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1. बातचीत प्रश्न ( लघु उत्तरीय प्रश्न एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्न )


1. अगर हममें वाशक्ति न होती तो क्या होता ?

उत्तर ⇒ हममें वाक्शक्ति न होती तो मनुष्य गूंगा होता, वह मूकबधिर होता। मनुष्य को सृष्टि की सबसे महत्वपूर्ण देन उसकी वाक्शक्ति है। इसी वाक्शक्ति के कारण वह समाज में वार्तालाप करता है। वह अपनी बातों को अभिव्यक्त करता है. और उसकी यही अभिव्यक्ति वाकशक्ति भाषा कहलाती है। व्यक्ति समाज में रहता है। इसलिए अन्य व्यक्ति के साथ उ पारस्परिक सम्बन्ध और कुछ जरूरतें होती हैं जिसके कारण वह वार्तालाप करता है। यह ईश्वर द्वारा दी हुई मनुष्य की अनमोल कृति है। इसी वाक्शक्ति के कारण वह मनुष्य है। यदि हममें इस वाकशक्ति का अभाव होता तो मनुष्य जानवरों की भाँति ही होता। वह अपनी क्रियाओं को अभिव्यक्त नहीं कर पाता। जो हम सुख-दुख इंद्रियों के कारण अनुभव करते हैं वह अवाक रहने के कारण नहीं कह पाते।


2. बातचीत के संबंध में बेन जॉनसन और एडिसन के क्या विचार हैं ?

उत्तर ⇒ बातचीत के संदर्भ में विभिन्न विद्वानों ने अपने-अपने ढंग से अनेक विचार रखे हैं। इनमें बेन जॉनसन और एडिसन के विचारों को लेखक ने यहाँ उद्धृत किया है। बेन जॉनसन के अनुसार बोलने से ही मनुष्य के रूप का साक्षात्कार होता है। वास्तव में, जब तक मनुष्य बोलता नहीं तबतक उसका गुण-दोष प्रकट नहीं होता। दूसरे विद्वान एडिसन के अनुसार असल बातचीत केवल दो व्यक्तियों में हो सकती है। कहने का तात्पर्य है कि जब दो आदमी होते तभी अपना दिल एक-दूसरे के सामने खोलते हैं। तीसरे व्यक्ति की अनुपस्थिति मात्र से ही बातचीत की धारा बदल जाती है। जब चार आदमी हुए तो ‘बेतकल्लुफी’ का स्थान ‘फार्मेलिटी’ ले लेती है। अर्थात्. बातचीत सारगर्भित न होकर मात्र रस्म अदायगी भर रह जाती है।


3. ‘आर्ट ऑफ कनवरसेशन’ क्या है ?

उत्तर ⇒ आर्ट ऑफ कनवरसेशन’ का अर्थ है-वार्तालाप की कला। ‘आर्ट ऑफ कनवरसेशन’ के हुनर की बराबरी स्पीच और लेख दोनों नहीं कर पाते। इस हुनर की पूर्ण शोभा काव्यकला प्रवीण विद्वतमंडली में है। इस कला के माहिर व्यक्ति ऐसे चतुराई से प्रसंग छेड़ते हैं कि श्रोताओं के लिए बातचीत कर्णप्रिय तथा अत्यन्त सुखदायी होती है। सुहृद गोष्ठी इसी का नाम है। सहृद गोष्ठी की विशेषता है कि वक्ता के वाकचातुर्य का अभिमान या कपट कहीं प्रकट नहीं हो पाता तथा बातचीत की सरसता बनी रहती है। कपट और एक-दूसरे को अपने पांडित्य के प्रकाश से परास्त करने का संघर्ष आदि रसाभास की सामग्री ‘आर्ट ऑफ कनवरसेशन’ का मूलतंत्र होती है। यूरोप के लोगों का ‘आर्ट ऑफ कनवरसेशन’ जगत् प्रसिद्ध है।


4. मनुष्य की बातचीत का उत्तम तरीका क्या हो सकता है ? इसके द्वारा वह कैसे अपने लिए सर्वथा नवीन संसार की रचना कर सकता है ?

