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Class 12th Economics Question 2022 लघु उत्तरीय प्रश्न ( 30 Marks ) PART -1 Class 12th Economics Question Paper 2022


1. समष्टि अर्थशास्त्र किस विषय का अध्ययन करता है ? (What is the subject matter of macroeconomics ?)

उत्तर⇒ समष्टि अर्थशास्त्र आर्थिक अध्ययन का महत्वपूर्ण पक्ष है। इसके अंतर्गत ऐसे विशाल समूहों का अध्ययन किया जाता है जो सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था को प्रदर्शित करते हैं जैसे-कुल रोजगार, कुल आय, कुल उत्पादन, कुल विनियोग, कुल बचत, कुल उपभोग, कुल पूर्ति, कुल मांग, सामान्य कीमत स्तर इत्यादि का समष्टि अर्थशास्त्र विषय है।


2. व्यष्टि अर्थशास्त्र की परिभाषा दीजिए। (Define Micro economics.)

उत्तर⇒ व्यष्टि अर्थशास्त्र को ‘सूक्ष्म अर्थशास्त्र’ भी कहा जाता है। व्यष्टि अर्थशास्त्र के अंतर्गत अर्थव्यवस्था की एक इकाई के रूप में अर्थव्यवस्था के छोटे-छोटे पहलुओं का अध्ययन किया जाता है। जैसे—एक उपभोक्ता, एक उत्पादक, एक फर्म अथवा एक उद्योग, एक बाजार आदि। व्यष्टि अर्थशास्त्र का अध्ययन आंशिक संतुलन से अधिक प्रभावित है जो आर्थिक क्रिया से संबंधित कारकों से प्रभावित होता है। इसके अंतर्गत अनुकूलतम साधन आवंटन और आर्थिक क्रियाओं जैसेमांग और पूर्ति का अध्ययन, मूल्य निर्धारण से संबंधित समस्याओं और नीतियों का अध्ययन होता है।


3. व्यष्टि अर्थशास्त्र के अध्ययन का क्या महत्त्व है ? (What is significance of studying micro economics ?)

उत्तर⇒ इसका अध्ययन का महत्त्व को इस प्रकार देखा जा सकता है –

(i). व्यक्तिगत इकाइयाँ मिलकर ही संपूर्ण अर्थव्यवस्था बनाती है। अतः संपूर्ण अर्थव्यवस्था के आर्थिक विश्लेषण के लिए व्यक्तिगत इकाइयों का ज्ञान आवश्यक है।

(ii). आर्थिक विश्लेषण में कीमत निर्धारण एवं वितरण की समस्याएं महत्त्वपूर्ण होती है। इन समस्याओं का निदान व्यष्टि आर्थिक विश्लेषण से किया जाता है। माँग और पूर्ति के दो बलों के आधार पर कीमत का निर्धारण किया जाता है जो व्यष्टि अर्थशास्त्र से संबंधित है।

(iii). व्यष्टि अर्थशास्त्र में व्यक्तिगत एवं विशिष्ट इकाइयों का विश्लेषण ही सरकार को आर्थिक नीतियाँ बनाने का आधार प्रदान करता है।


4. अनाधिमान वक्र परिभाषित करें। (Define indifference curve.)

उत्तर⇒अनाधिमान वक्र (Indifference curve)—उदासीनता वक्र दो वस्तुओं के विभिन्न संयोगों से संबंधित उपभोक्ता के व्यवहार की व्याख्या करता है। उपभोक्ता का व्यवहार उसकी उदासीनता अनुसूची द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। उपभोक्ता को समान संतुष्टि देने वाले दो वस्तुओं के विभिन्न संयोग उदासीनता अनुसूची अथवा तटस्थता समूह बनाते हैं। इसी उदासीनता अनुसूची को ग्राफ के द्वारा प्रदर्शित करके अनाधिमान वक्र प्राप्त किया जाता है।


5. अर्थव्यवस्था की केंद्रीय समस्याएं से क्या समझते हैं ? (What do you mean by central problem in an economy ? )

उत्तर⇒अर्थव्यवस्था से मतलब उस आर्थिक प्रणाली से है जिसके द्वारा समाज की समस्त आर्थिक क्रियाओं का संचालन होता है। प्रत्येक देश किसी न किसी आर्थिक प्रणाली पर आधारित होता है। आर्थिक प्रणाली के मुख्य रूप है — पूँजीवादी, समाजवाद एवं मिश्रित अर्थव्यवस्था। आर्थिक प्रणाली की भिन्नता के अनुसार अर्थव्यवस्था का संचालन अलग-अलग होता है किन्तु साधनों की सीमितता एवं उनके वैकल्पिक प्रयोगों तथा आवश्यकताओं की अनन्तता के कारण ही साधनों एवं साध्यों के बीच तालमेल बैठाने की समस्याएँ प्रत्येक आर्थिक प्रणाली में रहती है जिसे अर्थव्यवस्था की केंद्रीय समस्याएँ कहा जाता है।


6. समाजवादी अर्थव्यवस्था में केंद्रीय समस्याओं का समाधान कैसे होता है ? (How does solution of central problems in sociolist economy ?)

उत्तर⇒समाजवादी अर्थव्यवस्था में उत्पादन के साधनों पर समाज का नियंत्रण होता है तथा आर्थिक क्रियाओं का संचालन समाज के हित के लिए किया जाता है। इस अर्थव्यवस्था में केंद्रीय समस्याओं का समाधान सामाजिक प्राथमिकताओं के आधार पर आर्थिक नियोजन या योजना यंत्र द्वारा किया जाता है।


7. मिश्रित अर्थव्यवस्था में केंद्रीय समस्याओं का समाधान कैसे होता है ? (How does solution of central problems in mixed economy ?)

उत्तर⇒मिश्रित अर्थव्यवस्था में निजी क्षेत्र एवं सार्वजनिक क्षेत्र दोनों का सह-अस्तित्व होता है और दोनों ही क्षेत्र किसी सामान्य आर्थिक योजना के अधीन कार्य करता है। मिश्रित अर्थव्यवस्था में कीमत यंत्र और नियोजन-तंत्र दोनों मिलकर केंद्रीय समस्याओं का समाधान करते हैं।


8. पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में केंद्रीय समस्याओं का समाधान कैसे होता है ? (How does solution of central problems in a cpaitalist economy ?)

उत्तर⇒ पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में उत्पादन के साधनों पर निजी नियंत्रण होता है तथा यह अर्थव्यवस्था उत्पादन और उपभोग के क्षेत्र में स्वतंत्र होती है। इस अर्थव्यवस्था में आर्थिक समस्याओं का समाधान कीमत यंत्र द्वारा किया जाता है जिसमें माँग एवं पूर्ति के दो स्वतंत्र बल क्रियाशील होकर कीमत निर्धारण करते हैं।


9. आर्थिक समस्या क्या है? (What is an economic problem ?)

उत्तर⇒आवश्यकताएँ असीमित और साधन सीमित होते हैं। सीमित साधनों के वैकल्पिक प्रयोग होने के कारण इन साधनों एवं असीमित आवश्यकताओं के बीच एक संतुलन बनाने का प्रयास किया जाता है और इसी प्रयास से चुनाव की समस्या उत्पन्न होती है। इस प्रकार आर्थिक समस्या मूलत: चुनाव की समस्या है।
आर्थिक समस्या की परिभाषा एरिक रोल ने इस प्रकार से दी है। “आर्थिक समस्या मूलतः चयन की आवश्यकता से उत्पन्न होने वाली समस्या है। यह वह चयन है जिसमें वैकल्पिक प्रयोगों वाले सीमित संसाधनों का प्रयोग किया जाता है। यह संसाधनों के मितव्ययी उपयोग की समस्या है।


10. मौद्रिक लागत क्या है? (What is Money Cost ?)

उत्तर⇒कसी फर्म द्वारा एक वस्तु के उत्पादन में किये गये कुल मुद्रा व्यय को मुद्रा लागत कहते हैं। अर्थात् उत्पत्ति के समस्त साधनों के मूल्य को यदि मुद्रा में व्यक्त कर दिया जाये तो उत्पादक इन उत्पत्ति के साधनों की सेवाओं को प्राप्त करने में जितना कुल व्यय करता है वह मौद्रिक लागत कहलाती है।


11. वास्तविक लागत क्या है? (What is Real cost ?)

उत्तर⇒“किसी वस्तु के उत्पादन में विभिन्न प्रकार के श्रमिकों को जो प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष प्रयत्न करने पड़ते हैं अथवा साथ ही वस्तु के उत्पादन में प्रयोग की जाने वाली पूँजी को संचित करने में संयम अथवा प्रतीक्षा करनी पड़ती है में सब प्रत्यक्ष अथवा त्याग मिलकर वस्तु की वास्तविक लागत कहलाती है।


12. अवसर लागत क्या है ? (What is opportunity cost ?)

उत्तर⇒ आस्ट्रियन अर्थशास्त्री ने वास्तविक लागत के विचार में संशोधन किया और इन्होंने वास्तविक लागत के स्थान पर अवसर लागत का प्रयोग किया। अर्थशास्त्र का मौलिक सिद्धांत है कि आर्थिक साधन आवश्यकताओं की तुलना में सीमित होते हैं। अतः किसी वस्तु के उत्पादन का अर्थ है—दूसरी वस्तु या वस्तुओं के उत्पादन से वंचित होना।
इस प्रकार, किसी साधन की अवसर लागत का अभिप्राय उस साधन के दूसरे सर्वश्रेष्ठ वैकल्पिक प्रयोग से मिलने वाले मूल्य से है।
(“Opportunity cost of a factor refers to its value available in its next best alternative use.”)


13. निम्नलिखित को परिभाषित करें। (Define following.)

उत्तर⇒ (A) स्पष्ट लागत (Explicit cost)— ऐसे सभी व्यय, जिनका भुगतान उत्पादक द्वारा उत्पादन क्रिया के दौरान दूसरों को करना होता है स्पष्ट लागत कहलाते हैं।

(B) स्थिर लागत (Fixed cost)— स्थिर लागतें उस कुल खर्च का योग है जो उत्पादक को उत्पादन के स्थिर साधनों की सेवाओं को खरीदने या भाड़े पर लेने के लिए खर्च करनी पड़ती है।
(Fixed cost are the sum total of expenditure incurred by the producer on the purchase of fixed factors of production.)

(C) परिवर्तनशील लागत (Variable costs)— परिवर्तनशील लागत वह लागत है जो उत्पादक का उत्पादन के घटते-बढ़ते साधनों के प्रयोग के लिए खर्च करनी पड़ती है।
(Variable costs are the expenditure incured by the producer on the use of variable factors production:)

कुल लागत = स्थिर लागत + परिवर्तनशील लागत

(D) कुल लागत (Total cost) – किसी वस्तु की एक निश्चित मात्रा का उत्पादन करने के लिए उत्पादक को जितने कल व्यय करने पड़ते हैं. इनके जोड़ को कुल लागत कहते हैं। (Total cost of production is the sum of all expenditure incurred by the production in producing a given quantity of a commodity.)

उत्तर

(E) औसत लागत (Average cost)—किसी वस्तु की प्रति इकाई लागत को औसत लागत कहा जाता है। औसत लागत कुल लागत एवं उत्पादन मात्रा का भागफल होता है।

स्थायी संतुलन

(F) औसत स्थिर लागत (Average Fixed cost-AFC) — यदि उत्पादन की कुल स्थिर लागत को हम उत्पादन की मात्रा से भाग देते हैं तो हमें औसत स्थिर लागत प्राप्त हो जाती है।


14. औसत लागत एवं सीमांत लागत में क्या संबंध है ? (What is relationship between Average cost and Marginal cost ?)

उत्तर⇒औसत लागत तथा सीमांत लागत के बीच संबंध दर्शाने वाले मुख्य बिंदु है –

औसत

(i). दोनों की गणना उत्पादन की कुल लागत द्वारा की जाती है।

(ii). अर्थात् MC < AC
(iii). MC = AC
(iv). MC > AC


15. निम्नलिखित को परिभाषित करें। (Define following.)

उत्तर⇒ (A) कुल आय (Total Revenue)—किसी फर्म का कुल आय वस्तु की एक ही कीमत तथा कुल विक्रय की गयी इकाइयों के गुणनफल द्वारा प्राप्त किया जाता है।

कुल आय = कुल बिक्री से प्राप्त राशि = बिक्री इकाइयाँ x प्रति इकाई मूल्य

औसत लागत

(B) सीमांत आय (Marginal Revenue)-उत्पादक या फर्म को वस्तु की एक अतिरिक्त इकाई की बिक्री से जो अतिरिक्त आय प्राप्त होता है, उसे सीमांत आय कहते हैं। इस प्रकार सीमांत आय से मतलब किसी वस्तु की एक अतिरिक्त इकाई के परिवर्तन से कुल आय में होने वाला परिवर्तन से है।

औसत लागत

(C) औसत आय (Average Revenue) – औसत आय से मतलब उत्पादन की प्रति इकाई बिक्री से प्राप्त होने वाला आय। इस प्रकार कुल आय को बिक्री की गई इकाइयों की संख्या से भाग देने पर औसत आय प्राप्त होता है।

औसत आय सदा वस्तु के प्रति इकाई कीमत को व्यक्त करता है।

Bihar Board Class 12th Economics Question 2022 लघु उत्तरीय प्रश्न ( 30 Marks ) PART – 2 Class 12th Economics Question 202

16. सीमांत उपयोगिता और कुल उपयोगिता से आप क्या समझते हैं ? (What do you mean by Marginal Utility and Total Utility ?)

उत्तर⇒किसी वस्तु की एक अतिरिक्त इकाई के प्रयोग से जो अतिरिक्त उपयोगिता मिलता है, उसे सीमांत उपयोगिता कहते हैं।
सीमांत उपयोगिता (n वीं इकाई) = कुल उपयोगिता n  – कुल उपयोगिता n-1
MUnth = TUn – TUn-1

कुल उपयोगिता (Total Utility) — उपभोग के सभी इकाइयों के उपभोग से उपभोक्ता को जो उपयोगिता प्राप्त होती है, उसे कुल उपयोगिता कहते हैं। कुल उपयोगिता उपभोग की विभिन्न इकाइयाँ से प्राप्त सीमांत उपियोगता के योग होता है। (Total Utility is the addition of Marginal Utilities attained from various units of consumptions.)
TU = ΣMU
कुल उपयोगिता योग होती है सीमांत उपयोगिता का।


17. पूरक वस्तु और स्थानापन्न वस्तु में अंतर स्पष्ट करें।(Distinguish between Complementary goods and substitute goods.)

उत्तर⇒पूरक वस्तुएँ वे हैं जो किसी निश्चित उद्देश्य की पूर्ति के लिए एक साथ प्रयोग की जाती है। जैसे—स्कूटर-पेट्रोल। पूरक वस्तुओं की कीमत और खरीदी जाने वाली मात्रा में विपरीत संबंध होता है। स्कूटर की कीमत में तीव्र वृद्धि होने से स्कूटर की पूरक वस्तु पेट्रोल की मांग पर विपरीत प्रभाव पड़ता है जबकि पेट्रोल की कीमत में कोई परिवर्तन नहीं होता है।।
स्थानापन्न वस्तु वे वस्तुएँ हैं जो एक दूसरे के बदले एक ही उद्देश्य के लिए प्रयोग की जाती है।    जैसे—चाय, काफी आदि। ऐसी वस्तुओं में जब एक वस्तु की कीमत में वृद्धि होती है तब अन्य बातें समान रहने पर स्थानापन्न वस्तु की माँग में भी वृद्धि हो जाएगी।


18. उत्पादन फलन क्या है? (What is Production Function ?)

उत्तर⇒उपादानों (inputs) एवं उत्पादनों के फलनात्मक संबंध को उत्पादन फलन कहा जाता है। उत्पादन फलन हमें यह बताता है कि समय की एक निश्चित अवधि में उपादानों के परिवर्तन से उत्पादन आकार में किस प्रकार और कितनी मात्रा परिवर्तन होता है। उत्पादन केवल भौतिक मात्रात्मक संबंध पर आधारित है। इसमें मूल्यों का समावेश नहीं होता।

उत्पादन फलन Qx=f (A,B,C,D)


19. उत्पादन संभावना वक्र को परिभाषित करें। (Define production possibility curve?)

उत्तर⇒ उत्पादन संभावना वक्र इस विश्लेषण पर आधारित है कि अर्थव्यवस्था के उत्पादन के साधन सीमित है किन्तु उत्पादित की जाने वाली वस्तुएँ असीमित हैं। अर्थव्यवस्था को साध नों के वैकल्पिक उपयोगों के बीच चुनाव करना पड़ता है। इस प्रकार वस्तुओं के उत्पादन के अनेक विकल्प अर्थव्यवस्था के सामने आते हैं जिन्हें अर्थव्यवस्था की उत्पादन संभावना कहते हैं। इन उत्पादन संभावनाओं को रेखा चित्र द्वारा प्रदर्शित किया जाए तो उनके द्वारा बनने वाली रेखा को उत्पादन संभावना वक्र कहते हैं।


20. उत्पादन संभावना वक्र की मान्यताओं को बताये- (Point out Assumtion of Production possibility curve ?)

उत्तर⇒उत्पादन संभावना वक्र निम्न मान्यताओं पर आधारित है-

(i). उत्पादन के साधनों की स्थिर मात्रा (Fixed quantity of factors of production)
(ii). उपलब्ध साधनों का पूर्ण एवं कुशल उपयोग (Fuller and Efficient utilisation of the available resources)
(iii). स्थिर तकनीक (Constant Technology)
(iv). दो वस्तुएँ (Two goods).


21. उपभोक्ता संतुलन क्या है? (What is consumer’s equilibrium ?)

उत्तर⇒असीमित आवश्यकताओं तथा सीमित साधनों के होने पर एक उपभोक्ता का उद्देश्य अपने व्यय से अधिकतम संतुष्टि प्राप्त करना है और जब वह अधिकतम संतुष्टि प्राप्त कर लेता है तो वह उपभोक्ता संतुलन की अवस्था में होता है, एक उपभोक्ता उस समय संतुलन की अवस्था में होता है जब वह अपने वर्तमान परिस्थितियों को अच्छा समझते हैं। इस प्रकार जब कोई उपभोक्ता अपने व्यय करने के वर्तमान ढंग में कोई परिवर्तन नहीं करना चाहता, तब वह संतुलन की अवस्था में कहा जाता है।


22. मूल्य घटने पर बजट रेखा किस ओर बढ़ेगी? चित्र द्वारा दर्शायें। (In which direction budget line will move with a fall in price ? Depict with a diagram.)

उत्तर⇒मूल्य घटने पर बजट रेखा अपरिवर्तित रहेगी क्योंकि उपभोक्ता का वास्तविक क्रय उसकी आय तथा उपभोग की वस्तुओं पर निर्भर करता है। इस प्रकार आय तथा उपभोग वस्तुओं की मूल्य उपभोक्ता के लिए उपभोग सीमा निर्धारित करती है।
चित्र से स्पस्ट है –

 trangle

चित्र यह बताती है कि उपभोक्ता अपनी सीमांत आय से PQRST अथवा S वस्तु खरीद सकता है। अगर उपभोक्ता अपनी सम्पूर्ण आय वस्तु पर खर्च करता है तो 10 इकाई खरीद सकता है। उपभोक्ता अपनी सीमा रेखा या बजट रेखा के बाहर किसी वस्तु का उपभोग नहीं कर सकता है।
इस प्रकार मूल्य घटने पर भी बजट रेखा अपरिवर्तित रहेगी।


23. उपभोक्ता माँग वक्र कब शिफ्ट करता है ? (When does the consumer’s demand curve shifts?)

उत्तर⇒उपभोक्ता मांग वक्र जब शिफ्ट करता है जब मांग वक्र कीमत एवं मांगी गयी मात्रा के बीच एक विपरीत सम्बन्ध बताता है। इस विपरीत संबंध के कारण उपभोक्ता की मांग वक्र बायें से दायें नीचे गिरता है तो यह प्रदर्शित करता है कि ऊंची कीमत पर मांगी गई मात्रा कम होगी एवं कम कीमत पर मांगी गयी मात्रा अधिक होगी।


24. माँग वक्र नीचे क्यों गिरता है ? (Why does demand curve slope downwards ?)

उत्तर⇒मांग वक्र को जब रेखाचित्र द्वारा प्रदर्शित किया जाता है तो उसे माँग वक्र कहा जाता है। यह माँग वक्र की कीमत एवं मांगी जाने वाली मात्रा के बीच एक विपरीत संबंध को बताता है।
इस विपरीत संबंध के कारण ही माँग वक्र बायें से दायें नीचे की ओर गिरता है जो यह प्रदर्शित करता है कि ऊँची कीमत पर माँगी गई मात्रा कम होगी एवं कम कीमत पर मांगी गयी मात्रा अधिक होगी।


25. माँग की कीमत लोच की परिभाषा दें। (Define price Elasticity of Demand.)

उपभोक्ता के लिए उपभोग सीमा निर्धारित करती है। चित्र से स्पस्ट है -

उत्तर⇒माँग की कीमत लोच किसी वस्तु की कीमत में होने वाले प्रतिशत परिवर्तन तथा उस वस्तु की माँग में होने वाले प्रतिशत परिवर्तन का अनुपात है।
“Price elasticity of demand may be defined as the percentage change in the quantity demanded of a commodity divided by the percentage change in price of that commodity.”


26. माँग की लोच मापने का कुल व्यय रीति क्या है ? (What is the total expenditure method at measuring elasticity of demand ?)

उत्तर⇒इस रीति का प्रतिपादन मार्शल ने किया। इस रीति में यह ज्ञात किया जाता है कि वस्तु की कीमत में परिवर्तन होने से कुल व्यय में कितना और किस दिशा में परिवर्तन हुआ है।
कुल व्यय = वस्तु की कीमत x वस्तु की माँग


27. माँग की लोच मापने का ज्यामितीय या बिन्दु रीति क्या है ? (What is Geometric or point method of measuring elasticity of demand:)

कुल परिवर्तनशील लागत

उत्तर⇒इस रीति में माँग वक्र के किसी बिन्द पर माँग की लोच ज्ञात करने के लिए उस बिन्दु पर एक स्पर्श रेखा खींची जाती है।


28. श्रेष्ठ वस्तु (सामान्य) और घटिया (निम्न) वस्तु में अंतर करें। (Differentiate between superior or normal goods and inferior goods.)

उत्तर⇒श्रेष्ठ वस्तु या सामान्य वस्तुएं ऐसी वस्तुएं है जिनका आय प्रभाव धनात्मक तथा कीमत प्रभाव ऋणात्मक होता है। अर्थात् माँग वक्र बायें से दायें ऊपर बढ़ता हुआ होता है। धनात्मक ढाल वाला आय माँग वक्र यह बताता है कि उपभोक्ता की आय में प्रत्येक वृद्धि उसकी माँग में भी वृद्धि करती है तथा इसके विपरीत आय की प्रत्येक कमी सामान्य दशाओं में माँग में भी कभी उत्पन्न करती है।
घटिया वस्तुएं वे वस्तुएं होती है जिन्हें उपभोक्ता हीन दृष्टि से देखता है और आय स्तर के पर्याप्त न होने पर उपभोग करता है जैसे—मोटा अनाज, वनस्पति घी, मोटा कपड़ा आदि। इनका आय माँग वक्र ऋणात्मक ढाल वाला होता है अर्थात् बायें से दायें नीचे गिरता हुआ होता है।


29. माँग क्या है ? इसके निर्धारक तत्त्व को बताएँ। (What is demand. Point out its determinants of demand.)

उत्तर⇒अन्य बातें समान रहने पर एक निश्चित कीमत पर एक उपभोक्ता किसी वस्तु की जितनी मात्रा खरीदने को इच्छुक तथा योग्य होता है, उसे मांगी गई मात्रा कहा जाता है।

माँग को निर्धारक तत्त्व –
(i). वस्तु की उपयोगिता (Utility of the goods)
(ii). आय स्तर (Income level)
(iii). धन का वितरण (Distribution of wealth)
(iv). वस्तु की कीमत (Price of the goods)
(v). संबंधित वस्तुओं की कीमतें (Price of related goods)
(vi). स्थानापन्न वस्तुएं (Substitute goods)
(vii). भविष्य में कीमत परिवर्तन की आशंका(Expected future change in price)


30. बाजार माँग क्या है? (What is Market Demand ?)

उत्तर⇒बाजार माँग फलन से ज्ञात होता है कि किसी वस्तु की बाजार माँग अथवा वस्तु की कुल माँग निर्धारक तत्त्वों से किस प्रकार संबंधित है।
बाजार माँग फलन में व्यक्तिगत माँग फलन के तत्त्वों के अतिरिक्त निम्न को शामिल किया       जाता है – (i). जनसंख्या का आकार (ii). आय का वितरण।

Class 12th Economics Question Paper 2022 लघु उत्तरीय प्रश्न ( 30 Marks ) PART – 3 Bihar Board Class 12 Economics Question 2022

31. माँग के नियम की व्याख्या करें। (Explain law of Demand.)

उत्तर⇒अन्य बातें समान रहने पर वस्तु की कीमत एवं वस्तु की मात्रा में विपरीत संबंध पाया जाता है। माँग का नियम बताता है कि अन्य बातें समान रहने पर कीमत में कमी के परिणामस्वरूप वस्तु की मांगी जाने वाली मात्रा में वृद्धि होती है तथा कीमत में वृद्धि होने पर मांगी जाने वाली मात्रा में कमी होती है।”
The law of demand states that other thing equal, the amount demanded increases with a fall in price and diminishes with a rise in price.


32. कुल उत्पादन और औसत उत्पादन क्या है ? (What is total production and Average product ?)

उत्तर⇒कुल उत्पाद (Total product)— किसी एक निश्चित समयावधि में उत्पति के साध नों का प्रयोग करके उत्पादित की गई वस्तुओं और सेवाओं की कुल मात्रा को कुल उत्पाद कहा जाता है। (Total product is the total amount of goods and services produced in a given period by using various factors of production.)

