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1. ठोस अवस्था LONG ANSWER TYPE QUESTIONS

भौतिक रसायन
1. ठोस अवस्था

प्रश्न 1. अक्रिस्टलीय ठोसों (Amorphous solids) तथा क्रिस्टलीय ठोसों (Crystalline solids) में अंतर स्पष्ट करें।

उत्तर⇒ अक्रिस्टलीय ठोस तथा क्रिस्टलीय ठोस में निम्न अंतर है-

अक्रिस्टलीय ठोसक्रिस्टलीय ठोस
1. इनकी आकृति निश्चित नहीं होती है क्योंकि इनके घटक कण नियमित क्रम में व्यवस्थित नहीं रहते हैं।1. इनकी आकृति निश्चित होती है, क्योंकि इनके घटक कण नियमित क्रम में व्यवस्थित रहते हैं।
2. इनकी आकृति अनियमित होती है।2. इनकी निश्चित ज्यामितीय आकृति होती है।
3. इनके गलनांक निश्चित नहीं होते हैं।3. इनके गलनांक निश्चित होते हैं।
4. ये समदैक्षिक होते हैं।4. ये विषमदैक्षिक होते हैं।
5. इनकी संलयन ऊष्मा निश्चित नहीं होती है।5. इनकी संलयन ऊष्मा निश्चित होती है।
6. ये छदम ठोस या अतिशितित द्रव होते हैं।6. ये वास्तविक ठोस होते हैं।

प्रश्न 2. शॉटकी तथा फ्रेंकेल त्रुटियों में अंतर स्पष्ट करें।

उत्तर⇒ शॉटकी तथा फ्रेंकेल त्रुटियों में निम्नलिखित अंतर है-

शॉटकी त्रुटिफ्रेंकेल त्रुटि
1. इस दोष में धनायन तथा ऋणायन संख्या में बराबर होते हैं।1. संख्या में बराबर नहीं होते हैं।
2. इस दोष में धनायन तथा ऋणायन अपने जालक स्थलों से पूर्णतः विस्थापित हो जाते हैं।2. इस दोष में कोई भी आयन धनायन या ऋणायन अपने जालक बिन्दु को छोड़कर अन्तराकाशी स्थल में आ जाते हैं।
3. इस दोष में क्रिस्टल का घनत्व घट जाता हैं।3. इस दोष में घनत्व में परिवर्तन नहीं होता हैं।
4. यह दोष अधिक उप सह-संयोजन संख्या वाले आयनों (ठोसों) में पाया जाता है।4. संख्या वाले आयनिक ठोसों में पाया जाता है।
5. इस दोष में क्रिस्टल में धनायन एवं ऋणायन लगभग समान आकार के5. ऋणायन से कम होता है।

प्रश्न 3. (i) उपसहसंयोजन संख्या का क्या अर्थ है ?
(ii) निम्नलिखित परमाणुओं की उपसहसंयोजन संख्या क्या होती है ?
(क) एक घनीय निविड संकुलित संरचना
(ख) एक अंत: केंद्रित घनीय संरचना।

उत्तर⇒ (i) उपसहसंयोजक संख्या किसी क्रिस्टल में उपस्थित परमाणु के चारों ओर उन परमाणुओं की संख्या जो केंद्रित परमाणु को छूते हों। यह संख्या उस परमाणु की उपसहसंयोजक संख्या कहलाती है। आयनिक क्रिस्टल के केंद्रीय आयन के चारों ओर विपरीत आवेश के आयनों की संख्या केंद्रीय आयन की उपसहसंयोजन संख्या कहलाती है।

         (ii) (क) ccp में उपस्थित परमाणु के चारों ओर 12 परमाणु उपस्थित होते हैं जो उनकी उपसहसंयोजन संख्या कहलाती है।
         (ख) bcc में केंद्रीय परमाणु के चारों ओर उपस्थित परमाणुओं की संख्या आठ होती है जो इस संरचना में परमाणु की उपसहसंयोजन संख्या कहलाती है।

प्रश्न 4. निम्नलिखित जालकों में से प्रत्येक की एकक कोष्ठिका में कितने जालक बिन्दु होते हैं ?
(i) फलक-केंद्रित घनीय,
(ii) फलक-केंद्रित चतुष्कोणीय,
(iii) अंतःकेंद्रित

फलक केंद्रित घनीय या चतुष्कोणीय में जालक बिन्दु

उत्तर⇒ (i) और (ii)
फलक केंद्रित घनीय या चतुष्कोणीय में जालक बिन्दु
= 8 कोनों पर + 6 फलक पर = 14
प्रति एकक कोष्ठिका में अवयव
= 8×+6×= 1+3 = 4
fcc – 8 जालक बिन्दु कोणों पर 6
जालक बिन्दु फलक जालक पर
(iii) अंतः केंद्रित (BCC) में जालक
बिन्दु 8 कोणों पर + 1 केंद्रित बिंदु पर
हालाँकि प्रति एकक कोष्ठिका में
अवयव = 8×+1=2

प्रश्न 5. निम्नलिखित को उचित उदाहरणों से समझाइए-
(i) लौह चुंबकत्व
(ii) अनुचुंबकत्व
(iii) फेरीचुंबकत्व
(iv) प्रतिलौह चुंबकत्व
(v) 12-16 और 13-15 वर्गों के यौगिक।

उत्तर⇒ (i) लौह चुंबकीय-कुछ पदार्थ जैसे लोहा, कोबाल्ट, निकेल और CrO2 बहुत प्रबलता से चुंबकीय क्षेत्र की ओर आकर्षित होते हैं। ऐसे पदार्थों को लौहचुंबकीय पदार्थ कहा जाता है। प्रबल आकर्षणों के अतिरिक्त ये स्थायी रूप से चुंबकित किए जा सकते हैं। पदार्थ को चुंबकीय क्षेत्र में रखने पर सभी डोमेन चुबकीय क्षेत्र की दिशा में अभिविन्यसित हो जाते हैं और प्रबल चुंबकीय प्रभाव उत्पन्न होता है। चुंबकीय क्षेत्र को हटा लेने पर भी डोमेनों का क्रम बना रहता है और लौहचुंबकीय पदार्थ स्थायी चुंबक बन जाते हैं।
                              ↑↑↑↑↑↑↑↑ लौह चुंबकीय पदार्थ
(ii) अनुचुंबकत्व-अनुचुंबकीय पदार्थ चुंबकीय क्षेत्र की ओर दुर्बल रूप से आकर्षित होते हैं। ये चुंबकीय क्षेत्र की दिशा में ही चुंबकित हो जाते हैं | ये चुंबकीय क्षेत्र की अनुपस्थिति में अपना चुंबकत्व खो देते हैं। अनुचुंबकत्व का कारण एक अथवा अधिक अयुगलित इलेक्ट्रॉनों की अनुपस्थिति है, जो कि चुंबकीय क्षेत्र की ओर आकर्षित होते हैं। O2, Cu+2, Fe+3, Cr+3 ऐसे पदार्थों के कुछ उदाहरण हैं।

(iii) फेरीचुंबकत्व-जब पदार्थ में डोमेनों के चुंबकीय आघूर्णों का संरेखण समानांतर एवं प्रतिसमानांतर दिशाओं में आसान होता है तब पदार्थ में फेरीचुंबकत्व देखा जाता है। ये मैग्नेटाइट और फेराइट जैसे Mg, Fe2O4,
ZnFe2O4 ऐसे पदार्थों के उदाहरण होते हैं। Fe3O4 गरम करने पर फेरीचुंबकत्व खो देते हैं और अनुचुंबकीय बन जाते हैं।
                       ↑↑↓↑↑↓
(iv) प्रतिलौह चुबकत्व-प्रतिलौहचुंबकत्व प्रदर्शित करनेवाले पदार्थ जैसे MnO में डोमेन संरचना लौहचुंबकीय पदार्थ के सदृश होती है, परंतु उनके डोमेन एक-दूसरे के विपरीत अभिविन्यासित होते हैं तथा एक-दूसरे के चुंबकीय आघूर्ण को निरस्त कर देते हैं।
                  ↑↓↑↓↑↓
(v) 12 – 16 और 13 – 15 वर्गों के यौगिक- दो अवयव रखनेवाले ठोस यौगिक बनाते हैं। वर्ग 13 और 15 तथा 12 और 16 वर्गों से बने यौगिकों को दो वर्गों में बाँटा जा सकता है-
       (a) 12 – 16 यौगिक- ZnS, CdS, CdSe, HgTe आयन प्रकृति के होते हैं।
       (b) 13 – 15 यौगिक- A/P, GaAs, InSn आदि यौगिक सहसंयोजक यौगिक बनते हैं। ये यौगिक विद्युत और प्रकाशित गुणों को दर्शाते हैं। वे अर्धचालक होते हैं।

प्रश्न 6. (क) एकक कोष्ठिका और क्रिस्टल जालक को परिभाषित करें। इनके गुणों का वर्णन करें।
(ख) ठोस के गुणधर्मों का वर्णन करें। क्रिस्टलीय और अक्रिस्टलीय ठोस क्या है ?

जालक बिंदुओं को सीधी रेखाओं से जोड़ा जाता है

उत्तर⇒ (क) क्रिस्टल जालक-क्रिस्टल में अवयवी कणों की त्रिविमीय व्यवस्था को आरेख के रूप में निरूपित करके जिसमें प्रत्येक कण को बिंदु द्वारा चित्रित किया जाता है तो यह व्यवस्था क्रिस्टल जालक कहलाती है। यह दिक्स्थान जिसमें बिन्दुओं की नियमित त्रिविमीय व्यवस्था हो क्रिस्टल जालक कहलाती है।
             क्रिस्टल जालक के अभिलक्षण- (i) जालक में प्रत्येक बिन्दु जालक बिंदु अथवा जालक स्थान कहलाता है।
             (ii) क्रिस्टल जालक का प्रत्येक बिंदु एक अवयवी कण को निरूपित करता है जो एक परमाणु, एक अणु अथवा एक आयन हो सकता है।
            (iii) जालक बिंदुओं को सीधी रेखाओं से जोड़ा जाता है जिससे जालक की ज्यामिति व्यक्त की जा सके ।
एकक कोष्ठिता- एकक कोष्ठिता क्रिस्टल जालक का लघुतम भाग है, इसे जब विभिन्न दिशाओं में पुनरावृत्त किया जाता है तो पूर्ण जालक की उत्पत्ति होती है।
एकक कोष्ठिका की अभिलाक्षणिक गुण- (i) उसके तीनों किनारों की विमाओं a, b और c के द्वारा जो कि परस्पर लंबवत् हो भी सकते हैं अथवा नहीं भी।
              (ii) किनारों के मध्य कोण α, β और γ के द्वारा इस प्रकार एकक कोष्ठिका छ: पैरामीटरों a, b, c, α, β, γ द्वारा अभिलक्षणित होती है।
              (ख) ठोस अवस्था के निम्न गुण-धर्म हैं
              (i) ठोस पदार्थों का आयन, द्रव्यमान और आकृति निश्चित होती है।
              (ii) अन्तर अणु (अवयव) दूरी कम होती है।
              (iii) अन्तर अणु (अवयव) बल प्रबल होता है।
              (iv) ठोस के अवयव (परमाणु अणु या आयन) निश्चित स्थान पर होते हैं।
              (v) ठोस कठोर होते हैं।
              क्रिस्टलीय और अक्रिस्टलीय ठोस- सभी ठोस पदार्थ दो वर्गों में विभक्त किए जा सकते हैं-
              (i) क्रिस्टलीय ठोस- इस प्रकार के ठोस के अवयव छोटे होते हैं और ये निश्चित अभिलाक्षणिक ज्यामितीय आकार के होते हैं। इनकी प्रकृति वास्तविक ठोस दीर्घ परासी व्यवस्था होती है। जैसे NaCl और क्वार्ट्स।
              (ii) अक्रिस्टलीय ठोस-अक्रिस्टलीय ठोस असमाकृति आकार की आकृति होती है। इनका गलनांक ताप के एक परास में धीरे-धीरे नरम पड़ते हैं। इनकी गलन ऊष्मा निश्चित नहीं होती है। इनका गलनांक ताप के एक परास में धीरे-धीरे नरम पड़ते हैं। इनकी गलन ऊष्मा निश्चित नहीं होती। समदैशिक प्रकृति के होते हैं। इस प्रकार के ठोस आभासी ठोस अथवा अतिशीतित द्रव गुण दर्शाते ही अवयव केवल लघु परासी व्यवस्था में होते हैं। उदाहरण क्वार्ट्स काँच।

2. विलयन LONG ANSWER TYPE QUESTIONS

प्रश्न 1. राउल्ट का वाष्प दाब का आपेक्षिक अवनमन का सिद्धांत क्या है ? सिद्ध करें कि विलय का मोलर द्रव्यमान वाष्प दाब के अवनमन के व्युत्क्रमानुपाती होता है।

उत्तर⇒ राउल्ट के नियम के अनुसार यदि किसी अवाष्पशील विलेय को शुद्ध विलायक में डालने पर विलयन का वाष्प दाब शुद्ध विलायक के वाष्प दाब से कम होता है।
        वाष्प दाब का अवनमन के विलेय कणों के सान्द्रण पर निर्भर करता है।
        राउल्ट के नियम के अनुसार वाष्पदाब का आपेक्षिक अवनमन का मान विलेय के मोल अंश के बराबर होता है।
        यदि P0 शुद्ध विलायक का वाष्प दाब है तथा Ps विलयन का वाष्प दाब है तथा XB विलेय का मोल अंश है।

P> PS

वाष्प दाब का आपेक्षिक अवनमन Po राउल्ट के नियम के अनुसार

वाष्प दाब का आपेक्षिक अवनमन Po राउल्ट के नियम के अनुसार
           अतः हम कह सकते हैं कि विलेय का मोलर द्रव्यमान वाष्प दाब के अवनमन के व्युत्क्रमानुपाती होता है।
जहाँ WB = विलेय की मात्रा, WA = विलायक की मात्रा
MA = विलायक का मोलर द्रव्यमान है।

प्रश्न 2. निम्न पदों को परिभाषित कीजिए : (i) मोल-अंश (ii) मोललता (iii) मोलरता (iv) द्रव्यमान प्रतिशत

उत्तर⇒ (i) मोल-अंश : मोल-अंश अवयव के मोलों की संख्या अवयवों के कुल मोलों की संख्या का अनुपात होता है।
माना एक द्विअंगी विलयन में A तथा B अवयवों के मोल क्रमशः nA व nB हैं तब
A का मोल–अंश xA = 
B का मोल–अंश x
इसलिए xA + xB = 1 या xA = 1 – xB
(ii) मोललता : किसी विलयन की मोललता (m) 1 kg विलायक में उपस्थित विलेय के मोलों की संख्या के रूप में परिभाषित की जाती है।
किसी विलयन की मोललता
(iii) मोलरता : एक लीटर विलयन में घुले हुए विलेय के मोलों की संख्या को उस विलयन की मोलरता (M) कहते हैं।
किसी विलयन की मोललता
(iv) द्रव्यमान प्रतिशत (w/w) : विलयनों के अवयवों को द्रव्यमान प्रतिशत में निम्न प्रकार से परिभाषित किया जाता है-
किसी विलयन की मोललता
यदि अवयव A द्रव्यमान wA तथा B अवयव का द्रव्यमान wB हो तो A के लिए द्रव्यमान %
यदि अवयव A द्रव्यमान wA तथा B अवयव का द्रव्यमान wB हो तो A के लिए द्रव्यमान

प्रश्न 3. राउल्ट के नियम से धनात्मक एवं ऋणात्मक विचलन का क्या अर्थ है तथा DH मिश्रण के चिह्न का इन विचलनों से कैसे संबंधित है ?

उत्तर⇒  राउल्ट नियम से धनात्मक एवं ऋणात्मक विचलन :
1. धनात्मक विचलन : राउल्ट नियम से धनात्मक विचलन की स्थिति में A-B अन्योन्य क्रियाएँ A-A अथवा B-B के बीच अन्योन्य क्रियाओं की तुलना में कमजोर होती है अर्थात् इस स्थिति में विलेय-विलायक अणओं के मध्य अंतराण्विक आकर्षण बल विलेय–विलेय और विलायक-विलायक अणों की तुलना में कमजोर होते हैं परिणामस्वरूप वाष्प दाब में वृद्धि होती है जिससे धनात्मक विचलन होता है।
विलयन PA > P0A × xA
PB × P0B × xB
जहाँ PAPB विलयन में उपस्थित A और B अवयवों के आंशिक दाब है तथा P0A और P0B शुद्ध अवस्था में आंशिक दाब हैं।
XAXB विलयन अवयवों के मोल-अंश हैं।
यहाँ ΔH > 0 अर्थात् धनात्मक उदाहरण
(i) एथेनाल तथा n-हेक्सेन
(ii) CCl4 व CHCl3
2. ऋणात्मक विचलन : राउल्ट नियम से ऋणात्मक विचलन की स्थिति में A-A, एवं B-B के बीच अंतराआण्विक आकर्षण बल A-B की तुलना में कमजोर होता है । परिणामस्वरूप वाष्प दाब कम हो जाता है अतः ऋणात्मक विचलन प्रदर्शित होता है।
          उदाहरण : क्लोरोफॉर्म एवं ऐसीटोन का मिश्रण भी ऐसा विचलन बनाता है जो राउल्ट के नियम के ऋणात्मक विचलन दर्शाता है। इसका कारण यह है कि क्लोरोफॉर्म का अणु ऐसीटोन के अणु के साथ हाइड्रोजन बंध बना सकता है जैसा कि चित्र में दर्शाया गया है।
क्लोरोफॉर्म एवं ऐसीटोन का मिश्रण भी ऐसा विचलन बनाता है

अनादर्श विलयन जो ऋणात्मक विचलन दर्शाते हैं।
(i) PA < P0A तथा PB < P0B xB
(ii) ΔV मिश्रण = ऋणात्मक
उदाहरण :
(i) जल + HCl
(ii) जल + NHO3
(iii) CH3COCH तथा C6H5NH2
(iv) CH3COOH और पाइरिडीन

प्रश्न 4. राउल्ट के नियम उड़नशील एवं अउड़नशील पदार्थों के लिए लिखें और व्याख्या करें। आदर्श आचरण से धनात्मक विचलन की व्याख्या उचित उदाहरण के साथ दें।

उत्तर⇒ राउल्ट केनियम उड़नशील पदार्थों के लिए किसी वाष्पशील द्रवों के विलयन के प्रत्येक अवयव का आंशिक दाब विलयन में उनके मोल अंश के समानुपाती होता है।
P1 ∝ X1 और P1 = P10 X1
जहाँ P10 = शुद्ध घटक 2 का समान ताप पर वाष्प दाब है। इसी प्रकार,
P2 ∝ X2 और P2 = P20 X2
जहाँ P2 = शुद्ध घटक 2 का समान ताप पर वाष्प दाब है।
राउल्ट के नियम अउडनशील पदार्थों के लिए- किसी विलयन में प्रत्येक वाष्पशील अवयव का आंशिक वाष्प दाब इसके मोल-अंश के समानुपाती होता है। विलयनों का वाष्पदाब राउल्ट के नियम द्वारा प्रायुक्त किए गए वाष्प दाब से या तो अधिक होता है या कम। यदि यह अधिक होता है तो यह विलयन राउल्ट नियम से धनात्मक विचलन प्रदर्शित करता है। अन्तराण्विक बल कमजोर हो जाने के कारण मिश्रण राउल्ट के नियम से धनात्मक विचलन दर्शाता है।

प्रश्न 5. परासरण तथा विसरण में क्या अन्तर है ?

उत्तर⇒ परासरण तथा विसरण में निम्नलिखित अन्तर है-

परासरणविसरण
1. परासरण के लिए अर्द्धपारगम्य झिल्ली की आवश्यकता होती है।1. विसरण के लिए अर्द्ध पारगम्य झिल्ली की कोई आवश्यकता नहीं है ।
2. परासरण में सिर्फ घोलक के अणु तनु घोल से सान्द्र घोल की ओर तब तक जाता है जब तक साम्य की अवस्था प्राप्त नहीं हो जाए।2. विसरण में हल्की गैसें भारी गैसों की तुलना में अधिक तेजी से विसरित होती है।
3. परासरण में पूरा तंत्र को विद्युतीय सेल माना जा सकता है।3. विसरण में पूरे तंत्र को विद्युतीय सेल नहीं माना जा सकता है।

प्रश्न 6. निम्नलिखित पदों की व्याख्या करें-
(क) असामान्य अणु गुण (Abnormal Colligative Property)
(ख) वॉण्ट हॉफ गुणक (Van’t Hoff Factor)

उत्तर⇒ (क) असामान्य अणु गुण (Abnormal Coligative Property)-हमलोग जानते हैं अवाष्पशील तथा अचालक घुल्य के अणुआ की संख्या ठोस अवस्था तथा घोल में समान होती है। परन्तु यह स्थिति चालक घुल्य के साथ लागू नहीं होता है। इस घुल्य का घोल अवस्था की संख्या ठोस अवस्था तथा घोल में समान होती है। परन्तु यह स्थिति चालक घुल्य के साथ लागू नहीं होता है। इस घुल्य का घोल अवस्था में अणुओं की संख्या ठोस अवस्था के अणुओं की सख्या से हमेशा अधिक होती है। कणों के इस बढ़े मान से घोल के व्यवहार में भिन्नता उत्पन्न हो जाती है जिसे असामान्य व्यवहार कहते हैं तथा इस अणु को असामान्य अणुगुण (colligative property) कहा जाता है।
 हम जानते हैं कि Colligative property ∝ कणों की संख्या
मान लिया कि A  nB
प्रारम्भ में 1             0
साम्यावस्था में      1-α    nα
कुल कणों की संख्या (मोलों की संख्या) = 1 -+ α  nα = 1 + nα – α = 1 + α (n-1)

मान लिया कि πth = सामान्य परासरण दाब
π0bs = प्रेक्षित परासरण दाब
ΔPth = सामान्य वाष्प दाब अवनमन
ΔP0bs = प्रेक्षित वाष्प दाब अवनमन
ΔTbTh = सामान्य क्वथनांक उन्नयन
ΔTbobs = प्रेक्षित क्वथनांक उन्नयन
ΔTsn = सामान्य हिमांक अवनमन
ΔTƒnobs = प्रेक्षित हिमांक अवनमन
वाण्ट हॉफ गुणांक (Van't Hoff Factor)

वाण्ट हॉफ गुणांक (Van't Hoff Factor)
(ख) वाण्ट हॉफ गुणांक (Van’t Hoff Factor)-वाण्ट हॉफ ने तनु विलयनों का निम्न समीकरण दिया- πV = ST जबकि π = परासरण दाब, V
= मोलर आयतन, S = विलयन स्थिरांक, T = परम तापक्रम
          कुछ पदार्थ विलयनों में सामान्य से कम अथवा अधिक आता है। इस व्यवहार को समझने के लिए वाण्ट हॉफ ने विलयन समीकरण में निम्न संशोधन सुझाया- πV = iST
जबकि i वाण्ट हॉफ फैक्टर है। वाण्ट हॉफ फैक्टर (i) को निम्न प्रकार परिभाषित करते हैं-
जबकि i वाण्ट हॉफ फैक्टर है। वाण्ट हॉफ फैक्टर

प्रश्न 7. असामान्य अणु भार से आप क्या समझते हैं ? असामान्यता लाने वाले कारकों की व्याख्या उदाहरण के साथ करें।
उत्तर⇒ वह पदार्थ जो विलयन में वियोजित होता है, उसका अणुभार सामान्य अणुभार से कम आता है और उस पदार्थ का अणुभार जो विलयन में संगुणित होता है, उसका अणुभार सामान्य से अधिक आता है। इस प्रकार प्राप्त अणुभार असामान्य अणुभार कहलाता है।
CH3COCH3 + Br3 → CH3COCH2Br + HBr
          प्रकाश रासायनिक संयोग से हाइड्रोजन व क्लोरीन का हाइड्रोजन क्लोराइड गैस का बनाना शून्य श्रेणी की एक और अभिक्रिया है।
H2 + Cl22HCl
प्रथम श्रेणी की अभिक्रिया (First order reaction)-जिस अभिक्रिया के वेग में केवल एक अणु की सान्द्रता में परिवर्तन होता है। उदाहरणार्थ,
N2O5 के अपघटन में केवल N2O5 के सान्द्रण पर रासयनिक अभिक्रिया की प्रगति निर्भर होता है।

उदाहरण-N2O5 → 2NO2 +  O2

इसी प्रकार प्लेटिनम की उपस्थिति में H2 O2 के जलीय विलयन का अपघटन, फॉस्फीन का तापीय अपघटन, जलीय विलयन में आमोनियम नाइट्राइट का अपघटन, एसीटोन का अपघटन, प्रोपिऑन एल्डिहाइड का तापीय अपघटन, N – क्लोरो एसीएनिलाइड का पैरा-क्लोरो एसीएनिलाइड में परिवर्तन आदि प्रथम श्रेणी या एकाणुक अभिक्रियाएँ हैं।

H2O2H2O +  O2

प्रश्न 8. हेनरी का नियम तथा इसके कुछ महत्वपूर्ण अनुप्रयोग लिखिए।

उत्तर⇒ हेनरी नियम- गैस की विलायक में विलेयता तथा दाब के मध्यम मात्रात्मक संबंध हेनरी ने दिया। हेनरी नियम अनुसार स्थिर ताप पर किसी गैस की द्रव में विलेयता गैस के दाब के समानुपाती होती है।
हेनरी नियम का गणित प्रारूप :
         m ∝ P
         m = K . P
जहाँ  m = घुली गैस का द्रव्यमान
         p = साम्यावस्था में दाब
         K = हेनरी स्थिरांक
हेनरी नियम के अनप्रयोग-
         1. सोडा जल एवं शीतल पेयों में CO2 की विलेयता बढ़ाने के लिए बोतल को अधिक दाब पर बंद किया जाता है।
         2. गहरे समुद्र में श्वांस लेने के लिए गोताखोर ऑक्सीजन व हीलियम गैस के मिश्रण का प्रयोग करते हैं। ऐसा करने से उनको पीड़ा का अनुभव नहीं होता।
         3. अधिक ऊँचाई वाली जगहों पर ऑक्सीजन का आंशिक दाब सतही स्थानों से कम होता है अतः इन जगहों पर रहने वाले लोगों एवं आरोहकों के रुधिर और ऊतकों में ऑक्सीजन की सांद्रता निम्न हो जाती है। इसके कारण आरोहक कमजोर हो जाते हैं। यह लक्षण ऐनेक्सिया कहलाता है।

प्रश्न 9. समुचित चित्र तथा उपर्युक्त उदाहरण के साथ व्याख्या करें कि क्यों कुछ आदर्श विलयन राउल्ट के नियम में धनात्मक विलयन प्रदर्शित करता है ?

आदर्श विलयन के दोनों घटकों व्यवहार खण्डित रेखाओं द्वारा

उत्तर⇒ विलयन के दो वाष्पशील घटकों को मिलाने पर अनादर्श विलयन राउल्ट के नियम से धनात्मक विलयन दिखाते हैं, इनके अंतःक्रिया बल का परिणाम घट जाता है अर्थात् A …. B अंतः क्रिया A ….. A तथा B …. B अंतक्रिया से कम होता है। फलस्वरूप प्रत्येक घटक का आंशिक वाष्पदाब तथा विलयन का कुल वाष्पदाब आदर्श विलयन की तुलना में ज्यादा होता है।
समुचित चित्र तथा उपर्युक्त उदाहरण के साथ व्याख्या करें
         आदर्श विलयन के दोनों घटकों व्यवहार खण्डित रेखाओं द्वारा दिखाया गया है और साथ ही सम्पूर्ण विलयन को भी दिखाया गया हैं राउल्ट के नियम का पालन न करने के अतिरिक्त इन विलयनों में निम्न कमियाँ भी होती है-
         (i) Δv मिश्रण धनात्मक होता है। गैस अनुवानित भी है क्योंकि दुबल अंतःक्रिया बलों के कारण विलयन का आयन बढ़ना निश्चित होता है।
         (ii) ΔH मिश्रण धनात्मक होता है विलयन को बनाने के लिए ऊर्जा की जरूरत होती है। क्योंकि विलयन बनाने के लिए विलयन के घटकों को पास-पास लाना होता है इस क्रिया मिश्रण की प्रक्रिया उफष्माशोषी प्रकृति की होती है।
         उदाहरण- (i) इथाइल ऐल्कोहल तथा साइक्लोहेक्सेन (ii) ऐसीटोन तथा बेंजीन

प्रश्न 10. कोलॉइडों को निम्न आधार पर कैसे वर्गीकृत किया गया है ?
(क) घटकों की भौतिक अवस्था
(ख) परिक्षेपण माध्यम की प्रकृति
(ग) परिक्षिप्त प्रावस्था एवं परिक्षेपण माध्यम के मध्य अन्योन्यक्रिया ।

उत्तर⇒ (क) परिक्षिप्त प्रावस्था एवं परिक्षेपण माध्यम की भौतिक अवस्था के आधार पर वर्गीकृत निम्न हैं-

परिक्षिप्त प्रावस्थापरिक्षेपण माध्यमकोलॉइड का नामउदाहरण प्रकार
ठोसठोसठोस सॉलकुछ रंगीन कांच एवं रत्न प्रस्तर
ठोसद्रवसॉलप्रलेप (पेंट), कोशिका तरल
ठोसगैसएरोसॉलधुआँ, धूल
द्रवठोसजेलपनीर, मक्खन, जेली
द्रवद्रवइमल्शन (पायस)दूध, बालों की क्रीम
द्रवगैसएरोसॉलधुंध, कोहरा, बादल, कीटनाशक स्प्रे
द्रवठोसठोस सॉलप्यूमिस पत्थर, फोम रबर
गैसद्रवफोमफेन, फेंटी गई क्रीम, साबुन के झाग

(ख) परिक्षेपण माध्यम की प्रकृति के आधार पर 

परिक्षेपण माध्यमकोलॉइडी सॉल
जलहाइड्रोसॉल
एल्कोहलऐल्कोसॉल
बेंजीबेंजोसॉल
हवाएरोसॉल

(ग) परिक्षिप्त प्रावस्था एवं परिक्षेपण माध्यम के मध्य अन्योन्यक्रिया की प्रकृति के आधार पर वर्गीकरण-परिक्षिप्त प्रावस्था एवं परिक्षेपण माध्यम के मध्य अन्योन्यक्रिया की प्रकृति के आधार पर कोलॉइड दो प्रकार के होते हैं- (i) द्रवरागी कोलॉइड (ii) द्रवविरागी कोलॉइड।

3. वैद्युत रसायन LONG ANSWER TYPE QUESTIONS

प्रश्न 1. किसी वैद्युत अपघट्य के विलयन की चालकता. मोलर चालकता की परिभाषा दीजिए। सांद्रता के साथ इनके पास की विवेचना कीजिए।

उत्तर⇒ चालकत्व या विशिष्ट चालकत्व (k कप्पा) प्रतिरोधकता के व्युत्क्रमानुपाती होते हैं।
          यह उस पदार्थ की चालकता है जो लम्बाई में 1 मीटर और पृष्ठीय क्षेत्रफल 1m2 हो।
इसके लिए इकाई सिमेन मी-1 है
1 Scm-1 = 100 Sm-1
1 सिमेन या 1S= 1Ω-1 या 1 मोल
यदि इस विद्युत अपघट्य विलयन को 1cm2 आयतन के बर्तन में तथा इलेक्ट्रोड 1 cm दूरी पर हो, लेते हैं तब चालकत्व विशिष्ट चालकत्व कहलाएगा।
k (कप्पा) के लिए इकाई = Ω-1 Cm-1
मोलर चालकत्व : मोल वैद्युत अपघट्य उत्पन्न आयनों से उत्पन्न चालकत्व मोलर चालकत्व कहलाता है। इसे λ (लेम्डा) द्वारा दर्शाया जाता है। मोलर चालकता व विशिष्ट चालकत्व में संबंध – λm = k/M.
जहाँ M मोलर सांद्रता है यदि M की इकाई मोलरता है अर्थात् मोल/लीटर तब λm होगा।
जहाँ M मोलर सांद्रता है यदि M की इकाई मोलरता है अर्थात् मोल/लीटर तब λm होगा।
मोलर चालकत्व की इकाई Sm2 mol-1
विशिष्ट चालकत्व : विशिष्ट चालकत्व या चालकत्व सांद्रता घट घटती है क्योंकि प्रति Cm3 आयतन में आयन संख्या कम होती हैं मोलर चालकत्व या सांद्रता के साथ इसके माने को दर्शाने के लिए दुर्बल या प्रबल वैद्यत अपघट्य द्वारा उत्पन्न चालकत्व को लेते हैं।
(i) दुर्बल वैद्युत अपघट्य का चालकत्व : λm पर सांद्रता के प्रभाव को प्रति Cm3 आयतन में आयन संख्या से समझा जा सकता है। आयनों की नियोजन डिग्री पर निर्भर करती है। सांद्रता घटने पर वियोजन डिग्री बनती है परिणामस्वरूप मोलर सांद्रता बढ़ती है।
वियोजन डिग्री को निम्न अनुसार मापा जा सकता है।
वियोजन डिग्री को निम्न अनुसार मापा जा सकता है।
जहाँ α वियोजन डिग्री, Λmc मोलर चालकत्व तथा C सांद्रता पर
(ii) प्रबल वैद्युत अपघट्य का चालकत्व : प्रबल वैद्युत अपघट्य के लिए सांद्रता घटने पर आयन की संख्या नहीं बढ़ती है क्योंकि प्रबल अपघट्य पर्णरूप से वियोजित हो जाता है हालांकि सांद्र विलयन में आयनों के मध्य प्रबल आकर्षण होता है। इस प्रबल आकर्षण बल के कारण आयन का चालकत्व कम होता है। सांद्रता कम करने पर आयनों के बीच दूरी बढ़ जाती है परिणामस्वरूप चालकत्व बढ़ जाता है। जब सांद्रता निम्नतम रूप में होती है तब आयनों के मध्य आकर्षण बल न के बराबर होता है तब मोलर चालकत्व अनन्त को छूता है। ऐसी स्थिति में λm को λ द्वारा दर्शाते हैं।
जहाँ α वियोजन डिग्री, Λmc मोलर चालकत्व तथा C सांद्रता पर

प्रश्न 2. समझाइए कि कैसे लोहे पर जंग लगने का कारण एक वैद्युत रासायनिक सेल बनना माना जाता है ?