उत्तर ⇒ मनुष्य की बातचीत का सबसे उत्तम तरीका उसका आत्मवार्तालाप है। वह अपने अन्दर ऐसी शक्ति विकसित करे जिस कारण वह अपने आप से बात कर लिया करे। आत्मवार्तालाप से तात्पर्य क्रोध पर नियंत्रण है जिसके कारण अन्य किसी व्यक्ति को कष्ट न पहुँचे। क्योंकि हमारी भीतरी मनोवृत्ति प्रतिक्षण नए-नए रंग दिखाया करती है। वह हमेशा बदलती रहती है। लेखक इस मन को प्रपंचात्मक संसार का एक बड़ा भारी आइना के रूप में देखता है जिसमें जैसी चाहो वैसी सूरत देख लेना कोई असंभव बात नहीं। अतः मनुष्य को चाहिए कि मन की चित्त को एकाग्र कर मनोवृत्ति स्थिर कर अपने आप से बातचीत करना चाहिए। इससे आत्मचेतना का विकास होगा। उस वाणी पर नियंत्रण हो जायेगा जिसके कारण दनिया में किसी से न वैर रहेगा और बिना प्रयास के हम बड़े-बड़े अजेय शत्रु पर भी विजय पा सकते हैं। यदि ऐसा हुआ तो हम सर्वथा एक नवीन संसार की रचना कर सकते हैं। इससे हमारी वाकशक्ति का दमन भी नहीं होगा। अतः व्यक्ति को चाहिए कि अपनी जिहवा को काबू में रखकर मधुरता से सिक्त वाणी बोले। न किसी से कटुता रहेगी न वैर। दुनिया सूबसूरत हो जायेगी। मनुष्य के बातचीत करने का सही उत्तम तरीका है।


5. बातचीत शीर्षक कहानी का सारांश लिखें। अथवा, ‘बातचीत’ निबंध में निहित विचारों को स्पष्ट करें।

उत्तर ⇒ बालकृष्ण भट्ट आधुनिक हिन्दी गद्य के आदि निर्माताओं और उन्नायक रचनाकारों में एक हैं। बालकृष्ण भट्ट बातचीत निबंध के माध्यम से मनुष्य को ईश्वर द्वारा दी गई अनमोल वस्तु वाक्शक्ति का सही इस्तेमाल करने को बताते हैं। वे बताते हैं कि यदि वाक्शक्ति मनुष्य में न होती तो हम नहीं जानते कि इस गूंगी सृष्टि का क्या हाल होता। सबलोग मानों लुज-पुंज अवस्था में कोने में बैठा दिए गए होते। बातचीत के विभिन्न तरीके भी बताते हैं। यथा घरेलू बातचीत मन रमाने का ढंग है। वे बताते हैं कि जहाँ आदमी की अपनी जिंदगी मजेदार बनाने के लिए खाने, पीने, चलने, फिरने आदि की जरूरत है, वहाँ बातचीत की भी अत्यन्त आवश्यकता है। जो कुछ मवाद या धुआँ जमा रहता है वह बातचीत के जरिए भाप बनकर बाहर निकल पड़ता है। इससे चित हल्का और स्वच्छ हो परम आनंद में मग्न हो जाता है। बातचीत का भी एक खास तरह का मजा होता है। यही नहीं, वे बतलाते हैं कि मनुष्य बोलता नहीं तबतक उसका गुण-दोष नहीं प्रकट होता। बेन जानसन का कहना है कि बोलने से ही मनुष्य के रूप का साक्षात्कार हो जाता है। वे कहते हैं कि चार से अधिक की बातचीत तो केवल राम-रमौवल कहलाएगी। यूरोप के लोगों में बातचीत का हुनर है जिसे आर्ट ऑफ कनवरसेशन कहते हैं। इस प्रसंग में ऐसे चतुराई से प्रसंग छोड़े जाते हैं कि जिन्हें कान को सुन अत्यंत सुख मिलता है। हिन्दी में इसका नाम सुहद गोष्ठी है। बालकृष्ण भट्ट बातचीत का उत्तम तरीका यह मानते हैं कि हम वह शक्ति पैदा करें कि अपने आप बात कर लिया करें।