कुल परिवर्तनशील लागत

औसत उत्पाद (Average product) — परिवर्तनशील साधन के प्रति इकाई उत्पाद को औसत उत्पाद कहते हैं। (Average product is per unit production of the variable factor.)


33. अल्पकालीन औसत लागत ‘U’ आकार का क्यों है ? (Why shori Run Average cost curve is ‘U’shaped ?)

उत्तर⇒ अल्पकाल में परिवर्तनशील अनुपात का नियम लागू होता है। आरंभ में बढ़ते प्रतिफल के कारण लागत घटती है, फिर स्थिर प्रतिफल की दशा में लागत स्थिर रहती है तथा क्रम में घटते प्रतिफल मिलने पर लागत बढ़ती है। इसी कारण उत्पादन, आकार बढ़ने पर पहले लागत घटती है फिर न्यूनतम होकर स्थिर होती है और अन्त में बढ़ती है। इस क्रम के कारण अल्पकालीन औसत लागत वक्र U आकृति का होता है।


34. सीमांत उत्पाद क्या है? (What is marginal product?)

उत्तर⇒किसी परिवर्तनशील साधनों की एक अतिरिक्त इकाई का या एक कम इकाई का प्रयोग करने से कुल उत्पाद में जो अंतर आता है उसे सीमांत उत्पाद कहते हैं।


35. “पूर्ण प्रतिस्पर्धा में सभी फर्मों द्वारा समरूप वस्तु का उत्पादन होता है’ स्पष्ट करें। (In perfect competition homogeneous good is produced by all the firms. Clarify.)

उत्तर⇒पूर्ण प्रतियोगिता में सभी फर्मों द्वारा समरूप वस्तु कम उत्पादनं होता है क्योंकि पूर्ण प्रतियोगिता बाजार की वह स्थिति होती है जिसमें एक समान वस्तु के बहुत अधिक क्रेता तथा
विक्रेता होते हैं। इसके अन्तर्गत सभी फर्म एक ही तरह की समरूप वस्तु का उत्पादन करते हैं। क्रेता तथा विक्रेता बाजार कीमत को प्रभावित नहीं कर पाते हैं। यही कारण है कि पूर्ण प्रतियोगिता ङ्केम बाजार में वास्तु की एक ही कीमत प्रचलित रहती है जिसके कारण समरूप वस्तु का उत्पादन करना पड़ता है।


36. किसी कारक का सीमांत उत्पाद मल्य क्या है ?(What is marginal revenue product of a factor?)

उत्तर⇒सीमांत उत्पाद मूल्य–किसी परिवर्तनशील साधन की एक अतिरिक्त इकाई का या एक कम इकाई का प्रयोग करने से कुल उत्पाद में जो अन्तर आता है उसे उस इकाई का सीमांत उत्पाद मूल्य कहा जाता है।
MP = TPn – TPn-1


37. सकल घरेलू उत्पाद को परिभाषित करें। (Define gross domestic product.)

उत्तर⇒ सकल घरेलू उत्पाद—एक लेखा वर्ष में किसी देश की घरेलू सीमा में सभी उत्पादकों द्वारा जितनी भी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन होता है, उनकी बाजार कीमत के जोड़ को बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद कहा जाता है।


38. बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पाद क्या है ? (What Gross Domestic Product at market price ?)

उत्तर⇒ एक लेखा वर्ष में किसी देश की घरेलू सीमा में सभी उत्पादक द्वारा जितनी भी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन होता है उनकी बाजार कीमत के जोड़ को बाजार कीमत पर सकल घरेलू उत्पादन कहा जाता है।
(Gross Domestic Product (GDP) is the market value of the final goods and services produced during a year within the domestic territory of a country.)


39. बाजार कीमत पर शुद्ध घरेलू उत्पाद (NDPMP) क्या है ? (What is Net Domestic Product at market price ?)

उत्तर⇒बाजार कीमत पर शुद्ध घरेलू उत्पाद एक देश की घरेलू सीमा में सामान्य निवासियों तथा गैर-निवासियों द्वारा एक लेखा वर्ष में उत्पादित अंतिम वस्तुओं तथा सेवाओं के बाजार मूल्य के बराबर है। इसमें से घिसावट मूल्य घटा दिया जाता है।
“Net Domestic Product at market price is the market value of final goods and services produced within the domestic teritory of a country during a year exclusive depreciation.”


40. बाजार की परिभाषा दीजिए। (Define market.)

उत्तर⇒बाजार का आशय किसी स्थान से नहीं वरन उस समस्त क्षेत्र से होता है। जहाँ किसी वस्तु के क्रेता और विक्रेता फैले होते हैं। अर्थशास्त्र में बाजार ऐसे क्रेताओं एवं विक्रेताओं से संबंधित है जिनकी क्रियाएँ वस्तु की उस कीमत को प्रभावित करती है जिस पर वस्तु बेची जाती है।


41. बाजार कीमत पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद (NNPMP) और साधन लागत पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद (NNPFC) में क्या अंतर है ? (What is difference between NNPMP and NNPFC ?)

उत्तर⇒ बाजार कीमत पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद (NNPFC) – एक वर्ष की अवधि में उत्पादित अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का बाजार मूल्य + विदेशों से प्राप्त शुद्ध साधन आय – घिसावट या पूँजी उपभोग।
NNPMP = GNPMP – Depreciation

साधन लागत पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद (NNPFC) — किसी एक लेखा वर्ष में किसी देश की सीमा में अर्जित कुल साधन आय (लगान + मजदूरी + ब्याज तथा लाभ) तथा विदेशों से शुद्ध साधन आय का जोड़ साधन लागत पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद अथवा राष्ट्रीय आय कहलाता है।
NNPFC = NDPFC + विदेशों से शुद्ध साधन आय।


42. आय का चक्रीय प्रवाह क्या है ? (What is Circular Flow of Income ?)

उत्तर⇒आय का चक्रीय प्रवाह से मतलब अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में मौद्रिक आय के प्रवाह या वस्तुओं और सेवाओं के चक्रीय रूप में प्रवाह से है।
“It refers to flow of money income or the flow of goods and services across different sectors of the economy in a circular form.”
इस प्रवाह की आय का चक्रीय प्रवाह इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस प्रवाह का न कोई आरंभ होता है और न कोई अन्त होता है। यह निरन्तर एक चक्र के रूप में प्रवाहित होता रहता है।


43. वैयक्तिक प्रयोज्य आय क्या है ? (What is personal disposable income ?) .

उत्तर⇒वैयक्तिक प्रयोज्य आय वह आय है जो व्यक्तियों को सभी स्रोतों से प्राप्त होती है तथा सरकार द्वारा आरोपित करों के भुगतान के बाद व्यक्ति के पास बचती है।


44. राष्ट्रीय प्रयोज्य आय क्या है ? (What is National Disposable income ?)

उत्तर⇒राष्ट्रीय प्रयोज्य आय वह आय है जो किसी देश के निवासियों को सभी स्रोतों (अर्जित आय एवं विदेशों से प्राप्त होने वाले चालू हस्तांतरण भुगतानों) से उपभोग या बचत के लिए एक वर्ष में प्राप्त होती है।


45. दोहरी गणना की समस्या क्या है? (What is problem of Double counting ?)

उत्तर⇒“राष्ट्रीय आय के आकलन में किसी वस्तु या सेवा का मूल्य एक से अधिक बार शामिल करना ‘दोहरी गणना’ कहलाता है।


46. सकल राष्ट्रीय उत्पाद क्या है? (What is GNP (Gross National Product?)

उत्तर⇒सकल राष्ट्रीय उत्पाद (GNP)—सकल राष्ट्रीय उत्पाद एक देश की घरेलू सीमा में सामान्य निवासियों द्वारा एक लेखा वर्ष में उत्पादित अंतिम वस्तुओं तथा सेवाओं के बाजार मूल्य एवं विदेशों से प्राप्त शुद्ध साधन आय का जोड़ है।
GNPMP = GDPMP + विदेशों से शुद्ध साधन आय।


47. आय के चक्रीय प्रवाह का दो क्षेत्रीय मॉडल क्या है ?(What is two sector model of circular flow of income ?)

उत्तर⇒ आय के चक्रीय प्रवाह के दो क्षेत्रीय मॉडल में अर्थव्यवस्था के केवल दो क्षेत्रों घरेलू क्षेत्र (अर्थात् परिवार) तथा उत्पादक क्षेत्र (अर्थात् फर्म) के बीच होने वाले चक्रीय प्रवाहों (वास्तविक एवं मौद्रिक) का अध्ययन किया जाता है।


48. आय के चक्रीय प्रवाह में रिसाव एवं अन्तःक्षेपण क्या है ? (What is leakage and injections in the circular flow of income ?)

उत्तर⇒ रिसाव से मतलब वह आय जिसे बचाकर रख लिया जाता है और आय प्रवाह में वापस नहीं लौटाया जाता है। यदि उत्पादन के साधन अपनी समस्त आय को देश में उत्पादित वस्तुओं व सेवाओं पर व्यय नहीं करते तो इसे आय का रिसाव कहा जाता है।
इस प्रकार “आय का रिसाव आय का वह भाग है जो आय के चक्रीय प्रवाह के वापस. खर्च नहीं किया जाता और प्रवाह से बाहर कर दिया जाता है।”.
आय का अन्त:क्षेपण आय में होने वाली वह वृद्धि है जो चक्रीय प्रवाह में बाहर से किसी और स्रोत द्वारा होती है। अर्थव्यवस्था के संतुलन के लिए अन्त:क्षेपणों का रिसावों के समान होना आवश्यक है।
अर्थात् अन्तःक्षेपण = रिसाव।


49. वास्तविक प्रवाह क्या है? (What is Real flow ?)

उत्तर⇒ परिवारों से फर्मों को साधन सेवाओं (जैसे भूमि, श्रम, पूँजी आदि) एवं फर्मों से परिवारों को वस्तुओं या सेवाओं का जो प्रवाह होता है, उसे वास्तविक प्रवाह कहते हैं।


50. फर्म के अधिकतम लाभ की शर्ते क्या हैं? (What are the conditions of Profit Maximisation ?)

उत्तर⇒फर्म के अधिकतम लाभ की शर्त

(i). MC = MR
सीमांत लागत = सीमांत आय

(ii). MC वक्र द्वारा MR वक्र को नीचे से काटा जाना चाहिए तभी लाभ अधिकतम होगा।


51. चाय की दो पूरक वस्तुओं का उदाहरण दें। (Give two examples of complementary goods of tea.)

उत्तर⇒पूरक वस्तुएँ वे हैं जो किसी निश्चित उद्देश्य की पूर्ति के लिए एक साथ प्रयोग किया जाता है। चाय के दो पूरक वस्तुएं चाय एवं चीनी।


52. कुल स्थिर लागत वक्र एवं कुल परिवर्ती लागत वक्र चित्रित करें। (Draw total fixed cost curve and total variable cost curve.)

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उत्तर⇒कुल स्थिर लागत वक्र (Total Fixed Cost Curve)

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कुल परिवर्ती लगत बक्र ( Total Variable Cost Curve)


53. पूर्ण प्रतिस्पर्धी फर्म के माँग वक्र को चित्र द्वारा दर्शायें।(Show the demand curve of perfectly competitive firm with the help of a diagram.)

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उत्तर⇒पूर्ण प्रतिस्पर्धी फर्म के मांग वक्रपूर्ण प्रतियोगिता में मांग वक्र अर्थात् AR (Average Revenue) पूर्ण लोचदार होता है और X-अक्ष के समानान्तर एक पड़ी रेखा के रूप में होता है।


54. एक पूर्ति वक्र चित्रित करें जिसकी लोच इकाई हो।(Draw a supply curve whose elasticity is unity.)

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उत्तर⇒पूर्ति वक्र का चित्रांक

Class 12 Economics Question Paper Bihar Board लघु उत्तरीय प्रश्न ( 30 Marks ) PART – 4 Class 12 Economics Question 2022

55. प्रति इकाई कर लगाने पर फर्म की पूर्ति वक्र किस ओर शिफ्ट करती है ? (In which direction the supply curve shifts due to imposition of per unit tax ? )

उत्तर⇒प्रति इकाई कर लगाने से फर्म की पूर्ति वक्र बायें से दायें ऊपर की ओर बढ़ता हुआ ता है। इस प्रकार प्रति इकाई कर लगाने पर फर्म की पूर्ति वक्र का कीमत और कुल पूर्ति के च धनात्मक संबंध को दर्शाता है।


56. पूर्ण प्रतिस्पर्धी बाजार में संतुलन की स्थिति को चित्रित करें।(Draw the state of equilibrium in perfectly competitive market.)

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उत्तर⇒

E – पूर्ण प्रतियोगिता बाजार में संतुलन की स्थिति बताता है जहाँ मांग और पूर्ति एक दूसरे के बराबर है।


57. संतुलन कीमत क्या है? (What is Equilibrium price ?)

उत्तर⇒संतुलन कीमत वह कीमत है जो माँग एवं पूर्ति की शक्तियों द्वारा उस बिन्दु पर निर्धारित होता है जहाँ वस्तु की माँग और वस्तु की पूर्ति आपस में बराबर होती है।                                  “Equilibrium price is that price which is determined by demand and supply forces at that point where the demand of commodity and supply of the commodity become equal to each other.”


58. पूर्ण प्रतियोगिता एवं एकाधिकारी प्रतियोगिता में अंतर करें।(Differenctiate between perfect competition and Monopolistic competition.)

उत्तर⇒पूर्ण प्रतियोगिता एवं एकाधिकारी प्रतियोगिता में निम्न अंतर है –

(i). पूर्ण प्रतियोगिता में वस्तु विभेद नहीं होता है जबकि एकाधिकारी प्रतियोगिता में मिलती-जुलती वस्तुओं का उत्पादन होता है।

(ii). पूर्ण प्रतियोगिता में बाजार का पूर्ण ज्ञान होता है जबकि एकाधिकारी प्रतियोगिता . में बाजार का पूर्ण ज्ञान नहीं होता है।

(iii). पूर्ण प्रतियोगिता में साधनों में पूर्ण गतिशीलता पाई जाती है जबकि एकाधिकारी प्रतियोगिता में साधनों की गतिशीलता अपूर्ण होती है।

(iv). पूर्ण प्रतियोगिता में AR और MR बराबर होते तथा X-अक्ष के बराबर जबकि एकाधिकारी प्रतियोगिता में AR और MR एकाधिकारी प्रतियोगिता में अधिक लोचपूर्ण होते हैं।


59. फर्म के अधिकतम लाभ की शर्ते क्या है ? (What are the conditions of profit maximisation of ferm ?)

उत्तर⇒लाभ के अधिकतम करने की प्रमुख शर्ते –

(i). अनिवार्य शर्त (Necessary Condition)—सीमांत लागत (MC) = सीमांत आय (MR) or, (MC = MR)

(ii). पूरक शर्त (Supplementary condition)—संतुलन के बिन्दु पर सीमांत लागत रेखा (MC) सीमांत आय रेखा (MR) को नीचे से काटे अर्थात् MR और MC की समानता के बिंदु पर MC बढ़ती हुई होनी चाहिए।

(iii). समविच्छेद बिन्दु – यह उस स्थिति में उत्पन्न होती है जब TR = TC अथवा MR = MC


60. पूर्ति का नियम का उल्लेख करें। (Explain law of supply.)

उत्तर⇒ अन्य बातें समान रहने पर, वस्तु की कीमत वृद्धि पूर्ति को बढ़ाएगी तथा वस्त की कीमत में कमी पूर्ति को घटाएगी। इस प्रकार वस्तु कीमत तथा वस्तु पूर्ति में प्रत्यक्ष तथा सीधा संबंध पाया जाता है।
फलन के रूप में S = flp


61. पूर्ति की लोच क्या है? (What is Elasticity of Supply ?)

जाता है। फलन के रूप में S = flp

उत्तर⇒ “पूर्ति की कीमत लोच किसी वस्तु की कीमत में प्रतिशत परिवर्तन के कारण पर्ति में होने वाले प्रतिशत परिवर्तन की माप है।
“Price elasticity of supply is a measurement of the percentage change in quantity supplied of a commodity in response to some percentage change in its price.


62. पूर्ण प्रतियोगिता और एकाधिकार में किन्हीं दो अंतर को लिखिए। (Write any two differences between Perfect Competition and Monopoly.)

उत्तर⇒पूर्ण प्रतियोगिता और एकाधिकार में दो प्रमुख अंतर निम्न हैं –

(i). पूर्ण प्रतियोगिता में औसत आय और सीमान्त आय दोनों बराबर होते हैं जबकि एकाधिकार में औसत आय सीमांत आय से अधिक होता है। पूर्ण प्रतियोगिता में AR = MR जबकि एकाधिकार में AR > MR

(ii). पर्ण प्रतियोगिता में वस्तु की कीमत सीमांत लागत के बराबर होती है अर्थात् AR = MC जबकि एकाधिकार में वस्तु की कीमत सीमांत लागत से अधिक होती है अर्थात् AR > MC


63. बाजार मूल्य क्या है ? (What is Market Price ?)

उत्तर⇒बाजार मूल्य में परिवर्तन की प्रवृत्ति पायी जाती है। बाजार मुल्य अपने प्रत्येक परिवर्तन में पुन: सामान्य कीमत के बराबर आने का प्रयत्न करती है। बाजार मूल्य सामान्य मल्य के चारो ओर घूमती रहती है अर्थात् बाजार मूल्य की प्रवृत्ति सदा सामान्य कीमत की ओर आने की होती है।


64. पूर्ण प्रतियोगिता में किसी फर्म के माँग वक्र की प्रकृति क्या होगी ? (What is the shape of demand curve of a firm in Perfect competition ?)

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उत्तर⇒पूर्ण प्रतियोगिता में फर्म के माँग वक्र की आकृति इस प्रकार होगी –


65. पूर्ण प्रतियोगिता क्या है ? (What is perfect competition ?)

उत्तर⇒पूर्ण प्रतियोगिता बाजार की वह स्थिति होती है जिसमें एक समान वस्तु के बहुत अधिक क्रेताएँ व विक्रेता होते हैं। एक क्रेता तथा एक विक्रेता बाजार कीमत को प्रभावित नहीं कर पाते और यही कारण है कि पूर्ण प्रतियोगिता बाजार में वस्तु की एक ही कीमत प्रचलित रहती है।


66. एकाधिकार की परिभाषा दें। (Define Monopoly.)

उत्तर⇒ एकाधिकार दो शब्दों से बना है—एक + अधिकार अर्थात् बाजार की वह स्थिति जब बाजार में वस्तु का केवल एक मात्र विक्रेता हो। एकाधिकारी बाजार दशा में वस्तु की एक अकेला विक्रेता होने के कारण विक्रेता का वस्तु की पूर्ति पर नियंत्रण रहता है। विशुद्ध एकाधिकार में
वस्तु का निकट स्थानापन्न उपलब्ध नहीं होता है।


67. एकाधिकारी प्रतियोगिता क्या है ? (What is Monopolistic competition ?)

उत्तर⇒ एकाधिकारी प्रतियोगिता बाजार में एकाधिकार तथा प्रतियोगिता दोनों का अंश पाया जाता है। वास्तविक जगत में न पूर्ण प्रतियोगिता प्रचलित होती है न ही एकाधिकार। वास्तविक बाजार में प्रतियोगिता एवं एकाधिकार दोनों के तत्त्व उपस्थित रहते हैं। इस बाजार दशा के समह के उत्पादक विभेदीकृत वस्तुओं का उत्पादन करते हैं जो एक समान तथा समरूप नहीं होता किन्तु निकट स्थानापन्न अवश्य होता है।


68. एकाधिकार की विशेषताएँ को बताएँ। (Point out features of Monopoly.)

उत्तर⇒ एकाधिकार बाजार में निम्नलिखित प्रमुख विशेषताएँ पायी जाती है –

(i). एकाधिकारी बाजार में वस्तु का एकमात्र उत्पादक होता है।
(ii). बाजार में एकाधिकारी का कोई निकट स्थानापन्न उपलब्ध नहीं होता है।
(iii). एकाधिकारी कीमत और उत्पादन दोनों को निर्धारित कर सकता है। लेकिन एकाधिकारी कीमत और उत्पादन दोनों को एक समय में एक साथ निर्धारित नहीं कर सकता।
(iv). एकाधिकार में नई फर्मों का उत्पादन क्षेत्र में प्रवेश पूर्णतः प्रतिबंधित होता है।
(v). एकाधिकारी माँग वक्र ऋणात्मक ढाल वाला होता है। सीमांत आय (MR) तथा औसत आय (AR) से कम होता है।
(vi). एकधिकारी की स्थिति में कीमत विभेद की संभावना हो सकती है।


69. व्यावसायिक बैंक की विशेषताएँ बताइए। (Mention the characteristics of Commercial Bank.)

उत्तर⇒ व्यावसायिक बैंक की प्रमुख विशेषताएँ निम्न हैं—

(i). व्यावसायिक बैंक मुद्रा में लेन-देन करता है।
(ii). बैंक का उद्देश्य लाभ अर्जित करना होता है।
(iii). बैंक जनता से ऋण देने के उद्देश्य से जमाएं प्राप्त करता है।
(iv). व्यावसायिक बैंक साख का व्यवहार करता है, इन्हें साख-निर्माण करने की योग्यता होती है।
(v). व्यावसायिक बैंक ऐसी वित्तीय संस्था है जिसकी प्रकृति पूर्णत व्यावसायिक होती
(vi). व्यावसायिक बैंक व्यावसायिक संस्था के रूप में मांग जमा पैदा करती है और ये जमाएं विनिमय के माध्यम के रूप में प्रयोग की जाती है।


70. मध्यवर्ती वस्तुओं के दो उदाहरण दें। (Give two examples of intermediate goods.)

उत्तर⇒मध्यवर्ती वस्तुओं के दो उदाहरण कपास, गन्ना, मैदा है।


71. मूल्यह्रास से आप क्या समझते हैं ? (What do you understand by depreciation?)

उत्तर⇒मूल्यह्रास—किसी परिसम्पति के निरंतर प्रयोग से उसमें टूट-फूट के कारण उसके मूल्य में होने वाले ह्रास को ही मूल्यह्रास (Depreciation) कहते हैं।


72. राष्ट्रीय आय गणना में निवल निवेश को परिभाषित करें। (Define net investment in national income accounting.)

उत्तर⇒निवल निवेश—निवल निवेश से अभिप्राय उस खर्च से है जिसके द्वारा पूंजीगत पदार्थ जैसे मशीन, औजार, निर्माण हेतु कच्चा माल आदि के भण्डारों में वृद्धि की जाती है।


73. ‘मुद्रा लेखा की इकाई है’ समझाइये। (‘Money is unit of account’ Explain.)

उत्तर⇒“मुद्रा लेखा की इकाई है।”
केन्स के अनुसार “मुद्रा लेखा या हिसाब की मुद्रा है। हिसाब या लेखा की मुद्रा वह है जिसमें ऋणों, कीमतों और सामान्य क्रय शक्ति के काम आती है उसे लेखा या हिसाब की इकाई कहा जाता है।
बेन्हम के अनुसार, “जो मुद्रा व्यवहारिक हिसाब किताब का काम आती है उसे हिसाब की इकाई कहते हैं जैसे भारत में रुपया व पैसा लेखे की मुद्रा है इसलिए कहा जाता है कि मद्रा लेखा की इकाई है।


74. अर्थव्यवस्था में स्फीति का क्या अर्थ है ? (What is the meaning of inflation in the economy ?)

उत्तर⇒अर्थव्यवस्था में स्फीति का अर्थ मूल्य स्तरों में होने वाली सतत वृद्धि को ही स्फीति कहा जाता है। स्फीति का शाब्दिक अर्थ, मुद्रा के मूल्य में कमी होता है, अर्थात् मुद्रा के क्रय शक्ति में कमी आने को ही स्फीति कहा जाता है।


75. मुद्रा के प्राथमिक कार्य समझाइए। (Explain Primary Functions of Money.)

उत्तर⇒ मुद्रा के प्राथमिक कार्यों को मुख्य कार्य भी कहा जाता है। इन कार्यों के अंतर्गत मुद्रा के उन कार्यों को शामिल किया जाता है, जो मुद्रा द्वारा प्रत्येक देश में सम्पादित किये जाते हैं। इसलिए मुद्रा के इन कार्यों को मौलिक व आवश्यक कार्य भी कहा जाता है। मुद्रा के दो प्राथमिक कार्य हैं –

(i). विनिमय का माध्यम – मुद्रा विनिमय के माध्यम के रूप में काम करती है। विनिमय का संपूर्ण कार्य मुद्रा के माध्यम से किया जाता है।

(ii). मूल्य का मापक – मुद्रा मूल्य मापन को इकाई का कार्य करती है। मुद्रा द्वारा मूल्य को मापा जा सकता है।


76. मुद्रा के प्रावेगिक अथवा गत्यात्मक कार्य क्या है ? (What is Dynamic functions of money ?)

उत्तर⇒मुद्रा के वे कार्य जिनसे अर्थव्यवस्था में आर्थिक गतिविधियां सक्रीय रूप से प्रचलित । होती है, मुद्रा के प्रावेगिक अथवा गत्यात्मक कार्य कहलाती है।

मुद्रा के गत्यात्मक कार्य निम्न है—

(i). मुद्रा सामान्य कीमत स्तर को प्रभावित करती है।
(ii). मुद्रा आय, उत्पादन, रोजगार स्तर को प्रभावित करती है।
(iii). मुद्रा मौद्रिक नीति एवं राजकोषीय नीति के निर्धारण एवं संचालक का आधार है।
(iv). मुद्रा विशिष्टिकरण एवं श्रम विभाजन का आधार है।


77. प्रामाणिक व प्रतीक मुद्रा में अंतर करें। (Distinguish between standard and token money.)