उत्तर⇒ वायु तथा जल के संपर्क से लोहे को जंग लगना एक वैद्युत रासायनिक अभिक्रिया है धातु के धरातल पर बहुत-सी सेलों का निर्माण हो जाता है।
.
ऐनोड पर : 2Fe → 2Fe+2 + 4e
E0 Fe+2।Fe = – 0.4400
        इलेक्ट्रॉन खोकर Fe परमाणु Fe+2 आयन में ऑक्सीकृत हो जाता है । उत्पन्न इलेक्ट्रॉन ऑक्सीजन को अपचयित करते हैं जो H+ आयन की उपस्थिति से संभव है।
कैथोड पर : O2 + 4H+ + 4e → 2H2O(I)
E0H+|020 = – 0.23 Volt
पूर्ण अभिक्रिया : 2Fe + O2 +4H+ + 4e → 2Fe2 + 2H2O
E0सेल = 1.67 Volt
वायुमण्डलीय ऑक्सीकरण :
2Fe+2 (aq) + 2H2O (1) + O2(g) → Fe2O3(s) + 4H+ (aq)

प्रश्न 3. कोहलारस्क नियम को परिभाषित करें। यह नियम निम्न के लिए कैसे उपयोगी है ?
1. दुर्बल अपघट्य के लिए Λα की गणना में।
2. दुर्बल अपघट्य के लिए वियोजन डिग्री गणना के लिए।

उत्तर⇒ अनन्त सांद्रता पर किसी वैद्युत अपघट्य की मोलर चालकत्व के द्वारा उत्पन्न आयनों की चालकत्व का योग होता है आयनिक चालकत्व को फार्मूला इकाई में उत्पन्न आयनों की संख्या से गुणा करते हैं ।

गणितीय प्रारूप : AxBy यौगिक के लिए Λαm
xλ0 Λyyλ0BX
जहाँ Aαm अन्नत सांद्रता पर अपघट्य की मोलर चालकत्व है।
तथा λ0Ay और λ0BX धनायन और ऋणायन की मोलर चालकत्व है।

उदाहरण- Λα mNaCl = λα Na+λαcr
ΛαmBaCl2 = λαBa++ λα cl
ΛαmAl2(SO4) = 2λα Al+3 +3 λα SO2-2
साम्यांक चालकत्व के लिए कोहलारस्क नियम के अनुसार अनन्त सांद्रण पर अपघट्यों की साम्यांक चालकत्व दो संख्याओं का मान है एक जो धनायन पर व दूसरी ऋणायन के मान का योग है।
Λαm = λαc+ λαa
जहाँ λαc और λαa आयनिक चालकत्व है जो अनन्त सांद्रण पर है।
कोहलारस्क नियम की उपयोगिता :
1. दुर्बल अपघट्यों की मोलर चालकत्व की गणना करने के लिए-कोहलारस्क नियम दुर्बल अपघट्यों की मोलर चालकत्व की गणना करने के लिए बहुत उपयोगी है। पहले ही वर्णन किया जा चुका है कि Λαm का मान सीधे रूप से ज्ञात नहीं किया जा सकता इसे कोहलारस्क नियम से ज्ञात किया जा सकता है।
उदाहरण-ऐसीटिक अम्ल के लिए Λαm का मान यदि आयनों की मोलर चालकत्व का ज्ञान है तो ज्ञात किया जा सकता है, आयनों की मोलर चालकत्व का मान प्रबल आयनों Cu, COONa, HCl और NaCl की सहायता से ज्ञात किया जा सकता है।
∴        Λαm(CH3COOH) = λ0(CH3COO) + λ0H+
अब λαNa+ और λαcr के मानों को जोड़ने पर घटाने पर
ΛαCH2COOH =λα CH2COO– + λα H- + λαNa- + λα cr+ – λα cl

दुर्बल अपघट्यों की मोलर चालकत्व की गणना करने के लिए

= Λαm (CH2COONa) + Λαm (HCl) – Λαm (NaCl) इसी प्रकार
= Λαm (NH3OH) = Λαm (NH4Cl) + Λαm (NaOH) – Λαm (NaCl)
2. दुर्बल अपघट्यों के लिए वियोजन डिग्री ज्ञात करने के लिए-किसी अपघट्य के लिए मोलर चालकत्व उसकी वियोजन डिग्री पर निर्भर करती है वियोजन डिग्री का मान उच्च है तब उच्च मोलर चालकत्व होगा सांद्रता कम करने पर वियोजन डिग्री का मान बढ़ता है। अनन्त साब पर उच्चतम वियोजन डिग्री होती है।
अतः यदि Λαm किसी सांद्रता पर विलयन की मोलर चालकत्व
Λαm = अनन्त सांद्रता पर मोलर चालकत्व
दुर्बल अपघट्यों की मोलर चालकत्व की गणना करने के लिए

प्रश्न 4. वैधुत रासायनिक सेल I है ? यह किस सिद्धान्त पर कार्य करती है ? डेनियल सेल की कार्य प्रणाली का वर्णन करें। लवण सेतू का क्या कार्य है ? इस प्रकार की सेल के उदाहरण दें।

उत्तर⇒ एक वोल्टीय/गैल्वेनिक/वैद्युत रसायन सेल व यंत्र होता है जो रासायनिक ऊर्जा को वैद्युत ऊर्जा में बदलता है।
           गिब्ज ऊर्जा का घटता मान विद्युत ऊर्जा का मापन करता है।

दुर्बल अपघट्यों की मोलर चालकत्व की गणना करने के लिए
अर्ध ऑक्सीकरण सेल निरूपण

-ΔG0 =Wवैधुत = nFE0
E0 = e.m.f. सेल
n = इलेक्ट्रॉन संख्या
F = पैफराडे = 96500 कूलॉम
          इस प्रकार की एक सेल का नाम डेनियल सेल है
          डेनियल सेल में जिंक पट्टी को ZnSO4 विलयन में डुबोया जाता है और कॉपर पट्टी को कॉपर सल्फेट विलयन में। दोनों बीकरों को लवण सेत से जोड़ा जाता है। बाह्य परिपथ में एक वोल्टमापी जोड़ा जाता है।
          वोल्टमापी में हलचल दर्शाता है कि दोनों इलैक्ट्रोड के बीच विद्युत विभव उत्पन्न हुआ। धारा बाह्य परिपथ में कैथोड से ऐनोड की ओर तथा इलेक्ट्रॉन ऐनोड से कैथोड की ओर गमन करते हैं।
सेल की कार्य विधि :
          (i) जिंक परमाणु ऑक्सीकृत होकर जिंक आयन बनाते हैं।
Zn(s) → Zn+2 + 2e
          (ii) उत्पन्न इलेक्ट्रॉन कॉपर तार के माध्यम से कॉपर पट्टी की ओर गमन करते हैं।
          (iii) कॉपर आयन कॉपर प्लेट की ओर गमन कर इलेक्ट्रॉन ग्रहण करते हैं।
Cu+2 → 2e Cu(s)
          इलैक्ट्रोड जिस पर ऑक्सीकरण होता है ऐनोड कहलाता है तथा जिस इलैक्टोड पर अपचयन होता है कैथोड कहलाता है। सेल में ऑक्सीकरण से ऐनोड इलेक्ट्रॉन स्रोत बनता है। तथा अपचयन के कारण कैथोड इलेक्ट्रॉन ग्रहण करता है। अतः विद्युत रसायन सेल में
          कैथोड धन आवेशित टर्मिनल तथा ऐनोड ऋणावेशित टर्मिनल के रूप में कार्य करते हैं।
          लवण सेतू कार्य : वैद्युत रसायन सेल में लवण सेतू निम्न दो काई करता है-
          1. परिपथ पूर्ण कर धारा प्रवाह में सहायक है।
          2. वैद्युत अपघट्य के आयन लवण सेतु के माध्यम से ऐनोड की ओर गमन करता है अतः लवण सेतू आयनों को एक जगह इकट्ठा होने से रोकता है तथा धारा प्रवाह को बनाए रखता है। कभी-कभी वैद्युत रसायन सेल में लवण सेतू के स्थान पर छिद्रयुक्त माध्यम लगाया जाता है जो इलेक्ट्रॉन प्रवाह तथा आयन के स्थानान्तरण को बनाए रखते हैं।
          गैल्वेनिक सेल का निरूपण-गैल्वेनिक सेल दो अर्ध अभिक्रियाओं का योग है। एक ऑक्सीकरण अर्ध सेल तथा दूसरी अपचयन अर्ध सेल के नाम से जाना जाता है। यदि तत्त्व को M से तथा धनात्मक Mn+ से निरूपित किया जाए तब
          अर्ध ऑक्सीकरण सेल निरूपण M | Mn+(c) अर्ध अपचयन सेल निरूपण Mn+ (c) | M.
दोनों निरूपण में C का अर्थ सांद्रता है तथा कैथोड को दाईं तथा ऐनोड को बाईं ओर रखा जाता है। दोहरी रेखाओं के नीचे दर्शाया जाता है। कुछ प्रभाव वैद्युत रसायन सेल को सारणी के रूप में नीचे दर्शाया गया है –
प्रश्न 5. मोलर चालकता पर तनुता का क्या प्रभाव पड़ता है ?

संख्या में बहुत परिवर्तन नहीं होता है, लेकिन आयनिक मोबाइलिटी बढ़ता है

उत्तर⇒ दुर्बल विद्युत अपघट्य की आण्विक चालकता सांद्रण घटने और तनुता बढ़ने से तेजी से बढ़ता है क्योंकि दोनों आयनों की संख्या और आयनिक मोबाइलिटी तनुता से बढ़ता है।
          सबल विद्युत अपघट्य की आण्विक चालकता तनुता बढ़ने से बहुत धीरे-धीरे बढ़ती है क्योंकि आयनों की संख्या में बहुत परिवर्तन नहीं होता है, लेकिन आयनिक मोबाइलिटी बढ़ता है।
प्रश्न 6. फैराडे के विद्युत विच्छेदन के प्रथम नियम को लिखें। विद्युत रासायनिक तुल्यांक की परिभाषा दीजिये।

उत्तर⇒ फैराडे का प्रथम नियम-फैराडे के विद्युत विच्छेदन के प्रथम नियमानुसार, विद्युत विच्छेदन में इलेक्ट्रोड पर मुक्त पदार्थ की मात्रा प्रवाहित धारा की मात्रा के सीधे समानुपाती होती है।
          यदि Q कुलम्ब आवेश से W ग्राम पदार्थ इलेक्ट्रोड पर जमा होता है
          W ∝ W
या       W = ZQ                      चूँकि Q =It
           W = Z It
   जहाँ Z = विद्युत रासायनिक तुल्यांक, I = विद्युत और t = समय
   यदि Q = 1C, I = 1amp और t = 1 सेकेण्ड
   तो W = Z
विद्युत विच्छेदन में 1 कुलम्ब आवेश प्रवाहित करने से इलेक्ट्रोड पर मुक्त पदार्थ के द्रव्यमान को उस पदार्थ का विद्युत रासायनिक तुल्यांक कहते हैं।

प्रश्न 7. निम्नलिखित विधियों द्वारा धाराओं के शोधन के सिद्धान्तों की रूपरेखा दीजिए
         (i) मंडल परिष्करण (ii) वैद्युत अपघटन परिष्करण (iii) वाष्प प्रावस्था परिष्करण।

उत्तर⇒ (i) मंडल परिष्करण-हाँ, 1773 K ताप से नीचे Mg, SiO2 का अपचयन कर सकता है। Si, MgO का अपचयन 1773 K ताप से ऊपर अपचयन करता है।
          (ii) वैद्युत अपघटन परिष्करण-इस विधि में अशुद्ध धातु की ऐनोड बनाते हैं। उसी धातु की शुद्ध धातु इन्हें को कैथोड की तरह प्रयुक्त करते है। उन्हें एक उपयुक्त वैद्युत अपघटनी विश्लेषित में रखते हैं जिसमें उसी धातु का लवण घुला रहता है। अधिक क्षारकीय धातु विलयन में रहती है तथा कम क्षारकीय धातुएँ एनोड पंक में चली जाती है।
एनोड-            M → Mn+ + ne
कैथोड-            Mn+ + ne– → M
           कॉपर का शोधन वैद्युत अपघटनी विधि के द्वारा किया जाता है। अशुद्ध ऐनोड के रूप में तथा शुद्ध कॉपर पत्री कैथोड के रूप में लेते हैं। कॉपर सल्फेट का अम्लीय विलयन वैद्युत अपघटन होता है तथा वैद्युत अपघट्य के वास्तविक परिणामस्वरूप शुद्ध कॉपर ऐनोड से कैथोड की तरफ स्थानांतरित हो जाता है।
.एनोड-            Cu → Cu+2 | 2e
कैथोड-            Cu+2 + → 2e Cu
           फफोलेदार कॉपर से अशुद्धियाँ ऐनोड पंक के रूप में जमा होती है।
           (iii) वाष्प प्रावस्था परिष्करण-इस विधि में धातु को वाष्पशील यौगिक में परिवर्तित किया जाता है। इसके लिए दो आवश्यकताएँ होती हैं-
           (क) उपलब्ध अभिकर्मक के साथ धातु वाष्पशील यौगिक बनाती हो।
           (ख) वाष्पशील पदार्थ आसानी से विघटित हो सकता है।
           निकेल शोधन का मॉन्ड प्रक्रम इस प्रक्रम में निकेल को कार्बन मोनोऑक्साइड के प्रवाह में गरम करके प्राप्त करते हैं।
Ni + 4CO दुर्बल अपघट्यों की मोलर चालकत्व की गणना करने के लिए [Ni(CO)4]
इस कार्बोनिल को और अधिक ताप पर गरम करते हैं जिससे यह विघटित होकर शुद्ध धातु देता है।
Ni(CO)4 दुर्बल अपघट्यों की मोलर चालकत्व की गणना करने के लिएNi + 4CO
         जिर्कोनियम या टाइटेनियम शोधन के लिए वॉन आरकैल विधि
         यह विधि Zr तथा Ti जैसी धातुओं में शुद्धिकरण के लिए उपयोगी है। परिष्कत धातु को निर्वाति पात्र में आयोडीन के साथ गरम करते हैं।
Zr + 2l2 → Zrl4
   धातू आयोडाइड को विद्युत धारा में 1800 K ताप पर गरम करते हैं।
Zrl4 → Zr + 2I2

प्रश्न 8 लेड स्टोरेज बैटरी के रिचार्जिंग विधि की व्याख्या करें।

उत्तर⇒ लेड स्टोरेज बैटरी के रिचार्जिंग इस प्रकार की जाती है-
PbSO4(s) + 2e → Pb(s) + SOदुर्बल अपघट्यों की मोलर चालकत्व की गणना करने के लिए(aq) अवकरण
PbSO4 (s) + 2H2O (l) → PbO2 (s) + SOदुर्बल अपघट्यों की मोलर चालकत्व की गणना करने के लिए (aq) + 4H+ (aq) +
.                                                                                 2e ऑक्सीकरण
_____________________________________
2PbSO4 (s) + 2H2O (l) → Pb (s) + PbO2 (s) + 4H+ (aq) +
.                                                                                    2SOदुर्बल अपघट्यों की मोलर चालकत्व की गणना करने के लिए(aq)

4. रासायनिक बलगतिकी LONG ANSWER TYPE QUESTIONS

प्रश्न 1. अभिक्रिया की कोटि तथा अणुकता में अन्तर लिखें।

उत्तर⇒ अभिक्रिया की कोटि तथा अणुकता में निम्नलिखित अन्तर हैं-

अभिक्रिया की कोटिअणुकता
1. अभिक्रिया में लेने वाले उन अणुओं की संख्या जिनका सान्द्रण परिवर्तन होता है। यह प्रयोग द्वारा ज्ञात की जाती है। इसका मान शून्य, पूर्ण तथा भिन्न भी हो सकते हैं।यह ताप, दाब एवं सान्द्रण पर निर्भर करता है।अभिक्रिया में भाग लेने वाले कुल अणुओं की संख्या है।यह केवल सैद्धान्तिक मान है। इसका मान हमेशा पूर्ण होता है।यह ताप, दाब तथा सान्द्रण पर निर्भर नहीं करता है।

प्रश्न 2. प्रथम कोटि प्रतिक्रिया के लिए दर स्थिरांक का व्यंजक प्राप्त करें।

उत्तर⇒ प्रथम श्रेणी अभिक्रियाओं का वेग गुणांक (Rate constant of a first order reaction)-एक सामान्य प्रथम श्रेणी अभिक्रिया के लिए,
A → प्रतिफल
           माना कि A का प्रारम्भिक सान्द्रण R0 हैं। जिसमें t समय में x मोल क्रिया कर गये हैं, अतः R मोल शेष बचे हैं।

द्रव्यानुपाती क्रिया के नियमानुसार, अभिक्रिया की दर,-  ∝R
प्रथम कोटि प्रतिक्रिया के लिए दर स्थिरांक का व्यंजक प्राप्त करें
जहाँ k1 प्रथमक्रम की प्रतिक्रिया का दर स्थिरांक है। उपरोक्त समीकरण (i) का समाकलन (integration) करने पर

प्रथम कोटि प्रतिक्रिया के लिए दर स्थिरांक का व्यंजक प्राप्त करें
(जहाँ, C = समाकलन स्थिरांक)
प्रारंभ में जब t = 0, R = R0 तब समीकरण (ii) से,
-loge R0 = C
समीकरण (ii) में C का मान रखने पर,
-loge R = kt – logeR
या, kt = loge
यह प्रथम क्रम अभिक्रिया की दर स्थिरांक का समीकरण कहलाती है
यह प्रथम क्रम अभिक्रिया की दर स्थिरांक का समीकरण कहलाती है।

प्रश्न 3. अर्द्धजीवन काल तथा औसत जीवन काल का वर्णन करें।

उत्तर⇒ अर्द्धजीवन काल-किसी भी रासायानिक प्रतिक्रिया के ठीक अर्द्ध पूरा होने में जो समय लगता है उसे अर्द्धजीवन काल कहा जाता है। इसे t द्वारा सूचित किया जाता है।
प्रथम श्रेणी अभिक्रिया- प्रथम श्रेणी अभिक्रिया के लिय,
अर्द्धजीवन काल तथा औसत जीवन काल का वर्णन करें

        जब प्रतिकारक के प्रारम्भिक मात्रा की आधी मात्रा अपघटित हो चुकी है तब R= t = t½
प्रथम श्रेणी अभिक्रिया समीकरण में रखने पर,
अर्द्धजीवन काल तथा औसत जीवन काल का वर्णन करें
अर्द्धजीवन काल तथा औसत जीवन काल का वर्णन करें

अर्द्धजीवन काल तथा औसत जीवन काल का वर्णन करें
           समीकरण में क्योंकि अभिकरक की सांद्रता भाग नहीं लेती है। अतः यह स्पष्ट है कि प्रथम श्रेणी की अभिक्रिया में t½ अभिक्रिया के प्रारम्भिक सान्द्रता से मुक्त होती है।
औसत जीवन काल- दर स्थिरांक के व्युत्क्रम को औसत जीवन काल कहा जाता है। इसे T द्वारा सूचित किया जाता है। अर्थात् T = 
अर्द्धजीवन काल तथा औसत जीवन काल का वर्णन करें
औसत आयुकाल = 1.41 × अर्द्धजीवन काल

प्रश्न 4. सक्रियण ऊर्जा को समझावें।

उत्तर⇒ सक्रियण ऊर्जा (Energy of activation)-सभी अणु जो टकराते हैं क्रिया नहीं करते अपितु इसमें कुछ ही अणु अर्थात् सक्रिय अणु ही क्रिया करते हैं अतः जो अणु टकराकर क्रिया फलों में बदलते हैं, वे टकराने से पहले निश्चित मान की ऊर्जा प्राप्त कर सक्रिय अणु बन जाते हैं। यह ऊर्जा जो अणु को सक्रिय बनाने में प्रयोग होते हैं सक्रियण ऊर्जा कहलाते हैं। यह अभिक्रिया पर निर्भर होती है। आरहेनियम के समीकरण से,
k = Ae-Eo/RT
(A = आवृत्तिकारक स्थिरांक, Ea = सक्रियण ऊर्जा T = परमताप)
Ea व A दोनों ही अभिक्रिया पर निर्भर करते हैं।
या, loge K = loge A – 
RT यदि दो तापक्रम, T1 व T2 पर दर स्थिरांक k1 व k2 हो तो,
सक्रियण ऊर्जा को समझावें।

प्रश्न 5. समाकलित वेग समीकरण से क्या समझते हैं ? किसी शून्य कोटि एवं प्रथम कोटि की अभिक्रिया के लिए समालित वेग समीकरणों की व्युत्पत्ति करें।

उत्तर⇒ अभिक्रियाओं के सांद्रता पर आधारित तात्कालिक अवकल वेग (समीकरण) निर्धारण आसान नहीं होता है। इससे वेग नियम एवं अभिक्रिया की कोटि को ज्ञात करना कठिन हो जाता है। इस जटिलता से बचने के लिए समीकरण को समाकलित करके समाकलित वेग समीकरण ज्ञात कर लिया जाता है। इससे विभिन्न समय पर अभिक्रियाओं की सांद्रता तथा वेग स्थिरांक के बीच संबंध ज्ञात हो जाता है।
           शून्य कोटि की अभिक्रिया के लिए समाकलित वेग समीकरण की व्युत्पत्ति-कोई अभिक्रिया R → P एक शून्य कोटि की अभिक्रिया है।

समाकलित वेग समीकरण से क्या समझते हैं

या, -d [R] = K.dt

दोनों तरफ समाकलन करने पर- [R] = – Kt + I …(A)
जहाँ I = समाकलन स्थिरांक
जब, t = 0 हो, तो R की सांद्रता = [R]0 होगी।
[जहाँ [R]0 अभिक्रिया की प्रारंभिक सांद्रता]
अब, समीकरण (A) में [R]0 का मान रखने पर
[R]o = – K × 0 + I = I
पुनः I का मान समीकरण (A) में रखने पर
[R] = – Kt + [R]o                                         ….(B)
या, – Kt = [R] – [R]o
या, Kt = [R]o – [R]
और K =                                                 ….(C)
           प्रथम कोटि की अभिक्रिया के लिए समाकलित वेग समीकरण की व्युत्पत्ति
किसी अभिक्रिया R → P के लिए
समाकलित वेग समीकरण से क्या समझते हैं
इस समीकरण का समाकलन करने पर- In [R] = – Kt + I         …(D)
जहाँ I समाकलन स्थिरांक है।
जब t = 0, [R] = [R]0 जहाँ [R]0 = प्रारंभिक सांद्रता
समीकरण (D) के अनुसार, In [R]0 = –K × O+ I = I
समाकलित वेग समीकरण से क्या समझते हैं
इस प्रकार समीकरण (C) एवं (E) क्रमशः शून्य कोटि एवं प्रथम कोटि की अभिक्रियाओं के लिए स्थिरांक (K) प्राथमिक सांद्रता एवं अंतिम सांद्रता के बीच संबंध बताता है। इन्हें ही समाकलित वेग समीकरण कहा जाता है।

प्रश्न 6. अभिक्रिया की अणुकता एवं कोटि को समझाएँ।

उत्तर⇒ अणुकता (Molecularity)-किसी अभिक्रिया में भाग लेने वाले परमाणुओं या अणुओं की न्यूनतम संख्या को अभिक्रिया की अणुकता कही जाती है।
उदाहरण-
      (i) हाइड्रोजन परऑक्साइड के अपघटन में इसका कम-से-कम एक अणु भाग लेता है।

H2O2 → H2O + ½O2
अतः इस अभिक्रिया की अणुकता = 1 है।
         (ii) सोडियम हाइड्रॉक्साइड द्वारा इथाइल ऐसीटेट के जल अपघटन में दोनों के एक-एक अणु भाग लेते हैं।
CH3COOC2H5 + NaOH → CH3COONa + C2H5OH
अतः इस अभिक्रिया की अणुकता = 1 + 1 = 2
जिस अभिक्रिया की अणुकता 1 होती है। उसे एक अणुक अभिक्रिया कहा जाता है। इसी प्रकार 2 तथा 3 अणुकता वाली अभिक्रियाएँ क्रमशः द्विअणुक और त्रिअणुक अभिक्रिया कहलाती है।
           अभिक्रिया की कोटि (Order of reaction)-वेग समीकरण में प्रयुक्त सान्द्रण पदों के घातों के योगफल को अभिक्रिया की कोटि कहा जाता है।
       मान लिया कि किसी अभिक्रिया का वेग निम्नलिखित प्रकार से व्यक्त किया जाता है।
वेग K[A]n1[B]n2[C]n3
जहाँ n1n3 क्रमशः अभिकारक A, B तथा C के सान्द्रण के घात हैं तथा K एक स्थिरांक है।
∴              अभिक्रिया की कोटि = n1 + n2 + n3
उदाहरण
(i) X → प्रतिफल, वेग = K (X)1
∴            अभिक्रिया की कोटि = 1
(ii) x + Y → प्रतिफल, वेग = K [X]’ [Y]1
∴            अभिक्रिया की कोटि = 1 + 1 = 2
(iii) CH3COOCH3 + H2Oसमाकलित वेग समीकरण से क्या समझते हैंCH3COOH+CH3OH
            वेग = K.[CH3COOCH3]4 × स्थिरांक
∴         अभिक्रिया की कोटि = 1

प्रश्न 7. वेग स्थिरांक पर ताप के प्रभाव को समझाएँ।

उत्तर⇒ वेग स्थिरांक पर ताप का प्रभाव-अभिक्रिया का वेग ताप वृद्धि के साथ बढ़ जाता है। यह देखा गया है कि सामान्यतः 10°C ताप वद्धि से अभिक्रियाओं का वेग स्थिरांक लगभग दुगुना या तिगुना हो जाता है।
             ताप के प्रभाव को ताप गुणांक के रूप में व्यक्त किया जाता हैं ताप गुणांक उन दो तापों पर वेग स्थिरांकों का अनुपात है जिसमें 10°C का अन्तर हो।
वेग स्थिरांक पर ताप के प्रभाव को समझाएँ।
उदाहरण-KClO3 का वियोजन 2KCIO3 → 2 KCl + 3O2 तापक्रम की वृद्धि या 10°C तापक्रम बढ़ाने पर KClO3 का वियोजन का दर लगभग दुगुना हो जाता है। ताप में वृद्धि होने पर अणुओं की गति बढ़ जाती है अतः टक्करों की संख्या बढ़ जाती है। जब टक्करों की संख्या बढ़ती है तो प्रतिक्रिया की दर भी बढ़ जाती है। आरहेनियस ने अपने प्रायोगिक निरीक्षणों के आधार पर प्रतिक्रिया के वेग पर ताप के प्रभाव को निम्न समीकरण द्वारा व्यक्त किया-
प्रतिक्रिया की सक्रियण ऊर्जा
         जहाँ K = प्रतिक्रिया का वेग स्थिरांक, T = तापक्र (केल्विन में) R = गैस स्थिरांक तथा, Ea = प्रतिक्रिया की सक्रियण ऊर्जा
यदि Ea ताप के सापेक्ष स्थिर हो तो इस समीकरण का अवकलन करने पर In K =  + C (जहाँ C = अवकलन स्थिरांक है)
इन स्थिरांक का मान In A के बराबर होता है।
अतः In K = –  + InA
या      In K / A = –
या      K = 
जहाँ A को कम्पनावृत्ति गुणक कहा जाता है। उपर्युक्त समीकरण
In K = – + In A
या,        In K = In A
या, 2.303log K = 2.303 log A – 
या, log K = log A- 
मान लिया कि T1 ताप पर वेग स्थिरांक K1 तथा T2 ताप पर स्थिरांक K2 है, तो

log K1 = log A- 
तथा log K2 = log A- 
दोनों को घटाने पर हम पाते हैं कि
उपर्युक्त समीकरण से हम वेग स्थिरांक का मान निकाल सकते हैं।
उपर्युक्त समीकरण से हम वेग स्थिरांक का मान निकाल सकते हैं।

प्रश्न 8. शून्य क्रम की प्रतिक्रिया से आप क्या समझते हैं ?

उत्तर⇒ (a) शून्य क्रम प्रतिक्रिया वह रासायनिक प्रतिक्रिया है जिसके प्रतिक्रिया की दर किसी प्रतिकारक के सांद्रण पर निर्भर नहीं करता है, शून्य क्रम की प्रतिक्रिया कहलाता है। ऐसी स्थिति में प्रतिक्रिया स्थिर दर से आगे बढ़ती है।
शून्य कोटि की प्रतिक्रिया के लिए,
दर = K = स्थिरांक
(i) NH3 का प्लैटिनम सतह पर विघटन (ii) HI का सोने के सतह पर विघटन
(b) रासायनिक प्रतिक्रिया की दर को प्रभावित करने वाले निम्नलिखित कारक हैं-
(i) प्रतिकारकों का सांद्रण-प्रतिकारकों के सांद्रण बढ़ने से प्रतिक्रिया की दर बढ़ता है।
(ii) उत्प्रेरक की उपस्थिति-उत्प्रेरक Activation energy को घटाकर प्रतिक्रिया दर बढ़ाता है।
          तापक्रम-प्रतिक्रिया की दर तापक्रम बढ़ने से बढ़ता है। तापक्रम बढ़ने से प्रभावी टक्करों की संख्या बढ़ जाती है जो प्रतिक्रिया की दर को बढ़ा देता है। यह पाया गया है कि प्रत्येक 10°C तापक्रम बढ़ने से प्रायः प्रतिक्रिया की गति दुगुनी हो जाती है।
(iii) सतह का क्षेत्रफल-प्रतिक्रिया की गति प्रतिकारकों के सतह के क्षेत्रफल बढ़ने से बढ़ता है।
(iv) एक्टीवेशन ऊर्जा-एक्टीवेशन ऊर्जा के मान कमने से प्रतिक्रिया की दर बढ़ती है।

5. पृष्ठ-रसायन LONG ANSWER TYPE QUESTIONS

प्रश्न 1. भौतिक अधिशोषण एवं रासायनिक अधिशोषण में क्या अन्तर है ?

उत्तर⇒ भौतिक अधिशोषण और रासायनिक अधिशोषण में निम्नलिखित अन्तर है-
भौतिक अधिशोषण

(Physical Adsorption)रासायनिक अधिशोषण
1. इसकी अधिशोषण ऊष्मा अपेक्षाकृत कम होती है। अधिशोषण ऊष्मा 1-5 कि. कै, अधिशोषण के प्रति मोल होती है।(Chemical Adsorption)1. इसकी अधिशोषण ऊष्मा अपेक्षाकृत अधिक होती है। अधिशोषण ऊष्मा 20-100 कि. कै. अधिशोष्य के प्रति मोल होती
2. भौतिक अधिशोषण साम्य काफी शीघ्रता (more readily) से स्थापित होता है सामान्यतः उत्क्रमणीय (reversible) होता है।2. रासायनिक अधिशोषण साम्य अपेक्षाकृत धीरे-धीरे स्थापित होता है और यह अनुत्क्रमणीय (irreversiblel) होता है।
3. ये कमजोर वान्डर वाल बल से जुड़े रहते हैं।3. ये मजबूत रासायनिक बन्धन बनाते हैं।
4. इसमें बहुस्तर (multi layers) बनते हैं।4. इसमें एक-अणुक स्तर
(Unimolecular layer) बनता है।
5. दाब के बढ़ने से अधिशोषण का वेग काफी बढ़ जाता है।दाब के बढ़ने से अधिशोषण का वेग काफी बढ़ जाता है।5. अधिशोषण में दाब के वृद्धि का प्रभाव नगण्य घटता है।दाब के बढ़ने से अधिशोषण का वेग काफी बढ़ जाता है।

प्रश्न 2. बहुअणुक एवं वृहदागुण कोलॉइड में क्या अन्तर है? प्रत्येक का एक-एक उदाहरण दीजिए। सहचारी कोलॉइड इन दोनों प्रकार के कोलॉइडों से कैसे भिन्न हैं ?

उत्तर⇒ अवयवों का आकार व प्रकृति के आधार पर कोलॉइडों को निम्न रूप से वर्गीकृत किया जा सकता है
           (क) बहुआण्विक कोलॉइड (ख) वृहदाण्विक कोलॉइड (ग) सहचारी कोलॉइड (मिसेल)।
           (क) बहआण्विक कोलॉइड-विलीन करने पर किसी पदार्थ के बहुत-से परमाणु या लघु अणु एकत्रित होकर पूँज जैसी ऐसी स्पीशीज बनाते हैं। जिनका आकार कोलॉइडी सीमा (व्यास < 1 mm) में होता है। इस प्रकार प्राप्त स्पीशीज बहु आण्विक कोलॉइड कहलाती है। जैसे-एक गोल्ड सोल में अनेक परमाणु युक्त भिन्न-भिन्न आकारों के कण हो सकते हैं। सल्फर सॉल में एक हजार या उससे भी अधिक S8 सल्फर अणु वाले कण उपस्थित होते हैं।
           (ख) वृहदाण्विक कोलॉइड-बृहदाणु उचित विलायकों में ऐसे विलयन बनाते हैं जिनमें वृहदाणुओं का आकार कोलॉइडी सीमा में होता है। ऐसे निकाय वृहदाण्विक कोलॉइड कहलाते हैं। ये कोलॉइड बहुत स्थायी होते हैं जैसे-स्टार्च, सेलुलोज, प्रोटीन और एन्जाइम।
           (ग) सहचारी कोलॉइड (मिसेल)-कुछ पदार्थ ऐसे हैं जो कम सान्दताओं पर सामान्य प्रबल वैद्युत अपघट्य के समान व्यवहार करते हैं परन्तु उच्च सान्द्रताओं पर कणों का पंज बनने के कारण कोलॉइड के समान व्यवहार करते हैं इस प्रकार पूँजित कण मिसेल कहलाते हैं ये सहचारी कोलॉइड भी कहलाते हैं। मिसेल केवल निश्चित ताप से अधिक ताप पर बनते हैं जिसे क्राफ्ट ताप कहते हैं। जैसे–साबुन, अपमार्जक आदि ।

प्रश्न 3. एन्जाइम क्या होते हैं ? एन्जाइम उत्प्रेरण की क्रिया-विधि को संक्षेप में लिखिए।

उत्तर⇒ एन्जाइम जटिल नाइट्रोजनी कार्बनिक यौगिक है जो कि जीवित पौधों एवं जन्तुओं द्वारा उत्पन्न किए जाते हैं। वास्तविक रूप में से उच्च अणु द्रव्यमान वाले प्रोटीन अणु हैं जो जल में कोलॉइडी विलयन बनाते हैं। ये बहुत प्रभावी उत्प्रेरक होते हैं जो अनेक विशेष रूप से प्राकृतिक प्रक्रमों से संबंधित अभिक्रियाएँ को उत्प्रेरित करते हैं। जन्तु एवं पौधों में जीवन प्रक्रम के अनुरक्षण के लिए होनेवाली अनेक शारीरिक अभिक्रियाएँ, एन्जाइमों द्वारा उत्प्रेरित होती है। अतः एन्जाइमों के लिए जैवरासायनिक उत्प्रेरक शब्द का प्रयोग होता है एवं उत्प्रेरण की परिघटना जैवरासायनिक उत्प्रेरण कहलाती है।
           इक्षु शर्करा का प्रतिलोपन इन्वर्टेज एन्जाइम इक्षु शर्करा को ग्लूकोज एवं फ्रक्टोज में परिवर्तित कर देता है।
C12H22O11aqs + H2O (l)अर्द्धजीवन काल C6H12P6 + C6H12O6
.                                                              ग्लूकोज          फ्रक्टोज
एन्जाइम उत्प्रेरक की क्रियाविधि-एन्जाइम के कोलॉइडी कणों की सतहों पर बहुत सारे कोटर होते हैं ऐसे कोटर अभिलक्षणिक आकृति के होते हैं एवं इनमें सक्रिय समूह जैसे-NH2, -COOH, -SH, -OH. आदि होते हैं । वास्तव में यह सतह पर उपस्थित सक्रिय केन्द्र होते हैं। अभिक्रिया के अणु जिनकी परिपूरक आकृति होती है, इन कोटरों में एक ताले में चाबी के समान फिट हो जाते हैं। सक्रिय समूहों की उपस्थिति के कारण एक सक्रिय संकुल बनता है जो विघटित होकर उत्पाद देता है।
               अतः इस प्रकार, एन्जाइम उत्प्रेरित अभिक्रियाओं का दो पदों में सम्पन्न होना माना जा सकता है।
E + S [E – S] → E + P
पद-1 सक्रियता संकुल बनाने के लिए एन्जाइम का सबस्ट्रेट आबंधन
E + S → ES*
पद-2 उत्पाद बनाने के लिए सक्रियता संकुल का विघटन
ES* + E + P

प्रश्न 4. उत्प्रेरक की सक्रियता एवं वरणक्षमता का क्या अर्थ है ?