2. उसने कहा था ( लघु उत्तरीय प्रश्न एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्न )


1. लहना सिंह का परिचय अपने शब्दों में दें।

उत्तर ⇒  लहना सिंह ब्रिटिश सेना का एक सिक्ख जमादार है। वह भारत से दूर विदेश (फ्रांस) में जर्मन सेना के विरुद्ध युद्ध करने के लिए भेजा गया है। वह एक कर्त्तव्यनिष्ठ सैनिक है। अदम्य साहस, शौर्य एवं निष्ठा से युक्त वह युद्ध के मोर्चे पर डटा हुआ है। विषम परिस्थितियों में भी कभी वह हतोत्साहित नहीं होता। अपने प्राणों की परवाह किए बिना वह युद्धभूमि में खंदकों में रात-दिन पूर्ण तन्मयता के साथ कार्यरत रहता है। कई दिनों तक खंदक में बैठकर निगरानी करते हुए जब वह ऊब जाता है तो एक दिन वह अपने सूबेदार से कहता है कि यहाँ के इस कार्य (ड्यूटी) से उसका मन भर गया है, ऐसी निष्क्रियता से वह अपनी क्षमता का प्रदर्शन नहीं कर पा रहा है। वह कहता है- “मुझे तो संगीन चढ़ाकर मार्च का हुक्म मिल जाए, फिर सात जर्मन को अकेला मारकर न लौटूं तो मुझे दरबार साहब की देहली पर मत्था टेकना नसीब न हो।” उसके इन शब्दों से दृढ़ निश्चय एवं आत्मोसर्ग की भावना निहित है। वह शत्रु से लोहा लेने के लिए इतना ही उत्कंठित है कि उसका कथन जो इन शब्दों में प्रकट होता है-“बिना फेरे घोड़ा बिगड़ता है और बिना लड़े सिपाही।” शत्रु की हर चाल को विफल करने की अपूर्व क्षमता एवं दूरदर्शिता उसमें थी।
उसके जीवन का एक दूसरा पहलू भी है उसकी मानवीय संवेदना, वचनबद्धता तथा प्रेम। अपनी किशोरावस्था में एक बालिका के प्रति उसका अव्यक्त प्रेम था। कालान्तर में वह सेना में भर्ती हो गया तथा संयोगवश उसे यह ज्ञात हुआ कि वह बालिका अब सूबेदार की पत्नी है, उससे भेंट होने पर सूबेदार की पत्नी ने अपने पति एवं फौज में भर्ती उसके अपने एकमात्र पुत्र की रक्षा का वचन लहना सिंह से लिया जिसका पालन लहना सिंह ने अपने प्राणों बाजी लगाकर किया। यह उसकी कर्तव्यपरायणता तथा वचन का पालन करने का उत्कृष्ट उदाहरण है 


2. ‘उसने कहा था’ कहानी पहली बार कब प्रकाशित हई थी ?

उत्तर ⇒ उसने कहा था’ कहानी पहली बार 1915 में प्रकाशित हुई थी।


3. ‘उसने कहा था’ कहानी में किसने, किससे क्या कहा था ?

उत्तर ⇒ उसने कहा था’ कहानी में सुबेदारनी ने लहना सिंह से कहा कि जिस तरह उस समय उसने एक बार घोड़े की लातों से उसकी रक्षा की थी उसी प्रकार उसके पति और एकमात्र पुत्र की भी वह रक्षा करें। वह उसके आगे अपना आँचल पसार कर भिक्षा माँगती है। यह बात लहना सिंह के मर्म को छू जाती है।


4. कहानी का शीर्षक ‘उसने कहा था’ सबसे सटीक शीर्षक है। अगर हां तो क्या आप इसके लिए कोई दूसरा शीर्षक सुझाना चाहेंगे। अपना पक्ष रखें।