उत्तर⇒ प्रामाणिक व प्रतीक मुद्रा में निम्न अंतर है –

(i). प्रामाणिक मुद्रा देश का प्रधान सिक्का होता है जबकि प्रतीक मुद्रा प्रामाणिक द्रव का सहायक स्वरूप है।

(ii). प्रामाणिक मुद्रा असीमित विधिग्राह होती है जबकि प्रतीक मुद्रा सीमित विधि ग्राह होती है।

(iii). प्रामाणिक मुद्रा का अंकित मूल्य वास्तविक मूल्य के बराबर होता है जबकि प्रतीक मुद्रा का अंकित मूल्य वास्तविक मूल्य से अधिक होता है।

(iv). प्रामाणिक मुद्रा का स्वतंत्र ढलाई होती है जबक प्रतीक मुद्रा सीमित मुद्रा ढलाई होती है।

(v). प्रामाणिक मुद्रा शुद्ध धातु का बना होता है जबकि प्रतीक मुद्रा खोट मिला होता है।


78. न्यून माँग और अतिरेक माँग को परिभाषित करें। (Define Deficient Demand and Excess Demand.)

उत्तर⇒न्यून माँग (Deficient Demand) – “न्यून माँग वह दशा है जिसमें अर्थव्यवस्था में सामूहिक माँग पूर्ण रोजगार के लिए आवश्यक सामूहिक पूर्ति से कम होती है।”

अतिरेक माँग (Excess demand)— “अतिरेक माँग वह दशा है जिसमें सामूहिक माँग अर्थव्यवस्था में पूर्ण रोजगार के लिए आवश्यक सामूहिक पूर्ति से अधिक होती है।”
“Excess demand refers to a situation in which aggregate demand becomes excess of aggregate corresponding in full employment in the economy.”


79. न्यून माँग उत्पन्न होने के कारण बताएँ।(Explain Reasons of arising deficient demand.)

उत्तर⇒ न्यून माँग निम्न कारणों से उत्पन्न होती है —

(i). निर्यात में कमी
(ii). बचत प्रवृत्ति में वृद्धि के कारण उपभोग माँग में कमी।
(iii). सार्वजनिक व्यय में कमी
(iv). बैंक दर में वृद्धि से निवेश माँग में कमी
(v). करों में वृद्धि के परिणामस्वरूप व्यय योग्य आय एवं उपभोग माँग में कमी।

Bihar Board Class 12 Economics Question 2022 लघु उत्तरीय प्रश्न ( 30 Marks ) PART – 5 Class 12 Economics Question 2022

80. स्थिर विनिमय दर एवं लोचपूर्ण विनिमय दर की परिभाषा दें।
(Define fixed exchange rate and flexible exchange rate.)

उत्तर⇒ स्थिर विनिमय दर – स्थिर विनिमय दर वह दर है जिसका निर्धारण सरकार द्वारा किया जाता है। स्थिर विनिमय दर में सामान्यतया कोई परिवर्तन नहीं होता या परिवर्तन केवल एक निश्चित सीमा तक ही हो सकते हैं।
लोचपूर्ण विनिमय दर – लोचपूर्ण विनिमय दर वह दर है जिसका निर्धारण बाजार शक्तियों (विदेशी मुद्रा की माँग व पूर्ति) के आधार पर होता है। विनिमय दर में परिवर्तन विदेशी विनिमय की बाजार माँग व पूर्ति में परिवर्तन के अनुसार आ सकते हैं लोचदार विनिमय दर को चलायमान विनिमय दरें भी कहा जाता है।


81. स्फीतिक अंतराल और अवस्फीतिक अंतराल में क्या अंतर है ?(Distinguish between Infationary gap and Deflationary gap ?)

उत्तर⇒ न्यून माँग और अतिरेक माँग ही स्फीतिक और अवस्फीति अंतराल को बताती है। इन दोनों में प्रमुख अंतरों को हम इस प्रकार देख सकते हैं-

(i). स्फीतिक अंतराल सामूहिक माँग का वह स्तर है जो पूर्ण रोजगार संतुलन के लिए आवश्यक कुल माँग से कम होती है। जबकि अवस्फीतिक अंतराल सामूहिक माँग का वह स्तर है जो पूर्ण रोजगार संतुलन के लिए आवश्यक कुल माँग के स्तर से अधिक होता है।

(ii). न्यून माँग की स्थिति में सामूहिक माँग पूर्ण रोजगार संतुलन के लिए आवश्यक सामूहिक पूर्ति से कम होती है। जबकि अतिरेक माँग सामूहिक माँग पूर्ण रोजगार संतुलन के लिए आवश्यक सामूहिक पूर्ति से अधिक होती है।

(iii). न्यून माँग के कारण अवस्फीतिक अंतराल की स्थिति उत्पन्न होती है जबकि अतिरेक माँग के कारण स्फीतिक अंतराल उत्पन्न होती है।


82. सरकार का बजट क्या है ? (What is the budget of the government ?

उत्तर⇒सरकार का बजट बजट एक वित्तीय वर्ष अप्रैल 1 से मार्च 31 तक में सरकार की अनुमानित आय-व्यय का विवरण होता है जिसे बजट कहा जाता है।


83. खुला अर्थव्यवस्था से आप क्या समझते हैं? (What do you understand by an open economy ?)

उत्तर⇒खुली अर्थव्यवस्था — वे अर्थव्यवस्था जिसके उदारवादी तथा निजी आर्थिक तत्वा का प्रभाविकता रहती है तथा आयात-निर्यात पर न्यूनतम प्रतिबंध रहते हैं, खुली अर्थव्यवस्था कहलाता है जैसे हांगकांग,सिंगापर।


84. घाटे का बजट क्या है ? (What is Deficit Budget ?)

उत्तर⇒घाटे का बजट वह बजट होता है जिसमें सरकार की अनुमानित आय सरकार के अनुमानित व्यय से कम होती है।


85. सरकारी बजट के किन्हीं दो उद्देश्यों को समझाइए। (Explain briefly any two Objectives of government Budget.)

उत्तर⇒सरकारी बजट सरकार के वार्षिक व्यय एवं आय का ब्योरा प्रस्तुत करता है। बजट सरकार की उन विकास नीतियों एवं उद्देश्यों को भी बताता है, जिन्हें सरकार बजट के माध्यम से प्राप्त करती है। इसके दो प्रमुख उद्देश्य निम्न हैं –

(i). आर्थिक विकास को प्रोत्साहन – बजट का मुख्य उद्देश्य अर्थव्यवस्था में आर्थिक विकास की गति को प्रोत्साहन देना होता है।
आर्थिक विकास को प्रोत्साहन देने के लिए सरकार कर में छूट, सरकारी व्यय बढ़ाकर आधारभूत संरचना सड़क, पुल, नहरे, नल, बिजली आदि का निर्माण करती है।

(ii). रोजगार का सृजन – रोजगार का सृजन करना भी सरकार के बजट का मुख्य उद्देश्य है। इसके लिए सरकार श्रम-प्रधान तकनीकों, सड़क, पुल व बांध का निर्माण जैसे सार्वजनिक कार्यक्रमों को प्रोत्साहित करती है, जिससे रोजगार के अवसर उत्पन्न होती है।


86. भुगतान शेष के संघटकों को बताइए। (What are the components of Balance of Payment ?)

उत्तर⇒भगतान शेष के संघटकों को दो भागों में बांटा गया है –

(A). चालू खाते के मदें।
(B). पूँजी खाते के मदें।

(A). चालू खाते के अंतर्गत निम्न हैं-
(i). दृश्य व्यापार शेष या अदृश्य व्यापार खाता
(ii). अदृश्य व्यापार शेष या अदृश्य व्यापार खाता
(iii). एकपक्षीय अंतरण

(B). पॅजी खाते के अंतर्गत निम्न हैं-
(i). सरकारी सौदे
(ii). गैर सरकारी अथवा निजी सौदे
(iii). प्रत्यक्ष निवेश
(iv). पोर्टफोलियो निवेश


87.GNP अवस्फीतिक क्या है? (What is GNP Deflator ?)

स्थायी संतुलन

उत्तर⇒नकद GNP का वास्तविक GNP से अनुपात एवं उसका 100 से गुणनफल GNP अवस्फीतिक की आय है। यह उन सभी वस्तुओं एवं सेवाओं के औसत मूल्य स्तर की माप प्रस्तुत करता है जो GNP में शामिल की जाती है।


88. वस्तु विनिमय प्रणाली क्या है? (What is Barter system ?)

उत्तर⇒वस्तु विनिमय प्रणाली एक ऐसी प्रणाली है जिसमें वस्तु के बदले वस्तु बदली जाती है और विनिमय के किसी सर्वग्राह्य माध्यम का प्रयोग नहीं होता है।


89. केंद्रीय बैंक की परिभाषा दीजिए। (Define central Bank.)

उत्तर⇒केंद्रीय बैंक देश की मौद्रिक और बैंकिंग व्यवस्था की शीर्षस्थ संस्था है जो देश में चलन तथा साख का विकास, नियमन एवं नियंत्रण राष्ट्र के आर्थिक विकास और आर्थिक स्थिरता के उद्देश्य से कार्य करती है।


90. केंद्रीय बैंक एवं व्यापारिक बैंक में अंतर करें। (Distinguish between central bank and commercial bank.)

उत्तर⇒(i). केंद्रीय बैंक देश के विदेशी विनिमय का लेन-देन करता है। जबकि व्यापारिक बैंक केवल केंद्रीय बैंक की आज्ञा से ही विदेशी विनिमय का व्यवहार कर सकता है।

(ii). केंद्रीय बैंक को व्यापारिक बैंकों से कोई प्रतियोगिता नहीं होती है जबकि व्यापारिक बैंक परस्पर प्रतियोगिता करते हैं।

(iii). केंद्रीय बैंक को पत्र मुद्रा निर्गमन करने का एकाधिकार होता है जबकि व्यापारिक बैंक को यह अधिकार नहीं है।

(iv). केंद्रीय बैंक सरकार के बैंकर के रूप में सरकार की ओर से लेन-देन करता है जबकि व्यापारिक बैंक जनता का बैंकर है।

(v). केंद्रीय बैंक सरकार का स्वामित्व होता है जबकि व्यापारिक बैंक जनसाधारण में व्यवसाय करते हैं।


91. केंद्रीय बैंक के विकासात्मक कार्य का उल्लेख करें। (Explain Development related functions.)

उत्तर⇒केंद्रीय बैंक के विकासात्मक कार्य निम्न हैं –

(i). संगठित बैंकिंग प्रणाली का विकास करता है और नई वित्तीय संस्थानों का निर्माण करता है।
(ii). विकास कार्यों के लिए केंद्रीय बैंक पर्याप्त मुद्रा की पूर्ति सुनिश्चित करता है।
(iii). विनियोग को प्रोत्साहन देने के लिए सस्ती मुद्रा नीति अपनाता है।
(iv). देश के तीव्र औद्योगिक विकास के लिए पर्याप्त औद्योगिक वित्त का प्रबंध करता है।


92. बैंक दर एवं ब्याज दर में अंतर करें। (Distinguish between bank rate and interest rate.)

उत्तर⇒बैंक दर एवं ब्याज दर दोनों में अंतर होता है। ब्याज दर वह दर है जिस पर देश के व्यापारिक बैंक एवं अन्य वित्तीय संस्थाएं ऋण देने को तैयार होती है। इस प्रकार जबकि बैंक दर कद्रीय बैंक की पुनः कटौती है, बाजार ब्याज दर व्यापारिक बैंक की ऋण देने की ब्याज की दर होती है।


93. केंद्रीय बैंक के अंतिम ऋणदाता के कार्य को स्पष्ट करें। (Explain the ‘lender of laste resort function of the central Bank.)

उत्तर⇒केंद्रीय बैंक देश के अन्य बैंकों के लिए अंतिम ऋणदाता के रूप में भी कार्य करता है। आज सभी केंद्रीय बैंक, अंतिम ऋणदाता के दायित्व को निभा रहे हैं। जब किसी व्यापारिक बैंक को वित्तीय संकट के दौरान कहीं से भी ऋण प्राप्त नहीं हो पाता तो वह केंद्रीय बैंक से अंतिम सहारे के रूप में ऋण की माँग कर सकता है।
केंद्रीय बैंक, सदस्य बैंकों को ग्रहण करने योग्य बिलों की कटौती कर के अंतिम ऋणदाता के रूप में कार्य करता है।


94. गुणक प्रक्रिया क्या है ? (Explain the process of Multiplier ?)
उपर्युक्त ……… चित्र ………..

cicle

उत्तर⇒उपर्युक्त गुणक प्रक्रिया स्पष्ट करती है कि निवेश में परिवर्तन होने से आय में परिवर्तन होता है। इसके फलस्वरूप उपभोग में परिवर्तन होता है। चूंकि एक व्यक्ति का उपभाग व्यय दूसरे व्यक्ति की आय होती है। अतः उपभोग में परिवर्तन होने से आय में परिवर्तन होता है। इस प्रकार यह प्रक्रिया तब तक चलती रहती है जब तक उपभोग व्यय में परिवर्तन (∆C) शून्य नहीं हो जाता।
गुणक प्रक्रिया दो प्रकार की होती है। निवेश के बढ़ने पर गुणक, आय में कई गुणा वृद्धि कर देता है। इसे गुणक की अनुकूल प्रक्रिया (Forward Action of Multiplier) कहते हैं। इसके विपरीत, निवेश के कम होने पर गुणक के प्रभाव से आय में कई गुना कमी हो जाती है। इसे गुणक की प्रतिकुल प्रक्रिया (Backward Action of Multiplier) कहा जाता है।


95. आय के चक्रीय प्रवाह द्वारा अर्थव्यवस्था के संतुलन को दर्शायें । (Show the equilibrium of the economy with the help of circular flow of income.)

उत्तर⇒आय के चक्रीय प्रवाह द्वारा अर्थव्यवस्था के संतुलन –
अर्थव्यवस्था के चक्रीय प्रवाह में संतुलन की शर्त निम्न प्रकार है –
Y = C + 1 + G + C (X – M)
Y = आय अथवा उत्पादन
C = उपभोग व्यय
I = निवेश व्यय
G = सरकारी व्यय
X – M = शुद्ध निर्यात जहाँ X = निर्यात, M = आयात


96. निर्गत गणक क्या है ? (What is output multiplier ?)

कुल परिवर्तनशील लागत

उत्तर⇒निर्गत गुणक—निर्गत गुणक वह अंक है जिसके साथ निवेश में किए गए परिवर्तन को गुणा करके उसके फलस्वरूप आय में हुई वृद्धि का वृद्धि से K गुना अधिक होगी।
निर्गत गुणक को निम्न सूत्र द्वारा व्यक्त किया जा सकता है।


97. तरलता जाल क्या है ? (What is liquidity Trap ?)

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उत्तर⇒यह वह दशा है जिसमें सट्टे के लिए मुद्रा की माँग पूर्णतः लोचदार हो जाती है। यह पूर्ण तरलता पसंदगी की दशा है। जिसे प्रयोग दिए चित्र में से स्पष्ट किया जा सकता है। इस शब्दावली का प्रयोग प्रो० जे० एम० कीन्स द्वारा किया गया है।


98. किसी सरकार के प्रमुख कार्य क्या है ? (What are important functions of the government?)

उत्तर⇒ सरकार के प्रमुख कार्य—सरकार बहुत सारे प्रमुख कार्य करती है। सरकारी हस्तक्षेप से ही निजीकरण के दौर से पहले कई दशकों तक आर्थिक क्रियाओं के सभी क्षेत्रों में सरकारी हस्तक्षेप देखने को मिला। वर्तमान समय में अर्थ-व्यवस्था के प्रत्येक क्षेत्र में सरकार प्रमुख कार्य करती है। सरकार आर्थिक समस्याओं के समाधान के लिए कार्य करती है।

वर्तमान समय में विश्व में सरकार की प्रमुख भूमिका देखने को मिल रहा है।
सरकारी भूमिका में धनात्मक पहलू को देखा जा सकता है-

(i). बाजार शक्तियों का स्वतंत्र क्रियाशीलता से उत्पादकों के लाभ का अधिकतमीकरण . संभव होता है जिससे आर्थिक विकास दर को गति मिलती है।

(ii). सार्वजनिक क्षेत्र में सरकारी हस्तक्षेप से उत्पादन में वृद्धि होती है जिससे आर्थिक विकास संभव हो पाता है।
(iii). आत्मनिर्भरता के लिए सरकार विशेष पैकेजों द्वारा लोगों को आत्मनिर्भर बनाने की प्रक्रिया अपनायी है। इस तरह आर्थिक विषमता को दूर करने के लिए सरकार अहम भूमिका निभाती है।


99. आवश्यकताओं के दुहरा संयोग से आप क्या समझते हैं ?
(What do you understand by double coincidence of wants ?)

उत्तर⇒आवश्यकताओं के दुहरा संयोग-जब वस्तु विनिमय प्रणाली के अन्तर्गत विनिमय केवल उसी समय संभव हो सकता है जबकि व्यक्तियों के पास एक दूसरे की आवश्यकता की वस्तु हो और साथ ही वे आपस में एक-दूसरे से बदलने को तैयार हो परन्तु ऐसा संयोग सदा
संभव नहीं होता है। जैसे एक व्यक्ति चावल के बदले में कपड़ा चाहता है तो वह विनिमय तब ही कर सकेगा जबकि उसे ऐसा कोई व्यक्ति मिल जाए जिसके पास बदलने के लिए न केवल कपड़ा फालतू हो बल्कि जिसे चावल की भी आवश्यकता हो। व्यावहारिक जीवन में ऐसा दोहरा संयोग कठिनता से मिलता है।


100. सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति क्या है ? (What is marginal propensity to consume ?)

कुल परिवर्तनशील लागत

उत्तर⇒सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति कुल उपयोग स्तर में परिवर्तन कुल आय में परिवर्तन से अनुपात सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति कहलाता है।
कुशीहारा के अनुसार, “सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति उपभोग में होने वाले परिवर्तन तथा आय में होने वाला परिवर्तन का अनुपात है।”

Class 12 Economics Question 2022 लघु उत्तरीय प्रश्न ( 30 Marks ) PART – 6 Bihar Board Class 12 Economics Question 2022

101. औसत परिवर्तनशील लागत वक्र (Average Variable cost) की आकृति खींचें।
(Draw a figure of Average variable cost.)

koniye tribhuj

उत्तर⇒औसत परिवर्तनशील लागत कुल परिवर्तनशील लागत एवं उत्पादन की मात्रा का भागफल होती है।
अर्थात AVC = TVC/q


102.“माँग वक्र माँग के नियम का निरूपण है।” स्पष्ट करें। (Demand curve is a depiction of law of demand clarify.)

उत्तर⇒मॉग वक्र जब रेखा चित्र के रूप में प्रदर्शित कर दिया जाता है तब उस माग वक्र कहते है। यह माँग वक्र कीमत एवं माँगी गयी मात्रा के बीच एक विपरीत संबंध बताता है। इस विपरीत संबंध के कारण माँग वक्र बायें से दायें नीचे गिरता है, जो माँग के नियम का निरूपण करती है। अर्थात यह प्रदर्शित करता है कि ऊँची कीमत पर माँगी गयी मात्रा कम होगा एव कम कीमत पर माँगी गई मात्रा अधिक होगी।


103. एकाधिकार में माँग वक्र के आकार को बताएँ। (Mention shape of demand curve in Monopoly.)

chaturbhuj

उत्तर⇒एकाधिकार में माँग वक्र ऋणात्मक ढाल वाला होता है, अर्थात् दायीं ओर ढालू होता है। इस वक्र का दायीं ओर ढालू होना यह बताता है कि कीमत कम करने पर वस्तु की अधिक इकाइयाँ बेची जाती है। एकाधिकार में निकट स्थानापन्न न मिलने के कारण माँग कम लोचदार होता है। इसलिए यदि एकाधिकारी अपनी वस्तु की कीमत बढ़ाता है, तो क्रेताओं के सामने कोई स्थानापन्न वस्तु खरीदने का विकल्प नहीं होता है।  अतः कीमत बढ़ने पर वे उसी वस्तु को कम मात्रा में खरीदते हैं। फलस्वरूप माँग वक्र कम लोचदार होता है।


104. कॉफी की कीमत में वृद्धि चाय की माँग को किस प्रकार प्रभावित करेगी ? (How will an increase in the price of coffee affect the demand for tea ?)

उत्तर⇒कॉफी की कीमत में वृद्धि के परिणामस्वरूप चाय की माँग में वृद्धि हो जाती है। दोनों ही वस्तुएँ एक दूसरे की स्थानापन्न है, जो एक दूसरे के बदले एक ही उद्देश्य के लिए प्रयोग की जाती है। ऐसी वस्तुओं में जब एक वस्तु की कीमत में वृद्धि होती है तब अन्य बातें समान रहने की दशा में स्थानापन्न वस्तु की माँग में वृद्धि हो जाती है अर्थात् काफी की कीमत में वृद्धि की दशा में चाय की माँग में वृद्धि होगी।


105. साख नियंत्रण के मुख्य उद्देश्य क्या है? (What is main objectives of credit control ?)

उत्तर⇒साख नियंत्रण के मुख्य उद्देश्य निम्न हैं –

(i). कीमत स्थिरता स्थापित करना।
(ii). विदेशी विनिमय दर के स्थिरता लाना।
(iii). आर्थिक नियोजन को सफल बनाना।
(iv). उत्पादन एवं रोजगार वृद्धि के उपाय करना।


106. रेपो दर तथा रिवर्स रेपो दर क्या है ? (What is Repo Rate and Reverse Repo Rate ?)

उत्तर⇒रेपो दर वह दर है जिस पर देश का केंद्रीय बैंक अपने वाणिज्यिक बैंकों को अल्पकालीन ऋण प्रदान करता है।
रिवर्स रेपो दर वह दर है जिस पर वाणिज्यिक बैंक अपने आधिक्य कोषों को देश के केंद्रीय बैंक के पास जमा करके लाभ अर्जित करते हैं।


107. नकद कोषानुपात तथा साविधिक तरलता अनुपात में अंतर करें। (Distinguish between CRR and SLR.)

उत्तर⇒नकद कोष अनुपात और साविधिक तरलता अनुपात में अंतर यह है कि नकद कोष अनुपात का धन बैंकों को केंद्रीय बैंक के पास रखना पड़ता है जबकि साविधिक तरलता अनुपात की राशि व्यापारिक बैंक स्वयं अपने पास नकद रूप में या अन्य तरल परिसम्पतियों के रूप में रखते हैं।


108. उपभोग प्रवृत्ति क्या है ? (What is propensity to consume ?)

उत्तर⇒आय में वृद्धि पर उपभोग में कितनी वृद्धि होगी यह केन्स के अनुसार उपभोग प्रवृत्ति पर निर्भर करता है। इसी प्रकार आय के बढ़ने पर बचत में जो वृद्धि होती है उसे बचत प्रवृत्ति कहते हैं।


109. निम्न को परिभाषित करें –
(A). औसत उपभोग प्रवृत्ति (Average propensity to consume)
(B). औसत बचत प्रवृत्ति (APS)
(C). सीमांत बचत प्रवृत्ति (Marginal propensity to save)

कुल परिवर्तनशील लागत

उत्तर⇒ (A). औसत उपभोग प्रवृत्ति (Average propensity to consume) – आय का वह भाग जो उपभोग पर व्यय किया जाता है, उसे औसत उपभोग प्रवृत्ति कहते हैं।

कुल परिवर्तनशील लागत

(B) औसत बचत प्रवृत्ति (APS) – औसत बचत प्रवृत्ति एक अर्थव्यवस्था के आय तथा रोजगार के एक दिए हुए स्तर पर कुल बचत और कुल आय का अनुपात है।

(C) सीमांत बचत प्रवृत्ति (Marginal propensity to save) — आय में होने वाले परिवर्तन (∆y) के कारण बचत में होने वाले परिवर्तन (∆C) के अनुपात को सीमांत बचत प्रवृत्ति कहते हैं।

कुल परिवर्तनशील लागत

इस प्रकार सीमांत बचत प्रवृत्ति बचत में होने वाले परिवर्तन तथा आय में होने वाले परिवर्तन का अनुपात है।
(The marginal propensity to save is the ratio of change in saving to change in income.)


110. साख नियंत्रण के मात्रात्मक उपाय को बताएँ। (Explain tools of quantiative method of credit control.)

उत्तर⇒ (i). बैंक दर
(ii). खुले बाजार की क्रियाएं
(iii). नकद कोष अनुपात में परिवर्तन
(iv). साविधिक तरलता अनुपात में परिवर्तन


111. साख नियंत्रण के गुणात्मक उपाय बताएँ। (Explain qualitative methods of credit control.)

उत्तर⇒ (i). साख की राशनिंग
(ii). उपभोक्ता साख नियमन
(iii). सीमांत आवश्यकताओं में परिवर्तन
(iv). प्रत्यक्ष कार्यवाही
(v). नैतिक दबाव
(vi). प्रसार


112. पूँजी की सीमांत उत्पादकता या क्षमता क्या है? (What is marginal efficiency of capital ?)

उत्तर⇒पूँजी की सीमांत कुशलता किसी पूँजीगत पदार्थ की एक अतिरिक्त इकाई का प्रयोग करने से. है। उसकी लागत की तुलना में, मिलने वाले लाभ की अनुमानित दर है।
(Marginal efficiency of capital is expected rate of return of an additional unit of captial goods over itscost.)


113. प्रभावपूर्ण माँग क्या है? (What is effective demand ?)

उत्तर⇒जिस बिन्दु पर सामूहिक माँग और सामूहिक पूर्ति बराबर होते हैं उसे प्रभावपूर्ण माँग कहते हैं।


114. माँग की लोच को मापने का अनुपातिक रीति क्या है? (What is the proportionate method of Measuring elasticity of demand ?)

स्थायी संतुलन

उत्तर⇒ इस रीति का प्रतिपादन प्रो० फ्लक्स (Prof. Flux) ने किया। इस रीति के अनुसार, माँग की लोच का अनुमान लगाने के लिए माँग में होने वाले आनुपातिक या प्रतिशत परिवर्तन (Proportionate or percentage change in demand) को कीमत में होने वाले आनुपातिक या प्रतिशत परिवर्तन (Proportionate or Percentage change in price) से भाग कर दिया जाता है। इस विधि द्वारा माँग की लोच की माप निम्नलिखित सूत्रों की सहायता से ज्ञात होता है –
ed = (-) माँग में आनुपातिक या प्रतिशत परिवर्तन। कीमत में आनुपातिक या प्रतिशत परिवर्तन


115. राष्ट्रीय आय क्या है? (What is National income ?)