उत्तर⇒ किसी उत्प्रेरक की योग्यता या सक्रियता निम्न दो बातों पर निर्भर करती है
मा सक्रियता बहत सीमा तक उत्प्रेरक की सक्रियता रसावशोषण की प्रबलता पर निर्भर करती है। सक्रिय होने के लिए अभिक्रियक, उत्प्रेरक पर पर्याप्त प्रबलता से अधिशोषित होने चाहिए। तथापि वे इतनी प्रबलता से अधिशोषित नहीं होने चाहिए कि वे गतिहीन हो जाएँ एवं अन्य अभिक्रियाओं
           के लिए उत्प्रेरक की सतह पर कोई स्थान रिक्त न रहे। हाइड्रोजन अभिक्रियाओं के लिए यह पाया गया है कि उत्प्रेरकों सक्रियता आवर्त सारणी में वर्ग 5 से 11 के तत्वों तक बढ़ती है, जिनमें वर्ग 7 से 9 के तत्व अधिकतम सक्रियता दर्शाते हैं।
2H2(g) + O2(g)अर्द्धजीवन काल तथा औसत जीवन काल का वर् 2H2O(l)
(ii) वरणात्मकता (चयनात्मकता)-किसी उत्प्रेरक की वरणात्मकता उसकी किसी अभिक्रिया को दिशा देकर एक विशेष उत्पाद बनाने की क्षमता है जैसे-H2 एवं CO से प्रारंभ करके एवं भिन्न उत्प्रेरकों के प्रयोग से हम भिन्न-भिन्न उत्पाद प्राप्त कर सकते हैं।
(i) CO(g) + 3H2(g)CH4 (g) + H2O(g)
(ii) CO(g) + 2H2(g) CH3OH(g)
(iii) CO(g) + H2(g)वरणात्मकता (चयनात्मकता)-किसी उत्प्रेरक की वरणात्मकता उसकी किसीHCHO(g)
             अतः उत्प्रेरक के कार्य की प्रकृति अत्यधिक विशिष्ट होती है, अर्थात् कोई पदार्थ एक विशेष अभिक्रिया के लिए ही उत्प्रेरक हो सकता है, सभी अभिक्रियाओं के लिए नहीं। अर्थात् एक पदार्थ जो एक अभिक्रिया में उत्प्रेरक का कार्य करता है, अन्य अभिक्रियाओं को उत्प्रेरित करने में असमर्थ हो सकता है।

साबुन की क्रिया पायसीकरण एवं मिसेल बनने के कारण होती है

प्रश्न 5. साबुन की क्रिया पायसीकरण एवं मिसेल बनने के कारण होती है, इस पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर⇒ साबुन तथा अपमार्जक दोनों शोधन कार्य मिसेल के रूप में इमल्शन बना कर करते हैं। इमल्शन बनने के कारण जल का पृष्ठ तनाव कम हो जाता है। साबुन तथा अपमार्जक के अणु की संरचना में एक सिरा जल स्नेही व दूसरा लम्बी हाइड्रोकार्बन शृंखला वाला सिरा जल विरोधी होता है।
CH2(CH2)15 CH2-COONa+
                                   पूँछ सिर
अनेक अणुओं के हाइड्रोकार्बन सिरे मैल या तेल को चारों तरफ से घेर लेते हैं तथा सल्फोनिया सिरे दूर हटे होने से मिसेल बन जाते हैं। इन्हीं मिसेलों के कारण धूल या तेल कण कपड़े से अलग हो जाते हैं।

प्रश्न 6. निम्न पदों (शब्दों) को समझाइए
(i) वैद्युत कण संचलन, (ii) स्कंदन, (iii) अपोहन, (iv) टिन्डल प्रभाव।

निम्न पदों (शब्दों) को समझाइए

उत्तर⇒ (i) वैद्युत कण संचलन-
          कोलॉइडी कणों पर आवेश की
उपस्थिति वैद्युत कण संचलन प्रयोग
प्रारम्भिक से संपुष्ट होती है। जब
एक कोलाइडी विलयन में स्तर डूब
हुए दो प्लैटिनम इलैक्ट्रोडों पर विद्युत
विभव लगाया जाता है तो कोलॉइडी
कण एक या दूसरे इलैक्ट्रोडों की
ओर गमन करते हैं। विद्युत विभव
के प्रभाव में कोलॉइडी कणों का
संचलन वैद्युत कण संचालन कहलाता
है। धनात्मक आवेशित कण कैथोड की ओर जबकि ऋणात्मक आवेशित कण ऐनोड की ओर गति करते हैं।
               जब किसी उपयुक्त प्रकार के कण संचलन अर्थात् कणों की गति रोकी जाती है तो यह देखा जाता है कि परिक्षेपण माध्यम विद्युत क्षेत्र में गति करना प्रारम्भ कर देता है। यह परिघटना वैद्युत परासरण कहलाती है।
               (ii) स्कंदन-द्रवविरागी सॉल का स्थायित्व कोलॉइडी कणों पर आवेश के कारण होता है। यदि किसी प्रकार आवेश हटा दिया जाये तो कण एक-दूसरे के समीप आकर पुंजित हो जायेंगे एवं गुरुत्व बल के कारण नीचे बैठ जायेंगे। कोलॉइडी कणों के नीचे बैठ जाने का प्रक्रम सॉल का स्कंदन या अवक्षेपण कहलाता है।
               (iii) अपोहन यह एक उपयुक्त झिल्ली द्वारा अपोहन करके कोलॉइडी विलयन में से घुले हुए पदार्थों को निकालने का प्रक्रम है। चूंकि वास्तविक विलयन के कण जातव झिल्ली, पार्चमेन्ट पत्र या सेलोफेन शीट में से निकल सकते हैं, परन्तु कोलॉइडी कण नहीं, अतः झिल्ली को अपोहन में प्रयुक्त किया जाता है। इस उद्देश्य के लिए प्रयुक्त उपकरण अपोहक कहलाता है। कोलॉइडी विलयन से भरा एक उपयुक्त झिल्ली का बैग एक पात्र में लटकाया जाता है जिसमें से होकर जल निरंतर बहता रहता है। अणु एवं आयन झिल्ली से विसरित बाहरी जल में आ जाते हैं एवं शुद्ध कोलॉइडी विलयन शेष रह जाता है।
               (iv) टिन्डल प्रभाव यदि अंधेरे में रखा एक समांगी विलयन प्रकाश की दिशा से देखा जाए तो यह स्वच्छ दिखाई देता है परन्तु इसे प्रकाश के पथ की दिशा में समकोण दिशा में देखने पर वे मंद से प्रबल दूधियापन दर्शाते हैं। यह प्रभाव टिन्डल प्रभाव कहलाता है।

प्रश्न 7. (क) निम्न को परिभाषित करें :
(i) अधिशोषक (ii) विशेषांक (iii) अवशोषण (iv) अधिशोषण एन्थेल्पी (v) अधिशोषण प्रतियोगिता।
(ख) विलयन में अधिशोषण कैसे उत्पन्न होता है ?

उत्तर⇒ (क) (i) अधिशोषक-अणुक स्पीशीज या पदार्थ जो पृष्ठ पर सांद्रित या संचित होना अधिशोषण कहलाता है तथा पदार्थ जिसके पृष्ठ पर अधिशोषण होता है। अधिशोषक कहलाता है।
               (ii) विशेषांक-अधिशोष्य पदार्थ को अधिशोषण से दूर करना विशोषण कहलाता है। विशोषण पदार्थ को गरम करने या दाब कम करने पर होता है।
               (iii) अवशोषण-अवशोषण प्रक्रम में पदार्थ में ठोस के संपूर्ण स्थूल में समान रूप से वितरित हो जाता है। उदाहरण-अमोनिया जल द्वारा अवशोषित किया जाता है जबकि चारकोल द्वारा अमोनिया का अधिशोषण होता है। इसी प्रकार अजलीय CaCl2 द्वारा जलवाष्प का अवशोषण किया जाता है परन्तु सिलिका जेल द्वारा अधिशोषण होता है।
               (iv) अधिशोषण एन्थैल्पी-अधिशोषक के पृष्ठ पर 1 मोल अधिशोष्य का अधिशोषण में एन्थैल्पी परिवर्तन अधिशोषण से अधिक होती है। रसायन अधिशोषण में ऊर्जा परिवर्तन 40-400 kJ/मोल है। जबकि भौतिक अधिशोषण में ऊर्जा परिवर्तन 40 kJ/मोल है।
               यह भी देखा गया है कि अधिशोषण में ऐन्थैल्पिक मान घटता है। अतः अधिशोषण प्रक्रम के लिए ΔH = + ve, ΔS = + ve, AG = – ve

-log R = kt - log.

               (v) अधिशोषण प्रतियोगिता-भिन्न-भिन्न अधिशोषकों के बीच अधिशोष्यों को अधिशोषण के लिए एक प्रतियोगिता होती है। अधिक प्रबलता से अधिशोषण होने वाले पदार्थ दुर्बल अधिशोषक की ओर गति करते हैं। उदाहरण-गैस मास्क में लिया गया चारकोल द्वारा O2, N3 आदि जैसी गैसें पहले ही अधिशोषित होती हैं। लेकिन जहरीली गैसें जैसे-CH4 और Cl2 आदि को अधिशोषित किया जाता है।
               अतः जब गैसों के मिश्रण को अधिशोषण के लिए अधिशोषक के समीप रखा जाता है तब प्रबलता से अधिशोषित होनेवाली गैस आसानी से अधिशोषित होती है।
               उदाहरण-वायु में उपस्थित वाष्प सिलिका जेल द्वारा अधिशोषित होते हैं।
               (ख) विलयन द्वारा अधिशोषण-ठोस, विलयनों से भी घुले हुए पदार्थों का अधिशोषण कर सकते हैं। जैसे-जब ऐसीटिक अम्ल का जलीय विलयन को चारकोल के साथ हिलाया जाता है तो अम्ल का एक अंश चारकोल के द्वारा अधिशोषित हो जाता है एवं विलयन में अम्ल की सान्द्रता घट जाती है।
               फ्रॉयन्डलिक समीकरण विलयनों से अधिशोषण के व्यवहार का इस अंतर के साथ सन्निकट वर्णन करती है।
= kc1/nn >1                                         ….(i)
फ्रायन्डलिक अधिशोषक समतापी
                                        ….(ii)
               यह लैंग्मयूर अधिशोषण समतापी कहलाता है।
               समीकरण (i) व (ii) से ठोस द्वारा गैसों का अधिशोषण ज्ञात किया जाता है।

प्रश्न 8. निम्न पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें :
(i) समांगी उत्प्रेरण (ii) विषमांगी उत्प्रेरण (iii) एन्जाइम उत्प्रेरण।

उत्तर⇒ (i) समांगी उत्प्रेरण-जब अभिक्रिया एवं उत्प्रेरक समान प्रावस्था में हों तो प्रक्रम समांगी उत्प्रेरण कहलाता है। समांगी उत्प्रेरण निम्न हैं-
(a) RCOOR1 (l) + H2O(l RCOOH + R1OH
कार्बनिक एस्टेट कार्बोक्सिल अम्ल एल्कोहल
(b) 2CO(g) + O2(g) निम्न पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें 2CO2(g)
(c) C12H22O11 (aqs) + H2O (l) निम्न पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें C6H12O6 + C6H12O6
.                                                                          ग्लूकोस      फ्रुक्टोस
         (ii) विषमांगी उत्प्रेरण-उत्प्रेरक जिसमें अभिक्रियक एवं उत्प्रेरक निम्न प्रावस्थाओं में होते हैं, विषमांगी उत्प्रेरण कहलाता है।
         (a) Pt की उपस्थिति में सल्फर डाइऑक्साइड का सल्फर ट्राइऑक्साइड में ऑक्सीकरण

2SO2 (g) Pt की उपस्थिति में सल्फर डाइऑक्साइड का सल्फर ट्राइ 2SO3(g)
(b) वनस्पति तेल (l) + H2Pt की उपस्थिति में सल्फर डाइऑक्साइड का सल्फर ट्राइ वसा (s)
(c) N2(g) + 3H2(g)Pt की उपस्थिति में सल्फर डाइऑक्साइड का सल्फर ट्राइ2NH2(g)
(d) CO(g) + 2H2(g)CH3OH(l)
(e) H2C = CH2 + H2Pt की उपस्थिति में सल्फर डाइऑक्साइड का सल्फर ट्राइCH3 – CH3
(iii) एन्जाइम उत्प्रेरण-एन्जाइम जटिल नाइट्रोजनी कार्बनिक यौगिक है जो कि जीवित पौधे एवं जन्तुओं द्वारा उत्पन्न किए जाते हैं।
ये उच्च अणु द्रव्यमान वाले प्रोटीन अणु है जो जल में कोलॉइडी विलयन बनाते हैं। एन्जाइम का एक अणु अभिक्रियक के दस लाख अणुओं को प्रति मिनट परिवर्तित कर सकता है।

उदाहरण- NH2CONH2 + H2OPt की उपस्थिति में सल्फर डाइऑक्साइड का सल्फर ट्राइ2NH3 + 2CO2 प्रत्येक एन्जाइम की विशिष्टता किसी एक अभिक्रिया के लिए होती है। एन्जाइम उत्प्रेरित अभिक्रिया दो पदों में सम्पन्न होती है।
E + S (E – S) → E + P
पद (i)-सक्रिय संकुल बनाने के लिए एन्जाइम का सबस्ट्रेट से आबंधन
E + S → ES
पद (ii)-उत्पाद बनाने के लिए संक्रियत संकुल का विघटन
ES → E + P

प्रश्न 9. अधिशोषण और अवशोषण में आप कैसे विभेद करेंगे ?

Pt की उपस्थिति में सल्फर डाइऑक्साइड का सल्फर ट्राइ

उत्तर-अधिशोषण और अवशोषण के बीच विभेद (Distinction between adsorption and absorption)-अधिशोषण और अवशोषण के बीच स्पष्ट अन्तर है। अधिशोषण अन्तर हैं अधिशोषण एक पृष्ठीय घटना है तथा इसमें ठोस या द्रव अधिशोषक पदार्थ के आण्विक स्पीशिज को अपने पृष्ठ पर धारण (retain) करते हैं, किन्तु अपने परिमाण के अन्दर नहीं जाने देते हैं। इसके विपरीत अवशोषण में पदार्थ के आण्विक स्पीशिज ठोस या द्रव के सिर्फ पृष्ठ से चिपके नहीं रहते हैं, बल्कि उसके परिमाण के अन्दर भी समरूप तरीके से वितरित (distributed) हो जाते हैं। इस प्रकार स्पष्ट होता है कि अधिशोषण में अधिशोषित की सांद्रता में अधिशोषक के सिर्फ पृष्ठ पर वृद्धि होती है, जबकि अवशोषण में अवशोषित पदार्थ के सान्द्रण में अवशोषक पदार्थ के सम्पूर्ण पिण्ड (body) में वृद्धि समरूप होती है। उदाहरणार्थ स्पांज (sponge) जल को तथा P2O5 और निर्जल CaCl2 जलवाष्प का अवशोषित करते है। चॉक (Chalk) के पृष्ठ पर स्याही (ink) तथा चारकोल के पृष्ठ पर घोल में ऐसिटिक अम्ल और अक्रियाशील (inen) गैसों जैसा अनेक गैसें अधिशोषित होती हैं। अमोनिया गैस जल में अवशोषित होती है जबकि चारकोल के पृष्ठ पर अधिशोषित होती है। अधिशोषण और अवशोषण की घटनाओं को निम्नांकित प्रकार से निरूपति कर सकते हैं-
प्रश्न 10. अधिशोषण को प्रभावित करने वाले कौन-कौन से कारक है ?

उत्तर⇒ अधिशोषण को प्रभावित करने वाला कारक-अधिशोषण को निम्नांकित कारक प्रभावित करते हैं-

          (i) तापमान का प्रभाव (Effect of Temperature)-अधिशोषण की घटना में ऊष्मा ऊर्जा मुक्त होती हैं अतः ली शेंटेलियर सिद्धान्त के अनुसार, तापमान में वृद्धि होने पर अधिशोषण की सीमा कम जाती है।
          उदाहरणार्थ, 660 मिमी दाब पर 1 ग्राम चारकोल 0°C पर 10C.C नाइट्रोजन, तथा 29°C पर 20C.C नाइट्रोजन तथा-78°C पर 45.C.C. नाइट्रोजन को अधिशोषित करता है।
          (ii) दाब अथवा सान्द्रण का प्रभाव-चूंकि किसी ठोस के पृष्ठ पर गैस के अधिशोषण की घटना में गैस के दाब में कमी होती है, ली शैटेलियर सिद्धान्त के अनुसार गैस के दाब में वृद्धि होने पर गैस के अधिशोषण का परिमाण बढ़ जाता है। ठोस अधिशोषक के प्रति इकाई क्षेत्रफल (area) या द्रव्यमान (mass) पर गैस के अधिशोषण के परिमाण का दाब के साथ विवरण व्यक्त करने के लिए फ्रायण्डलिक (Freundich : 1909) ने एक समीकरण दिया है जो निम्नांकित प्रकार है-
 – KP1/n
m

प्रश्न 11. ठोसों द्वारा गैसों के अधिशोषण पर दाब एवं ताप के प्रभाव की विवेचना कीजिए।

उत्तर⇒ ठोस पर गैस के अधिशोषण के लिए दाब का प्रभाव-दाब के प्रभाव को फ्रॉयन्डलिक अधिशोषण समतापी द्वारा वर्णित किया जा सकता है। अधिशोषण एक उत्क्रमणीय प्रक्रम होता है और इसे दाब को कम कर प्राप्त किया जा सकता है। इसलिए यह संभव है कि दाब बढ़ने पर अधिशोषण
बढता है। साम्य दाब Ps पर  का मान अधिकतम होता है और इससे अधिक अधिशोषण नहीं हो सकता चाहे दाब को और अधिक बढ़ाया जाए।
(i) कम दाब पर-(ग्राफ में A से B तक वक्र)
 p1
 kp’ जहाँ k स्थिरांक है। स्थिर ताप  व P मध्य ग्राफ Ps
ठोसों द्वारा गैसों के अधिशोषण पर दाब एवं ताप के प्रभाव की विवेचना

ठोसों द्वारा गैसों के अधिशोषण पर दाब एवं ताप के प्रभाव की विवेचना
          समीकरण (1) व (2) फ्रॉयन्डलिक अधिशोषण समपाती समीकरण है जो गैस को ठोस द्वारा अधिशोषित करने पर दाब के प्रभाव को वर्णित करता है।
          (ख) ताप का प्रभाव (ठोस द्वारा गैस के अधिशोषण पर) अधिशोषण एक वास्तविक साम्यावस्था है। इसमें दो विपरीत प्रक्रम संपन्न होते हैं (1) अधिशोषण (2) विअधिशोषण प्रक्रम
ठोसों द्वारा गैसों के अधिशोषण पर दाब एवं ताप के प्रभाव की विवेचना

क्योंकि अधिशोषण एक ऊष्माक्षेपी प्रक्रम है।
इसलिए ली-चेटलियर सिद्धांत के अनुसार
ताप बढ़ने पर अधिशोषण घटता है।
            स्थिर दाब पर  तथा तापमान के मध्य खींचा गया ग्राफ अधिशोषण समतापी वक्र कहलाता है। भौतिक अधिशोषण तथा रासायनिक अधिशोषण के लिए अधिशोषण समतापी वक्र निम्न हैं।
भौतिक अधिशोषण-दोनों समतापी वक्र एक दूसरे से भिन्न है, जहाँ
भौतिक अधिशोषण समतापी वक्र दर्शाता है कि  का मान तापमान के बढ़ने पर घटता है, वहीं रासायनिक अधिशोषण समतापी वक्र पहले ताप के बढ़ने पर बढ़ता है लेकिन बाद में ताप के बढ़ने पर  का मान घटता है।

6. तत्त्वों के निष्कर्षण के सामान्य सिद्धांत LONG ANSWER TYPE QUESTIONS

प्रश्न 1. हेमाटाइट अयस्क से लोहे का निष्कर्षण धमन भट्टी (Blast furmace) से कैसे किया जाता है? धातुकर्म की व्याख्या करते हुए अभिक्रिया भी लिखें।

उत्तर⇒ लोहे का अयस्क हेमाटाइट (Fe2O3) है जिसमें मुख्य रूप से बालु सिलिका (SiO2) अशुद्धि होता है। हेमाटाइट (Fe2O3) को कोक (C) तथा चुना पत्थर (CaCO3) के साथ वात्या भट्टी (Blast furnace) में डाला जाता है।
          आयरन के ऑक्साइड अयस्कों को निस्तापन/भर्जन के द्वारा सांद्रण के उपरांत चुना पत्थर तथा कोक के साथ वाल्या भट्टी (धमन भट्टी) में ऊपर से डाला जाता है।

हेमाटाइट अयस्क से लोहे का निष्कर्षण धमन भट्टी
          निस्तापन-अयस्क का निस्तापन किया जाता है जो फेरस ऑक्साइड को फेरिक ऑक्साइड में बदल देता है।
          जारण-जारण के द्वारा वाष्पशील अशुद्धि को दूर किया जाता है तथा धातु ऑक्साइड को अपचयित किया जाता है।
4FeO (s) + O2 (g) → 2Fe2O3 (s)
S+O2 (g) → SO2 (g)↑
4As + 3O2 (g) → 2As2O3 (g)↑
वात्या भट्टी (धमन भट्टी) को निचली सतह पर होने वाली अभिक्रिया
C (s) + O2 (g) → CO2 (g)
निचले स्तर का ताप 2170 K होता है।
मध्यम स्तर पर होने वाली प्रतिक्रिया
CaCO3 (s) → CaO (s) + CO2 (g)
CaO (s) + SiO2 → CaSiO3
                            धातुमल कैल्शियम सिलिकेट
माध्यम स्तर के कोक (C) कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) से प्रतिक्रिया करती है तथा कार्बन मोनोऑक्साइड देती है तथा तापमान को गिरा देती है।
C (s) + CO2 (g) → 2CO (g)
वात्या भट्टी के ऊपरी स्तर पर होने वाली प्रतिक्रिया जो तापमान 800 1100 K में होती है।
3Fe2O3 (s) + CO (g) → 2Fe3O4 + CO2 + (g)
Fe3O + CO (g) → 3FeO + CO2 (g)
FeO (s) + CO (g) → Fe (s) + CO2 (g)
            कार्बन मोनोऑक्साइड जो मध्यम स्तर में बनता है, अपचायक का कार्य करता है तथा हेमाटाइट से लोहे को पूर्णतः मुक्त कर देता है।
            गलित लोहे के ऊपर धातुमल (CaSiog) तैरता रहता है, जिसे निकासी से अलग कर लिए जाता है।
            वात्या भट्टी से प्राप्त लोहे में लगभग 40% कार्बन तथा अन्य अशुद्धियाँ जैसे S, P, Si, Mn, सूक्ष्म मात्रा में उपस्थित रहते हैं। यह कच्चा लोहा (Pig iron) के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 2. अमोनिया का औद्योगिक उत्पादन कैसे किया जाता है ?

उत्तर⇒ व्यापक स्तर पर अमोनिया हाबर प्रक्रम द्वारा बनाई जाती है।
N2(g) + 3H2(g) 2NH3(g) + 4H2O(I) + Cr2O3
            ला-शतैलिए सिद्धान्त के अनुसार उच्च दाब अमोनिया निर्मित करने के लिए अनुकूल होता है। अमोनिया के उत्पादन के लिए अनुकूलतम परिस्थितियाँ 200 x 105 Pa वायुमंडल दाब, 700K ताप तथा थोड़ी मात्रा में K2O तथा Al2O3 युक्त आयरन ऑक्साइड जैसे उत्प्रेरक का उपयोग होता है ताकि साम्य अवस्था प्राप्त करने की दर बढ़ाई जा सके।
युक्त आयरन ऑक्साइड जैसे उत्प्रेरक का उपयोग होता है

प्रश्न 3. (क) ऑक्सीकरण अभिक्रिया से धातु निष्कर्षण कैसे किया जाता है ?
(ख) शोधन से आप क्या समझते हैं ? शोधन में उपयोग कुछ विधियों का वर्णन करें।

उत्तर⇒ (क) विशेषकर अधातुओं का परिष्करण ऑक्सीकरण पर निर्भर करता है।
उदाहरण- ब्राइन से क्लोरीन प्राप्त करना।
2Cl (aq) + 2H2O → 2OH (aq) + H2(g) + Cl2(g)
ΔG° = + 422 kJ
        जब इसे E° में बदलते हैं तब E = 2.2 volt
        वास्तव में यह 2.2 से ज्यादा विभव आवश्यकता होती है लेकिन वैद्युत अपघटन के लिए इस व्यवधान को दूर करने के लिए ज्यादा विभव की आवश्यकता होती है अतः वैद्युत अपघटन द्वारा Cl2 प्राप्त होती है NaOH उपोत्पाद के रूप में NaCl के लिए भी वैद्युत अपघटन किया जाता है। परन्तु इससे Na प्राप्त होता है न कि NaOH सोना-चाँदी आदि का धातु के निक्षालन विधि द्वारा प्राप्त करते हैं। यह भी एक ऑक्सीकरण अभिक्रिया है।

Ag → Ag+ या Au → Au+
4Au(s) + 8CN (aq) + 2H2O(aq) + O2(g)
→ 4[Au(CN)2](aq) + 40H aq
2[Au(CN)2] (aq) + Zn(s) 2Au + (Zn (CN)4]2- (aq)
          अभिक्रिया में जिंक अपचायक के रूप में कार्य करता है।
          (ख) किसी विधि द्वारा उत्पन्न धातु पूर्ण शुद्ध नहीं होती। पूर्ण शुद्ध धातु प्राप्त करने के लिए विभिन्न विधियों का उपयोग किया जाता है। ये विधियाँ संयुक्त रूप से शोधन विधियाँ कहलाती है। जैसे- (i) आसवन (ii) द्रवगलन (iii) वैद्युत अपघटन (iv) मंडल परिष्करण (v) वाष्प प्रावस्था (vi) वर्णलेखिकी।

प्रश्न 4. हैबर विधि से अमोनिया गैस बनाने के सिद्धान्त को NH3 से HNO3 में परिवर्तन करने के सिद्धांत और समीकरण को लिखिए।

उत्तर⇒ हैबर विधि-
इस विधि में अमोनिया गैस का उत्पादन सीधे नाइट्रोजन गैस और हाइड्रोजन गैस के संयोग से अधिक दाब (लगभग 200 वायु….) और कम तापक्रम (450°C) पर उत्प्रेरक की उपस्थिति में किया जाता है।
                  N2 + 3H2  2NH3 + Qk cal.
         यह ऊष्माक्षेपी आयतन में संकुचन और उत्क्रमणीय रासायनिक प्रतिक्रिया है। इसलिए अमोनिया की अधिकतम मात्रा उच्च दाब, कम तापक्रम पर बन अमोनिया को निकालकर प्राप्त किया जाता है जिससे साम्य की दिशा अग्रगामी हो जाती है।

         अमोनिया को नाइट्रिक अम्ल में परिवर्तन-
         अमोनिया से नाइट्रिक अम्ल प्राप्त करने के लिए इसे Pt एस्बेस्टस उत्प्रेरक की उपस्थिति में ऑक्सीकरण कराते हैं जिससे नाइट्रीक ऑक्साइड गैस प्राप्त होता है।
4NH3 + 5O24NO + 6H2O
नाइट्रिक ऑक्साइड ऑक्सीजन की अधिकता में NO2 में परिवर्तित होता है जो जल से प्रतिक्रिया कर HNO3 अम्ल बनाता है।
2NO2 + O2 → 2NO2
3NO2 + H2O → 2HNO3 + NO

प्रश्न 5. धातु का नाम बतायें जो निम्न अयस्कों से प्राप्त होते हैं
(a) क्रायोलाइट (b) डोलोमाइट (c) कालामाइन (d) हेमाटाइट (e) मैलाकाइट।

उत्तर⇒ अयस्क                   –                        धातु
(a) क्रायोलाइट                   –                        ऐल्युमिनियम
(b) डोलोमाइट                   –                        कैल्सियम या मैग्नीशियम
(c) कालामाइन                   –                        जिंक
(d) हेमाटाइट                     –                         लोहा
(e) मैलाकाइट                    –                        कॉपर।

प्रश्न 6. धातुओं के निष्कर्षण (extraction of metals) के झाग उत्प्लावन विधि वर्णन करें।

उत्तर⇒ झाग प्लवन विधि (Froth Floatation process)-यह विधि सल्फाइड अयस्कों के सान्द्रण (concertation) के लिए विशेष रूप से उपर्युक्त हैं यह विधि अशुद्धियों के कणों (Gangue Particles) एवं अयस्क की जल एवं तेल के साथ गीले होने की विशेषता पर आधारित है। अयस्क तेल के साथ एवं गैंग कण पानी से गीला होता है। सल्फाइड अयस्क को चूर्ण करके जल से क्रिया करवाई जाती है। इससे एक लेई (Paste or Slurry) बनती है। इसको एक टैंक में डालकर जल मिलाया जाता हैं एक दूसरा पदार्थ ग्राही (Collector) जैसे पोटेशियम ऐथिलजेन्ट (Potassium Ethyl Xanthate) या एमिल जेन्थेट (Amyl Xanthate) इसमें मिलाया जाता है। टैंक की सामग्री को यान्त्रिक विलोडक (Mechanical Stirrer) एवं हवा के द्वारा कम दाब पर हिलाया जाता है। अयस्क के कण नीचे स्थित अयस्क की जलीय लेई (Aqueous Pulp) में स्थित वायु के बुलबुलों
धातुओं के निष्कर्षण (extraction of metals) के झाग उत्प्लावन विधि वर्णन करें

(Bubbles) से जुड़ जाते हैं एवं सतह पर तैरते रहते हैं। यहाँ से इन तैरने वाले झागों को अलग किया जा सकता है। गैंग कण, जो तीव्रता से जल कणों के साथ जुड़े रहते हैं, टैंक के पेंदे (Bottom) में बैठ जाते हैं। इनको बाद में अलग कर लिया जाता है। झाग (Froth) को दूर कर लिया जाता है। इससे सान्द्रित अयस्क (Concentrated Ore) प्राप्त किया जाता है। अयस्क जैसे कॉपर पाइराइट्स (CuFeS2) गैंलेना (PbS) एवं जिंक ब्लैंड (ZnS) को इस विधि द्वारा शुद्ध किया जाता है।

प्रश्न 7. चुम्बकीय सान्द्रण विधि का वर्णन करें।

उत्तर⇒ चुम्बकीय सान्द्रण (Magnetic Concentration)-यह विधि लौह चुम्बकीय अयस्कों (Ferromagnetic Ores) जैसे लोहा, टिनस्टोन, वचोल्फार्म (Wolfarm) आदि के लिए प्रयुक्त की जाती है; जब खनिज तो चुम्बक (Magnet) से आकर्षित होता है लेकिन गैंग (Gangue) नहीं।
              इस विधि को प्रयोग चुम्बकीय अशुद्धियों में से अयस्क के पृथक्करण के लिए किया जाता है। पिसे हुए अयस्क को दो चक्क (Rollers) के ऊपर घूमने वाली बेल्ट पर डाला जाता है। दो चक्कों में से एक चुम्बकीय होता है। जैसे ही अयस्क विद्युतचुम्बकीय चक्का (Electromagnetic Roller) के ऊपर से गुजरता है, अचुम्बकीय (non magnetic) अयस्क नीचे गिर जाते हैं एवं चुम्बकीय अशुद्धियाँ पहिया (Magnetic Roller) से आकर्षित होकर उससे चारों ओर घूमती रहती है। जब चुम्बकीय आकर्षण बल खत्म हो जाता है तो अशुद्धि एक ग्राही (Collector) में इकट्ठी हो जाती है। टिनस्टोन अयस्क में उपस्थित चुम्बकीय अशुद्धि वोलफ्रेमाइट (FeWO4) को इस विधि द्वारा पृथक किया जाता है।
धातुओं के निष्कर्षण (extraction of metals) के झाग उत्प्लावन विधि वर्णन करें

