कण की गतिज ऊर्जा

गतिज ऊर्जा आधा होने पर त्रिज्या घटकर प्रारंभिक त्रिज्या का 1/√2 गुना हो जाता है।


17. इलेक्ट्रॉन और प्रोटॉन समान विभवांतर के द्वारा त्वरित होता है और समरूप लम्बवत चुम्बकीय क्षेत्र में प्रवेश करता है। प्रोटान के पथ की त्रिज्या इलेक्ट्रान के पथ के त्रिज्या से कितना बड़ा होता है ?

Ans ⇒ चूँकि इलेक्ट्रॉन और प्रोटॉन पर समान परिमाण में आवेश होता है तथा दोनों समान विभवांतर में त्वरित होता है। इसलिए दोनों के द्वारा प्राप्त गतिज ऊर्जा समान होगा।
अर्थात् Ee = Ep = E (माना)
इलेक्ट्रॉन और प्रोटॉन समान विभवांतर

5. चुम्बकत्व एवं द्रव्य ( Short Answer Type Question )


1. चुम्बकीय बल रेखाओं से क्या समझते हैं ? इसके प्रमुख तीन गुणों को लिखें।

Ans ⇒ चुम्बकीय बल रेखाएँ – चुम्बकीय क्षेत्र में खींची गयी वे वक्र रेखाएँ जिनके किसी बिन्दु पर खींची गयी स्पर्श रेखा उस बिन्दु पर चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा को प्रदर्शित करती है।
चुम्बकीय बल रेखाओं के तीन प्रमुख गुण निम्नलिखित हैं –
(i) इनके किसी भी बिन्दु पर खींची गयी स्पर्श रेखा उस बिन्दु पर चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा बताती है।
(ii) ये सदैव बिन्दु वक्र के रूप में होती हैं।
(iii) ये एक-दूसरे को कभी नहीं काटती हैं। 


2. चुम्बकीय क्षेत्र में किसी छड़ चुम्बक पर कार्य करने वाल बल आघूर्ण (बल-युग्म) क्या है ? व्यंजक प्राप्त करें।

Ans ⇒ बल-आघूर्ण – चित्रानुसार माना कि m ध्रुव सामर्थ्य तथा 2l लम्बाई की एक छड़ चुम्बक SN, एक समान चुम्बकीय क्षेत्र B में रखा है, जा चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा के साथ θ कोण बनाता है।
बल-आघूर्ण

बल आघूर्ण (बल-युग्म) के परिमाण τ = MBsinθ
यदि B = 1 तथा θ = 90° तो sinθ = 1 तथा m = τ
इस प्रकार, किसी चुम्बकीय द्विध्रुव का चुम्बकीय द्विध्रुव आघूर्ण वैसे बल आघूर्ण के बराबर है जो इकाई ध्रुव सामर्थ्य के द्विध्रुव को समान चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा के लम्बवत् रखने से प्राप्त होता है।


3. किसी बिंदु पर चुम्बकीय विभव तथा चुम्बकीय तीव्रता को परिभाषित करें। दोनों में क्या सम्बन्ध है ? लिखें।

Ans ⇒ किसी बिंदु पर चुम्बकीय विभव – किसी बिन्दु पर चुम्बक की इकाई उत्तरी ध्रुव को अनन्त से उस बिन्दु तक ले जाने में जितना कार्य होता है उसे उस बिन्दु पर का चुम्बकीय विभव कहते हैं। इसे V द्वारा सूचित किया जाता है। इसका मात्रक जूल प्रति ऐम्पियर मीटर है।

किसी बिन्दु पर चुम्बकीय तीव्रता – किसी बिन्दु पर चुम्बक की इकाई ध्रुव को अनन्त से उस बिन्दु तक ले जाने में जितना बल लगता है उसे उस बिन्दु पर की चुम्बकीय तीव्रता कहते हैं, जिसे E द्वारा सूचित किया जाता है। इसका मात्रक वेबर/मीटर² या टेसला या न्यूटन-ऐम्पियर-मीटर है।

चुम्बकीय तीव्रता तथा चुम्बकीय विभव में सम्बन्ध – किसी बिन्द पर चुम्बकीय तीव्रता ऋणात्मक चुम्बकीय विभव प्रवणता के बराबर है।
इसलिए,  है।
अतः चुम्बकीय तीव्रता = ऋणात्मक चुम्बकीय विभव प्रवणता।


4. चुम्बकीय तीव्रता से आप क्या समझते हैं ?

Ans ⇒ चुम्बकीय तीव्रता – किसी चुम्बक की इकाई आयतन में अणओं के विद्युतीय धारा लूपों के चुम्बकीय आघूर्णों के सदिश योग को चुम्बकीय तीव्रता
कहते हैं। इसे I द्वारा सूचित किया जाता है।
∴  किसी चुम्बक की चुम्बकीय तीव्रता,
चुम्बकीय तीव्रता से आप क्या समझते हैं
संक्षेप में, किसी चुम्बक का इकाई आयतन में उपस्थित चुम्बकीय आघूर्णॊ को चुम्बकीय तीव्रता कहते हैं। इसका मात्रक ऐम्पियर/मीटर है।


5. चुम्बकशीलता तथा चुम्बकीय प्रवृत्ति से आप क्या समझते हैं ?

Ans ⇒ चुम्बकशीलता – किसी माध्यम में चुम्बकीय प्रेरण तथा चुम्बकीय क्षेत्र के अनुपात को पदार्थ की चुम्बकशीलता कहते हैं। इसे μ द्वारा सूचित किया जाता है।
चुम्बकशीलता तथा चुम्बकीय प्रवृत्ति से आप क्या समझते हैं

चुम्बकीय प्रवृत्ति – किसी माध्यम में चुम्बकीय तीव्रता तथा चुम्बकीय क्षेत्र के अनुपात को पदार्थ की चुम्बकीय प्रवृत्ति कहते हैं। इसे X द्वारा सूचित किया जाता है।
चुम्बकीय प्रवृत्ति


6. अनुचुम्बकीय पदार्थ या अनुचुम्बकत्व क्या है ? समझाएँ।

अनुचुम्बकीय पदार्थ या अनुचुम्बकत्व क्या है

Ans ⇒ अनुचुम्बकीय पदार्थ या अनुचुम्बकत्व-वैसे पदार्थ अनुचुम्बकीय पदार्थ कहलाते हैं जिन्हें चुम्बकीय क्षेत्र में धागा से बाँध कर स्वतंत्रतापूर्वक लटकाने पर वे चुम्बकीय बल रेखाओं के समानान्तर अर्थात् कमजोर क्षेत्र से हटकर शक्तिशाली क्षेत्र में चले आते हैं। इस प्रकार के गुण अनुचुम्बकत्व कहलाते हैं। जैसे-Pt, Mn, Pd, Os, O2, Al, Cr, CuSO4, Na, CuCl2 इत्यादि। इनकी सापेक्षिक चुम्बकशीलता एक से थोड़ा ज्यादा किन्तु चुम्बकीय प्रवृत्ति से
कम तथा धनात्मक है, जो तापक्रम के व्युत्क्रमानुपाती है। इनकी चुम्बकीय तीव्रता एक साथ रैखिक रूप में बदलते हैं तथा कम ताप तथा बहुत अधिक क्षेत्र पर संतृप्तता को प्राप्त करते हैं। ये B-सदिश शैथिल्य नहीं दर्शाते हैं।


7. चुम्बकीय फ्लक्स से क्या अभिप्राय है ? समझाएँ।

चुम्बकीय फ्लक्स

Ans ⇒ चुम्बकीय फ्लक्स – चुम्बकीय क्षेत्र में स्थित किसी तल से उसके लम्बवत् गुजरनेवाली बल रेखाओं की संख्या को उस तल से बद्ध चुम्बकीय फ्लक्स कहते हैं। इसे प्रायः φ (फाई) से प्रदर्शित किया जाता है।
माना कि एक तल जिसका क्षेत्रफल A है जो समान चुम्बकीय क्षेत्र B के लम्बवत् रखा है । चित्रानुसार (a) में इस तल से बद्ध चुम्बकीय फ्लक्स, = BA है।
फिर चित्रानुसार (b) में चुम्बक क्षेत्र B तलपर खींचे गये अभिलम्ब से θ कोण बनाता है तब तल से बद्ध चुम्बकीय फ्लक्स, φ चुम्बकीय क्षेत्र B से इस तल के लम्बवत् घटक Bcosθ तथा तल के क्षेत्रफल A के गुणनफल के बराबर है। अतः φ = BAcosθ है।
चुम्बकीय फ्लक्स का मात्रक वेबर है।
, अतः चुम्बकीय क्षेत्र B का मात्रक वेबर/मीटर² है।
इसलिए B को चुम्बकीय फ्लक्स घनत्व भी कहते हैं। B का मात्रक न्यूटन/ऐम्पियर-मीटर भी है। इसका एक अन्य मात्रक टेसला है। अत: 1 टेसला = 1 वेबर/मीटर² = 1 न्यूटन/ऐम्पियर-मीटर
φ का विमा सूत्र [ML²T-2 I-1] है।


8. चुम्बकशीलता तथा चुम्बकीय प्रवृत्ति में सम्बन्ध करें।

Ans ⇒ चुम्बकशीलता तथा चुम्बकीय प्रवृत्ति में सम्बन्ध – किसी माध्यम में चुम्बकीय प्रेरण B तथा चुम्बकन क्षेत्र H के अनुपात को उस माध्य की चुम्बकशीलता कहते हैं। इसे द्वारा व्यक्त किया जाता है। अतः μ = P है।
चुम्बकीयन तीव्रता I तथा चुम्बकन क्षेत्र H के अनुपात को पदार्थ की चुम्बकीय प्रवृत्ति कहते हैं। इसे X द्वारा व्यक्त किया जाता है। अतः है, जिससे X = I/H है जिससे I = XH प्रत्येक माध्यम की चुम्बकशीलता उसकी चुम्बकीय प्रवृत्ति से सम्बद्ध होती है।
चुम्बकशीलता तथा चुम्बकीय प्रवृत्ति में सम्बन्ध करें


9. प्रतिचुम्बकीय पदार्थ या प्रतिचुम्बकत्व क्या है ?

प्रतिचुम्बकीय पदार्थ या प्रतिचुम्बकत्व क्या है

Ans ⇒ प्रतिचुम्बकीय पदार्थ या प्रतिचुम्बकत्व – वैसे पदार्थ प्रति चुम्बकीय पदार्थ कहलाते हैं जिन्हें धागे के द्वारा निलम्बन शीर्ष से बाँधकर चुम्बकीय क्षेत्र में स्वतंत्रतापूर्वक लटकाने पर वे शक्तिशाली क्षेत्र से हटकर कमजोर क्षेत्र में अर्थात् चुम्बकीय बल रेखा के लम्बवत् आकर स्थित हो जाते हैं। इस प्रकार के गुण प्रति चुम्बकत्व कहलाते हैं। जैसे – Sb, Bi, Zn, Cu, Ag, Pb, H2O, C2H5OH, H2, He, Au, P, NaCl, N2, Hg हवा इत्यादि।

इनकी सापेक्षिक चुम्बकशीलता एक से कम है, किन्तु चुम्बकीय प्रवृत्ति का मान कम या ऋणात्मक है और तापक्रम पर निर्भर नहीं करता है। इनकी चुम्बकीय तीव्रता चुम्बकीय क्षेत्र के साथ रैखिक रूप से बदलती है। ये B-सदिश शैथिल्य नहीं दर्शाते हैं।


10. चुम्बकत्व के लिए गाउस के नियम को लिखें।

Ans ⇒ गाउस के नियम – किसी भी बंद सतह से गुजरने वाला कुल चुम्बकीय फ्लक्स हमेशा शून्य होता है।
φB = ∑B.ΔS = 0


11. चुम्बकत्व में क्यूरी के नियम को समझाएँ।

चुम्बकत्व में क्यूरी के नियम को समझाएँ

Ans ⇒ इस नियम के अनुसार चुम्बकीय पदार्थ की चुम्बकन तीव्रता I, चुम्बकीय प्रेरण B के समानुपाती तथा तापक्रम T के व्युत्क्रमानुपाती होती है।

जहाँ C नियतांक है तथा इसे क्यूरी का नियतांक कहते हैं।


12. (a) एक सदिश को पूर्ण रूप से व्यक्त करने के लिए तीन राशियों की आवश्यकता होती है। उन तीन स्वतंत्र राशियों के नाम लिखिए जो परंपरागत रूप से पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र को व्यक्त करने के लिए प्रयुक्त होती है।
(b) दक्षिण भारत में किसी स्थान पर नति कोण का मान लगभग 18° है। ब्रिटेन में आप इससे अधिक नति कोण की अपेक्षा करेंगे या कम की ?
(c) यदि आप ऑस्ट्रेलिया के मेलबॉर्न शहर में भू-चुंबकीय क्षेत्र रेखाओंका नक्शा बनाएँ तो ये रेखाएँ पृथ्वी के अंदर जाएगी या इससे बाहर आएगी।
(d) एक चुम्बकीय सूई, जो ऊर्ध्वाधर तल में घूमने के लिए स्वतंत्र है, यदि भू-चुंबकीय या दक्षिण ध्रुव पर रखी हो तो यह किस दिशा में संकेत करेगी ?
(e) यह माना जाता है कि पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र लगभग एक चुम्बकीय द्विध्रुव के क्षेत्र जैसा है जो पृथ्वी के केन्द्र पर रखा है और जिसका द्विध्रुव आघूर्ण 8 x 1022 JT-1 है। कोई ढंग सुझाइए, जिससे इस संख्या की परिमाण की कोटि जाँची जा सके।
(f) भू-गर्भशास्त्रियों का मानना है कि मुख्य N-S चुम्बकीय धुवों के अलावा पृथ्वी की सतह पर कोई अन्य स्थानीय ध्रुव भी है, जो विभिन्न दिशाओं में विन्यास है। ऐसा होना कैसे संभव है ?

Ans ⇒ (a) (i) चुम्बकीय दिक्पात (ii) नमन (iii) पृथ्वी के क्षैतिज चुम्बकीय क्षेत्र।
(b) जब विषुवत रेखा से ध्रुव की ओर जाया जाता है तब नमन शून्य से 90° तक बढ़ता है। भारत की तुलना में ब्रिटेन चुम्बकीय उत्तरी ध्रुव के समीप है। इसलिए ब्रिटेन में नमन दक्षिण भारत की तुलना में अधिक होगा।

(c) चूँकि मेलबॉर्न पृथ्वी के दक्षिणी गोलार्द्ध, जहाँ पृथ्वी के चुंबक का उत्तरी ध्रुव है, के निकट है। अतः चुंबकीय बल रेखाएँ पृथ्वी के अंदर से आती प्रतीत होती है।
(d) भू–चुम्बकीय ध्रुव पर BH = 0 अतः चुंबकीय सूई किसी भी दिशा में संकेत करेगी।
(e) पृथ्वी के सतह पर निरक्षीय पर द्विध्रुव के कारण चुम्बकीय क्षेत्र
पृथ्वी के सतह पर निरक्षीय पर द्विध्रुव के कारण चुम्बकीय क्षेत्र
यह वास्तव में पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र के कोटि में है।
(f) पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र लगभग द्विध्रुव क्षेत्र है। पृथ्वी के अन्दर चुम्बकीय खनिज के रहने से N-S ध्रुव होता है।


13. (a) ठंढा करने पर किसी अनुचुंबकीय पदार्थ का नमूना अधिक चुंबकन क्यों प्रदर्शित करता है ?
(b) अनुचुम्बकत्व के विपरीत प्रति चुम्बकत्व पर ताप का प्रभाव लगभग नहीं होता है क्यों ?
(c) यदि एक टोरॉइड में विस्मथ का क्रोड लगाया जाय तो इसके अंदर चुम्बकीय क्षेत्र उस स्थिति की तुलना में (तनिक कम होगा या (तनिक) ज्यादा होगा, जबकि क्रोड खाली हो?
(d)क्या किसी लौह-चुंबकीय पदार्थ की चुंबकशीलता चुम्बकीय क्षेत्र पर निर्भर करती है ? यदि हाँ तो उच्च चुम्बकीय क्षेत्रों के लिए मान कम होगा या अधिक ?
(e) किसी लौह चुंबक की सतह के प्रत्येक बिंदु पर चुंबकीय क्षेत्र रेखाएँ सदैव लंबवत होती है, (यह तथ्य उन स्थिर वैद्युत क्षेत्र रेखाओं के सदश है जो कि चालक की सतह के प्रत्येक बिन्दु पर लंबवत होती हैं।) क्यों ?
(f) क्या किसी अनुचुम्बकीय नमूने का अधिकतम संभव चुंबकन, लौह चुंबक के चुम्बकन के परिमाण की कोटि का होगा ?

Ans ⇒ (a) संरेखित द्वि-ध्रुव को तितर-बितर करने की प्रवृत्ति निम्न ताप पर घटता है क्योंकि अनियमित ऊष्मीय गति घटता है। फलतः अनुचुम्बकीय पदार्थ अधिक चुंबकन प्रदर्शित करता है।

(b) प्रति चुंबकीय पदार्थ में प्रेरित द्वि-ध्रुव आघूर्ण चुम्बकीत करने वाला क्षेत्र के विपरीत दिशा में होता है। इसलिए इसके अणुओं की अनियमित ऊष्मीय गति इसके चुम्बकत्व को प्रभावित नहीं करता है। यही कारण है कि प्रति चुम्बकीय पदार्थ के चुम्बकत्व पर ताप का प्रभाव नहीं पड़ता है।

(c) बिस्मथ प्रति चुम्बकीय पदार्थ है, इसलिए क्रोड में क्षेत्र क्रोड के खाली होने की तुलना में कम होता है।
(d) नहीं। लौह चुम्बकीय पदार्थ की चुम्बकशीलता (μ) आरोपित चुम्बकीय क्षेत्र (H) पर निर्भर करता है और H के बीच वक्र से स्पष्ट है कि H के निम्न मान के लिए μ अधिक होता है।
μ = B/ H
(e) लौह चुम्बकीय पदार्थ के लिए μr > 1 अतः क्षेत्र रेखाएँ इस माध्यम से सतह पर लम्बवत् होती है।
(f) हाँ। अनुचुम्बकीय पदार्थ में अधिकतम संभव चुम्बकन लौह चुंबक के चुम्बकन समान कोटि का हाता है। किन्तु अनुचुम्बकीय पदार्थ के लिए उच्च चुम्बकीय क्षेत्र की आवश्यकता होती है जो व्यवहार में संभव नहीं है।


14. (a) लौह-चुंबकीय पदार्थ के चुंबकन वक्र की अनुत्क्रमणीयता, डोमेनों के आधार पर गुणात्मक दृष्टिकोण से समझाइए।
(b) नर्म लोहे के एक टुकड़े के शैथिल्य पाश का क्षेत्रफल, कार्बन-स्टील को बार-बार चुंबकन चक्र से गुजारा जाए तो कौन-सा टुकड़ा अधिक ऊष्मा ऊर्जा का क्षय करेगा ?
(c) लौह चुम्बक जैसा शैथिल्य पाश प्रदर्शित करने वाली कोई प्रणाली स्मृति संग्रहण की युक्ति है। इस कथन की व्याख्या कीजिए।
(d) कैसेट के चुम्बकीय फीतों पर पर्त चढ़ाने के लिए या आधुनिक कम्प्यूटर में स्मृति संग्रहण के लिए, किस तरह के लौह चुम्बकीय पदार्थों का इस्तेमाल होता है ?
(e) किसी स्थान को चुम्बकीय क्षेत्र से परिरक्षित करना है। कोई विधि सुझाइए।

Ans ⇒ (a) जब चुम्बकन क्षेत्र बड़ा होता है तब अन्तर डोमेन की सीमा गायब होने लगता है और चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा में डोमेन सजने लगते हैं। चुम्बकन क्षेत्र को कम करने पर डोमेन टूटता नहीं है। इस प्रकार चुम्बकन उत्क्रमणीय नहीं है।
(b) कार्बन-स्टील टुकड़ा, क्योंकि प्रति चक्र के एकांक आयतन में क्षय ऊष्मा शैथिल्य पाश के क्षेत्रफल के बराबर होता है।
(c) लौह चुम्बकीय पदार्थ का चुम्बकन पूर्णतः उत्क्रणीय नहीं है। जब लौह चुम्बकीय पदार्थ को चुम्बकन क्षेत्र में रखा जाता है। तब इसका डोमेन चुम्बकीय क्षेत्र की दिशा में घूम जाता है और यह चुम्बकीत हो जाता है। चुम्बकन क्षेत्र को हटाने पर डोमेन पुनः प्रारम्भिक स्थिति में नहीं आता है। यह कुछ स्मृति को रख लेता है।
(d) इसके लिए निम्न प्रकार के पदार्थ काम में लाये जाते हैं
MnFe2O4; Fe Fe2O4, Ni Fe2O4 आदि ।
(e) नरम लोहा रिंग के द्वारा चुम्बकीय क्षेत्र को घेर कर ऐसा किया जा सकता है।


नीचे दिए गए चित्रों में कई में चुम्बकीय क्षेत्र रेखाएँ गलत दर्शाई गई है

15. नीचे दिए गए चित्रों में कई में चुम्बकीय क्षेत्र रेखाएँ गलत दर्शाई गई है। पहचानिए कि उनमें गलती क्या है ? इनमें कछ में वैद्युत-क्षेत्र रेखाएँ ठीक-ठीक दर्शाई गई है। बताइए वे कौन-से चित्र हैं ?

Ans ⇒ (a) गलत – चुम्बकीय क्षेत्र रेखाएँ एक बिन्दु से चित्र के अनुसार बाहर की ओर नहीं निकलता है। लम्बे धनावेशित तार के कारण विद्युत क्षेत्र रेखाओं को निरूपित करता है।
(b) गलत – चुम्बकीय बल रेखाएँ एक-दूसरे को नहीं काटती है। पुन: चुम्बकीय बल रेखाएँ बन्द लूप नहीं हो सकता है। धारावाही सीधा चालक के चारों ओर चुम्बकीय बल रेखाओं का बंद लूप होता है। विद्युत बल रेखाएँ बंद लूप नहीं बनाता है।
(c) गलत – चुम्बक के ध्रुवों के बीच में चुम्बकीय क्षेत्र रेखाएँ चित्रानुसार ध्रुव पर सरल रेखा नहीं हो सकता है। यह स्थिति विद्युत बल रेखाओं के लिए भी सत्य है।


16. क्यूरी-नियम क्या है ?

Ans ⇒ अनुचुंबकीय पदार्थ की चुंबकीय प्रवृत्ति (K) पदार्थ के परम ताप (T) के व्युत्क्रमानुपाती होता है यानी K ∝ 1/T
इसे क्यूरी का नियम (Curie’s law) कहते हैं। लौह-चुंबकीय पदार्थ के लिए एक निश्चित ताप के ऊपर जिसे क्यूरी बिंदु (Curie point) कहा जाता है। K का मान अचानक कम हो जाता है और पदार्थ लौह-चुंबकीय से अनुचुंबकीय पदार्थ में बदल जाता है।


17. अनुचुंबकीय तथा प्रतिचुंबकीय पदार्थों के उन दो अभिलाक्षणिक गुणधर्मों का उल्लेख कीजिए, जो इन दो प्रकार के पदार्थ के व्यवहार में भेद दर्शाते हैं।

Ans ⇒

S.Nअनुचुंबकीय पदार्थप्रतिचुंबकीय पदार्थ
(i) धनात्मक लेकिन बहुत छोटा होता है।ऋणात्मक लेकिन बहुत छोटा होता है।
(ii) धनात्मक लेकिन बहुत छोटा होता है।ऋणात्मक लेकिन बहुत छोटा होता है।

6. वैद्युत चुम्बकीय प्रेरण ( Short Answer Type Question )

6. वैद्युत चुम्बकीय प्रेरण


Q.1. विद्युत-चुम्बकीय प्रेरण से आप क्या समझते हैं ?

Ans ⇒ विद्यत-चम्बकीय प्रेरण – फैराडे द्वारा 1831 ई. में जाना गया कि जब किसी बंद कुंडली के सापेक्ष किसी चुम्बक में गति उत्पन्न की जाती है तो बंद कुण्डली में लगे गैलवेनोमापी में विक्षेप होता है, जो उस समय तक रहता है जबतक कि चुम्बक एवं कुण्डली के बीच सापेक्षिक गति वर्तमान होती है। इसके फलस्वरूप कुण्डली में विद्युत वाहक बल तथा विद्युत धारा प्रेरित होती है। अतः किसी बंद कुण्डली और चुम्बक के बीच सापेक्षिक गति के कारण कुण्डली में वि. वा. बल के प्रेरित होने की घटना को विद्युत्-चुम्बकीय प्रेरण कहा जाता है। कुण्डली में उत्पन्न वि. वा. बल को प्रेरित वि. वा. बल तथा उत्पन्न धारा को प्रेरित धारा कहा जाता है


Q.2. फैराडे के विद्युत-चुम्बकीय प्रेरण के नियमों को लिखें।

Ans ⇒  फैराडे के विद्युत – चुम्बकीय प्रेरण के नियम – फैराडे के विद्युत चम्बकीय प्रेरण के निम्नलिखित तीन नियम हैं

प्रथम नियम – किसी कुण्डली या परिपथ से संबद्ध चुम्बकीय फ्लक्स में जब भी परिवर्तन होता है तो कुण्डली या परिपथ में प्रेरित वि. वा. बल उत्पन्न होता है जो कुण्डली या परिपथ में उतने ही समय तक रहता है जितने समय तक चुम्बकीय पलक्स में परिवर्तन होता रहता है।

द्वितीय नियम – किसी कुण्डली या परिपथ में उत्पन्न प्रेरित वि. वा. बल कुण्डली या परिपथ से संबद्ध चुम्बकीय फ्लक्स के परिवर्तन की दर से समानुपाती होती है।

तृतीय नियम – किसी कुण्डली या परिपथ से संबद्ध चुम्बकीय फ्लक्स के बढ़ जाने से सीधी धारा प्रेरित होती है।


Q.3. लेंज के नियम से आप क्या समझते हैं ?

Ans ⇒  लेंज का नियम – विद्यत चम्बकीय प्रेरण में सभी अवस्थाओं में किसी परिपथ में प्रेरित धारा की दिशा इस प्रकार की होती है कि वह उस कारण का विरोध करती है जिसके कारण वह स्वयं उत्पन्न होती है। इस प्रकार विद्युत् चुम्बकीय प्रेरण की घटना में प्रेरित विद्युत वाहक बल तथा प्रेरित धारा की दिशा लेन्ज के नियम से ज्ञात की जाती है।


Q.4. किस प्रकार लेन्ज के नियम ऊर्जा-संरक्षण सिद्धान्त का पोषण करता है ?