उत्तर ⇒ जहाँ तक कहानी के शीर्षक का सवाल है उसकी उपयुक्तता स्पष्ट है-उसने कहा था। सूबेदारनी की बातें जहाँ स्वयं सूबेदारनी के चरित्र को उजागर करती है वहीं लहनासिंह के चरित्र में भी महत्त्वपूर्ण मोड़ लानेवाली साबित होती है। सूबेदारनी की बातें ही उनके बीच के संबंधों को भी उजागर करती हैं जो कहानी का मुख्य प्रतिपाद्य है। इसलिए सूबेदारनी के कहे वचन की ओर संकेत कराने वाला यह शीर्षक सटीक है। मृत्यु की ओर बढ़ते लहनासिंह के अंतिम क्षणों में भी सूबेदारनी के कहे शब्द ही गूंजते रहते हैं। यही शब्द लहनासिंह को । सूबेदारनी का विश्वास बनकर महान त्याग की प्रेरणा देता है।


5. ‘उसने कहा था’ कहानी का केन्द्रीय भाव क्या है ? वर्णन करें।

उत्तर ⇒ ‘उसने कहा था’ प्रथम विश्वयुद्ध की पृष्ठभूमि में लिखी गयी कहानी है। गुलेरीजी ने लहनासिंह और सबेदारनी के माध्यम से मानवीय संबंधों का नया रूप प्रस्तुत किया है। लहना सिंह सूबेदारनी के अपने प्रति विश्वास से अभिभूत होता है, क्योंकि उस विश्वास की नींव में बचपन के संबंध है। सबेदारनी का विश्वास ही लहनासिंह को उस महान त्याग की प्रेरण देता है।

कहानी एक और स्तर पर अपने को व्यक्त करती है। प्रथम विश्वयुद्ध की पृष्ठभूमि पर यह एक अर्थ में युद्ध-विरोधी कहानी भी है। क्योंकि लहनासिंह के बलिदान का उचित सम्मान किया जाना चाहिए था परन्तु उसका बलिदान व्यर्थ हो जाता है और लहनासिंह का करुण अंत
युद्ध के विरुद्ध में खड़ा हो जाता है। लहनासिंह का कोई सपना पूरा नहीं होता।


6. लहना सिंह के प्रेम के बारे में लिखिए।

उत्तर ⇒ लहना सिंह अपनी किशोरावस्था में एक अंजान लड़की के प्रति आशक्त हुआ था किंतु वह उससे प्रणय सूत्र में नहीं बँध सका। कालांतर में उस लड़की का विवाह सेना में कार्यरत एक सूबेदार से हो गया। लहना सिंह भी सेना में भर्ती हो गया। अचानक अनेक वर्षों के बाद उसे ज्ञात हुआ कि सूबेदारिन ही वह लड़की है जिससे उसने कभी प्रेम किया था। सूबेदारिन ने उससे निवेदन किया कि वह उसके पति सेना में भर्ती व एकमात्र पुत्र बोधा सिंह की रक्षा करेगा। लहना ने कहा था कि उस वचन को निभाएगा और अपने प्राणों का बलिदान कर उसने अपनी प्रतिज्ञा का पालन किया। यही उसका वास्तविक प्रेम था।


7. ‘उसने कहा था’ कहानी कितने भागों में बँटी हुई है ? कहानी के कितने भागों में युद्ध का वर्णन है ?

उत्तर ⇒ ‘उसने कहा था’ कहानी पाँच भागों में बँटी हुई है। इस पूरी कहानी में तीन भागों में युद्ध का वर्णन है। द्वितीय, तृतीय तथा चतुर्थ भाग में युद्ध के दृश्य हैं।


8. कहानी के पात्रों की एक सूची तैयार करें।

उत्तर ⇒ कहानी का मुख्य पात्र लहना सिंह है जिसके इर्द-गिर्द कहानी के घटनाक्रम घूम रहे हैं। उसके अतिरिक्त अन्य पात्र निम्नलिखित हैं –

1. एक बालिका – जिसकी भेंट कभी किशोरावस्था में लहना सिंह से हुई थी तथा कालान्तर में उसका विवाह सूबेदार हजारा सिंह के साथ हुआ।
2. लहना सिंह – कहानी का मुख्य पात्र।
3. हजारा सिंह – सूबेदार।
4. बोधा सिंह – हजारा सिंह का पुत्र।
5. लपटन साहब – सेना का एक उच्च अधिकारी।
6. वजीरा सिंह – एक सैनिक।


9. “जाड़ा क्या है, मौत है और निमोनिया से मरनेवालों को मुरब्बे नहीं मिला करते।” वजीरा सिंह के इस कथन का क्या आशय है ?