प्रश्न 8. निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखें :
(i) निस्तापन (Calcination) (ii) जारण (Roasting)

उत्तर⇒ (i) निस्तापन (Calcination)-वायु की अनुपस्थिति में इसके गलनांक से नीचे उच्च ताप पर गर्म करने की क्रिया निस्तापन कहलाती है। यह जलयोजित((Hydrated) अयस्कों के लिए प्रयुक्त की जाती है। इस प्रक्रिया के द्वारा (a) नमी दूर हो जाती है। (b) गैसें बाहर निकलती है। (c) वाष्पशील अशुद्धियाँ दूर हो जाती है (d) समस्त पदार्थ छिद्रयुक्त (Porous) हो जाता है ! (e) अयस्क का तापीय विघटन (Thermal Decomposition) होता है।

जैसे—(a) CaCO3 (लाइमस्टोन) → CaO + CO2
(b) ZnCO3 – (कैलेमाइन) → (मिलावट) →
2FeO3.3H2O (लिमोनाइट) → 2Fe2O3 + 3H2O CuCO3.Cu(OH)2 (मेलेकाइट) → 2CuO + H2O + CO2
निस्तापन परवर्त्तनी भट्टियों (Reverberatory Furnace) में किया जाता है।
          (ii) जारण(Roasting)-अकेले अयस्क या अयस्क में उपर्युक्त पदार्थ मिलाकर इसके गलनांक से नीचे वायु के आधिक्य (Excess) में उच्च ताप पर गर्म करने की क्रिया जारण कहलाती है। भर्जन परावर्तन भट्टी या वात्या भट्टी (Blast Furnace) में किया जाता है। जारण में (a) वाष्पशील अशुद्धियों (Voltatile Impurities) जैसे S, As, Sb आदि ऑक्सीकृत होकर SO2, As2O3 एवं Sb2O3 आदि गैसों के रूप में मुक्त हो जाती है।
          (b) सल्फाइड अयस्क उनके ऑक्साइडों में विघटित होकर SO2 मुक्त करते हैं। (c) नमी दूर हो जाती है।       (d) समस्त पदार्थ छिद्रयुक्त (Porous) हो जाता है एवं यह आसानी से अपचयित हो सकता है। जारण कई प्रकार का हो सकता है-
          (a) ऑक्सीकारक जारण (Oxidising Roasting), (b) वात्य जारण (Blast Roasting), (c) अपचायक जारण (Reducing Roasting), (d) सल्फेट जारण (Sulphate Roasting), (e) क्लोराइड जारण (Chlorodising Roasting)।

प्रश्न 9. निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखें : (i) प्रगलन (Smelting) (ii) अपचयन (Reduction)

उत्तर⇒ (i) प्रगलन (Smelting)-प्रगलन वह प्रक्रिया है जिसमें अयस्क को गालक (Flux) एवं अपचायक पदार्थ के साथ पिघलाया जाता है। प्रगलन क्रिया सामान्यतः कोयले को जलाकर या विद्युत ऊर्जा द्वारा उच्च ताप उत्पन्न करके वात्या भट्टी (Blast Furnace) में सम्पन्न की जाती है।
          अगलनीय अशुद्धि (Infusible Impurity) धातुमल में परिवर्तित हो जाती है एवं इसे हटा लिया जाता है।
CaO        +       SiO2              →         CaSiO3
गालक             आधात्री                        धातुमल
(Flux)           (Cangue)                    (Slag)
FeO        +        SiO2             →         FeSiO3
आधात्री              गालक                      धातुमल
(Cangue)        (Flux)                      (Slag)

परन्तु घोल में CO2 गैस देर तक प्रवाहित करने से चूना जल का दुधियापन समाप्त हो जाता है और पुनः स्वच्छ घोल प्राप्त होता है। ऐसा कैल्शियम बाइकार्बोनेट के बनने के कारण होता है जो जल में घुलनशील है।
CaCO3 + H2O + CO2 = Ca (HCO3)2 (घुलनशील)
SO2 गैस के साथ ‘चूना जल परीक्षा करने पर भी पहले घोल का रंग दुधिया हो जाता है परन्तु देर तक SO2 गैस प्रवाहित करने पर पुनः स्वच्छ घोल प्राप्त होता है।
Ca(OH)2 + SO2 = CaSO3 ↓ + H2O
        (दुधिया अवक्षेप)
CaSO3 + H2O + SO2 = Ca(HSO3)2 (घुलनशील)

इन्हीं कारणों से CO2 और SO2 को पहचानने में भूल हो जाती है। पोटैशियम डाइक्रोमेट या पोटैशियम परमैंगनेट के जलीय घोल से इनकी जाँच करके इनमें अन्तर किया जा सकता है।
SO2 गैस को तनु अम्लीकृत पौटेशियम डाइक्रोमेट के नारंगी रंग के विलयन में प्रवाहित करने पर इसका रंग परिवर्ति होकर हरा हो जाता है।
K2Cr2O+ H2SO4 + 3SO2 → K2SO4 + Cr2(SO4)+ H2O, CO2
(नारंगी)                                                                 (हरा)
            गैस यह परीक्षण नहीं देती है।

7. P-ब्लॉक तत्त्व LONG ANSWER TYPE QUESTIONS

अकार्बनिक रसायन
7. p-ब्लॉक तत्त्व

प्रश्न 1. सम्पर्क विधि से गंधकाम्ल उत्पादन के सिद्धान्त का समीकरण के साथ उल्लेख करें। SO आयन का परीक्षण करें।

उत्तर⇒ गंधकाम्ल का निर्माण निम्नलिखित तीन चरणों में किया जाता है। ये चरण इस प्रकार हैं-
(i) SO2 का उत्पादन-सल्फर या आयरन पाइराइट को हवा की अधिकता में जलाकर SO2 गैस प्राप्त किया जाता है।
S + O2 → SO2
4 FeS2 + 11O2 → 2Fe2O3 + 8 SO2
(ii) V2O5 उत्प्रेरक की उपस्थिति में SO2को शुद्ध ऑक्सीजन से ऑक्सीकृत कर SO2 को शुद्ध ऑक्सीजन से ऑक्सीकृत कर SO3 गैस बनाया जाता है।
2 SO2 + O22SO3
(iii) SO3 को सल्फ्यूरिक अम्ल से प्रतिक्रिया कराकर ओलियम (H2S2O7) प्राप्त किया जाता है।
SO3 + H2SO4 → H2S2O7
(iv) ओलियम से इच्छित सांद्रण का सल्फ्यूरिक अम्ल जल से तन कर प्राप्त किया जाता है।
H2S2O7 + H2O → 2 H2SO4
इस प्रकार सम्पर्क विधि से सल्फ्यूरिक अम्ल तीन चरणों में प्राप्त किया जाता है।
इस प्रकार सम्पर्क विधि से सल्फ्यूरिक अम्ल तीनआयन का परीक्षण- लवण के घोल में बेरियम क्लोराइड मिलाते हैं। बेरियम सल्फेट का श्वेत अवक्षेप प्राप्त होता है जो तनु HCl तथा HNO3 में अघुलनशील है।
          BaCl2 + Na2SO4 → BaSO4 ↓ + 2NaCl
          BaCl2 + HNO3 → अघुलनशील

प्रश्न 2. अमोनिया का औद्योगिक उत्पादन कैसे किया जाता है ? अथवा अमोनिया उत्पादन की हैबर विधि को लिखें।
(a) NH3 डाइड्रोजन बंध बनाती है, परन्तु PH3 नहीं बनाती क्यों ?
(b) हैलोजन प्रबंध ऑक्सीकारक क्यों होते हैं ?

उत्तर⇒ अमोनिया का बड़े पैमाने पर उत्पादन हैबर प्रक्रम के द्वारा किया जाता है। ला शैतलिए सिद्धान्त के अनुसार उच्च दाब अमोनिया उत्पादन के लिए अनुकूलतम परिस्थितियाँ 200 x 103 Pa वायुमंडल दाब, 700 k ताप तथा थोड़ी मात्रा में K2O तथा Al2O3 युक्त आयरन ऑक्साइड जैसा उत्प्रेरक का उपयोग होता है।
N2 (g) + 3H2 (g)2NH3 (g) ΔΘ = -66.01 kg/mol
           (a) नाइट्रोजन की उपस्थिति के कारण NH3 हाइड्रोजन बंधन बनाती है। परन्तु PH3 में H-बंध नहीं होती है। अमोनिया में N-H बंध के वैधुत ऋणात्मकता में अन्तर के कारण अत्यधिक ध्रुवीय होता है। ध्रुवता के कारण अमोनिया के अणुओं में अन्तराआणविक हाइड्रोजन बंध पाया जाता है लेकिन फॉस्फीन में नहीं होता है।
          (b) हैलोजन परिवार के सदस्य अणु व परमाणु दोनों रूप में अपनी इलेक्ट्रॉन लब्धि क्षमता के कारण प्रबल ऑक्सीकारक की तरह कार्य करती है।
X2 + 2e → 2X
जहाँ, X = Pf2, Cl, Br, I.

प्रश्न 3. श्वेत फॉस्फोरस तथा लाल फॉस्फोरस के गुणों के मुख्य भिन्नताओं को लिखिए।

उत्तर⇒ फॉस्फोरस अपरूपता दर्शाता है। फॉस्फोरस का प्रमुख अपररूप श्वेत फॉस्फोरस है यह पारभासी श्वेत मोमी ठोस है जो जल में अघुलनशील परन्तु CS2 तथा बेंजीन में विलेय है यह अत्यन्त क्रियाशील व वायु में जल उठता है। अतः यह जल में रखा जाता है। यह अन्धेरे में भी चमकता है। इस गुण के कारण यह फॉस्फोरस कहलाता है। श्वेत फॉस्फोरस विविक्त चतुष्फलकीय P4 अणुओं से जुड़ कर बना होता है।
            जब श्वेत फॉस्फोरस को अक्रिय वातावरण में 573K ताप पर कई दिनों तक गर्म किया जाता है तो लाल फॉस्फोरस बनता है। लाल फॉस्फोरस का गलनांक बिन्दु (870 K) उच्च होता है। घनत्व मान (2.16 g/mcm3) भी उच्च होता है। लाल फॉस्फोरस लोहे जैसी धूसर चमक वाला होता है। यह
            गन्धहीन, अविषैला तथा जल एवं कार्बन डाइऑक्साइड में अविलेय होता है । यह श्वेत की तुलना में बहुत कम क्रियाशील है। यह अंधेरे में दीप्त नहीं होता है। यह बहुलकी होता है जिसमें P4 चतुष्फालक श्रृंखला के रूप में एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं।
श्वेत फॉस्फोरस तथा लाल फॉस्फोरस के गुणों
प्रश्न 4. आवर्त्त-सारणी के समह-16 के तत्वों के सामान्य लक्षण का वर्णन करें।

उत्तर⇒ (i) Group-16 में ऑक्सीजन, सल्फर, सेलिनियम, टेलूरीयम व पोलोनियम हैं।
8O, 16S,34Se,52Te, एवं 84PO
(ii) Group-16 के तत्वों के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास में बाह्यतम कक्ष में ns2 p4 (p-block element) होता है तथा इसके भीतर वाला कक्ष पूर्ण होता है। अतः सामान्य तत्वों के गुण प्रकट करते हैं।

(iii) 8O…… 2, (2, 4) – 1s2 2s2 2p4
16S…… 2, 8, (2, 4) – 1s2 2s2 2P6 3s2 3P4
34se …… 2, 8, 18. (2, 4) – 1s2 2s22p6 3s2 3p6 3d10 4s2 4p4
52Te …… 2, 8, 18, 18 (2, 4) – 1s2 2s2 2p6 3s2 3p6 3d10 4s2 4p6 4d10 5s2 5p4
84PO …… 2, 8, 18, 32, 18, (2, 4) – 1s2 2s2 2p6 3s2 3p6 3d10 4s2 4p6 4d10 4ƒ14 5s2 5p6 5d10 6s2 6p4

           (iv) प्रायः Group-16 के तत्व अधातु हैं। जिनके गलनांक व क्वथनांक कम होते हैं।
           (v) Group-16 के तत्व हाइड्रोजन से संयोग करके गैसीय हाइड्राइड बनाते हैं।
           जैसे-H2O, H2S, H2Se, H2Te, H2P
           (vi) Group-16 के तत्व संयोजकता 6 प्रकट करते हैं।
           (vii) ये ट्राइऑक्साइड बनाते हैं। ट्राइऑक्साइड अम्लीय होते हैं तथा क्षारों में घुलकर ऑक्सीलवण बनाते हैं।
           (viii) Group-16 के सभी तत्व ऑक्सीक्लोराइड बनाते हैं जो कि सुगमता से जल अपघटित होकर ऑक्सी अम्ल देते हैं। पोलोनियम रेडियोएक्टिव तत्व है।
           SOCl2 + 2H2O → H2SO4 + 2HCl
           सल्फ्यूरिल क्लोराइड

प्रश्न 5. ऑक्सीजन एवं सल्फर में समानता व असमानता बताइए।

उत्तर⇒ ऑक्सीजन-सल्फर ये group-16 के प्रारूपी तत्व हैं, अतः इनके गुणों में समानता प्रदर्शित होती है।
ऑक्सीजन एवं सल्फर में समानता (Similarity between oxygen and sulphur)
(i) दोनों अधातु हैं।
(ii) सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास समान है।
8O = 2, 6 16S = 2, 8 6
(iii) समान प्रकार के यौगिक बनाते हैं।
समान प्रकार के यौगिक बनाते हैं।
(iv) दोनों ही हाइड्रोजन से संयोग कर H2O व H2S बनाते हैं।
(v) MO2 सूत्र के ऑक्साइड देते हैं, जैसे-O3, SO2
           ऑक्सीजन एवं सल्फर में असमानता (Difference between oxygen and sulphur)-
           (i) भौतिक अवस्था-सल्फर पीले रंग का ठोस व ऑक्सीजन रंगहीन गंधहीन गैस है।
           (ii) प्राप्ति-सल्फर की अपेक्षा प्रकृति में ऑक्सीजन विस्तृत रूप से फैली हुई है।
           (iii) ऑक्सीजन की अधिकतम संयोजकता 2 तथा सल्फर की 6 है।
           (iv) CO2 एक रंगहीन गैस तथा CS2 एक गंधहीन द्रव है।
           (v) H2 से संयोग-विभिन्न प्रकार के यौगिक बनाते हैं।
           H2O उदासीन रंगहीन, गंधहीन द्रव
           H2S अम्लीय, सड़े अण्डे की गंध वाली गैस

प्रश्न 6. ओजोन कैसे बनता है ? इनके गुण कौन-कौन हैं ?

उत्तर⇒ ठण्डी व शुष्क ऑक्सीजन में शांति विद्युत विसर्ग प्रवाहित करके ओजोन प्राप्त की जाती है।
3O 2O3
विभिन्न प्रकार के उपकरण ओजोनाइजर प्रयुक्त किये गये हैं।
          ओजोन के गुण-भौतिक गुण-यह नीले रंग की सड़ी मछली जैसी गंधयुक्त गैस है। वायु से भारी है। जल में कम विलेय परंतु तरपीन के तेल में अत्यधिक घुलती है। -112°C तक ठण्डा करने पर नीले रंग के द्रव में बदलती हैं। (M.P. = -299.7°C)
रासायनिक गुण-
          (a) अपघटन-230°C पर गर्म करने पर O2 में अपघटित होती है।
2O3अयस्क से लोहेO2 + O
          (b) ऑक्सीकारक गुण-चूँकि गर्म करने पर ऑक्सीजन परमाणु देती है। अतः यह एक प्रबल ऑक्सीकारक है।
          (i) काले लेड सल्फाइड को लेड सल्फेट में ऑक्सीकृत करती है।
काले लेड सल्फाइड को लेड सल्फेट में ऑक्सीकृत करती है
          (ii) पोटेशियम आयोडाइड को आयोडीन में ऑक्सीकृत करती है।
2KI + H2O + O3 → 2KOH + I2 + O2
          (iii) फेरस सल्फेट को फेरिक सल्फेट में, पोटेशियम मैगनेट को परमैंगनेट
में, फेरोसायनाइड को फेरीसायनाइड में ऑक्सीकृत करती है।
काले लेड सल्फाइड को लेड सल्फेट में ऑक्सीकृत करती है

          (iv) इसी प्रकार नम आयोडीन को आयोडिक अम्ल में ऑक्सीकत। करता है।
I2 + H2O 5O3 → 2HIO3 + 5O2
          (v) सल्फर, फॉस्फोरस आदि को इनके अम्लों में ऑक्सीकृत करता है।
I2 + H2O 5O3 → 2HIO3 + 5O2
          (vi) इसी प्रकार सोडियम नाइट्राइट को सोडियम नाइट्रेट में ऑक्सीकृत करता है।
NaNO2 + O3 → NaNO3 + O2
          (c) अपचायक गण-O3 एक अवकारक भी है हाइड्रोजन पर ऑक्साइड को जल में तथा बेरियम परक्साइड को बेरियम ऑक्साइड में अपचयित करती है।
H2O2 + O3 → H2O + 2O2
BaO2 + O3 → BaO + 2O2
          (d) विरंजक गुण- यह रंगीन पदार्थों को ऑक्सीकृत कर रंगहीन कर देती है। नील तथा वानस्पतिक पदार्थों के रंग को उड़ा देती है।
O3 → O2 + ‘O’
रंग + O → रंगहीन

प्रश्न 7. सल्फर के अपरूपों का वर्णन करें।

उत्तर⇒ सल्फर के अनेक अपरूप हैं। इनके दो प्रमुख अपरूप हैं-
(i) अल्फा सल्फर या रोम्बिक सल्फर, (ii) बीटा सल्फर या मोनो क्लीनिक सल्फर।
          (i) अल्फा या रोम्बिक सल्फर (α or Rhombic Sulphur) – कमरे के ताप पर सबसे स्थायी अपरूप है। यह पीले रंग का होता है। इसका गलनांक (M.P.) = 385.8 K तथा घनत्व 2.06 gm / ml है। यह S8 के रूप में रहता है।
          निर्माण- रौल सल्फर को कार्बन डायसल्फाइड में घुलाकर घोल का वाष्पीकरण करने से रोम्बिक सल्फर बनता है। इसकी रचना मुकुट (Crown) की तरह होता है।
सल्फर के अपरूपों का वर्णन करें
          यह जल में अघुलनशील है परंतु बेन्जीन, अल्कोहल तथा ईथर में अल्पघुलनशील है। परंतु CS2 में पूर्ण घुलनशील है।
          यह 369 K तक स्थायी है। इसके ऊपर गर्म करने पर यह मोनोक्लिनिक सल्फर में बदल जाता है।

प्रश्न 8. (a) N2O5 में नाइट्रोजन की सहसंयोजकता क्या है ?
(b) N व Bi दोनों पेन्टाहैलाइड क्यों नहीं बनाते हैं जबकि फॉस्फोरस बनाता है, समझाइये।

उत्तर⇒ (a) N की सहसंयोजकता पेन्टाऑक्साइड में (N2 O5)4 है।
          (b) N व Bi दोनों भिन्न कारणों से पेन्टाहैलाइड नहीं बनाते हैं। तत्व N संयोजी कोश में रिक्त d – कक्षकों की अनुपस्थिति के कारण अपनी सहसंयोजकता 5 तक नहीं बढ़ा सकता। तत्व Bi बन्धन के लिए अनुपलब्ध संयोजी 6s इलेक्ट्रॉन के कारण (अक्रिय युग्म प्रभाव के कारण) पेन्टाहैलाइड नहीं बनाता है। 3d – कक्षकों की उपलब्धता के कारण, तत्व P पेन्टाहैलाइड (PCl5) बनाता है।

प्रश्न 9. SO2 ऑक्सीकरण व अपचायक दोनों की तरह कार्य करता है जबकि SO3 केवल ऑक्सीकारक की तरह कार्य करता है, समझाइये।

उत्तर⇒ SO2 में, सल्फर की ऑक्सीजन अवस्था +4 होती है। सल्फर के लिए अधिकतम ऑक्सीकरण अवस्था + 6 तथा न्यूनतम -2 है। चूंकि यह अपनी ऑक्सीकरण अवस्था में वृद्धि व कमी दोनों कर सकता है, इसलिए यह ऑक्सीकारक व अपचायक दोनों की तरह कार्य करता है। दूसरी ओर SOमें  सल्फर की ऑक्सीकरण अवस्था + 6 होती है जो कि अधिकतर यह अपनी ऑक्सीकरण संख्या में केवल कमी कर सकता है, इसलिए SO3 केवल ऑक्सीकारक की तरह ही कार्य कर सकता है।

प्रश्न 10. प्रयोगशाला में नाइट्रोजन कैसे बनाते हैं ? संपन्न होनेवाली अभिक्रिया के रासायनिक समीकरण को लिखिए।

उत्तर⇒ (i) N2 के विरचन की प्रयोगशाला विधि-जलीय अवस्था में अमोनिया क्लोराइड और सोडियम नाइट्राइट क्रिया कर N2 बनाते हैं। अभिक्रिया में थोड़ी मात्रा में NO और HNO3 बनाता है जिन्हें H2SO4 और K2Cr2O7 की क्रिया से हटाया जाता है।
NH4Cl (aq) + NaNO2 (aq) → N2 (g) + NaCl (aq) + 2H2O
(ii) तापीय विघटन कर अमोनियम डाइक्रोमेट से बनाई जाती है।
(NH4)2Cr2O7अयस्क से लोहेN2(g) + 4H2O(I) + Cr2O3
(iii) सोडियम या बेरियम एजाइड से शुद्ध N2 प्राप्त होती है।
Ba(N3)2अयस्क से लोहेBa + 3N2(g)

प्रश्न 11. नाइट्रोजन NCl5 नहीं बनाता है जबकि फॉस्फोरस PCl5 बनाता है, व्याख्या करें।

उत्तर⇒ नाइट्रोजन तथा फॉस्फोरस की सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास =
           N7 → 1s22s22px12py12pz1
           P15 → 1s22s22p63s23px13py13pz13d°
           p में इलेक्ट्रॉन उत्तेजित अवस्था में 3s से 3d में जाता है लेकिन नाइट्रोजन में नहीं क्योंकि इसमें संयोजी कक्षा में खाली orbitals नहीं है। इसलिए P, PCl5 बनाता है लेकिन N, NCl3 नहीं बनाता है।

प्रश्न 12. पाइरोफॉस्फोरस व ऑर्थोफॉस्फोरस अम्ल में क्या समानता है ? अम्लों की संरचना लिखें।

उत्तर⇒ पाइरोफॉस्फोरस अम्ल (H4P2O7) है जो ऑर्थोफॉस्फोरस की विजलीय अवस्था है, इसे ऑर्थोफास्फोरस के दो अणुओं से एक जल अणु हटाने पर प्राप्त करते हैं।
2(H3PO4) → H6P2O8अमोनिया को नाइट्रिक अम्ल में परिवरH4P2O7
पाइरोफॉस्फोरस व ऑर्थोफॉस्फोरस अम्ल में क्या समानता है

प्रश्न 13. डाइबोरॉन की संरचना का वर्णन करें।

उत्तर⇒ डाइबोरेन (B2H6) की संरचना-डाइबोरेन की संरचना बहुत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इसमें आवश्यक इलेक्ट्रॉन (संयोजी) नहीं होते हैं। डाइबोरेन की संरचना को X-किरण विधि द्वारा ज्ञात करते हैं।
               डाइबोरॉन संरचना में कुल 16 इलेक्टॉनों की आवश्यकता होती है ताकि सभी आबंध अच्छी प्रकार से बन सकें। लेकिन केवल इलेक्ट्रॉन ही उपस्थित होते हैं। तीन-तीन प्रत्येक बोरॉन परमाणु से व एक-एक प्रत्येक हाइड्रोजन परमाणु से। इस प्रकार B2H6 इलेक्ट्रॉन कमी का यौगिक है। दो ब्रीज हाइड्रोजन परमाणु एक-दूसरे के लम्ब होते हैं। दोनों हाइड्रोजन परमाणु बोरॉन-परमाणुओं के इलेक्ट्रॉन से आबंध बनाते है। इस प्रकार यह संरचना 3– 3e संरचना होती है या बहु केन्द्र आबंध संरचना होती है। दोनों परमाणु नजदीक होने के कारण इनमें प्रतिकर्षण होता है। इस प्रतिकर्षण को कम करने के लिए ब्रीज आबंध बीच में बनता है।

प्रश्न 14. बोरॉन तत्व अपने ही वर्ग के दूसरे तत्वों से किस प्रकार भिन्न है ? सिलिकॉन व बोरॉन कौन-से गुणधर्म समान दर्शाते हैं ?

उत्तर⇒ बोरॉन परमाणु की अद्वितीय प्रकृति-क्योंकि बोरॉन का छोटा आकार होता है यह अत्यधिक विद्युत ऋणात्मक होता है। बोरॉन अपने ही वर्ग के बाकी तत्वों से भिन्न गुणधर्म दर्शाता है। बोरॉन में बहुत से गुणधर्म सिलिकॉन से मिलते-जुलते हैं। ऐसा विकर्ण संबंध के कारण है।
                 बोरॉन के अद्वितीय गुण-1. बोरॉन अधातु है जबकि बाकी तत्व धातु गुण दर्शाते हैं। 2. बोरॉन विद्युत का कुचालक होता है जबकि दूसरे तत्व सुचालक होते हैं। 3. बोरॉन दो अवस्थाओं में पाया जाता है-(i) क्रिस्टल, (ii) अक्रिस्टल । 4. बोरॉन के क्वथनांक व गलनांक उच्च होते हैं। 5. बोरॉन केवल सहसंयोजी आबंध बनाता है। 6. बोरॉन के हाइड्रोक्साइड व ऑक्साइड अम्लीय होते हैं। 7. बोरॉन ट्राइहैलाइड एकल प्रकृति के होते हैं। 8. बोरॉन हाइड्राइड स्थायी होते हैं।
सिलिकॉन के साथ बोरॉन का विकिरण सम्बन्ध-
           1. दोनों अधातु गुण को दर्शाते हैं।
           2. सिलिकॉन व बोरॉन ऑक्साइड B2O3 तथा SiO3 दोनों अम्लीय प्रकृति के होते हैं।
B2O3 + 6NaOH → 2Na3BO3 + 3H2O
SiO2 + 2NaOH → 2Na2SiO3 + H2O
बोरेट व सिलिकेट्स चतुष्फलकीय (BO4, SiO4) चतुष्फलकीय इकाइयाँ हैं।
           3. दोनों के क्लोराइड जल से क्रिया कर बोरिक अम्ल तथा सैलिसिक अम्ल बनाते हैं।
                 BCl3 + 3N2O → H3BO3 + 3HCl
                 SiCl4 + 2H2O → H2SiO3 + 2HCl
           4. बोरॉन, सिलिकेट्स हाइड्राइड स्थायी होते हैं।
           5. बोरॉन बाइनरी यौगिक बनाता है। ऐसा बहुत से धातुओं के साथ मिलकर करता है।
                 3Mg + 2B → Mg3B2
                 2Mg + Si → Mg2 Si
इनमें से कुछ बोराइड व सिलिकॉन H3PO4 से क्रिया कर बोरॉन मिश्रण बनाते हैं।
Mg2B2 + H3PO4 → मिश्रण
             B4H10 (मुख्य)
Mg2Si + H3PO4 → मिश्रण
6. बोरॉन व सिलिकॉन तत्व अर्धचालक हैं।

8. D- एवं F-ब्लॉक के तत्त्व LONG ANSWER TYPE QUESTIONS

8. d- एवं f-ब्लॉक के तत्त्व

प्रश्न 1. संक्रमण धातुओं के अभिलक्षण क्या हैं ? ये संक्रमण धातु क्यों कहलाती हैं ? d-ब्लॉक के तत्वों में कौन-से तत्व संक्रमण श्रेणी के तत्व नहीं कहे जा सकते ?

उत्तर⇒ d-ब्लॉक तत्व संक्रमण तत्व कहलाते हैं क्योंकि इन तत्वों के गुणों में बहुत भिन्नता है। इन तत्वों के गुण s-ब्लॉक तथा p-ब्लॉक तत्वों के मध्य गुणों को दर्शाते हैं। इन तत्वों में अन्तिम इलेक्ट्रॉन (n – 1) d उपकक्षक में जाता है। अतः इनका इलेक्ट्रॉनिक विन्यास में d उपकक्षक आंशिक भरा होता है। Zn, Cd, Hg तत्व d उपकक्षक को पूर्ण रूप से भरते हैं।
          Zn = 30 = [Ar] 3d10 4s2 Zu (11) 3d10
          Cd = 48 = [Kr] 4d10 5s2 Cd(11) 4d10
          Hg = 80 = [Xe] 4ƒ14 5d16 6s2 Hgf(11) 5d10
∴        Zn, Cd, Hg संक्रमण तत्व नहीं कहलाते हैं।

        गुणधर्म- (i) ये धातुएँ कठोर होती हैं।
        (ii) इनके क्वथनांक व गलनांक उच्च होते हैं।
        (iii) वर्ग I व II की तुलना में इन धातुओं का घनत्व अधिक होता है।
        (iv) इन तत्वों की प्रथम आयनन ऊर्जा (I.E. I) s-ब्लॉक तत्वों में अधिक होती है लेकिन p-ब्लॉक तत्वों से कम होती है।
        (v) इन तत्वों की प्रकृति धनावेशित होती है।
        (vi) इन तत्वों का प्रमुख इलेक्ट्रॉन विन्यास (n – 1)1-9 है जो रंगीन गुणधर्म दर्शाते हैं। जबकि जिन तत्वों का इलेक्ट्रॉन विन्यास (n- 1) d° या (n – 1) d10 है वे रंगहीन हैं।
        (vii) छोटे आकार व उच्च घनत्व के कारण ये तत्व जटिल यौगिक बनाते हैं।
        (viii) इनकी ऑक्सीकरण अवस्था एक से अधिक होती है।
        (ix) एक से अधिक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होने के कारण अनुचुंबकीय गुण दर्शाते हैं।
        (x) समान आकार होने के कारण ये तत्व मिश्रधातु बनाते हैं।
        (xi) d-उपकक्षक होने के कारण ये तत्व जालक यौगिकों का निर्माण करते हैं।
        (xii) बहुत-से संक्रमण तत्व जैसे-Mn, Ni, Co, Cr, V, Vt आदि तथा ऑक्साइड V2O5, Cr2O3. NiO, KmnO4. K2Cr2O7 आदि उत्प्रेरक के रूप में कार्य करते हैं। उत्प्रेरक के रूप में अपना d-उपकक्षक का प्रयोग करते हैं।

प्रश्न 2. लैन्थेनॉयड आकुंचन क्या है ? लैन्थेनॉयड आकुंचन के परिणाम क्या हैं ?