Ans ⇒  विद्युत्-चुम्बकीय प्रेरण में ऊर्जा संरक्षण सिद्धान्त का पोषण – विद्युत्-चुम्बकीय प्रेरण की घटना में लेन्ज के नियम से प्रेरित धारा की दिशा जानी जाती है तथा यह जाना जाता है कि प्रेरित विद्युत-ऊर्जा का स्रोत क्या है ? लेन्ज के नियमानुसार प्रेरित धारा के कारण कुण्डली के किनारे पर जो चुम्बकीय ध्रुव बनता है वह चम्बक के ध्रव पर चम्बक की गति की विपरीत दिशा में बल उत्पन्न करता है। अन्ततः प्रेरित धारा के उत्पादन के लिए जब चुम्बक को गतिमान किया जाता है तब बल के विरुद्ध कार्य होता है। इस प्रकार यांत्रिक ऊर्जा खर्च करने पर विद्युत ऊर्जा प्राप्त की जाती है। अतः ऊर्जा स्वयं उत्पन्न नहीं होकर केवल इसका एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तन होता है। इस प्रकार लेंज के नियम से ऊर्जा संरक्षण के सिद्धान्त का पोषण होता है।


Q.5. प्रेरित विद्युत वाहक बल की गणना करें।

Ans ⇒  प्रेरित विद्युत वाहक बल – माना कि एक अल्प समयान्तराल dt में परिपथ से गुजरने वाले चुम्बकीय फ्लक्स में dθ परिवर्तन होता है तो फैराडे के विद्युत-चुम्बकीय प्रेरण के द्वितीय नियम से परिपथ में प्रेरित वि. वा. बल,
             e = ∝ (चुम्बकीय फ्लक्स-परिवर्तन की समय-दर)
या,     e = K  जहाँ K एक नियतांक है।
विद्युत चुम्बकीय मात्रक में K का मान एकांक है। अतः 
चुम्बकीय फ्लक्स के मान को घटाने पर dφ का मान ऋणात्मक होता है तथा परिपथ में सरल वि. वा. बल प्रेरित होता है, जिसका चिह्न धनात्मक लिया जाता है। अतः जब परिपथ में चुम्बकीय फ्लक्स के घटने पर प्रेरित विद्युत वाहक बल
              = -e =                                                  या, e = –   है।
चुम्बकीय फ्लक्स के मान घटने पर dφ धनात्मक होता है तथा परिपथ में प्रतिलोमी वि. वा. बल प्रेरित होता है, जिसका चिह्न ऋणात्मक लिया जाता है।
अतः जब परिपथ से चुम्बकीय फ्लक्स के बढ़ने पर प्रेरित विद्युत् वाहक बल
               = -e = +                                                  या, e = –  होता है ।

इस प्रकार हम पाते हैं कि परिपथ का चुम्बकीय फ्लक्स घटे या बढ़े, प्रेरित वि. वा. बल का मान चुम्बकीय फ्लक्स के परिवर्तन के समय दर के समानपाती होता है और चिह्न (दिशा) में फ्लक्स परिवर्तन के चिह्न के विपरीत होता है।
माना कि कुण्डली में कुल लपेटों की संख्या n है तो कुण्डली में कुल प्रेरित वि. वा. बल,
e = -n    विधुत चुम्बुकिये मात्रक = -n 


Q.6. स्वप्रेरकत्व या स्वप्रेरित गुणांक क्या है ? समझाएँ ।

Ans ⇒  स्वप्रेरकत्व या स्वप्रेरित गुणांक – माना कि किसी क्षण एक कुण्डली में 1 धारा प्रवाहित है तो चुम्बकीय फ्लक्स φ प्रवाहित धारा के सीधा समानुपाती होती है अर्थात् φ ∝ I
             या, φ = LI,
             जहाँ L को कुण्डली का स्वप्रेरकत्व या स्वप्रेरण गुणांक कहा जाता है। यह कुण्डली के लपेटों की संख्या, अनुप्रस्थ काट के क्षेत्रफल तथा क्रोड के पदार्थ की चुम्बकशीलता पर निर्भर करती है, जिस पर कि कुण्डली लिपटी होती है।
             जब I = I, φ = L x I                                    या, L = φ
             इस प्रकार कुण्डली का स्वप्रेरकत्व कुण्डली से सम्बद्ध चुम्बकीय फ्लक्स के बराबर होती है जबकि उससे इकाई धारा प्रवाहित होती हो। चुम्बकीय फ्लक्स में परिवर्तन के कारण प्रेरित वि. वा. बल जो कि कुण्डली में उत्पन्न होती है,
कुण्डली से सम्बद्ध चुम्बकीय फ्लक्स

जहाँ  कुण्डली में धारा परिवर्तन की दर है। ऋणात्मक चिह्न प्रेरित वि. वा. बल के विपरीत प्रकृति को प्रदर्शित करता है। केवल परिमाण में, e = L  होता है।
जब  e = -n  = –(LI) या,           e = -L ,

अतः कुण्डली की स्वप्रेरकत्व, कुण्डली में उत्पन्न प्रेरित विद्युत् वाहक बल के बराबर होता है जबकि कुण्डली में धारा के परिवर्तन की दर इकाई है। स्वप्रेकत्व का S.I मात्रक हेनरी है तथा विमा सूत्र [ML3I-2T-2] है।


Q.7. स्वप्रेरण से आप क्या समझते हैं ?

स्वप्रेरण

Ans ⇒  स्वप्रेरण – किसी कुण्डली या परिपथ में प्रवाहित धारा की प्रबलता के बदलने से उसके भीतर का चुम्बकीय क्षेत्र भी बदलता है जिससे कुण्डली में एक अतिरिक्त विद्युत वाहक बल प्रेरित होता है, जिसे स्वप्रेरण कहा जाता है । दूसरे शब्दों में, अपने ही धारा के कारण कुण्डली में वि. वा. बल का उत्पन्न होना स्वप्रेरण कहलाता है।माना कि एक कुण्डली एक बैटरी तथा एक टेपिंग कुन्जी K से जुड़ी है। कन्जी K को दबाने पर धारा कण्डली द्वारा प्रवाहित होना शुरू होती है तथा उसमें चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है । लपेटों में, जो कुण्डली में प्रेरित विद्युत वाहक बल उत्पन्न करते हैं, की दिशा परिपथ में धारा की वृद्धि के विपरीत होती है। दूसरी तरफ जब कुन्जी को छोड़ने पर परिपथ में धारा का अपक्षय होना शुरू हो जाता है तथा घटते हुए चुम्बकीय क्षेत्र कुण्डली में उत्पन्न हो जाता है तथा उत्पन्न वि. वा. बल परिपथ में धारा के अपक्षय का विरोध करती है। इस प्रकार धारा की वृद्धि तथा अपक्षय, दोनों समय कुण्डली में हैं। स्वप्रेरण को विद्युत चुम्बकीय जड़त्व भी कहा जाता है।


Q.8. अन्योन्य प्रेरण गुणांक या अन्योन्य प्रेरकत्व क्या है ? समझाएँ।

Ans ⇒  अन्योन्य प्रेरण गणांक या अन्योन्य प्रेरकत्व – माना कि प्राथमिक P तथा द्वितीयक S दो कुण्डलियाँ हैं। किसी क्षण प्राथमिक कुण्डली से I धारा प्रवाहित होता है तो द्वितीयक कुण्डली S से सम्बद्ध चुम्बकीय फ्लक्स उस समय प्राथमिक कुण्डली से प्रवाहित धारा के सीधा समानुपाती होता है।
         अर्थात् φ ∝ I
         या, φ = MI, जहाँ M को अन्योन्य प्रेरण गुणांक या अन्योन्य प्रेरकत्व कहते हैं।
         जब I = 1 तो φ = M x I या, M = e
         इस प्रकार, पड़ोसी कुण्डली में इकाई धारा के प्रवाहित होने से दो कुण्डलियों के अन्योन्य प्रेरकत्व पहली कुण्डली से सम्बद्ध चुम्बकीय फ्लक्स के बराबर होता है। चुम्बकीय फ्लक्स के परिवर्तन के कारण कुण्डली में उत्पन्न प्रेरित वि. वा. बल, 
या  प्राथमिक कुण्डली में धारा के परिवर्तन की दर तथा e = द्वितीयक कुण्डली में अन्योन्य प्रेरण के कारण उत्पन्न प्रेरित वि. वा. बल है। ऋणात्मक चिह्न प्रेरित विद्युत वाहक बल के विरोधी प्रकृति को प्रदर्शित करता है।
दूसरे कुण्डली में धारा के परिवर्तन की दर के इकाई होने

अतः दूसरे कुण्डली में धारा के परिवर्तन की दर के इकाई होने पर दो कुण्डलियों के अन्योन्य प्रेरकत्व पहले कुण्डली में उत्पन्न प्रेरित विद्युत् वाहक बल के बराबर होता है। S. I में अन्योन्य प्रेरकत्व का भी मात्रक हेनरी ही है तथा विमा सूत्र [ML2I-2T-2] है।


Q.9. किसी कुंडली में संचित ऊर्जा के लिए, जिसका स्वप्रेरण गुणांक L है, व्यंजक प्राप्त करें।

Ans ⇒  किसी वि. वा. बल वाले स्रोत को कुंडली से जोड़ा जाता है जिसका स्वप्रेरण L है। यदि कुंडली में प्रेरित वि. वा. बल का मान e हो, तो
किसी कुंडली में संचित ऊर्जा के लिए, जिसका स्वप्रेरण गुणांक L है, व्यंजक प्राप्त करें।


लेंज के नियम

Q.10. चित्र (a) से (c) में वर्णित स्थितियों के लिए प्रेरित धारा की दिशा की प्रागुक्ति (predict) कीजिए।
Ans ⇒  (a) लेंज के नियम के अनुसार कुंडली का सिरा q चुम्बक के S- ध्रुव प्रेरित होता है। इसलिए कुंडली में धारा की दिशा चुम्बक की ओर से देखने पर घड़ी की दिशा में होते हैं। अतः धारा q से b की ओर घड़ी की दिशा में।

(b) लेंज के नियम के अनुसार, दोनों कुंडली का सिरा जो चुम्बक के समीप है, पर S-ध्रुव प्रेरित में होता है। अतः बायीं कुंडली में धारा की दिशा q से p और दायीं कुंडली में धारा x और y की की ओर घड़ी की दिशा में बहती है।

(c) धारा प्रेरित नहीं होता है क्योंकि लूप के तल में चुम्बकीय बल रेखाएँ होती है।

7. प्रत्यावर्ती धारा ( Short Answer Type Question )

PHYSICS HINDI MEDIUMBy High Target

7. प्रत्यावर्ती धारा


Q. 1. प्रत्यावर्ती धारा क्या है ? इसके तात्कालिक मान को लिखें।

प्रत्यावर्ती धारा क्या है

Ans ⇒ प्रत्यावर्ती धारा वह धारा है जिसका मान और दिशा समय के साथ आवर्त रूप में बदलते रहते हैं। यह धारा दिष्टधारा से भिन्न होती है क्योंकि दिष्टधारा की दिशा नहीं बदलती है जबकि प्रत्यावर्ती धारा की दिशा आवर्त रूप से बदलती रहती है।
        इसके तात्कालिक मान का समीकरण
                I0 = I0 sin ωt से निरूपित किया जाता है।
        जहाँ I0 = शिखर मान, I = तात्कालिक मान है। Download Question PDF


Q.2. प्रत्यावर्ती धारा के एक पूर्ण चक्कर के लिए Iav = O। इसे साबित करें।

Ans ⇒ प्रत्यावर्ती धारा के पूर्ण चक्कर के लिए औसत मान
प्रत्यावर्ती धारा के एक पूर्ण चक्कर के लिए


Q.3. प्रत्यावर्ती धारा के माध्यमान या औसत मान से क्या समझते हैं ? प्रत्यावर्ती धारा के औसतमान तथा शिखरमान के बीच संबंध स्थापित कीजिए।

Ans ⇒ औसत मान – वह स्थायी धारा जो किसी परिपथ से गुजरने के बाद आधे चक्र में ठीक उतना ही आवेश को प्रवाहित करता है जितना आवेश प्रत्यावर्ती धारा उतने ही समय में तथा उसी परिपथ से होकर प्रवाहित करता है। इसे Ia या Im से सूचित किया जाता है।
प्रत्यावर्ती धारा के माध्यमान और शिखरमान से संबंध :
मान लिया कि प्रत्यावर्ती धारा का क्षणिक मान I = I0 sinωt                   …(i)
परिपथ में प्रवाहित किया जाता है।
मान लिया कि dt समय में dq आवेश प्रवाहित होता है, तो,
प्रत्यावर्ती धारा का औसतमान शिखरमान

अतः प्रत्यावर्ती धारा का औसतमान शिखरमान का 0.636 गुना होता है।


Q.4. प्रत्यावर्ती धारा के वर्ग-माध्य मूल मान या आभासी मान तथा शिखर मान के बीच संबंध स्थापित करें।

Ans ⇒ मान लिया कि प्रत्यावत्ती धारा का क्षणिक मान I = I0 sinωt             …(i)
परिपथ में प्रवाहित किया जाता है।
मान लिया कि dt समय में R प्रतिरोध से होकर dH ऊष्मा उत्पन्न होता है। अतः
मान लिया कि प्रत्यावत्ती धारा का क्षणिक मान
परिपथ में प्रवाहित किया जाता है

अतः प्रत्यावत्ती धारा का आभासी मान शिखर मान का 0.707 गुना होता है।


Q.5. चोक कुण्डली क्या है ? क्यों इसे प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में धारा को सीमित करने के लिए प्राथमिकता दी जाती है ? इसकी क्या उपयोगिताएँ हैं ?

Ans ⇒ चोक कण्डली – उच्च प्रेरकत्व तथा नगण्य प्रतिरोध के कुण्डली को चोक कुण्डली कहा जाता है, जिसका व्यवहार बिना किसी विद्युत ऊर्जा के नष्ट किये ही किसी धारा की शक्ति को कम करने के लिए किया जाता है क्योंकि इससे शक्ति का उपयोग शून्य के बराबर होता है ।
शून्य शक्ति के उपयोग का कारण है कि चोक कुण्डली के लिए धारा तथा वोल्टता के बीच कला कोण π/2(90°) होता है।
             चोक कुण्डली के शक्ति गुणांक,  है। कम आवृत्ति के प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में चोक कुण्डली का व्यवहार किया जाता है, जिसका क्रोड नरम लोहे का बना होता है। कुण्डली प्रेरकत्व, L का मान अधिक है तथा आवृत्ति के बहुत कम होने के कारण प्रतिघात (Lω) का मान बहुत अधिक है। अधिक आवृत्ति के प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में चोक कुण्डली का व्यवहार केवल वायु क्रोड में होता है, क्योंकि आवृत्ति के अधिक होने से प्रेरकत्व L का मान कम है तथा प्रतिघात (Lω) अधिक है। यह मरकरी ट्यूब, लैम्प तथा रेडियो परिपथ में व्यवहार किया जाता है।


Q.6. वाटहीन धारा से आप क्या समझते हैं ?

चोक कुण्डली के शक्ति गुणांक

Ans ⇒ वाटहीन धारा – हम जानते हैं कि प्रत्यावर्ती धारा परिपथ के औसत शक्ति Pav = EvIv cosφ जहाँ φ विद्युत वाहक बल तथा धारा के वर्ग–माध्य-मूल मान के बीच कला कोण है।
माना कि EvIv से φ कला कोण द्वारा चित्रानुसार आगे है। यह माना जा सकता है कि Ivcosφ तथा Ivcosφ दो अवयवों के सदिश योग Iv है। इस प्रत्येक अवयव के कारण व्यय शक्ति की निम्न प्रकार गणना की जा सकती है।

(i) Ev तथा Ivcosφ के बीच के कला कोण का शून्य के बराबर होने पर Ivcosφ अवयव के कारण परिपथ में व्यय औसत शक्ति,
P’av = Ev(Ivcosφ) cos0° = EvIvcosφ

(ii) Ev तथा Iv cosφ के बीच कला कोण का π/2 के बराबर होने पर, Ivcosφ अवयव के कारण परिपथ में व्यय औसत शक्ति, P’av = Ev (Ivcosφ) cosπ/2 = 0 (शून्य)।
इस प्रकार प्रत्यावर्ती परिपथ के Ivcosφ अवयव के कारण ही प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में औसत शक्ति व्यय होती है और प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में Ivcosφ अवयव का कोई भागीदारी शक्ति के व्यय में नहीं होती है। Ivcosφ अवयव के शक्ति के व्यय में भागीदारी नहीं होने के कारण उसे प्रत्यावत्ती धारा का वाटहीन अवयव या प्रत्यावर्ती धारा का वाटहीन धारा कहते हैं,


Q.7. ट्रांसफॉर्मर का क्रोड परतदार क्यों होता है ?

Ans ⇒ ट्रांसफॉर्मर का क्रोड परतदार होता है, क्योंकि क्रोड में लौह क्षय होता है। भँवर धाराओं के प्रेरित होने से ट्रांसफॉर्मर के क्रोड में विद्युत शक्ति की हानि होती है, जिसे लौह क्षय कहा जाता है। क्रोड को परतदार होने स लौह क्षय का मान कूम जाता है, इसलिए क्रोड परतदार होता है।


Q.8. प्रेरणिक प्रतिघाते क्या होता है ?

Ans ⇒ किसी प्रेरक द्वारा परिपथ में प्रत्यावर्ती धारा प्रवाह में प्रभावी पतिरोध को प्रेरणिक या प्रेरक प्रतिघात (Inductive reactance) कहते है।


Q.9. ट्रांसफार्मर क्या है ? परिणमन अनुपात से क्या तात्पर्य है ?

Ans ⇒ ट्रांसफार्मर – ट्रांसफार्मर का कार्य, उच्च धारा पर निम्न प्रत्यावती वोल्टता को निम्न धारा पर उच्च वोल्टता में तथा निम्न धारा पर उच्च प्रत्यावर्ती वोल्टता को अधिक धारा पर निम्न वोल्टता में परिवर्तित करना है। Input voltage और Output voltage के अनुपात को परिणमन अनुपात कहते हैं।


Q.10. किन कारणों से ट्रांसफार्मर की दक्षता घटती है ?

Ans ⇒ ट्रांसफार्मर में निम्नलिखित पाँच कारणों से ऊर्जा का क्षय होता है तथा उन्हें निम्नलिखित प्रकार से दूर किया जाता है –
(i) फलक्स क्षय : प्राथमिक तथा द्वितीयक कुण्डलियों का युग्मन ठीक नहीं होता है और प्राथमिक कुण्डली में उत्पन्न चुम्बकीय फ्लक्स सभी द्वितीयक कुण्डली से संबद्ध नहीं होते हैं तथा कुछ क्रोड से न जाकर वायु होकर जाती है।

(ii) ताम्र क्षय : प्राथमिक तथा द्वितीयक कुण्डलियों में ताँबे के तार के लपेटों प्रतिरोध के कारण जूल-ऊष्मन प्रभाव से कुछ विद्युतीय ऊर्जा का ताप ऊर्जा में परिवर्तन होता है जिससे कि शक्ति क्षय होती है।

(iii) लौह – क्षय : ट्रांसफार्मर के लोहे के क्रोड में भँवर धाराओं के प्रेरण से भी ऊष्मा के रूप में शक्ति क्षय होती है, जिसे लौह-क्षय कहते हैं। लोहे के क्रोड को पूरतदार बना देने पर लौह-क्षय घटता है।

(iv) शैथिल्य क्षय : कुण्डलियों से प्रत्यावर्ती धाराओं के प्रवाहित होने से लोहे के क्रोड बार-बार चुम्बकित तथा अचुम्बकित होते हैं। इसलिए प्रत्येक चुम्बकन चक्र में कुछ ऊर्जा शैथिल्य के कारण क्षय होती है, जिसे शैथिल्य क्षय कहते हैं। इसे कम करने के लिए सिलिकन लोहे का क्रोड उपयुक्त होता है।


Q.11. भंवर धाराएं क्या हैं ?

Ans ⇒ यदि किसी भी धातु के टुकड़े को चुम्बकीय क्षेत्र में घुमाते हैं या किसी असमान चुम्बकीय क्षेत्र में उसे चलाते हैं या किसी अन्य प्रकार से उसमें गुजरने वाली बल रेखाओं की संख्या में परिवर्तन करते हैं तो उस धात चालक के सम्पूर्ण आयतन में प्रेरित धाराएँ उत्पन्न हो जाती हैं। ये धाराएँ धात के टुकड़े की गति (अथवा चुम्बकीय फ्लक्स परिवर्तन) का विरोध करती है। ये धाराएँ एक बन्द घेरे के रूप में होती हैं जिनका तल चुम्बकीय बल रेखाओं की दिशा के लम्बवत होता है। इन्हें भँवर धाराएँ कहते हैं।


Q.12. स्टाटेर क्या हैं ? इसका उपयोग समझावें।

Ans ⇒ यह एक उच्च प्रतिरोध है जिसे दिष्ट धारा मोटर की कुण्डली के साथ श्रेणीक्रम में लगाया जाता है, जिससे मोटर स्टार्ट करते समय प्रारम्भ में जब मोटर में विरोधी विद्युत वाहक बल शून्य होता है, जब मोटर की कण्डली से होकर अति उच्च धारा नहीं प्रवाहित हो सके, अन्यथा कुण्डली के जलने का भय रहता है। यह प्रतिरोध मोटर के स्टार्ट होते समय कुण्डली के साथ श्रेणीक्रम में जुड़ा रहता है तथा जब मोटर अपनी अधिकतम चाल से चलने लगती है (अर्थात् जब कुण्डली के घूमने का कोणीय वेग अधिकतम हो जाता है) तब स्वतः ही इसका सम्बन्ध कुण्डली से हट जाता है। इसके लिए ऐसा प्रबन्ध किया जाता है क जब मोटर की कुण्डली अधिकतम चाल से घुमने लगती है तो प्रतिरोध के साथ जुड़ी नर्म लोहे की पत्ती एक विद्युत चुम्बक से आकर्षित हो जाती है तथा कुण्डली के साथ प्रतिरोध का संबंध टूट जाता है।


Q.13. डायनेमों तथा विद्युत मोटर में क्या अन्तर है ?

Ans ⇒ डायनेमो (जनित्र) तथा विद्युत मोटर में निम्नलिखित अन्तर हैं –

S.Lडायनेमोविद्युत मोटर
1.डायनेमो यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदलता है।मोटर विद्युत ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा से बदलती है।
2.डायनेमो विद्युत चुम्बकीय प्रेरण के सिद्धान्त पर कार्य करता है।मोटर धारा के चुम्बकीय प्रभाव पर कार्य करती है। यह चुम्बकीय क्षेत्र में धारावाही चालक पर लगने वाले बल के सिद्धान्त पर कार्य करती है।
3.इसमें चुम्बकीय क्षेत्र में कुण्डली को घुमाकर प्रेरित विद्युत वाहक बल उत्पन्न किया जाता है।इसमें चुम्बकीय क्षेत्र में स्थित कुण्डली में धारा प्रवाहित करते हैं जिससे कुण्डली घूमने लगती है।

Q. 14. प्रत्यावर्ती धारा तथा दिष्ट (सीधी) धारा में अन्तर स्पष्ट करें।

Ans ⇒ प्रत्यावर्ती धारा तथा दिष्ट (सीधी) धारा में निम्नलिखित अन्तर है –

S.Lप्रत्यावर्ती धारादिष्ट (सीधी) धारा
1.धारा परिपथ में दोनों दिशाओं में प्रवाहित होती है।दिष्ट (सीधी) धारा परिपथ में सदा ही दिशा में प्रवाहित होती है।
2.इसके विद्युत वाहक बल को ट्रांसफॉर्मर द्वारा घटाया जा सकता है।इसके विद्युत वाहक बल को किसी अन्य प्रतिरोध की मदद से घटाया जा सकता है।
3.इससे विद्युत अपघटन की क्रिया नहीं हो सकती है।इससे विद्युत अपघटन की क्रिया होती है।
4.इससे कलई नहीं की जा सकती है।कलई करने में इस धारा का उपयोग होता है।
5.उच्च वोल्टता पर दूर स्थानों में इसे भेजा जा सकता है।इसे दूर स्थानों तक नहीं भेजा जा सकता है।
6.धारा के स्पर्श से झटका अधिक घातक होता है।धारा के स्पर्श से झटका का खतरा अधिक नहीं रहता है।

Q.15. परिपथ में प्रतिरोध, प्रतिबाधा और प्रतिघात में अंतर कीजिए।

Ans ⇒

S.Lप्रतिरोधप्रतिबाधाप्रतिघात
1.धारा प्रवाह में लगाये विरोध को प्रतिरोध से परिभाषित करते हैं।एक परिपथ द्वारा उसमें लगे प्रतिरोध, प्रेरक और धारित्र द्वारा उत्पन्न बाधा को प्रतिबाधा कहते हैं।धारा प्रवाह में धारित्र या प्रेरक द्वारा उत्पन्न विरोध को प्रतिघात कहते हैं।
2.यह धारा के स्रोत की आवृत्ति से स्वतंत्र हैयह धारा स्रोत की आवृत्ति पर निर्भर है।यह धारा स्रोत की आवृत्ति पर निर्भर है।
3.इसे ओम में मापते हैं।इसे ओम में मापते हैं।इसे ओम में मापते हैं।

Q.16. वि० वा० बल तथा विभवांतर में बीच क्या अंतर है ?