उत्तर⇒आय (लगान + मजदूरी + ब्याज तथा लाभ) तथा विदेशों से प्राप्त शुद्ध साधन आय का जोड़ साधन लागत पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद अथवा राष्ट्रीय आय कहलाता है। अर्थात् साधन लागत पर शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद (NNPFC) एक वर्ष में एक देश में सामान्य निवासियों द्वारा अर्जित कुल साधन आय का जोड़ है।


116. उपभोक्ता संतुलन से क्या अभिप्राय है ? (What is meant by consumer equilibrium ?)

उत्तर⇒ उपभोक्ता संतुलन का तात्पर्य एक उपभोक्ता उस समय संतुलन में होता है, जब वह अपनी दी हुई आय तथा बाजार कीमतों से प्राप्त संतुष्टि को अधिकतम कर लेता है।
उपभोक्ता संतुलन की स्थिति तब प्राप्त करता है. जब वह प्रति रुपया संतष्टि MUxIPx मुद्रा की सीमांत उपयोगिता MUM के बराबर हो जाती है अर्थात् MUxIPx = MUM


117. सामान्य वस्तु एवं गिफिन वस्तु के बीच अंतर स्पष्ट करें। (Distinguish between Normal goods & Giffin goods.)

उत्तर⇒सामान्य वस्तु तथा गिफिन वस्तु में निम्न अंतर इस प्रकार है –

Sl. Nसामान्य वस्तुगिफिन वस्तु
1.(i). सामान्य वस्तु वह वस्तु है जिस पर माँग का नियम लागू होता है।(i).  गिफिन वस्तु वह घटिया वस्तु है जिस पर माँग नियम लागू नहीं होता।
2.(ii).  सामान्य वस्तु की माँग वक्र का ढलान ऊपर से नीचे बायें से दायेंकी ओर होता है।(ii). गिफिन वस्तु की माँग की ढलान नीचे से ऊपर की ओर होता है।
3.(iii).  सामान्य वस्तु की आय प्रभाव धनात्मक(iii).  गिफिन वस्तु की आय प्रभाव ऋणात्मक होता है।

118. प्राथमिक घाटा क्या हैं ?(What is primary deficit ?)

उत्तर⇒ प्राथमिक घाटा राजकोषीय घाटे तथा भगतान किये जाने वाले ब्याज का अंतर है।
[ प्राथमिक घाटा या सकल प्राथमिक घाटा ] = [ राजकोषीय घाटा] – [ ब्याज भुगताना ]
प्राथमिक घाटा यह स्पष्ट करता है कि देश की सरकार को कितने ऋण की आवश्यकता है। सरकार को ब्याज के भुगतान के अतिरिक्त अपने और खर्च चलाने के लिए कितने ऋण की आवश्यकता है।


119. ‘एक दिष्ट अधिमान’ से आप क्या समझते हैं ? (What do you mean by ‘Monotonic preference’?)

उत्तर⇒ एक उपभोक्ता दो वस्तओं के विभिन्न बंडलों को अधिमान देता है जिसमें इन वस्तओं में से कम से कम एक वस्तु की अधिक मात्रा हो और दूसरे बंडल की तुलना में दूसरी वस्तु की मात्रा भी कम नहीं हो। यह स्थिति एक दिष्ट अधिमान की सूचक है।


120. आर्थिक समस्या क्यों उत्पन्न होती हैं ? (Why does in economic problem arise ?)

उत्तर⇒सीमित साधनों में असीमित आवश्यकताएँ आर्थिक समस्या को जन्म देती है। आवश्यकताओं में तीव्रता से अंतर होने के कारण साधनों का वैकल्पिक प्रयोग होने के कारण तथा चयन या चुनाव की समस्या भी आर्थिक समस्या या केंद्रीय समस्या को जन्म देती है।
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट होता है कि असीमित आवश्यकताएँ एवं सीमित साधन दो आधारभूत स्तंभ है जिन पर सभी आर्थिक समस्याओं का ढाँचा खड़ा है।


121. किसी वस्तु की पूर्ति’ एवं ‘stock’ में क्या अंतर हैं ? (What is difference between “supply’ and ‘stock’ of a goods ?)

उत्तर⇒स्टॉक वस्तु की वह मात्रा है जो किसी समय विशेष पर बाजार में विक्रेताओं के पास उपलब्ध है जबकि पूर्ति वह मात्रा है जिसे किसी निश्चित समय में तथा किसी निश्चित कीमत पर विक्रेता बेचने को तत्पर्य है यदि बाजार में वस्तु की कीमत कम है तो विक्रेता वस्तु का अधिक स्टॉक रखते हुए भी वस्तु की कम मात्रा बेचने को तैयार होंगे।

Class 12th Economics Question Paper 2022 ( दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर ) ( 20 Marks ) PART- 1


1. पूर्ण प्रतियोगिता में मूल्य निर्धारण कैसे होता है ? (How is price determination under perfect competition ?)

उत्तर⇒ मार्शल के अनुसार “पूर्ण प्रतियोगिता की स्थिति में किसी वस्तु का मूल्य उस वस्तु की माँग एवं पूर्ति की सापेक्षिक शक्तियों के द्वारा निर्धारित होती है।”
मार्शल के अनसार ही “कैंची की दोनों पत्तियों से कपडा काटने का काम होता है। किंत यह नहीं कहा जा सकता है कि इसमें से केवल ऊपर वाली या केवल नीचे वाली पत्ती ही कपड़ा काटने का काम कर रही है। उसी प्रकार यह भी नहीं कहा जा सकता कि मूल्य का निर्धारण अकेले केवल माँग (उपयोगिता) के द्वारा या अकेले केवल पूर्ति (उत्पादन लागत) के द्वारा ही होता है।
एक उदाहरण द्वारा देखा जा सकता है –

मूल्यवस्तु की माँगपूर्ति
10 रुपये200800
8 रुपये400600
5 रुपये500500
4 रुपये600400
2 रुपये800200
How is price determination under perfect competition ?).

उपर्युक्त उदाहरण से स्पष्ट है कि 5 रुपये के मूल्य पर माँग एवं पूर्ति दोनों 500 हो जाते हैं अर्थात् दोनों में संतुलन स्थापित हो जाते हैं।
चित्र द्वारा उपर्युक्त उदाहरण को देखा जा सकता है-चित्र में DD माँग की रेखा और SS पूर्ति की रेखा है। दोनों रेखाएँ आपस में Pबिंदु पर मिलती है। इस बिंदु पर माँग एवं पूर्ति दोनों बराबर दो जाते हैं। इसे साम्य बिंदु कहा जाता है और इस बिंदु पर जो मूल्य निर्धारित होता है उसे साम्य मूल्य कहा जाता है।
इस प्रकार पूर्ण प्रतियोगिता में किसी वस्तु का मूल्य उस वस्तु की माँग एवं पूर्ति की सापेक्षिक शक्तियों द्वारा इनके संतुलन बिंदु पर निर्धारित होता है। Download Question PDF


2. सीमांत उपयोगिता ह्रास नियम की व्याख्या करें। इस नियम के लागू होने के आवश्यक शर्त कौन-कौन सी है ? (Explain the law of Diminishing Marginal utility ? What are the necessary conditions for the operation of this law.)

उत्तर⇒ सीमांत उपयोगिता ह्रास नियम जिसे आवश्यकता संतुष्टि का नियम कहते हैं। इसका प्रतिपादन आस्ट्रियन अर्थशास्त्री गोसेन ने किया था। मनुष्य की आवश्यकताएँ अनंत होती हैं किंतु इनमें से किसी भी एक आवश्यकता विशेष की पूर्ण रूप से संतुष्टि की जा सकती है। आवश्यकताओं की इसी विशेषता पर उपभोग का प्रमुख नियम सीमांत उपयोगिता ह्रास नियम आधारित है।
सीमांत उपयोगिता ह्रास नियम के अनुसार, “अन्य बातें पूर्ववत रहने पर जैसे-जैसे किसी वस्तु की अतिरिक्त इकाइयों का उपभोग किया जाता है वैसे-वैसे उनसे प्राप्त होने वाली अतिरिक्त उपयोगिता क्रमशः घटती जाती है।”
मार्शल के अनुसार, “एक मनुष्य के पास किसी वस्तु की जितनी मात्रा हो उसमें निश्चित वृद्धि के फलस्वरूप उस व्यक्ति को जो अतिरिक्त उपयोगिता प्राप्त होती है वह उसकी मात्रा में होने वाली प्रत्येक वृद्धि के साथ कम होती जाती है।”

सीमांत उपयोगिता ह्रास नियम

सीमांत उपयोगिता ह्रास नियम को एक चित्र एवं तालिका द्वारा हम देख सकते हैं –

सीमांत उपयोगिता ह्रास नियम के लागू होने के आवश्यक शर्त एवं मान्यताएँ
(Necessary conditions for the application of law of diminishing utility or Assumptions)

(i). वस्तु का उपभोग लगातार में होना चाहिए।
(ii). वस्तु की उपभोग इकाइयों का आकार पर्याप्त होना चाहिए।
(iii). सभी वस्तु इकाइयों का आकार व बनावट में एकसमान अथवा समरूप होनी चाहिए।
(iv). वस्तु के उपलब्ध स्थानापन्नों का मूल्य स्थिर होना चाहिए।
(v). उपभोक्ता की आय एवं उपभोग प्रवृत्ति स्थिर होनी चाहिए।
(vi). उपभोक्ता के फैशन, रुचि एवं स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं होना चाहिए।


3. सम सीमांत उपयोगिता नियम क्या है ? (What is Law of Equi-Marginal Utility ?)

सीमांत उपयोगिता

उत्तर⇒ सम-सीमांत उपयोगिता नियम वास्तव में उपयोगिता ह्रास नियम पर आधारित है। सम-सीमांत उपयोगिता का नियम मार्शल के नाम से जाना जाता है।
मार्शल ने सम-सीमांत उपयोगिता नियम की व्याख्या करते हुए कहा है— “यदि एक व्यक्ति के पास कोई ऐसी वस्तु है जिसे वह अनेक प्रयोगों में ला सकता है तो वह इन प्रयोगों के बीच इस प्रकार वितरण करेगा ताकि सभी प्रयोगों में इसकी सीमांत उपयोगिता बराबर रहे।”
मार्शल ने एक ऐसी वस्तु का जिक्र किया है जिसका की प्रयोग अनेक कार्यों में किया जा सकता है।
जब उपभोक्ता एक से अधिक वस्तुओं पर व्यय करता है तो सम-सीमांत उपयोगिता नियम के अनुसार उपभोक्ता को विभिन्न वस्तुओं पर इस प्रकार खर्च करना चाहिए कि विभिन्न वस्तुओं की सीमांत उपयोगिताएँ उनके मूल्य के आनुपातिक हो। उदाहरण के लिए यदि उपभोक्ता अपनी आय को केवल तीन वस्तुओं A, B एवं C पर खर्च करता है तो सम-सीमांत उपयोगिता नियम के अनसार, उपभोक्ता को अधिकतम संतोष तब प्राप्त होगा जब

इस नियम की व्याख्या एक उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया जाता है। किसी उपभोक्ता के पास छः रुपये है जिसे वह A, B और C पर खर्च करना चाहता है। यह मान लिया जाता है कि इन तीनों वस्तुओं को प्रत्येक इकाई का मूल्य एक रुपया है। इन वस्तुओं से उपभोक्ता को जो सीमांत उपयोगिता मिलती है इसे निम्न तालिका द्वारा देखा जा सकता है –

वस्तुओं की इकाइयाँA की सीमांत उपयोगिताB की सीमांत उपयोगिताC की सीमांत उपयोगिता
1302515
2201510
31555
41033
5822

तालिका से स्पष्ट है कि तीनों वस्तुओं की क्रमागत इकाइयों से प्राप्त सीमांत उपयोगिता क्रमशः घटती जाती है क्योंकि सीमांत उपयोगिता ह्रास नियम लागू होता है।

सम-सीमांत उपयोगिता

सम-सीमांत उपयोगिता नियम को चित्र द्वारा देखा जा सकता है-


4. कुल स्थिर लागत, कुल परिवर्तनशील लागत और कुल लागत का क्या अर्थ है ? इनके संबंध को समझाएं। (What are total fixed cost, total variable cost and total cost ? How are they related ?) .

कुल स्थिर लागत, कुल परिवर्तनशील लागत और कुल लागत का क्या अर्थ है

उत्तर⇒ स्थिर लागत उत्पादन के आकार से अप्रभावित रहती है। उत्पादन स्तर शून्य होने पर भी उत्पादक को स्थिर लागतों का भुगतान वहन करना पड़ता है। चित्र द्वारा देख सकते हैं –चित्र में उत्पादन स्तर Oq अथवा Oq1 पर स्थिर लागत OK ही है। यही कारण है कि अल्पकाल में कुल स्थिर लागत रेखा X-अक्ष के समानान्तर एक पड़ी रेखा के रूप में होती है।

कुल परिवर्तनशील लागत

कुल परिवर्तनशील लागत – परिवर्तनशील लागत का आकार उत्पादन की मात्रा पर निर्भर करता है। जैसे-जैसे उत्पादन के आकार के वृद्धि होती है। वैसे-वैसे परिवर्तनशील लागतों में भी वृद्धि होती है।चित्र द्वारा देख सकते हैं-

(Total variable cost)

चित्र में TVC (Total variable cost) रेखा दिखाई गई है। शन्य उत्पादन स्तर पर परिवर्तनशील लागत शून्य होती है। चित्र में q1, q2, q3, q4, q5 उत्पादन स्तरों पर कुल परिवर्तनशील लागते क्रमशः k1q2, k2q2, k3q3, k4q4, k5q5, प्रदर्शित करती है जिससे स्पष्ट है कि TVC उत्पादन के आकार के साथ-साथ बढ़ती है।
कुल लागत (Total cost)
अल्पकाल में,
कुल लागत = कुल स्थिर लागत + कुल परिवर्तनशील लागत
TC = TFC + TVC

चित्र में TFC एवं TVC रेखाओं को जोड़कर कुल लागत रेखा प्राप्त की गई है।TC और TVC रेखाएँ परस्पर समानान्तर रूप से आगे बढ़ती है क्योंकि TC और TVC का अंतर TFC को बताता है और TFC सदा स्थिर होती है।


5. कुल आगम, सीमान्त आगम और औसत आगम को उदाहरण देकर समझाइए। (Explain Total Revenue, Marginal Revenue and Average Revenue with the help of illustrations.)

उत्तर⇒ कुल आगम (Total Revenue) – किसी फर्म का कुल आगम वस्तु की एक इकाई कीमत तथा कुल विक्रय की गयी इकाइयों के गुणनफल द्वारा प्राप्त किया जाता है।
कुल आगम = कुल बिक्री से प्राप्त राशि = बिक्री इकाइयाँ x प्रति इकाई मूल्य
उदाहरण—एक विक्रेता वस्तु की एक इकाई Rs. 10 में बेचता है और यदि वह कुल 500 इकाइयाँ बेचता है तब इस दशा में कुल आगम = 10 x 500 = Rs. 5000

MR = ∆(TR)/∆Q

सीमांत आगम (Marginal Revenue)—उत्पादक या फर्म को, वस्तु की एक अतिरिक्त इकाई की बिक्री में जो अतिरिक्त आगम प्राप्त होता है, उसे सीमांत आगम कहते हैं।
यदि TRn-1 = (n-1) इकाइयों से प्राप्त कुल आगम
TRn = n इकाइयों से प्राप्त कुल आगम
MRn = TRn – TRn-1

औसत आगम (Average Revenue) — औसत आगम से मतलब उत्पादन की प्रति इकाई बिक्री से प्राप्त होने वाला आगम। इस प्रकार कुल आगम की बिक्री की गई इकाइयों की संख्या से भाग देने पर औसत आगम प्राप्त होता है।

AR= TR/Q
औसत आगम सदा वस्तु की प्रति इकाई की कीमत को व्यक्त करता है।


6. औसत लागत तथा सीमांत लागत के आपसी संबंध की चित्र की सहायता से व्याख्या करें। (Explain the relationship between Average cost and Marginal cost with the help of diagram.)

औसत लागत

उत्तर⇒ औसत लागत (Average cost) औसत लागत से मतलब प्रति इकाई उत्पादन लागत से है। औसत लागत जानने के लिए कुल लागत को कुल उत्पादित इकाइयों से भाग कर दिया जाता है। जैसे—10 टेबुल की कुल उत्पादन लागत 1000 रु० है तो

सीमांत लागत (Marginal cost) — वस्तु की एक अतिरिक्त इकाई उत्पन्न करने से कुल लागत में जो वृद्धि होती है उसे सीमांत लागत कहते हैं।

औसत लागत और सीमान्त लागत में संबंध – सीमांत लागत, औसत लागत में परिवर्तन लाता है न कि औसत लागत, सीमान्त लागत में परिवर्तन लाता है। औसत लागत और सीमान्त लागत दोनों कुल लागत से निकाले जाते हैं । कुल लागत को समस्त इकाइयों से भाग देकर औसत लागत निकाला जाता है वहां एक अतिरिक्त इकाई के उत्पादन से कुल लागत में होने वाली वृद्धि सीमांत लागत होती है। अतः यदि सीमांत लागत गिरती है तो यह औसत लागत को गिराती है और यदि सीमांत लागत बढ़ती है तो औसत लागत को ऊपर खींचती है जिससे औसत लागत बढ़ती है।

औसत लागत

औसत लागत तथा सीमांत लागत के संबंध को चित्र द्वारा देखा जा सकता है –
चित्र से स्पष्ट है कि –
(i). जब तक MC, AC से कम है, तब तक AC वक्र गिरता है और MC वक्र, AC वक्र को उसके न्यूनतम बिन्दु पर काटने से पहले नीचे गिरता है (चित्र में B बिन्दु तक )(ii). जब MC वक्र गिरता है तो AC वक्र की तुलना में अधिक तेजी से गिरकर अपने न्यूनतम बिन्दु E पर पहुँच जाता है। उसके बाद MC वक्र E से B तक बढ़ता जाता है जबकि AC वक्र D से B तक अभी भी गिर रहा होता है।

(iii).उठता हुआ MC वक्र, AC वक्र को इसके न्यूनतम बिन्दु B पर काटकर ऊपर बढ़ता जाता है क्योंकि MC वक्र, AC वक्र के ऊपर है।


7. अर्थव्यवस्था के प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्रों से आप क्या समझते हैं ? (What do you mean by primary sector, secondary sector and tertiary sector.)

उत्तर⇒ एक अर्थव्यवस्था की विभिन्न उत्पादकीय पहचान तथा वर्गीकरण है। विशाल दृष्टिकोण से एक अर्थव्यवस्था को निम्न भागों में वर्गीकरण किया जा सकता है—
(1). प्राथमिक क्षेत्र
(ii). द्वितीयक क्षेत्र या गौण क्षेत्र
(iii). तृतीयक क्षेत्र।

(1). प्राथमिक क्षेत्र – अर्थव्यवस्था के प्राथमिक क्षेत्र वह क्षेत्र है जो प्राकृतिक साधनों जैसे — भूमि, वन, खनन आदि साधनों का शोषण करके उत्पादन पैदा करता है। इसमें सभी कृषि तथा उससे संबंधित क्रियाएँ जैसे मछली पालन, वन तथा खनन का उत्पादन शामिल किया जाता है।

(ii). द्वितीयक क्षेत्र या गौण क्षेत्र – अर्थव्यवस्था के द्वितीयक क्षेत्र या गौण क्षेत्र को निर्माण क्षेत्र भी कहा जाता है। यह एक प्रकार की वस्तु को मनुष्य, मशीन तथा पदार्थों द्वारा दूसरी वस्तु में बदलता है। उदाहरण के रूप में हम कह सकते हैं कपास से कपड़ा बनाना अथवा गन्ने से चीनी बनाना आदि।

(iii). तृतीयक क्षेत्र – अर्थव्यवस्था के इस क्षेत्र को सेवा क्षेत्र भी कहा जाता है। सेवा क्षेत्र प्राथमिक तथा गौण क्षेत्र को सेवाएँ प्रदान करता है। इसमें बैंक, बीमा, यातायात, संचार, व्यापार तथा वाणिज्य आदि को शामिल किया जाता है।

प्राथमिक क्षेत्र, द्वितीयक क्षेत्र और तृतीयक क्षेत्र में अंतर को हम इस प्रकार देख सकते हैं –

(i). प्राथमिक क्षेत्र में प्राकृतिक साधनों का शोषण करता है तथा इससे वस्तुएँ तथा सेवाएँ पैदा किया जाता है जबकि द्वितीयक क्षेत्र एक वस्तु को दूसरी वस्तु में परिवर्तन करता है जिससे उपभोक्ताओं को अधिक संतुष्टि मिलती है और तृतीयक क्षेत्र प्राथमिक तथा द्वितीयक क्षेत्र के कार्यों को सफलतापूर्वक चलाने में सहायता करता है।

(ii). प्राथमिक क्षेत्र में असंगठित तथा परंपरागत तरीके अपनायी जाती है जबकि द्वितीयक क्षेत्र सिर्फ संगठित तकनीक अपनाती है और तृतीयक क्षेत्र संगठित या आधुनिक तकनीक अपनाती है।

(iii). प्राथमिक क्षेत्र में श्रम विभाजन की कोई संभावना नहीं होती है जबकि द्वितीयक क्षेत्र में उत्पादन के लिए जटिल श्रम विभाजन आवश्यक होता है और तृतीय क्षेत्र जटिल तथा भौगोलिक श्रम विभाजन का प्रयोग करता है।

(iv). प्राथमिक क्षेत्र को कृषि तथा संबंधित क्षेत्र के नाम से जाना जाता है जबकि द्वितीयक क्षेत्र को निर्मित क्षेत्र और तृतीयक क्षेत्र को सेवा क्षेत्र के नाम से जाना जाता है।


8. अर्थव्यवस्था के केंद्रीय समस्याओं का उल्लेख करें। (Discuss the central problems of an economy.)

उत्तर⇒ अर्थव्यवस्था से मतलब उस आर्थिक प्रणाली से है जिसके द्वारा समाज की समस्त आर्थिक क्रियाओं का संचालन किया जाता है। प्रत्येक देश किसी न किसी आर्थिक प्रणाली पर आधारित है। आर्थिक प्रणाली के प्रमुख रूप हैं—पूँजीवाद और समाजवाद एवं मिश्रित अर्थव्यवस्था। आर्थिक प्रणाली में भिन्नता के अनुसार अर्थव्यवस्था का संचालन अलग-अलग होता है किंतु साध नों की सीमितता एवं उनके वैकल्पिक प्रयोगों तथा आवश्यकताओं की अनन्तता के कारण ही साध नों एवं साध्यों के बीच उपयुक्त तालमेल बैठाने की समस्याएँ प्रत्येक आर्थिक प्रणाली में विद्यमान रहती है जिसे हम अर्थव्यवस्था की केंद्रीय समस्याएँ कहते हैं। केंद्रीय आर्थिक समस्या को चार मौलिक आर्थिक समस्याओं में बाँटा गया है।

(i). क्या उत्पादन करना है तथा कितनी मात्रा में अर्थव्यवस्था के केंद्रीय समस्याओं में सबसे प्रमुख समस्या यह है कि प्रत्येक समाज को यह निर्णय लेना होता है कि कौन-सा माल का उत्पादन करना तथा कितनी मात्रा में उत्पादन करना है।

(ii). कैसे उत्पादन करना है—अर्थव्यवस्था के दूसरी प्रमुख केंद्रीय समस्या यह उत्पन्न होती है कि वस्त का उत्पादन कैसे करना है। किसी वस्तु के उत्पादन की अनेक वैकल्पिक तकनीक है। उत्पादन में तकनीक के चुनाव की मुख्य समस्या होती है। उत्पादन की तकनीक दो प र होती है—(A) श्रम प्रधान तकनीक (B) पूँजी प्रधान तकनीक। श्रम प्रधान तकनीक में श्रम का अधिक मात्रा में किया जाता है। जबकि पूँजी प्रधान तकनीक में पूँजी का अधिक प्रयोग होता

(iii). केंद्रीय समस्या का तीसरा प्रमुख समस्या यह भी है कि किसके लिए उत्पादन किया जाए। इस समस्या में यह महत्त्वपूर्ण बात सामने आती है कि उत्पादन के बाद वितरण कैसे किया जाए।

(iv)आर्थिक विकास के लिए क्या-क्या प्रावधान किये जाने चाहिए ? अर्थव्यवस्थाके केंद्रीय समस्या में यह भी एक प्रमुख समस्या है कि आर्थिक विकास के लिए कौन-कौन से प्रावधान किया जाए जिससे अर्थव्यवस्था में आर्थिक विकास हो। इसके लिए समाज को यह निर्णय लेना होता है कि कितनी बचत तथा निवेश भविष्य की प्रगति के लिए किया जाना चाहिए ताकि आर्थिक विकास हो सके।


9. उत्पादन फलन क्या है? इसकी प्रमुख विशेषताएँ बतलाएँ। (What is Production function ? Discuss the main characteristics?)