उत्तर⇒ लैन्थेनॉयड आकुंचन-लैन्थेनॉयड तत्वों के इलेक्ट्रॉन विन्यास में 6s2 साझे इलेक्ट्रॉन हैं। परन्तु त्रिधनात्मक आयन के लिए 41n (n = 1 से 14) तक इलेक्ट्रॉन है। अतः क्रमशः आयनन त्रिज्या कम होती जाती है। La (106 pm) से Lu+3 (85 pm) तक अतः 4f आंतरिक कक्षकों के उत्तरोत्तर पूर्ति होने के साथ श्रेणी की धातुओं की परमाणु और आयनिक त्रिज्याओं में क्रमिक ह्रास होता है जो लैन्थेनॉयड आकुंचन कहलाता है।
लैन्थेनॉयड आकुंचन क्या है
          लैन्थेनॉयड आकुंचन के प्रभाव-लैन्थेनॉयड का लैन्थेनॉयड आकुंचन एक मुख्य गुण है। यह गुण तीसरी संक्रमण श्रेणी के तत्त्व दर्शाते हैं । इस कारण दूसरी व तीसरी संक्रमण श्रेणी के तत्वों की त्रिज्या लगभग एक समान है। जैसे-

श्रेणीतत्त्वपरमाणु त्रिज्यातत्त्वपरमाणु त्रिज्या
240Zr160 pm41nb146 pm
372Zn159 pm73Ta146 pm

           (i) समान आकार के कारण Zr और Hf, Nb और Ta, Mo और W के गुणधर्म समान हैं।
           (ii) त्रिआयनी की वैद्युतऋणात्मकता में थोड़ी वृद्धि होती है।
           (iii) E0 का मान भी बहुत कम बढ़ता है।
               M+3 + 3e → M(g)
           (iv) ऑक्साइड व हाइड्रॉक्साइड की क्षारकता कम होती जाती है।
               La(OH)3        Lu(OH)
               प्रबल क्षार         दुर्बल क्षार
           (v) आयन विनिमय विधि से लैन्थेनॉयडों को पृथक किया जाता है।

प्रश्न 3. पोटैशियम डाइक्रोमेट की ऑक्सीकरण क्रिया का उल्लेख कीजिए तथा निम्नलिखित के साथ आयनिक लिखिए-
(i) आयरोडाइड आयन, (ii) आयरन, (iii) विलयन, (iv) H2S

उत्तर⇒ K2Cr2O7 + 4H2SO4 → K2SO4 + Cr2(SO4)3 + 4H2O + 3[O]
या आयनन रूप में
        Cr2O +14H+ + 6e → 2Cr3+ + 7H2O (अपचयन)
∴      Cr2O + आयन अम्ल में प्रबल ऑक्सीकारक है।
        (i) यह I को I2 में ऑक्सीकृत करता है।
        Cr2O + 14H+ + 6I → 2Cr3+ + 7H2O
        (ii) Fe (II) को ऑक्सीकृत कर Fe (III) में बदलता है।
        Cr2O +14H+ + 6Fe2+ → 2Cr3+ + 6Fe3+ + 7H2O
        (iii) H2S को ऑक्सीकृत कर S बनाता है।
        Cr2O + SH+ + 3H2S → 2Cr+3 + 3S+ 7H2O

प्रश्न 4. पोटैशियम परमैंगनेट को बनाने की विधि का वर्णन कीजिए। अम्लीय पोटैशियम परमैंगनेट किस प्रकार
(i) आयरन II आयन (ii) SO2 (iii) ऑक्सैलिक अम्ल से अभिक्रिया करता है ?
अभिक्रियाओं के लिए आयनिक समीकरण लिखिए।

उत्तर⇒ KMnO4 का बनना-KMnO4 को पाइरोलूसाइट अयस्क से तैयार करते हैं। जैसे-
          1. पाइरोल्साइट अयस्क को पोटैशियम परमैंग्नेट में बदलना-अयस्क को KOH से क्रिया करवाते हैं या पोटैशियम कार्बोनेट से क्रियाशील किया जाता है।
.
          2MnO2 + 4KOH + O2अयस्क से लोहे2K2MnO4 + 2H2O
          2MnO2 + 2K2CO3 → 2K2MnO4 + 2CO2
     2. K2MnO4 का KMnO4 में ऑक्सीकरण-
     हर विलयन को Cl2 या O2 या CO2 को ऑक्सीकृत कर KMnO4 प्राप्त करते हैं।
          2K2MnO4 + Cl2 → 2KCl + 2KMnO4
          2K2MnO4 + O3 + H3O → 2KMnO4 + 2KOH + O2
          2K2MnO4 + 2CO2 → 2K2CO3 + MnO↓ + 2KMnO4

          विलयन को सान्द्रित कर गहरे रंग के क्रिस्टल KMnO4 प्राप्त करते हैं। K2MnO4 विलयन को विद्युत अपघटन से ऑक्सीकृत करते हैं।
विद्युतीय ऑक्सीकरण-
2K2MnO4  2K+ + MnO
ऐनोड पर MnO → MnO + e
कैथोड पर 2H+ + 2e → H2
KMnO4 के ऑक्सीकरण चरण-
(i) आयरन आयन का ऑक्सीकरण Fe+2 → Fe+3
2KMnO4 + 3H2SO4 → K2SO4 + 2MnSO4 + 3H2O + 5[O]
या MnO + 8H+ + 5e → Mn2+ + 4H2O
2KMnO4 + 3H2SO4 → K2SO4 + 2MnO4 + 3H2O + 5[O]
          2FeSO4 + H2SO4 → Fe2(SO4)3 + H2O] × 5
          2KMnO4 + 8H2SO4 + 20FeSO4 →
          K2SO4 + 3MnSO4 + 5Fe(SO4)3 + 8H2O
या आयनन अभिक्रिया
          MnO + 8H+ + 5Fe+2 → 5Fe+3 + Mn+2 + 4H2O
(ii) SO2
2KMnO4 + 3H2SO4 → K2SO4 + 2MnSO4 + 2H2O + 5[O]
          SO2 + H2O +O → H2SO4] × 5
2KMnO4 + 5SO2 + 2H2O → K2SO4 + 2MnSO4 + 2H2SO4

या आयनिक अभिक्रिया
2MnO4 + 5SO2 + 2H2O→ 5SO2+ 2Mn2+ + 4H+
(iii) 2KMnO4 +3H2SO4 → K2SO4 2MnSO4 +3H2O + 5[0]
अमोनिया को नाइट्रिक अम्ल में परिवर

प्रश्न 5. निम्नलिखित के संदर्भ में, लैन्थेनॉयड एवं ऐक्टिनॉयड के रसायन की तुलना कीजिए।
(i) इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (ii) परमाण्वीय एवं आयनिक आकार (iii) ऑक्सीकरण अवस्था (iv) रासायनिक अभिक्रियाशीलता।

उत्तर⇒ (i) ऐक्टिनॉयड तथा लैन्थेनॉयड का इलेक्ट्रॉन विन्यास- ऐक्टिनॉयड तथा लैन्थेनॉयड दोनों अन्तर संक्रमण तत्व कहलाते हैं या f-ब्लॉक तत्व कहलाते हैं। इन तत्वों के इलेक्ट्रॉन विन्यास में f उपकक्षक आंशिक रूप से भरा होता है। दोनों में (n – 2) fउपकक्षक में अन्तिम इलेक्ट्रॉन जाता है। लैन्थेनॉयडों का सामान्य इलेक्ट्रॉन विन्यास [Xe]4f05d0-16s2 है जहाँ [Xe] परमाणु Xe का केन्द्र है। ऐक्टिनॉयड का सामान्य विन्यास [Rn]5f0-2 6d0-2 782 है जहाँ [Rn] परमाणु रेडॉन का केन्द्र है।
             अन्तिम इलेक्ट्रॉन 4f उपकक्षक में तथा 5f उपकक्षक में जाता है, लैन्थेनॉयड और ऐक्टिनॉयड के लिए
             (ii) Ln के लिए परमाणु आकार 187 pm (Yb) के लिए होता है। उनका आयन आकार La+3 (106 pm) से Lu+3 (85 pm) है। जहाँ ऐक्टिनॉयड के लिए यह भिन्नता दर्शाता है जो AC+3 (III pm) से Cr+3(98 pm) (99 pm) Th4+ तक तथा Th+4(86) से Cr+4 तक है।
             (iii) ऑक्सीकरण अवस्था-लेन्थेनॉयड की प्रमुख ऑक्सीकरण अवस्था + 3 [+2, +4 कभी-कभी] तथा ऐक्टिनॉयड की प्रमुख अवस्था +2, +3, +4, +5, +6, +7 है।
             (iv) रासायनिक अभिक्रियाशीलता-रासायनिक अभिक्रिया निम्न है-
लैन्थेनॉयड और ऐक्टिनॉयड श्रेणी का तुलनात्मक अध्ययन

लैन्थेजॉयडऐक्टिनॉयड
समामाता :
1. प्रमुख ऑक्सीकरण अवस्था + 3 है।
समामाता :
1. इनके लिए भी प्रमुख ऑक्सीकरण अवस्था +3 है।
2. लैन्थेनॉयड, लैन्थेनॉयड आकुंचन दर्शाते हैं।2. ऐक्टिनॉयड, ऐक्टिनॉयड आकुंचन दर्शाते हैं।
3. ये आयन विनिमय दर्शाते हैं।3.ये भी आयन विनिमय दर्शाते हैं।

                         विभिन्नता :                                                               विभिन्नता :

1. +3 ऑक्सीकरण अवस्था के साथ + 2 और +4 ऑक्सीकरण अवस्था दर्शाते हैं।1. +3 ऑक्सीकरण अवस्था के साथ +4, +5, +6, +7 अवस्था भी दर्शाते हैं।
2. लगभग आयन रंगीन है।2. लगभग आयन रंगीन हैं।
3. ये जटिल यौगिक नहीं बनाते।3. ये जटिल यौगिक बनाते हैं।
4. ये ऑक्सोधनायन नहीं बनाते।4. ये ऑक्सोधनायन बनाते हैं।UO2-, PUO2-2 और UO+
5. इनके यौगिक दुर्बल क्षारीय हैं।5. इनके यौगिक प्रबल क्षारीय हैं।
6. प्रोमिथियम को छोड़कर शेष सभी अरेडियोधर्मी है।6. ये तत्व रेडियोधर्मी हैं।
7. इनके चुम्बकीय गुण आसानी से वर्णित किए जा सकते हैं।7. इनके चुम्बकीय गुणों को आसानी से वर्णित किया जा सकता।

प्रश्न 6. लैन्थेनॉयड आकुंचन क्या है? यह किस कारण होता है? लैन्थेनॉयड आकुंचन के क्या प्रभाव हैं ? क्या ऐक्टिनॉयड भी ऐक्टिनॉयड आकुंचन दर्शाते हैं।

उत्तर⇒ लैन्थेनम से ल्युटीशियम तक के तत्वों की परमाणु एवं आयनिक त्रिज्याओं में समग्र ह्रास लैन्थेनॉयड आकुंचन कहलाता है। जब हम La (57) से Lu (71) तक जाते हैं तब परमाणु व आयन आकर नियमित घटता है, यह प्रभाव लैन्थेनॉयड, आकुंचन कहलाता है।
            लैन्थेनॉयड आकुंचन के कारण-लैन्थेनॉयड आकंचन एक ही उपकोश में एक इलेक्ट्रॉन का दूसरे इलेक्ट्रॉन द्वारा अपूर्ण परिरक्षण प्रभाव होने के कारण होता है। श्रेणी में नाभिकीय आवेश बढ़ने के साथ एक d-इलेक्ट्रॉन के परिरक्षण प्रभाव की तुलना में एक 4fइलेक्ट्रॉन पर परिरक्षण प्रभाव कम होता है तथा श्रेणी में बढ़ते हुए नाभिकीय आवेश के कारण बढ़ते हुए परमाणु क्रमांक के साथ परमाणु के आकार में एक नियमित हास पाया जाता है। लैन्थेनॉयड श्रेणी में आकुंचन का संचयी प्रभाव लैन्थेनॉयड आकुंचन कहलाता है।
           लैन्थेनॉयड आकुंचन के प्रभाव- (i) लैन्थेनॉयड श्रेणी में आकुंचन के संचयी प्रभाव के कारण तृतीय संक्रमण श्रेणी की त्रिज्याओं के मान दसरी संक्रमण श्रेणी के संगत तत्वों की त्रिज्याओं के मानों के लगभग समान हो जाते हैं। अतः इन्हें परमाणु त्रिज्या के आधार पर अलग नहीं किया जा सकता।
           (ii) तृतीय श्रेणी के तत्वों का समान आकार होता है, द्वितीय श्रेणी के तत्वों के समान। जैसे-
.                                      3                      4                     5
1st संक्रमण श्रेणी 21Se(144 pm) 22 Ti(132 pm) 23V (122 pm)
2nd संक्रमण श्रेणी 39V(180 pm) 40Zr(160 pm) 41Nb(146 pm)
3rd संक्रमण श्रेणी 57La (187 pm) 72Hf(159 pm) 73Ta(146 pm)
           समान वर्ग की दूसरी ओर तीसरी श्रेणी के तत्वों का आकार लगभग एक-समान है। अर्थात् 4zr rHfrNb = rra अतः इन्हें पृथक करना आसान नहीं है।
           (iii) हाइड्रोजन की क्षारकता पर प्रभाव- क्योंकि La+3 सं Lu+3 आयन तक आकार घटता है। अतः हाइड्रॉक्साइड का सहसंयोजी गुण बढ़ता है इसलिए क्षारकता गुण घटता है। जैसे-La(OH)3 प्रयत्न क्षार है जबकि Lu(OH)3 दुर्बल भार।
           एक्टिनॉयड भी लैन्थेनॉयड की भाँति आकुंचन गुण दर्शाते हैं। ऐक्टिनॉयड में यह गुण 5f इलेक्ट्रॉन अपूर्ण परिरक्षण प्रभाव के कारण होता है।

प्रश्न 7. संक्रमण धातुओं के निम्नांकित गुणों की विवेचना करें :
(i) अवकारक गण (Reducing properties) (ii) अम्लीय एवं क्षारीय गुण (Acidic and Basic properties)

उत्तर⇒ (i) अवकारक गुण (Reducing properties)-वे पदार्थ जो रासायनिक प्रतिक्रियाओं में इलेक्ट्रॉन प्रदान करते हैं, अवकारक कहलाते हैं। वे पदार्थ जो इलेक्ट्रॉन को आसानी से त्याग करने में सक्षम हैं प्रबल अवकारक कहलाते हैं। किसी तत्व के द्वारा इलेक्ट्रॉन को प्रदान करने की प्रवृत्ति तत्व के आयनीकरण इन्थैल्पी पर निर्भर करती है। तत्व का आयनीकरण इन्थैल्पी कम होने पर तत्व के द्वारा इलेक्ट्रॉन को प्रदान करने की प्रवृत्ति अधिक होती है। अतः संक्रमण तत्व का आयनीकरण इन्थैल्पी कम होने के कारण ये तत्व प्रबल अवकारक होते हैं।
           (ii) अम्लीय एवं क्षारीय गुण (Acidic and basic properties) संक्रमण तत्वों का आवेश घनत्व अधिक होने के कारण इनके लवण जलांशित होते हैं, जिसके फलस्वरूप प्रोटॉन मुक्त होता है। इसी कारण संक्रमण तत्वों के लवण के जलीय घोल अम्लीय होते हैं।
           Mn+2 + 2H2O → M(OH)2 + 2H+
        या, FeCl3 + 3H2O → Fe(OH3)3 + HCl
      प्रथम संक्रमण श्रेणी के तत्वों के द्विसंयोजी धनायन (Divalent cation) की आयनिक त्रिज्या कम होती है, इसलिए संक्रमण धातुओं के ऑक्साइड क्षारीय होते हैं, किन्तु इनकी क्षारीय शक्ति कम होती है।

प्रश्न 8. किसी श्रेणी के संक्रमण तत्वों की त्रिज्या के मान में कमी होती है। क्यों?

उत्तर⇒ किसी श्रेणी में संक्रमण तत्वों की परमाणविक त्रिज्या तत्व की परमाणु संख्या में वृद्धि होने पर घटती है। संक्रमण तत्वों की परमाणविक त्रिज्या में परिवर्तन इतनी कम होती है कि क्रोयिम से लेकर जिंक तक तत्वों की परमाणविक त्रिज्या लगभग बराबर होती है। इसका कारण यह है कि संक्रमण तत्वों की परमाणु संख्या में वृद्धि होने पर केन्द्रक का प्रभावी आवेश बढ़ता है तथा परमाणु संख्या में वृद्धि के साथ आने वाला नया इलेक्ट्रॉन (n – 1) d – orbital में आता है जिसका screening power काफी कम है। अतः d – उपकक्ष (suborbit) में होने वाली इलेक्ट्रॉन की वृद्धि ns ऑर्बिटल के इलेक्ट्रॉन पर केन्द्रक के आकर्षण बल को बढ़ा देती है। न्यूक्लियस का बढ़ा हुआ आवेश परमाणु की त्रिज्या में कमी की प्रवृत्ति रखता है। इसलिए किसी संक्रमण श्रेणी (transition series) के परमाणु संख्या में वृद्धि के साथ परमाणु की त्रिज्या में कमी होती है।

प्रश्न 9. निम्नलिखित के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखें।
(i) Cr3+ (ii) Pm3+ (iii) Cu+ (iv) Ce4+ (v) CO2+ (vi) Lu2+ (vii) Mn2+ (viii) Th4+

उत्तर⇒ (i) Cr3+ = [Ar]18 3d3
(ii) Pm3+= [Xe]54 4f6
(iii) Cu+ = [Ar]18 3d10
(iv) Ce4+ = [Xe]54
(v) CO2+ = [Ar]18 3d7
(vi) Lu+2 = [Xe]54 4f14 5=d1
(vii) Mn2+ = [Ar] 18 3d5
(viii) Th4+ = [Rn]86

प्रश्न 10. संक्रमण तत्वों के सामान्य गुणधर्म का वर्णन करें।

उत्तर⇒ संक्रमण तत्वों अथवा d-खण्ड तत्वों के ये नाम इसलिए पड़े हैं कि उनके गुण s- तथा p-खंडों के मध्यवर्ती हैं तथा उनका उपान्त्य कोष d इलेक्टॉनों के प्रवेश के फलस्वरूप प्रसारित हो रहा होता है। उनके यौगिक व रासायनिक गुणों में अनेक समानताएँ होती हैं, जैसा कि अधोलिखित विवरण से स्पष्ट है। 3d-श्रेणी के तत्वों में Se, Ti, V, Cr, Mn, Fe, Co, Ni, Cu और Zn आते हैं।
           (i) धात्विक आचरण-सभी संक्रमण तत्व धातुएँ हैं तथा ऊष्मा व विद्युत के सुचालक हैं। वे तन्य हैं तथा एलॉय बनाते हैं।
           (ii) गलनांक व क्वथनांक-इनके गलनांक व क्वथनांक सामान्यतः ऊँचे होते हैं, किन्तु Zn, Cd व Hg इसके महत्त्वपूर्ण अपवाद हैं। इसकी व्याख्या इस आधार पर की जा सकती है कि अभ्यान्तर d स्तर पूर्ण है। सामान्यतः इनके गलनांक 1000°C से ऊपर है।
           (iii) घनत्व-इनके परमाणु आयतन s-खंड तत्वों की तुलना में कम है। इसका कारण यह है कि इनमें अभ्यन्तर आर्बिटल पूरे भर जाते हैं और नाभिकीय आवेश बढ़ जाता है, जिससे इलेक्ट्रॉन भीतर की ओर खिंच जाते हैं। अतः इनके घनत्व उच्च हैं।
           (iv) अल्प अभिक्रियाशीलता-ये धातुएँ निष्क्रिय रहने की उत्तरोत्तर बढ़ती हुई प्रवृत्ति प्रदर्शित करती हैं और यह प्रवृत्ति स्वर्ण व प्लैटिनम में सबसे प्रबल है। इसका कारण यह है कि इनके ऊर्ध्वपातन के ऊष्मा आयनन विभव उच्च होते हैं।
           (v) आयनन विभव-इनके आयनन विभव s व p-ब्लॉक के तत्वों के मध्यवर्ती तथा 5 व 10eV के बीच होते हैं। इस प्रकार के s-ब्लॉक तत्वों की तुलना में कम धनविद्युती हैं और दशाओं के अनुसार आयनिक या सहसंयोजक यौगिक बनाते हैं। सामान्य रूप से, जिन यौगिकों में धातुएँ निम्न संयोजकता की अवस्था में होती हैं वे आयनिक होते हैं तथा अन्य यौगिक सहसंयोजक होते हैं। परमाणु का आकार बढ़ने के साथ-साथ आयनिक यौगिक बनाने की प्रवृत्ति क्षीण होती जाती है।
           (vi) रंग-संक्रमण तत्वों के यौगिक सामान्यतः रंगीन होते हैं। रंग का उद्भव अपूर्ण इलेक्ट्रॉन कोषों तथा इलेक्ट्रॉनों की एक ऊर्जा स्तर से दूसरे स्तर तक उठाने की क्षमता से सम्बद्ध है। संक्रमण तत्वों में d इलेक्ट्रॉन एक ही उपकोश में अधिक उच्च ऊर्जा स्तर में पहुँच जाते हैं। दोनों ऊर्जा स्तरों में अन्तर इतना कम होता है कि ऊर्जा का अवशोषण दृश्य क्षेत्रा में ही होता है। Cu2+ लवणों में लाल प्रकाश अवशोषित होता है तथा पारगमित प्रकाश में स्पेक्ट्रम के अन्य रंगों का विशेषतः नीले की प्रधानता रहती है। अतः ये लवण नीला दिखाई देते हैं।
           s एवं p-ब्लॉक के तत्व में इलेक्ट्रॉन का किसी बाहरी कोश तक उन्नत होना आवश्यक है। दोनों स्तरों में अन्तर बहुत अधिक होता है तथा पराबैंगनी प्रकाश के अनुरूप हो सकता है। फलतः यौगिक आँखों को रंगीन दिखाई नहीं देता।
           (vii) परिवर्ती संयोजकता-संक्रमण तत्व परिवर्ती संयोजकता प्रदर्शित करते हैं। इसका कारण यह है कि इनके परमाणुओं में से संयोजी इलेक्ट्रॉन का निष्कासन होने पर अवशिष्ट कोर अस्थायी होती है और उनके एक या अधिक और इलेक्ट्रॉनों को त्यागने की प्रवृत्ति रहती है। उदाहरणार्थ-लोहे की दो संयोजकताओं को इस प्रकार निरूपित किया जा सकता है।
Fe (26) = 2, 8, 14, 2
Fe2+ (24) = 2, 8, 14 (कोर)
           अस्थायी होने के कारण एक और इलेक्ट्रॉन खोकर Fe3+ आयन देती है।
Fe3+ (23) = 2, 8, 13
           (viii) उत्प्रेरण क्षमता-अनेक संक्रमण तत्वों तथा उनके यौगिक बहुत सक्षम उत्प्रेरक हैं, जैसे-Cu, Fe, NiCr2O3V2O3 आदि ।
           (ix) चुम्बकीय गुण-अनेक संक्रमण तत्व अनुचुम्बकीय है। इसका कारण अयग्मित इलेक्ट्रॉनों की उपस्थिति है। जिन तत्वों में अयग्मित इलेक्ट्रॉन नहीं होते, वे प्रतिचुम्बकीय होते हैं। लोहा व कोबाल्ट लौह-चुम्बकीय हैं।
           (x) संकर बनाने की क्षमता-संक्रमण तत्व छोटे, उच्च आवेशित आयन बनाते हैं जो अन्य समूहों द्वारा प्रदत्त एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्मों का अधिग्रहण कर सकते हैं। फलतः, संक्रमण तत्वों में संकर बनाने की प्रबल क्षमता होती है।

9. उप-सहसंयोजन यौगिक LONG ANSWER TYPE QUESTIONS

प्रश्न 1. निम्नलिखित उपसहसंयोजन सत्ता में धातुओं के ऑक्सीकरण अंक का उल्लेख कीजिए-
(i) [Co(H2O)(CH)(en)2]2+
(ii) [PtCl4]2-
(iii) [Cr(NH3)3Cl3]
(iv) [CoBr2(en)2]+
(v) K3[Fe(CN)6]

उत्तर⇒ (i) [Co(H2O)(CN)(en)2]2+ यौगिक में H2O अणु उदासीन लिगन्ड है।
          x + (-1) = + 2
              x = +3
∴           Co की ऑक्सीकरण-संख्या + 3
(ii) [PtCl4]2-Pt की ऑक्सीकरण-संख्या = x
          x + 4 (-1) = -2
               x = 4 – 2 = +2
∴           Pt की ऑक्सीकरण संख्या = +2
(iii) [Cr(NH3)3Cl3] मे मान Cr की ऑक्सीकरण संख्या x है और NH3 उदासीन लिगन्ड।
           x + (-3) = 0
या              Cr = +3 (ऑक्सीकरण-संख्या)
(iv) माना Co की ऑक्सीकरण-संख्या = x
        [CoBr2(en)2]+
∴           x + 2 (-1) + 3 (1) = +0
                  x = +3
(v) K3 [Fe(CN)6] में माना Fe की ऑक्सीकरण संख्या = x
∴           x + 6 (-1) + 3(1) = + 0
                  x = +3

प्रश्न 2. IUPAC नियमों के आधार पर निम्नलिखित के लिये सूत्र लिखिए-
(i) टेट्राहाइड्रोऑक्सोजिंकेट (II)
(ii) पोटैशियम टेट्राक्लोरिडोपैलेडेट (II)
(iii) डाइ-ऐमीनडाइक्लोरिडो प्लैटिनम (II)
(iv) पोटैशियम टेट्रासायनों निकैलेट (II)
(v) पेन्टाऐमीननाइट्रिटो-o-कोबाल्ट (III)
(vi) पेन्टनाऐमीनानाइट्रिटो-N-कोबाल्ट (III). Download Question PDF

उत्तर⇒ (i) टेट्राहाइड्रोऑक्सोजिंकेट (II) [Zn(OH)4]2-
(ii) पोटैशियम टेट्राक्लोरिडोपैलेडेट (II)
K2[PdCl4] पोटैशियम टेट्राक्लोरिडोपैलेडेट
(iii) डाइऐमीनडाइक्लोरिडो प्लैटिनम (II)
डाइऐमीनडाइक्लोरिडो प्लैटिनम (II) [PtCl2 (NH3)2]
(iv) पोटैशियम टेट्रासायनों निकैलेट (II)
पोटैशियम टेट्रासायनों निकैलेट (II) K2[Ni(CN)4]
(v) पेन्टाऐमीननाइट्रिटो-o-कोबाल्ट (II)
पेन्टाऐमीननाइट्रिटो-o-कोबाल्ट (II)[Co(ONo) (NH5O)2+
(vi) हैक्साऐमीनकोबाल्ट (III) सल्फेट
हैक्साऐमीनकोबाल्ट (III) सल्फेट [Co(NH3)6]2 (SO4)3
(vii) पोटैशियम ट्राई (ऑक्सैलेटो) क्रोमेट (III)
पोटैशियम ट्राई (ऑक्सैलेटो) क्रोमेट
(viii) हेक्साऐमीन प्लैटिनम (IV) [Pt(NH3)6]+4
(ix) टेट्राब्रोमिडो क्यूप्रेट (II)
टेट्राब्रोमिडो क्यूप्रेट (II) [Cu(Br)4]2-
(x) पेन्टाऐमीनाइट्रिटो-N-कोबाल्ट (III)
पेन्टाऐमीनाइट्रिटो-N-कोबाल्ट (III) [Co(NO2)NH3)5]2+

प्रश्न 3. निम्नलिखित के सभी समावयवों (ज्यामितीय व धुवण) की संरचनाएँ बनाइए-
(i) [CoCl2 (en)2]+
(ii) [Co(NH3)Cl(en)2]2+
(iii) [Co(NH3)Cl2(en)]+

उत्तर⇒ (i) [CoCl2(en)2]+
निम्नलिखित के सभी समावयवों (ज्यामितीय व धुवण) की संरचनाएँ बनाइए-
[Co(NH3)Cl(en)2]2+ की ज्यामिति समावयवता
निम्नलिखित के सभी समावयवों (ज्यामितीय व धुवण) की संरचनाएँ बनाइए-
(ii) [CO(NH3)Cl(en)2]2+
निम्नलिखित के सभी समावयवों (ज्यामितीय व धुवण) की संरचनाएँ बनाइए-
(iii) समपक्ष [CoCl2(en)2] की ध्रुवण समावयव
निम्नलिखित के सभी समावयवों (ज्यामितीय व धुवण) की संरचनाएँ बनाइए-

निम्नलिखित के सभी समावयवों (ज्यामितीय व धुवण) की संरचनाएँ बनाइए-
Co(NH3)Cl2(en)]+ समपक्ष और विपक्ष के ज्यामिति समावयव

प्रश्न 4. संयोजकता आबंध सिद्धांत के आधार पर निम्नलिखित उपसहसंयोजन सत्ता में आबंध की प्रकृति की विवेचना कीजिए-
(i) [Fe(CN)6]4+ (ii) [FeF6]3- (iii) [Co(C2O4)3]3- (iv) [CoF6]3-

उत्तर⇒ (i) [Fe(CN)6]4-
संयोजकता आबंध सिद्धांत के आधार पर निम्नलिखित उपसहसंयोजन सत्ता
         CN- लिगन्ड प्रबल है। यह 5d इलेक्ट्रॉन को 3d उपकक्षक में धकेलता है, जिससे इलेक्ट्रॉन अयुग्मित हो जाता है d2sp3 संकरण उत्पन्न करता है।
संयोजकता आबंध सिद्धांत के आधार पर निम्नलिखित उपसहसंयोजन सत्ता
         छ: CN- आयन लिगन्ड छ: इलेक्ट्रॉन युग्म को त्याग कर d2sp3 सकरण कक्षक का निर्माण करते हैं अणु का घूर्णन कम होता है तथा प्रतिचुंबकीय होता है।
(ii) [FeF6]3- हेक्सा फ्लोरो फैरेट (II)
संयोजकता आबंध सिद्धांत के आधार पर निम्नलिखित उपसहसंयोजन सत्ता
         F- आयन दुर्बल लिगन्ड है। यह इलेक्ट्रॉन को अगले कक्षक में नहीं धकेल सकता। अतः अन्दर के d-उपकक्षक के इलेक्ट्रॉन संकरण में भाग नहीं ले सकते। अतः संकरण में 4d कक्षक का उपयोग होता है। जैसे sp3dजो अष्टफलक होता है उच्च घूर्णन यौगिक होता है।
संयोजकता आबंध सिद्धांत के आधार पर निम्नलिखित उपसहसंयोजन सत्ता
संयोजकता आबंध सिद्धांत के आधार पर निम्नलिखित उपसहसंयोजन सत्ता
         ट्राइऑक्सेलेटो क्रोमेट (III)
कोबाल्ट = CO = 27 = [Ar]3d34s2
COO-
|        ऑक्सेलटो प्रबल क्षेत्र उत्पन्न करता है, इस कारण 3d कक्षकों से
COO-
चार इलेक्ट्रॉन को धकेलता है जिससे d2sp3 संकरण उत्पन्न होता है। यह अष्टफलक आकृति उत्पन्न करता है।
∴          अतः यौगिक अनुचुंबकीय है।
चार इलेक्ट्रॉन को धकेलता है जिससे
अष्टफलकीय आकृति बनाता है।
(iv) [CoF6]3-
         [CoF6]3- हेमसाफ्लोरो कोबाल्ट (III) आयन- इस यौगिक में कोबाल्ट की उत्तेजन अवस्था में बाह्य इलेक्ट्रॉन विन्यास 3d6 है अतः F-आयन दुर्बल लिगन्ड है। इसलिए एक 4s, तीन 4p और दो 4d कक्षक संकरण अवस्था में भाग लेकर sp3d2 संकरण कक्षक का निर्माण करते हैं। छ: F-आयन इलेक्ट्रॉन युग्म दान करते हैं। 3d उपकक्षक में इलेक्ट्रॉन युग्म उपसहसंयोजन यौगिक बनाते हैं जो अनुचुंबकीय है।
चार इलेक्ट्रॉन को धकेलता है जिससे
         बाह्य कक्षक के रूप में संयोजक उपकक्षक d का उपयोग किया जाता है। अतः संकरण बाह्य संकरण कहलाता है।

प्रश्न 81. निम्न संकुलों के IUPAC नाम लिखिए तथा ऑक्सीकरण अवस्था, इलेक्ट्रॉनिक विन्यास और उपसहसंयोजन संख्या दर्शाइए। संकुल का त्रिविम रसायन तथा चुंबकीय आघूर्ण भी बताइए :
(i) K[Cr(H2O)2(C2O4)2[.3H2O
(ii) CrCl3(py)3

उत्तर⇒ (i) K[Cr(H2O)2(C2O4)2[.3H2O
पोटैशियम डाइएक्वा डाइऑक्सेलेटो क्रोमेट (III) ट्राइहाइड्रेट CN = 6 ऑक्सीकरण संख्या + 3 इलेक्ट्रॉन विन्यास
Cr+3 = 3d3 [t2g3 – eg2] है।
चार इलेक्ट्रॉन को धकेलता है जिससे
समपक्ष ध्रुवण समावयवता में d और 1 बनाता है।
चार इलेक्ट्रॉन को धकेलता है जिससे
क्योंकि यह तीन अनुग्मित इलेक्ट्रॉन 3d3 रखता है।
अतः μ चुंबकीय =चार इलेक्ट्रॉन को धकेलता है जिससे 

(ii) [CrCl3(py)3]
नाम ट्राइक्लोरोट्राइ पाइराइडी क्रोमियम (II)
             ऑक्सीकरण संख्या Cr = +3
                  उपसंहसंयोजन संख्या = 6
          इलेक्ट्रॉन विन्यास Cr+3 = 3d3
(a) ज्यमितीय समावयव-
चार इलेक्ट्रॉन को धकेलता है जिससे
          (b) दूसरी प्रकार का ज्यामितीय समावयव फलकीय (Fac) और वामावती समावयव है। चुंबकीय आघूर्णन-इन तीन अयुग्मित इलेक्ट्रॉन रखता है।
μ =
= 3.87 B.M.

प्रश्न 5. संयोजकता आबंध सिद्धांत (VBT) की मुख्य अवधारणाओं का वर्णन करें। चतुष्फलक और अष्टफलक उपसहसंयोजन यौगिकों के उदाहरण दें।

उत्तर⇒ अवधारण- (i) लिगन्ड पर इलेक्ट्रॉन युग्म दान करने के लिए होने चाहिए।
        (ii) धातु परमाणु आयन में रिक्त उपकक्षक होने चाहिए।
संयोजकता आबंध सिद्धांत (VBT)-
        (i) संयोजकता आबंध सिद्धांत पाउलिंग द्वारा प्रतिपादित है। इस सिद्धांत की मुख्य अवधारण निम्न है। रिक्त उपकक्षक होने चाहिए ताकि उपसहसंयोजी आबंध बन सके।
        (ii) कुल आबंध संख्या पर निर्भरता के कारण आवश्यक अपकक्षकों का उपयोग होता है। जैसे-s, p या d, जो संकरण कक्षकों का निर्माण करते हैं।
        (iii) संकरण कक्षक आबंध बनाने में उपयोग होते हैं।
        (iv) बाह्य उपकक्षक उच्च ध्रुवण या आन्तरिक उपकक्षक निम्न ध्रुवण यौगिक बनाते हैं। यह इस बात पर निर्भर करता है कि किस प्रकार के उपकक्षक उपलब्ध हैं।
उदाहरण- (क) हैक्सा ऐमीन क्रोमियम (III) आयन-इस यौगिक में क्रोमियम आयन की + 3 औक्सीकरण अवस्था है तथा इलेक्ट्रॉन विन्यास 3d3 है।
Cr (III) आयन के परमाणवीय कक्षक
          दो 3d, एक 4s तथा तीन 4p कक्षक संकरित होकर d2sp3 संकरण कक्षक का निर्माण करते हैं।
          छ: अमोनिया अणु इलेक्ट्रॉन युग्म त्यागकर उपसहसंयोजकी आबध बनाते हैं। अयुग्मित इलेक्ट्रॉन के कारण अनुचुंबकीय हैं।
(ख) [Fe(CN)6]3-
आयन- इसमें आयरन आयन की ऑक्सीकरण अवस्था + 3 है।
Fe = [Ar] 3d6 4s2
Fe = [Ar] 3d5 4s0
       फेरिक आयन में छ: उपकक्षक रिक्त रहता है जो सायनाइड आयन द्वारा त्यागे गए छ: इलेक्ट्रॉन युग्मों को ग्रहण करता है। ऐसा निम्न योजना अनुसार होता है-
Cr (III) आयन के परमाणवीय कक्षक
       एक इलेक्ट्रॉन अयुग्मित है। अतः अनुचुंबकीय है तथा अष्टफलक आकृति का निर्माण करता है।
(ग) [Fe(CN)6]4-
         आयन-इस उपसहसंयोजक यौगिक आयन में आयरन की ऑक्सीकरण अवस्था + 2 है।
                 Fe परमाणु का इलेक्ट्रॉन विन्यास [Ar] 3d6 4s2
                 Fe+2 आयन का इलेक्ट्रॉन विन्यास [Ar] 3d6
सायनाइड आयन से छ: युग्म इलेक्ट्रॉन प्राप्त करने के लिए आयरन आयन छ: रिक्त उपकक्षक प्रदान करता है। यह d2sp3 संकरण द्वारा संभव है। CN- आयन प्रबल लिगन्ड है जो इलेक्ट्रॉन को युग्मित करता है।
Cr (III) आयन के परमाणवीय कक्षक
      अतः छ: सायनाइड CN-आयन से छ: इलेक्ट्रॉन युग्म रिक्त d2sp3 के छ: संकरित कक्षकों में जगह बनाते हैं। क्योंकि एक इलेक्ट्रॉन अयुग्मित है, अतः यह प्रति-चुंबकीय है।
(घ) [CoF6]-3
       आयन- इस उपसहसंयोजक यौगिक आयन में कोबाल्ट की ऑक्सीकरण अवस्था + 3 है।
Co का इलेक्ट्रॉन विन्यास = [Ar] 3d7 4s2
Co+3 आयन = [Ar] 3d6
       कोबाल्ट (III) आयन में छ: रिक्त उपकक्षक हैं जो छः फ्लुराइड लिगन्ड से इलेक्ट्रॉन युग्म प्राप्त कर sp3d2 संरचण दर्शाते हैं।

Cr (III) आयन के परमाणवीय कक्षक
       अतः छः फ्लोराइड आयन से छ: इलेक्ट्रॉन युग्म प्राप्त कर sp3d2 कक्षक में भरे जाते हैं। 3d उपकक्षक में इलेक्ट्रॉन युग्मों को रिक्त उपकक्षक में भरते हैं।
        (ड) [Ni(CO)4] इसी यौगिक में निकेल की ऑक्सीकरण अवस्था शून्य है। शून्य ऑक्सीकरण अवस्था में निकेल का इलेक्ट्रॉन विन्यास [Ar] 3d8 4s2 है। अतः कार्बोनाइल द्वारा प्रदान चार इलेक्ट्रॉन युग्मों को रिक्त उपकक्षक में भरते हैं।
 अतः छः फ्लोराइड आयन से छ: इलेक्ट्रॉन युग्म प्राप्त कर
         सभी इलेक्ट्रॉन युम्मित हैं, अतः [Ni(CO)4] यौगिक प्रतिचुंबकीय है।
         (च) [Ni(CN)4]-2– टैट्रा सायनो निकैलेट (II)-सायनाइड प्रबल लिगन्ड है जो इलेक्ट्रॉन को युग्मित करता है तथा dsp3 संकरण कक्षक बनाता है।
 अतः छः फ्लोराइड आयन से छ: इलेक्ट्रॉन युग्म प्राप्त कर

प्रश्न 6. (i) अम्लराज और सधूम नाइट्रिक अम्ल क्या है ?
(ii) अमोनिया गैस को शुष्क बनाने के लिए किस शुष्क कारण का प्रयोग किया जाता है और क्यों ?