Ans ⇒ वि० वा० बल तथा विभवांतर में निम्नलिखित अंतर है –

S.Lवि० वा० बलविभवांतर
1.यह सेल का परिपथ खुला रहने पर विभव के अंतर को बतलाता है।यह सेल का परिपथ बंद रहने पर विभव के अंतर को बतलाता है।
2.यह प्रतिरोध पर निर्भर नहीं करता है।यह प्रतिरोध के समानुपाती होता है।
3.यह परिपथ के बंद नहीं रहने पर exist करता है।यह परिपथ के बन्द रखने पर exist करता है।
4.यह विभवांतर से बड़ा होता है।यह वि० वा० बल से छोटा होता है।
5.इसे वोल्ट में मापा जाता है।इसे भी वोल्ट

8. वैद्युत चुम्बकीय तरंगें ( Short Answer Type Question )

8. वैद्युत चुम्बकीय तरंगें


Q. 1. विद्युत-चुम्बकीय तरंग क्या है ? चित्र सहित इसकी प्रकृति समझाएँ।

विद्युत-चम्बकीय तरंग

Ans ⇒ विद्युत-चम्बकीय तरंग – दोलन गति करते आवेशित कण से उत्पन्न तरंगों को विद्युत चुम्बकीय तरंग कहते हैं। चित्रानुसार इसमें समान आवृत्ति तथा कला के एक-दूसरे के लम्बवत् तथा तरंग की गति की दिशा के लम्बवत् विद्युत क्षेत्र गॉस के नियम सेचुम्बकीय क्षेत्र exerts a force का दोलन होता है। ये अनुप्रस्थ तरंगें होती हैं । इसके संचरण की दिशा सदिश गॉस के नियम से तथा exerts a force  युक्त तल पर अभिलम्बवत् होती है तथागॉस के नियम से x  exerts a force द्वारा प्राप्त की जाती है।
विद्युत चुम्बकीय तरंग का विचार सर्वप्रथम 1864 ई० में मैक्सवेल द्वारा दिया गया, जिसका सत्यापन हर्ट्ज द्वारा 1896 ई० में किया गया।


Q.2. विद्युत चुम्बकीय स्पेक्ट्रम में निहित विभिन्न तरंगों के नाम, उसकी आवृत्ति परास तथा आविष्कारक का नाम लिखें।

Ans ⇒ विद्युत चुम्बकीय स्पेक्ट्रम में निहित विभिन्न तरंगों के नाम, उसकी आवृत्ति परास तथा आविष्कारक के नाम निम्नलिखित हैं :

S.Nतरंगों के नामआवृत्ति परास (हर्ट्ज)आविष्कारक का नाम
1.गामा किरणें3 x 1021 – 3 x 1018बैकरल तथा क्यूरी
2. एक्स-किरणें3 x 1018 – 3 x 1016रोएंट्जन
3.पराबैंगनी-विकिरण3 x 1016 – 7.5 x 1014रिटर
4.दृश्य प्रकाश7.5 x 1014 – 3.8 x 1014न्यूटन
5.अवरक्त विकिरण3 x 104 – 3 x 1011हरशैल
6.माइक्रो तरंगें3.8 x 104 – 3 x 108हर्ट्ज
7.रेडियो तरंगें3 x 1011 – 3 x 104मारकोनी

Q.3. पृथ्वी के वायुमण्डल की विभिन्न परतों के नाम लिखें तथा उनके प्रमुख भौतिक गुणों का वर्णन करें।

Ans ⇒ पृथ्वी के वायुमण्डल को निम्नलिखित पाँच परतों में विभाजित किया गया है –

(i) क्षोभ मण्डल – इस परत की ऊँचाई पृथ्वी तल से लगभग 12 किमी. है। इस परत में उपस्थित जलवाष्प तथा कार्बनडाइ ऑक्साइड सूर्य तथा पृथ्वी से आने वाले अवरक्त विकिरणों को अवशोषित कर लेती है।

(ii) समताप मण्डल – यह परत पृथ्वी तल से 12 किमी. की ऊँचाई तक फैली होती है। इस परत के वायुमण्डल का ताप लगभग एक समान रहता है।

(iii) ओजोन मण्डल – यह परत पृथ्वी तल से लगभग 30 किमी. की ऊँचाई से 50 किमी. की ऊँचाई तक फैली होती है। यह परत सूर्य से आने वाली पराबैंगनी विकिरणों को अवशोषित कर लेती है ।

(iv) मध्य मण्डल – यह परत पृथ्वी तल से लगभग 50 किमी. से 80 किमी. की ऊँचाई तक होती है। इस परत का ताप ऊँचाई बढ़ने पर घटता जाता है।

(v) आयन मण्डल – यह परत पृथ्वी तल से लगभग 80 किमी. से 300 किमी. की ऊँचाई तक फैली होती है। सूर्य से आने वाली रेडियो तथा माइक्रो तरंगें इससे परावर्तित होकर पुनः अन्तरिक्ष में चली जाती हैं तथा पृथ्वी से प्रेषित रेडियो तरंगें आयन मण्डल से पूर्णतः आन्तरिक परावर्तित होकर वापस पृथ्वी पर आ जाती हैं।


Q.4. विद्युत चुम्बकीय तरंगों तथा ध्वनि तरंगों में अंतर स्पष्ट करें।

Ans ⇒ विद्युत चुम्बकीय तरंगों तथा ध्वनि तरंगों में निम्नलिखित अन्तर है –

S.Lविद्युत चुम्बकीय तरंगेंध्वनि तरंगें
1.विद्युत चुम्बकीय तरंगें अनुप्रस्थ होती हैं।ध्वनि तरंगें वायु में अनुदैर्ध्य होती है।
2.इसके संचरण के लिए भौतिक माध्यम आवश्यक नहीं है अर्थात् ये निर्वात में भी संचरित होती है।इसके संचरण के लिए भौतिक माध्यम आवश्यक है अर्थात ये तरंगें निर्वात में संचरित नहीं होती है।
3.इसमें वैद्युत तथा चुम्बकीय क्षेत्र परस्पर लम्बवत् तथा तरंग की गति की दिशा के लम्बवत् कम्पन करते हैं।इसमें माध्यम से कण तरंग गति की दिशा में कम्पन करते हैं।
4.ये ध्रुवण का गुण भी दर्शाती है।ये ध्रुवण का गुण नहीं दर्शाती है।

Q.5. विद्युत चुम्बकीय तरंगों के प्रमुख गुणों का उल्लेख करें।

Ans ⇒ विद्युत चुम्बकीय तरंगों के प्रमुख गुण निम्नलिखित हैं –
(a) विद्युत चुम्बकीय तरंगों के अनावेशित होती है इसीलिए विद्युत या चुम्बकीय क्षेत्र की उपस्थिति द्वारा प्रभावित नहीं होती है।
(b) ये तरंगें प्रकृति में अनुप्रस्थ होती है तथा त्वरित विद्युत आवेश से उत्पन्न होती है।
(c) ये तरंगें निर्वात में भी सीधी रेखाओं में संचरित होती है तथा इसका वेग समान माध्यम में प्रकाश के वेग के बराबर होता है।
(d) इन तरंगों की आवृत्ति v तथा तरंगदैर्ध्य λ, वेग C से निम्नलिखित सम्बन्ध रखते हैं –
                                            C = vλ
(e) ये तरंगें एक-दूसरे के लम्बवत् परिवर्ती विद्युत तथा चुम्बकीय दोलनों द्वारा संचरित होती है।
(f) ये तरंगें परावर्तन, अपवर्तन, व्यतिकरण, विवर्तन तथा ध्रुवण के गुण प्रदर्शित करती है।
(g) इन तरंगों में छोटे पैक्टों जिसे फोटॉन या क्वांटा कहते हैं; के रूप में ऊर्जा देते हैं।
इए फोटॉन की ऊर्जा E = hv = hc/λ होती है, जहाँ h प्लांक नियतांक = 6.625 x 10-34 जूल-सेकेण्ड है।
कुल ऊर्जा W = Nhv होती है, जहाँ N फोटॉन की संख्या है।


Q.6. विद्युत चुंबकीय तरंग में चुंबकीय क्षेत्र सदिश  एवं विद्युत क्षेत्र सदिश  में कौन ज्यादा प्रभावी होता है एवं क्यों ?

Ans ⇒ विद्युत चुम्बकीय तरंगें में चुम्बकीय क्षेत्र एवं विद्युत क्षेत्र दोनों एक समान प्रभावी होते हैं। ये क्षेत्र आवेश के दोलनों की आवृत्ति के समान ही दोलन करते हैं।


Q.7.x-किरणों के किन्हीं दो गणों को लिखें।

Ans ⇒ (i) X-किरणें विद्युत चुंबकीय तरंग है।
(ii) X-किरणे का स्थिर द्रव्यमान शून्य लेकिन गतिशील द्रव्यमान hv/c2 है।


Q.8. किसी विद्युत-चुम्बकीय क्षेत्र तरंग से जुड़े वैद्युत ऊर्जा घनत्व एवं चुम्बकीय ऊर्जा घनत्व का व्यंजन लिखें तथा दर्शाइए कि उनका अनुपात 1 होता है।

Ans ⇒ वैद्युत ऊर्जा घनत्व  जहाँ ε0 = 4π x 10-7 wb A-1 m-1, μ = 8.85 x 10-12 C2 N-1m-2


Q.9. विद्युत-चुम्बकीय स्पेक्ट्रम में निहित विभिन्न तरंगों के संसूचन की विधि तथा उसका उपयोग क्या है ?

Ans ⇒ विद्युत-चुम्बकीय स्पेक्ट्रम में निहित विभिन्न तरंगों के संसूचन की विधि तथा उसके उपयोग निम्नलिखित हैं –

S.Lतरंगों के नामसंसूचन विधिउपयोग
1.गामा किरणेंउच्च वेधन क्षमता होती है।कैंसर चिकित्सा में
2.एक्स-किरणेंलकड़ी या धातु के आवरण में रखी फोटोग्राफी प्लेट को प्रभावित कर देती है।सर्जरी चिकित्सा में
3.पराबैंगनी-विकिरणप्रकाश विद्युत प्रभाव उत्पन्न करती है तथा सर्वाधिक रासायनिक प्रभाव होता है।अनेक रोगों के कीटाणुनाशक में
4.दृश्य प्रकाशइससे अन्य वस्तुएँ देखी जाती है।अन्य वस्तुएँ देखने में
5.अवरक्त विकिरणऊष्मीय प्रभाव सर्वाधिक होता है।रोगियों की सिकाई करने में
6.माइक्रो तरंगेंक्रिस्टल संसूचक या अर्द्ध चालक डायोड पर।रडार तथा दूरसंचार में
7.रेडियो तरंगेंप्रेरकत्व-धारित्व (L-C) परिपथ द्वारासंचार प्रसारण तथा टेलीविजन में

Q.10. UV-किरणों के कुछ गुणों को लिखिए।

Ans ⇒ UV-किरणों के गुण निम्नलिखित हैं –

(i) ये परिवर्तन और अपवर्तन के नियमों का पालन करती हैं।
(ii) ये व्यतिकरण के अंतर्गत जा सकती हैं और ध्रुवित की जा सकती है।
(iii) ये कुछ पदार्थों में प्रतिदीप्ति उत्पन्न करती हैं।
(iv) ये फोटोग्राफी प्लेट को प्रभावित कर सकती हैं।
(v) जब त्वचा सूर्य के प्रकाश में विवरण के लिए छोड़ी जाती है तो ये विटामिन-D का संश्लेषण करती है।
(vi) जब धातुओं पर UV किरणें पड़ने दी जाती हैं तो उनसे प्रकाशित इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित करती हैं।
(vii) ये काँच में से नहीं गुजर सकतीं।
(viii) UV प्रकाश के लिए सेंधा नमक, फलोराइट और क्वार्ट्ज पारदर्शी हैं।


Q.11. अवरक्त किरणों के कुछ गुण लिखिए।

Ans ⇒ अवरक्त किरणों के गुण निम्नलिखित हैं –
(i) ये em तरंगें हैं और निर्वात् में प्रकाश की चाल से चलती हैं।
(ii) ये परावर्तन एवं अपवर्तन के नियमों को पालन करती हैं।
(iii) ये फोटोग्राफी प्लेट को प्रभावित करती हैं।
(iv) इनको ध्रुवित किया जा सकता है।
(v) ये व्यतिकरण उत्पन्न करती हैं।
(vi) वायुमंडल में कोहरे और धुएँ की स्थितियों में दृश्य विकिरण की अपेक्षा ये कम प्रकीर्ण होती हैं।
(vii) जब ये अणुओं से अवशोषित होती हैं तो ऊर्जा के दोलन में बदल जाती है।


Q.12. किरणों के कुछ उपयोग बताएँ।

Ans ⇒ किरणों के उपयोग निम्नलिखित हैं –
(i) ये मांसपेशियों के तनाव के उपचार करने के काम में लाई जाती हैं।
(ii) उपग्रहों को सौर सेलों की सहायता से वैद्युत ऊर्जा प्रदान करने के काम आती हैं।
(iii) वे निर्जालित फलों को उत्पन्न करने में काम आती है।
(iv) इनका उपयोग सौर पानी उष्मक और सौर कूकर में किया जाता है।
(v) कोहरे और धुएँ की स्थितियों में इन्हें चित्र (फोटोग्राफी) लेने के काम में लाया जाता है।
(vi) IR फोटोग्राफी को मौसम की भविष्यवाणी करने में काम में लाया जाता है।
(vii) सूर्य से अवरक्त प्रकाश (IR) पृथ्वी को गर्म रखने और उस पर जीवन को कायम रखने के (पोषित करने) काम में लाया जाता है।

9. किरण प्रकाशिकी एवं प्रकाशिक यंत्र ( Short Answer Type Question )

Q.1. लेन्स की शक्ति से आप क्या समझते हैं ?

Ans ⇒ लेन्स की शक्ति-किसी लेन्स की शक्ति उसकी उस योग्यता की माप है जो प्रकाश की समानान्तर किरणों का अभिसरण या अपसरण करती है। अधिक फोकस दूरी के लेन्स किरणों के अभिसरण या अपसरण पर कम प्रभाव डालते हैं जबकि कम फोकस दूरी के लेन्स अधिक प्रभावकारी होते हैं।
किसी लेन्स की शक्ति उसकी फोकस दूरी के व्युत्क्रम से मापी जाती है।
माना कि लेन्स की शक्ति P तथा उसकी फोकस दूरी f है, तो P = 1/F फोकस दूरी के मीटर में व्यक्त होने पर लेन्स की क्षमता का मात्रक डायोप्टर है। अतः P (डायोप्टर) = 1/f मीटर।
चिह्न परिपाटी के अनुसार उत्तल लेन्स की क्षमता धनात्मक तथा अवतल लेन्स की क्षमता ऋणात्मक होती है जो कि क्रमशः फोकस दूरी भी होती है।


Q.2. समतुल्य लेन्स क्या है ?

Ans ⇒ समतुल्य लेन्स – जब दो या दो से अधिक समाक्षीय लेन्सों के युग्म के बदले एक ऐसा लेन्स लिया जाता है जिसे लेन्स-युग्म के अक्ष पर उपयुक्त स्थान पर रखने से किसी वस्तु का प्रतिबिम्ब उसी स्थान पर उतने ही आवर्धन का बने जैसा कि लेन्स-युग्म द्वारा बनता है, तो उस लेन्स को लेन्स-युग्म का समतुल्य लेन्स कहा जाता है।


Q.3. लेन्स के एक आवर्तक पृष्ठ पर चान्दीकृत का क्या प्रभाव पड़ता है ? वर्णन करें।

लेन्स के एक आवर्तक पृष्ठ पर चान्दीकृत का क्या प्रभाव

Ans ⇒ लेन्स के एक आवर्तक पृष्ठ पर चान्दीकृत का क्या प्रभाव – किसी लेन्स के एक पृष्ठ पर चान्दीकृत करने से चित्रानुसार पृष्ठ 1 से प्रकाश किरण का अपवर्तन, पृष्ठ 2 से प्रकाश किरण का परावर्तन तथा पुनः पृष्ठ 1 से प्रकाश किरण का अपवर्तन होता है। इस तरह के समतुल्य लेन्स की फोकस दूरी F का मान निम्नलिखित सम्बन्ध से प्राप्त होता है।
(अपवर्तन से) तथा दर्पण (परावर्तन से) के संयोग की फोकस दूरी है। उपर्युक्त चित्रानुसार दो आवर्तन (पृष्ठ 1 से) और एक परावर्तन (पृष्ठ 2 से) प्रदर्शित है।
अतः हम पात है कि 

जहाँ f1 लेन्स की फोकस दूरी तथा fm गोलीय दर्पण की फोकस दूरी है।
विशेष स्थिति : (a) समतलोत्तर लेन्स की फोकस दूरी जबकि इसके समतल पृष्ठ चान्दीकृत हैं –
समतलोत्तल लेन्स के समतल पृष्ठ चान्दीकृत होने की स्थिति में fm = चित्रानुसार अनन्त हैं।

समतलोत्तर लेन्स की फोकस दूरी जबकि इसके समतल पृष्ठ चान्दीकृत हैं

Q.4. सौर ऊर्जा जमा करने के लिए कौन और क्यों अधिक उपयुक्त है-एक खूब पालिशदार अवतल दर्पण या अभिसारी लेन्स ?

Ans ⇒ सौर-ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए अभिसारी लेन्स की अपेक्षा पालिशदार अवतल दर्पण अधिक अच्छा होता है।
सौर ऊर्जा में ऊष्मा ऊर्जा के साथ प्रकाश ऊर्जा भी होती है। जब ये किसी द्रव्यात्मक माध्यम से होकर गुजरती है तो उसका कुछ भाग माध्यम द्वारा अवशोषित हो जाता है। इसलिए सौर ऊर्जा को जमा करने के लिए अभिसारी लेंस का उपयोग करने पर माध्य (लेन्स) द्वारा दर्पण के व्यवहार से ऊर्जा का बहुत कम भाग (नगण्य) ही दर्पण के पदार्थ द्वारा अवशोषित होता है, क्योंकि दर्पण की सतह के काफी चमकीला होने से ऊर्जा का अधिकांश भाग इसके द्वारा परावर्तित हो जाता है।


Q.5. काँच की एक उत्तल लेन्स पूरी तरह पानी में डुबा देने पर हवा की अपेक्षा इसकी फोकस दूरी क्यों बढ़ेगी या घटेगी ?

Ans ⇒ जब काँच की एक उत्तल लेन्स पूरी तरह पानी में डुबा दिया जाता है तो उसकी फोकस दूरी बढ़ जाती है।
पतले लेन्स के लिए हम जानते हैं कि 
माना कि लेन्स के हवा में रहने की स्थिति में उसकी फोकस दूरी fa हवा तथा काँच के अपवर्तनांक क्रमशः μa तथा μg हैं तो उपर्युक्त समीकरण के अनुसार हम पाते हैं कि
 जहाँ R1 तथा R2 लेन्स की दोनों सतहों की वक्रता त्रिज्याएँ हैं।
फिर माना कि लेन्स को पानी में डुबाने पर उसकी फोकस दूरी fw है तो
 जहाँ μw पानी का अपवर्तनांक है।
उपर्युक्त समीकरण के दायीं तरफ की राशियों की तुलना करने पर
उपर्युक्त समीकरण के दायीं तरफ की राशियों की तुलना करने पर


Q.6 क्रान्तिक कोण से आप क्या समझते हैं ? इसका अपवर्तनांक से सम्बन्ध स्थापित करें।

क्रान्तिक कोण

Ans ⇒ क्रान्तिक कोण – जब प्रकाश किरण सघन माध्यम से विरल माध्यम में जाती है तो वह अभिलम्ब से दूर हट जाती है। सघन में यह आपतन कोण जिसके लिए किरण का विरल माध्यम में अपवर्तन कोण 90° है, क्रान्तिक कोण कहलाता है। इसे ic द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। अतः यदि i = ic (सघन माध्यम में) तो r = 90° (विरल माध्यम में)।
इसलिए सघन माध्यम के सापेक्ष विरल माध्यम का अपवर्तनांक


Q.7. क्या कारण है कि सघन माध्यम में स्थित वस्तु को विरल माध्यम से देखने पर वह कम गहरी प्रतीत होती है ? अपवर्तनांक का वस्तु की वास्तविक तथा आभासी गहराई से सम्बन्ध स्थापित करें।

सघन माध्यम में स्थित वस्तु को विरल माध्यम से देखने पर वह कम गहरी प्रतीत होती है

Ans ⇒ चित्रानुसार सघन माध्यम (पानी) के अन्दर बिन्दु A पर कोई वस्तु है जिसे विरल माध्यम (वायु) से देखा जा रहा है। बिन्दु A से चलने वाली आपतित किरण AB पानी-वायु सीमा पृष्ठ पर पानी से वायु में अपवर्तित होती है। अतः बिन्दु B पर खींचे गये अभिलम्ब NBN’ से दूर हटकर वायु में BC मार्ग पर अपवर्तित होती है। माना कि किरण AB के लिए पानी में आपतन कोण ABN’ = i तथा वायु में अपवर्तन कोण NBC = r जहाँ ∠r > ∠i से। दूसरी आपतित किरण AM, पानी-वायु सीमा पृष्ठ पर लम्बवत् आपतित है अर्थात् ∠i = 0 (शून्य)। अतः यह किरण अविचलित मार्ग MM’ पर निकल जाती है अर्थात् ∠r = 0 (शून्य) ।

पानी के सापेक्ष वायु का आवर्तनांक
अब यदि बिन्दु

                 स्पष्ट है कि ∠MAB = ∠ABN’ = i तथा ∠MA’B = ∠NBC = r ।
                अब समकोण त्रिभुज AMB से sini = MB/AB
                तथा समकोण त्रिभुज A’MB से sin r = MB/A’B
                ∴     पानी के सापेक्ष वायु का आवर्तनांक
अब यदि बिन्दु B, बिन्दु M के अत्यन्त समीप हो (अर्थात् वस्तु को लम्बवत स्थिति से देखा जाए) तो हम पाते हैं कि AB ≈ MA तथा A’B = MA’


Q.8. पूर्ण आन्तरिक परावर्तन से क्या अभिप्राय है ? इसके लिए क्या-क्या प्रतिबन्ध आवश्यक है ?

Ans ⇒ पूर्ण आन्तरिक परावर्तन – यदि प्रकाश किरण सघन माध्यम से क्रान्तिक कोण से अधिक आपतन कोण पर आकर विरल माध्यम के सीमा-पृष्ठ पर टकराती है तो वह परावर्तन के नियमों का पालन करती हुई सघन माध्यम में ही पूर्ण परावर्तित हो जाती है। इस क्रिया को पूर्ण आन्तरिक परावर्तन कहते हैं।

पतिबन्ध – इसके निम्नलिखित प्रतिबन्ध हैं –
1. प्रकाश किरण को सघन माध्यम से विरल माध्यम में जाना चाहिए।
2. आपतन कोण का मान क्रान्तिक कोण से अधिक होना चाहिए।


Q.9. मरीचिका किसे कहते हैं ? इसका कारण समझाएँ।

मरीचिका किसे कहते हैं

Ans ⇒ गर्मियों की दोपहर में रेगिस्तान में किसी स्थान पर पानी न होने पर भी कभी-कभी यात्री को पानी होने का आभास होता है। इसे मरीचिका कहते हैं।
गर्मियों में जमीन के निकट की वायु तो गरम होकर विरल हो जाती है, जबकि ऊपरी परतों की वायु अपेक्षाकृत ठण्डी रहती है। अतः जमीन से ऊपर जाने पर वायु क्रमशः सघन होती जाती है। जब किसी वृक्ष की चोटी से आन वाली प्रकाश किरण सघन माध्यम से विरल माध्यम में प्रवेश करती है तो यह अभिलम्ब से दूर हटती है। इस प्रकार किसी परत तक आते-आते आपतित प्रकाश का आपतन कोण, क्रान्तिक कोण से अधिक हो जाता है, जिससे इसका पूर्ण आन्तरिक परिवर्तन हो जाता है और प्रकाश किरण परावर्तित होकर यात्री की आँख में प्रवेश करती है, जिससे यात्री को वृक्ष का उल्टा प्रतिबिम्ब दिखाई देता है और वहाँ जलाशय होने का आभास होता है।


Q.10. स्पष्ट दृष्टि की न्यूनतम दूरी से आप क्या समझाते हैं ? उम्र के साथ स्पष्ट दृष्टि की न्यूनतम दूरी बढ़ जाती है, क्यों ?

Ans ⇒ स्पष्ट दृष्टि की न्यूनतम दरी – अधिक से अधिक आवर्धित दिखने के लिए वस्तु को नेत्र के निकट-से-निकट लाया जाए ताकि नेत्र पर उसका दर्शन कोण बड़ा बने। किन्तु, स्पष्ट दृष्टि के लिए बिम्ब को आँख के समीप रखने की एक खास सीमा होती है। इस सीमा के अंदर वस्त स्पष्ट नहीं दिखता है। इस विशेष दूरी को आँख के लिए स्पष्ट दृष्टि की न्यूनतम दरी कहा जाता है। इसे D अक्षर से सूचित किया जाता है और सामान्य क्षेत्र के लिए इसका मान 25 से. मी. है।
उम्र के साथ आँख के लेंस की लोच कम हो जाती है और सिलियरी मांसपेशियों समंजन क्षमता भी घटती जाती है। आँख के लेंस की फोकस दरी बढ़ने के कारण स्पष्ट दृष्टि की न्यूनतम दूरी बढ़ जाती है।


Q.11. आँख की समंजन क्षमता से आप क्या समझते हैं ?

Ans ⇒ आँख की समंजन क्षमता – आँख के लेस की फोकस दूरी की स्वयं समायोजनकारी क्रिया को आँख की समंजन-क्षमता कहते हैं। सिलियरी मांसपेशियों की संकुचन-क्रिया से लिम्बक स्नायुओं द्वारा आँख के लेंस पर दाब पड़ता है। इस दाब से लेंस की वक्रता घटती है और त्रिज्या बढ़ती है। जब सिलियरी मांसपेशियाँ पूरी तरह तनाव-मुक्त रहती हैं तब आँख के लेंस की मोटाई सबसे कम रहती है। तब नेत्र-लेंस का फोकस रेटिना पर पड़ता है। दूरी से आती समांतर किरणें फोकस पर अभिसरित होती हैं। अतः आँख दूरस्थ वस्तु को देख पाती है।
समीप की वस्तु देखते समय सिलियरी मांसपेशियाँ सिकुड़कर आँख के लेंस के बाहरी तलों को अधिक वक्र बना देती है जिससे लेंस की फोकस टी कम हो जाती है और तब बहुत का प्रतिबिंब पुनः रेटिना पर बनता है। नेत्र-लेंस की इस स्वयं-समायोजनकारी क्रिया को आँख की समंजन क्षमता कहते हैं। आँख की समंजन-क्षमता की एक सीमा होती है। सामान्य नेत्र के लिए निकट-बिन्दु 25 सेमी. तथा दूर बिन्दु अनंत पर होते हैं।


Q.12. एकल आँख की तुलना में जोड़े आँख के लाभ की व्याख्या करें।

Ans ⇒ जब हम किसी वस्तु को देखते हैं तो हमारी आँखें वस्तु को तो कोणों से देखती हैं । एक आँख बिंब के दाएँ भाग को अधिक देखती हैं और दूसरी आँख उसी वस्तु के बाएँ भाग को अधिक देखती हैं। इसका परिणाम यह होता है कि हमें वस्तु के त्रिविम रूप का आभास प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त देखने की क्रिया में हमारी दोनों आँखों के दृष्टि-अक्ष वस्त पर अभिसरित होते हैं जिससे हमें वस्तु को देखने में काफी राहत मिलती है। अत: दो आँखों के होने के कारण ही हम आसानी से वस्तुओं को ठोस रूप में देख पाते हैं।


Q.13. कोणीय वर्ण-विक्षेपण तथा विक्षेपण क्षमता क्या है ?