उत्तर⇒ उपादानों एवं उत्पादनों के फलनात्मक संबंध को उत्पादन फलन कहा जाता उत्पादन फलन हमे यह बताता है कि समय की एक निश्चित अवधि में उपादानों के परिवर्तन से उत्पादन आकार में किस प्रकार और कितनी मात्रा में परिवर्तन होता है। इस प्रकार उपादानों की मात्रा और उत्पादन की मात्रा के मौलिक संबंध को उत्पादन फलन कहते हैं। उत्पादन केवल भौतिक मात्रात्मक संबंध पर आधारित है। इसमें मूल्यों का समावेश नहीं होता है।
गणितीय रूप में उत्पादन फलन,
Qx = f(A, B, C, D)
वाट्सन के शब्दों में, “एक फर्म के भौतिक उत्पादन और उत्पादन के भौतिक साधनों के संबंध को उत्पादन फलन कहा जाता है।”

मान्यताएँ – उत्पादन फलन निम्न मान्यताओं पर आधारित है-
(i). उत्पादन फलन का संबंध किसी निश्चित समयावधि से होता है।
(ii). दीर्घकाल में उत्पादन फलन के सभी उपादान परिवर्तनशील होते हैं।
(iii). अल्पकाल में तकनीकी स्तर में कोई परिवर्तन नहीं होता है।
(iv). उत्पादन फलन के सभी उत्पादन अल्पकाल में परिवर्तन नहीं किये जा सकते हैं।

उत्पादन फलन की विशेषताएँ – उत्पादन फलन की निम्न विशेषताएँ हैं –
(i). उत्पादन फलन उत्पत्ति के साधनों एवं उत्पादन के भौतिक मात्रात्मक संबंध को बताता है।
(ii). उत्पादन फलन में उपादानों एवं उत्पादन की कीमतों का कोई समावेश नहीं होता है।
(iii). उत्पादन फलन का संबंध एक समयावधि से होता है।
(iv). उत्पादन फलन स्थिर तकनीकी दशा पर आधारित है।
(v). जब फर्म अपने उत्पादन फलन के कंछ उपादानों को स्थिर रखती है।
(vi). फर्म दीर्घकाल में जब सभी उपादानों को परिवर्तित कर देती है तब ऐसे उत्पादन फलन को दीर्घकालीन उत्पादन फलन अथवा पैमाने के प्रतिफल कहते हैं।
(vii). उत्पादन फलन उत्पादन का तकनीकी सारांश प्रस्तुत करता है।


10. सर्वाधिक संतुष्टि के लिए उपभोक्ता वस्तुओं के किस बंडल का चुनाव करता है ? अधिमान वक्र द्वारा दर्शायें। (Which bundle of goods consumer chooses for maximization of satisfaction? Show with the help of indifference curves.)

 औसत लागत.
स्थायी संतुलन

उत्तर⇒ सर्वाधिक संतुष्टि के लिए बंडलों का चुनाव एक उपभोक्ता सर्वाधिक संतष्टि के लिए उस बंडल का चनाव करता है जब उपभोक्ता संतुलन की अवस्था तक होता है जब अपनी सीमित आय की सहायता से वस्तुओं को उनकी दी गयी कीमतों पर खरीदकर अधिकतम संतुष्टि प्राप्त करने में सफल हो जाता है। उपभोक्ता की कीमत रेखा उसकी आय एवं उपभोग वस्तुओं की कीमतों से निर्धारित होता है। इस कीमत रेखा के साथ उपभोक्ता अधिकतम ऊँचे अधिमान वक्र तक पहुंचने का प्रयास करता है।
अधिमान वक्र विश्लेषण में उपभोक्ता के संतुलन की दो शर्त है –
(1). अधिमान वक्र कीमत रेखा का स्पर्श करे (Price Line should be tangent to Indifference Curve) अर्थात् मात्रात्मक रूप में X वस्तु की Y वस्तु के लिए सीमांत प्रतिस्थापन दर X तथा Y वस्तुएं की कीमतों के अनुपात के बराबर हो।चित्र द्वारा देख सकते हैं –

स्थायी संतुलन

चित्र में संतुलन बिन्दु E पर कीमत रेखा ढाल = अधिमान वक्र का ढाल

(2). स्थायी संतुलन के लिए सन्तुलन बिन्दु पर अधिमान वक्र मूल बिंदु की ओर उन्नतोदर होती है
चित्र द्वारा देख सकते हैं-

चित्र में K बिंदु पर संतुलन की स्थिति स्थायी नहीं है क्योंकि K बिंदु पर MRSXY, बढ़ती हुआ है। बिंदु E अंतिम संतुलन का बिंदु है जहाँ MRSXY घटती हुई है।

Class 12th Economics Question Paper 2022 Economics ( दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर ) ( 20 Marks ) PART- 2

11. वर्धमान पैमाने का प्रतिफल क्या है? समझाइये।(What is increasing returns to goals ? Explain.)

 उत्तर

उत्तर⇒ वर्धमान पैमाने का प्रतिफल लागत की दृष्टि से बढ़ते प्रतिफल के नियम को लागत ह्रास नियम भी कहा जाता है। बढ़ते प्रतिफल नियम के अंतर्गत परिवर्तनशील साधन की मात्रा को बढ़ाने से सीमान्त उत्पादकता में वृद्धि होती है जिसके कारण औसत लागत एवं सीमांत लागत घटना आरंभ कर देती है। बढ़ते तथा घटती लागतें वस्तुत: स्थिर कीमतों के अंतर्गत समान ही है इसलिए बढ़ते प्रतिफल नियम को घटती लागत नियम भी कहते हैं।
बढ़ते प्रतिफल नियम में जब औसत लागत (AP) बढ़ता है तब सीमांत उत्पादन (MP) उससे अधिक तेजी से बढ़ता है।
लागत के शब्दों में जब औसत लागत (AC) गिरता है तो सीमांत लागत (MC) उससे अधिक तेजी से गिरती है।


12. एक फर्म के पूर्ति की लोच क्या है? उदाहरण द्वारा समझाइये । (What is firm’s elasticity of supply? Explain with example.)

उत्तर⇒ “पूर्ति की लोच किसी वस्तु की कीमत में प्रतिशत परिवर्तन के कारण पूर्ति में होने वाले प्रतिशत परिवर्तन की आय है।”
यदि किसी वस्तु की पूर्ति का उसकी कीमत बढ़ने-घटने से काफी विस्तार-संकुचन हो जाए तो उसे वस्तु की पूर्ति की कीमत लोच कहते हैं।
परन्तु कोई फर्म ऐसी वस्तु का उत्पादन करती है जिनकी पूर्ति पर उनकी कीमत का कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता है अर्थात् चाहे उनकी कीमत बढ़ जाए या कम हो जाए उनकी पूर्ति नहीं बदलती है और उतनी ही रहती है या बहुत थोड़ी बदलती है। ताजे दूध का उदाहरण हम ले सकते है। जो ताजा दूध बाजार में आ चुका है, उसे तो बेचना ही पड़ेगा चाहे कीमत भले ही बहुत कम हा गई हो। दूध ऐसी वस्तु नहीं है कि गेहूँ की तरह गोदाम में इस विचार से रखा जाए कि कीमत बढ़न पर बेचा जाएगा। अत: नश्वर, यानी जल्दी खराब होने वाली वस्तुओं जैसे दूध, ताजे फल, साब्जया की पूर्ति अथवा ऐसी वस्तुओं की पूर्ति जिन्हें बनाने के लिए बहुत पूँजी आदि अधिक समय चाहिए पूर्ति की लोच बेलोचदार होती है।
फर्म द्वारा निर्मित वस्तुओं की पूर्ति अपेक्षाकृत मूल्य सापेक्ष होती है। कारखाने में मालिक अपनी वस्तु की मांग बढ़ने पर अपने कारखाने में एक पारी की बजाय दो पारी कर देते हैं और यदि आवश्यकता हुई फर्म चार पारी (Shift) भी कर देते हैं। इस प्रकार पूर्ति को काफी बढ़ाया जा सकता है। मांग घट जाने पर भी पूर्ति की पारी कम करके अथवा मजदूरों को हटाकर घटाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त कारखाना उद्योगों में उत्पादन की मौसम. वर्षा आदि जैसे प्राकतिक तत्त्वों पर निर्भरता बहुत कम होती है। इस प्रकार फर्म की. पूर्ति लोच में निर्मित वस्तुओं की पूर्ति अधिक लोचदार या लोचदार होती है।


13. माँग को प्रभावित करने वाले तत्त्वों को बताएँ। (Explain factors affecting demand.)

उत्तर⇒ माँग को प्रभावित या निर्धारित करने वाले प्रमुख तत्त्व –

(i). वस्तु की उपयोगिता – उपयोगिता का मतलब होता है आवश्यकता पूर्ति की क्षमता। एक दी गई समयावधि में वस्तु की माँग का आकार इस बात पर निर्भर करता है कि मनुष्य की आवश्यकता पूर्ति की वस्तु में कितनी क्षमता है। अधिक उपयोगिता वाली वस्तु की माँग अधिक होगी तथा इसके विपरीत कम उपयोगिता वाली वस्तु की माँग कम होगी।

(ii) आय स्तर – आय स्तर का माँग पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। उपभोक्ता की आय जितनी अधिक होगी उसकी माँग उतनी ही अधिक होगी तथा उसकी आय का स्तर कम स्तर उसकी माँग को कम कर देगी।

(iii). धन का वितरण – समाज में धन के वितरण का भी माँग पर प्रभाव पड़ता है।

(iv). वस्तु की कीमत – वस्तु की कीमत माँग को मुख्य रूप से प्रभावित करती है। कम कीमत पर वस्तु की अधिक माँग तथा अधिक कीमत पर वस्तु की कम माँग होती है।

(v). संबंधित वस्तुओं की कीमतें – संबंधित वस्तुएँ दो प्रकार की होती है—
(a) स्थानापन्न वस्तुएँ—ऐसी वस्तुएँ जिनका एक-दूसरे के बदले प्रयोग किया जाता है जैसे—चीनी-गुड़, चाय-कॉफी आदि।
(b) पूरक वस्तुएँ – ऐसी वस्तुएँ जिनका उपयोग एक साथ किया जाता है, जैसे कार-पेट्रोल, स्याही-कलम. डबल रोटी-मक्खन आदि।
स्थानापन्न वस्तुओं में एक वस्तु की कीमत का परिवर्तन दूसरी वस्तु की माँग को विपरीत दिशा में प्रभावित करता है तथा पूरक वस्तुओं में एक वस्तु के कीमत परिवर्तन के कारण दूसरी वस्तु की माँग समान दिशा में बदलती है।

(vi). रुचि, फैशन आदि – वस्तु की माँग पर उपभोक्ता की रुचि, उसकी आदत, प्रचलित फैशन आदि का भी प्रभाव पड़ता है। किसी वस्तु विशेष का समाज में फैशन होने पर निश्चित रूप से उसकी माँग में वृद्धि होगी।

(vii). भविष्य में कीमत परिवर्तन की आशा – सरकारी नियंत्रण, देशी विपत्ति की आशंका, युद्ध संभावना आदि अनेक अप्रत्याशित एवं प्रत्याशित घटकों का भी वस्तु की माँग पर प्रभाव पड़ता है।
इसके अतिरिक्त, जनसंख्या परिवर्तन, व्यापार की दिशा में परिवर्तन, जलवायु, मौसम आदि का भी वस्तु की माँग पर प्रभाव पड़ता है।


14. माँग के नियम की व्याख्या करें। उसकी मान्यताओं को लिखें।(Explain the law of demand.What are its assumptions?)

उत्तर⇒ माँग का नियम किसी वस्त की कीमत तथा उसकी माँग के विपरीत संबंध को बताता है। यह नियम यह बताता है कि “अन्य बातों के समान रहने पर वस्तु की कीमत तथा वस्तु की मात्रा में विपरीत संबंध पाया जाता है।”
इस प्रकार अन्य बातों के समान रहने की दशा में किसी वस्तु की कीमत में वृद्धि होने पर उसकी माँग में कमी हो जाती है तथा इसके विपरीत कीमत में कमी होने पर वस्तु की माँग में वृद्धि हो जाती है।
मार्शल के अनुसार, “मूल्य में कमी होने से माँग की मात्रा बढ़ती है तथा मूल्य में वृद्धि होने से माँग की मात्रा कम होती है।”
The amount demanded increase with a fall in price and diminishes with a rise in price.

माँग के नियम को हम उदाहरण द्वारा स्पष्ट कर सकते हैं-

गेहूँ की कीमतवस्तु की माँग (प्रति किलो)
4 रुपये2 किलो
3 रुपये3 किलो
2 रुपये5 किलो

तालिका से स्पष्ट है कि जैसे-जैसे बाजार में गेहूँ की कीमत में कमी आती जाती है वैसे गेहूँ की माँग में वृद्धि होती जाती है। जब गेहूँ की कीमत प्रति किलो 4 रुपया है तो गेहूँ की मांग 2 किलो है, परन्तु जब गेहूँ की कीमत घटकर 2 रुपये प्रति किलो हो जाती है तो गेहूँ की माँग बढ़कर 5 किलो हो जाती है इस प्रकार गेहूँ की कीमत घटने पर गेहूँ की माँग में लगातार वृद्धि होती चली जाती है।

माँग के नियम की मान्यताएँ (Assumptions) – माँग के नियम की क्रियाशीलता कुछ मान्यताओं पर आधारित है –

(i). उपभोक्ता की आय में कोई परिवर्तन नहीं होनी चाहिए (Consumer’s income should remain constant)

(ii). उपभोक्ता की रुचि, स्वभाव, पसंद आदि में कोई परिवर्तन नहीं होनी चाहिए (Consumer’s taste, nature etc. should remain constant)

(iii). संबंधित वस्तुओं की कीमतों में कोई परिवर्तन नहीं होनी चाहिए (Prices of related goods should remain constant)

(iv). किसी नवीन स्थानापन्न वस्तु का उपभोक्ता को ज्ञान नहीं होना चाहिए (Consumer’s remains unknown with a new substitute)

(v). भविष्य में वस्तु की कीमत में परिवर्तन की संभावना नहीं होनी चाहिए (No possibility of price change in future)


15. अत्यधिक माँग का अर्थ समझाएँ। क्या यह मुद्रा स्फीति उत्पन्न करती है ? (Explain the Meaning of Excess Demand. Does it create inflation?)

उत्तर⇒ यदि अर्थव्यवस्था में सामूहिक माँग एवं सामूहिक पूर्ति में संतुलन पूर्ण रोजगार स्तर के बा ॥ है तो यह अत्यधिक या अतिरेक माँग की स्थिति होती है। हम यँ कह सकते हैं कि अतिरेक माँग या अधिक माँग तब उत्पन्न होती है जब सामूहिक माँग पूर्ण रोजगार स्तर पर सामूहिक पूर्ति से अधिक होती है। इस प्रकार “अतिरेक माँग या अत्यधिक माँग वह दशा है जिसमें सामूहिक माँग अर्थव्यवस्था में पूर्ण रोजगार के लिए आवश्यक सामूहिक पूर्ति से अधिक होती है।
Excess Demand refers to a situation in which aggregate demand becomes excess of aggregate supply corresponding to full employment in the economy.
अतिरेक माँग (Excess Demand)
AD>AS
अतिरेक माँग की इस स्थिति में सामूहिक माँग पर्याप्त माँग से अधिक होगी फलतः मांग में वृद्धि की रोजगार और उत्पादन के स्तर पर कोई प्रतिक्रिया नहीं होगी क्योंकि सभी साधनों को पहल ही पूर्ण रोजगार मिल चुका है। ऐसी स्थिति में जबकि सामूहिक माँग (AD) सामूहिक पूर्ति (AS) से अधिक हो जाती है, वस्तुओं एवं सेवाओं की कीमतें बढ़ने लगती है जिससे मुद्रा स्फीति (inflation) की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

सुधार के लिए मौद्रिक उपाय – अतिरेक माँग के सुधार के लिए निम्न मौद्रिक उपायों को किए जा सकते हैं-

(i). बैंक दर को बढ़ाया जाना चाहिए ताकि साख विस्तार को संकुचन किया जा सके और माँग में कमी हो सके।
(ii). केंद्रीय बैंक को खुले बाजार में प्रतिभूतियों को बेचनी चाहिए ताकि अर्थव्यवस्था में क्रयशक्ति कम हो।
(iii). नकद कोष अनुपात में वृद्धि की जानी चाहिए ताकि साख का कम विस्तार हो।
(iv). तरलता अनुपात को बढ़ाया जाना चाहिए ताकि साख के विस्तार को कम किया जा सके।

इस प्रकार अत्यधिक माँग को ठीक करने के लिए महँगी मौद्रिक नीति अपनायी जाती है। उसके अनेक उपायों द्वारा साख की उपलब्धता को महँगा एवं दुर्लभ बनाने के प्रयास किए जाते हैं। साख महँगी होने के कारण लोग उधार लेने एवं व्यय करने के लिए हतोत्साहित होते हैं फलस्वरूप सामूहिक माँग में कमी आती है तथा अतिरेक माँग को ठीक करने में सहायता मिलती है।


16. एकाधिकारी के लाभ अधिकतमीकरण की क्या शर्ते हैं? चित्र द्वारा समझाइये। (What are the conditions of profit maximization of monopolist? Explain using diagram.)

उत्तर⇒ (1). एकाधिकारी वस्तु की अतिरिक्त इकाइयां उत्पादित करता चला जाता है जब तक कि सीमांत आय (MR), सीमांत लागत (MC) से अधिक होती है।

उपभोक्ता के लिए उपभोग सीमा निर्धारित करती है।

(2). एकाधिकारी के अधिकतम लाभ उस आय (MR) सीमांत लागत के बराबर होंगे।
एक चित्र द्वारा देखा जा सकता है –

रेखाचित्र में, उत्पादन स्तर OM पर ही सीमांत आय और सीमांत लागत बराबर है क्योंकि OM के लम्बवत ऊपर बिन्दु E पर ही सीमांत लागत (MC) और सीमांत आय (MR) एक दूसरे को काटते हैं। यदि एकाधिकारी OM मात्रा से कम उत्पादित करता है तो उसे लाभ कम होंगे। इसके विपरीत यदि वह OM से अधिक उत्पादन करता है तो सीमांत लागत (MC) सीमांत आय से अधिक होगी जिससे वह OM से अतिरिक्त इकाइयों पर हानि उठा रहा होगा। अतः उत्पादन मात्रा OM पर ही उसे अधिकतम लाभ प्राप्त होंगे और इस स्तर पर ही वह सन्तलन में होगा। चित्र से स्पष्ट है कि वस्तु की OM मात्रा बेचने से एकाधिकारी को MS अथवा OP कीमत प्राप्त होगी। उसके द्वारा अर्जित कुल लाभ HTSP के क्षेत्रफल के बराबर है।


17. प्रभावी माँग क्या है? इससे देश के आय/ उत्पादन का निर्धारण कैसे होता है ?
(What is effective demand ? How does it determine a country’s incomel output?)

स्थायी संतुलन

उत्तर⇒ प्रभावी माँग
आय के भिन्न-भिन्न स्तरों पर मांग के भिन्न-भिन्न स्तर होते हैं परंतु माँग के ये सभी स्तर प्रभावपूर्ण नहीं होते हैं अर्थात् ये सभी स्तर प्रभावपूर्ण माँग को नहीं दर्शाती हैं। केवल वही माँग जो पूर्ति द्वारा संतुलित होती, प्रभावपूर्ण मांग कहलाती है। या हम कह सकते हैं कि कुल मांग और कुल पूर्ति का कटाव बिंदु प्रभावपूर्ण मांग का बिंदु कहलाता है।
लार्ड केन्स ने अपनी पुस्तक ‘General Theory of Employment, Interest and Money जो 1936 में प्रकाशित हुई, इस पुस्तक में लार्ड केन्स के रोजगार सिद्धांत के अनुसार पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में अल्पकाल में कुल उत्पादन अथवा राष्ट्रीय आय रोजगार के स्तर पर निर्भर करता है क्योंकि अल्पकाल में उत्पादन के अन्य साधन जैसे-पूँजी, तकनीक आदि स्थिर रहते हैं। रोजगार का स्तर प्रभावपूर्ण मांग पर निर्भर करता है। प्रभावपूर्ण माँग सामुहिक माँग के उस स्तर को कहते हैं जिस पर वह सामूहिक पूर्ति के बराबर होती है।
केन्स के अनुसार एक अर्थव्यवस्था में आय/ रोजगार एवं उत्पादन का निधारण उस बिदु पर होता है जहाँ सामूहिक माँग और सामूहिक पूर्ति आपस में बराबर होते हैं। । अर्थात् जिस बिंदु पर सामूहिक माँग (AD) तथा सामूहिक पूर्ति (AS) आपस में बराबर होते हैं उसे प्रभावपूर्ण माँग का बिंदु कहा जाता है।
इसी कारण प्रभावपूर्ण माँग को केन्स के रोजगार सिद्धांत का प्रारंभिक बिंदु कहा जाता है।
चित्र द्वारा देखा जा सकता है –


18. लचीले विनिमय दर व्यवस्था में विनिमय दर का निर्धारण कैसे होता है ?
(How is exchange rate determined in the index flexible exchange rate system ?)

उत्तर⇒ लचीले विनिमय दर प्रणाली में विनिमय दर विदेशी मुद्रा बाजारों में विदेशी मुद्रा की मांग एवं पूर्ति द्वारा निर्धारित होती है तथा विनिमय कर माँग एवं पूर्ति के परिवर्तन के साथ बदलती रहती है।
अतः R=f (D, S)
R – विनिमय दर, D- अंतर्राष्ट्रीय बाजार में विभिन्न मुद्रा की माँग, S = अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में विभिन्न मुद्राओं की पूर्ति।
जिस विनिमय दर पर विदेशी मुद्रा की माँग उसकी पूर्ति के बराबर हो जाए, उसे विनिमय की समता दर कहते हैं।

स्थायी संतुलन

लचीले विनियम दर का निर्धारण – जिस प्रकार वस्तु की कीमत बाजार में मांग व पूर्ति की शक्तियों द्वारा निर्धारित होती है उसी प्रकार विनिमय दर भी विदेशी विनिमय बाजार में माँग व पूर्ति के द्वारा निर्धारित होती है। सभी देशों द्वारा वस्तुओं, सेवाओं एवं पूंजी के लेन-देन किये जाते हैं। इन लेन-देनों के बदले विदेशी विनिमय से भुगतान एवं प्राप्तियाँ होती है। जब विदेशी विनिमय से भुगतान किया जाता है तो उस देश के द्वारा विदेशी विनिमय की मांग की जाती है। इसी तरह जब विदेशी विनिमय की प्राप्तियाँ मिलती है तो उस देश में विदेशी विनिमय की पूर्ति होती है।
इस तरह विदेशी विनिमय के माँग एवं पूर्ति घटक विनिमय दर का निर्धारण करते हैं। विदेशी विनिमय की माँग मुख्य रूप से वस्तुओं एवं सेवाओं के आयात तथा विदेशों में विनियोग करने व ऋण देने के कारण उत्पन्न होती है।
विदेशी विनिमय की पूर्ति विनिमय दर और विदेशी विनिमय की पूर्ति के बीच फलनात्मक सम्बन्ध को दर्शाती है।
लचीले विनिमय दर का निर्धारण वहाँ होता है जहां विदेशी विनिमय की कुल माँग वक्र DD तथा कुल पूर्ति वक्र SS एक दूसरे को E बिन्दु पर काटते हैं। नीचे के चित्र में OR विनिमय दर संतुलित विनिमय दर निर्धारित होती है जिस पर विदेशी मुद्रा की कुल माँग (OQ) इसका कुल पूर्ति (OQ) के बराबर होती है।


19. चार क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था में चक्रीय प्रवाह को समझाएँ। (Explain the circular flow in four sector economy.)

उत्तर⇒ चार क्षेत्रीय प्रवाह मॉडल खुली अर्थव्यवस्था को प्रदर्शित करता है। चार क्षेत्रीय चक्रीय प्रवाह मॉडल में विदेशी क्षेत्र या शेष विश्व क्षेत्र को शामिल किया जाता है। वर्तमान में अर्थव्यवस्था का स्वरूप खुली अर्थव्यवस्था का है। जिसमें वस्तुओं का आयात-निर्यात होता है। जब तक अर्थव्यवस्था शेष विश्व से आयात की गई वस्तओं का भगतान करती है तो इसमें देश के बाहर शेष विश्व की ओर मुद्रा का प्रवाह होता है। दूसरी ओर जब एक देश शेष विश्व को निर्यात करता है तो दूसरे देश उसे भुगतान करते हैं। इस प्रकार शेष विश्व से इस देश की ओर मुद्रा का प्रवाह होता है।

खुली अर्थव्यवस्था में आय प्रवाह के पाँच प्रमुख स्तंभ होते हैं—
(i) परिवार क्षेत्र
(ii) व्यावसायिक क्षेत्र
(iii) सरकारी क्षेत्र
(iv) शेष विश्व क्षेत्र एवं
(v) पूँजी बाजार।

संतुलन की शर्त — चार क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था के चक्रीय प्रवाह में संतुलन की शर्त है –
y = C+I+G+ (X – M)
y= आय, C = उपभोक्ता व्यय, I = निवेश व्यय, G = सरकारी व्यय, (X-M) = शुद्ध निर्यात, X = निर्यात, M = आयात।

विशेषताएँ-
(i) परिवार क्षेत्र — यह क्षेत्र उत्पादन के साधनों का स्वामी होता है। यह क्षेत्र अपनी सेवा के बदले मजदूरी, लगान, ब्याज, लाभ के रूप में आय प्राप्त करते हैं। यह क्षेत्र अपने आय का कुछ भाग बचा लेता है जो पूँजी बाजार में चला जाता है।

(ii) उत्पादक क्षेत्र – उत्पादक क्षेत्र वस्तुओं एवं सेवाओं का उत्पादन करता है जिसका उपयोग परिवार तथा सरकार द्वारा किया जाता है।

(iii) सरकारी क्षेत्र—सरकार परिवार एवं उत्पादक क्षेत्र दोनों से कर की वसूली करता है।

(iv) शेष विश्व—शेष विश्व निर्यात के लिए भुगतान प्राप्त करता है। यह क्षेत्र सरकारी खातों पर भुगतान प्राप्त करता है।

(v) पूँजी बाजार – पूँजी बाजार तीनों क्षेत्र परिवार, फर्मों तथा सरकार की बचतें एकत्रित करता है। यह क्षेत्र परिवार, फर्मे तथा सरकार को पूँजी उधार देकर निवेश करता है। पूँजी बाजार में अन्तर्प्रवाह एवं बाह्य प्रवाह बराबर होते हैं।


20. राष्ट्रीय आय की विभिन्न धारणाओं को स्पष्ट कीजिए। (Explain the various concepts of National Income.)