उत्तर⇒ (i) अम्लराज (Aqua regia)-आयतन के विचार से तीन भाग सांद्र हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (HCl) एवं एक भाग सांद्र नाइट्रिक अम्ल (HNO3) के मिश्रण को अम्लराज कहा जाता है। अम्लराज अत्यंत शक्तिशाली (Very strong) अम्ल होता है। इसमें सोना, प्लैटिनम आदि जैसे अत्यंत अक्रियाशील धातुओं को भी घुला लेने की क्षमता होती है। अम्लराज की सक्रियता HNO3 और HCl की प्रतिक्रिया के परिणामस्वरूप बने नवजात क्लोरीन परमाणु के कारण होता है।

(i) अम्लराज और सधूम नाइट्रिक अम्ल क्या है ?

          सधूम नाइट्रिक अम्ल (Fuming nitric acid)-सांद्र नाइट्रिक अम्ल जिसमें NO2 गैस अधिकता में घुला रहता है। सधूम नाइट्रिक अम्ल कहलाता है। घुली हुई NO2 गैस इसमें भूरे धूम (brown fume) के रूप में निकलती रहती है। इसी कारण इसे सधूम नाइट्रिक अम्ल कहा जाता है। इसे प्राप्त करने के लिए सांद्र नाइट्रिक अम्ल में थोड़ा स्टार्च मिलाकर मिश्रण का स्त्रवण किया जाता है। सधूम नाइट्रिक अम्ल, सांद्र नाइट्रिक अम्ल की अपेक्षा अधिक प्रबल ऑक्सीकारक है।
        (ii) अमोनिया गैस को शुष्क बनाने के लिए इसे कली चूना (CaO) से होकर प्रवाहित किया जाता है। कली चूना अमोनिया गैस में उपस्थित जलवाष्प को शोषित करके भखरा चूना में बदल जाती है।
CaO + H2O → Ca(OH)2
       अमोनिया को अन्य प्रचलित शुष्क कारकों जैसे-अनार्द्र CaCl2 P2O5 या सांद्र H2 SO4 द्वारा शुष्क नहीं बनाया जा सकता क्योंकि ये पदार्थ अमोनिया के साथ निम्नलिखित तरीके से प्रतिक्रिया कर लेते हैं-

CaCl2 + 8NH3 = CaCl2 . 8NH3
2NH3 + H2SO4 = (NH4)2 SO4
P2O5 + 6NH3 + 3H2O = 2(NH4)3PO4

प्रश्न 7. संक्रमण धातुएँ रंगीन यौगिक का निर्माण करते हैं। विवेचन करें।

उत्तर⇒ यौगिक के रंग (Colour of compound)-संक्रमण धातु रंगीन यौगिक का निर्माण करने में सक्षम हैं। उदाहरणार्थ, FeCl3, CoCl2, CuSO4, CdS रंगीन होते हैं। रंग की व्याख्या d – d संक्रमण (d – d transition) एवं आवेश स्थानान्तरण (charge transfer) के आधार पर की जाती है।
        (i) d – d संक्रमण (d – d transition)- d सब ऑरबिट में पाँच ऑरबिटल (dxydxz, dyzdx2 –y2 एवं dz2) होते हैं। स्वतंत्र अवस्था में पाँचों ऑर्बिटलों की ऊर्जा बराबर होती है, लेकिन यौगिक में d – ऑर्बिटलों के दो सेट t2g (dxy, dxzdyz) एवं eg (dx2 – y2 एवं dz2) प्राप्त होते हैं।
       ष्टफलकीय (Octachedral) यौगिक में d – ऑर्बिटल का विघटन (splitting) निम्न प्रकार से होता है-
(i) अम्लराज और सधूम नाइट्रिक अम्ल क्या है ?
      चतुष्फलकीय यौगिकों में d-orbital का विघटन (splitting) निम्न प्रकार से होता है-
(i) अम्लराज और सधूम नाइट्रिक अम्ल क्या है ?
         यौगिक में भी इलेक्ट्रॉन कम ऊर्जा वाले ऑरबिटल में रहता है। लेकिन जब यौगिक से होकर दृश्य प्रकाश (visible light) की किरणें गुजरती हैं तो दृश्य प्रकाश के अवयवी रंगों जिसकी ऊर्जा t2 एवं e ऑर्बिटलों की ऊर्जा के अन्तर के बराबर होती है, यौगिक के द्वारा शोषित हो जाती हैं फलस्वरूप यौगिक से निकलने वाली किरणपूंज में उस रंग की किरण का अभाव हो जाता है। यह किरण रंगीन हो जाती है। इसी कारण से यौगिक रंगीन दिखाई पड़ने लगता है। उदाहरणार्थ यदि कोई यौगिक नीले रंग की किरण को शोषित कर लेता है, तो निकलनेवाली किरण में रंग लाल दिखाई पड़ेगा। ऐसे यौगिकों के रंगीन होने के कारण नीचे के ऑर्बिटल से ऊपर के ऑर्बिटल में इलेक्ट्रॉन के स्थानान्तरण को d – d संक्रमण (d – d transition) कहा जाता है।
        चतुष्फलकीय यौगिक में d– ऑर्बिटल षटफलकीय यौगिकों के विपरीत होती है अर्थात् t2le ऑर्बिटल की ऊर्जा e ऑर्बिटल से अधिक होती है। अतः इन यौगिकों में d – d संक्रमण के फलस्वरूप इलेक्ट्रॉन का स्थानान्तरण e से t2 ऑर्बिटल में होता है।
       d – d संक्रमण के फलस्वरूप उत्पन्न रंग हल्के (light) होते हैं।
       आवेश स्थानान्तरण (Charge transfer)-संक्रमण तत्वों के कुछ ऐसे यौगिक भी पाये जाते हैं जिनमें d संक्रमण नहीं होने के बावजूद भी गाढ़े (intense) रंग होते हैं। इस तथ्य की व्याख्या आवेश स्थानान्तरण के आधार पर की जाती है। ऐसे यौगिक का अवयवी धनायन यौगिक के अवयवी ऋणायन द्वारा प्रदत्त इलेक्ट्रॉन को ग्रहण कर सकता है। ऐसा यौगिक प्रकाश के किसी रंग की किरणों को शोषित कर अवकारक के एक इलेक्टॉन को ऑक्सीकारक पर स्थानान्तरित करता है।
       उदाहरण- पोटाशियम परमैग्नेट (KMnO4) तथा पोटाशियम डाइको (K2Cr2O7) के रंगीन होने का कारण आवेश स्थानान्तरण ही है।
(i) अम्लराज और सधूम नाइट्रिक अम्ल क्या है ?
प्रश्न 8. कारण बताएँ-
(a) साइनाइड कॉम्प्लेक्स {Ag(CN)2} से सिल्वर धातु के निष्कर्षण में जिंक इस्तेमाल करते हैं परन्तु कॉपर नहीं, क्यों ?
(b) क्यों कैल्शियम ऑक्साइड सिलिका के साथ धातुमल बनाता है ?
(c) क्यों कैल्शिनेशन में कभी-कभी सल्फेट का बनना उपयोगी होता है ?

उत्तर⇒ (a) जिंक की विद्युत धनात्मक Cu से ज्यादा है। इसलिए सायनाइड कम्प्लेक्स से सिल्वर के निष्कर्षण में जिंक का इस्तेमाल करते हैं।
(b) CaO + SiO2→ CaSiO3
        कैल्शियम ऑक्साइड भस्मीय फ्लक्स है जबकि SiO2 अशुद्धि है। इसलिए कैल्शियम ऑक्साइड सिलिका के साथ धातुमल बनाते हैं।
       (c) कैल्शिनेशन में सल्फेट बनने से वह दूसरे धातु के साथ ऑक्सीकृत नहीं होता है जिससे धातु की मात्रा में कमी नहीं होती है।

प्रश्न 9. उपसहसंयोजन यौगिकों के लिए संभावित विभिन्न प्रकार की समावयवताओं को सूचिबद्ध कीजिए तथा प्रत्येक का एक उदाहरण दीजिए।

उत्तर⇒ उपसहसंयोजन यौगिकों में दो प्रकार की समावयवताएँ ज्ञात हैं
        (i) त्रिविम समावयता,
        (ii) संरचनात्मक समावयवता।
        (i) त्रिविम समावयता-त्रिविमीय समावयवों के रासायनिक सूत्र व रासायनिक आबंध समान होते हैं। त्रिविम समावयव दो प्रकार के होते हैं
        (i) ज्यामितीय समावयवता,
        (ii) ध्रुवण समावयवता।
        (i) ज्यामितीय समावयता-इस प्रकार की समावयता हेट्रोलेप्टिक संकुलों में पाई जाती है जिनमें लिगेन्डों की भिन्न ज्यामितीय व्यवस्थाएँ संभव हो सकती हैं। इस प्रकार के व्यवहार के प्रमुख उदाहरण 4 व 6 उपसहसंयोजन संख्या वाले संकुलों में पाए जाते हैं। इस प्रकार की समावयवता चतुष्फलकीय ज्यामिति में संभव नहीं है परन्तु [MX2L4] सूत्र वाले अष्टफलकीय संकुलों में जहाँ दो लिगेन्ड X एक-दूसरे के समपक्ष या विपक्ष हो संभव है।
(i) अम्लराज और सधूम नाइट्रिक अम्ल क्या है ?
        (ii) धुवण समावयता-ध्रुवण समवयव एक-दूसरे के दर्पण प्रतिबिब होते हैं जिन्हें एक-दूसरे पर अध्यारोपित नहीं किया जा सकता। इन्हें प्रतिबिंब रूप या एनैन्टिओमर कहते हैं। अणु अथवा आयन जो एक-दूसरे पर अध्यारोपित नहीं किए जा सकते, काइरल कहलाते हैं। ये दो रूप दक्षिण-ध्रुवण घूर्णक (d) और वामावर्ती (1) कहलाती हैं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि ये ध्रुवणमापी में समतल ध्रुवित प्रकाश को किस दिशा में घूर्णित करते हैं (d दाई तरफ घूर्णित करता है तथा I बाईं तरफ) प्रकाशिक समावयवता सामान्य रूप से द्विदंतूर लिगेन्ड युक्त अष्टफलकीय संकुलों में पाई जाती है। जैसे-[Pt Cl2 (en)2]2+ के समान उपसहसंयोजक समूह में केवल समपक्ष रूप प्रकाशित समावयवता दर्शाता है।
(i) अम्लराज और सधूम नाइट्रिक अम्ल क्या है ?
        (i) बंधनी समावयवता-
[Co(NH3)5 NO2] Cl2 और (Co(NH3)5 (ONo)Cl2
पीला रंग                                            लाल रंग

        (ii) उपसहसंयोजन समावयवता-
[Co(NH3)6] [Cr (CN)6] और (Cr(NH3)6] [Co(CN)6]
        (iii) आयन समावयवता-
[Co(NH3)5 SO4 Br और [Co(NH3)5 Br]SO4
        (iv) विलायकयोजन समावयवता-
[Cr(H2O)5 Cl] Cl2H2O हरा रंग उत्पन्न करता है।

प्रश्न 10. प्रत्येक का एक उदाहरण देते हुए निम्नलिखित में उपसहसंयोजन यौगिकों की भूमिका की संक्षिप्त विवेचना कीजिए
        (i) जैव प्रणालियाँ
        (ii) औषध रसायन
        (iii) विश्लेषणात्मक रसायन
        (iv) धातुओं का निष्कर्षण/धातु कर्म

उत्तर⇒ (i) जैव तंत्र में उपसहसंयोजन यौगिकों का महत्व-प्रकाश संश्लेषण के लिए उत्तरदायी वर्णक, क्लोरोफिल, मैग्नीशियम का उपसहसंयोजन यौगिक है। रक्त का लाल वर्णक हीमोग्लोबिन, जोकि ऑक्सीजन का वाहक है, आयरन का एक उपसहसंयोजन यौगिक है। विटामिन B12 सायनोकोबालऐमीन, प्रतिप्रणाली अरक्तता कारक, कोबाल्ट का एक उपसहसंयोजन यौगिक है। जैविक महत्व के अन्य आयन युक्त उपसहसंयोजन यौगिक जैसे-कार्बोक्सी पेप्टिडेज-A तथा कार्बनिक एनहाइड्रेज एन्जाइम हैं।
        (ii) औषध रसायन में उपयोग- औषध रसायन में कीलेट चिकित्सा के उपयोग में अभिरुचि बढ़ रही है। इसका एक उदाहरण है-पौधे/जीव जंतु निकायों में विषैले अनुपात में विद्यमान धातुओं के द्वारा उत्पन्न समस्याओं का उपचार। इस प्रकार कॉपर तथा आयरन की अधिकता को D-पेनिसिलऐमीन तथा डेसफेरीआक्सिम B लिगेन्डों के साथ उपसहसंयोजन यौगिक बनाकर दूर किया जाता है। EDTA को लेड की विषाक्ता के उपचार में प्रयुक्त किया जाता है। प्लेटिनम के कुछ उपसहसंयोजन यौगिक ट्यूमर वृद्धि को प्रभावी रूप से रोकते हैं। उदाहरण-समपक्ष प्लेटिन तथा संबंधित यौगिक।
      (iii) गुणात्मक तथा मात्रात्मक रासायनिक विश्लेषण में उपयोग-उपसहसंयोजन यौगिकों के गुणात्मक व मात्रात्मक रासायनिक विश्लेषणों में बहुत उपयोग है। अनेक परिचित रंगीन अभिक्रियाएँ जिनमें धातु आयनों के साथ अनेक लिगेन्डों की उपसहसंयोजन सत्ता बनने के कारण रंग उत्पन्न होता है। चिरसम्मत तथा यांत्रिक विधियों द्वारा धातु आयनों की पहचान व उनके मात्रात्मक आकलन का आधार है। ऐसे अभिकर्मकों के उदाहरण हैं-EDTA, DMG, ∝ – नाइट्रोसो-β नेपथॉल, क्यूपरॉन आदि।
     (iv) धातु निष्कर्षण में-धातुओं की प्रमुख निष्कर्ष विधियों में जैसे सिल्वर तथा गोल्ड के लिए संकुल विरचन का उपयोग होता है। उदाहरणार्थ, ऑक्सीजन तथा जल की उपस्थिति में गोल्ड, सायनाइड आयन से संयोजित होकर जलय विलयन में सहसंयोजन सत्ता [Au(CN)2] बनाता है। इस विलयन में जिंक मिलाकर गोल्ड को पृथक किया जा सकता है।

10. हैलोऐल्केन्स तथा हैलोऐरीन्स LONG ANSWER TYPE QUESTIONS

कार्बनिक रसायन
10. हैलोऐल्केन्स तथा हैलोऐरीन्स

प्रश्न 1. आप निम्नलिखित को कैसे संश्लेषित करेंगे ? दर्शाए।
(i) एक उपयुक्त ऐल्कीन से 1-फेनिलएथेनॉल।
(i) SN2 अभिक्रिया द्वारा ऐल्किल हैलाइड के उपयोग से साइक्लो हेक्लिसमेथेनॉल।
(iii) एक उपयुक्त ऐल्किल हैलाइड के उपयोग से पेन्टेन-1-ऑल।

उत्तर⇒ Download Question PDF

आप निम्नलिखित को कैसे संश्लेषित करेंगे
(ii) CH3 – (CH2)3 – CH2Br + aq. KOH → CH3 – (CH2)3 – पेन्टेन-1-ऑल CH2OH + KBr

प्रश्न 2. समझाइए क्यों-
      (i) क्लोरोबेन्जीन का द्विध्रुव आघूर्ण साइक्लेहेक्सिन क्लोराइड की तुलना में कम होता है ?
      (ii) ऐल्किल हैलाइड धुवीय होते हुए भी जल में अमिश्रणीय हैं ?
      (iii) ग्रिगनार्ड अभिकर्मक का विरचन निर्जलीय अवस्थाओं में करना चाहिए ?

उत्तर⇒ (i) क्लोरोबेन्जीन का द्विध्रुव आघूर्ण मान साइक्लोहेक्सिल क्लोराइड की तुलना में कम है क्योंकि कार्बन, क्लोरीन से जुड़ा होता है। कार्बन क्लोरोबेन्जीन में sp2 संकरण दर्शाता है। अतः यह अधिक विद्युत ऋणात्मक है साइक्लोहेक्सिल क्लोराइड में कार्बन से तो sp3 संकरित है। इसलिए Cl – Cl आबंध से क्लोरीन आसानी से इलेक्ट्रॉन दान करता है।
      (ii) ऐल्किल हैलाइड ध्रुवीय (2.05 – 2.15 D) है लेकिन जल से घुलनशील है क्योंकि ऐल्किल हैलाइड जल के साथ न तो हाइड्रोजन आबंध बनाते हैं और न ही हाइड्रोजन आबंध को तोड़ते हैं।
      (ii) ग्रिगनार्ड अभिकर्मक अति अभिक्रियाशील होते हैं, ग्रिगनार्ड अभिकर्मक ऐसे हाइड्रोकार्बन के साथ क्रिया करते हैं जो प्रोटोन दान करते हैं। केवल जल से काफी होता जो ग्रिगनार्ड अभिकर्मक को हाइड्रोकार्बन में बदल देते हैं।
      R – Mg – X + H2O → R – H + Mg(OH)X
          अतः यह आवश्यक ही ग्रिगनार्ड अभिकर्मक की शुष्क वातावरण में ही तैयार करें।
      R-X + Mg  R- Mg -X
प्रश्न 3. क्लोरोफॉर्म का संरचना सूत्र दें तथा इसके बनाने की विधि का उल्लेख करें।

उत्तर⇒ क्लोरोफॉर्म  
         इथाइल ऐल्कोहॉल का प्रयोग करने पर निम्नांकित प्रतिक्रिया होती है-
         विरंजक चूर्ण पहले जल अपघटित होकर Ca(OH)2 एवं Cl2 में बदल जाता है। क्लोरीन इथाइल ऐल्कोहॉल को ऐसीटल्डिहाइड में ऑक्सीकृत कर देता है। ऐसीटल्डिहाइड क्लोरीन से प्रतिक्रिया कर (OH)2 द्वारा क्लोरोफार्म एवं कैल्शियम फॉर्मेट में जल अपघटित हो जाता है।
Ca(OCl) Cl + H2O → Ca(OH)2 + Cl2

क्लोरोफॉर्म का संरचना सूत्र दें तथा इसके बनाने की विधि का

         ऐसीटोन का व्यवहार करने पर अग्रांकित प्रतिक्रिया होती है-
         विरंजक चूर्ण के जल अपघटन से प्राप्त क्लोरीन ऐसीटोन को ट्राइक्लोरो ऐसीटोन को ट्राइक्लोरो ऐसीटोन में बदल देता है। ट्राइक्लोरो ऐसीटोन Ca(OH)2 द्वारा क्लोरोफॉर्म एवं कैल्शियम ऐसीटेट से जल अपघटित हो जाता है।
Ca(OCl)Cl + H2O → Ca(OH)2 + Cl2
क्लोरोफॉर्म का संरचना सूत्र दें तथा इसके बनाने की विधि का

प्रश्न 4. आयोडोफार्म का संरचना सूत्र दें तथा इसके बनाने की विधि का उल्लेख करें।

उत्तर⇒ संरचना सूत्र-
आयोडोफार्म का संरचना सूत्र दें तथा इसके बनाने की विधि का
         आयोडोफॉर्म बनाने की विधि-
         (i) प्रयोगशाला विधि :
         सिद्धांत-ऐल्कोहॉल या ऐसीटोन, आयोडीन एवं कॉस्टिक क्षार या कार्बोनेट के मिश्रण को थोड़ा गर्म करने पर आयोडोफॉर्म प्राप्त होता है।
         प्रतिक्रिया- (a) इथाइल ऐल्कोहॉल का प्रयोग करने पर प्रतिक्रिया निम्नलिखित रूप में होती है-
प्रतिक्रिया- (a) इथाइल ऐल्कोहॉल का प्रयोग करने पर प्रतिक्रिया निम्नलिखित रूप

(b) ऐसीटोन का प्रयोग करने पर प्रतिक्रिया निम्नलिखित रूप में होती है-
ऐसीटोन का प्रयोग करने पर प्रतिक्रिया निम्नलिखित रूप में होती है

प्रश्न 5. क्लोरीन यद्यपि इलेक्ट्रॉन अपनयक समूह है फिर भी यह एरोमैटिक इलेक्ट्रॉनरागी प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं में ऑर्थो तथा पैरा-निर्देशक है, क्यों ?

उत्तर⇒ प्रेरण प्रभाव के कारण क्लोरीन इलेक्ट्रॉन आकर्षित करती है तथा अनुनाद के कारण इलेक्ट्रॉन निर्गमित करती है। प्रेरण प्रभाव के कारण क्लोरीन इलेक्ट्रॉनरागी प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं में बने मध्यवर्ती कार्बोकैटायन को अस्थायित्व प्रदान करती है।
क्लोरीन यद्यपि इलेक्ट्रॉन अपनयक समूह है
प्रेरण प्रभाव मध्यवर्ती कार्बोकैटायन के अस्थायित्व प्रदान करता है।
क्लोरीन यद्यपि इलेक्ट्रॉन अपनयक समूह है
        अनुनाद प्रभाव मध्यवर्ती कार्बोकैटायन को स्थायित्व प्रदान करता है।
        अनुनाद के द्वारा हैलोजन कार्बोकैटायन का स्थायित्व प्रदान करने का प्रयास करती है तथा यह प्रभाव आर्थो एवं पैरा स्थितियों पर अधिक प्रबल होता है की तुलना में प्रेरण प्रभाव अधिक प्रबल होता है, अत: नेट प्रभाव इलेक्ट्रॉन अपनयन करने का होता है जिससे निष्क्रियण उत्पन्न होता है। आर्थो एवं पैरा स्थिति पर आक्रमण में अनुनाद प्रभाव, प्रेरण प्रभाव के विपरीत कार्य करता है, अतः ऑर्थो एवं पैरा स्थिति के निष्क्रियण को कम करता है। इस प्रकार अभिक्रियाशीलता, प्रबल प्रेरण प्रभाव के द्वारा तथा अभिविन्यास, अनुनाद प्रभाव के द्वारा नियंत्रित होता है।

11. ऐल्कोहॉल, फिनाल एवं ईथर LONG ANSWER TYPE QUESTIONS

11. ऐल्कोहॉल, फिनाल एवं ईथर

प्रश्न 1. फीनॉल की अम्लता ऐल्कोहॉल की अपेक्षा अधिक है। क्यों ?

उत्तर⇒ फीनॉल की धातुओं (उदाहरणार्थ-सोडियम तथा ऐलुमिनियम) तथा सोडियम हाइड्रॉक्साइड के साथ अभिक्रियाएँ इसकी अम्लीय प्रकृति को दर्शाती है। फीनॉल में हाइड्रॉक्सिल समूह बेंजीन वलय के sp2 संकरित कार्बन से सीधा संयुक्त रहता है। जो कि इलेक्ट्रॉन अपनयक समूह के रूप में कार्य करता है।
       किसी ऐल्कोहॉल तथा फिनॉल का आयनन निम्नलिखित प्रकार से होता है-
क्लोरीन यद्यपि इलेक्ट्रॉन अपनयक समूह है
       फीनॉल में – OH से संयुक्त sp2 संकरित कार्बन को उच्च विद्युत ऋणात्मकता के कारण ऑक्सीजन पर इलेक्ट्रॉन घनत्व कम हो जाता है। जिससे 0- H आबंध की ध्रुवता बढ़ती है।
       ऐलकॉक्साइड आयनों में ऋणावेश ऑक्सीजन पर स्थानागत होता है। जबकि फीनॉक्साइड आयनों में विस्थापित होता है। ऋणावेश का विस्थानन संरचना (1 – V) फीनॉक्साइड आयनों को अधिक स्थायी बनाता है तथा फीनॉल के आयनन में सहायक होता है। Download Question PDF

फीनॉल की अम्लता ऐल्कोहॉल की अपेक्षा अधिक है

प्रश्न 2. निम्नलिखित यौगिकों के IUPAC नाम लिखिए :
समझाइए क्यों

समझाइए क्यों
निम्नलिखित यौगिकों के IUPAC नाम लिखिए 

उत्तर⇒ (i) 2, 2, 4-ट्राईमिथाइल पेंटेन-3-ऑल
(ii) 5-इथाइल हेप्टेन-2, 4-डाइऑल
(iii) ब्यूटेन-2, 3-डाइऑल
(iv) प्रोपेन-1, 2, 3-ट्राइऑल
(v) 2-मेथिल फिनॉल
(vi) 4-मेथिल फिनॉल
(vii) 2, 5-डाइमेथिल फीनॉल
(viii) 2, 6-डाइमेथिल फीनॉल
(ix) 1-मिथॉलमा-2-मेथिलप्रोपेन
(x) एथॉक्सीबेंजीन
(xi) 1-फीनॉक्सीहेप्टेन
(xii) 2-एथॉक्सीब्यूटेन।

प्रश्न 3. निम्नलिखित अभिक्रियाओं के लिए समीकरण दीजिए।
(i) प्रोपेन-1-ऑल का क्षारीय KMnO4 के साथ ऑक्सीकरण।
(ii) ब्रोमीन की CS2 की फिनॉल से अभिक्रिया।
(iii) तनु HNO3 की फिनॉल से अभिक्रिया।
(iv) फिनॉल की जलीय NaOH की उपस्थिति में क्लोरोफॉर्म के साथ अभिक्रिया।

उत्तर⇒ (i) CH3CH2CH2OH + 2[O]CH3CH2COOH + H2O
(ii) फिनॉल की ब्रोमीन व CS2 के साथ अभिक्रिया-
निम्नलिखित अभिक्रियाओं के लिए समीकरण दीजिए
(iii) फिनॉल की तुन HNO3 के साथ अभिक्रिया
निम्नलिखित अभिक्रियाओं के लिए समीकरण दीजिए
(iv) फिनॉल की CHCl3 व जलीय NaOH से अभिक्रिया
निम्नलिखित अभिक्रियाओं के लिए समीकरण दीजिए

प्रश्न 4. निम्नलिखित को उदाहरण सहित समझाइए-
(i) विलियम्सन ईथर संश्लेषण
(ii) असममित ईथर।

उत्तर⇒ (i) विलियम्सन ईथर संश्लेषण- यह सममित और असममित ईथरों को बनाने की एक महत्त्वपूर्ण प्रयोगशाला विधि है। इस विधि में, ऐल्क्लि हैलाइड की सोडियम ऐल्काक्साइड के साथ अभिक्रिया करायी जाती है।
       R – C + R’ONa – R – O – R’ + NaX
       इस अभिक्रिया में प्राथमिक ऐल्किल हैलाइड पर ऐल्काक्साइड आयन का SN2 आक्रमण होता है।
निम्नलिखित अभिक्रियाओं के लिए समीकरण दीजिए
       (ii) असममित ईथर- यदि ईथरल ऑक्सीजन के दोनों ओर दो विपरीत एल्काइल या ऐरिल समूह उपस्थित हो तो ऐसा ईथर असममित ईथर कहलाता है।

निम्नलिखित अभिक्रियाओं के लिए समीकरण दीजिए

प्रश्न 5. हाइड्रोजन आयोडाइड की निम्नलिखित के साथ अभिक्रिया के लिए समीकरण लिखिए
(i) 1-प्रोपॉक्सीप्रोपेन (ii) मेथॉक्सीबेन्जीन तथा (iii) बेन्जिल एथिल ईथर

उत्तर⇒
हाइड्रोजन आयोडाइड की निम्नलिखित के साथ अभिक्रिया के लिए

प्रश्न 6. निम्नलिखित अभिक्रियाओं के लिए समीकरण लिखिए-
(i) फ्रिडेल-क्राफ्ट अभिक्रिया-ऐनिसोल का ऐल्किलन
(ii) ऐनिसोल का नाइट्रीकरण
(iii) एथेनॉइक अम्ल माध्यम में ऐनिसोल का ब्रोमीनन
(iv) ऐनिसोल का फ्रिडेल-क्राफ्ट ऐसीटिलन।

उत्तर⇒ (i) फ्रिडेल-क्राफ्ट अभिक्रिया-ऐनिसोल का ऐल्किलन-

निम्नलिखित अभिक्रियाओं के लिए समीकरण लिखिए

(ii) नाइट्रीकरण-एनिसोल जब सांद्र H2SO4 व HNO3 के मिश्रण से मिलता है तब आर्थों और पैरा नाइट्रो ऐनिसाल बनता है।
निम्नलिखित अभिक्रियाओं के लिए समीकरण लिखिए

(iii) एथेनोइक अम्ल माध्यम में एनिसॉल का ब्रोमीकरण-फिनाइल एल्काइल इथर को हैलोजनन करते हैं जैसे एनिसॉल का ब्रोमीन कर ब्रोमो ऐनिसाल बनता है।
निम्नलिखित अभिक्रियाओं के लिए समीकरण लिखिए
(iv) ऐनिसोल का फ्रिडेल-क्राफ्ट ऐसीटिलन-ऐनिसोल इलेक्ट्रॉन प्रतिस्थापन अभिक्रिया दर्शाता है तब इसे ऐसीटल क्लोराइड के साथ AICl3 की उपस्थिति में क्रियाशील किया जाता है। AlCl3 लेविस अम्ल की भाँति कार्य करता है। ऐसीटाइल वर्ग दोनों आर्थों और पैरा समूह पर आता है।
निम्नलिखित अभिक्रियाओं के लिए समीकरण लिखिए

प्रश्न 7. मोनोहाइड्रिक ऐल्कोहॉल बनाने की विभिन्न सामान्य विधियों की विवेचना करें इनके सामान्य रासायनिक गुणों का वर्णन करें।

उत्तर⇒ मोनोहाइड्रिक ऐल्कोहॉल बनाने की सामान्य विधियाँ-
(i) ऐल्किल हैलाइड के जल-अपघटन (Hydrolysis) द्वारा-ऐल्किल हैलाइड का जलीय कास्टिल क्षार या आर्द्र सिल्वर ऑक्साइड द्वारा जल-अपघटन करने पर ऐल्कोहल प्राप्त होते हैं।

         R-X + KOH→ RHO + KX
         CH3I + KOH → CH3OH + CI
मिथिल आयोडाइड          मेथिल ऐल्कोहॉल
R – CH2 – X + AgOH → R – CH2OH + AgX
CH3 – CH2 – Br→ CH3 – CH2OH + AgBr
एथिल ब्रोमाइड                  एथिल एल्कोहल
(i) ऐल्डिहाइड एवं कीटोन के अवकरण द्वारा- ऐल्डिहाइड एवं कीटोन का अवकरण करने पर एल्कोहल प्राप्त होता है। RCHO + 2[H] → R – CH2OH
.                                    प्राथमिक ऐल्कोहॉल
R – CO – R’ + 2[H] → R – CH(OH) – R’
.                                    द्वितीयक ऐल्कोहॉल
(iii) ग्रिगनार्ड-प्रतिकर्मक (Grignrd’s Reagent) द्वारा-ग्रिगनार्ड प्रतिकर्मक की प्रतिक्रिया फॉर्मल्डिहाइड, फॉर्मल्डिहाइड को छोड़ किसी दूसरे ऐल्डिहाइड तथा कीटोन से करने पर पहले योगशील यौगिक प्राप्त होते हैं।
इनका जल-अपघटन करने पर क्रमशः प्राथमिक, द्वितीय एवं तृतीय ऐल्कोहल प्राप्त होते हैं।
ग्रिगनार्ड-प्रतिकर्मक (Grignrd's Reagent) द्वारा