Ans ⇒ कोणीय वर्ण-विक्षेपण – प्रिज्म द्वारा विक्षेपित सफेद प्रकाश की किरणें के लाल तथा बैंगनी अवयवों के बीच के कोण को प्रिज्म का वर्ण-विक्षेपण कहा जाता है। वर्ण-विक्षेपित प्रकाश के किन्हीं दो वर्णों की किरणों के बीच का कोण उन किरणों का कोणीय वर्ण-विक्षेपण या केवल विक्षेपण कहा जाता है।

विशिष्ट वर्ण विक्षेपण – स्पेक्ट्रम के सीमांत बैंगनी तथा लाल रंग की किरणों के लिए माध्यम के अपवर्तनांक का अंतर । (μv -μr) विशिष्ट वर्ण-विक्षेपण
कहा जाता है।

वर्ण-विक्षेपण क्षमता

वर्ण-विक्षेपण क्षमता – प्रिज्म के लाल तथा बैंगनी किरणों के बीच का माध्यम निर्गत किरण के लिए न्यूनतम विचलन की स्थिति में होने पर किसी अपवर्तक माध्यम की वर्ण-विक्षेपण क्षमता उस माध्यम के पतले प्रिज्म द्वारा उत्पन्न औसत विचलन का अनुपात होता है। पीले किरण का न्यूनतम विचलन कोण प्रिज्म द्वारा उत्पन्न किरणों का माध्य विचलन होता है।
माना कि पतले प्रिज्म के माध्यम के अपवर्तनांक लाल, बैंगनी तथा पीली किरणों के लिए क्रमशः μrμv तथा μ है, तो इनके न्यूनतम विचलन कोण क्रमशः δr = (μr – 1)A, δv = (μv – 1)A तथा δ = (μ – 1)A, जहाँ A पतले प्रिज्म का अपवर्तक कोण है।
चित्रानुसार δr = ∠QPR तथा δr = ∠QPR
अतः वर्ण-विक्षेपक कोण,
α = ∠ROV = ∠QP’V – ∠OPP’= ∠QP’V – ∠QPR
                      δv – δr
a = δv – δr = (μv – 1)A (μr – 1)A = (μv – μr)A
∴     वर्ण-बिक्षेपन-क्षमता – 


Q.14. विभेदन-क्षमता से आप क्या समझते हैं ? सूक्ष्मदर्शी की विभेदन-क्षमता का सूत्र लिखें तथा सूक्ष्मदर्शी की विभेदन-क्षमता कैसे बढ़ायी जाती है ?

Ans ⇒ विभेदन-क्षमता – किसी प्रकाशिक यंत्र की दो समीपवर्ती वस्तुओं के प्रतिबिम्बों को अलग-अलग करने की क्षमता को विभेदन क्षमता कहते है। किसी प्रकाशीय यंत्र की विभेदन सीमा जितनी कम होती है, उसकी विभेदन क्षमता उतनी ही अधिक मानी जाती है।

सूक्ष्मदशी का विभेदन सीमा

सूक्ष्मदशी का विभेदन सीमा – किसी सक्ष्मदर्शी की विभेदन सीमा उन दो बिन्दुवत वस्तुओं के बीच की न्यूनतम दूरी है, जिसके प्रतिबिम्ब सूक्ष्मदर्शी के वस्तु लेंस द्वारा ठीक विभेदित होते हैं। सूक्ष्मदर्शी की विभेदन सीमा प्रकाश की तरंग लम्बाई λ के समानुपाती तथा सूक्ष्मदर्शी में प्रवेश करने वाली किरणों के शंकु के कोण के व्युत्क्रमानुपाती होती है। अतः सूक्ष्मदर्शी की विभेदन सीमा

सूक्ष्मदर्शी से देखी जानी वाली वस्तुएँ प्रायः अदीप्त होती हैं, जिन्हें किसी बाह्य प्रकाश-स्रोत से प्रदीप्त किया जाता है। अतः λ पर नियंत्रण किया जा सकता है।
सूक्ष्मदर्शी की विभेदन सीमा कम करने के लिए शंकुकोण को बढ़ाया जाता है जिसके लिए वस्तु लेन्स की द्वारक (अभिमुख) को बढ़ाना होता है। अतः विभेदन सीमा कम करने के लिए कम-से-कम तरंग-लम्बाई (λ) का प्रकाश, जैसे नीला या बैगनी प्रकाश व्यवहार किया जाता है । इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी में शंकुकोण का मान भी कम होता है। अतः इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी, साधारण सूक्ष्मदर्शी की तुलना में 5000 गुना विभेदन कर सकता है। इसमें प्रकाश की तरंग-लम्बाई λ का मान, 5000 गुना कम है।


Q.15. रंगीन काँच के चूर्ण को महीन पाउडर बना देने पर वह सफेद दिखता है, क्यों?

Ans ⇒ जब श्वेत प्रकाश की किरणें रंगीन काँच की महीन पाउडर पर आपतित होती हैं तो सभी आपतित किरणें असंख्य छोटे कणों के पीछे परावर्तित हो जाता है तथा प्रकाश का अवशोषण काँच के पाउडर द्वारा नहीं हो पाता है। इसीलिए महीन पाउडर सफेद् दिखता है।


Q.16. सूर्योदय एवं सूर्यास्त के समय आसमान का रंग लाल दिखता है, क्यों ?

Ans ⇒ दोपहर को सूर्य हमलोगों से निकटस्थ रहता है, किन्तु सर्योदय एवं सूर्यास्त के समय क्षैतिज के ऊपर होता है तथा सूर्य की किरणें तिरछी होती हैं, जिससे उसे वायुमंडल का अधिक भाग तय करना पड़ता है। परिणामतः प्रकाश अधिकाधिक प्रकीर्णक कणों को पार कर हम सब के पास आता है। इसमें नीले अवयव काफी मात्रा में प्रकीर्ण हो जाते हैं और लाल अवयव का प्रकीर्णन बहुत कम होता है। सूर्योदय एवं सूर्यास्त के समय लाल-अवयव के अधिक मात्रा में प्राप्त होने के कारण ही सूर्य के साथ-साथ आकाश का यह भाग लाल दिखता है।


Q.17. आकाश आसमानी रंग का दिखता है, क्यों ?

Ans ⇒ हम जानते हैं कि प्रकाश का प्रकीर्णन सभी दिशाओं में होता है और प्रकीर्ण प्रकाश का परिणाम तरंग-लम्बाई के चौथे घात का व्युत्क्रमानुपाती होता है। सूर्य के प्रकाश के आसमानी अवयव की तरंग लम्बाई लाल अवयव का लगभग 5/9 गुणा होता है, अतः आसमानी अवयव लाल अवयव की तुलना में लगभग 10 गुना अधिक प्रकीर्ण होता है, और इस प्रकीर्ण प्रकाश में आकाश आसमानी रंग का दिखता है। इसी प्रकार, गहरा स्वच्छ जल प्रकाश के प्रकीर्णन के कारण ही हरा तथा नीला दिखता है।


Q.118. काँच का टुकड़ा आसमानी दिखता है, क्यों ?

Ans ⇒ सफेद काँच सात वर्णों के संयोग से बना होता है। जब प्रकाश की किरणें काँच से गुजरती हैं तो आसमानी को छोड़कर सभी वर्गों को अवशोषित कर लेती हैं। अतः निर्गत किरणें वर्गों में आसमानी होती हैं तथा काँच का टुकड़ा आसमानी दिखता है।


Q.19. जब एक समतल काँच का सिल्ली विभिन्न रंगों के अक्षरों पर रखे जाते हैं तो लाल रंग के अक्षर अत्यधिक लाल दिखता है, क्यों ?

Ans ⇒ कुशी के सूत्रानुसार, तरंग-लम्बाई के घटने से उसके अपवर्तनांक बढ़ते हैं। लाल वर्ण का अपवर्तनांक अधिकतम तथा बैंगनी वर्ण का अपवर्तनांक न्यूनतम है।


Q.20. हरे प्रकाश में लाल कपड़ा काला क्यों दिखता है ?

Ans ⇒ हरे प्रकाश में लाल कपड़ा काला दिखता है, क्योंकि लाल रंग हरे प्रकाश को अवशोषित करता है किन्तु परावर्तित नहीं करता है।
लाल वर्ण के लिए आभासी शीष्ट  अधिकतम तथा बैंगनी वर्ण के लिए न्यूनतम है। इसलिए लाल रंगों का अक्षर अत्यधिक लाल दिखता है।


Q.21. पूर्ण सूर्यग्रहण के समय और विकिरण में किस तरह का स्पेक्ट्रम प्राप्त होता है ?

Ans ⇒ सूर्यग्रहण के समय, वस्तुतः सूर्य के केन्द्रीय भाग अर्थात् फोटोस्फेयर से प्रकाश पृथ्वी पर नहीं पहुँचता है। हमलोग केवल क्रोमोस्फेयर से प्रकाश पाते हैं, जिसमें उत्सर्जित वाष्पीय अवस्था में बहुत-से तत्त्व होते हैं। इसलिए स्पेक्ट्रम में अंधकारमय क्षेत्र में प्रकाशित उत्सर्जित रेखाएँ होती हैं, जो प्रकाशित रेखाएँ और स्पेक्ट्रम में बहुधा फ्रॉनहॉफर रेखाएँ दिखती हैं।


Q.22. क्रांतिक कोण के लिए  साबित करें।

प्रकाशित तन्तु क्या है

Ans ⇒ हम जानते हैं कि जब प्रकाश की किरण सघन माध्यम से विरल माध्यम में जाती है तो अभिलम्ब से दूर जाती है और अपवर्तन कोण हमेशा आपतन कोण से बड़ा होता है। क्रांतिक कोण की परिभाषा से, जब i = C तथा r = 90° और किरण OB पानी से हवा में जाती है। स्नेल के नियम से


Q.23. प्रकाशित तन्तु क्या है ? इसकी कार्यविधि सिद्धान्त सहित समझाएँ।

प्रकाशित तन्तु क्या है

Ans ⇒ प्रकाशिक तन्तु क्वार्टज (μ = 1.7) के लगभग 10-4 सेमी मोटे तथा लम्बे हजारों रेशों से मिलकर बने तन्तु को प्रकाशिक तन्तु कहते हैं। इसके चारों ओर अपेक्षाकृत कम अपवर्तनांक (μ = 1.5) के पदार्थ की तह लगा दी जाती है।
प्रकाशित तन्तु का कार्य सिद्धान्त पूर्ण आन्तरिक परावर्तन पर आधारित है। चित्रानुसार जब प्रकाश किरण इस तन्तु के एक सिरे पर अल्प कोण बनाती हुई आपतित होती है तो यह इसके अन्दर अपवर्तित हो जाती है। तन्तु के अन्दर यह किरण तन्तु तह के सीमापृष्ठ पर बार-बार पूर्ण आन्तरिक परावर्तित होती हुई तन्तु के दूसरे सिरे पर पहुँच जाता है क्योंकि इस सीमापृष्ठ पर किरण का आपतन कोण, क्रान्ति कोण से बड़ा होता है। तन्तु के दूसरे किनारे पर किरण वायु में आवर्तित होकर अभिलम्ब से दूर हटती हुई निर्गत होती है।


Q.24. ब्रूस्टर का नियम क्या है ? आपतन कोण के बराबर ध्रुव कोण होने पर प्रमाणित करें कि परावर्तित तथा अपवर्तित किरणें एक-दूसरे के अभिलम्बवत होती हैं।
अथवा, ब्रूस्टर के नियम को लिखें तथा प्रमाणित करें।

Ans ⇒ ब्रूस्टर के नियम – ब्रूस्टर का नियम कहता है कि जब प्रकाश ध्रुवण कोण पर आपतित होती है, तो परावर्तित तथा अपवर्तित किरणें एक-दूसरे से अभिलम्बवत् होती हैं।

ब्रूस्टर के नियम

प्रमाण – माना कि साधारण या अध्रुवित प्रकाश AB के प्रति हवा से अपवर्तनांक (μ) के माध्यम को अलग करने वाली सतह पर आपतित होती है। जब प्रकाश ध्रुवण कोण P पर आपतित होती है, तो परावर्तित प्रकाश के प्रति BC पथ में पूर्णतः समतल ध्रुवित प्रकाश में कागज के तल के अभिलम्बवत् कंपन होता है। अध्रुवित प्रकाश अपवर्तित प्रकाश के BD पथ के प्रति चलता है। परावर्तित प्रकाश आपतन के समतल में पूर्णतः ध्रुवित हो जाता है। ध्रुवण की कोटि आपतन कोण के बढ़ने से बढ़ती है। परावर्तित किरणें BC तथा अपवर्तित किरणें BD एक-दूसरे के अभिलम्बवत् है, अर्थात् ∠CBD = 90°
इस प्रकार, पारदर्शी माध्यम के अपवर्तनांक ध्रुवण कोण के स्पर्शज्या के बराबर होता है।


Q.25. उत्तल लेंस के प्रधान अक्ष पर रखे बिन्दु का लेन्स से बने प्रतिबिम्ब को दिखाने के लिए किरण आरेख खींचे, यदि वस्तु फोकस दूरी से तीन गुनी दूरी पर हो।

यदि वस्तु फोकस दूरी से तीन गुनी दूरी पर हो

Ans ⇒


Q.26. दृश्य किरणों की अपेक्षा पराबैंगनी किरणों की ऊर्जा अधिक होती है। क्यों ?

दृश्य किरणों की अपेक्षा पराबैंगनी किरणों की ऊर्जा अधिक होती है

Ans ⇒ विद्युत चुम्बकीय तरंगों का विस्तार सूक्ष्म तरंगदैर्ध्य को गामा किरणों से लेकर रेडियोतरंगों के बीच होती है। Max Planck के अनुसार प्रकाश का संचरण कणिका के रूप में होता है जिसकी ऊर्जा विकिरण की आवृत्ति के समानुपाती होती है।
चूँकि दृश्य प्रकाश के सभी घटकों की अपेक्षा पराबैंगनी किरणों का तरंगदैर्ध्य अत्यधिक छोटा होता है, अतः पराबैंगनी किरणों की ऊर्जा E = 
का मान दृश्य प्रकाश की अपेक्षा अधिक होगी।


Q.27. लेजर किरणों की दो प्रमुख विशेषताएँ लिखें।

Ans ⇒ लेजर किरणों के विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –
(i) लेजर किरण पुंज पूर्णतः कला संबंद्ध होता है इसकी तरंगें एक-दूसरे के साथ एक ही कला में होती है।
(ii) लेजर किरण पुंज का प्रकाश लगभग पूर्णतः एकवर्णी होता है।


Q.28. इन्द्रधनुष क्या है ?

Ans ⇒ वर्षा के समाप्त होने पर या झीसीं पड़ते समय जो संकेन्द्री वृत्तों के रंगीन चाप आकाश में दिखाई पड़ते हैं, उसे इन्द्रधनुष कहते हैं। सूर्य की तरफ पीठ करके खड़ा होने पर प्रायः दो इन्द्रधनुष दिखते हैं। जिसमें एक को प्राथमिक तथा दूसरे को द्वितीयक इन्द्रधनुष कहा जाता है। अन्दर के इन्द्रधनुष प्राथमिक तथा बाहर के इन्द्रधनुष द्वितीयक होता है। प्राथमिक इन्द्रधनुष को स्पेक्ट्रम का बैंगनी रंग अन्दर के किनारे पर एवं लाल रंग बाहर के किनारे पर तथा द्वितीयक इन्द्रधनुष में स्पेक्ट्रम का लाल रंग अन्दर के किनारे पर एवं बैंगनी रंग बाहर के किनारे पर होता है। दोनों इन्द्रधनुष में सौर–स्पेक्ट्रम के सभी रंग होते हैं।
पृथ्वी पर वर्षा की गिरती हुई बूंदों के ऊपरी भाग पर सूर्य के प्रकाश की किरणों के आपतित होने से बूंदों के भीतर क्रमशः अपवर्तन, वर्ण-विक्षेपण तथा आन्तरिक परावर्तन की क्रियाएँ होने से प्राथमिक इन्द्रधनुष की उत्पत्ति होती है एवं बूंदों के निचले भाग पर आपतित होने से बूंदों के भी वैसी क्रियाएँ होने से द्वितीयक इन्द्रधनुषों की उत्पत्ति होती है।


Q.29. पराबैंगनी किरणों तथा अवरक्त किरणों में क्या अंतर है ?

Ans ⇒ पराबैंगनी किरणों तथा अवरक्त किरणों में निम्नलिखित अंतर हैं –

S.Lपराबैंगनी किरणअवरक्त किरण
1.पराबैंगनी स्पेक्ट्रम की खोज रिटर ने 1801 ई० में की थी।इसकी खोज विलियम हरशैल ने 1800 ई० में की थी।
2.इसकी तरंगदैर्ध्य λ < 3900 Åइसकी तरंगदैर्ध्य λ < 7800 Å
3.यह फोटोग्राफिक प्लेटों पर रासायनिक क्रिया करती है।निम्न ताप के प्रकाश स्रोत से प्राप्त प्रकाश में इनकी मात्रा अधिक होती है। स्रोत के ताप को कम करने से अवरक्त किरणों की मात्रा बढ़ जाती है।
4.ये साधारण काँच द्वारा अधिकांशतः अवशोषित हो जाती हैं लेकिन क्वार्ट्ज में से पारगमित हो जाती हैं।काँच द्वारा इनका भी काफी भाग अवशोषित हो जाता है।
5.यह प्रतिदीप्ति एवं स्फुरदीप्ति उत्पन्न करती है।इनमें ऊर्जा की मात्राा काफी कम होती है। मनुष्य के शरीर पर इनका कुप्रभाव नहीं होता है।

Q. 30. तारे क्यों टिमटिमाते हैं ?

तारे क्यों टिमटिमाते हैं

Ans ⇒ तारे (S) से आने वाली तिरछी प्रकाश की किरणें वायुमंडल से गुजरती हुई जब प्रेक्षक तक पहुँचती है, तो वह नीचे की ओर मुड़ जाती है। अब वह S’ से आती हुई प्रतीत होती है, इसलिए S’, S का आभासी स्थिति है एवं S अपने वास्तविक ऊँचाई से अधिक ऊँचा प्रतीत होता है। साथ-ही-साथ प्रकाश की किरणें वायुमंडलीय परिवर्तन के कारण अपने रास्ते को परावर्तित करती रहती है जिस कारण तारे टिमटिमाते होते हैं।


Q.31. आवर्धन एवं आवर्धन क्षमता में अंतर स्पष्ट करें।

Ans ⇒ आवर्धन एवं आवर्धन क्षमता में अंतर निम्नलिखित हैं –

S.Lआवर्धनआवर्धन क्षमता
1.एक रेखीय आवर्धन जो h2/h1 के बराबर होता है।यह कोणीय आवर्धन है जो ∠β/∠α के बराबर होता है।
2.इसका मान V के बढ़ने से बढ़ता है।इसका मान V के बढ़ने पर घटता है।
3.इसका मान -∞ और +∞ बीच हो सकता है।इसका माना D/f तथा 1+ D/f के बीच हो सकता है।
4.निश्चित शर्त के अधीन यह आवर्धन क्षमता के बराबर होता है।यह आवर्धन की एक विशेष शर्त है जब Ve = D हो।

Q.32. दृष्टि निर्बन्ध से आप क्या समझते हैं ?

Ans ⇒ किसी वस्तु का प्रतिबिंब जब आँख की रेटिना पर बनता है तब वस्तु दिखलाई पड़ती है। वस्तु को हटा देने पर लगभग 1/10 सेकेण्ड तब इसकी संवेदना (Sensation) मस्तिष्क में बनी रहती है। इसमें आँख की शलाखा (Rods) और शंकु (Cones) 1/10 सेकेण्ड तक उत्तेजित होते रहते हैं। इसे ‘दृष्टि निर्बन्ध’ कहते हैं।

10. तरंग प्रकाशिकी ( Short Answer Type Question )


Q.1. प्रकाश के प्रकीर्णन से क्या तात्पर्य है ? किस रंग के प्रकाश का प्रकीर्णन सर्वाधिक तथा किस रंग के प्रकाश का प्रकीर्णन न्यूनतम है ?

प्रकाश के प्रकीर्णन से क्या तात्पर्य है

Ans ⇒ जब प्रकाश ऐसे कणों पर पड़ता है जिसका आकार, प्रकाश के तरंगदैर्ध्य की तुलना में छोटा है तो प्रकाश विभिन्न दिशाओं में प्रकीर्णित हो जाता है। इसे प्रकाश का प्रकीर्णन कहते हैं। वैज्ञानिक रेले के अनुसार, प्रकीर्णित प्रकाश की तीव्रता प्रकाश की तरंगदैर्घ्य के चतुर्थघात के व्युत्क्रमानुपाती होती है। अर्थात्
चूँकि बैगनी प्रकाश का तरंगदैर्घ्य सबसे कम तथा लाल रंग के प्रकाश का तरंगदैर्घ्य सबसे अधिक है। अतः बैगनी प्रकाश का प्रकीर्णन सर्वाधिक तथा लाल प्रकाश का प्रकीर्णन न्यूनतम है।


Q.2. तरंगाग्र क्या है ? हाइजेन का द्वितीयक तरंगिका-सिद्धान्त से आप क्या समझते हैं ?

तरंगाग्र क्या है

Ans ⇒ तरंगाग्र – प्रकाश के किसी बिन्दु-स्रोत से समान दूरी पर चारों तरफ ईथर के कणों के कंपन की कलाएँ समांगी माध्यमों में समान होती हैं। वैसे समान-कंपन कला वाले कणों को स्पर्श करती हुई काल्पनिक सतह को तरंगाग्र कहा जाता है। समांगी माध्यमों में बिन्दु-स्रोतों के लिए तरंगाग्र गोलाकार होते हैं। बिन्दु सोतों से तरंग के संचरण को उस स्रोत से उत्पन्न गोलाकार तरंगाय के प्रसार के रूप में व्यक्त किया जाता है।

चित्रानुसार समय के बढ़ने के साथ स्रोत से निकला तरंगाग्र आगे की तरफ प्रसारित होता जाता है और इसके पहले वाले स्थानों पर दूसरे तरंगाग्र प्रसारित होकर आते-जाते हैं। बिन्दु–स्रोत से निकली किरणें गोलाकार तरंगाग्रों की त्रिज्याएँ हैं। अतः प्रकाश की किरणें इसके तरंगारों पर अभिलम्ब होती हैं। गोलीय तरंगाग्रे संकेन्द्री वृत्तों द्वारा प्रदर्शित हैं।
माना कि एक गोलीय सतह है σ जिसका केन्द्र बिन्दु स्रोत S है जो प्रकाश का पल्स उत्साहित करता है। t = 0 समय में 6 पर प्रकाशीय विक्षोभ का कण पहुँचता है तथा कम समयावधि के लिए अन्त करता है जिसमें धनात्मक तथा ऋणात्मक विक्षोभ उत्पन्न होता है। σ पर के ये कणें तब गोलीय तरंगिकाएँ भेजते हैं जो σ के चारों तरफ फैल जाते हैं। t समय में इन तरंगिकाओं में प्रत्येक की त्रिज्याएँ vt होती है। गोलीय ∑ सभी द्वितीयक तरंगिकाओं के ज्यामितीय आरेख हैं जो प्राथमिक तरंगाग्र से σ = 0 समय में उत्सर्जित हुए थे।
यह स्पष्ट है कि ∑ के बगल के बिन्दु पर बहुत-से द्वितीयक तरंगिकाएँ केवल धनात्मक विक्षोभ पर मिलती हैं। इसलिए σ से द्वितीयक तरंगिकाएँ, इस प्रकार अध्यारोपित होती हैं कि वे द्वितीयक तरंगिकाओं के ज्यामितीय आरेख पर नये तरंगाग्र उत्पन्न करते हैं। इस प्रकार सतह के बहुत-से बिन्दुओं जो कि तरंगाग्र द्वारा पहुँचते हैं, द्वितीयक तरंगिकाओं के स्रोत हो जाते हैं। किसी दिये गये बाद के समय में इन तरंगिकाओं के ज्यामितीय आरेख उस समय के तरंगाग्र के नया स्थान द्वारा प्रदर्शित होता है।


Q.3. प्रकाश के व्यतिकरण से आप क्या समझते हैं ?

Ans ⇒ प्रकाश के व्यतिकरण – समान तरंग-लम्बाई के दो या दो से अधिक प्रकाश-तरंगों के अध्यारोपण के कारण किसी स्थान पर उत्पन्न परिणामी प्रदीपन-तीव्रता के अधिकतम तथा न्यूनतम होने की परिवर्तन की घटना प्रकाश का व्यतिकरण कहलाता है।
जब परिवर्तित प्रदीपन-तीव्रता अधिकतम होती है तब व्यतिकरण संपोषी व्यतिकरण तथा जब परिवर्तित प्रदीपन-तीव्रता न्यूनतम होती है तब व्यतिकरण विनाशी व्यतिकरण कहलाती है। जिसमें अवयवी तरंगें विपरीत कलाओं में संयोजित होती हैं किन्तु संपोषी व्यतिकरण में अवयवी तरंगें एक ही कला में संयोजित होती हैं।


Q. 4. प्रकाश का विवर्तन क्या है ? समझाएँ।

प्रकाश का विवर्तन क्या है

Ans ⇒ प्रकाश का विवर्तन – प्रकाश के ऋतरेखीय संचरण के सिद्धान्त क अनुसार किसी छोटे प्रकाश स्रोत से निकले किरण-पंज के सामने यदि अपारदर्शी अवरोध रख दी जाती है तो अवरोध के दूसरी तरफ रखे पर्दे पर अवरोध की जो ज्यामितीय छाया बनती है उसके अंधकारमय क्षेत्र की तरफ भी कुछ प्रकाशित किरणें मुड़ जाती हैं। अवरोध के किनारे से प्रकाश की तरगा के मुड़ जाने की घटना प्रकाश का विवर्तन कहा जाता है। तरंग के विवर्तन का प्रभाव अवरोध के आकार तथा तरंग की तरंग-लम्बाई पर निर्भर करता है। अवरोध का आकार तरंग की तरंग-लम्बाई से कम होने पर विवर्तन का प्रभाव काफी स्पष्ट होता है। छाया की सीमा से प्रकाशित क्षेत्र की तरफ धीरे-धीरे पहले अधिक प्रकाशित तथा कम प्रकाशित पट्टियों में टूटी हुई दिखती है। इन पट्टियों को विवर्तन फ्रिन्ज कहते हैं।
चित्रानुसार S स्रोत से निकली प्रकाश किरणें AB अवरोध आपतित होती है। YX पर्दा है जिस पर A’ B’ ज्यामितीय छाया बनते हैं। A’ के ऊपर तथा B’ के नीचे समान रूप से प्रकाशित होती है। किन्तु AB के किनारे से मुड़ने से प्रकाश किरणें A’B’ के कुछ भागों में A’ से ऊपर तथा B’ से नीचे भी कुछ फ्रिन्जे प्राप्त होती हैं। यह घटना प्रकाश का विवर्तन कहलाता है।


Q.5. प्रकाश के ध्रुवण से आप क्या समझते हैं ?

प्रकाश का धुवण

Ans ⇒ प्रकाश का धुवण – प्रकाश तरंग की प्रकृति अनुप्रस्थ होती है तथा प्रकाश के कंपन संचरण की दिशा के अभिलम्बवत् होती है। साधारण प्रकाश अध्रुवित प्रकाश कहलाते हैं। किसी बिन्दु पर किरण के सापेक्ष असंख्य अनुप्रस्थ दिशाएँ होती हैं। किसी विशेष दिशा में प्रकाश के कंपन को ले जाने की घटना प्रकाश का ध्रुवण कहलाता है। प्रकाश के कम्पन को किसी एक दिशा में ले जाने के क्रम में विभिन्न प्रकाश के रवा व्यवहार किये जाते हैं। वैसे रवा जो प्रकाश के कंपन को एक दिशा में ले जाते हैं, प्रकाशीय संक्रिया कहलाते हैं। जब अध्रुवित या साधारण प्रकाश प्रकाशीय संक्रिया रखा पर आपतित होता है तो संचरण के बाद प्रकाश का कंपन रवा के अक्ष से समानान्तर हो जाता है तथा इस प्रकार दिशा स्थित हो जाता है। इस तरह संचरित प्रकाश ध्रुवित प्रकाश कहलाता है।


Q.6. प्रकाश में डॉप्लर प्रभाव क्या है ?