उत्तर⇒ राष्ट्रीय आय की अवधारणाओं में तीन बातें मुख्य रूप से हैं –

(i) राष्ट्रीय आय की धारणाएँ वस्तुओं के निरन्तर चलने वाला एक प्रवाह है अर्थात् राष्ट्रीय आय से आशय किसी एक समय पर उपलब्ध वस्तुओं के स्टॉक से नहीं बल्कि किसी समयावधि में उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं के प्रवाह में है।

(ii) राष्ट्रीय आय की धारणाएँ में सभी प्रकार की वस्तुओं और सेवाओं की बाजार कीमत शामिल की जाती है और एक वस्तु की कीमतें एक ही बार शामिल की जाती है, इसमें अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य ही गिना जाता है जिससे दोहरी गणना से बचा जा सके।

(iii) राष्ट्रीय आय की धारणाएँ के साथ एक निश्चित समय की अवधि जुड़ी रहती है। यह अवधि एक वर्ष की होती है।

(iv) राष्ट्रीय आय की गणना के संबंध में मूलतः दो धारणाएँ जैसे—राष्ट्रीय उत्पाद तथा घरेलू उत्पाद को आधारस्वरूप लिया जाता है। शेष सभी धारणाएँ इन धारणाएँ पर आधारित इनके स्वरूप है।

Bihar Board Class 12 Economics Question 2022 Economics ( दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर ) ( 20 Marks ) PART- 3

21. चक्रीय आय प्रवाह मॉडल का महत्त्व बताएँ। (Explain importance of circular income flows.)

उत्तर⇒ आर्थिक विश्लेषण के दृष्टिकोण से चक्रीय आय प्रवाहों का महत्त्व निम्न रूप से देखा जा सकता है-

(i) राष्ट्रीय आय का अनुमान (Estimation of National income) – देश की राष्ट्रीय आय की गणना करने में मुद्रा प्रवाह का अध्ययन बहुत उपयोगी है।

(ii) अर्थव्यवस्था की कार्य-प्रणाली का ज्ञान (Knowledge of working of Economy) इसके द्वारा हमें यह मालूम हो जाता है कि अर्थव्यवस्था सुचारु रूप से कार्य कर रही है अथवा नहीं।

(iii) मौद्रिक नीति का महत्त्व (Importance of Monetary policy) – चक्रीय आय प्रवाह अर्थव्यवस्था में बचत तथा विनियोग की समानता लाने के दृष्टिकोण से मौद्रिक नीति के महत्त्व को स्पष्ट करती है।

(iv) राजकोषीय नीति का महत्त्व (Importance of fiscal policy)—चक्रीय आय प्रवाहों के अध्ययन के द्वारा अर्थव्यवस्था में संतुलन बनाये रखने की दृष्टि से राजकोषीय नीति का महत्त्व स्पष्ट हो जाता है।

(v) असंतुलन की समस्याओं का अध्ययन (Study of problem of imbalance) – चक्रीय आय प्रवाहों के द्वारा असंतुलन के कारणों तथा उनको दूर करने के उपायों का अध्ययन किया जा सकता है।

(vi) आय का रोजगार सिद्धांत का प्रतिपादन (Theory of income and Employment propounded)—मुद्रा प्रवाह तथा इसे प्रभावित करने वाले तत्वों को ध्यान में रखकर प्रसिद्ध अर्थशास्त्री जे० एम० केन्स ने आय व रोजगार का सिद्धान्त का प्रतिपादन किया।

(vii) अन्तर्राष्ट्रीय व्यापारिक नीतियों का आधार (Basis for international commercial policies) – चक्रीय आय प्रवाहों के अध्ययन से यह ज्ञात होता है कि राष्ट्रीय आय में से आयात रिसाव है क्योंकि आयातों का भुगतान अन्य देशों की आय है। आयातों को कम करने की दृष्टि
से सरकार निर्यात को प्रोत्साहित करने की नीति को अपनाती है।

(vii) उत्पादन, आय तथा व्यय की तिहरी समानता (Triple Identity of production, income and expenditure) – आय के चक्रीय प्रवाह से स्पष्ट हो जाता है कि उत्पादन, आय तथा व्यय उत्पादन प्रक्रिया के फलस्वरूप उत्पन्न वस्तुओं तथा सेवाओं के मूल्य को प्रकट करने के लिए विभिन्न रूप है। इस प्रकार चक्रीय प्रवाह से ज्ञात होता है कि
उत्पादन = आय – व्यय
यह समानता राष्ट्रीय आय के मापन की रीतियों का आधार है।


22. पूर्णतया लोचदार माँग और पूर्णतया बेलोचदार माँग में अन्तर कीजिए।
(Differentiate between perfectly elastic demand and perfectly inelastic demand.)

 औसत.

उत्तर⇒ जब किसी वस्तु की कीमत में परिवर्तन नहीं होने पर भी अथवा बहुत सूक्ष्म परिवर्तन होने पर माँग में बहुत अधिक परिवर्तन हो जाता है तब उस वस्तु की माँग पूर्णतया लोचदार कही जाती है। पूर्ण लोचदार माँग को अनंत लोचदार मांग भी कहा जाता है । इस स्थिति में एक दी नई कीमत पर वस्त की माँग असीम या अनंत होती है तथा कीमत में नाममात्र की वृद्धि होने पर शन्य हो जाती है। माँग वक्र पूर्ण लोचदार होने पर माँग वक्र x-अक्ष के समानांतर होता है जिसे हम नीचे चित्र द्वारा देख सकते हैं।

 निम्न को परिभाषित करें

माँग की मात्रा जब किसी वस्तु की कीमत में परिवर्तन होने पर भी उसका माँग में कोई परिवर्तन नहीं होता है तो इसे पूर्णतया बेलोचदार माँग कहते हैं। इस स्थिति में माँग की लोच शून्य होती है जिसके फलस्वरूप माँग वक्र Y-अक्ष के समानांतर होती है। इसे हम निम्न चित्र द्वारा देख सकते हैं


23. न्यून माँग से क्या समझते हैं? इसके आर्थिक परिणामों का वर्णन करें।
(What do you mean by Deficient demand ? Describe their economical effects.)

उत्तर⇒ न्यून माँग वह दशा है जिसमें अर्थव्यवस्था में सामूहिक माँग पूर्ण रोजगार के लिए आवश्यक सामूहिक पूर्ति से कम होती है। अर्थव्यवस्था में पूर्ण रोजगार स्तर से पहले ही संतुलन प्राप्त हो जाने के कारण ही न्यून माँग की दशा उत्पन्न हो जाती है। यह स्थिति उत्पन्न होने के कारण यह है कि पूर्ण रोजगार स्तर तक पहुँचने के लिए जितनी सामूहिक माँग की आवश्यकता थी, वर्तमान सामूहिक माँग उससे कम रह गई। सामूहिक माँग की इस कमी के कारण ही हम पूर्ण रोजगार स्तर तक नहीं पहुंच पाये। अतः जब वर्तमान सामूहिक माँग पूर्ण रोजगार स्तर के लिए आवश्यक सामूहिक माँग से कम हो जाती है तो इसे न्यून माँग कहते हैं।

न्यून माँग के आर्थिक परिणाम
न्यून माँग के आर्थिक परिणाम निम्न तीन हैं –
(A) उत्पादन पर प्रभाव, (B) रोजगार पर प्रभाव, (C) कीमतों पर प्रभाव।

(A) उत्पादन पर प्रभाव (Effects on Production) – इसके अंतर्गत निम्न आर्थिक परिणाम देखने को मिलते हैं।
(i). न्यून माँग के कारण उत्पादक वस्तुओं एवं सेवाओं का उत्पादन घटाने के लिए बाध्य होंगे।
(ii). न्यून माँग के कारण अपनी वर्तमान उत्पादन क्षमता का पूर्ण उपभोग नहीं कर पाएंगे।
(iii). न्यून माँग के कारण देश के उत्पत्ति के संसाधनों का पूर्ण उपयोग नहीं हो पाएगा।
(iv). न्यून माँग के कारण पहले से कार्य कर रही कुछ फर्मे अपना कार्य बन्द कर देगी।
(v). न्यूयून माँग के कारण उत्पादन की लागत में वृद्धि होगी।

(B) रोजगार पर प्रभाव (Effects on Employment) – माँग की कमी के कारण उत्पादकों को वस्तुओं एवं सेवाओं के अपने उत्पादन में कमी करनी पड़ेगी। इसका सामान्य प्रभाव यह होगा कि देश में रोजगार के स्तर में कमी आ जाएगी।

(C) कीमतों पर प्रभाव (Effects on Prices) – न्यून माँग के कारण देश में कीमत स्तर में कमी आ जाएगी जिससे उत्पादकों के लाभ के मार्जिन में कमी आ जाएगी तथा उपभोक्ताओं को कम कीमत पर वस्तुएँ एवं सेवाएँ प्राप्त हो सकेगी।


24. क्या सकल घरेलू उत्पाद किसी देश के आर्थिक कल्याण का निर्देशांक है ? अपने उत्तर को स्पष्ट करें। (Is gross domestic product an indication of a country’s economy welfare ? Clarify your answer.)

उत्तर⇒ सकल घरेलू उत्पाद आर्थिक कल्याण का निर्देशांक
यदि सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का आकलन वास्तविक अर्थों में नहीं किया जाता तो इसे देश में आर्थिक कल्याण की माप का सूचक नहीं माना जा सकता है। देश
में वास्तविक राष्ट्रीय आय की वृद्धि प्रति व्यक्ति आय की वृद्धि उत्पन्न करती है। विपरीत परिस्थितियों में कहा जा सकता है कि जब तक देश की वास्तविक राष्ट्रीय आय में वृद्धि नहीं होती, तब तक प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि दर्ज नहीं की जा सकती है।

सकल घरेलू उत्पाद (GDP) को देश में आर्थिक कल्याण का निर्देशांक प्रयोग करने के लिए कुछ व्यावहारिक सीमाएँ हैं –
1. सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की वृद्धि देश में बेहतर जीवन स्तर को अनिवार्य रूप से प्रदर्शित करने में असमर्थ है।

2. सकल घरेलू उत्पाद (GDP) देश में आय के समान वितरण पक्ष की अवहेलना करता है। आर्थिक कल्याण में वृद्धि तब तक सुनिश्चित नहीं की जा सकती जब तक GDP की वृद्धि को समाज में समान वितरण न सुनिश्चित किया जाए।

3. अर्थव्यवस्था की अनेक क्रियाओं का आकलन मौद्रिक अर्थों में नहीं किया जाता जिससे GDP का आकलन वास्तविक आकार से कम रह जाता है। अत: GDP (सकल घरेलू उत्पाद) को आर्थिक कल्याण का उचित निर्देशांक नहीं माना जा सकता है।

4. सकल घरेलू उत्पाद (GDP) बाह्य घटकों की उपेक्षा करता है जो किसी क्रिया पर धनात्मक या ऋणात्मक प्रभाव डालता है। इन बाह्य कारणों का प्रभाव GDP के परिक्षेत्र से बाहर होता है और इसलिए समाज की दृष्टि से GDP को आर्थिक कल्याण का सही एवं विश्वसनीय निर्देशांक नहीं माना जा सकता।
इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि देश के आर्थिक कल्याण का GDP या GNP आर्थिक कल्याण का माप निर्देशांक सही नहीं है।


25. भारत में मुद्रा की पूर्ति की वैकल्पिक परिभाषा क्या है? इनमें से कौन सबसे – व्यापक मुद्रा है ?
(What are the alternative definitions of supply of money in India ? Which of these is broad money?)

उत्तर⇒ मुद्रा की पूर्ति की भारत में वैकल्पिक परिभाषा
किसी विशेष समय में मुद्रा की पूर्ति का तात्पर्य समाज में प्रचलित मुद्रा की कुल मात्रा से होता है। मुद्रा की परिभाषा से स्पष्ट है कि सिक्के एवं कागजी नोट को ही हम मुद्रा नहीं कहते बल्कि इसके अन्तर्गत उन सभी पदार्थों को भी रखा जाता है जो लेन-देन के भुगतान के रूप में स्वीकार किये जाते हैं। अतः वर्तमान समय में मुद्रा की पूर्ति के अन्तर्गत निम्न तीन प्रकार की मुद्राओं का समावेश रहता है –

(i) सिक्के (Coins)
(ii) पत्रमुद्रा (Paper Money)
(iii) बैंक जमा (Bank Deposit)
केवल चालू जमा जिसके आधार पर चेक जारी किये जाते हैं। किन्तु मुद्रा की पूर्ति के अन्तर्गत किसी विशेष समय में केवल प्रचलन में मुद्रा की ही गणना की जाती है।
सकल मांग जमाओं में बैंकों के बीच होने वाले दावे को शामिल किया जाता है, जबकि शुद्ध माँग जमाओं में दावे शामिल नहीं किये जाते हैं। बैंक के बीच होने वाले दावे लोगों की मांग जमाओं में शामिल नहीं होते। अतः शुद्ध मांग जमाओं को मुद्रा पूर्ति का व्यापक भाग माना जाता है।


26. उदासीन वक्र की सहायता से उपभोक्ता का संतुलन स्पष्ट कीजिए। (Explain consumer’s equilibrium with the help of indifference curve.)

उत्तर⇒ एक उपभोक्ता संतुलन की अवस्था में तब होता है जब अपनी सीमित आय की सहायता से वस्तुओं को उनकी दी गई कीमतों पर खरीदकर अधिकतम संतुष्टि प्राप्त करने में सफल हो जाता है। उपभोक्ता को कीमत रेखा उसकी आय एवं उपभोग वस्तुओं की कीमतों से निर्धारित होती है। इस कीमत रेखा के साथ उपभोक्ता ऊँचे से नीचे उदासीनता वक्र तक पहुँचने का प्रयास करता है।

उदासीनता वक्र विश्लेषण में उपभोक्ता के संतुलन की दो शर्ते हैं –

कुल परिवर्तनशील लागत

(i). उदासीनता वक्र कीमत रेखा को स्पर्श करें (Price Line should be tangent to indifference Curve) अर्थात् मात्रात्मक रूप में X वस्तु की Y वस्तु के लिए सीमांत प्रतिस्थापन दर X तथा Y वस्तुओं की कीमतों के अनुपात के बराबर होनी चाहिए।

MRSXY = PX/Y चित्र द्वारा देखा जा सकता है।

चित्र में संतुलन बिंदु E पर कीमत रेखा का ढाल = उदासीनता वक्र का ढाल अर्थात्                   MRSxy =  PX/X

कुल स्थिर लागत, कुल परिवर्तनशील लागत और कुल लागत का क्या अर्थ है

(ii). स्थायी संतुलन के लिए संतुलन बिंदु पर उदासीनता वक्र मूल बिन्दु की ओर उन्नतोदर होनी चाहिए अर्थात् संतुलन बिन्दु पर MRS घटती हुई होनी चाहिए। (For stable equilibrium indifference curve should be convex to the origin at the point of equilibrium that MRS should be declining at the point of equilibrium) अर्थात् संतुलन बिन्दु पर MRSXY घटती हुई होनी चाहिए। चित्र में देख सकते हैं।

चित्र में K बिन्दु पर यद्यपि संतुलन की पहली शर्त पूरी हो रही है किन्तु K पर संतुलन की स्थिति स्थायी नहीं है क्योंकि K बिन्दु पर MRSXY, बढ़ता हुआ है। बिन्दु E अंतिम संतुलन का बिन्दु है जहाँ MRSXY, घटती हुई है।


27. केंद्रीय बैंक के मौद्रिक उपाय से क्या समझते हैं? न्यून माँग को ठीक करने के लिए मौद्रिक उपाय का वर्णन करें। (What do you mean by monetary measures of Central Bank ? Explain the monetary measures to correcting deficient demand.)

उत्तर⇒ केंद्रीय बैंक के मौद्रिक नीति देश के केंद्रीय बैंक की मौद्रिक नीति होती है जिसका उद्देश्य मुद्रा और साख की पूर्ति को नियंत्रित करना होता है। भारत का केंद्रीय बैंक भारतीय रिजर्व बैंक है।
केंद्रीय बैंक अर्थव्यवस्था में आर्थिक स्थिरता प्राप्त करने के लिए मौद्रिक नीति द्वारा तीन घटकों को नियंत्रित करता है।
(i) मुद्रा की पूर्ति, (ii) ब्याज दर, (iii) मुद्रा की उपलब्धता
डी० सी० ऑस्टन के अनुसार, “मौद्रिक नीति का संबंध ब्याज की दर तथा साख की उपलब्धि को नियंत्रित करके कुल माँग के स्तर तथा संरचना को प्रभावित करने से है।
“Monetary Policy involves the influence on the level and composition of aggregate demand by the manipulation of interest rate and the availability of credit.” D.C. Auston.

न्यन माँग को ठीक करने के मौद्रिक उपाय – न्यून माँग को ठीक करने के मौद्रिक उपाय को दो वर्गों में देखा जा सकता है –
(A). मात्रात्मक उपाय (Quantitative measures)
(B). गुणात्मक उपाय (Qualitative measures)

(A) मात्रात्मक उपाय के अंतर्गत देश की साख की कुल मात्रा को नियंत्रित किया जाता है।
इसके अंतर्गत निम्न विधियों द्वारा मात्रात्मक साख नियंत्रण करता है –

(i). बैंक दर को कम कर दिया जाता है ताकि अधिक साख विस्तार हो सके तथा माँग में वृद्धि हो सके।
(ii). केंद्रीय बैंक खुले बाजार में प्रतिभूतियाँ खरीदता है जिससे अर्थव्यवस्था में क्रय शक्ति बढ़ती है।
(iii). नकद कोष अनुपात को कम कर दिया जाता है जिससे साख का अधिक विस्तार होता है। प्रत्येक व्यापारिक बैंक को कानूनी रूप से अपनी जमा राशियों का एक निश्चित अनुपात देश के केंद्रीय बैंक के पास रखना पड़ता है, जिसे नकद कोष अनुपात कहा जाता है।
(iv). तरलता अनुपात को कम कर दिया जाता है। फलतः साख का अधिक विस्तार हो सकता है। प्रत्येक बैंक को अपनी परिसम्पतियों का एक निश्चित अनुपात नकदी के रूप में रखना वैधानिक रूप से आवश्यक है। इसे हम तरलता अनुपात कहते हैं।

(B). गुणात्मक उपाय  – गुणात्मक उपाय वे उपाय हैं जिनका उद्देश्य अर्थव्यवस्था के कुछ विशेष कार्यों के लिए दी जाने वाली साख के प्रवाह को नियंत्रित करना है। इसके अंतर्गत निम्न उपाय अपनाए जाते हैं-
(i). ऋणों की सीमांत आवश्यकता को कम कर दिया जाता है ताकि अधिक ऋण अधिक मात्रा में मिल सके। न्यून माँग के नियंत्रण के लिए साख के मार्जिन को कम कर दिया जाता है।
(ii). साख की राशनिंग को समाप्त कर दिया जाता है। न्यून माँग को ठीक करने की स्थिति में साख की राशनिंग समाप्त कर दिया जाता है।
(iii). केंद्रीय बैंक द्वारा व्यापारिक बैंकों को साख विस्तार करने का परामर्श दिया जाता है जिससे भी साख का विस्तार होता है। इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि न्यून माँग की स्थिति में केंद्रीय बैंक द्वारा सस्ती मौद्रिक नीति अपनायी जाती है।


28. भारतीय व्यापारिक बैंक के प्रमुख कार्यों का वर्णन कीजिए। (Explain the main functions of Indian commercial bank.)

उत्तर⇒ व्यावसायिक बैंक के प्रमुख कार्य –
(Main functions of commercial Bank) व्यावसायिक बैंक मुख्य रूप से तीन प्रकार के कार्य करते हैं –
(1). प्राथमिक कार्य,   (2). एजेन्सी कार्य,   (3). सामान्य उपयोगी सेवाएं ।

(1) प्राथमिक कार्य के अंतर्गत व्यावसायिक बैंक निम्न कार्य करता है-

(i) जमा स्वीकार करना (Receiving Deposits):— व्यावसायिक बैंक निम्न प्रकार से लोगों का जमा स्वीकार करता है-

(a) बचत जमाखाता – यह खाता परिवारों के लिए लाभदायक है जिनको एक बार रुपया जमा करवाने के बाद तुरंत जरूरत नहीं पड़ती है।
(b) चालू खाता जमा-यह खाता व्यापारी लोगों के लिए उपयोगी होता है, जिन्हें कई बार रुपया निकलवाने की जरूरत पड़ती है। इस खाते में कोई ब्याज नहीं
दिया जाता है।
(c) मियादी खाता जमा – इसमें दीर्घकाल के लिए जमा स्वीकार की जाती है। इस खाते में ब्याज की दर अधिक होती है।

(ii) उधार देना (Advancing of loan) – व्यावसायिक बैंक का दूसरा मख्य कार्य है लोगों को ऋण देना। बैंक दूसरे लोगों से जो जमा स्वीकार करता है उसका एक निश्चित भाग सुरक्षा कोष में रखकर उत्पादक कार्यों के लिए उधार दे देता है और उसपर ब्याज कमाता है।

(iii) साख का निर्माण (Credit of Creation) – व्यावसायिक बैंक साख का निर्माण करता है।

(2) एजेन्सी कार्य (Agency Functions):— बैंक अपने ग्राहकों के एजेन्ट के रूप में भी काम करता है, जिसके लिए बैंक कुछ कमीशन भी लेता है। बैंक द्वारा प्रदत एजेन्सी सेवाएँ निम्न हैं –

(i) नकद कोषों का हस्तांतरण — बैंक ड्राफ्ट, उधार खाते चिट्ठी तथा अन्य साख-पत्रों द्वारा बैंक एक स्थान से दूसरे स्थान को रकम का स्थानांतरण करता है।

(ii) बैंक अपने ग्राहकों के लिए कंपनियों के शेयर बेचता और खरीदता है।
(iii) बैंक मृतक की वसीयतों और प्रबंधकर्ता का दायित्व निभाता है।

(3). सामान्य उपयोगी सेवाएँ (General Utility Services):- व्यावसायिक बैंक द्वारा। उपलब्ध अन्य उपयोगी सेवाएँ निम्न हैं –
(i). बैंक, विदेशी मुद्रा का क्रय-विक्रय करता है।
(ii). कीमती वस्तुओं के लिए लॉकर्स उपलब्ध कराता है।
(iii). पर्यटक चेक और उपहार चेक जारी करता है।
(iv). बैंक अपने ग्राहकों के आर्थिक हवाले देता है।

(4). अन्य कार्य –
(i) ओवर ड्राफ्ट (Overdraft)
(ii) विनिमय बिलों पर कटौती (Discounting Bills of Exchange)
(iii) कोषों का निवेश करना (Investment of Funds) -बैंक अपने अतिरिक्त धन राशियों को तीन प्रकार की प्रतिभूतियों में निवेश करता है—
(a) सरकारी प्रतिभूतियाँ, (b) अन्य अनुमोदित प्रतिभूतियाँ एवं (c) अन्य प्रतिभूतियाँ
इस प्रकार व्यावसायिक बैंक के उपर्युक्त कई कार्य हैं।


29. केंद्रीय बैंक के मुख्य कार्यों की व्याख्या करें। (Explain the main function of Central Bank.)

उत्तर⇒ केंद्रीय बैंक के कार्य निम्नलिखित हैं –
(i) कागजी नोट जारी करने का कार्य (Function of Note issue) – सभी देशों में केंद्रीय बैंक को कागजी नोट जारी करने का एकाधिकार (Monopoly) होता है। निम्नलिखित कारणों से केंद्रीय बैंक को नोट जारी करने का अधिकार दिया जाता है-

(a).  केंद्रीय बैंक द्वारा जारी किये गये नोटों में जनता का स्थायी विश्वास होता है क्योंकि केंद्रीय बैंक बन्द नहीं हो सकता।
(b).  केंद्रीय बैंक को नोट-निर्गमन का अधिकार देने से वह मुद्रा तथा साख की मात्रा को सरलतापूर्वक नियमन एवं नियंत्रण कर सकता है।
(c).  केन्द्रीय बैंक द्वारा जारी किये गए नोटों में अधिक एकरूपता (Uniformity) रहती है, जिससे जाली नोटों का बनना कम सम्भव है।
इस प्रकार उपर्युक्त कारणों से केंद्रीय बैंक को नोट जारी करने का अधिकार दिया जाता है।

(ii) बैंकों के बैंक का कार्य (Banker’s Bank) – केंद्रीय बैंक अन्य सभी बैंकों के बैंक का कार्य करता है। जिस प्रकार बैंक जनता को विभिन्न सुविधाएँ देते हैं, उसी प्रकार केंद्रीय बैंक भी बैंकों को विभिन्न सुविधाएँ प्रदान करता है।

(a). केंद्रीय बैंक बैंकों की रकम को अपने पास जमा रखता है।
(b). केंद्रीय बैंक बैंकों को उनके विनिमय बिलों को पुनः बट्टा करा कर (Rediscounting) तथा सरकारी एवं अन्य प्रतिभूतियों के आधार पर ऋण भी देते हैं।
(c). केंद्रीय बैंक बैंकों को कुछ अन्य सुविधायें भी प्रदान करते हैं मुद्रा को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने की सुविधा (Remittance facilities), समाशोधन-गृह की सुविधा इत्यादि।
इस प्रकार केंद्रीय बैंक बैंकों को उपर्युक्त सुविधायें प्रदान कर बैंकों के बैंक के रूप में कार्य करते हैं।

(iii) देश के धातु – कोष एवं विदेशी विनिमय-कोष को सुरिक्षत रखना (Safe custody of Internal reserve and Foreign Exchange Reserve) केंद्रीय बैंक देश के धातु-कोष जिसमें सोने-चाँदी का भंडार सम्मिलित है तथा विदेशी विनिमय कोष (Foreign Exchange Reserve) को सुरक्षित रखता है।

(iv) सरकार की मौद्रिक – नीति को सफल बनाना (To make successful the Monetary policy of the Government)— यों तो मौद्रिक-नीति (Monetry policy) का संचालन केंद्रीय बैंक ही करती है, लेकिन उसका निर्धारण मुख्यतः सरकार के हाथों में रहता है।


30. माँग की लोच से आप क्या समझते हैं? माँग की लोच मापने के प्रतिशत और रेखा गणित विधि को समझाएँ। (What do you mean Price elasticity of demand ? Explain measurement of percentage method and geometrical method.)