ग्रिगनार्ड-प्रतिकर्मक (Grignrd's Reagent) द्वारा
जहाँ R, R’ एवं R” तीन भिन्न ऐल्किल मूलक हैं।
ऐल्कोहल के सामान्य रासायनिक गुण-
1. ऑक्सीकरण (Oxidation)-
(क) प्राथमिक ऐल्कोहल को जलीय KMnO4 द्वारा ऑक्सीकृत करने पर कार्बोक्सिलिक अम्ल प्राप्त होते हैं।
R-CH2 – OH + 2[O]R-COOH + H2O
    प्राथमिक एल्कोहल                          कार्बोक्सिल अम्ल
CH3CH2CH2OH + 2[O]CH3-CH2-COOH+H2O
प्रापिल एल्कोहल                                      प्रोपायोनिक अम्ल
        प्राथमिक ऐल्कोहॉल का ऑक्सीकरण पोटैशियम डाइक्रोमेट एवं सांद्र सल्फ्लूरिक अम्ल द्वारा कराने पर पहले ऐल्डिहाइड बनता है। जो पुनः ऑक्सीकृत होकर कार्बोक्सिलिक अम्ल में परिणत हो जाते हैं।
R -CH2OH+[O]R – COOH + H2O
.                                                       कार्बोक्सिलिक अम्ल
CH3 -CH2 2OH + [O] 
.CH3CH2CHO प्राथमिक ऐल्कोहॉल का ऑक्सीकरण पोटैशियमCH3CH2COOH
प्रोपायोनल्डिहाइड             प्रोपायोनिक अम्ल
       उपर्युक्त प्रतिक्रियाओं से स्पष्ट होता है कि प्राथमिक एल्कोहॉल के ऑक्सीकरण के फलस्वरूप प्राप्त ऐल्डिहाइड एवं   अम्ल में कार्बन परमाणुओं की संख्या समान होती है।
       (ख) द्वितीयक ऐल्कोहॉल का ऑक्सीकरण-द्वितीयक ऐल्कोहॉल का ऑक्सीकरण जलीय KMnO4 या K2Cr2O7 एवं सान्द्र H2SO4 द्वारा कराने पर ऐल्कोहॉल के समान कार्बन परमाणुओं की संख्या वाला कीटोन बनता है।
 (ख) द्वितीयक ऐल्कोहॉल का ऑक्सीकरण-
       कीटोन एल्डिहाइड की तरह सुगमतापूर्वक ऑक्सीकृत नहीं होता है। यह प्रतिक्रिया की प्रचंड अवस्था में ऑक्सीकृत होकर ऐल्कोहॉल से एक कम कार्बन परमाणुओं की संख्या वाले कार्बोक्सिलिक अम्ल में परिणत हो जाते हैं।
 (ख) द्वितीयक ऐल्कोहॉल का ऑक्सीकरण-
        (ग) तृतीयक ऐल्कोहॉल का ऑक्सीकरण-तृतीयक ऐल्कोहॉल उदासीन या क्षारीय घोल में ऑक्सीकरण का प्रतिरोधी होता है। किन्तु यह पोटैशियम डाइक्रोमेट एवं सांद्र सल्फ्यूरिक अम्ल द्वारा ऑक्सीकृत होकर पहले कीटोन तथा फिर अम्ल बनाता है।
         इस प्रकार, तृतीयक ऐल्कोहॉल का ऑक्सीकरण होने पर कार्बन परमाणुओं की संख्या पहले ही चरण में घट जाती है।
 (ख) द्वितीयक ऐल्कोहॉल का ऑक्सीकरण-
2. एस्टरीकरण (Esterification)-अम्लीय उत्प्रेरक (HCl, H2SO4 तथा लूइस अम्ल BF3 आदि) की उपस्थिति में ऐल्कोहल कार्बोक्सिलिक अम्लों से प्रतिक्रिया कर एस्टर बनाते हैं।
R – COOH + H – O – R’एस्टरीकरण (Esterification)RCOOR’ + H2O
      अम्ल       ऐल्कोहॉल               एस्टर
CH3COOH    +    HOC2H5   एस्टरीकरण (Esterification)   CH2COOC2H5 + H2O
ऐसीटिक अम्ल      ऐथिल एल्कोहॉल             एथिल ऐसीटेट
      ऐल्कोहल एवं अम्ल की प्रतिक्रिया द्वारा एस्टर बनने की क्रिया एस्टरीकरण कहलाती है।
         3. सल्फ्यूरिक अम्ल की प्रतिक्रिया- अन्य अम्ल की तरह सल्फ्यूरिक अम्ल भी ऐल्कोहॉल से कमरे के ताप पर प्रतिक्रिया कर एस्टर बनाता है।
R – OH + HOSO3H → ROSO3H + H2O
.                                       ऐल्किल हाइड्रोजन सल्फेट
       सल्फ्यूरिक अम्ल द्वारा ऐल्कोहॉल जल निकलने की क्रिया निर्जलीकरण (dehydration) कहलाते हैं।

प्रश्न 8. ईथर बनाने की विभिन्न सामान्य विधियों की विवेचना करें। इनके सामान्य रासायनिक गुणों का वर्णन करें।

उत्तर⇒ ईथर बनाने की सामान्य विधियाँ-
       (i) अल्काइल हैलाइड से-अल्काइल हैलाइड को सोडियम एल्कोसाइड के साथ गर्म करने से ईथर बनता है।
R – ONa + R – X → R – O – R + NaX
सोडियम अल्काइल             ईथर
एल्कोसाइड हैलाइड
इसे विलियम्सन की विधि (Williamsons’ synthesis) कहते हैं।
      C2H5 – ONa + C2H5I→ C2H5– O – C2H5+ NaI
सोडियम                   इथाइल                 डाइइथाइल ईथर
इथॉक्साइड              आयोडाइड
       (ii) अल्कोहल से- अल्कोहल के अधिक मात्रा को 140°C तक सान्द्र गन्धकाम्ल के साथ गर्म करने पर ईथर बनता है।
R – OH + R – OR R – O – R + H2O
.                                            ईथर
C2H5 -OH+H -O- C2H5C2H5 -O-C2H5 +H2O
            इथानॉल                                           डाइइथाइल ईथर
       (iii) अल्कोहल के निर्जलीकरण से-एल्कोहल को वाष्प के 250°C तक तप्त किए हुए एल्युमिनियम ऑक्साइड उत्प्रेरक के ऊपर प्रवाहित करने से जल का एक अणु निष्कासित होता है और ईथर बनता है।
R – OH + HORR – O – R + H2O
.                                              ईथर
C2H5 – OH+HO – C2H5  C2H5 -O- C2H5 + H2O
.                                                                 डाइइथाइल ईथर
ईथर का सामान्य रासायनिक गुण-
(i) HX के साथ प्रतिक्रिया-
R – O – R + HXईथर का सामान्य रासायनिक गुणR – OH + RX
ईथर                               अल्कोहल अल्काइड
.                                          हैलाइड
C2H5 – O – C2H5 + HI ईथर का सामान्य रासायनिक गुण C2H5OH + C2H5I
डाइ इथाइल ईथर                           इथाइल        इथाइल
.                                                   अल्कोहल   आयोडाइड
(ii) FCl5 के साथ प्रतिक्रिया- ईथर PCl5 के साथ प्रतिक्रिया कर अल्काइन क्लोराइड देता है।
R – O + PCl5ईथर का सामान्य रासायनिक गुण2R – Cl + POCl3
ईथर                           अल्काइल क्लोराइड
C2H5 – O – C2H5 + PCl5 → 2C2H5Cl + POCl3
डाइ ईथाइल ईथर                        अल्काइल क्लोराइड
(iii) एसिड हैलाइड के साथ प्रतिक्रिया-ईथर, एसिद्ध हैलाइड के साथ अनार्द्र जिंक क्लोराइड की उपस्थिति में प्रतिक्रिया कर एस्टर बनाता है।
एसिड हैलाइड के साथ प्रतिक्रिया

12. ऐल्डिहाइड, कीटोन एवं कार्बोक्सिलिक अम्ल LONG ANSWER TYPE QUESTIONS

प्रश्न 1. निम्नलिखित अभिक्रिया को उदाहरण सहित व्याख्या करें :
(a) ऐलडोल संघनन (b) कैनिजारो अभिक्रिया

उत्तर⇒ (a) ऐलडोल संघनन-जिन ऐल्डिहाइडो व कीटोनो में कम-से-कम एक α-हाइड्रोजन विद्यमान होती है, वे तनु क्षार के उत्प्रेरक की तरह उपस्थिति में एक अभिक्रिया द्वारा क्रमशः β-हाइड्रॉक्सी ऐल्डिहाइड (एलडोल) अथवा β-हाइड्रॉक्सी कीटोन (कीटोल) प्रदान करते हैं। इस अभिक्रिया को ऐलडोल अभिक्रिया कहते हैं।
11. ऐल्कोहॉल, फिनाल एवं ईथर LONG ANSWER TYPE QUESTIONS

 11. ऐल्कोहॉल, फिनाल एवं ईथर LONG ANSWER TYPE QUESTIONS

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          ऐलडोल व कीटोल आसानी से जल निष्कासित करके α, β-असंतृप्त कार्बोनिल यौगिक देते हैं जो ऐलडोल संघनन उत्पाद है।
          (b) कैनिजारो अभिक्रिया-ऐल्डिहाइड, जिनमें α-हाइड्रोजन परमाणु नहीं होते सांद्र क्षार की उपस्थिति में गरम करने से स्वऑक्सीकरण व अपचयन (असमानुपातन) की अभिक्रियाएँ प्रदर्शित करते हैं। इस अभिक्रिया में ऐल्डिहाइड का एक अणु ऐल्कोहॉल में अपचयित होता है। जबकि दूसरा अणु कार्बोक्सिलिक अम्ल के लवण में ऑक्सीकृत हो जाता है।

उदाहरण-

प्रश्न 2. कोल्बे अभिक्रिया तथा राइमर-टीमन अभिक्रिया क्या है ? व्याख्या करें।

उत्तर⇒ कोल्बे अभिक्रिया-फीनॉल को सोडियम हाइड्रॉक्साइड के साथ अभिकृत कराने से बना फीनॉक्साइड आयन, फीनॉल की अपेक्षा इलेक्ट्रॉनरागी ऐरोमैटिक प्रतिस्थापन अभिक्रिया के प्रति अधिक क्रियाशील होता है। अतः वह CO2 जैसे दुर्बल इलेक्ट्रॉनरागी के साथ इलेक्ट्रॉनरागी प्रतिस्थापन अभिक्रिया करता है। इससे ऑर्थी हाइड्रॉक्सीबेन्जोइक अम्ल मुख्य उत्पाद के रूप में प्राप्त होता है।
कोल्बे अभिक्रिया तथा राइमर-टीमन अभिक्रिया क्या है

         राइमर-टीमन अभिक्रिया-फीनॉल की सोडियम हाइड्रॉक्साइड की उपस्थिति में क्लोरोफॉर्म के साथ अभिक्रिया से बेंजीन में, – CHO समूह ऑर्थो स्थिति पर प्रवेश कर जाता है। इस अभिक्रिया को राइमर-टीमन अभिक्रिया (Reimer-Tiemann reaction) कहते हैं।
      प्रतिस्थापित मध्यवर्ती बेन्जिल क्लोराइड क्षार की उपस्थिति में अपघटित होकर सैलिसैलिडहाइड बनाता है।
कोल्बे अभिक्रिया तथा राइमर-टीमन अभिक्रिया क्या है

प्रश्न 3. निम्नलिखित यौगिकों के आईयूपीएसी (IUPAC) नाम पद्धति में नाम लिखिए-
(i) CH3 CH(CH3)CH2CHO
(ii) CH3CH2COCH(C2H5)CH2CH2Cl
(iii) CH3CH = CHCHO
(iv) CH3COCH2COCH3
(v) CH3CH(CH3) CH2C(CH3)2COCH3
(vi) (CH3)3CCH2COOH
(vii) OHCC6H4CHO-P

उत्तर⇒
निम्नलिखित यौगिकों के आईयूपीएसी (IUPAC) नाम पद्धति में नाम लिखिए

निम्नलिखित ऐल्डिहाइडों एवं कीटोनों के आइयूपीएसी
निम्नलिखित ऐल्डिहाइडों एवं कीटोनों के आइयूपीएसी

प्रश्न 4. निम्नलिखित ऐल्डिहाइडों एवं कीटोनों के आइयूपीएसी (IUPAC) नाम लिखिए और जहाँ संभव हो सके साधारण नाम भी दीजिए।
(i) CH3CO(CH2)4CH3
(ii) CH3CH2CHBrCH2CH(CH3) CHO
(iii) CH3(CH2)5CHO
(iv) Ph – CH = CH – CHO
(v)
(vi) PhcoPh

उत्तर⇒ (i) हेप्टेन-2-ओन
(ii) 4-ब्रोमो-2-मेथिल हैक्सेनैल
(iii) हैप्टेनल
(iv) 3-फेनिल प्रोपेनल
(v) साइक्लोपेन्टेन कार्बोल्डिहाइड।

प्रश्न 5. निम्नलिखित में कौन-से यौगिकों में ऐल्डोल संघनन होगा, किनमें कैनिजारो अभिक्रिया होगी और किनमें उपर्युक्त में से कोई क्रिया नहीं होगी ? ऐल्डोल संघनन तथा कैनिजारों अभिक्रिया में संभावित उत्पादों की संरचना लिखिए :
(i) मेथेनल
(ii) 2-मेथिलपेन्टेनैल
(iii) बेन्जोफीनॉन
(iv) साइक्लोहेक्सेनोन
(v) 1-फेनिलप्रोपेनोन
(vi) फेनिलऐसीटैल्डिहाइड
(vii) ब्यूटेन-1-ऑल
(viii) 2, 2 डाइमेथिलब्यूटेनैल।

उत्तर⇒ (i) मेथेनल HCHO कैनिजारो अभिक्रिया दर्शाता है-
     मेथेनल के दो अणु संयोग कर सांद्र NaOH की उपस्थिति में निम्न अभिक्रिया होती है।
निम्नलिखित ऐल्डिहाइडों एवं कीटोनों के आइयूपीएसी
यह एल्डोल संघनन नहीं दर्शाता।
(ii)
कैनिजारो अभिक्रिया को नहीं दर्शाता।
यह एल्डोल संघनन दर्शाता है।
निम्नलिखित में कौन-से यौगिकों में ऐल्डोल संघनन होगा

(ii) बेंजएल्डिहाइड कैनिजारों अभिक्रिया दर्शाता है।
निम्नलिखित में कौन-से यौगिकों में ऐल्डोल संघनन होगा
यह अणु न तो कैनिजारो तथा नहीं एल्डोस संघनन दर्शाता।
(v) साइक्लो हैक्सेनॉन O यह अणु एल्डोल संघनन दर्शाता है।
निम्नलिखित में कौन-से यौगिकों में ऐल्डोल संघनन होगा

(vii) 1-फिनाइल ऐस्टेल्डिहाइड
निम्नलिखित में कौन-से यौगिकों में ऐल्डोल संघनन होगा

        फीनाइल ऐस्टेल्डिहाइड के दो अणु NaOH की उपस्थिति में एल्डोल संघनन दर्शाते हैं।
ऐस्टेल्डिहाइड
(viii) ब्यूटेन-1-आन CH3 – CH2 – CH2 – CH2OH
यह अणु न तो एल्डोल संघनन और न ही कैनिजारो अभिक्रिया दर्शाता ।
ऐस्टेल्डिहाइड
प्रश्न 6. निम्नलिखित यौगिक युगलों में विभेद करने के लिए रासायनिक परीक्षणों को दीजिए-
(i) प्रोपेनैल एवं प्रोपेनोन
(ii) पेन्टेन-2-ऑन एवं पेन्टेन-3-ऑन
(ii) एसीटोफीनॉन एवं बेन्जोफीनॉन
(iv) फीनॉल एवं बेन्जोइक अम्ल
(v) बेन्जोइक अम्ल एवं ऐथिलबेन्जोएट
(vi) एथेनल एवं प्रापेनल।

उत्तर⇒ (i) प्रोपेनल एवं प्रोपेनाम में विभेद :
आयोडोफार्म परीक्षण : प्रोपेनल ऋणात्मक परीक्षण देता है। जबकि प्रोपेनान धनात्मक परीक्षण | जब प्रोपेनान का NaOH के साथ किया जाता है तब पीले रंग के अवक्षेप बनते हैं।
2NaOH + I2 → Nal + NaOI + H2O
ऐस्टेल्डिहाइड

(ii) पेन्टेन-2-ऑन एवं पेन्टेन-3-ऑल में विभेदन-पेन्टेन-2-ऑन हैलोफॉर्म परीक्षण देता है।
ऐस्टेल्डिहाइड

(iii) एसीटोफीनॉन एवं बेन्जोफीनॉन में विभेद : ऐसीटोफीनॉन आयोडोफार्म परीक्षण देता है।
ऐस्टेल्डिहाइड

(iv) फिनॉल और बेंजोइक अम्ल में विभेदन : फिनॉल बैंगनी रंग उत्पन्न करता है। जब इसे FeCl3 विलयन से क्रियाशील किया जाता है।
ऐस्टेल्डिहाइड

     या बेंजोइक अम्ल NaHCO3 से क्रिया कर CO2 गैस उत्पन्न करता है जबकि फीनॉल ऐसा नहीं करता।
ऐस्टेल्डिहाइड

फिनॉल Br2 जल को रंगहीन करता है।
ऐस्टेल्डिहाइड

(v) बेंजोइक अम्ल एवं ऐथिल बेन्जोएट में विभेदन : ऐसीटोफीनॉल आयोडोफार्म परीक्षण देता है जबकि बेन्जैल्डिहाइड ऐसा नहीं करता।
ऐस्टेल्डिहाइड

(vi) एथेनल और प्रोपेनल में विभेदन : एथेनल हैलोफॉर्म परीक्षण देता है जबकि प्रोपेनल नहीं।
एथेनल और प्रोपेनल में विभेदन

प्रश्न 7. निम्नलिखित पदों (शब्दों) का वर्णन करें :
(i) ऐसीटाइलेशन
(ii) कैनिजारो अभिक्रिया
(iii) क्रॉस ऐल्डॉल संघनन
(iv) विकार्बोक्सिलन।

उत्तर⇒ (i) ऐसीटाइलेशन : एल्कोहल, फीनॉल या एमीन के सक्रिया हाइड्रोजन को एसाइल (RCO) समूह द्वारा प्रतिस्थापित कर संगत एस्टर या एमाइड बनाना ऐसीटाइलेशन कहलाता है । यह अभिक्रिया ऐसिड क्लोराइड या किसी अम्ल एन्हाइड्राइड की उपस्थिति में होती है।
एथेनल और प्रोपेनल में विभेदन
(ii) कैनिजारो अभिक्रिया : ऐल्डिहाइड, जिसमें α-हाइड्रोजन परमाणु नहीं होते। सांद्र क्षार की उपस्थिति में स्वऑक्सीकरण व अपचयन की अभिक्रियाएँ प्रदर्शित करते हैं। इस अभिक्रिया में ऐल्डिहाइड का एक अणु ऐल्कोहॉल में अपचयित होता है। जबकि दूसरा अणु कार्बोक्सिलिक अम्ल के लवण में ऑक्सीकृत हो जाता है।
2HCHOएथेनल और प्रोपेनल में विभेदनCH3OH + HCOONa
2C6H5CHOएथेनल और प्रोपेनल में विभेदनC6H5CH2OH + C6H5COONa
2(CH3)3 CHOएथेनल और प्रोपेनल में विभेदन(CH3)2CH2OH + (CH3)3 COO-Na+
        यह अभिक्रिया उन सभी यौगिकों में संभव है जिनमें α-हाइड्रोजन परमाणु नहीं होता।
        (iii) क्रॉस ऐल्डोहल संघनन : जब दो भिन्न-भिन्न ऐल्डिहाइड या कीटोन के मध्य ऐल्डोल संघनन होता है तो उसे, क्रास ऐल्डोल संघनन कहते हैं। प्रत्येक में α-हाइड्रोजन हो तो ये चार उत्पादों का मिश्रण देते हैं।
एथेनल और प्रोपेनल में विभेदन

       क्रॉस ऐल्डोल संघनन में कीटोन भी एक घटक के रूप में प्रयुक्त हो सकते हैं।
एथेनल और प्रोपेनल में विभेदन

       इस प्रकार ऐसीटोन, बेन्जैल्डिाइड से क्षारकीय माध्यम में क्रिया कर डाइबेन्जल ऐसीटोन बनता है।
एथेनल और प्रोपेनल में विभेदन

(iv) विकार्बोक्सिलन : (a) कार्बोक्सिलिक अम्लों के सोडियम लवणों को सोडालाइम के साथ गरम करने पर कार्बन डाइऑक्साइड निकल जाती है एवं हाइड्रोकार्बन प्राप्त होते हैं। यह अभिक्रिया विकार्बोक्सिलन कहलाती है।
एथेनल और प्रोपेनल में विभेदन
(b) कोल्बे वैद्युत अपघटन :
2RCOONa→2FCOO + Na+ – आयन
2H2 2OH + 2H+ + आयन
एनोड पर : 2RCOO – 2e→2RCOO→ R – R+ + 2CO2
कैथोड पर : 2H+ + 2e→H2(g)
(c) विकार्बोक्सिलन :
CH2COOAg + Brएथेनल और प्रोपेनल में विभेदन CH3Br + CO2 + AgBr
एल्डिहाइड का सामान्य परिचय दें

(IV) कैल्शियम लवण भी विकार्बोक्सिल दर्शाते हैं।
Ca(CH3COO)2CH3COCH3 + CaCO3

प्रश्न 8. एल्डिहाइड का सामान्य परिचय दें।

उत्तर⇒ एल्डिहाइड तथा कीटोन का सामान्य सूत्र CnH2nO है । इन दोनों में द्विसंयोजक क्रियाशील कार्बोनिल मूलक > CO उपस्थित रहता है, जिसके कारण दोनों श्रेणियों के गुणों में बहुत समानता पायी जाती है। कार्बोक्सिल मूलक की उपस्थिति के कारण दोनों श्रेणियों को कार्बोनिल यौगिक भी कहा जाता है। एल्डिहाइड में कार्बोनिल मूलक के साथ अनिवार्य रूप से एक हाइड्रोजन परमाणु तथा दूसरे बंधन से भी एक हाइड्रोजन परमाणु अथवा एल्काइल मूलक जुड़ा रहता है। उसी कीटोनों में कार्बोनिल मूलक के दो बंधों से दो एल्काइल मूलक लगे रहते हैं।
एल्डिहाइड का सामान्य परिचय दें

      एल्डिहाइड में कार्बोनिल मूलक के साथ एक हाइड्रोजन परमाणु के संलग्न रहने के कारण रासायनिक प्रतिक्रियाओं में और विशेषकर ऑक्सीकरण प्रतिक्रिया में कीटानों से ये अधिक क्रियाशीलता प्रदर्शित करते हैं।
एल्डिहाइड का सामान्य परिचय दें

      उपस्थित रहता है। इन यौगिकों का सामान्य सूत्र CnH2nO है और इन्हें साधारणतः RCHO द्वारा व्यक्त किया जाता है। कुछ महत्त्वपूर्ण एल्डिहाइडों के नाम इस प्रकार हैं-
एल्डिहाइड का सामान्य परिचय दें

13. ऐमीन LONG ANSWER TYPE QUESTIONS

प्रश्न 1. निम्नलिखित युगलों के यौगिकों में विभेद के लिए एक रासायनिक परीक्षण दीजिए
(i) मेथिलऐमीन एवं डाइमेथिलऐमीन ।
(ii) द्वितीयक एवं तृतीक एमीन ।
(iii) ऐथिलएमीन एवं ऐनिलीन।
(iv) एनिलीन एवं बेन्जिल एमीन।
(v) ऐनिलीन एवं N-मेथिल ऐनिलीन।

उत्तर⇒ (i) मेथिल एमीन, कार्बिल ऐमीन बनाती है जबकि डाइमेथिल एमीन अभिक्रिया नहीं करती है।
CH3CNH2 + HCCl3 + 3KOH (alc.)→CH3NC + 3KCl + 3H2O
Methyl amine                                           Carbylamine
.                                                                   (Foul smell)
        (ii) द्वितीयक ऐमीन हिन्सबर्ग अभिकर्मक के साथ अभिक्रिया करती है जबकि तृतीयक एमीन अभिक्रिया नहीं करती है।
द्वितीयक ऐमीन हिन्सबर्ग अभिकर्मक के साथ अभिक्रिया करती है

       (iii) एथिल ऐमीन नाइट्रेस अम्ल से अभिक्रिया द्वारा N2 गैस मुक्त करती है जबकि ऐनिलीन अभिक्रिया नहीं करती है।
C2H5NH2 + HNO2C2H5OH + H2O + N2 ↑
एथिल ऐमीन
       (iv) एथिल ऐमीन नाइट्रस अम्ल से अभिक्रिया द्वारा N2 गैस मुक्त करती है जबकि ऐनिलीन अभिक्रिया नहीं करती है।
द्वितीयक ऐमीन हिन्सबर्ग अभिकर्मक के साथ अभिक्रिया करती है

       (v) ऐनिलीन, कार्बिल ऐमीन अभिक्रिया करती है जबकि N-मेथिल ऐनिलीन अभिक्रिया नहीं करती है।
द्वितीयक ऐमीन हिन्सबर्ग अभिकर्मक के साथ अभिक्रिया करती है

प्रश्न 2. निम्न पर लघु टिप्पणी लिखिए :
(i) कार्बिलऐमीन अभिक्रिया,
(ii) हॉफमान ब्रोमामाइड,
(iii) युग्मन अभिक्रिया
(iv) डाइऐजोकरण
(v) अमोनी अपघटन
(vi) ऐसीटिलन
(vii) गैब्रिएल थैलिमाइड संश्लेषण।

उत्तर⇒ (i) कार्बिलऐमीन अभिक्रिया-ऐलिफैटिक तथा ऐरोमैटिक प्राथमिक ऐमीन, क्लोरोफॉर्म और एथेनॉलिक पोटैशियम हाइड्रॉक्साइड के साथ गर्म करने पर दुर्गधयुक्त पदार्थ आइसोसायनाइड अथवा कार्बिल ऐमीन का विरचन करती हैं। द्वितीयक एवं तृतीयक ऐमीन यह अभिक्रिया नहीं दर्शाती। इस अभिक्रिया को कार्बिल ऐमीन अभिक्रिया अथवा आइसोसायनाइड परीक्षण कहते हैं तथा यह प्राथमिक ऐमीनों के परीक्षण में प्रयुक्त होती है।
R – NH2 + CHCl3 + 3KOHद्वितीयक ऐमीन हिन्सबर्ग अभिकर्मक के साथ अभिक्रिया करती हैR – NC + 3KCl + 3H2O
      (ii) हॉफमान ब्रोमामाइड अभिक्रिया-हॉफमान ने प्राथमिक ऐमीनो के विरचन के लिए एक विधि विकसित की जिसमें किसी एमाइड की NaOH के जलीय अथवा एथेनॉलिक विलयन में ब्राऐमीन से अभिक्रिया करते हैं। इस अभिक्रिया में एल्किल अथवा ऐरिल समूह का स्थानांतरण ऐमाइड के कार्बोनिल कार्बन से ऐमीन के कार्बोनिल परमाणु पर होता है। इस प्रकार प्राप्त ऐमीन में ऐमाइड से एक कार्बन कम होता है।
द्वितीयक ऐमीन हिन्सबर्ग अभिकर्मक के साथ अभिक्रिया करती है

      (iii) युग्मन अभिक्रिया-बेन्जीन डाइएजोनियम क्लोराइड फीनॉल से अभिक्रिया करने पर इसके पैरा स्थान पर युग्मित होकर पैरा हाइड्रॉक्सीनोबेन्जीन बनाता है। इस प्रकार की अभिक्रिया को युग्मन अभिक्रिया कहते हैं।
द्वितीयक ऐमीन हिन्सबर्ग अभिकर्मक के साथ अभिक्रिया करती है

     (iv) डाइऐजोकरण-नाइट्रस अम्ल को जब प्राथमिक ऐरोमेटीक ऐमीन से क्रियाशील किया जाता है तब डाइऐजोनियम लवण बनता है।
द्वितीयक ऐमीन हिन्सबर्ग अभिकर्मक के साथ अभिक्रिया करती है

    (v) अमोनी अपघटन- अमोनिया को एल्कोहल माध्यम में जब ऐल्किल हैलाइड से क्रियाशील किया जाता है तो 1°, 2°, 3° ऐमीन का मिश्रण प्राप्त होता है।
R – X + HNH2   एल्कोहल    R – NH2 + HX
यदि R-X को अधिकाय में प्रयुक्त किया जाता है तो मिश्रण 1°, 2′, 3° ऐमीन प्राप्त होता है।
द्वितीयक ऐमीन हिन्सबर्ग अभिकर्मक के साथ अभिक्रिया करती है
द्वितीयक ऐमीन हिन्सबर्ग अभिकर्मक के साथ अभिक्रिया करती है

       (vi) ऐसीटिलन-किसी फिनॉल, एल्कोहल या ऐमीन से क्रिया H परमाणु RCO समूह द्वारा प्रतिस्थापित करना ऐसीटिलन कहलाता है। ऐसीटिलन को क्षार जैसे पिरीडीन, डाइमेथिल एमीन आदि से प्राप्त किया जाता है।

CH3COCl + C2H5OH पिरिडिन CH3COOC2H5 + HCl
(CH3CO)2O + C2H5NH2→ CH3CONHCH2CH3 + CH3COOH
       (vii) गैब्रिएल थैलिमाइड संश्लेषण- इस अभिक्रिया में थैलिमाइड ऐथेनालिक पोटैशियम हाइड्रॉक्साइड से अभिक्रिया द्वारा थैलिमाइड का पोटैशियम लवण बनाता है जो ऐल्किन हैलाइड के साथ गर्म करने के पश्चात् क्षारीय जल अपघटन द्वारा संगत प्राथमिक ऐमीन उत्पन्न करता है। इस विधि का उपयोग प्राथमिक ऐमीनो के विरचन के लिए किया जाता है।
द्वितीयक ऐमीन हिन्सबर्ग अभिकर्मक के साथ अभिक्रिया करती है

प्रश्न 3. निम्नलिखित अभिक्रियाओं को पूर्ण कीजिए-
(i) C6H4NH2 + CHC3 + (ऐल्कोहॉली) + KOH →
(ii) C6H5N2Cl + H3PO2 + H2O →
(iii) C6H5NH2 + H2SO4 (सांद्र) →
(iv) C6H5Cl + C2H5OH →
(v) C6H5NH2 + Br2 (aq) →
(vi) C6H5NH2 + (CH3O)2O →
(vii) C6H5N2Cl 

उत्तर⇒
निम्नलिखित अभिक्रियाओं को पूर्ण कीजिए-

प्रश्न 4. ऐमीन क्या है ? यह कितने प्रकार का होता है ? प्राइमरी, सेकेण्ड्री तथा टर्शियरी ऐमीन को परिभाषित करें।

उत्तर⇒ एलिपैफटिक ऐमीन अमोनिया के अल्काइल व्युत्पन्न (Deriva tive) है जो अमोनिया में उपस्थित हाइड्रोजन परमाणुओं के अल्काइल समूहों द्वारा प्रतिस्थापित (Replace) होने से बनते हैं। ऐमीन को तीन वर्गों में विभाजित किया जा सकता है-
(i) प्राइमरी ऐमीन (Primary amine)
(ii) सेकेण्डरी ऐमीन (Secondary amine)
(iii) टर्शियरी ऐमीन (Tertiary amine)
(i) प्राइमरी ऐमीन (Primary Amine)-अमोनिया का वह अल्काइल व्युत्पन्न जो अमोनिया के केवल एक ही हाइड्रोजन परमाणु के एक अल्काइल समूह द्वारा प्रतिस्थापित होने से बनता है, प्राइमरी ऐमीन कहलाता है।
उदाहरण- 
प्राइमरी ऐमीन में क्रियाशील समूह (Functional group) -NH2 उपस्थित रहता है, जिसे ऐमीनो कहा जाता है।
        (ii) सेकेण्डरी ऐमीन (Secondary Amine)-अमोनिया के वे अल्काइल व्युत्पन्न जो अमोनिया के दो हाइड्रोजन परमाणुओं के दो अल्काइल समूहों (दोनों अल्काइल समूह एक ही या विभिन्न हो सकते हैं) द्वारा प्रतिस्थापित होने से प्राप्त होते हैं, सेकेण्डरी ऐमीन कहलाते हैं।
उदाहरण- 
सेकेण्ड्री ऐमीन का क्रियाशील समूह – N – है, जिसे imino कहा जाता है।
           (iii) टरशियरी ऐमीन (Tertiary Amine)-अमोनिया के वे अल्काइल व्युत्पन्न जो अमोनिया के तीनों हाइड्रोजन परमाणुओं तीन अल्काइल समूहों तीन अल्काइल समूह एक ही या विभिन्न हो सकते हैंद्ध द्वारा प्रतिस्थापित होने से प्राप्त होते हैं, टर्शियरी ऐमीन कहलाते हैं।
उदाहरण-

टर्शियरी ऐमीन में क्रियात्मक समूह > N – (Nitrile) है।

14. जैव अणु LONG ANSWER TYPE QUESTIONS

प्रश्न 1. एन्जाइम क्या होते हैं ?

उत्तर⇒ सभी जैव अभिक्रियाएँ कुछ जैव उत्प्रेरकों की सहायता से होती हैं जो एन्जाइम कहलाते हैं। एन्जाइम किसी विशेष अभिक्रिया अथवा विशेष क्रियाधार के लिए विशिष्ट होते हैं। इनका नामकरण सामान्यतया उस यौगिक या यौगिकों के वर्ग पर आधारित होता है। जिन पर ये कार्य करते हैं। जैसे जो एन्जाइम माल्टस को ग्लूकोज में बदलता है। माल्टेस कहलाता है।
C12 H22O11 + H2O → 2C6H12O6
.                                         ग्लूकोस
       जो एन्जाइम एक क्रियाधार का ऑक्सीकरण उत्प्रेरित करते हैं तथा साथ ही दूसरे क्रियाधार का अपचयन करते हैं उन्हें ऑक्सिडोरिडक्टेज का नाम दिया जाता है। उत्प्रेरक की भाँति एन्जाइम कम मात्रा में प्रयोग होता है।

प्रश्न 2. एंजाइम की परिभाषा लिखिए। एंजाइम साधारण रासायनिक उत्प्रेरकों से किस प्रकार भिन्न हैं ?