प्रकाश में डॉप्लर प्रभाव क्या है

Ans ⇒ प्रकाश स्रोत एवं प्रेक्षक के बीच आपेक्षिक गति के कारण आवृत्ति में होने वाले आभासी परिवर्तन को डॉप्लर प्रभाव कहा जाता है। यदि प्रेक्षक स्रोत की ओर चले तो प्रकाश तरंग की आवृत्ति में आभासी वृद्धि अर्थात् तरंगदैर्ध्य में आभासी कमी होती है और यह दृश्य प्रकाश के स्पेक्ट्रम के नीले वर्ण की ओर विस्थापित होगी। तरंगदैर्ध्य की इस कमी को Blue shift कहते हैं। इसके विपरीत यदि प्रेक्षक स्रोत से दूर चले तो प्रकाश की आवृत्ति में आभासी कमी के कारण तरंगदैर्ध्य में आभासी वृद्धि होती है और यह दृश्य प्रकाश के स्पेक्ट्रम के लाल वर्ण की ओर विस्थापित होगी। इसे Red shift कहते हैं। सिद्धान्तों के अनुसार प्रकाश के आभासी तरंगदैर्ध्य (λ) एवं यथार्थ तरंगदैर्ध्य (λ) के बीच निम्नलिखित सम्बन्ध है
जहाँ V = प्रकाश स्रोत की चाल तथा C = प्रकाश की चाल।


Q.7. किसी लेंस के विभेदन क्षमता से संबंधित किसी गोलीय द्वारक के विवर्तन के महत्त्व को समझाएँ।

Ans ⇒ गोलीय द्वारक पर विवर्तन के कारण किसी बिन्दु-वस्तु का प्रतिबिंब, बिन्द-प्रतिबिंब न होकर एक चकती की तरह केन्द्रीय अधिकता जिसके चारों तरफ दीप्त एवं अदीप्त छल्ले होते हैं।
लेंस का विभेदन क्षमता  जहाँ D = लेंस का द्वारक, λ = तरंगदैर्ध्य।
अतः किसी लेंस के विभेदन क्षमता गोलीय, सतह (जैसे नेत्र लेंस) पर विवर्तन का उच्च सीमा निर्धारित करता है।


Q.8. व्यतिकरण एवं विवर्तन में अंतर स्पष्ट करें।

Ans ⇒ व्यतिकरण एवं विवर्तन में निम्नलिखित अंतर है –

S.Lव्यतिकरणविवर्तन
1.व्यतिकरण की घटना दो कला संबंध स्रोतों से आने वाले दो पृथक-पृथक तरंगाग्रों के अध्यारोपण से होती है।विवर्तन की घटना एक ही तरंगाग्र के विभिन्न बिन्दुओं से आने वाली द्वितीयक तरंगिकाओं के अध्यारोपण के कारण होती है।
2.व्यतिकरण फ्रिजें प्रायः समान चौड़ाई की होती है।विवर्तन फ्रिजें समान चौड़ाई की नहीं होती है।
3.सभी दीप्त फ्रिजें पर तीव्रता समान होती है।क्रमिक दीप्त फ्रिजें पर तीव्रता घटती जाती है।
4.सभी अदीप्त फ्रेजों पर तीव्रता एक-सी होती है।सभी अदीप्त फ्रिजें पर तीव्रता शून्य होती है अथवा प्रायःबढ़ती है।

Q. 9. ध्रुवित-प्रकाश उत्पन्न करनेवाला एक युक्ति का नाम लिखें। एक ग्राफ बनाएँ जो यह साबित करें कि पारगमित प्रकाश की तीव्रता ध्रुवक तथा विश्लेषक के बीच के कोण पर निर्भर करता है।

प्रकाश उत्पन्न करनेवाला एक युक्ति का नाम लिखें

Ans ⇒ नाइकोल प्रिज्म ।
ग्राफ –


Q.10. जब प्रकाश की किरणें विरल माध्यम से सघन माध्यम में प्रवेश करती है, तो उसकी गति घटती है। गति में यह कमी क्या प्रकाश ऊर्जा में कमी का द्योतक है ?

Ans ⇒ हम जानते हैं कि C = vλ
माध्यम में, V = vλ (जहाँ V < C क्योंकि λ घटता है)
ऊर्जा E = nv
ऊर्जा नहीं घटता क्योंकि प्रकाश का आवृत्ति (v) नहीं बदलता है।


Q.11. एकवर्णीय प्रकाश तथा श्वेत प्रकाश के कारण एकल-झिरी विवर्तन प्रतिरूप की तुलना करें।

Ans ⇒ श्वेत प्रकाश के लिए केन्द्रीय अधिकता (C.M.) दूसरे अधिकता तथा न्यूनता के साथ रंगीन हो जाता है, क्योंकि सभी की चौड़ाई तरंगदैर्ध्य पर निर्भर करता है।


Q.12. (a) हाइगेन के तरंग सिद्धांत के अवधारणाओं को लिखें।
(b) (i) दूर से आती प्रकाशपूँज तथा (ii) किसी बिन्दु स्रोत से अपसारित प्रकाशपूँज के लिए तरंगाग्र के प्रकार को दर्शाएँ।

हाइगेन के तरंग सिद्धांत के अवधारणाओं को लिखें।

Ans ⇒ (a) हाइगेन के तरंग सिद्धांत के अवधारणाएँ–
(i) किसी स्रोत से निकले हुए तरंग जो की तरंग गति से आगे बढ़ता है, प्रकाश कहलाता है। (ii) प्रकाश जिस माध्यम में गमन करता है, उसे ईथर माध्यम कहा जाता है, जो कि अत्यधिक प्रत्यास्थ तथा कम घनत्व वाला होता है। (iii) प्रकाश का रंग उसके आवृत्ति पर निर्भर करती है।
(b) (i) दूर से आती प्रकाशपूँज (ii) किसी बिन्दु स्रोत से अपसारित प्रकाशपूँज।


Q.13. जब एकवर्णीय प्रकाश दो माध्यमों को पृथक करने वाली सतह पर आपतित होता है, तब परावर्तित एवं अपवर्तित दोनों प्रकाश की आवृत्तियाँ समान होती है। स्पष्ट कीजिए, क्यों ?

Ans ⇒ जब एकवर्णीय प्रकाश दो माध्यमों को पृथक करने वाली सतह पर आपतित होता है, तब परावर्तित एवं अपवर्तित दोनों प्रकाश की आवत्तियाँ समान होती है, क्योंकि प्रकाश फोटॉन का बना होता है, तथा फोटॉन की ऊर्जा हमेशा समान होती है।


Q.14. जब प्रकाश विरल से सघन माध्यम में गति करता है तो उसकी चाल में कमी आती है। क्या चाल में आई कमी प्रकाश तरंगों द्वारा संचारित ऊर्जा की कमी को दर्शाता है।

Ans ⇒ जब प्रकाश विरल से सघन माध्यम में गति करता है तो उसकी चाल में कमी आती है, चाल में आई कमी प्रकाश तरंगों द्वारा संचारित ऊर्जा की कमी को नहीं दर्शाता क्योंकि प्रकाश तरंगों द्वारा संचारित ऊर्जा तरंगों के आयाम पर निर्भर करता है न कि उसके चाल पर।


Q.15. प्रकाश का एक संकीर्ण स्पंद एक माध्यम में भेजा जाता है। क्या आप आशा करते हैं कि स्पंद माध्यम में गति के साथ अपनी आकृति पूर्ववत् रखेगा ?

Ans ⇒ जैसा कि हम जानते हैं कि एक संकीर्ण स्पंद बहुत सारे छोटे-छोटे आवर्त तरंगों के मिलने से बना हो तथा सभी आवर्त तरंगों के पास विभिन्न तरंगदैर्ध्य है।
सुत्रानुसार, V = vλ अत: विभिन्न तरंगदैर्यों के स्पंद विभिन्न गति तथा विभिन्न आकृति के साथ गमन करेंगे।


Q.16. प्रकाश की तरंग आवधारणा में, प्रकाश की तीव्रता का आकलन तरंग के आयाम के वर्ग से किया जाता है। प्रकाश को फोटॉन अवधारणा में प्रकाश की तीव्रता का आकलन करता है ?

Ans ⇒ प्रकाश की तरंग अवधारणा में, प्रकाश की तीव्रता का आकलन तरंग के माध्यम के वर्ग से किया जाता है तथा फोटॉन अवधारणा में प्रकाश की तीव्रता किसी इकाई क्षेत्रफल पर पड़ने वाले फोटॉन की संख्या से प्राप्त किया जाता है।


Q.17. स्थिर जल में प्रकाश की चाल c/n है, जहाँ n जल का अपवर्तनांक है। प्रेक्षक के सापेक्ष चाल v से गतिमान जलधारा में प्रकाश की चाल क्या होगी ?

Ans ⇒ चूंकि प्रकाश की चाल जलधारा की चाल पर निर्भर करता है। इसलिए प्रेक्षण के सापेक्ष चाल V से गतिमान जलधारा में प्रकाश की चाल पहले से मौजूद चाल से अधिक होगा (अर्थात् c/n + होगा)।

11. विकिरण तथा द्रव की द्वैत प्रकृति ( Short Answer Type Question )

11. विकिरण तथा द्रव की द्वैत प्रकृति


Q.1. प्रकाश-विद्युत प्रभाव से आप क्या समझते हैं, ? समझाएँ।

द्वारा 1898 ई. में जाना गया कि जब प्रकाश धातु के सतह पर पड़ती है तो सतह से इलेक्ट्रॉनों का उत्सर्जन होता है। लेनार्ड द्वारा 1900 ई० में कहा गया कि जब पराबैंगनी किरणे ऋणावेशित प्लेट पर पड़ती हैं तो प्लेट से उत्सर्जित इलेक्ट्रॉन धनात्मक प्लेट द्वारा आकर्षित हो जाता है, फलस्वरूप परिपथ पूरा हो जाता है तथा इलेक्ट्रॉन प्रवाहित होता है। किन्तु यदि पराबैंगनी किरणें धनात्मक प्लेट पर पड़ती हैं तो प्लेट से उत्सर्जित इलेक्ट्रॉन ऋणात्मक प्लेट पर पहुँच नहीं पाता है क्योंकि इलेक्ट्रॉन ऋणात्मक आवेशित होता है। इससे परिपथ पूरा नहीं हो पाता है और धारा प्रवाहित नहीं होती है।
इस प्रकार, उच्च आवृत्ति के प्रकाश के प्रभाव में धातुओं के सतहों से इलेक्ट्रॉनों के उत्सर्जन की घटना प्रकाश-विद्युत प्रभाव कहलाती है।
प्रकाश-विद्युत प्रभाव के द्वारा उत्सर्जित इलेक्ट्रॉन कहलाते हैं तथा उत्पन्न धारा प्रकाश विद्युत धारा कहलाती है।


Q.2. प्रकाश किस प्रकार द्वैत प्रकृति (स्वरूप) है ?

Ans ⇒ प्लांक के क्वांटम सिद्धान्त के अनुसार प्रकाश ऊर्जा का उत्सर्जन और अवशोषण सतत् नहीं होकर विविक्त रूप में ऊर्जा के बण्डलों के रूप में होता है, जिन्हें फोटॉन या क्वांटा कहते हैं। इसमें कणों के सभी गुण जैसे द्रव्यमान, संवेग ऊर्जा आदि पाये जाते हैं।
इस प्रकार प्रकाश की सभी घटनाओं की व्याख्या करने के लिए तरंग सिद्धान्त और क्वांटम सिद्धान्त दोनों ही आवश्यक है।
अर्थात् व्यतिकरण, विवर्तन आदि में प्रकाश तरंगों का व्यवहार करना है, जबंकि कुछ अन्य परिस्थितियों में प्रकाश में वैद्युत प्रभाव, काम्पटन प्रकाश आदि में प्रकाश कण (फोटॉन) की तरह व्यवहार करता है। इस प्रकार में कणिका और तरंग दोनों के गुण विद्यमान हैं। प्रकाश के इस स्वरूप या प्रकृति को द्वैत स्वरूप या प्रकृति कहते हैं।


Q.3. डी० ब्रॉग्ली सिद्धान्त अथवा प्रकाश की द्वैत प्रकृति क्या है ? समझाएँ।

Ans ⇒ डी० ब्रॉग्ली सिद्धान्त – जब कोई द्रव्य कण जैसे इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन आदि गति करते हैं तब इन कणों के साथ तरंग सम्बद्ध होती है। इन तरंगों को द्रव्य तरंग या डी ब्रॉग्ली तरंग कहते हैं। डेविसन, जर्मन तथा थामसन द्वारा गतिमान इलेक्ट्रॉन के साथ सम्बद्ध द्रव्य तरंग के विवर्तन का प्रायोगिक रूप से प्रदर्शन किया गया तथा द्रव्य तरंग की प्रायोगिक पुष्टि की गयी।
डी ब्रोगली द्वारा 1925 ई. में सर्वप्रथम परिकल्पना की गयी थी कि जब प्रकाश की प्रकृति द्वैत है, तब द्रव्य कण जैसे इलेक्ट्रॉन, प्रोट्रॉनों, न्यूट्रॉन आदि की प्रकृति भी द्वैत हो सकती है अर्थात् निश्चित परिस्थितियों में यह कण भी तरंग की तरह व्यवहार कर सकते हैं।


Q.4. आइंस्टाइन का प्रकाश-विद्यत समीकरण क्या है ? इसे स्थापित करें।
अथवा, आइंस्टाइन का प्रकाश-विद्युत समीकरण कर व्याख्या करें।

Ans ⇒ आइंस्टाइन का प्रकाश-विद्युत समीकरण – प्लांक के क्वांटम सिद्धान्त के आधार पर आइन्स्टीन द्वारा 1905 ई. में प्रकाश-विद्युत प्रभाव की घटना की व्याख्या की गयी। इस सिद्धान्त के अनुसार, प्रकाश ऊर्जा के छोटे-छोटे बण्डलों या पैकेटों के रूप में चलते हैं, जिसे फोटॉन कहा जाता है। प्रत्येक फोटॉन की ऊर्जा hv होती है, जहाँ v प्रकाश की आवृत्ति तथा h प्लांक का सार्वत्रिक स्थिरांक है। प्रकाश की तीव्रता उन फोटॉनों की संख्या पर निर्भर करती है।
जब एक फोटॉन किसी धातु पर पड़ता है तो वह धातु में उपस्थित इलेक्ट्रॉनों में से किसी एक को अपने ऊर्जा hv को स्थानान्तरित करता है तथा अपना अस्तित्व समाप्त कर देता है। इस ऊर्जा के एक भाग धातु से इलेक्ट्रॉन को उत्तेजित करने में तथा शेष ऊर्जा उत्तेजित नहीं होते हैं । इलेक्ट्रॉन जो धातु से उत्तेजित होते हैं, वे परमाणु के साथ टक्कर करने में अपने रास्ते से सतह पर अपनी कुछ प्राप्त ऊर्जा फैलाते हैं। इस प्रकार विभिन्न गतिज ऊर्जाओं के साथ इलेक्ट्रॉन धातु पर उत्सर्जित होते हैं।
माना कि प्रकाश इलेक्ट्रॉन का महत्तम गतिज ऊर्जा धातु सतह से E1 उत्सर्जित होती है और धातु पर प्रकाश इलेक्ट्रॉन को उत्तेजित करने के लिए आवश्यक ऊर्जा W है, जिसे धातु का कार्य-फलन कहते हैं तथा यह विभिन्न धातुओं के लिए विभिन्न होता है। तब हम पाते हैं कि
                                                    hv = W + Ek या Ek = hv – W
जहाँ hv, इलेक्ट्रॉन द्वारा अवशोषित फोटॉन की ऊर्जा है।
इलेक्ट्रॉन द्वारा अवशोषित फोट्रॉन की ऊर्जा धातु के कार्यफलन W से कम होने पर इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित नहीं करता है। इसलिए, दिये गये धातु के लिए, प्रकाश की थ्रिशोल्ड न्यूनतम आवृत्ति v0 होने पर प्रकाश के फोटॉन की ऊर्जा के परिमाण hv0 धातु के बाहर इलेक्ट्रॉन को उत्तेजित करने में खर्च होता है अर्थात् यह कार्य फलन W के बराबर है। इस प्रकार W = hv0 है।
                                                    Ek = hv – hv0 या Ek = hv – v0
माना कि उत्सर्जित प्रकाश इलेक्ट्रॉन का अधिकतम वेग vmax है, तो Ek = 1/2mv2max होती है।
अतः उपर्युक्त समीकरण को निम्न प्रकार से लिखा जाता है –
1/2mv2max = h(v – v0)
यह समीकरण आइंस्टाइन का प्रकाश-विद्युत समीकरण कहलाता है।


Q.5. प्रकाश-विद्युत उत्सर्जन के नियमों को लिखें तथा आइंस्टाइन के प्रकाश-विद्युत समीकरण से इसकी व्याख्या करें।

Ans ⇒ प्रकाश-विद्युत उत्सर्जन के नियम – प्रकाश-विद्युत प्रभाव के प्रयोगों के आधार पर लेनार्ड तथा मिलिकन द्वारा प्रकाश-विद्युत उत्सर्जन के निम्नलिखित नियम दिये गये हैं –
(a) धातु की सतह से फोटो-इलेक्ट्रॉन के उत्सर्जन की दर, सतह पर पड़ते हुए आपतित प्रकाश की तीव्रता के समानुपाती होती है।
(b) उत्सर्जित फोटो-इलेक्ट्रॉन की अधिकतम गतिज ऊर्जा, आपतित प्रकाश की तीव्रता पर निर्भर नहीं करती है।
(c) फोटो-इलेक्ट्रॉन की महत्तम गतिज ऊर्जा आपतित प्रकाश की आवृत्ति के बढ़ने से बढ़ती है।
(d) आपतित प्रकाश की आवृत्ति के किसी न्यूनतम मान से कम रहने पर, फोटो-इलेक्ट्रॉन धातु से उत्सर्जित होती है। यह न्यूनतम आवृत्ति है, जिसे थ्रिशोल्ड आवृत्ति कहते हैं। विभिन्न धातुओं के लिए विभिन्न होता है।
(e) ज्योंहि धातु की सतह पर प्रकाश आपतित होती है, फोटो इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित होती है, अर्थात् प्रकाश के आपतित तथा इलेक्ट्रॉन से उत्सर्जित होने में समय नगण्य अर्थात् नहीं के बराबर लगता है।

प्रकाश-विद्युत उत्सर्जन नियम की व्याख्या – यदि दिये गये प्रकाश की तीव्रता की आवृत्ति v को बढ़ाया जाता है तो प्रति सेकेण्ड सतह पर टकराने वाली फोटॉन की संख्या समान अनुपात में बढ़ती है, किन्तु प्रत्येक फोटॉन की ऊर्जा hv समान रहती है। अतः फोटो-इलेक्ट्रॉनों की संख्या बढ़ती है, किन्तु उनकी अधिकतम गतिज ऊर्जा Ek समान रहती है, इस प्रकार आइंस्टाइन समीकरण से (a) तथा (b) नियम की व्याख्या हो जाती है।
आइंस्टाइन के समीकरण से यह भी देखा जाता है कि फोटो-इलेक्ट्रॉनों की महत्तम गतिज ऊर्जा Ek आपतित प्रकाश की आवृत्ति v के बढ़ने के साथ रैखिक रूप से बढ़ती है। यह (c) नियम है।
यदि v < v0 तो इलेक्ट्रॉन की गतिज ऊर्जा ऋणात्मक होती है जो कि असंभव है। अर्थात् यदि आपतित प्रकाश की आवृत्ति v के थ्रिशोल्ड आवृत्ति v0 से कम है तो फोटो-इलेक्ट्रॉन का उत्सर्जन नहीं हो सकता है। यही (d) नियम है।
प्रकाश के आपतित होने के बाद एकाएक फोटो-इलेक्ट्रॉनों के उत्सर्जन की व्याख्या आइन्सटीन के फोटॉन सिद्धान्त द्वारा भी की जा सकती है। ज्योंही प्रथम फोटॉन धातु पर पड़ता है, धातु में एक इलेक्ट्रॉन अवशोषित तथा उत्तेजित हो जाता है। इस प्रकार धातु को प्रकाश के आपतन तथा इलेक्ट्रॉन के उत्सर्जन में समय नहीं लगता है, यही (e) नियम है।


Q.6. प्रकाश-विद्युत सेल या फोटो-विद्युत सेल क्या है ? फोटो-उत्सर्जक सेल की बनावट तथा कार्य-विधि का वर्णन करें।

प्रकाश-विद्यत सेल

Ans ⇒ प्रकाश-विद्यत सेल – यह वैसी व्यवस्था है जिसमें प्रकाश ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिणत किया जाता है।
प्रकाश-उत्सर्जक सेल – चित्रानुसार प्रकाश-उत्सर्जक सेल की प्रायोगिक व्यवस्था प्रदर्शित है । इनमें एक काँच या क्वार्ट्ज बल्ब होता है और आन्तरिक सतह में पतले क्षारीय धातु जैसे, सोडियम, कैल्शियम इत्यादि का परत लगा होता है, जो प्रकाश संवेदनशील होता है तथा सेल के कैथोड का कार्य करता है। वल्व के मध्य में एक सीधी तार स्थिर होती है जो ऐनोड का कार्य करती है। कैथोड तथा ऐनोड बाहरी बैटरी, प्रतिरोध R तथा गैलवेनोमापी G से जुड़ा होता है। जब थ्रिशोल्ड आवृत्ति से उच्च आवृत्ति का प्रकाश, सेल के कैथोड पर पड़ता है तो फोटो इलेक्ट्रॉन कैथोड से उत्सर्जित होता है। यह इलेक्ट्रॉन ऐनोड की तरफ गतिशील होता है और इसलिए एक धारा बाह्य परिपथ में प्रवाहित होती है।
प्रकाश-उत्सर्जक सेल विद्युतीय परिपथ में स्वीच की तरह कार्य करता है। इसलिए इस सेल को फोटो-रेसीस्टीभ सेल भी कहते हैं। प्रकाश-उत्सर्जक सेल दो प्रकार का होता है –
(a) निर्वात प्रकाश-उत्सर्जक सेल – निर्वात प्रकाश सेल में प्रकाश के आपतित होने के बाद एकाएक धारा प्रवाहित होना शुरू हो जाता है। यह आपतित प्रकाश की तीव्रता के समानुपाती होता है। इसलिए यह सेल फोटोमापी के लिए तथा टेलीविजन में अत्यधिक उपयुक्त है।

(b) गैस यक्त प्रकाश-उत्सर्जक सेल – गैस युक्त प्रकाश-उत्सर्जक सेल के बल्ब में कुछ अक्रिय गैस (आरगन या न्योन) भरी होती है। गैसों के आयनीकरण के कारण धारा कुछ अधिक होते हैं, किन्तु प्रकाश की तीव्रता के समानुपाती नहीं होती है। इस तरह के सेल का व्यवहार सीनेमेटोग्राफी ध्वनि के उत्पादन तथा रिकार्डिंग में होता है।


Q.7. डी. ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य समीकरण से इलेक्ट्रॉन का तरंगदैर्घ्य निकालिए।

डी. ब्रॉग्ली तरंगदैर्घ्य समीकरण से इलेक्ट्रॉन का तरंगदैर्घ्य निकालिए

Ans ⇒ मान लें कि इलेक्ट्रॉन V वोल्टता से त्वरित किया गया है। यदि त्वरण के पश्चात् इलेक्ट्रॉन के वेग को ‘v’ द्वारा और इलेक्ट्रॉन के द्रव्यमान को ‘m’ द्वारा प्रकट करते हैं, तो इलेक्ट्रॉन की गतिज ऊर्जा qV जूल के बराबर होनी चाहिए।


Q.8. साबित कीजिए कि किसी इलेक्ट्रॉन के लिए द ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य निम्न संबंध से दिए जाते हैं

इलेक्ट्रॉन के लिए द ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य निम्न संबंध से दिए जाते हैं

Q.9. एक इलेक्ट्रॉन – कण तथा फोटॉन समान गतिज ऊर्जा के समान है। इनमें किस कण का द ब्रॉग्ली तरंगदैर्ध्य सबसे कम है ?

 एक इलेक्ट्रॉन
∴      इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान कम होता है।
अतः इसका तरंगदैर्ध्य α-कण की अपेक्षा अधिक होगा।


Q.10. प्रकाश-वैद्यत के कुछ उपयोग बताइए।

Ans ⇒ प्रकाश-वैद्युत सेल के प्रमुख उपयोग निम्न प्रकार हैं –
(i) घरों के लिए इन्हे चोर घंटी के रूप में प्रयुक्त करते हैं।
(ii) इन्हें अग्नि घंटी के रूप में काम में लाते हैं।
(iii) रासायनिक अभिक्रिया में ताप नियंत्राण के काम में लाया जाता है।
(iv) एक हाल में प्रवेश करने वाले व्यक्तियों की स्वतः गिनती के काम में इन्हें लाया जाता है।
(v) सड़कों की बत्तियों को स्वतः बुझाने के काम में इन्हें लाया जाता है।
(vi) द्वारक के स्वतः नियंत्रण के काम में इन्हें फोटोग्राफिक कैमरा में लगाते हैं।
(vii) इन्हें TV स्टूडियो में प्रकाश को वैद्युत धारा में परिवर्तित करके प्रसारण के काम में लाया जाता है।


Q.11. निरोधी विभव के क्या अभिलक्षण हैं ?

Ans ⇒ निरोधी विभव के निम्न अभिलक्षण हैं –
(i) यह प्रकाशिक इलेक्ट्रॉनों की उच्चतम गतिज ऊर्जा का माप है।
(ii) यह धातु पृष्ठ की प्रकृति पर निर्भर है।
(iii) यह प्रकाश संवेदी द्रव्य के पृष्ठ जिस पर प्रकाश आवृत्ति आपतित है पर निर्भर है। एक दत्त पृष्ठ के लिए इसका निरोधी विभव या बाधा विभव का मान अधिक होता है जब आपतित आवृत्ति अधिक हो।


Q.12. फोटॉन के क्या गुण हैं ?

Ans ⇒ फोटॉन के निम्नलिखित गुण हैं –
(i) निर्वात् में यह प्रकाश वेग से गतिमान होते हैं।
(ii) इनका विराम द्रव्यमान शून्य होता है।
(iii) इनका संवेग p = h/λ द्वारा दिया जाता है।
(iv) यह वैद्युतीय रूप से उदास होते हैं।
(v) यह सरल रेखा में गति करते हैं।
(vi) यह विद्युत और चुंबकीय क्षेत्रों में विचलित नहीं होते।
(vii) जब यह एक माध्यम से दूसरे माध्यम में चलते हैं, इनकी ऊर्जा वही रहती है।
(viii) इनका गतिक द्रव्यमान होता है, जो m = h/λ द्वारा व्यक्त किया जाता है।


Q.13. ध्रुवण का मैलस नियम क्या है ?