उत्तर⇒ कीमत में परिवर्तन के फलस्वरूप माँग में होने वाले परिवर्तन के माप को माँग की लोच कहते हैं। प्रो० मार्शल के अनुसार, माँग की कीमत लोच, कीमत में होने वाले प्रतिशत परिवर्तन का अनुपात है।

उत्तर

इसे हम समीकरण के रूप में इस प्रकार देख सकते हैं-

हम कह सकते हैं कि “कीमत में परिवर्तन के प्रति, माँग की संवेदनशीलता का माप” माँग की लोच कहलाती है।
किसी वस्तु के मूल्य में परिवर्तन के फलस्वरूप उसकी माँग में जो परिवर्तन होता है उसे माँग की लोच कहते हैं।

उत्तर

(i). प्रतिशत विधि (Percentage method) – माँग की लोच मापने की प्रतिशत विधि को आनुपातिक विधि या फ्लक्स विधि भी कहा जाता है। क्योंकि इसे फ्लक्स ने प्रतिपादित किया था। इस विधि के अनुसार कीमत में प्रतिशत परिवर्तन और माँग में प्रतिशत परिवर्तन के अनुपात से हम माँग की लोच निम्न सूत्र की सहायता से माप सकते हैं।

जिसमें ∆P (डेल्टा P) = कीमत में परिवर्तन
P = आरंभिक कीमत, ∆q = माँग में परिवर्तन, q = आरंभिक माँग
सूत्र से जब उत्तर 1 है तो माँग की लोच इकाई के बराबर है अर्थात् माँग लोचदार है। जब उत्तर 1 से अधिक है तो माँग का लोच अधिक है। 1 से कम है तो माँग कम लोचदार है।

(ii). रेखागणित विधि/ज्यामितिय विधि/बिन्दु प्रणाली (Geometrical method) – माँग की कीमत लोच मापने की एक अन्य विधि है जिसे रेखागणितीय विधि या बिंदु विधि (point method) है जिसका प्रयोग “सीधी रेखा वाले माँग वक्र” के विभिन्न बिन्दु पर लोच मापने के लिए किया जाता है।

कुल परिवर्तनशील लागत

(i) सीधी रेखा वाले माँग वक्र को x अक्ष और Y अक्ष तक बढ़ाया गया है जिसे हम चित्र में देख सकते हैं –

(ii) चित्र में माँग वक्र के ठीक बीच में एक बिन्दु है जो रेखा को दो बराबर भागों में BE और BD में बाँट देता है। बिन्दु A ऊपरी भाग में और बिन्दु C निचले भाग में स्थित है।

कुल परिवर्तनशील लागत

(iii) माँग वक्र के जिस बिन्दु पर लोच निकालनी होती है उस बिन्दु के निचले भाग को ऊपरी भाग से भाग कर देते हैं। सूत्र के अनुसार,

माँग की लोच = माँग वक्र का नीचे का भाग / माँग वक्र का ऊपर का भाग

Bihar Board Class 12 Economics 2022 Economics ( दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर ) ( 20 Marks ) PART- 4

31. विदेशी मुद्रा के वायदा बाजार तथा हाजिर (चालू) बाजार में अंतर करें। (Differentiate between Forward Market and Spot Market?)

उत्तर⇒ वायदा बाजार (Forward Market) — यह विदेशी मुद्रा का वह बाजार है जिसमें विदेशी करेंसी के क्रय-विक्रय का सौदा वर्तमान में हो जाता है पर करेंसी की देयता भविष्य में तयशुदा किसी तिथि पर होती है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि विदेशी विनिमय से संबंधित वायदा बाजार वह बाजार है जिसमें भविष्य में किसी तिथि पर पूरे होने वाले लेन-देन का कारोबार होता है।

हाजिर बाजार (Spot Market) – यदि विदेशी मुद्रा बाजार में लेन-देन प्रकृति का है तो उसे हाजिर या चालू बाजार कहते हैं। इस प्रकार विदेशी विनिमय से संबंधित हाजिर बाजार का अर्थ उस बाजार है जिसमें केवल चालू या हाजिर लेनदेन किया जाता है।
इस बाजार का भविष्य के लेन-देन से कोई संबंध नहीं होता है। इस बाजार की प्रवृत्ति दैनिक होती है। विदेशी मुद्रा के हाजिर बाजार में लागू हो रही विनिमय दर को हाजिर दर कहा जाता है।

वायदा बाजार की मुख्य विशेषताएँ (Principal characteristics of forward market)-वायदा बाजार की मुख्य विशेषताएँ निम्न हैं-
(i) वायदा बाजार केवल भविष्य से संबंधित होता है।
(ii) वायदा बाजार की दूसरी प्रमुख विशेषता है कि यह भविष्य की विनिमय दर अर्थात् उस विनिमय दर को निर्धारित करता है जिसपर भविष्य में लेन-देन को पूरा किया जाना है।

हाजिर (चालू) बाजार की मुख्य विशेषताएँ (Principal characteristic of spot market)
हाजिर बाजार की मुख्य विशेषताएँ निम्न हैं –
(i) हाजिर बाजार दैनिक प्रकृति वाला होता है, इसका भविष्य के लेन-देन से कोई संबंध नहीं होता है।
(ii) हाजिर बाजार में जो विनिमय दर होती है, उसे तात्कालिक विनिमय दर कहा जाता है।
इस प्रकार वायदा बाजार और हाजिर बाजार के उपर्युक्त कई विशेषताएँ हैं।


32. स्थिर विनिमय दरों के गुण तथा दोषों की व्याख्या करें। (Explain merits and demerits of fixed exchange rates.)

उत्तर⇒ स्थिर विनिमय दरों के गुण (Merits of fixed exchange rates) – स्थिर विनिमय दरों के निम्न गुणों को इस प्रकार देखा जा सकता है-

(i) अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में वृद्धि (Increase in International Trade) – स्थिर विनिमय दर का प्रथम गुण यह है कि इससे अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में वृद्धि होती है।

(ii) विदेशी पूँजी को प्रोत्साहन (Incentive to foreign capital) – स्थिर विनिमय दर का दूसरा प्रमुख गुण यह है कि विनिमय दर में स्थिरता रहने से विदेशी पूँजी का आयात बढ़ता है जिससे देश के आर्थिक विकास में सहायता मिलती है।

(iii) पूँजी निर्माण में वृद्धि (Acceleration in capital formation)—स्थिर विनिमय दर का प्रमुख गुण यह है कि जब विनिमय दर में स्थिरता बनी रहती है तो उससे आंतरिक कीमत स्तर में भी स्थायित्व बना रहता है जिससे देश में पूँजी-निर्माण को प्रोत्साहन मिलता है।

(iv) आर्थिक नियोजन संभव (Economic planning possible)-स्थिर विनिमय दर द्वारा आर्थिक नियोजन संभव हो पाता है क्योंकि विनिमय दर स्थिर रहने पर सरकारी परियोजनाओं के व्यय निर्धारित मात्रा से अधिक नहीं होते, सरकार के आयात मूल्यों में भी भारी उतार-चढ़ाव नहीं आता।

(v) भुगतान संतुलन बनाये रखने में सहायक (Helps in maintaining favourable balance of payments) — स्थिर विनिमय दरों के कारणं विदेशी पूँजी आकर्षित होती है, औद्योगिक विकास संभव होता है,रोजगार का विस्तार होता है, उत्पादन में वृद्धि होती है। इस सभी के फलस्वरूप देश का भुगतान संतुलन देश के अनुकूल हो जाता है।

दोष (Demerits)—स्थिर विनिमय दरों में निम्न दोष पाई जाती है-

(i) राष्ट्रीय हितों की अवहेलना (Ignores National Interest) — स्थिर विनिमय दर प्रणाली में एक प्रमुख दोष यह है कि अन्तर्राष्ट्रीय हित में राष्ट्रीय हितों की बलि करनी पड़ती है।

(ii) अनेक क्षेत्रों में नियंत्रण (Controls in various sectors) — स्थिर विनिमय दर प्रणली के अंतर्गत केवल विदेशी विनिमय और भुगतानों पर ही प्रतिबंध लगाना पर्याप्त नहीं है बल्कि अनेक प्रकार के अनुशासन उद्योग, बैंकिंग व्यवसाय और विदेशी व्यापार आदि पर भी लागू करना पड़ता है।

(iii) विनिमय दर में आकस्मिक उच्चावचन (Sudden fluctuations in exchange rate)-स्थिर विनिमय दर बनाए रखने में जब कोई मुद्रा कमजोर हो जाती है तब उसका आकस्मिक अवमूल्यन कर दिया जता है।


33. कीमत रेखा क्या है? एक रेखाचित्र द्वारा समझाएँ। (What is price line ? Explain with figure.)

कुल परिवर्तनशील लागत

उत्तर⇒ कीमत रेखा किसी वस्तु के प्रचलित बाजार कीमत को दर्शाती है। यह रेखा एक समतल सीधी रेखा होती है जिसका किसी भी प्रतियोगी फर्म को सामना करना पड़ता है। एक फर्म इस कीमत पर अपनी वस्तु को जितनी मात्रा में चाहे बेच सकती हैं। जब फर्म अपना निर्यात बढ़ाता है तो यह अतिरिक्त इकाई बाजार कीमत पर बेची जाती है। अतएव प्रत्येक अतिरिक्त इकाई के बेचने से प्राप्त आय अर्थात् सीमांत आय (MR) और औसत आय (AR) कीमत के बराबर होते हैं। इसके फलस्वरूप सीमांत आय, औसत आय व कीमत रेखा एक ही समतल रेखा में मिल जाती है जो क्षैतिज अक्ष-X के समानांतर होती है। इस रेखा को ही कीमत रेखा कहा जाता है। इसे हम नीचे के चित्र द्वारा देख सकते हैं-

ऊपर के रेखाचित्र में हम देख सकते हैं कि बाजार की मान दी हुई तथा P पर स्थिर है। अतः हमें एक समतल सीधी रेखा प्राप्त होती है जो शीर्ष अक्ष-Y को Pबिन्दु पर काटती है। यह समतल सीधी रेखा कीमत रेखा कहलाती है।


34. भारत सरकार के बजट में प्रचलित निम्न धारणाओं की व्याख्या करें। (Explain the following concepts prevalent in the budget of Government of India.)
(क) राजस्व घाटा (Revenue Deficit)
(ख) राजकोषीयााrical Deficit
(ग) प्राथमिक घाटा (Primary Deficit)

उत्तर⇒ (क) राजस्व घाटा (Revenue Deficit)- राजस्व घाटा से मतलब सरकार की राजस्व प्राप्तियाँ (कर राजस्व + गैर कर राजस्व) की तुलना में राजस्व व्यय ( योजना राजस्व व्यय + गैर योजना राजस्व व्यय ) के अधिक होने से है। सरकार जब प्राप्त किए गए राजस्व से अधिक व्यय करती है तो उसे राजस्व घाटा सहना पड़ता है।

सूत्र के रूप में
राजस्व घाटा = कुल राजस्व व्यय – कुल राजस्व प्राप्तियाँ।

(ख) राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) — राजकोषीय घाटा का अर्थ सरकार के कुल व्यय (योजना व्यय + गैर योजना व्यय) का उधार रहित कुल प्राप्तियाँ (राजस्व प्राप्तियाँ + उधार बिना पूँजी प्राप्तियाँ) से अधिक हो जाना।

सूत्र के रूप में
राजकोषीय घाटा = कुल व्यय – उधार के बिना कुल प्राप्तियाँ = कुल व्यय – राजस्व प्राप्तियाँ – उधार रहित पूँजी प्राप्तियाँ।

राजकोषीय घाटे के संबंध में प्रमुख बात यह है कि इसमें उधार जो पूँजी प्राप्तियों का एक घटक है शामिल नहीं किया जाता है।

( ग ) प्राथमिक घाटा (Primary Deficit) — प्राथमिक घाटे को राजकोषीय घाटा – (Minus) ब्याज अदायगियों के रूप में परिभाषित किया जाता है। हम कह सकते हैं। यह राजकोषीय घाटे से ब्याज की अदायगियों घटाने से शेष राशि के बराबर होता है।

सूत्र के रूप में
प्राथमिक घाटा = राजकोषीय घाटा – ब्याज अदायगियाँ।


35. सारणी की सहायता से सीमान्त उपयोगिता एवं कुल उपयोगिता के संबंध को बताएं। (Explain relationship between Marginal utility and Total utility.)

उत्तर⇒ सीमांत उपयोगिता एवं कुल उपयोगिता में संबंध-सीमांत उपयोगिता तथा कुल उपयोगिता में घनिष्ठ संबंध है। हम जानते हैं कि जैसे-जैसे किसी वस्तु की उत्तरोत्तर इकाइयों का उपभोग किया जाता है वैसे-वैसे उससे प्राप्त सीमान्त उपयोगिता घटती जाती है तथा कुल उपयोगिता में वृद्धि होती जाती है। कुल उपयोगिता की वह वृद्धि तब तक कायम रहती है जब तक सीमांत उपयोगिता शून्य नहीं हो जाती है। जब सीमांत उपयोगिता शून्य होती है तो कुल उपयोगिता अधिकतम होती है। When marginal utility is zero, total utility is maximum.
शून्य होने के बाद सीमांत उपयोगिता ऋणात्मक होने लगती है जिसके कारण कुल उपयोगिता भी घटने लगती है। इस प्रकार हम देख सकते हैं –

(i). सीमांत उपयोगिता के घटने के साथ-साथ कुल उपयोगिता तब तक बढ़ती है जब तक सीमांत उपयोगिता शून्य न हो जाए।
(ii). जब सीमांत उपयोगिता शून्य होती है तो कुल उपयोगिता अधिकतम होती है।
(iii). शून्य होने के बाद सीमांत उपयोगिता ऋणात्मक होने लगती है जिसके कारण कुल उपयोगिता भी घटने लगती है।

सीमांत उपयोगिता तथा कुल उपयोगिता के संबंध को तालिका द्वारा देखा जा सकता है-

रोटी की इकाइयाँसीमांत उपयोगिताकुल उपयोगिता
11616
21228
30836
40440
5040
6-436
7-828

तालिका से स्पष्ट है कि चौथी रोटी के उपभोग तक सीमांत उपयोगिता क्रमशः घटती जाती है लेकिन चूंकि तब तक सीमांत उपयोगिता धनात्मक रहती है। अतः कुल उपयोगिता में उत्तरोत्तर वृद्धि होती जाती है। पाँचवीं रोटी के उपभोग से जब शून्य के बराबर सीमांत उपयोगिता मिलती है तो कुल उपयोगिता अधिकतम अर्थात् 40 के बराबर होती है। लेकिन इसके बाद छठी एवं सातवीं इकाइयों से क्रमशः -4 और –8 के बराबर सीमान्त उपयोगिता मिलती है तो कुल उपयोगिता क्रमशः घटती है अर्थात् 36 तथा 28 हो जाती है।


36. राजस्व घाटा से क्या समझते हैं ? इसे कम करने के प्रमुख उपाय बताएं। (What do you mean by Revenue Deficit ? Explain main remedies to Revenue Deficit.)

उत्तर⇒ जब सरकार का राजस्व व्यय इसकी राजस्व प्राप्तियों से अधिक हो जाता है तो इस अन्तर को राजस्व घाटा कहते हैं।
इस प्रकार Revenue Deficit = Revenue Expenditure-Revenue Receipts.
भारत में सत्तर के दशक के बीच तक सरकार की राजस्व प्राप्तियाँ उसके राजस्व व्यय से अधिक होती थी जिससे सरकार को राजस्व आधिक्य प्राप्त होता था लेकिन उसके बाद सरकार + बजट में बराबर राजस्व घाटा रहा है यानी सरकार का राजस्व उसकी राजस्व प्राप्तियों से अधिक रहा है।
राजस्व घाटे से हमें इस बात की जानकारी मिलती है कि सरकार किस फर्म के लिए ऋण ले रही है। राजस्व घाटे से पूरे किये गए व्यय से प्रायः सम्पत्ति अथवा विनियोग में वृद्धि नहीं होती। दूसरी ओर इस घाटे को पूरा करने के लिए प्राप्त ऋणों की अदाएगी का बोझ भविष्य में बढ़ जाता है क्योंकि विनियोग के माध्यम से कुछ भी लाभ प्राप्त नहीं होता।
राजस्व घाटा को कम करने के लिए निम्न उपाय किये जा सकते हैं –
(i) करों की दरों में वृद्धि करके सरकार अपनी राजस्व प्राप्तियों में वृद्धि करती है जिससे प्राप्तियाँ तथा व्यय का अंतर कम किया जा सकता है।
(ii) करों के आधार को विस्तृत करके भी सरकार अपनी राजस्व प्राप्तियों में वृद्धि करती है तथा प्राप्तियों एवं व्यय के अंतर को कम करने का प्रयास करती है।
(iii) सार्वजनिक व्यय में कटौती करके भी राजस्व घाटा को कम किया जा सकता है।


37. विनिमय दर से क्या अभिप्राय है? विदेशी विनिमय दर का निर्धारण कैसे होता है ? (What do you mean by Exchange Rate ? How is foreign exchange rate determined ?)

उत्तर⇒ विनिमय दर वह दर है जिसपर एक देश की एक मुद्रा इकाई का दूसरे देश की मुद्रा में विनिमय किया जाता है। विदेशी विनिमय दर यह बताती है कि किसी देश की एक इकाई के बदले में दूसरे देश की मुद्रा की कितनी इकाइयाँ मिल सकती है।
उदाहरण के लिए यदि एक अमेरिकन डालर का विनिमय, 68 भारतीय रुपये से हो तो 1 डालर = 68 रुपया।

कुल परिवर्तनशील लागत

क्राउथर (Crowther) के अनुसार, विनिमय दर एक देश की इकाई मुद्रा के बदले दूसरे देश की मुद्रा की मिलने वाली इकाइयों की माप है।”
विदेशी विनिमय का निर्धारण-विदेशी विनिमय बाजार में मुद्रा का मूल्य अथवा विनिमय दर उसकी माँग एवं पूर्ति की सापेक्षिक शक्तियों के द्वारा निर्धारित होता है। इसे हम चित्र द्वारा देख सकते हैं –

चित्र में OX रेखा पर विदेशी मुद्रा की माँग एवं पूर्ति को तथा OY रेखा पर R विनिमय दर को दिखाया गया है। DD रेखा मुद्रा की माँग की रेखा तथा SS विदेशी मुद्रा की पूर्ति की रेखा है। चित्र में माँग की रेखा DD नीचे की ओर झुकती है। इसका मतलब यह है कि जैसे-जैसे विनिमय दर में वृद्धि होती है। वैसे-वैसे विदेशी विनिमय की कम माँग की जाती है। इसका कारण यह है कि विदेशी विनिमय के मूल्य में वृद्धि होने से विदेशी वस्तुओं की घरेलू मुद्रा के रूप में लागत बढ़ जाती है और वे अधिक महँगी हो जाती हैं। इसके फलस्वरूप आयातों में कमी होती है और विदेशी विनिमय की माँग घट जाती है।
चित्र में पूर्ति की रेखा SS ऊपर की ओर उठती है। इसका मतलब यह है कि जैसे-जैसे विनिमय दर में वृद्धि होती है वैसे-वैसे विदेशी विनिमय की पूर्ति बढ़ती जाती है। इसके फलस्वरूप विदेशियों के लिए घरेलू वस्तुएँ सस्ती हो जाती है। क्योंकि घरेलू मुद्रा के मूल्य में कमी आ जाती है। अतः जब विनिमय दर में वृद्धि होती है तो देश के निर्यात की माँग बढ़ जाती है जिससे विदेशी विनिमय की पूर्ति भी बढ़ती है।


38. औसत आय और सीमांत आय के बीच संबंध की व्याख्या करें। (Explain Relationship between Average Revenue and Marginal Revenue.)

कुल परिवर्तनशील लागत

उत्तर⇒ औसत आय (AR) — बेची गयी वस्तु की प्रति इकाई के आय को औसत आय कहते हैं।

सीमांत आय (MR)—वस्तु की एक अतिरिक्त इकाई बेचने से कुल आय में जो वृद्धि होती है, उसे सीमांत आय कहते हैं।

दोनों में संबंध – औसत आय और सीमांत आय में साधारण संबंध
(i) औसत आय (AR) तब तक बढ़ता है जब तक सीमांत आय (MR) औसत आय (AR) से अधिक है। वैकल्पिक रूप में जब सीमांत आय (MR)= औसत आय (AR) तो औसत आय (AR) बढ़ता है।

(ii) औसत आय तब अधिकतम और स्थिर होता है जब सीमांत आय (MR), औसत आय (AR) के बराबर होता है। वैकल्पिक रूप में जब सीमांत आय (MR) = औसत आय (AR) तो औसत आय (AR) अधिकतम होता है।

कुल परिवर्तनशील लागत

(iii) औसत आय (AR) तब गिरता है जब सीमांत आय (MR), औसत आय (AR) से कम . होता है। वैकल्पिक रूप में जब सीमांत आय (MR), औसत आय (AR) से कम होता है। वैकल्पिक रूप में जब सीमांत आय (MR) < औसत आय (AR) तो औसत आय (AR) गिरता है। ____सीमांत आय (MR) ऋणात्मक हो सकता है लेकिन औसत आय (AR) कभी भी ऋणात्मक नहीं हो सकता है।
हम रेखाचित्र द्वारा दोनों के बीच संबंध को देख सकते हैं।चित्र में स्पष्ट है कि औसत आय (AR) वक्र तब तक ऊपर उठता है जब तक सीमांत आय (MR) > औसत आय (AR) से अधिक है। औसत आय (AR) वक्र बिन्दु A तक उठता है जहाँ गिरता हुआ सीमांत आय (MR) वक्र उसे काटता है। इस बिन्दु पर सीमांत आय (MR) = औसत आय (AR) गिरता हुआ सीमांत आय (MR) ऋणात्मक हो सकता है परंतु औसत आय (AR) हमेशा धनात्मक रहती है।

संक्षेप में हम कह सकते हैं रेखाचित्र यह दर्शाता है कि (i) औसत आय (AR) तब तब बढ़ते है जब तक सीमांत आय (MR)> औसत आय (AR) (ii) औसत आय (AR) अधिकतम होता है जब सीमांत आय (MR) = औसत आय (AR) (iii) औसत आय (AR) तब गिरने लगता है जब सीमांत आय < औसत आय (AR)


39. परिवर्तनशील अनुपात के नियम की व्याख्या कीजिए। ( Explain Relationship betbeen Average Revenue Marginal Revenue.)

उत्तर⇒ परिवर्तनशील अनुपात के नियम को आधुनिक अर्थशास्त्री ने अलग-अलग तरीके से इस नियम को परिभाषित किया गया है-
स्टिगलर के अनुसार, “जब कुछ उत्पत्ति साधनों को स्थिर रखकर एक उत्पत्ति साधन की इकाइयों में समान वृधि की जाए तब एक निश्चित बिंदु के बाद उत्पादन की उत्पन होने बाली व्रिधिया कम हो जाएगी अर्थात सीमांत उत्पादन घाट जाएगा ।

नियम की मान्यताएँ (Assumptions of the law)-
(i).एक उत्पत्ति साधन परिवर्तनशील है तथा अन्य स्थिर
(ii). परिवर्तनशील साधन की समस्त इकाइयाँ समरूप होती है।
(iii). तकनीकी स्तर में कोई परिवर्तन नहीं होता
(iv). स्थिर साधन अविभाज्य है।
(v). विभिन्न उत्पत्ति साधन अपूर्ण स्थानापन्न होते हैं।
(vi). स्थिर साधन सीमित एवं दुर्लभ है।

परिवर्तनशील अनुपात के नियम की तीन अवस्थाओं को स्पष्ट करती है। उत्पत्ति के बढ़ते प्रतिफल की अवस्था –
प्रथम अवस्था में स्थिर साधन के साथ जैसे-जैसे परिवर्तनशील साधन की इकाइयाँ प्रयोग में बढ़ायी जाती है हमें बढ़ता हुआ उत्पादन प्राप्त होता है जिसका मुख्य कारण है कि परिवर्तनशील साधन बढ़ने पर स्थिर साधनों का पूर्ण प्रयोग संभव हो पाता है।
दूसरी अवस्था घटते प्रतिफल की अवस्था होती है—इस अवस्था में औसत उत्पादन (AP) : तथा सीमांत उत्पादन (MP) दो घट रहे होते हैं। इस अवस्था का समापन उस बिन्दु पर होता है जहाँ सीमान्त उत्पादकता (MP) शून्य हो जाती है। इस अवस्था में कुल अवस्था में कुल उत्पादन (TP) भी बढ़ता है किन्तु घटती दर से बढ़ता है।
तीसरी अवस्था ऋणात्मक प्रतिफल की अवस्था होती है इस तीसरी अवस्था में सीमान्त उत्पादन (MP) शून्य से कम अर्थात् ऋणात्मक हो जाता है। इसमें सीमान्त उत्पादकता (MP) के ऋणात्मक हो जाने के कारण कुल उत्पादकता (TP) घटने लगती है।


40. पूर्ण प्रतियोगिता तथा एकाधिकृत प्रतियोगिता के अंतर्गत मूल्य निर्धारण में अंतर स्पष्ट कीजिए। (Clarify the difference between perfect competition and monopolistic com petition in price determined.)