उत्तर ⇒ वजीरा सिंह जो पलटन का विदूषक है लहना सिंह को कहता है कि अपने स्वास्थ्य की रक्षा करो। जाड़ा की ठंढ मौत का कारण बन सकती है। मरने के बाद तुम्हें कुछ प्राप्त होने वाला नहीं है। यदि निमोनिया से तुम्हारी मृत्यु हो जाती है तो तुम्हें कोई मुरब्बा अथवा अन्य स्वादिष्ट वस्तुएँ नहीं मिलेंगी। जीवन का सुख फिर नहीं मिलेगा। साथ ही तुम अपने अस्तित्व को इस प्रकार समाप्त कर दोगे, अर्थात् मृत्यु ही अन्तिम सच्चाई है।


10. “कहती है, तुम राजा हो, मेरे मुल्क को बचाने आए हो।” वजीरा के इस कथन में किसकी ओर संकेत है ?

उत्तर ⇒ यह कथन उस देश (सम्भवतः फ्रांस) की एक महिला का है। उसके बंगले के बगीचे में जब वजीरा सिंह अथवा उसके अन्य साथी जाते हैं तो वहाँ की मालकिन उक्त महिला इन लोगों को फल, दूध तथा अन्य भोज्य पदार्थ बहुत प्रसन्न होकर देती है तथा उसके लिए उनसे पैसे नहीं लेती है। उसे इस बात की प्रसन्नता है कि उक्त सैनिक इसके देश को जर्मन हमलावरों से रक्षा करने के लिए आए हुए हैं। अतः वह उन सैनिकों को अपना रक्षक मानकर उनका स्वागत-सत्कार करने को तत्पर रहती है।


11. “कहती है, तुम राजा हो, मेरे मुल्क को बचाने आए हो।” वजीरा के इस कथन में किसकी ओर संकेत है ?

उत्तर ⇒ यह कथन उस देश (सम्भवतः फ्रांस) की एक महिला का है। उसके बंगले के बगीचे में जब वजीरा सिंह अथवा उसके अन्य साथी जाते हैं तो वहाँ की मालकिन उक्त महिला इन लोगों को फल, दूध तथा अन्य भोज्य पदार्थ बहुत प्रसन्न होकर देती है तथा उसके लिए उनसे पैसे नहीं लेती है। उसे इस बात की प्रसन्नता है कि उक्त सैनिक इसके देश को जर्मन हमलावरों से रक्षा करने के लिए आए हुए हैं। अतः वह उन सैनिकों को अपना रक्षक मानकर उनका स्वागत-सत्कार करने को तत्पर रहती है।


12. लहना के गाँव में आया तुर्की मौलवी क्या कहता है ?

उत्तर ⇒ लहना के गाँव में एक तुर्की मौलवी पहुँचकर वहाँ के लोगों को प्रलोभित करता है। वह उनलोगों को मीठी-मीठी बातों से भुलावे में डालने का प्रयास करता है। वह गाँववालों को कहता है कि जब जर्मन शासन आएगा तो तुमलोगों के सारे कष्ट दूर हो जाएंगे। तुमलोग सुख-चैन की वंशी बजाओगे। तुम्हारी सारी आवश्यकताएँ पूरी हो जाएँगी।