Ans ⇒ प्रकाश तीव्रता ध्रुवक को पार करने में गुणक cose से कम होती है। यदि I0 आपतित तीव्रता तथा I ध्रुवक के बाद की तीव्रता हो तो I = I0cos2θ जहाँ θ आपतित ध्रुवण तल एवं सहज गमन तल के बीच कोण है।


Q.14. प्रकाशिक फाइबर क्या है ? इसके कुछ मुख्य उपयोगों का संक्षिप्त वर्णन करें।

Ans ⇒ यह पूर्ण आंतरिक परावर्तन (Total internal reflection) के सिद्धांत पर कार्य करने वाली एक ऐसी काँच या क्वार्ट्ज की नली है जिसकी सहायता से प्रकाश संकेत को एक स्थान से दूसरे स्थान तक भेजा जाता है।

उपयोग –
(i) संचार लाइन के रूप में एवं कम्प्यूटर (Computer) के क्षेत्र में।
(ii) दो विमीय एवं त्रिविमीय फोटो संचार में।
(iii) Endoscopy में (मेडिकल क्षेत्र में)।
(iv) हृदय (Heart) में ब्लड प्रवाह मापने में।
(v) अपवर्तनांक मीटर (Refractrometer) में।

12. परमाणु ( Short Answer Type Question )

Q.1. रदरफोर्ड के परमाणु मॉडल की क्या सीमाएँ हैं ?

रदरफोर्ड के परमाणु मॉडल की क्या सीमाएँ हैं

Ans ⇒ रदरफोर्ड के परमाणु मॉडल की निम्नलिखित सीमाएँ हैं –
(a) नाभिक के चारों तरफ परिभ्रमण करते हुए इलेक्ट्रॉन नाभिक के केन्द्र की तरफ लगातार त्वरित होता है। लॉरेन्ज के अनुसार त्वरित आवेशित कण को लगातार ऊर्जा विकीर्णित करना चाहिए। इसलिए, परमाणु में भी, परिभ्रमण करते हुए इलेक्ट्रॉन को लगातार ऊर्जा उत्सर्जित करनी चाहिए और इस तरह उसके पथ की त्रिज्या घटते जाना चाहिए तथा अन्त में चित्रानुसार उसे नाभिक पर गिर जाना चाहिए। इसलिए रदरफोर्ड के परमाणु मॉडल परमाणु के स्थायित्व की व्याख्या नहीं करता है।

(b) यदि रदरफोर्ड के मॉडल सत्य हैं तो इलेक्ट्रॉन सभी संभव त्रिज्याओं के कक्षाओं में परिभ्रमण कर सकते हैं तथा इसलिए उसे लगातार ऊर्जा स्पेक्ट्रम उत्सर्जित करना चहिए। यद्यपि परमाणु हाइड्रोजन की तरह रेखीय स्पेक्ट्रम होते हैं। Download Question PDF


Q. 2. हाइड्रोजन परमाणु मॉडल के लिए बोर की क्या मान्यताएँ या परिकल्पनाएँ हैं ?

Ans ⇒ बोर के हाइड्रोजन परमाणु मॉडल की निम्नलिखित मान्यताएँ या परिकल्पनाएँ हैं :
(a) परमाणु जिसमें धनावेशित नाभिक होता है परमाणु के पूरे द्रव्यमान के लिए उत्तरदायी होता है।
(b) इलेक्ट्रॉन निश्चित त्रिज्याओं के किसी निश्चित वृत्ताकार कक्षाओं में नाभिक के चारों तरफ परिभ्रमण करता है।
(c) निश्चित कक्षाएँ वैसे होते हैं जिसमें इलेक्ट्रॉन के कोणीय संवेग h/2π के पूर्ण गुणज होते हैं, जहाँ h प्लांक का स्थिरांक है। इसका मान 6.62 x 10-34 जूल-सेकेण्ड है।
माना कि m तथा v, त्रिज्या r के निश्चित कक्षाओं में इलेक्ट्रॉन के द्रव्यमान, रैखिक वेग तथा उसके घूर्णन त्रिज्या है, तो , जहाँ n प्रधान क्वांटम संख्या कहलाती है, जिसका पूर्ण मान क्रमशः 1, 2, 3,…………है।
यह बोर का क्वांटाइजेशन अवस्था कहलाती है।
(d) जब इलेक्ट्रॉन, निश्चित कक्षाओं में परिक्रमा करते हैं तो वे ऊर्जा विकीर्णन नहीं करते हैं तथा वैसे कक्षाओं को स्थायी कक्षाएँ कहते हैं।
(e) ऊर्जा विकीर्णित होती है, जब इलेक्ट्रॉन उच्च ऊर्जा कक्षा से निम्न ऊर्जा कक्षा पर कूदती है तथा ऊर्जा अवशोषित होती है जब वह निम्न ऊर्जा कक्षा से उच्च ऊर्जा कक्षा पर कूदती है।
माना कि ni तथा nf प्रधान क्वांटम संख्या के कक्षाओं के साथ क्रमशः E1 तथा Ef ऊर्जाओं से सम्बन्धित है। इसमें ni < nf तो उत्सर्जित विकिरण की आवृत्ति  है। यह बोर की आवृत्ति अवस्था कहलाती है, जहाँ h प्लांक नियतांक है।


Q. 3. α-किरणों के प्रकीर्णन के प्रयोग में अधिकांश α-कण धातु-पत्र से होकर सीधे गुजर जाते हैं। इससे आप क्या निष्कर्ष निकालेंगे ?
अथवा, रदरफोर्ड के α-कणों के प्रकीर्णन से क्या निष्कर्ष निकाला गया ?

Ans ⇒ धातु-पत्र (धातु की पत्ती) पर से α-कणों के प्रकीर्णन में यह देखा गया कि ये कण विभिन्न दिशाओं में विक्षेपित हो जाते हैं। प्रयोग में यह भी देखा गया कि अधिकांश α-कणों में कोई भी विक्षेप नहीं होता। कुछ कण तो छोटे-छोटे कोणों से विक्षेपित होते हैं, परंतु कुछ ही कण अपने प्रारंभिक पथ से 90° से भी अधिक कोण से विक्षेपित हो जाते हैं। जब धन आवेश से आविष्ट α-कण धातु-पत्र के परमाणु से गुजरते हैं तो उनमें से अधिकांश कणों पर कोई बल नहीं लगता या बहुत कम बल लगता है। परंतु किसी-किसी कण पर बहुत अधिक विकर्षण-बल लगता है। रदरफोर्ड ने अनुमान लगाया कि ऐसा तभी संभव है जब परमाणु के अंदर एक धन आवेश अत्यधिक संकेंद्रित (concentrated) हो। गणना के आधार पर उन्होंने बताया कि परमाणु में उसका द्रव्यमान तथा धन आवेश अत्यंत छोटे आकार (10-15m त्रिज्या) के नाभिक (न्यूक्लियस) में संकेंद्रित रहते हैं तथा इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर वृत्तीय कक्षाओं (circular orbits) में घूमते रहते हैं। इस प्रकार परमाणु के अंदर नाभिक तथा इलेक्ट्रॉनों के बीच स्थान खाली रहता है। यदि α-कण परमाणु के खोखले भाग से गुजरते हैं तो वे सीधे अथवा थोड़ा विक्षेपित होकर निकल जाते हैं। यदि -कण नाभिक के बहुत निकट से गुजरता है तो वह तीव्र विकर्षण बल का अनुभव करता है और अपने पथ से अधकि विक्षेपित हो जाता है।


Q.4. रिडवर्ग नियतांक क्या है, इसका मात्रक लिखें।

Ans ⇒ हाइड्रोजन परमाणु के बोर-सिद्धांत (Bohr’s theory) से हम जानते हैं कि जब इलेक्ट्रॉन उच्चतर कक्षा (higher orbit) n2 (ऊर्जा n2‘) से निम्नतर कक्षा (lower orbit) n1(ऊर्जा En1) में आता है तब विद्युत-चंबकीय तरंगों के रूप में उत्सर्जित फोटॉन की ऊर्जा 
रिडवर्ग नियतांक क्या है, इसका मात्रक लिखें

यदि प्रकाश का वेग  c हो और उत्सर्जित विकिरण ऊर्जा का तरंगदैर्ध्य λ हो, तो

यदि प्रकाश का वेग  c हो और उत्सर्जित विकिरण ऊर्जा का तरंगदैर्ध्य λ हो, तो

जहाँ 1/λ = यदि प्रकाश का वेग ;यदि प्रकाश का वेग  को उत्सर्जित विकिरण-ऊर्जा की तरंग संख्या (wave number) कहा जाता है , तथा  R = ‘ एक नियतांक है जिसे रिडबर्ग

नियतांक (Rydberg constant) कहा जाता है। उपर्युक्त व्यंजक में m इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान, e इलेक्ट्रॉन पर आवेश, ε0 मुक्त आकाश की परावैद्युतता (permitivity of free space), c प्रकाश का वेग तथा h प्लांक का स्थिरांक है।
रिडबर्ग नियतांक का SI मात्रक m-1 है तथा इसका सैद्धांतिक मानक 1.097000 x 107m-1 प्राप्त होता है।
रिडबर्ग नियतांक का यह सैद्धांतिक मान, प्रयोगात्मक मान से बहुत ही थोड़ा भिन्न है।


Q.5. उत्तेजित ऊर्जा तथा आयनीकरण ऊर्जा से आप क्या समझते हैं ?
अथवा, उत्तेजित तथा आयनीकरण ऊर्जा क्या है ?

Ans ⇒ उत्तेजित ऊर्जा – उत्तेजित ऊर्जा, ऊर्जा का वह परिमाण है जो एक इलेक्ट्रॉन को ग्राउंड अवस्था से परमाणु के किसी एक उत्तेजित अवस्था में कूदने में लगता है।
               हम जानते हैं कि हाइड्रोजन परमाणु के ग्राउंड अवस्था (n = 1) में इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा, E1 = 13.6 3V, प्रथम उत्तेजित अवस्था में (n = 2) में इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा E2 = -3.4 eV है।
इसलिए, हाइड्रोजन परमाणु के प्रथम उत्तेजित ऊर्जा,
              E2 – E1 = – 3.4 – (- 13.6) = 10.2 eV.
       अतः 10.2 वोल्ट को प्रथम उत्तेजित विभव कहते हैं। उसी प्रकार, हाइड्रोजन परमाणु के दूसरे उत्तेजित ऊर्जा, E3 – E1 = -1.51 – (-13.6) = 12.09 eV तथा दूसरे उत्तेजित विभव 12.09 वोल्ट है।

आयनीकरण ऊर्जा – आयनीकरण ऊर्जा वैसी आवश्यक ऊर्जा है, जिसके परमाणु से एक इलेक्ट्रॉन को बाहर निकाला जाता है। जब इलेक्ट्रॉन को बढ़ाकर कक्षा n = ∞ में ले जाया जाता है तो वह परमाणु से पूर्णतः बाहर हो जाता है। इसलिए, हाइड्रोजन परमाणु के आयनीकरण ऊर्जा n = 1 कक्षा से n = ∞ कक्षा में छोड़ने में आवश्यक ऊर्जा के बराबर होता है। अर्थात् आयनीकरण ऊर्जा = E – E1 = 0 – (- 13.6) = 13.6 ev । अतः हाइड्रोजन परमाणु के आयनीकरण विभव 13.6 वोल्ट है।


Q.6. नाभिक का संघटन क्या है ? समझाएँ।

Ans ⇒ परमाणु के नाभिक में प्रोटॉन तथा न्यूट्रॉन होते हैं। प्रोटॉन और न्यूट्रॉनों की कुल संख्या मिलकर परमाणु की द्रव्यमान संख्या या उसके परमाणु भार A के बराबर होती है तथा प्रोटॉनों की संख्या, परमाणु क्रमांक Z के बराबर होती है। नाभिक का कुल आवेश उसमें उपस्थित समस्त प्रोटॉनों के आवेश के बराबर होता है तथा नाभिक का कुल द्रव्यमान, उसमें उपस्थित समस्त प्रोटॉनों एवं न्यूट्रॉनों के द्रव्यमान के योग के बराबर होता है। उदाहरण के लिए, हाइड्रोजन (परमाणु क्रमांक = 1, परमाणु भार = 1) के नाभिक में केवल एक प्रोटॉन होता है। हीलियम का परमाणु क्रमांक 2 तथा परमाणु भार 4 है, अतः इसके नाभिक में दो प्रोटॉन तथा दो न्यूट्रॉन होते हैं।
            किसी भी नाभिक में प्रोटॉनों की संख्या ठीक उतनी ही होती है जितना उस तत्त्व का परमाणु क्रमांक होता है तथा न्यूट्रॉनों की संख्या = परमाणु भार – परमाणु क्रमांक।
           नाभिक के संघटन की यह प्रोटॉन- न्यूट्रॉन परिकल्पना अनेक प्रयोगों द्वारा प्रमाणित की जा चुकी है तथा इसी परिकल्पना को अभी तक सत्य माना जाता है।


Q.7. रदरफोर्ड के-कण प्रकीर्णन के प्रायोगिक निरीक्षण का क्या निष्कर्ष प्राप्त हुआ ?

Ans ⇒ निष्कर्ष –

रदरफोर्ड के-कण प्रकीर्णन के प्रायोगिक निरीक्षण का क्या निष्कर्ष प्राप्त हुआ

(i) परमाणु के सभी धनात्मक आवेश अत्यल्प भाग में संकेन्द्रित होते है।
(ii) पूरे द्रव्यमान थोड़े भाग में ही संकेन्द्रित होते हैं, जिनका आकार का भाग 1/10000 वाँ भाग होता है उसे नाभिक कहा जाता है।

(iii) नाभिक के चारों ओर का स्थान व्यावहारिक रूप से रिक्त होता है। सोने के नाभिक प्रकीर्णित प्रक्रिया में स्थिर होते हैं।
α- कण का परिणाम F = 

(iv) α-कणों के प्रकीर्णन की कुल संख्या तथा प्रकीर्णन कोण के बीच का ग्राफ परमाणु के नाभिक मॉडल के आधार पर होता है।


Q. 8. समीपस्थ पहुँच दूरी (क्लोजेस्ट एप्रोच दूरी) क्या है ? समझाएँ।

रदरफोर्ड के-कण प्रकीर्णन के प्रायोगिक निरीक्षण का क्या निष्कर्ष प्राप्त हुआ

Ans ⇒ α-कण प्रकीर्णन प्रयोग में α-कण नाभिक के केन्द्र की तरफ गतिशील होता है तथा उससे जितनी दूरी से वापस होता है, वही दूरी उसकी समीपस्थ पहुँच दूरी (क्लोजेस्ट एप्रोच दूरी) कहलाती है। इसे ro से दिखाया जाता है। यहाँ इसकी – O+ नाभिक गतिज ऊर्जा, स्थिर विद्युत स्थितिज ऊर्जा के समान होते हैं।

अत: EP = 

जहाँ E= स्थिर विधुत स्थितीज  उर्जा।

EK =  mV2, जहाँ EK = गतिज उर्जा


Q.9. कैथोड किरणें क्या है ? समझाएँ।

Ans ⇒ कैथोड किरणें – कैथोड किरणें बहुत से इलेक्ट्रॉनों के तेजगामी प्रवाह हैं जो सभी तत्त्वों में विद्यमान है।
(i) इनकी खोज सर्वप्रथम गोल्डस्टीन ने तरंग प्रवृत्ति के रूप में की।
(ii) ये ऋण आवेशयुक्त होती है।
(iii) इनके मात्रा तथा आवेश इलेक्ट्रॉन के बराबर है। अर्थात इनका आवेश 1.6 x 10-19 C तथा 9.1 x 10-31 kg है।
           जब विसर्ग नली का दाब लगभग 10-2 से 10-3 पारे के मिमी तथा उच्च विभवांतर इनके इलेक्ट्रोडों के बीच आरोपित होता है, तो कुछ अदृष्य किरणें कैथोड से निकलती है तथा नली के दीवार पर प्रदीप्ति उत्पन्न करती है कैथोड किरणें कहलाती है।


Q.10. उत्तेजित ऊर्जा तथा आयनीकरण ऊर्जा से आप क्या समझते हैं ?
अथवा, उत्तेजित तथा आयनीकरण विभव क्या है ?

Ans ⇒ उत्तेजित ऊर्जा – उत्तेजित ऊर्जा, ऊर्जा का वह परिमाण है जो एक इलेक्ट्रॉन को ग्राउंड अवस्था से परमाणु के किसी एक उत्तेजित अवस्था में कूदने में लगता है।
             हम जानते हैं कि हाइड्रोजन परमाणु के ग्राउंड अवस्था (n = 1) में इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा E1 = -13.6eV है, प्रथम उत्तेजित अवस्था में (n = 2) में इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा E2 = -3.4 eV है।
अतः हाइड्रोजन परमाणु के प्रथम उत्तेजित ऊर्जा
E2 – E1 = -3.4 – (-13.6) = 10.2 eV
अतः 10.2eV को प्रथम उत्तेजित विभव कहा जाता है।

आयनीकरण ऊर्जा – आयनीकरण ऊर्जा वैसी आवश्यक ऊर्जा है, जिसके परमाणु से एक इलेक्ट्रॉन को बाहर निकाला जाता है। जब इलेक्ट्रॉन को बढ़ाकर कक्षा n = ∞ में ले जाया जाता है, तो वह परमाणु से पूर्णतः बाहर हो जाता है। इसलिए हाइड्रोजन परमाणु के आयनीकरण ऊर्जा n = 1 कक्षा से n = ∞ कक्षा में छोड़ने में आवश्यक ऊर्जा के बराबर होता है।
          अर्थात् आयनीकरण ऊर्जा = E – E1 = 0 – (-13.6) = 13.6 eV
अतः हाइड्रोजन परमाणु का आयनीकरण विभव = 13.6 eV है।


Q.11. प्रकाश का फोटो सेल क्या है ?

Ans ⇒ फोटो सेल एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें प्रकाश ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदला जा सकता है। यह प्रकाश विद्युत प्रभाव के सिद्धांत पर बनी रहती है। यह मुख्यतः दो प्रकाश का होता है -(i) प्रकाश उत्सर्जक सेल (Photo emissive cell) (ii) प्रकाश वोल्टीय सेल (Photo voltaic cell)।

उपयोग – (i) सिनेमाओं में ध्वनि के पुनः उत्पादन (reproduction) में ।
(ii) टेलीविजन तथा फोटोग्राफी में।
(iii) अंतरिक्ष Solar battery द्वारा विद्युत उत्पन्न में।
(iv) सड़कों पर बत्तियों के अपने-आप जलने या बुझने में तथा Crossing पर signal देने के काम में।
(v) दरवाजों को अपने आप खोलने तथा बंद करने में।
(vi) बैंक, खजानों इत्यादि में चोरों की सूचना देने के काम में।
(vii) मौसम विज्ञान विभाग में दिन के प्रकाश की तीव्रता मापने के काम में।
(viii) तारों के ताप मापने के काम में।

13. नाभिक ( Short Answer Type Question )

13. नाभिक

Q.1. आइसोटोप तथा आइसोबार से आप क्या समझते हैं ?

Ans. आइसोटोप (समस्थानिक) – तत्त्व के परमाणु जिसकी परमाणु संख्या समान किन्तु द्रव्यमान संख्या असमान हो, आइसोटोप कहलाते हैं। इस तरह के तत्त्वों को रासायनिक या विभिन्न टेकनीक विधि द्वारा अलग नहीं किया जा सकता है जैसे – 

(a) 8O168O178O18 (b) 17Cl3517Cl37 (c) 82pb20682pb20782pb208 ।

आइसोबार (समभारिक)- तत्त्व के परमाणु जिसकी द्रव्यमान संख्या समान किन्त परमाण संख्या असमान हो, आइसोबार कहलाते हैं। इनके रासायनिक गुण विभिन्न हैं। जैसे –
(a) 18Ar16 तथा 20Ca40                (b) 32Ge76 तथा 34Se76
(c) 1H3 तथा 2He3                      (d) 3Li7 तथा 4Be7 ।


Q.2. आइसोटोन (समन्यूट्रॉनिक) क्या है ?

Ans. आइसोटोन (समन्यूट्रॉनिक) – समान न्यूट्रॉनों की संख्या वाले न्यूक्लाई को आइसोटोन कहते हैं, इसके लिए, परमाणु संख्या (Z) तथा परमाणु द्रव्यमान (A) दोनों का मान विभिन्न है, किन्तु (A – Z) का मान समान है। जैसे –
(a) 3Li7 तथा 4Be7 (b) 1H3 तथा 2H4 (C) 11Na23 तथा 12Mg24 ।


Q.3. तापीय न्यूट्रॉन से आप क्या समझते हैं ?

Ans. तापीय न्यूट्रॉन – वैसे न्यूट्रॉन तापीय न्यूट्रॉन कहलाते हैं जो मोडरेटर के हाइड्रोजन न्यूक्लाई के विरुद्ध संघटक के कारण कम हो जाते हैं। ऐसे न्यूट्रॉन (3/2KT) कमरे के तापक्रम पर ऊर्जा रखते हैं तथा 92U235 न्यूक्लाई के विखण्डन में उपयोगी होते हैं।
जैसे – 92U235 + 0n1 92U235 → 56Ba141 + 36Kr92 + 30n1 + 200 MeV (ऊर्जा)।


Q.4. द्रव्यमान अवगुण तथा पैकिंग फ्रैक्शन क्या है ?

Ans. द्रव्यमान अवगुण – न्यूक्लिऑन बनने के द्रव्यमानों के योग के बीच अन्तर तथा नाभिक के विराम द्रव्यमान को द्रव्यमान अवगुण कहते हैं। इसे Δm द्वारा सूचित किया जाता है।

माना कि तत्त्व ZXA का एक परमाणु है, जिसका द्रव्यमान संख्या A तथा परमाणु संख्या Z है। mp तथा mn क्रमशः प्रोटॉन तथा न्यूट्रॉन का द्रव्यमान है, तो बने न्यूक्लिऑन का द्रव्यमान = Zmp + (A – Z)mn.
माना कि m(ZXA) नाभिक का द्रव्यमान है, तो द्रव्यमान अवगुण

Δm = [Zmp + (A – Z)mn] – m (ZXA)
पैकिंग फ्रैक्शन – प्रति न्यूक्लिऑन द्रव्यमान अवगुण को पैकिंग फ्रैक्शन कहते हैं। इस प्रकार, पैकिंग फ्रैक्शन = Δm/A


Q.5. बंधन ऊर्जा क्या है ? समझाएँ। बंधन ऊर्जा प्रति न्यूक्लिऑन क्या है ?

Ans. बंधन (बाइण्डिग) ऊर्जा – नाभिक में प्रोटॉन तथा न्यूट्रॉन 10-4 मीटर के क्रम में छोटे स्थान में सीमित होते हैं। वैसे छोटी दूरी पर दो प्रोटॉनों के बीच एक-दूसरे पर अत्यधिक विकर्षण बल लगता है। इसलिए नाभिक के बाँधने के लिए कुछ परिणामों में ऊर्जा की आवश्यकता होती है, जिसे नाभिक का बंधन ऊर्जा कहते हैं। वैसे ऊर्जा की आपूर्ति नाभिक के न्यूक्लिऑन द्वारा होती है। द्रव्यमान अवगुण Δm आवश्यक बंधन ऊर्जा की आपूर्ति करता है। इसलिए, द्रव्यमान अवगुण के समतुल्य ऊर्जा को नाभिक की बंधन ऊर्जा कहते हैं।
                आइन्सटीन के द्रव्यमान-ऊर्जा समतुल्यता सम्बन्ध के अनुसार बंधन ऊर्जा = Δmc2 जूल, जहाँ Δm, किलोग्राम में द्रव्यमान अवगुण तथा c प्रकाश का वेग है। किसी नाभिक का बंधन ऊर्जा, अनन्त दूरी में न्यूक्लिऑन के अलग करने में किये गये कार्य को कहा जाता है।
प्रति न्यूक्लिऑन बंधन ऊर्जा – प्रति न्यूक्लिऑन बंधन ऊर्जा वैसी ऊर्जा है जो नाभिक से एक न्यूक्लिऑन के बाहर करने के लिए आवश्यक है। इसका मान न्यूक्लिऑनों की संख्या द्वारा बंधन ऊर्जा में भाग देने पर प्राप्त होता है।

इस प्रकार, प्रति न्यूक्लिऑन बंधन ऊर्जा = बंधन ऊर्जा /A है।


Q.6. नाभिकीय विखण्ड से आप क्या समझते हैं ? समझाएँ।

Ans. नाभिकीय विखण्डन-जब किसी बड़े तत्त्व के नाभिक पर न्यटॉन की बमबारी की जाती है तो उससे दो छोटे-छोटे तत्त्वों का निर्माण होता है, जिसके साथ-साथ अत्यधिक मात्रा में ऊर्जा विमुक्त होती है। इस घटना को नाभिकीय विखण्डन कहते हैं, जैसे-जब यूरेनियम-235 जैसे बने तत्त्वों के नाभिक पर न्यूट्रॉन की बमबारी करने से उसके भारी नाभिक ही लगभग बराबर भागों में क्रमशः बेरियम-141 तथा क्रिप्टन-92 बनाते है साथ ही अत्यधिक मात्रा में ऊर्जा विमुक्त्त होता है, इस घटना को नाभिकी विखण्डन कहते हैं।
                      92U235 + on1 → 92U235 → 56Ba141 + 36Kr92 + 30n1 + 200 Mev
           नाभिक जो इस प्रकार टूटते हैं, वे विखण्डित नाभिक कहलाते हैं। यही परमाणु बम का सिद्धान्त है।
           नाभिक के द्रव बूँद मॉडल नाभिकीय विखण्डन क्रिया की स्पष्ट जानकारी देता है। यूरेनियम-235 के एक विखण्डन में तीन न्यूट्रॉन विमुक्त होता है, जिससे नये विखंडन उत्पन्न होता है, तो यूरेनियम-235 न्यूकेलेइड अत्यधिक मात्रा में अधिक वेग से ऊर्जा विमुक्त करती है, जिसे नाभिकीय शृंखला प्रतिक्रिया कहते हैं। जब ये नियंत्रित नहीं होते हैं तो परमाणु बम हो जाते हैं किन्तु इन्हें नियंत्रित करने पर ये विद्युत उत्पन्न करते हैं।


Q.7. नाभिकीय संलयन क्या है ? समझाएँ।

Ans. नाभिकीय संलयन- नाभिकीय संलयन वैसी घटना या प्रक्रिया है जिसमें दो हलके तत्त्व आपस में मिलकर एक नये तत्त्व बनाते हैं जिसके साथ-साथ अत्यधिक मात्रा में ऊर्जा विमुक्त होती है। यह हाइड्रोजन बम का सिद्धान्त है। यह विश्वास किया जाता है कि सूर्य की ऊर्जा नाभिकीय संलयन
प्रक्रिया के कारण ही है।
               सामान्यतया नाभिकीय संलयन प्रक्रिया संभव नहीं होती है। इस क्रिया के लिए अत्यधिक ताप की आवश्यकता होती है, जिस ताप पर न्यूकेलेइड का संलयन संभव होता है।
                   हाइड्रोजन बम में निम्नलिखित प्रतिक्रियाएँ होती हैं –
1H2 (ड्यूटेरियम) + 1H2 (ड्यूटेरियम) → 2He4(हीलियम) + 23.9 MeV
1H2 (ड्यूटेरियम) + 1H2 (ड्यूटेरियम) → 2He4 + (हीलियम) + 0n1 + 17.6 MeV
       हाइड्रोजन बम परमाणु बम से बहुत ज्यादा विनाशकारी शक्तिवाला है।


Q.8. भारी नाभिक में न्यूट्रॉन की संख्या प्रोटान से ज्यादा क्यों होती है ?