उत्तर⇒ पूर्ण प्रतियोगिता बाजार की अवस्था है जिसमें क्रेताओं व विक्रेताओं की संख्या बहुत अधिक होती है। जबकि एकाधिकृत प्रतियोगिता में भी विक्रेताओं की संख्या अधिक होती है लेकिन पूर्ण प्रतियोगिता की तुलना में कम होती है। दोनों ही बाजार अवस्थाओं में संतुलन वहाँ प्राप्त होता है जहाँ सीमांत आय (MR) तथा सीमांत लागत (MC) दोनों एक-दूसरे के बराबर होते हैं।
दोनों ही बाजार अवस्थाओं में मल्य निर्धारण के लिए अल्पकाल में लाभ सामान्य लाभ तथा हानि प्राप्त हो सकती है, जबकि दीर्घकाल में दोनों ही बाजार अवस्थाओं में केवल सामान्य लाभ ही प्राप्त होता है। लेकिन फिर भी बाजार अवस्थाओं में मूल्य निर्धारण में कछ अंतर देखने
को मिलता है।
(i). पूर्ण प्रतियोगिता में माँग वक्र (अर्थात् औसत आगम = (AR) पूर्णतः मूल्य सापेक्ष होता है। यही कारण है कि उसे एक पड़ी रेखा द्वारा प्रदर्शित किया जाता है, परंतु एकाधिकृत प्रतियोगिता में माँग वक्र पूर्णतः मूल्य सापेक्ष नहीं होता वरन् बाएँ से दाएँ नीचे की ओर गिरता हुआ होता है।

(ii). पूर्ण प्रतियोगिता में जहाँ औसत आगम (AR) सीमांत आगम (MR) के बराबर होता है, एकाधिकृत प्रतियोगिता में AR, MR से अधिक होता है।

(iii). पूर्ण प्रतियोगिता में उत्पादक या विक्रेता की अपनी कोई कीमत नीति (Price Policy) नहीं होती, अर्थात् उसे बाजार में प्रचलित मूल्य ही स्वीकार करना पड़ता है, जबकि एकाधिकृत प्रतियोगिता में हर उत्पादक अपनी स्वतंत्र कीमत नीति (Price Policy) अपना सकता है।

(iv). पूर्ण प्रतियोगिता में सभी फर्में एक जैसी वस्तुओं का उत्पादन करती हैं, परंतु एकाधिकृत प्रतियोगिता में वास्तविक या काल्पनिक वस्तु विभेद (Product Differentiation) पाया जाता है।

(v). पूर्ण प्रतियोगिता में सीमान्त लागत, सीमान्त आगम तथा औसत आगम के बराबर होती है अर्थात् MC = MR = AR । परिणामतः उत्पादक को केवल सामान्य लाभ की प्राप्ति होती है, लेकिन एकाधिकृत प्रतियोगिता में सीमांत आगम सीमान्त लागत के बराबर होती है (MR = MC) परंतु औसत आगम (AR) से अधिक होता है।

(vi). एकाधिकृत प्रतियोगिता में पूर्ण प्रतियोगिता की तुलना में उत्पादन कम मात्रा में होता है।
इसी प्रकार पूर्ण प्रतियोगिता में MR = AR = AC की स्थिति होती है तथा एकाधिकृत प्रतियोगिता में MR = MC तो होता है, परंतु MR तथा MC से AR (औसत आगम) अधिक होता है।

Class 12th Economics Question Answer 2022 ( दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर ) ( 20 Marks ) PART-5

41. स्फीतिक अंतराल क्या है ? अतिरेक माँग के कारणों को बताएं। (What is Inflationary gap ? Explain reasons of arising excess demand ?)

कुल परिवर्तनशील लागत

उत्तर⇒ किसी अर्थव्यवस्था में पूर्ण रोजगार संतुलन की स्थिति को बनाए रखने के लिए जितनी सामूहिक माँग की आवश्यकता पड़ती है, उससे अधिक सामूहिक माँग के अंतर के माप को स्फीतिक अंतराल कहते हैं।
सामूहिक माँग सामूहिक पूर्ति से जितनी अधिक होती है, उस अंतर को स्फीतिक अंतराल कहते हैं।
स्फीतिक अंतराल की स्थिति में अर्थव्यवस्था में उत्पादन में वृद्धि नहीं होती केवल कीमतों में वृद्धि होती है। पूर्ण रोजगार की स्थिति में उत्पादन स्थिर हो जाता है। केवल कीमतों में वृद्धि होने लगती है। अर्थव्यवस्था में स्फीतिक दबाव उत्पन्न होने लगता है।
चित्र के द्वारा हम देख सकते हैं-

चित्र में AS वक्र E बिन्दु के बाद यह प्रकट करती है कि अर्थव्यवस्था में वस्तुओं तथा सेवाओं की अतिरिक्त पूर्ति संभव नहीं है। यदि कुल माँग में वृद्धि होती है तो यह अत्यधिक माँग का स्तर होगा। चित्र में यदि माँग AD से बढ़कर AD, होती है तो AD, तथा AD, का अंतर EF है जो स्फीतिक अंतराल को बताता है। – अतिरेक माँग के कारण E, बिन्दु नया संतुलन बिन्दु होगा। रोजगार का स्तर OY ही है। उन्हीं वस्तु तथा सेवाओं की पूर्ति के लिए कुल माँग में वृद्धि हो रही है जिसके कारण पूर्ण रोजगार संतुलन बिन्दु F पर वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि होगी।

अतिरेक माँग के कारण – किसी भी देश में अतिरेक माँग की स्थिति निम्नलिखित कारणों से उत्पन्न हो सकता है –

(i). सार्वजनिक व्यय में वृद्धि के कारण सरकार द्वारा की जाने वाली वस्तुओं व सेवाओं की माँग में वृद्धि।
(ii). करों में कमी के परिणामस्वरूप व्यय योग्य आय एवं उपभोग माँग में वृद्धि।
(iii). हीनार्थ प्रबंध के फलस्वरूप मुद्रा पूर्ति में वृद्धि।
(iv). साख विस्तार से माँग में वृद्धि
(v). विनियोग माँग में वृद्धि
(vi). उपभोग प्रवृत्ति में वृद्धि के फलस्वरूप उपभोग माँग में वृद्धि
(vii). निर्यात के लिए वस्तुओं की माँग में वृद्धि। इस प्रकार उपरोक्त कई कारण हैं जो अतिरेक माँग में वृद्धि के कारण हैं।


42. निवेश गुणक क्या है? गुणक एवं सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति में क्या संबंध है ? (What is Investment multiplier ? What is the relation between multiplier and marginal propensity to consume (MPC)?)

उत्तर⇒ केन्स का गुणक का सिद्धांत निवेश तथा आय के बीच संबंध स्थापित करता है इसलिए इसे निवेश गुणक कहा जाता है। गुणक की धारणा निवेश में प्रारंभिक परिवर्तन के परिणामस्वरूप आय में होने वाले अंतिम परिवर्तन के संबंध को व्यक्त करती है। गुणक निवेश में होने वाले परिवर्तन के कारण आय में होने वाले परिवर्तन का अनुपात है।
केन्स के अनुसार, “निवेश गुणक से ज्ञात होता है कि जब निवेश में वृद्धि की जाएगी तो आय में वृद्धि होगी, वह निवेश में होने वाली वृद्धि से K गुणा अधिक होगी।”
इस प्रकार स्पष्ट है कि विनियोग में हुई वृद्धि के कारण आय में होने वाली वृद्धि का अनुपात गुणक है। इसलिए केन्स का गुणक विनियोग या आय गुणक के नाम जाता है।

निवेश गुणक को निम्न सूत्र द्वारा देखा जा सकता है-

K = ∆Y/∆I
यहाँ , K = गुणक, ∆N = निवेश में परिवर्तन, ∆Y = आय में परिवर्तन।

निवेश गुणक एवं सीमांत उपभोग प्रवृत्ति में संबंध – केन्स का निवेश गुणक सीमांत उपभोग प्रवृत्ति पर निर्भर करता है। यदि सीमांत उपभोग प्रवृत्ति अधिक है तो गुणक भी अधिक होगा। इसके विपरीत यदि सीमांत उपभोग प्रवृत्ति कम है तो गुणक भी कम होगा। इस प्रकार गुणक और सीमांत उपभोग प्रवृत्ति में सीधा संबंध होता है।


43. पूर्ति की मूल्य लोच की परिभाषा दीजिए। इसे मापने की विधियों की व्याख्या करें। (Define price elasticity of supply. Explain the methods of measuring it.)

उत्तर⇒ किसी वस्तु के मूल्य में परिवर्तन के फलस्वरूप जिस गति या दर से उसकी पूर्ति में परिवर्तन होता है उसे पूर्ति की लोच कहा जाता है।

कुल परिवर्तनशील लागत

सैम्युलसन के अनुसार, “पूर्ति की लोच किसी वस्तु के मूल्य में परिवर्तन के फलस्वरूप उसकी पूर्ति की लोच की मात्रा है।”
“Elasticity of supply is the degree of the responsiveness of supply of a commodity to a change in its price.”

पूर्ति की लोच की माप – पूर्ति की लोच की माप पूर्ति की लोच की माप की मुख्यतः दो विधियाँ हैं –

(i) प्रतिशत विधि (Percentage method) — कीमत में प्रतिशत अंतर और पूर्ति में प्रतिशत अंतर के अनुपात से हम पूर्ति की लोच मापते हैं।

कुल परिवर्तनशील लागत

सूत्र के रूप में –

कुल परिवर्तनशील लागत

(ii) ज्यामितीय विधि (Geometric method) — इस विधि का प्रयोग पूर्ति वक्र पर स्थित किसी बिन्दु पर पूर्ति की लोच मापने के लिए किया जाता है। इसलिए इस विधि को बिंदु विधि भी कहा जाता है। यह विधि सीधी लकीर वाले पर्ति वक्र पर स्थित बिन्दु पर ES मापी जाती है।

चित्र में तीन सरल रेखीय पूर्ति वक्र बनाया गया है जिनमें OP कीमत पर पूर्ति की मात्रा 00 दिखाई गयी है। पूर्ति वक्र के बिन्दु R पर पूर्ति की कीमत लोच मापनी है। ज्यामितीय विधि द्वारा समतल खंड को पति की मात्रा से भाग देकर पति की लोच निकाली जाती है।


44. पूर्ति का नियम क्या है? पूर्ति पर कीमत का क्या प्रभाव पड़ता है ? (What is Law of Supply ? What is the effect of price on Supply ?)

उत्तर⇒ अन्य बातें समान रहने पर, वस्तु की कीमत वृद्धि पूर्ति को बढ़ाता है तथा वस्तु कीमत में कमी पूर्ति को घटाता है। इस प्रकार वस्तु कीमत तथा वस्तु पूर्ति में प्रत्यक्ष तथा सीधा संबंध पाया जाता है।
फलन के रूप में S = f(P)
पूर्ति का नियम यह बताता है कि अन्य बातें समान रहने पर जितनी कीमत अधिक होती है उतनी ही पूर्ति अधिक होती है या जितनी कीमत कम होती है उतनी ही पूर्ति कम होती है।
“The law of Supply States, othere things remaining constant, the higher the price, the greater the quantity supplied or the lower the price, the smallar the quantity supplied.’

पूर्ति का नियम वस्तु की कीमत एवं उसकी पूर्ति के बीच धनात्मक संबंध बताता है। जिसके कारण पूर्ति वक्र का ढाल बायें से दायें ऊपर की ओर चढ़ता हुआ होता है।
पूर्ति का नियम निम्न मान्यताओं पर आधारित है।
(i) बाजार में क्रेताओं और विक्रेताओं के आय स्तर में कोई परिवर्तन नहीं होना चाहिए।
(ii) स्थानापन्नों की कीमतों में परिवर्तन नहीं होनी चाहिए।
(iii) उत्पत्ति के साधनों की कीमतें स्थिर होनी चाहिए।
(iv) तकनीकी ज्ञान का स्तर स्थिर होनी चाहिए।
(v) सरकारी नीति में कोई परिवर्तन नहीं होनी चाहिए।
(vi) क्रेता तथा विक्रेता की रुचि, फैशन, आदत में परिवर्तन नहीं होनी चाहिए।

अपवाद (Eception) — पूर्ति के नियम के कुछ अपवाद निम्न हैं –

(i). कृषि वस्तुओं पर यह नियम अनिवार्य रूप से लागू नहीं होती है। अनेक प्राकृतिक आपदाओं जैसे सूखा, बाढ़, ओलावृष्टि के कारण कृषि उत्पादित वस्तुओं की कीमतें बढ़ने पर भी उनकी पूर्ति को नहीं बढ़ाया जा सकता।

(ii). नाशवान वस्तुओं पर पूर्ति का नियम लागू नहीं होता है।

(iii). सामाजिक प्रतिष्ठा वाली वस्तुओं पर भी यह नियम लागू नहीं होता है।
पूर्ति का कीमत पर प्रभाव पड़ता है। कीमत में परिवर्तन होने से पूर्ति में परिवर्तन होता रहता है। यह परिवर्तन पूर्ति के नियम के अनुरूप ही होते हैं। कीमत के कम होने पर पूर्ति में कमी तथा कीमत के बढ़ने पर पूर्ति में वृद्धि होती है। लेकिन कीमत में परिवर्तन होने पर उसकी पूर्ति में परिवर्तन होता है।


45. प्रत्यक्ष कर के गुण-दोष का वर्णन करें। (Explain merits and demerits of Direct taxes.)

उत्तर⇒ प्रत्यक्ष कर के गुण (Merits of Direct tax)—प्रत्यक्ष कर के निम्न प्रमुख गुण हैं-

(i) निश्चितता – प्रत्यक्ष कर के प्रमुख गुण यह है कि करदाता और सरकार दोनों ही यह जानते हैं कि उन्हें कितनी राशि देनी है और लेनी है।
(ii) मितव्ययी – प्रत्यक्ष कर करदाता द्वारा सीधे सरकार के हाथों में पहुँच जाते हैं।
(iii) न्यायशीलता – प्रत्यक्ष कर समानता के सिद्धान्त की पूर्ति करते हैं क्योंकि इन्हें नागरिकों की कर दान क्षमता के आधार पर गतिशील बनाया जा सकता है।
(iv) लोचदार – एक अच्छे कर की विशेषता यह है कि आवश्यकतानुसार आय में कमी या वृद्धि की जा सके।
(v) उत्पादकता – प्रत्यक्ष करों से प्राप्त आय का उपयोग देश के आर्थिक विकास में किया जाता है।
(vi) प्रगतिशील – प्रत्यक्ष करों में धनी व्यक्तियों को निर्धन व्यक्तियों की तुलना में अधिक कर देना पड़ता है।

प्रत्यक्ष कर के दोष (Demerits of Direct tax) — इसके निम्न दोषों को इस प्रकार देखा जा सकता है –

(i) करों की चोरी – प्रत्यक्ष कर के भार को कम करने के लिए करदाता अनेक प्रकार की बेईमानी करता है।
(ii) असविधाजनक – प्रत्यक्ष कर में करदाता को बहुत असुविधा होती है क्योंकि करदाता को इनका भुगतान करने में कई औपचारिकताओं को पूरा करना पडता है।

(iii) कर की मनमानी दरें – कर निर्धारण अधिकारी द्वारा कर की दरें निर्धारित होती है।

(iv) करदाता को मानसिक कष्ट – प्रत्यक्ष कर से करदाता को शारीरिक कष्ट के साथ मानसिक कष्ट भी होता है क्योकि उसे कर का भुगतान अपनी आय से करना पड़ता है।

(v) उत्पादन पर कुप्रभाव – प्रत्यक्ष करों का उत्पादन पर बुरा प्रभाव पड़ता है।


46. अप्रत्यक्ष कर के गण-दोष को बताएँ।। (Explain merits and demerits of Indirect taxes.)

उत्तर⇒ अप्रत्यक्ष कर के गुण-दोष (Merits and demerits of indirect tax)
Merits of indirect tax-अप्रत्यक्ष करों के निम्न गुण हैं –

(i) ये सुविधाजनक होते हैं – इन करों का भुगतान वस्तुओं के खरीदने के समय करना होता है और चूँकि वस्तुएँ एक बार बहुत बड़ी मात्रा में नहीं खरीदी जाती।

(ii) कर से बचना प्रायः कठिन होता है – क्योंकि ये वस्तु को खरीदते समय वस्तु-विक्रेता को ही दिए जाते हैं।

(iii) ये कर प्रत्येक नागरिक से वसल किए जाते हैं – ज्य की सहायता प्रत्येक नागरिक को करनी चाहिए। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए धनी और निर्धन प्रत्येक तक पहुंचने का परोक्ष कर एक वस्तुओं को खरीदते समय कर देना पड़ता है।

(iv). यह कर लोचदार होता है।
(v). इस प्रकार के करों से सामाजिक लाभ प्राप्त होता है।
(vi). कर प्रणाली का आधार विस्तृत होता है।

अप्रत्यक्ष करों के निम्न दोष देखे जा सकते हैं (Demerits of indirect tar)-
(i) अप्रत्यक्ष कर करदान योग्यता पर निर्भर नहीं है – अप्रत्यक्ष करों में धनी और निधन दोनों ही वर्गों को कर लगी हई वस्त का उपयोग करने पर कर का भगतान समान दर से करना पड़ता है जिससे व्यवहार में ये कर प्रतिगामी हो जाते हैं।

(ii). अप्रत्यक्ष करों से समाज में आर्थिक विषमता फैलती है।

(iii) अप्रत्यक्ष कर प्रायः अनिश्चित होते हैं – अनिवार्यताओं पर लगे कर को छोड़कर अन्य करों से प्राप्त होने वाली आय प्रायः अनिश्चित होती है।

(iv) अप्रत्यक्ष करों में मितव्ययिता नहीं रहती – इन करों को वसूल करने में खर्च अधिक पड़ता है।

(v) इनका उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है – अप्रत्यक्ष करों का उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

प्रत्यक्ष कर एवं अप्रत्यक्ष करों के गुण-दोषों के बाद हम इस निष्कर्ष पर आते हैं। किसी देश की कर प्रणाली को न्यायपूर्ण बनाने के लिए इन दोनों ही प्रकार के करों को लगाना चाहिए।


47. भुगतान शेष में असंतुलन के कारण कौन-कौन से हैं ? (Explain the reasons of adverse balance of payments.)

उत्तर⇒ भुगतान शेष में असंतुलन के कारण – भुगतान शेष में असंतुलन के कारणों को चार वर्गों में बाँटा जा सकता है –
(i) प्राकृतिक कारण; (ii) आर्थिक कारण, (iii) राजनैतिक कारण, (iv) सामाजिक कारण।

(i) प्राकृतिक कारण – भुगतान शेष के असंतुलन होने के कारण प्राकृतिक है। प्राकृतिक कारण . जैसे कि भूकंप, अकाल, सूखा इत्यादि भुगतान संतुलन में असंतुलन उत्पन्न कर देते हैं।

(ii) आर्थिक कारण – आर्थिक कारण के अंतर्गत भगतान शेष के असंतलन के निम्न कारण को देख सकते हैं-
(a) विकास व्यय – विकासशील देशों में बड़े पैमाने पर विकास व्यय के लिए भारी मात्रा में आयात किये जाते हैं।
(b) व्यापार चक्र – अर्थव्यवस्था में व्यावसायिक क्रियाओं में होने वाले उतार चढ़ाव के कारण निर्यातों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
(c) बढ़ती कीमतों के कारण भी भुगतान संतुलन में असंतुलन उत्पन्न हो जाता है।
(d) आयात प्रतिस्थापन के कारण आयातों में कमी हो जाती है जिसके कारण भुगतान संतुलन में घाटा कम हो जाता है।
(e) अन्य आर्थिक कारण – दूसरे देशों में पूर्ति के नये स्रोतों, नई और शेष प्रतियोगी वस्तुओं की खोज से देश के निर्यातों में कमी आती है।

(iii) राजनीतिक कारण – भुगतान संतुलन को असंतुलित करने वाले प्रमुख राजनीति कारण निम्न हैं –
(a) अधिक सुरक्षा व्यय के कारण भुगतान संतुलन में असंतुलन पैदा हो जाता है।
(b) अंतर्राष्ट्रीय संबंध – देश के अंतर्राष्ट्रीय संबंध मधुर, खिंचावपूर्ण, तनावपूर्ण एवं युद्धमय हो सकते हैं।
(c) दूतावासों का विस्तार – दूतावासों के विस्तार व उनके रख-रखाव पर किया गया ऊँचा व्यय देश के लिए आयात तुल्य होता है।
(d) राजनीतिक अस्थिरता – देश की राजनीतिक अस्थिरता भी देश के भुगतान संतुलन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

(iv) सामाजिक कारण – सामाजिक संरचना एवं सामाजिक मानदंडों में परिवर्तन के कारण लोगों की रुचि, स्वभाव और फैशन में परिवर्तन आ सकता है।
इस प्रकार उपरोक्त कई कारण है जिसके चलते भुगतान असंतुलन की स्थिति पैदा हो जाती है।


48. भुगतान संतुलन क्या है? प्रतिकूल भुगतान संतुलन को सुधारने के क्या उपाय हैं ? (What is Balance of Payments ? What are methods to correct adverse Balance of payment ?)

उत्तर⇒ भुगतान संतुलन का संबंध किसी देश के शेष विश्व के साथ हुए सभी आर्थिक लेन-देन के लेखांकन के रिकार्ड से है।

भुगतान संतुलन की परिभाषा – बेन्हम के अनुसार “किसी देश का भुगतान शेष किसी दिए समय में सारे संसार के साथ उसके लेन-देन का लेखा है।”

प्रतिकूल भुगतान संतुलन को सुधारने के उपाए — प्रत्येक देश अपने अपने भुगतान संतुलन को सुधारने के लिए निम्न उपाए करते हैं –

(i) निर्यातों में वृद्धि (Increasing in exports) – भुगतान संतुलन के प्रतिकूलता को ठीक करने के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण उपाए निर्यात में वृद्धि करना है।

(ii) आयात प्रतिस्थापन (Import substitution)-आयात की जाने वाली वस्तुओं का स्थान लेने वाली अर्थात् प्रतिस्थापित वस्तुएँ देश के अंदर निर्माण करनी चाहिए जिससे आयात कम हो सके।

(iii) घरेलू करेंसी का अवमूल्यन (Devaluation of domestic currency) – जब घरेलू मुद्रा
का विदेशी मुद्रा में मूल्य घटाया जाता है तो विदेशियों के लिए हमारी घरेलू वस्तुएं सस्ती हो जाती है।

(iv) विनिमय नियंत्रण (Exchange control) — सरकार ने सब निर्यातकों को विदेशी मुद्रा केंद्रीय बैंक में समर्पण करने के लिए विदेशी विनिमय पर नियंत्रण करना चाहिए।

(v) मुद्रा संकुचन (Deflation)—मुद्रा संकुचन द्वारा भी भुगतान संतुलन की प्रतिकूलता को कम किया जा सकता है।

(vi) विदेशी सहायता (External Assistance)—विदेशों से ऋण अथवा सहायता लेकर भी भुगतान संतुलन की प्रतिकूलता को ठीक किया जा सकता है। विदेशी व्यक्तियों, बैंकों, सरकारों एवं विश्व बैंक तथा मुद्रा कोष से ऋण लेकर अल्पकाल में भगतान संतलन की प्रतिकूलता को ठीक किया जा सकता है। इस प्रकार उपरोक्त उपायों द्वारा भुगतान संतुलन के प्रतिकूलता को सधारा जा सकता है।


49. उत्पत्ति ह्रास नियम क्या है? यह क्यों लागू होती है ?
(What is law of Diminishing Return? Why does this law become operative ?)

उत्तर⇒ इस नियम का प्रतिपादन सबसे पहले टरगो (Turgot) ने की थी।
मार्शल ने इस सिद्धांत की व्याख्या कृषि के संदर्भ में की है। उनके अनुसार, “यदि कृषि कला में कोई सुधार नहीं तो भूमि पर उपयोग की जाने वाली पूँजी एवं श्रम की मात्रा में वृद्धि करने से कुल उपज़ में सामान्यतः अनुपात से कम वृद्धि होती है।
इस बिन्दु के बाद जैसे-जैसे परिवर्तनशील साधन की इकाइयों में वृद्धि की जाती है वैसे-वैसे सीमांत उत्पादन गिरता जाता है।
श्रीमती जॉन राबिन्सन के अनुसार, “उत्पत्ति ह्रास नियम यह बताता है कि यदि किसी एक उत्पत्ति के साधन की मात्रा को स्थिर रखा जाए तथा अन्य साधनों की मात्रा में उत्तरोत्तर वृद्धि की जाए तो एक निश्चित बिन्दु के बाद उत्पादन में घटती दर से वृद्धि होती है।”

मान्यताएँ (Assumptions) – इस नियम की निम्न मान्यताएँ हैं –
(i). एक उत्पत्ति साधन परिवर्तनशील है तथा अन्य स्थिर।
(ii). परिवर्तनशील साधन की समस्त इकाइयाँ समरूप होते हैं।
(ii). तकनीकी स्तर में कोई परिवर्तन नहीं होता।
(iv). स्थिर साधन अविभाज्य है।
(v). विभिन्न उत्पत्ति साधन अपूर्ण स्थानापन्न होते हैं।
(vi). स्थिर साधन सीमित एवं दुर्लभ है।

उत्पत्ति हास नियम लागू होने के कारण – इस नियम के लागू होने के निम्न प्रमुख कारण हैं –
(i) साधनों की निश्चित पूर्ति – जिसके कारण उत्पत्ति ह्रास नियम लागू होता है।
(ii) साधनों के आदर्श प्रयोग का अभाव – अभाव में उत्पत्ति ह्रास नियम लागू होता है।
(iii) साधनों के बीच अपूर्ण स्थानापन्नता का होना – उत्पत्ति ह्रास नियम लागू होने का कारण माना जाता है।
(iv) कृषि तथा प्राथमिक क्षेत्र में प्रकृति की प्रधानता द्वारा – उत्पत्ति ह्रास नियम क्रियाशील होने लगता है।

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examunlocker@gmail.com

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