उत्तर⇒एंजाइम एक प्रकृति सरल अथवा संयुग्मी प्रोटीन है, जो कोशिका की प्रक्रियाओं में विशिष्ट उत्प्रेरक के रूप में कार्य करते हैं। एंजाइम एवं रासायनिक उत्प्रेरक में निम्नांकित अन्तर है।

एंजाइमरासायनिक उत्प्रेरक
1. यह एक कार्बनिक पदार्थ है।1. यह कार्बनिक या अकार्बनिक दोनों हो सकता है।
2. यह मुख्यतः प्रोटीन का बना होता है।2. यह प्रोटीन का बना हुआ नहीं होता है।
3. यह अभिक्रिया को 1020 गुणा तक बढ़ा देता है।3. यह अभिक्रिया को उतना नहीं बढ़ा पाता है।
4. इसे पुनर्निर्माण की दर अति-तीव्र होता है।4. इसके पुनर्निर्माण की दर कम होती है।
5. यह उदासीन स्थिति तथा शरीर तापक्रम पर कार्य करता है।5. इसके लिए उच्च तापमान की आवश्यकता पड़ती है।

प्रश्न 3. कार्बोहाइड्रेट क्या है ? इसके सामान्य सूत्र एवं प्रकार को लिखें। इसके मुख्य प्रकारों का वर्णन करें।

उत्तर⇒ कार्बोहाइड्रेट-कार्बन, हाइड्रोजन एवं ऑक्सीजन से निर्मित वे रासायनिक यौगिक जो ध्रुवण, घूर्णक, पॉलिहाइड्रॉक्सी एल्डिहाइड अथवा कीटोन हो, कार्बोहाइड्रेट कहलाता है यह हमारे भोजन का मुख्य अवयव है तथा ऊर्जा के सस्ते स्त्रोत के रूप में जाना जाता है।
        कार्बोहाइड्रेट का सामान्य सूत्र C4 (H2O)n है।
        कार्बोहाइड्रेट को उनके जल-अपघटन तथा उनके फलस्वरूप बने उत्पाद की संख्या के आधार पर तीन वर्गों में बाँटा गया है-
        (i) मोनोसैकेराइड (Monosaccharides)
        (ii) ऑलिगोसैकेराइड (Oligosaccharides)
        (iii) पॉलिसैकेराइड (Polysaccharides)

(i) मोनोसैकेराइड- कार्बोहाइड्रेट के वे प्रकार जिनको

        (i) मोनोसैकेराइड- कार्बोहाइड्रेट के वे प्रकार जिनको और अधिक सरल यौगिकों में जल अपघटित नहीं किया जा सकता है, मोनोसैकेराइड कहलाता है। सभी कार्बोहाइड्रेट जल अपघटन के फलस्वरूप मोनोसैकेराइड में परिवर्तित हो जाते हैं। ग्लूकोस तथा फ्रक्टोस मोनोसैकेराइड के उदाहरण हैं।

      (ii) ऑलिगोसैकेराइड– कार्बोहाइड्रेट का वह प्रकार जो जल द्वारा अपघटित होकर एक से ज्यादा (लगभग 2-10) मोनोसैकेराइड अणु देते हो, ऑलिगोसैकेराइड कहलाता है।
      वैसे ऑलिगोसैकेराइड जो मोनोसैकेराइड के दो अणुओं के संयोग से बना होता है, डाइसैकेराइड कहलाता है। तनु अम्लों या एंजाइमों द्वारा जल अपघटित होने पर ये समान अथवा भिन्न मोनोसैकेराइड के दो अणु बनाते हैं।
C12H22O11 + H2निम्नलिखित अभिक्रियाओं को पूर्ण कीजिए- C6H12O6 + C6H12O6
.                                        ग्लूकोस        फ्रक्टोस
       (iii) पॉलिसैकेराइड– कार्बोहाइड्रेट का वह प्रकार जिसमें हजारों मोनोसैकेराइड इकाइयाँ ग्लाइकोसिडिक बंधन द्वारा जुड़े होते हों, पॉलिसैकेराइड कहलाता है। स्टार्च, सेलूलोस, ग्लाइकोजीन तथा डेक्सीड्रीन इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
(C6H10O5)→ (C6H10O5)n →C12H22O11 → C6H12O6
स्टार्च                                                माल्टोस           D-ग्लूकोस

प्रश्न 4. विभिन्न प्रकार के विटामिनों की कमी से होने वाले रोग तथा विटामिन के स्रोत को सारणीबद्ध करें।

उत्तर⇒विभिन्न प्रकार के विटामिन, उनकी कमी से होने वाले रोग तथा उनके स्रोत निम्नलिखित है-

विटामिनस्रोतहीनताजनित रोग
1. विटामिन-Aमछली का तेल, गुर्दाजोरोफलमिया
2. विटामिन-B1(थायोमील)यीस्ट, दूध, हरी सब्जियाँबेरी-बेरी
3. विटामिन-B2
(राबोफ्लौविन)
यीस्ट, सब्जियाँ दूध, अंडे की
सफेदी
त्वचाशोथ, गाढ़ी,लाल जीभ, तथा ओष्ठ विदारता कीलोसिस
4. विटामिन-B6
(पिरिडॉक्सिन)
अन्न, चना, शीरा यीस्ट, अंड-पीत तथा माँसतीव्र त्वचाशोथ, आक्षेप।
5. विटामिन-B12बैल, भेड़, मछली आदि का यकृतप्राणी रक्ताल्पता
6. विटामिन-Cनींबू जाति के फल, हरी सब्जियाँस्कर्वी
7. विटामिन-Eगेहूँ, सोयाबीन, तेलबंध्यता
8. विटामिन-Kअन्न-पत्तेदार सब्जियाँरक्तस्रावीय अवस्था

 प्रश्न 5. मोनोसैकेराइड क्या है ? ग्लूकोस के निर्माण एवं गुणों का प्रकाश डालें।

उत्तर⇒ कार्बोहाइड्रेट के वे प्रकार जिन्हें जल अपघटन द्वारा और सरल यौगिकों में परिवर्तित नहीं किया जा सकता है, मोनोसैकेराइड कहलाता है।
          ग्लूकोस तथा फ्रक्टोस ऐल्डोहैक्सोस तथा सेल्डोकीटोज के विशिष्ट उदाहरण हैं।
          ग्लूकोस (Glucose)-
          (i) उपस्थिति- प्रकृति में ग्लूकोस स्वतंत्र तथा संयुक्त दोनों रूपों में पाया जाता है। मीठे फल, शहद तथा पके अंगूरों में ग्लूकोस प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। ग्लूकोस को Instant form of energy कहा जाता है क्योंकि यह शरीर को तुरंत ऊर्जा प्रदान करता है।
          (ii) निर्माण-विधि- ग्लूकोस का निर्माण शर्करा तथा स्टार्च द्वारा निम्न प्रकार से किया जाता है।
          (a) सूक्रोस अर्थात् शर्करा द्वारा- सूक्रोस एक डाइसैकेराइड कार्बोहाइड्रेट है। इसके जलीय अपघटन के फलस्वरूप ग्लूकोस तथा फ्रक्टोस प्राप्त होता है। सूक्रोस के ऐल्कोहॉलीय विलयन को तनु HCl तथा H2SO4 के साथ उबालने पर ग्लूकोस तथा फ्रक्टोज समान मात्रा में प्राप्त होता है।
C12H22O11 + H2निम्नलिखित अभिक्रियाओं को पूर्ण कीजिए- C6H12O6 + C6H12O6
          (b) स्टार्च द्वारा- औद्योगिक स्तर पर ग्लूकोस का निर्माण स्टार्च द्वारा किया जाता है। स्टार्च का जल अपघटन तनु H2SO4 के साथ 393 K तापमान पर उबालने से होता है। जल अपघटन के फलस्वरूप ग्लूकोज का निर्माण होता है।
(C6H12O5)n + n H2निम्नलिखित अभिक्रियाओं को पूर्ण कीजिए- nC6H12O6
    स्टार्च                                             ग्लूकोस
(iii) ग्लूकोस के गुण-
(a) ऐसीटिक एन्हाइड्राइड द्वारा अभिक्रिया- ग्लूकोस ऐसीटिक एन्हाइड्राइड द्वारा अभिक्रिया कर पेंटाएसिटेट का निर्माण करता है। यह अभिक्रिया इस बात को साबित करता है कि ग्लूकोस में पाँच हाइड्रॉक्सिल समूह उपस्थित हैं।OHC – (CHOH)6– CH2OH 
OHC – (CHOCOCH3) – CH2OOCHCH3

(i) मोनोसैकेराइड- कार्बोहाइड्रेट के वे प्रकार जिनको

        (b) हाइड्रॉक्सिल ऐमीन के साथ अभिक्रिया- ग्लूकोस हाइड्रोक्सिल ऐमीन के साथ अभिक्रिया कर मोनो ऑक्सीजन देता है। यह हाइड्रोजन साइनाइड के एक अणु से अभिक्रिया कर साइनोहाड्रिन बनाता है। ये अभिक्रियाएँ ग्लूकोस में एक कार्बोनिल समूह की उपस्थिति सिद्ध करती है।
        (iv) सिल्वर नाइट्रेट विलयन से अभिक्रिया- ग्लूकोस एमोनियामय सिल्वर नाइट्रेट विलयन से अभिक्रिया कर सिल्वर धातु देता है। यह ग्लूकोस में एक ऐल्डिाइडिक समूह की उपस्थिति को दर्शाता है।
HOCH2 – (CHOH)4 – CHO + Ag2O →
.                                                               HOCH2 – (CHOH)4 – CHO + 2Ag
         (v) नाइट्रिक अम्ल द्वारा अभिक्रिया- ग्लूकोस नाइट्रिक अम्ल द्वारा ऑक्सीकृत होकर सैकेटिक अम्ल का निर्माण करता है।
HOCH2 – (CHOH)4 – CHO (v) नाइट्रिक अम्ल द्वारा अभिक्रिया-
.                                                  HOOC – (CHOH)4 – COOH
       (vi) हाइड्रोजन आयोडाइड से अभिक्रिया– ग्लूकोस HI के साथ लम्बे समय तक गर्म करने पर n-हेक्सेन बनाता है। यह प्रदर्शित करता है कि ग्लूकोस में 6 कार्बन परमाणु एक ऋजु-श्रृंखला में आबंधित है।
HOCH2 – (CHOH)4 – CHO (v) नाइट्रिक अम्ल द्वारा अभिक्रिया-
.                                H3C – CH2 – CH2 – CH2 – CH2 – CH3

प्रश्न 6. प्रोटीन की द्वितीयक संरचना के सामान्य प्रकार क्या है ?

उत्तर⇒प्रोटीन की द्वितीयक संरचना-किसी प्रोटीन की द्वितीयक संरचना का संबंध उस आकृति से है जिसमें पोलिपेप्टाइड शृंखला विद्यमान रहती है। यह दो भिन्न प्रकार की संरचनाओं में विद्यमान होती है। α-हेलिक्स
         तथा β-प्लीटेड शीट संरचना में संरचनाएं पेप्टाइड आबंध के तथा – प्रोटीन की द्वितीयक संरचना के सामान्य प्रकार क्या है – तथा – NH – समूह के मध्य हाइड्रोजन बंध के कारण पॉलिपेप्टाइड की मुख्य शृंखला के नियमित कुंडलन में उत्पन्न होती है। α-हेलिक्स संरचना एक ऐसी संरचना है। जिसमें पॉलिपेप्टाइड श्रृंखला दक्षिणावर्ती पेंच के समान जुड़ी रहती है। फलस्वरूप प्रत्येक ऐमीनों अम्ल का अवशिष्ट का -NH समूह, कुंडली के अगले मोड़ पर स्थित  = O समूह के साथ हाइड्रोजन आबंध बनाता है।

चित्र : प्रोटीन की       कुंडलिनी संरचना

चित्र : प्रोटीन की           -सहित संरचना
         β-संरचना में सभी पोलिपेप्टाइड शृंखलाएं लगभग अधिकतम विस्तार तक खिंची रह कर एक-दूसरे के पार्श्व में स्थित होती हैं तथा आपस में अंतराआण्विक हाइड्रोजन आबंध द्वारा जुड़ी रहती हैं। यह संरचना वस्त्रों में लकीर के समान होती है। अतः इसको β-प्लीटेड शीट कहते हैं।

प्रश्न 7. एन्जाइम क्या होते हैं ? एन्जाइम कैसे कार्य करते है ?

उत्तर⇒ (क) एन्जाइम- ऐन्जाइम एक उत्प्रेरक है। लगभग सभी एन्जाइम गोलिकाकार प्रोटीन होते हैं। एन्जाइम किसी विशेष अभिक्रिया अथवा विशेष क्रियाधार के लिए विशिष्ट होते हैं। इसका नामकरण सामान्यतया उपयोगिक या यौगिकों के वर्ग पर आधारित होता है। जिस पर ये कार्य करते हैं। जैसे उस एन्जाइम का नाम माल्टेस है। जो माल्टोज के ग्लूकोस में जल अपघटन को उत्प्रेरित करता है।
                                C12H22O11 → 2C6H12O6
.                                                            ग्लूकोज
कभी-कभी एन्जाइम का नाम उप अभिक्रिया के आधार पर दिया जाता है। जिसमें इसका उपयोग होता है। जैसे जो एन्जाइम एक क्रियाधार का ऑक्सीकरण उत्प्रेरित करते हैं तथा साथ ही दूसरे क्रियाधार का अपचयन उन्हें आक्सिडोरिडक्टेस नाम दिया जाता है। एन्जाइम के नाम के अंत में ऐसा आता है।
          किसी अभिक्रिया की प्रगति के लिए एन्जाइम की बहुत कम मात्रा में आवश्यकता होती है। रासायनिक उत्प्रेरक की क्रिया के समान कहा जाता है कि एन्जाइम सक्रियण ऊर्जा के परिमाण को कम कर देते हैं। जैसे सूक्रोज के अम्लीय जलअपघटन के लिए सक्रियण ऊर्जा 6.22kJ/ मोल है। जबकि सूक्रेस एन्जाइम द्वारा जल अपघटित होता है तो सक्रियण ऊर्जा केवल 2.15 kJ/ मोल होती है।
           (ख) विटामिन- भोजन में कुछ कार्बनिक यौगिकों की आवश्यकता सूक्ष्म मात्रा में होती है। परन्तु उनकी कमी के कारण विशेष रोग हो जाते हैं। इन यौगिकों को विटामिन कहते हैं। ये कार्बनिक यौगिक विशिष्ट जैविक क्रियाओं के संपन्न होने के लिए हमारे आहार में आवश्यक वे पदार्थ हैं जिनसे जीव की इष्टतम वृद्धि एवं सवास्थ्य का सामान्य रख-रखाव होता है। विटामिनों को A, B, C, D आदि अक्षरों के द्वारा निर्दिष्ट किया जाता है। इनमें से कुछ को पुनः 34 वर्गों उदाहरणार्थ B1, B2, B6 तथा B12 आदि के नाम दिया जाता है। विटामिन का आधिक्य भी हानिकारक होता है। अतः चिकित्सक के परामर्श बिना विटामिन की गोली नहीं लेनी चाहिए।
जल या वसा में घुलनशील के आधार पर विटामिनों को दो वर्गों में वर्गीकृत किया जाता है।
                  (i) वसा विलेय विटामिन-इस वर्ग में उन विटामिनों को रखा गया है जो वसा तथा तेल में विलेय होते हैं परंतु जल में अविलेय । ये विटामिन A, D, E तथा K हैं। ये यकृत तथा ऐडिपोस ऊत्तक में संग्रहित रहते हैं।
                 (ii) जल में विलेय विटामिन-B वर्ग के विटामिन तथा विटामिन C जल में विलेय होते हैं। अतः इन्हें एक साथ इस वर्ग में रखा गया है। जल में विलेय विटामिनों की पूर्ति हमारे आहार में नियमित रूप से होनी चाहिए। क्योंकि ये आसानी से मूत्र के साथ उत्सर्जित हो जाते हैं। इन्हें हमारे शरीर में (B12 विटामिन के अतिरिक्त) संचित नहीं किया जा सकता है।

16. दैनिक जीवन में रसायन LONG ANSWER TYPE QUESTIONS

प्रश्न 1. निम्नलिखित शब्दों को उपयुक्त उदाहरणों द्वारा समझाइए ?
(क) ऋणायनी अपमार्जक (ख) धनायनी अपमार्जक (ग) अनायनिक अपमार्जक

उत्तर⇒ (क) ऋणायनी अपर्माजक- ऋणायनी अपमार्जक लंबी शंखला वाले ऐल्कोहलों या हाइड्रोकार्बन के सल्फोनेटिक व्युत्पन्न होते हैं। दीर्घ श्रृंखला वाली ऐल्कोहॉलों को सांद्र सल्फ्यूरिक अम्ल से अभिक्रिया कराने से ऐल्किल हाइड्रोजन सल्फेट बनते हैं। जिन्हें क्षार से उदासीन करने पर ऋणायनी अपमार्जक बनते हैं। इसी प्रकार से एल्किलबेन्जीन सल्फोनेट, ऐल्किल बेन्जीन सल्फोनिक अम्लों के द्वारा उदासीन करने से प्राप्त होते हैं।
          (ख) धनायनी अपमार्जक-ऐमीनों के ऐसीटेट, क्लोराइड या ब्रोमाइड ऋणायनों के साथ बने चतुष्क लवण होते हैं। इनमें धनायनी भाग में लंबी हाइड्रोकार्बन शृंखला होती है तथा नाइट्रोजन अणु पर एक धन आवेश होता है। अतः इन्हें धनायनी अपमार्जक कहते हैं। जैसे सैटिलट्राइमेथिल अमोनिया ब्रोमाइड।

निम्नलिखित शब्दों को उपयुक्त उदाहरणों द्वारा समझाइए

         (ग) अनायनिक अपमार्जक-ऐसा अपर्माजक स्टीऐरिक अम्ल तथा पॉलीऐथिलीन ग्लाइकोल की अभिक्रिया से बनाता है।
CH3(CH2)16COOH + HO(CH2CH2O)n CH2 CH2OH
             CH3(CH2)16COO(CH2CH2O)nCH2CH2OH Download Question PDF

प्रश्न 2. साबुन की शोधन क्रिया समझाइए।

साबुन की शोधन क्रिया समझाइए

उत्तर⇒ सभी अपमार्जकों तथा साबुन में दो भाग होते हैं। एक समूह जल में घुलनशील तथा दूसरा जल में अघुलनशील, परिणामस्वरूप जब साबुन या अपमार्जक को जल में घोला जाता है तब हाइड्रोकार्बन भाग जल से दूर भागता है जबकि आयनिक भाग जल को आकर्षित करता है।
         धूल के कण जो तेल की भांति व्यवहार दर्शाते हैं। हाइड्रोकार्बन शृंखला की ओर आकर्षित होते हैं। जबकि आयनिक गन्दे जल में घुल जाती है। परिणामस्वरूप कपड़ा साफ हो जाता है। जब उचित सांद्रता में साबुन या अपमार्जकों को जल में मिलाया जाता है तो मिसेल बनते हैं।
निम्नलिखित शब्दों को उपयुक्त उदाहरणों द्वारा समझाइए

(Cleansing action of soap detergent)

प्रश्न 3. एण्टेसिड, एण्टीबायोटिक और दर्दशामक क्या है ?

उत्तर⇒ एण्टेसिड (Antacids)-यह वह रासायनिक पदार्थ है जो पेट की अम्लीयता को उदासीन बनाकर उचित मार्ग पर ला देता है।
         उदाहरण- CaCO3, NaHCO3, Mg(OH)2 या, Al(OH)3 को टिकिया के रूप में या घोल के रूप में लेने पर पेट में उपस्थित अधिक HCl को उदासीन करता है।
         एण्टीबायोटिक (Antibiotic)- वह रासायनिक पदार्थ जो सूक्ष्म जीवाणुओं (बैक्टीरिया, कवक, फफूंदी) से उत्पन्न होता है, जो अन्य सूक्ष्म जीवाणुओं की वृद्धि रोके या समाप्त ही कर दें।
         ददशामक (Analesics)-वह रासायनिक पदार्थ जो शरीर के दर्द के निवारण में प्रयुक्त होता है।
उदाहरण- 

प्रश्न 4. अपमार्जक क्या होते हैं ? वर्गीकरण करें, साबुन की तुलना में अपमार्जक अधिक उपयोगी है वर्णन करें ?

सोडियम ऐल्किल बेंजीन सल्फोनेट

उत्तर⇒ अपमार्जक-लवणों की अत्यधिक घुलनशीलता के कारण सामान्यतः जल में इनकी सांद्रता अधिक होती है। ज्यादातर आयनिक लवणों की कठोर जल में कुछ धातु आयन जैसे Ca+2 और Mg+2 आयन होते हैं। जब ये आयन साबुन के साथ घुलते हैं तो अघुलनशील अवक्षेप बनाते हैं। ये अवक्षेप कपड़े धान में व्यवधान उत्पन्न करते हैं। संश्लिष्ट अपमार्जक वह शोधक अभिकर्मक है जिनमें साबुन के सभी गुण होते हैं, परन्तु जो वास्तव में साबुन नहीं होते। अपमार्जक कठोर जल के साथ झाग बनाते हैं। सामान्यतः सोडियम लॉरील सल्फेट और सोडियम डोडेसिल बेन्जीन सल्फोनेट अपमार्जक के उदाहरण है।

सोडियम ऐल्किल बेंजीन सल्फोनेट

        साबुन कठोर जल में कार्य नहीं करते :
        कठोर जल में अपमार्जक अधिक उपयोगी है। क्योंकि कठोर जल में कैल्सियम तथा मैग्नीशियम के आयन होते हैं। यह आयन सोडियम या पोटैशियम साबुन को कठोर जल में घोलने पर क्रमशः अघुलनशील कैल्सियम और मैग्नीशियम साबुन में परिवर्तित कर देते हैं। अतः अच्छी धुलाई में क्षमता डालते हैं।
        अपमार्जकों के प्रकार-संश्लिष्ट अपमार्जक तीन प्रकार के होते हैं। ऋणायनी, धनायनी और अनायिक एक लम्बी श्रृंखला वाले ऐल्कोहलों या हाइड्रोकार्बनों के सल्फोनेटित व्युत्पन्न होते हैं।
CH3—(CH2)16CH2OH + H2SO4 → CH3—(CH2)16CH2OSO3H
        CH3(CH2)16CH2SO—O3Na+
        इस प्रकार के अपमार्जक ऋणायिनक होते हैं। क्योंकि इन पर ऋणायन होता है।
        उदाहरण-ऐल्किल बेंजीन सल्फोनेट ऋणायनी अपमार्जक अम्लीय विलयन में भी उपयोगी होते हैं जो एल्किल हाइड्रोजन सल्फेट बनाते हैं जो कि घुलनशील पदार्थ है। साबुन अम्लीय विलयन में अघुलशील पदार्थ बनाते हैं।
        धनायनी अपमार्जक-धनायनी अपमार्जक एमीनों के ऐसीटेट क्लोराइड या ब्रोमाइड या ब्रोमाइड ऋणायनों के साथ बने चतुष्क लवण होते हैं। इनके धनायनी भाग में लंबी हाइड्रोकार्बन शंखला होती है। तथा नाइट्रोजन अणु पर एक धन आवेश होता है सेटिलट्राइमेथिल अमोनियम ब्रोमाइड एक प्रचलित धनायनी अपमार्जक है।
साबुन की शोधन क्रिया समझा

           अनायनिक अपमार्जक-कुछ अपमार्जक अनायनिक अपमार्जक भी होते हैं। अनायनिक अपमार्जकों की संरचना में कोई आयन नहीं होता। ऐसा अपमार्जक स्टीऐरिक अम्ल तथा पालीएथीलीन ग्लाइकॉल की अभिक्रिया से बनता है।
CH3(CH2)16COOH + HO (CH2CH2O)n CH2CH2OH
 CH3(CH2)16COO(CH2CH2O)n CH2CH2OH
अनायमिक अपमार्जक
कछ द्रव अवस्था में अनायनिक अभिकर्मक भी होते हैं।

प्रश्न 5. (i) प्रतिअम्ल क्या है ? उन सामान्य यौगिकों का उल्लेख करें जो प्रतिअम्ल के रूप में उपयोग होते हैं ?
(ii) निम्न को उदाहरण देकर समझाइए (क) प्रशांतक (ख) प्रतिजनन क्षमता औषध (ग) प्रतिहिस्टैमिन।

उत्तर⇒ (i) प्रतिअम्ल वे पदार्थ होते हैं जो आमाशय से अम्ल के अत्यधिक उत्पादन को रोकते हैं तथा pH- को उदासीनता से आगे नहीं बढ़ने देते। धात्विक हाइड्रॉक्साइड जैसे मैग्नीशियम हाइड्रॉक्साइड Mg(OH)2 मैग्नीशियम कार्बोनेट MgCO3 आदि।
           (ii) (क) प्रशांतक-प्रशांतक रासायनिक यौगिकों का वह वर्ग है जिसका उपयोग तनाव तथा छोटी या बड़ी मानसिक बीमारियों में किया जाता है। यह अच्छा होने की भावना को अभिप्रेरित करके चिंता, तनाव, क्षोभ अथवा उत्तेजना से मुक्ति देते हैं। प्रशांतक विभिन्न प्रकार के होते हैं। ये अलग-अलग क्रिया-विधियों से कार्य करते हैं। जैसे नॉरऐड्रीनलीन एक तंत्रिकीय संचारक है जो मनोदशा परिवर्तन में भूमिका निभाती है।
           (ख) प्रतिजनन क्षमता औषध-जनन नियंत्राण गोलियों में आवश्यक रूप में संश्लिष्ट एस्ट्रोजन एवं प्रोजेस्टीरॉन व्युत्पन्नों का मिश्रण होता है। दोनों ही यौगिक हार्मोन होते हैं। प्रोजेस्टेरोन अंडोत्सर्ग को निरोधित करता है। नारएथिनड्रान संश्लिष्ट प्रोजेस्टीरॉन व्युत्पन्न का उदाहरण है।
           (ग) प्रतिहिस्टेमिन-हिस्टेमिन एक शक्तिशाली वाहिका विस्फारक है। इसके विविध कार्य हैं। यह श्वसनिकओं और आहार नली के चिकनी पेशियों को संकुचित करती है तथा दूसरी पेशियों, जैसे रुधिर वाहिकाओं की दीवारों को नरम करती है। जुकाम के कारण होने वाले नासिका संकुलन और पराग के कारण होने वाली ऐलर्जी का कारण भी हिस्टैमिन ही होती है।            संश्लिष्ट औषध ब्रोमोफेनिरामिन और टरफेनाडीन प्रतिहिस्टैमिन का कार्य करती है।

Conversions

1. बेन्जएमाइड से टॉलूइन


2. एथेन से ब्रोमो एथीन
एथेन से ब्रोमो एथीन


3. प्रोपीन से 1-नाइट्रोप्रोपीन
प्रोपीन से 1-नाइट्रोप्रोपीन


4. टॉलूईन से बेन्जिल ऐल्कॉहल
टॉलूईन से बेन्जिल ऐल्कॉहल


5. प्रोपीन से प्रोपाइन
प्रोपीन से प्रोपाइन


6. एथेनॉल से एथिल फ्रलूओराइड
एथेनॉल से एथिल फ्रलूओराइड


7. ब्रोमोमेथेन से प्रोपेनोन
ब्यूट-1-ईन से ब्यूट-2-ईन


8. ब्यूट-1-ईन से ब्यूट-2-ईन
1-क्लोरोब्यूटेन से m-ऑक्टेन


9. 1-क्लोरोब्यूटेन से m-ऑक्टेन
बेन्जीन से बाइफेनिल


10. बेन्जीन से बाइफेनिल
ब्रोमोमेथेन से प्रोपेनोन


11. प्रोपीन से प्रोपेन-1-ऑल
प्रोपीन से प्रोपेन-1-ऑल


12. एथेनॉल से ब्यूट-1-आइन
एथेनॉल से ब्यूट-1-आइन


13. 1-ब्रोमोप्रोपेन से 2-ब्रोमोप्रोपेन
1-ब्रोमोप्रोपेन से 2-ब्रोमोप्रोपेन


14. बेन्जीन से 4-ब्रोमोनाइट्रोबेन्जीन
बेन्जीन से 4-ब्रोमोनाइट्रोबेन्जीन


15. बेन्जिल ऐल्कोहॉल से 2-फेनिल एथेनॉइक अम्ल
बेन्जिल ऐल्कोहॉल से 2-फेनिल एथेनॉइक अम्ल


16. एथेनॉल से प्रोपेन नाइट्राइल
एथेनॉल से प्रोपेन नाइट्राइल


17. ऐनिलीन से क्लोरोबेन्जीन
ऐनिलीन से क्लोरोबेन्जीन


18. 2-क्लोरोब्यूटेनसे 2, 4-डाइमेथिलहेक्सेन
2-क्लोरोब्यूटेनसे 2, 4-डाइमेथिलहेक्सेन


19. 2-मेथिल-1-प्रोपीन से 2-क्लोरो-2-मेथिलप्रोपेन
2-मेथिल-1-प्रोपीन से 2-क्लोरो-2-मेथिलप्रोपेन


20. एथिल क्लोराइड से प्रोपेनॉइक अम्ल
एथिल क्लोराइड से प्रोपेनॉइक अम्ल


21. ब्यूट-1-ईन से n-ब्यूटिल ब्रोमोडाइड
ब्यूट-1-ईन से n-ब्यूटिल ब्रोमोडाइड


22. 2-क्लोरोप्रोपिल से 1-प्रोपेनॉल
2-क्लोरोप्रोपिल से 1-प्रोपेनॉल


23. आइसोप्रोपिल ऐल्कोहॉल से आयोडोफार्म
आइसोप्रोपिल ऐल्कोहॉल से आयोडोफार्म


24. क्लोरोबेन्जीन से P-नाइट्रोफीनॉल
क्लोरोबेन्जीन से P-नाइट्रोफीनॉल


25. टॉलुईन से बेन्जोट्राइक्लोराइड
टॉलुईन से बेन्जोट्राइक्लोराइड


26. बेन्जीन से p-क्लोरोबोमोबेन्जीन
बेन्जीन से p-क्लोरोबोमोबेन्जीन


27. क्लोरोबेन्जीन से एनिलीन
क्लोरोबेन्जीन से एनिलीन


28. तृतीयक-ब्यूटिल ब्रोमाइड से आइसो-ब्यूटिल ब्रोमाइड
तृतीयक-ब्यूटिल ब्रोमाइड से आइसो-ब्यूटिल ब्रोमाइड


29. ऐनिलीन से फ्रेनिलआइसोसायनाइड
ऐनिलीन से फ्रेनिलआइसोसायनाइड


30. इथाइल अल्कोहल से इथिलीन
         इथिलीन का निर्माण इथाइल अल्कोहल का निर्जलीकरण सान्द्र H2SO4 की अधिकता में कराने से होता है।
इथाइल अल्कोहल से इथिलीन


31. एसीटिलीन से बेंजीन
         जब एसीटिलीन को लाल तप्त तांबे की नली में उच्च ताप पर गर्म किया जाता है तो बेंजीन का निर्माण होता है।
एसीटिलीन से बेंजीन


32. एथाइल अल्कोहल से इथाइल एथीन
एथाइल अल्कोहल से इथाइल एथीन


33. इथाइल एमीन से इथाइल अल्कोहल
इथाइल एमीन से इथाइल अल्कोहल


34. नाइट्रोबेन्जीन से बेन्जोइक अम्ल
नाइट्रोबेन्जीन से बेन्जोइक अम्ल


35. बेन्जीन से m-ब्रोमोफीनॉल
बेन्जीन से m-ब्रोमोफीनॉल


36. बेन्जिल क्लोराइड से 2 फेनिल एथेन ऐमीन
बेन्जिल क्लोराइड से 2 फेनिल एथेन ऐमीन


37. ऐनिलीन से p-ब्रोमोऐनेलीन
ऐनिलीन से p-ब्रोमोऐनेलीन


38. ऐनीलीन से बेन्जाइल ऐल्कोहॉल
ऐनीलीन से बेन्जाइल ऐल्कोहॉल


39. एथेनॉइक अम्ल से मेथेनेमीन
एथेनॉइक अम्ल से मेथेनेमीन


40. हेक्सेननाइट्राइल से 1-ऐमीनापेन्टेन
हेक्सेननाइट्राइल से 1-ऐमीनापेन्टेन


41. मेथेनॉल से एथेनॉइक अम्ल
मेथेनॉल से एथेनॉइक अम्ल


42. एथेनेमीन से मैथेनेमीन
एथेनेमीन से मैथेनेमीन


43. एथेनॉइक अम्ल से प्रोपेनॉइक अम्ल
एथेनॉइक अम्ल से प्रोपेनॉइक अम्ल


44. मेथेनेमीन से ऐथेनेमीन
मेथेनेमीन से ऐथेनेमीन


45. नाइट्रोमेथेन से डाइमेथिल ऐमीन
नाइट्रोमेथेन से डाइमेथिल ऐमीन


46. प्रोपेनॉइक अम्ल से ऐथेनॉइक अम्ल
प्रोपेनॉइक अम्ल से ऐथेनॉइक अम्ल


47. प्रोपेनॉल से ब्यूटेनॉन
प्रोपेनॉल से ब्यूटेनॉन


48. बेलडीहाइड से बेंजीन
बेलडीहाइड से बेंजीन


49. क्लोरोबेन्जीन से टॉलुईन
क्लोरोबेन्जीन से टॉलुईन


50. क्लोरोबेन्जीन से फिनॉल
क्लोरोबेन्जीन से फिनॉल


51. साइक्टोपेन्टीन से साइक्लोपेन्टा-1, 3-डाईन
साइक्टोपेन्टीन से साइक्लोपेन्टा-1, 3-डाईन


52. एथिलीन ऑक्साइड से n-प्रोपिल ऐल्कोहॉल
एथिलीन ऑक्साइड से n-प्रोपिल ऐल्कोहॉल


53. बेन्जीन से फेनिल ऐसीटिक अम्ल
बेन्जीन से फेनिल ऐसीटिक अम्ल


54. प्रोपेनोन से प्रोपीन
प्रोपेनोन से प्रोपीन


55. ऐसीटैल्डिहाइड से फॉर्मेल्डिहाइड
ऐसीटैल्डिहाइड से फॉर्मेल्डिहाइड

बेन्जोइक अम्ल से बेन्जोफीनोन अम्ल

56. बेन्जोइक अम्ल से बेन्जोफीनोन अम्ल
बेन्जोइक अम्ल से बेन्जोफीनोन अम्ल


57. एनिलीन से N-फेनिल एथेनेमाइड
एनिलीन से N-फेनिल एथेनेमाइड


58. p-टॉलूईडीन से 2-ब्रोमो-4-मेथिल एनिलीन
p-टॉलूईडीन से 2-ब्रोमो-4-मेथिल एनिलीन


59. बेन्जीन सल्फोनिक अम्ल से बेन्जीन

59. बेन्जीन सल्फोनिक अम्ल से बेन्जीन

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examunlocker@gmail.com

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