Ans. भारी नाभिक के स्थायित्व के लिए प्रोट्रॉनों के मध्य क्रियाशील प्रतिकर्षण बल को संतुलित करना आवश्यक होता है। इसलिए इस प्रतिकर्षण बल की क्षतिपूर्ति के लिए नाभिक में न्यूट्रॉन की संख्या प्रोटोन की संख्या से अधिक होती है जिससे नाभिक को अधिक नाभिकीय बल मिलता है।।


Q.9. U238 का α-क्षय ऊर्जा की दृष्टि से संभव है तो क्यों नहीं सारे U238 एक साथ क्षय हो जाते हैं। इनका अर्द्धकाल ज्यादा क्यों है?

Ans. क्योंकि किसी भारी नाभिक (92U238) से α-कण का उत्सर्जन होता है जिसकी ऊर्जा लगभग 5.4MeV होती है। इस ऊर्जा के साथ α-कण विभव विरोध (26Mev) की ऊँचाई को पार नहीं कर पाता है। परन्तु रेडियो सक्रिय नाभिक द्वारा उत्सर्जित किसी भी 4-कण की ऊर्जा की मात्रा इतनी नहीं होती है।

फ पदार्थ की स्र्कियता ∞ 

अतः U238 की सक्रियता कम होने के कारण अर्द्धआयु काल अधिक होता है।


Q.10. न्यूक्लियर रिएक्टर में भारी पानी को मंदक के रूप में क्यों प्रयोग किया जाता है ?

Ans. न्यूक्लियर रिएक्टर में विखण्डन अभिक्रिया से उत्सर्जित तीव्रगामी न्यूट्रॉन्स को धीमा करने के लिए मंदक के रूप में भारी जल का उपयोग किया जाता है। ताकि उत्सर्जित न्यूट्रॉन्स धीमे होने से पूर्व विखण्डन योग्य पदार्थ से पलायन कर जाए और श्रृंखला अभिक्रिया नियमित नहीं रह सके।


Q.11. नाभिकीय समीकरण में किन संरक्षण नियमों का पालन किया जाता है ?

Ans. नाभिकीय समीकरण में द्रव्यमान – ऊर्जा संरक्षण नियमों का पालन किया जाता है।
(i) कुल आवेश संरक्षित रहता है।
(ii) न्यूक्लिऑनों की संख्या संरक्षित रहती है।
(iii) कुल ऊर्जा संरक्षित रहती है।


Q.12. बंधक ऊर्जा क्या है ? समझावें बंधन ऊर्जा प्रति न्यूक्लिऑन क्या है ?

Ans. बंधक ऊर्जा – नाभिक में प्रोटॉन तथा न्यूट्रॉन 10-4 मीटर के क्रम में छोटे स्थान में सीमित होते हैं। वैसी छोटी दूरी पर दो प्रोटॉनों के बीच एक-दूसरे पर अत्यधिक विकर्षण-बल लगता है। इसलिए नाभिक के बाँधने के लिए कुछ परिणामों में ऊर्जा की आवश्यकता होती है, जिसे नाभिक का बंधक ऊर्जा कहा जाता है।
              प्रति न्यूक्लिऑन बंधक ऊर्जा – प्रति न्यूक्लिऑन बंधन ऊर्जा वैसी औसत ऊर्जा है, जो नाभिक से एक न्यूक्लिऑन बाहर करने के लिए आवश्यक है। इसका मान न्यूक्लिऑनों की संख्या द्वारा बंधन ऊर्जा में भाग देने पर प्राप्त होता है।

∴ प्रति न्यूक्लिऑन बंधन ऊर्जा = 


Q.13. रेडियोसक्रियता से आप क्या समझते हैं ? क्यूरी क्या है ?

Ans. रेडियोसक्रियता – जब किसी तत्त्वों या, यौगिकों में यों ही स्वतः कुछ विभेदित विकिरण उत्सर्जित होते रहते हैं, जो कि फोटोग्राफी प्लेट को प्रभावित करते हैं, तो उस प्रकार की घटना रेडियोसक्रियता कहलाती है तथा जिस पदार्थ में यह घटना होती है, उसे रेडियोसक्रिय पदार्थ या, तत्त्व कहते हैं। जैसे-U, Po, Th इत्यादि।
                    हेनरी बेक्वेरल द्वारा 1895 ई० में सर्वप्रथम रेडियोसक्रियता का आविष्कार किया गया। फिर 1998 ई० में मैडम क्यूरी तथा स्मीडर द्वारा और फिर 1902 ई० में मैडम क्यूरी ने अपने पति पेरी क्युरी के साथ विशेष रूप से ‘Ra’ तथा ‘Po’ रेडियोसक्रिय तत्त्वों का आविष्कार किया। भारी तत्त्वों के परमाणु के विघटन में α, β तथा γ-किरणों के उत्सर्जन की घटना को रेडियोसक्रियता कहते हैं। किसी पदार्थ की रेडियोसक्रियता बाहरी तापक्रम एवं दाब पर प्रभावित नहीं होती है।
            रेडियोसक्रियता की इकाई को क्यूरी कहते हैं।


Q.14. रेडियोसक्रियता के नियमों को लिखें।

Ans. प्रथम नियम – रेडियोसक्रियता एक स्वतः घटनेवाली घटना है, जो कि भौतिक कारणों (अर्थात् तापमान, दाब) पर निर्भर नहीं करता है।
          द्वितीय नियम – किसी रेडियोसक्रिय तत्व के विघटन में -कण या B कण उत्सर्जित हो सकते हैं, दोनों एक साथ नहीं।
          ततीय नियम – किसी रेडियोसक्रिय तत्त्व के विघटन होने वाले परमाणु की संख्या उस समय मौजूद परमाणु संख्या के सीधी समानुपाती होता है।

14. अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी : पदार्थ, युक्तियाँ तथा साधारण परिपथ ( Short Answer Type Question )

14. अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी : पदार्थ, युक्तियाँ तथा साधारण परिपथ

Q. 1. ठोस में किस प्रकार ऊर्जा पट्टी (बैण्ड) बनता है ? समझाएँ।

अथवा, ठोसों में ऊर्जा पट्टी के बनावट की व्याख्या उपयुक्त आरेख द्वारा करें।

Ans⇒ ठोसों में ऊर्जा पट्टी (बैण्ड) – ठोसों में परमाणु अपने पड़ोसी परमाणुओं द्वारा घिरा होता है तथा परमाणु में इलेक्ट्रॉन के इस ऊर्जा स्तर के कारण केवल सबसे बाहरी कक्षाओं में रूपान्तरित होता है, क्योंकि सबसे बाहरी कक्षाओं में इलेक्ट्रॉन एक से अधिक परमाणु द्वारा साझेदारी करता है।
                  माना कि एक छोटा सिलिकॉन के रवा N परमाणु से बना है सिलिकॉन के परमाणु की इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 1s2, 2s2p2, 3s23p2 है। इसके बाहरी कक्षा के 3s उपकक्षा में 2 इलेक्ट्रॉन तथा 3p उपकक्षा में 2 इलेक्ट्रॉन होते हैं। सबसे बाहरी कक्षा में, 2n s-स्तर 2N इलेक्ट्रॉन द्वारा पूरे भरे होते हैं। जबकि 6N के बाहर सबसे बाहरी कक्षा में, p-स्तर में, केवल 2N भरे होते हैं। चित्रानुसार सिलिकॉन परमाणु में ऊर्जा स्तर प्रदर्शित है।
चित्रानुसार सिलिकॉन परमाणु में ऊर्जा स्तर प्रदर्शित है।

           सिलिकॉन परमाणु में वास्तविक अन्तर परमाण्विक विलगाव को r = a द्वारा व्यक्त किया जाता है।
           माना कि सिलिकॉन परमाणु एक-दूसरे के नजदीक रखे हैं। इस तरह की रवा लैटिस में अंतिम वास्तविक स्थिति (r = a) है।
(i) जब r = d1 है तो एक परमाणु के सबसे बाहरी कक्षा में इलेक्ट्रॉन एक-दूसरे के साथ नहीं मिलते हैं। इसलिए, d पर N परमाणु के प्रत्येक का अपना ऊर्जा स्तर होता है।

(ii) जब r = d2 है, तो सबसे बाहरी कक्षाओं (3s2 तथा 3p2) के इलेक्ट्रॉनों के बीच दूरी हो जाती है, जिसके कारण प्रत्येक परमाणु के स्तर 3s तथा 3p के ऊर्जा कुछ रूपान्तरित हो जाते हैं। इसलिए वहाँ अधिक संख्या के सटे रिक्त ऊर्जा स्तर हो जाता है। 2N, s-स्तर को समान ऊर्जा नहीं होता है, किन्तु छोटे ऊर्जा पट्टी (बैण्ड) में फैल जाते हैं। उसी प्रकार 6N, p-स्तर पर भी छोटे ऊर्जा बैण्ड में फैल जाते हैं। फलस्वरूप विलगित परमाणु के s तथा p स्तर के बीच ऊर्जा अन्तराल कम हो जाता है।

(iii) जब r = d है, तो 3s तथा 3p स्तरों के बीच ऊर्जा गायब हो जाते हैं और सभी 8N स्तर (2N s-स्तर तथा 7N p-स्तर) एक ऊर्जा बैण्ड बनाते हुए नियमित रूप में बँट जाता है।

(iv) जब r = a है, तो 4N भरे स्तरों के बैण्ड तथा 4N रिक्त ऊर्जा स्तरों के बैण्ड, एक ऊर्जा गैप द्वारा एक-दूसरे से अलग हो जाते हैं। 4N भरे स्तरों के निम्न ऊर्जा बैण्ड को (वैलेन्स बैण्ड) संयोजी पट्टी कहते हैं, जबकि 4N खाली स्तरों के उच्च ऊर्जा बैण्ड को चालन पट्टी (कण्डक्शन बैण्ड) कहते हैं। दोनों के बीच के ऊर्जा अन्तराल को फॉरबिडेन ऊर्जा अन्तराल कहते हैं।
          उच्चतम ऊर्जा स्तर जिसके शून्य केल्विन पर वैलेन्स बैण्ड में एक इलेक्ट्रॉन रह सकता है, फर्मी स्तर कहलाती है। तापक्रम के बढ़ने पर इलेक्ट्रॉन ऊर्जा अवशोषित करता है तथा उत्तेजित हो जाता है। उत्तेजित इलेक्ट्रॉन उच्च ऊर्जा स्तरों पर कूद जाता है। उच्च ऊर्जा स्तरों में ये इलेक्ट्रॉन तुलना में नाभिक से अधिक दूर होते हैं तथा निम्न ऊर्जा स्तरों में इलेक्ट्रॉनों की तुलना में अधिक मुक्त होते हैं। वैलेन्स बैण्ड तथा कण्डक्शन बैण्ड के तुलनात्मक स्थिति पर निर्भर करते हुए ठोस कण्डक्शन (चालक), अचालक तथा अर्द्ध-चालक की तरह आचरण करते हैं।


Q. 2. सौर सेल क्या है ? इसकी उपयोगिता कृत्रिम उपग्रहों में क्या है ? समझाएँ।

Ans⇒ सौर-सेल – सौर सेल ऐसी युक्ति है जो सौर ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करती है। सैलेनियम से तैयार किये गए सौर से आपतित प्रकाश ऊर्जा का 0.6% ही विद्युत में परिवर्तित कर सकते हैं। आजकल सौर सेल प्रायः सिलिकॉन, जरमेनियम तथा गैलियम जैसे अर्द्धचालकों के बनाए जाते हैं, जिनकी दक्षता अधिक होती है
                 वैसी संधि डायोड जिसमें P- या N- प्रकार में एक को बहुत पतला इस प्रकार बनाया जाता है कि डायोड पर पड़ते हुए प्रकाश ऊर्जा उसकी संधि पर पहुँचने के पहले ज्यादा अवशोषित नहीं होता है, प्रकाश ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करते हैं, सौर सेल कहलाते हैं। जैसे- प्रकाश-चालकीय सेल जिसका वर्णन इसके पहले यूनिट में प्रकाश-विद्युत (फोटो) सेल में है।
प्रकाश पड़ने पर अर्द्धचालकों की चालकता बढ़ जाती है। सौर सेल में अपद्रव्य मिश्रित अर्द्धचालक पदार्थ की परतें इस प्रकार व्यवस्थित की जाती है कि प्रकाश पड़ने पर उसके दो भागों में विभवान्तर उत्पन्न हो जाता है।
सौर सेल में अपद्रव्य मिश्रित अर्द्धचालक पदार्थ की परतें

वर्ग सेमी आकार के सौर सेल द्वारा 60 मिली ऐम्पियर धारा लगभग 0.4 से 0.5 वोल्ट पर उत्पन्न होती है। सौर सेल पैनेल में अनेक सौर सेल विशेष क्रम में व्यवस्थित होते हैं, जिससे विभिन्न कार्यों के लिए पर्याप्त परिणाम में विद्युत प्राप्त की जा सकती है।

               सौर सेल पैनेल का उपयोग कृत्रिम उपग्रह में किया जाता है।
               सौर सेल के अन्य उपयोग निम्नलिखित हैं –
       (a) समस्त कृत्रिम उपग्रहों तथा अंतरिक्ष अन्वेषक यान मुख्यतः सौर पैनलों द्वारा उत्पादित विद्यत पर निर्भर करता है।
      (b) यह प्रकाश व्यवस्था, जल पम्पों, रेडियो तथा दूरदर्शन के अभिग्राहियों को प्रचालित करने में उपयोगी है।
      (c) यह प्रकाश ग्रह में तथा तट से दूर निर्मित खनिज तेल के कुएँ खोदने के रिंग को विद्युत ऊर्जा प्रदान करने में उपयोगी है।


Q. 3. चालकों के लक्षणों की व्याख्या ऊर्जा पट्टी (बैण्ड) के आधार पर करें।

ऊर्जा बैण्ड के आधार पर चालकों के लक्षणों के व्याख्या -

Ans⇒ ऊर्जा बैण्ड के आधार पर चालकों के लक्षणों के व्याख्या –
चित्रानुसार धातुओं (चालकों) की ऊर्जा बैण्ड रचना वैसी होती है जिसमें कण्डक्शन बैण्ड तथा वैलेन्स बैण्ड कण्डक्शन बैण्ड एक-दूसरे से ओवरलैप (एक दूसरे पर चढ़े) होते हैं या कण्डक्शन बैण्ड अंशतः भरे होते हैं।

Zn में वैलेन्स बैण्ड कण्डक्शन बैण्डों पर चढ़े होते हैं तथा Na में अंशतः भरे होते हैं। फर्मी स्तर के नीचे से बहुत-से इलेक्ट्रॉन उच्च स्तरों में जा सकते हैं, जो कि फर्मी स्तर के ऊपर होते हैं।

 वैसे इलेक्ट्रॉन मुक्त इलेक्ट्रॉन की भाँति व्यवहार करते हैं। जब चालकों से विद्युत क्षेत्र आरोपित किया जाता है तो ये मुक्त इलेक्ट्रॉन विद्युतीय क्षेत्र की दिशा के विपरीत दिशा में गतिशील हो जाते हैं। दूसरे शब्दों में उससे एक धारा प्रवाहित करना प्रारम्भ करने पर विद्युतीय क्षेत्र आरोपित हो जाता है तथा वैसा ठोस चालक कहा जाता है।


Q. 4. ट्रान्जिस्टर क्या है ? N-P-N तथा P-N-P ट्रान्जिस्टर में अंतर स्पष्ट करें।

Ans⇒ ट्रान्जिस्टर – ट्रान्जिस्टर एक अर्द्ध-चालक युक्ति है जिसका व्यवहार प्रवर्धन, दोलित्र आदि के लिए होता है। यह एक तीन सेक्सन अर्द्धचालक है। तीनों सेक्सन इस प्रकार संयोजित होते हैं कि दो के किनारों को समान प्रकार का वाहक होता है। जब सेक्शन उसे अलग करता है तो विपरीत प्रकृति के वाहक प्राप्त होते हैं। इसलिए यह दो प्रकार का N-P-N तथा P-N-P ट्रान्जिस्टर होता है। इसके तीनों सेक्शन उत्सर्जक E, आधार B तथा संग्राहक C कहलाते हैं।

इसमें तीर के निशान इलेक्ट्रॉन के प्रवाह की दिशा के विपरीत धारा की दिशा

N-P-N ट्रान्जिस्तिर – चित्रानुसार (a) द्वारा N-प्रकार अर्द्ध-चालक के दो छोटे क्रिस्टल के बीच एक बहुत पतला टुकड़ा P-प्रकार का अर्द्धचालक होता है। केन्द्रीय टुकड़े, आधार (B) कहलाते हैं। जबकि बायीं तथा दायीं क्रिस्टल क्रमशः उत्सर्जक (E) तथा संग्राहक (C) कहलाते हैं।
               इसमें उत्सर्जक (E) को ऋणात्मक विभव दिया जाता है जबकि संग्राहक (C) को आधार के सापेक्ष धनात्मक विभव दिया जाता है।
               पुनः उत्सर्जन आधार N-P संधि बायीं तरफ अग्र अभिनति (फॉरवर्ड बायसित) होते हैं; जबकि आधार-संग्राहक P-N संधि बायीं तरफ पश्च अभिनति (रिवर्स बायसित) होते हैं। N-P-N ट्रान्जिस्टर के संकेत (b) चित्रानसार प्रदर्शित है। इसमें तीर के निशान इलेक्ट्रॉन के प्रवाह की दिशा के विपरीत धारा की दिशा को प्रदर्शित करते हैं।

P-N-P ट्राजिस्टर – चित्रानुसार (a) द्वारा P-प्रकार के अर्द्धचालक दो छोटे क्रिस्टलों के बीच एक बहुत पतले टुकड़े N-प्रकार के अर्द्ध चालक हैं। केन्द्रीय टुकड़े आधार (B) कहलाते हैं जबकि बायीं तथा दायीं तरफ के क्रिस्टल क्रमशः उत्सर्जक (E) तथा संग्राहक (C) कहलाते हैं। उत्सर्जक को धनात्मक विभव दिया जाता है जबकि आधार के सापेक्ष संग्राहक को ऋणात्मक विभव दिया जाता है। इस प्रकार बायी तरफ उत्सर्जक आधार P-N संधि फॉरवर्ड बायस्ड होते हैं जबकि आधार संग्राहक N-P संधि दायीं तरफ रिवर्स बायस्ड होता है। इसका संकेत (b) चित्रानुसार प्रदर्शित है, जिसमें तीर की दिशा धारा की दिशा विवरों (होलों) के प्रवाह की दिशा को प्रदर्शित करता है।
के प्रवाह की दिशा को प्रदर्शित करता है।

संकेत में P-N-P तथा N-P-N ट्रान्जिस्टर में अन्तर क्रमशः उत्सर्जक के विपरीत दिशा के तरफ तीर के निशान तथा उसकी दिशा की तरफ तीर की निशान को प्रदर्शित करते हैं।


Q. 5. बीट क्या है ? समझाएँ।

Ans⇒ बाइनरी संख्या के प्रत्येक अंक को बीट कहा जाता है। प्रथम अक न्यूनतम महत्त्वपूर्ण बीट (L. S. B.) कहा जाता है, जबकि अंतिम अंक अधिकतम महत्त्वपूर्ण बीट (M. S. B.) कहा जाता है। बाइनरी संख्या पद्धति के आधार 2 होते हैं। दशमलव संख्या पद्धति में इकाई स्थान में अंक का गुणज 101 होता है, दसवें स्थान में अंक का गुणज 102 होता है, सौवें स्थान में अंक का गुणज 102 होता है और सो ऑन । बाइनरी संख्या पद्धति में अंक का गुणज 20, 21, 22………M. S. B. होता है।


Q. 6. बूलियन बीजगणित से आप क्या समझते हैं ?

Ans⇒ बूलियन बीजगणित – कम्प्यूटर पद्धति का इलेक्ट्रॉनिक परिपथ बलियन बीजगणित के सिद्धांत पर आधारित है। यह तार्किक कथन के साथ प्रस्तुत होता है कि उसके केवल दो मान या तो सही या गलत मान होता है। तार्किक कथन बूलियन चर कहलाते हैं, जिसके एक मान या तो सही या गलत होता है। बूलियन चर का सही मान 1 द्वारा तथा गलत मान 0 द्वारा व्यक्त होता है। इलेक्ट्रॉनिक परिपथों में 1 तथा 0 संकेतों को, परिपथ अवयव जैसे स्विच, डायोड या ट्रान्जिस्टर को एक्टिव (active) तथा पैसिव (passive) अवस्था में निरूपित किया जाता है।

बुलियन बीजगणित में तीन बेसिक संचालक व्यवहार किये जाते है –
         (i) OR, (ii) AND तथा (iii) NOT ।
         (i) अतिरिक्त संकेत (+) को OR रूप में लिखा जाता है। इसका बूलियन व्यंजक निम्नलिखित हैं –
Y = A + B मतलब कि Y बराबर है A OR B

(ii) गुणा चिह्न (× या .) को AND रूप में लिखा जाता है। इसका बलियन व्यंजक निम्नलिखित हैं –
Y = A. B या A x B मतलब कि Y बराबर है A AND B.

(iii) बार संकेत (-) को NOT की तरह लिखा जाता है। इसका बूलियन व्यंजक निम्नलिखित है Y = A मतलब कि Y बराबर है NOT A NOT ऑपरेशन को नेगेशन भी कहा जाता है।


Q. 7. तार्किक द्वार क्या है ? समझाएँ।

Ans⇒ तार्किक द्वार – बायनरी सूचना के मनीपुलेशन (manipulation) तार्किक परिपथ द्वारा होता है, जिसे द्वार कहते हैं। द्वारा आंकित परिपथ होता है जो निविष्ट (इनपुट) तथा बहिर्गत (आउटपुट) वोल्टता के बीच तार्किक सम्बन्ध बताता है। इसलिए यह तार्किक द्वार कहलाता है।
               तार्किक द्वार सामान्यतया आंकिक कम्प्यूटर में पाया जाता है। तीन प्रकार के बेसिक द्वार होते हैं जिसे OR द्वार, AND द्वार तथा NOT द्वार कहते हैं। प्रत्येक द्वार ग्राफिक संकेतों द्वारा प्रदर्शित होता है तथा इसका संचालन बूलियन बीजगणित फलन के सहारे वर्णित होता है। प्रत्येक द्वार के लिए बायनरी चारों का सम्बन्ध इनपुट-आउटपुट सत्यता सारणी में निरूपित किया जाता है।


Q. 8. सत्यता सारणी क्या है ?

Ans⇒  सत्यता सारणी – सत्यता सारणी वैसी सारणी होती है जो तार्किक द्वार के लिए सभी इनपुट/आउटपुट संभावनाओं को दिखाती है। इसे संयोगिता की सारणी भी कहा जाता है| OR द्वार, AND द्वार तथा NOT द्वार की सत्यता सारणी निम्नलिखित हैं :
सत्यता सारणी क्या है


Q.9. XOR द्वार से आप क्या समझते हैं ?

Ans⇒ XOR द्वार – XOR द्वार वैसा द्वार है जो OR, AND तथा NOT द्वार के व्यवहार से प्राप्त होता है। इसे एक्सक्लुसिव OR द्वार भी कहा जाता है। चित्रानुसार (a) द्वार XOR द्वार चित्रानुसार (b) द्वारा इसके तार्किक संकेत तथा चित्रानुसार (b) द्वारा इसकी सत्यता सारणी प्रदर्शित है।
XOR द्वार से आप क्या समझते हैं ?

XOR द्वार से आप क्या समझते हैं ?
(c) XOR द्वार की सत्यता सारणी
XOR द्वार की स्थिति में आउटपुट केवल 1 है, जबकि इनपुट अनेक होते हैं।


Q. 10. OR द्वार, NOR द्वार, AND द्वार तथा NAND द्वार के तार्किक संकेत खींचें।

Ans⇒  OR द्वार के तार्किक संकेत :
..................... निविष्ट (इनपुट) बहिर्गत (आउट पुट) NOR द्वार के तार्किक संकेत: ................. निविष्ट (इनपुट) बहिर्गत (आउट पुट) AND द्वार के तार्किक सकेत : ................... निविष्ट (इनपुट) बहिर्गत (आउट पुट) NAND द्वार के तार्किक संकेत निविष्ट (इनपुट) बहिर्गत (आउटपुट)
निविष्ट (इनपुट) बहिर्गत (आउट पुट)
NOR द्वार के तार्किक संकेत:
..................... निविष्ट (इनपुट) बहिर्गत (आउट पुट) NOR द्वार के तार्किक संकेत: ................. निविष्ट (इनपुट) बहिर्गत (आउट पुट) AND द्वार के तार्किक सकेत : ................... निविष्ट (इनपुट) बहिर्गत (आउट पुट) NAND द्वार के तार्किक संकेत निविष्ट (इनपुट) बहिर्गत (आउटपुट)
निविष्ट (इनपुट) बहिर्गत (आउटपुट)
AND द्वार के तार्किक सकेत :
..................... निविष्ट (इनपुट) बहिर्गत (आउट पुट) NOR द्वार के तार्किक संकेत: ................. निविष्ट (इनपुट) बहिर्गत (आउट पुट) AND द्वार के तार्किक सकेत : ................... निविष्ट (इनपुट) बहिर्गत (आउट पुट) NAND द्वार के तार्किक संकेत निविष्ट (इनपुट) बहिर्गत (आउटपुट)
निविष्ट (इनपुट) बहिर्गत (आउटपुट)
NAND द्वार के तार्किक संकेत:
. निविष्ट (इनपुट) बहिर्गत (आउटपुट) .
निविष्ट (इनपुट) बहिर्गत (आउटपुट)

Q. 11. दिए गए NOR द्वारा युक्त परिपथ की सत्यमान सारणी लिखिए और इस परिपथ द्वारा अनुपालित तर्क संक्रियाओं (OR, AND, NOT) को अभिनिर्धारित कीजिए।
. निविष्ट (इनपुट) बहिर्गत (आउटपुट) .

Ans⇒ 
1. ⇒ NOR द्वार
2. ⇒ NOR द्वार

निविष्ट (इनपुट) बहिर्गत (आउटपुट) .
निविष्ट (इनपुट) बहिर्गत (आउटपुट) .

Q. 12. नैज अर्द्ध चालक क्या है ? किसी नैज अर्द्धचालक को आप बाह्य n-अर्द्धचालक में कैसे परिवर्तित करेंगे

Ans⇒ नैज अर्द्धचालक – नैज अर्द्धचालक वैसा शुद्ध अर्द्धचालक होता है, जो किसी भी प्रकार के अशुद्धि से मुक्त होता है। किसी नैज अर्द्धचालक को पंच संयोजी परमाणुओं से अपमिश्रित कर बाह्य n-अर्द्धचालक में परिवर्तित किया जा सकता है।


Q. 13. किसी नैज अर्द्धचालक का अपमिश्रण से आप क्या समझते हैं ? अपमिश्रण किसी अर्द्धचालक के चालकता को किस प्रकार प्रभावित करता है ?

Ans⇒  किसी नैज अर्द्धचालक में उचित अशुद्धियों को 106 : 1 अनुपात में मिलाने की विधि को अपमिश्रण कहा जाता है।
             किसी अर्द्धचालक की चालकता अपमिश्रण करने से बढ़ता है, क्योंकि प्रत्येक अपमिश्रित परमाणु एक मुक्त आवेश वाहक देता है।


Q.14. n-अर्द्धचालक तथा p-अर्द्धचालक में क्या अंतर है ?

Ans⇒ 

n-अर्द्धचालकP-अर्द्धचालक
(i) किसी शुद्ध अर्द्धचालक का पंच संयोजी परमाणु (अर्थात् P, As) से अपमिश्रण से n-अर्द्धचालक बनता है।(i) किसी शुद्ध-अर्द्धचालक का त्रिसंयोजी परमाणु (अर्थात् Al, In) से अपमिश्रण से p-अर्द्धचालक बनता है।
(ii) इनमें इलेक्ट्रॉन बहुमत आवेश वाहक है।(ii) इनमें छिद्र बहुमत आवेश वाहक है।

Q. 15. ट्रांजिस्टर α में तथा β क्या है ?

Ans⇒  उभयनिष्ठ आधार प्रवर्धक का विद्युत लाभ है।
यह 0.95 से 0.98 तक बदलता है।
β ⇒ उभयनिष्ठ उत्सर्जक प्रवर्धक का विद्युत लाभ है।
उभयनिष्ठ उत्सर्जक प्रवर्धक का विद्युत लाभ है।

β का मान 19 से 49 तक बदलता है।


Q. 16. p-अर्द्धचालक कैसे बनता है ? इसमें मौजूद बहुमत आवेश-वाहक के नाम लिखें। इसके लिए ऊर्जा-पट्टी चित्र बनाएँ।

Ans⇒  किसी शुद्ध अर्द्धचालक का त्रि-संयोजी परमाणु (अर्थात् Al, In) से अपमिश्रण से अर्द्धचालक बनता है। इसमें मौजूद बहुमत आवेश वाहक छिद्र होते हैं।

p-अर्द्धचालक कैसे बनता है ? इसमें मौजूद बहुमत आवेश-वाहक के नाम लिखें। इसके लिए ऊर्जा-पट्टी चित्र बनाएँ

Q.17. p-अर्द्धचालक के लिए ऊर्जा-पट्टी चित्र बनाएँ । तापमान के बढ़ने के साथ-साथ किस प्रकार ऊर्जा-पट्टी अंतराल परिवर्तित होता है ?

Ans⇒

 p-अर्द्धचालक कैसे बनता है ? इसमें मौजूद बहुमत आवेश-वाहक के नाम लिखें। इसके लिए ऊर्जा-पट्टी चित्र बनाएँ
तापमान के बढ़ने से कुछ बंधन टूटते हैं तथा मुक्त इलेक्ट्रॉन तथा छिद्र उत्पन्न करते हैं। इनकी उपस्थिति ऊर्जा-पट्टी अंतराल को घटाती है।


Q. 18 भैलेन्स बैंड, कंडक्शन बैंड एवं फारबिडेन बैंड में अंतर स्पष्ट करें।

Ans⇒ Valence energy band में Valence electrons होते हैं। यह आंशिक या पूर्णतः इलेक्ट्रॉन से भरा रहता है। यह कभी खाली नहीं होता। इस बैंड में इलेक्ट्रॉन में बाहरी विद्युतीय क्षेत्र से ऊर्जा लेने की क्षमता नहीं होती है। अतः इस बैंड में उपस्थित electrons धारा प्रवाह में कोई योगदान नहीं करते हैं।
               Forbidden energy gap में इलेक्ट्रॉन नहीं रहते हैं। यह पूर्णतः खाली रहता है। इलेक्ट्रॉन को Valence band से conduction band में इलेक्ट्रॉन को shift करने के लिए आवश्यक ऊर्जा को band gap energy (Eg) कहते हैं।

15. संचार व्यवस्था ( Short Answer Type Question )

15. संचार व्यवस्था

1. ग्रीन हाउस प्रभाव क्या है ? इसकी क्या उपयोगिताएँ हैं ?

Ans⇒ ग्रीन हाउस प्रभाव सूर्य से आने वाले विद्युत् चुम्बकीय विकिरणों में से दृश्य प्रकाश के साथ केवल लघु तरंगदैर्ध्य के बहुत कम अवरक्त विकिरण ही वायुमंडल से होकर पृथ्वी तक पहुँच पाते हैं जिससे पृथ्वी गर्म हो जाती है। प्रत्येक गर्म वस्तु के अवरक्त्त विकिरण के उत्सर्जित करने के कारण पृथ्वी भी अपनी सतह से अवरक्त्त उत्सर्जित करने के कारण पृथ्वी भी अपनी सतह से अवरक्त्त विकिरण उत्सर्जित करती है। किन्तु, पृथ्वी से उत्सर्जित ये अवरक्त्त विकिरण वायुमण्डल की परतों को पार नहीं कर पाते हैं, बल्कि वायुमंडल के नीचे की परतों से ही परावर्तित होकर पृथ्वी पर वापस आ जाते हैं।
                  इस प्रकार, पृथ्वी तल के समीप अवरक्त विकिरण बढ़ जाते हैं तथा इस पर की वस्तुएँ इन विकिरणों को अवशोषित करके गर्म हो जाती है। इसे ग्रीन हाउस प्रभाव कहते हैं। इसी प्रकार के कारण पृथ्वी का तल गर्म बना रहता है। Download Question PDF


2. पृथ्वी के वायुमण्डल में ओजोन परत का क्या महत्त्व है ?

Ans⇒ सूर्य से उत्सर्जित विकिरणों में पराबैंगनी विकिरण तथा एक्स-किरणें मनुष्यों एवं अन्य जीव-जन्तुओं के साथ-साथ पौधों के लिए हानिकारक होती है। पृथ्वी के वायुमण्डल की ओजोन परत इन विकिरणों को अवशोषित कर लेती है तथा उन्हें पृथ्वी पर नहीं पहँचने देती है। ।


3. आयन मंडल क्या है ? रेडियो तरंगों के प्रसारण में इसकी क्या भूमिका है ?

Ans⇒ आयन मंडल – पृथ्वी तल से लगभग 80 किलोमीटर से 300 किमी. ऊँचाई तक फैले क्षेत्र को आयन मंडल कहते हैं। जैसे-जैसे इस क्षेत्र में ऊँचाई पर जाते हैं, इसका ताप बढ़ता जाता है। इस क्षेत्र में वायुमंडल का दाब बहुत कम होता है। सूर्य से आने वाली एक्स-किरणें तथा पराबैगनी विकिरण इस क्षेत्र में अवशोषित हो जाते हैं, जिससे उपस्थित वायु का आयनीकरण हो जाता है। अतः इस क्षेत्र में मुक्त इलेक्ट्रॉन तथा धनावेशित आयन पाये जाते हैं। पृथ्वी तल से लगभग 110 किमी. ऊँचाई पर इलेक्ट्रॉन घनत्व सर्वाधिक होता है और फिर ऊँचाई बढ़ने पर इलेक्ट्रॉन घनत्व घटता जाता है।
आयन मंडल क्या है ? रेडियो तरंगों के प्रसारण में इसकी क्या भूमिका है

रेडियो तरंगों के प्रसारण में आयन मंडल की भूमिका – जब पृथ्वी तल से प्रेषित रेडियो तरंगें आयन मण्डल में प्रवेश करती हैं जो इसमें उपस्थित इलेक्ट्रॉनों तथा आयनों के कारण धाराएँ उत्पन्न हो जाती हैं, फलस्वरूप माध्यम अपेक्षाकृत विरल माध्यम की तरह व्यवहार करता है। इसलिए रेडियो तरंग जब नीचे के बिना आयनित माध्यम से आयनित माध्यम में प्रवेश करती है तो अपने मार्ग से विचलित होकर आयन मंडल में आपतन बिन्दु पर खींचे गये अभिलम्ब से दूर हट जाती है। जैसे-जैसे आयन मंडल में तरंग प्रवेश करती है, माध्यम का अपवर्त्तनांक घटता है, जिससे तरंग का विचलन बढ़ता जाता है। इस प्रकार, चित्रानुसार आयन मंडल पर आपतित रेडियो तरंगों का आपतन कोण किसी विशेष कोण से अधिक होने पर तरंगें आयन मंडल की परतों द्वारा पूर्ण आन्तरिक परावर्तित हो जाती हैं।


4. पृथ्वी तल पर टेलीविजन सिगनल को एक स्थान से दूसरे स्थान तक किस विधि से भेजा जाता है तथा टेलीविजन कार्यक्रम प्रसारण की आवृत्ति परास क्या है ?

Ans⇒  चित्रानुसार माना कि AB टेलीविजन सिगनल का प्रेषित एण्टीना है, जिसकी पृथ्वी तल से ऊँचाई h है। स्पष्ट है कि पृथ्वी की वक्रता त्रिज्या के कारण प्रेषित एण्टीना B से भेजे गये सिगनल पृथ्वी तल पर अधिक-से-अधिक दूर स्थित P तथा ए बिन्दुओं पर पहुंचते हैं।
                माना कि पृथ्वी की त्रिज्या OP = OA = R है तथा दूरी BP = BQ = d है, तो समकोण △ OPB से हम पाते हैं कि OB2 = OP2 + PB2
या, (R+ h)2 = R2 + d2            या, R2 + d2 = 2Rh = R2 + d2
या, d2 = h2 + 2hR                  चूंकि h < < R, अत: d = 2hR के
आयन मंडल क्या है ? रेडियो तरंगों के प्रसारण में इसकी क्या भूमिका है


5. पृथ्वी पर रेडियो तरंगों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक भेजने की कौन-कौन-सी विधियाँ हैं ? समझाएँ। प्रत्येक विधि की आवृत्ति परास लिखें।

Ans⇒  रेडियो तरंगों को पृथ्वी पर एक स्थान से दूसरे स्थान तक भेजने की अग्रलिखित तीन विधियाँ हैं –

1. भू-तरंग द्वारा- इस विधि में रेडियो तरंगों सीधे एक स्थान से दूसरे स्थान तक पृथ्वी के तल के अनुदिश भेजी जाती हैं। अतः यह तरंग पृथ्वी की वक्रता के कारण मुड़ सकती है। चित्रानुसार तरंग-1, भू-तरंग है। इस विधि द्वारा 1500 किलो-हर्टज से कम आवृत्ति वाली रेडियो तरंगें ही संचरित की जा सकती हैं। इसे मीडियम तरंग बैण्ड कहते हैं।

इस विधि में प्रेषित एण्टीना से रेडियो तरंगों को

2. आकाश तरंग द्वारा – इस विधि में प्रेषित एण्टीना से रेडियो तरंगों को पृथ्वी तल से अल्प कोण बनाते हुए भेजा जाता है, जो क्षोभ मण्डल से परावर्तित होकर अभिग्राही एण्टीना पर पहुँच जाती है। इसे तरंग-2 द्वारा दिखाया गया है। इस विधि द्वारा लगभग 2000 किलो-हर्टज तक की आवृत्ति की रेडियो तरंगों को संचरित किया जा सकता है।

3. व्योम तरंग द्वारा – इस विधि में प्रेषित एण्टीना से लगभग ऊर्ध्वाधर प्रेषित तरंगें आयन मण्डल से परावर्तित होकर अभिग्राही एण्टीना पर पहुँचती हैं। इसे तरंग 3 द्वारा दर्शाया गया है। इस विधि द्वारा 1500 किलो-हर्टज से 40 मेगा हर्टज आवृत्ति वाली रेडियो तरंगें प्रसारित की जाती हैं। इसे लघु तरंग बैण्ड कहते हैं।


6. माइक्रो तरंग क्या है ? इसके प्रमुख उपयोग लिखें।

Ans⇒ माइक्रो तरंग – वे विद्युत-चुम्बकीय तरंगें जिनकी तरंगदैर्घ्य मि० मी० की कोटि के तथा आवृत्ति परास 3 x 1011 – 3 x 108 हर्टज होती हैं, माइक्रो तरंगें कहलाती हैं। इसका संसूचन क्रिस्टल संसूचक या अर्द्धचालक डायोड द्वारा होता है। इसका एक स्थान से दूसरे स्थान तक प्रसारण भू-स्थायी उपग्रह या संचार उपग्रह द्वारा किया जाता है।

उपयोग – माइक्रो तरंगों का मुख्य उपयोग रडार में दुश्मन के हवाई जहाज की स्थिति का पता लगाने के लिए किया जाता है। रडार द्वारा एक निश्चित दिशा में माइक्रो तरंगें प्रेषित की जाती हैं। ये तरंगें हवाई जहाज से परावर्तित होकर वापस उसी दिशा में लौट जाती हैं। इस प्रकर प्रेषित तथा अभिग्रहीत तरंगों का समय अन्तर ज्ञान होने पर हवाई जहाज की दूरी की गणना की जा सकती है।


7. संचार तंत्र क्या है ? समझाएँ।

Ans⇒  संचार तंत्र – सूचना प्रौद्योगिकी के विकास में संचार साधनों की भूमिका महत्त्वपूर्ण है। आज अर्द्धचालक इलेक्ट्रॉनिक युक्तियों, संचार उपग्रहों एवं कम्प्यूटर नेटवर्क ने संचार माध्यम को इतना प्रभावी कर दिया कि विश्व के किसी भी स्थान में घटने वाली घटनाओं की क्षण-प्रतिक्षण जानकारी घर बैठे प्राप्त की जा रही है। चित्रानुसार संचार तंत्र को सामान्यतः तीन भागों में बाँटा गया है –
इस विधि में प्रेषित एण्टीना से रेडियो तरंगों को

          (a) प्रेषण (b) संचरण तथा (c) अभिग्रहण।
          प्रेषित्र से ग्राही में मध्य रेडियो तथा माइक्रो (सूक्ष्म) तरंगों के संचरण द्वारा प्रकाशीय तन्तुओं द्वारा प्रकाश का संचरण होता है। इसमें आयन मण्डल की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण है।
            संचार साधनों, जैसे-टेलीफोन, रेडियो, टेलीविजन, कम्प्यूटर नेटवर्क आदि द्वारा मुख्यतः ध्वनि, संगीत, भाषण तथा दृश्य प्रसारण किया जाता है। रेडियो तरंगों द्वारा उसके सफलतापूर्वक प्रसारण हेतु मॉडुलन तथा संसूचन अभिक्रियाएँ की जाती हैं। मॉडुलन में निम्न आवृत्ति की श्रव्य तरंगों को उच्च आवृत्ति की वाहक या रेडियो तरंगों के साथ मिश्रित कर उच्च आवृत्ति की परिणामी तरंग प्रेषी केन्द्र पर किया जाता है। संसूचन में मॉडुलित तरंगों में से श्रव्य तरंगों को ग्राही केन्द्र में वाहक तरंगों से अलग किया जाता हैं।


8. मॉडुलन क्या है ? इसकी क्या आवश्यकताएँ हैं ?

Ans⇒  मॉडुलन – यह वह प्रक्रिया है जिसमें निम्न आवृत्ति की श्रव्य तरंगों को उच्च आवृत्ति की वाहक या रेडियो तरंगों के साथ मिश्रित किया जाता है। इससे प्राप्त उच्च आवृत्ति की परिणामी तरंग को मॉडुलित तरंग कहते हैं। इसका कार्य प्रेषी केन्द्र पर किया जाता है।

आवश्यकताएँ – लम्बी दूरियों तक प्रसारण के लिए माइक्रोफोन द्वारा रूपान्तरित श्रव्य आवृत्ति विद्युत चुम्बकीय तरंगों पर उच्च आवृत्ति की वाहक तरंगों का अध्यारोपण कर मॉडुलित तरंग प्राप्त करना अर्थात् मॉडुलन की प्रक्रिया आवश्यक होती है।

मॉडुलन की आवश्यकताओं के निम्नलिखित कारण हैं –
           (a) श्रव्य तरंगों की आवृत्ति बहुत कम होती है, अतः इसमें बहुत कम ऊर्जा होती है। वायुमंडल में ऊर्जा ह्रास के कारण आयाम घटता जाता है तथा कुछ दूरी के बाद आयाम के शून्य हो जाने पर तरंगें समाप्त हो जाती हैं।
           (b) श्रव्य आवृत्ति की विद्युत चुम्बकीय तरंगों को सीधे ट्रान्समीटर से प्रसारित करने पर अध्यारोपण से वे निष्प्रभावी होते हैं।
           (c) श्रव्य आवृत्ति की विद्युत चुम्बकीय तरंगों को प्रसारित करने के लिए ऐण्टीना की लम्बाई 1.5 x 107 मी. से 1.5 x 104 मीटर की कोटि की होनी चाहिए जो कि असंभव है।

           इसलिए श्रव्य आवृत्ति तरंगों में उच्च आवृत्ति की वाहक तरंगों का अध्यारोपण करने से प्राप्त मॉडुलित तरंगों के प्रेषण के लिए आवश्यक ऐण्टीना की लम्बाई भी कम होती है, जिसे व्यावहारिक रूप में प्राप्त किया जा सकता है। फलस्वरूप ये तरंगें ज्यादा दूरियों तक प्रसारित की जा सकती हैं।


9. संचार व्यवस्था में सिगनलों की बैंड चौड़ाई का वर्णन करें।

Ans⇒ सिगनल की संचार प्रक्रिया को जिस प्रकार की संचार व्यवस्था चाहिए वह उस आवृत्ति बैंड पर निर्भर करती है जो उसके लिए आवश्यक माना जाता है।
             वाक् सिगनलों के लिए 300 Hz से 3100 Hz का आवृत्ति परास उपयुक्त माना जाता है अतः वाक सिगनलों को व्यापारिक टेलीफोन संचार के लिए 2800 Hz (3100 Hz – 300 Hz) बैंड चौड़ाई चाहिए। संगीत के प्रेषण के लिए वाद्य यंत्रों द्वारा उच्च आवृत्तियों के स्वर उत्पन्न करने के कारण, लगभग 20 KHz की बैंड चौड़ाई की आवश्यकता होती है।
            दृश्यों के प्रसारण (प्रेषण) के लिए वीडियो सिगनलों को 4.2 MHz बैंड चौड़ाई की आवश्यकता होती है। TV सिगनलों में दृश्य तथा श्रव्य दोनों अवयव होते हैं तथा उनके प्रेषण के लिए प्रायः 6 MHz बैड चौड़ाई आवंटित की जाती है।


10. ऐंटीना अथवा ऐरियल के साइज से क्या समझते हैं ?

Ans⇒  किसी सिगनल को प्रेषित करने के लिए हमें किसी ऐंटीना या एरियल की आवश्यकता होती है। कोई ऐंटीना उस सिगनल में समय के साथ होने वाले परिवर्तन उचित रूप से संवेदन कर सके, इसके लिए यह आवश्यक है कि उस ऐंटीना का साइज उस सिगनल से संबद्ध तरंगदैर्घ्य (λ) के तुलनीय हो। 20 KHz आवृत्ति की किसी वैद्युत चुम्बकीय तरंग की तरंगदैर्घ्य λ = 15 km होती है। इस लंबाई के तुलनीय साइज का ऐंटीना निर्मित करना तथा प्रचलित करना संभव नहीं है। अतः ऐसे आधार बैंड सिगनलों का सीधा प्रेषण व्यावहारिक नहीं है। यदि प्रेषण आवृत्ति उच्च (v = 1 MHz, λ = 300 m) हो, तो उपयुक्त लंबाई के ऐंटीना द्वारा प्रेषण संभव हो सकता है। अतः हमारे न्यून आवृत्ति आधार बैंड सिगनल में निहित सूचना को किसी उच्च रेडियो आवृत्तियों में प्रेषण से पूर्व रूपान्तरित करने की आवश्यकता होती है।


11. किसी ऐंटीना द्वारा प्रभावी शक्ति विकिरण से क्या समझते हैं ?

Ans⇒  किसी रेखीय ऐंटीना (लंबाई 1) द्वारा विकिरित शक्ति 1/λ2 के अनुक्रमानुपाती होती है। ऐंटीना की समान लंबाई के लिए, तरंगदैर्घ्य 2 के घटने पर विकरित शक्ति में वृद्धि हो जाती है। अतः किसी अच्छे प्रेषण के लिए हमें उच्च शक्ति चाहिए।


12. आकाश तरंग से क्या समझते हैं ? इसका वर्णन करें।

Ans⇒ आकाश तरंगों द्वारा प्रसारण रेडियो तरंगों के प्रसारण का एक अन्य ढंग है। आकाश तरंग, प्रेषण-ऐंटीना से अभिग्राही-ऐंटीना तक सरल रेखीय पथ पर गमन करती है। आकाश तरंगों का उपयोग दृष्टिरेखीय रेडियो संचरण (Line of Sight-LOS) के साथ-ही-साथ उपग्रह संचार में भी किया जाता है। 40 MHz से अधिक आवृत्तियों पर संचार केवल दृष्टिरेखीय (LOS) रेडियो संचरण द्वारा ही संभव है। इन आवृत्तियों पर ऐंटीना का साइज अपेक्षाकत छोटा होता है तथा इसे पृथ्वी के पृष्ठ से कई तरंगदैर्घ्य की ऊँचाई पर स्थापित किया जाता है। पृथ्वी की वक्रता के कारण सीधी तरंगें किसी बिन्दु पर अवरोधित हो जाती हैं।
आकाश तरंगों द्वारा प्रसारण रेडियो तरंगों के प्रसारण का

यदि प्रेषक एंटीना hr ऊँचाई पर है तो क्षितिज की दूरी r का मान dT = आकाश तरंगों द्वारा प्रसारण रेडियो तरंगों के प्रसारण का होगा, जहाँ R पृथ्वी की त्रिज्या है | dT को प्रेषक ऐंटीना का रेडियो क्षितिज भी कहते हैं। पृथ्वी के पृष्ठ से hT तथा hg ऊँचाई वाले दो ऐंटीना के बीच की अधिकतम दृष्टिरेखीय दूरी
dM = 
जहाँ hR अभिग्राही ऐंटीना की ऊँचाई है।


13. लेजर किरणों की चार प्रमुख विशेषताएँ लिखें।

Ans⇒ लेजर किरणों के चार मुख्य विशेषताएँ निम्न हैं –
         (i) प्रत्येक लेजर का विकिरण अत्यधिक तीक्ष्ण एवं दैशिक होता है।
         (ii) प्रत्येक लेजर में एक एक्टिव पदार्थ का उपयोग होता है जो ऊर्जा को प्रकाश ऊर्जा में बदल देता है।
         (iii) प्रत्येक लेजर में एक पम्पिंग स्रोत होता है जो ऊर्जा को पावर देता है।
         (iv) प्रत्येक लेजर अम्पलीफाई होनेवाले प्रकाश बीम को एक्टिव मैटेरियल से होकर भेजते हैं।


14. मॉडुलन को परिभाषित करें। इसके प्रकारों को लिखें।

Ans⇒  निम्न आवृत्ति के मूल सिग्नलों को अधिक दूरियों तक प्रेषित नहीं किया जा सकता। इसलिए प्रेषित पर, निम्न आवृत्ति के संदेश सिग्नलों की सूचनाओं को किसी उच्च आवृत्ति की तरंग पर अध्यारोपित किया जाता है जो सूचना के वाहक (corrier) की भाँति व्यवहार करती है। इस प्रक्रिया को मॉडुलन कहते हैं। इसके तीन प्रकार हैं- (i) आयाम मॉडुलन (ii) कला मॉडुलन (iii) आवृत्ति मॉडुलन।


15. संचार प्रणाली में संचरण के लिए प्रयुक्त तीन विभिन्न विधाओं का उल्लेख कीजिए।

Ans⇒  संचार प्रणाली में संचरण के लिए प्रयुक्त तीन विधाएँ निम्न हैं –
           (i) Transmitter : इसके द्वारा विभिन्न प्रकार के Message को अलग-अलग आवृत्ति पर universal में छोड़ा जाता है तथा ये निश्चित Channel के द्वारा प्रसारित किया जाता है।

         (ii) Communication channel : अलग-अलग Communication channel को एक निश्चित आवृत्ति के range को दिया जाता है, जिसके सहारे वे किसी message को प्रसारित करने का काम करता है।

      (iii) Receiver : यह आकाश में छोड़े गए message को signal के रूप पकड़कर हमलोगों को message देने का काम करता है।


16. टी०वी० संकेत के प्रेषण सीमा को बढ़ाने के लिए किन्हीं दो बिन्दुओं को व्यक्त करें।

Ans⇒  अत्यधिक उच्च आवृत्ति के वाहक तरंगें एवं मॉडुलेशन की सहायता से।


17. एनालॉग तथा डिजिटल सिग्नल से आप क्या समझते हैं ?

Ans⇒ ऐसा current या voltage सिग्नल जो सतत् तथा समय के साथ परिवर्तनशील हो analog signal कहा जाता है। ऐसा Signal प्रस्तुत करने वाले परिपथ को analog electronic circuit कहा जाता है।
            ऐसे signal जिनके दो level of current voltage (0 and 1) को digital signal कहा जाता है। इस इलेक्ट्रॉनिक परिपथ में जिससे धारा तथा वोल्टेज के दो ही signal (on या off) होता है। इस परिपथ द्विआधारी संख्याओं के प्रयोग से सम्पन्न होता है। 0 या 5 V को क्रमशः O तथा 1 से सचित किया जाता है। अतः इस परिपथ में input या output में ही मान संभव है या तो O या 1.


18. निम्न की व्याख्या करें – (i) www (ii) Fax

Ans⇒ (i) www – वर्ल्ड वाइड वेभ।।
          (ii) Fax – टेलीफोन लाइन के माध्यम से दूरस्थ स्थान पर डॉक्युमेन्ट का इलेक्ट्रॉनिक प्रेषण Fax कहलाता है।

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