13. ‘उसने कहा था’ पाठ के आधार पर सूबेदारनी का चरित्र-चित्रण करें।

उत्तर ⇒ सूबेदारनी कहानी में सिर्फ दो बार आती है। एक बार कहानी के आरंभ में ही, दूसरी बार कहानी के अंतिम भाग में, वह भी लहनासिंह की स्मृतियों में। लेकिन कहानी में सूबेदारनी का चरित्र लहनासिंह के बाद सबसे महत्त्वपूर्ण चरित्र है। उससे पहली मुलाकात आठ वर्ष की बालिका के रूप में होती है जो अपने ही हमउम्र लडके के मजाक से लज्जाती है। लेकिन उसके व्यक्तित्व में पहला परिवर्तन ही हमें तब नजर आता है, लहना सिंह के इस प्रश्न के जबाब में कि तेरी कुड़माई हो गई और जब वह यह कहती है कि “हाँ हो गई देखते नहीं रेशम से कढ़ा सालू।” उसका इतने विश्वास के साथ जवाब देना यह बताता है कि जैसे सगाई के साथ वह एकाएक बहुत बड़ी हो गयी है, इतनी बड़ी कि उसमें इतना विश्वास आ गया है कि वह दृढ़तापूर्वक जवाब दे सके कि “हाँ हो गई।” जाहिर है विश्वास की यह अभिव्यक्ति सूबेदारनी के व्यक्तित्व का नया पहलू है। फिर भी अभी वह यह समझने में असमर्थ है कि ‘कुड़माई’ का अर्थ क्या है। इसलिए या लड़की होने के कारण अपनी भावनाओं को या तो वह व्यक्त नहीं करती इसलिए ऐसा नहीं लगता कि कुड़माई का उस पर भी वैसा ही। आघात लगा है जैसा लहना सिंह पर लगा था।

किन्तु लहनासिंह के साथ उसके संबंध कितने गहरे थे इसका अहसास भी कहानी में सूबेदारनी के माध्यम से ही होता है। आठ साल की नादान-सी उम्र में जिस लड़के से उसका मजाक का संबंध बना था उसे वह पच्चीस साल बाद भी अपने मन-मस्तिष्क से नहीं निकाल पाई। जबकि इस दौरान वह किसी और की पत्नी बन चुकी थी उसका घर-परिवार था। जवान बेटा था। और जैसा कि कहानी से स्पष्ट होता है वह अपने घर-परिवार से सुखी और प्रसन्न थी।

लेकिन पच्चीस साल बाद भी जब लहनासिंह उसके सामने आता है तो वह उसे तत्काल पहचान जाती है। न केवल पहचान जाती है बल्कि अपने बचपन के संबंधों के बल पर उसे विश्वास है कि अगर वह लहनासिंह को कुछ करने को कहेगी तो वह कभी इनकार नहीं करेगा। निश्चय ही यह विश्वास उसके अन्दर लहनासिंह के व्यक्तित्व से नहीं पैदा हुआ बल्कि यह स्वयं उसके मन में लहनासिंह के प्रति जो भावना थी उससे पैदा हुआ था। लहनासिंह के प्रति उसके अंतर्मन में बसी लगाव की भावना का इस तरह पच्चीस साल बाद भी जिन्दा रहना सूबेदारनी के व्यक्तित्व को नया निखार देता है। इस अर्थ में वह परंपरागत भारतीय नारी से भिन्न नजर आती है।

इसका अर्थ यह नहीं है कि सूबेदारनी अपने घर-परिवार के दायित्व से विमुख है। बल्कि इसके ठीक विपरीत लहनासिंह से उसकी पच्चीस साल बाद हुई मुलाकात उसके अपने घर-परिवार के प्रति गहरे दायित्व बोध को भी व्यक्त करती है। वह लहना सिंह से प्रार्थना करती है कि जिस तरह बचपन में उसने तांगे से उसे बचाया था, उसी तरह अब उसके पति और पुत्र के प्राणों की भी रक्षा करे। इस तरह उसमें अपने पति और पुत्र के प्रति प्रेम और कर्तव्य की भावना भी है।

हम कह सकते हैं कि सूबेदारनी के लिए जितना सत्य अपने पति और पत्र के प्रति प्यार और कर्त्तव्य है उतना ही सत्य उसके लिए वे स्मृतियाँ भी हैं। जो लहनासिंह के प्रति उसके लगाव को व्यक्त करती है। उसके चरित्र के दो पहलू हैं और इनसे ही उसका चरित्र महत्त्वपूर्ण है।


14. ‘उसने कहा था’ पाठ के आधार पर लहनासिंह का चरित्र-चित्रण करें।

उत्तर ⇒ लहनासिंह से हमारा पहला परिचय अमृतसर के बाजार में होता है। उसकी उम्र सिर्फ 12 वर्ष है। किशोर वय, शरारती चुलबुला। उसका यह शरारतीपन बाद में युद्ध के मैदान में भी दिखाई देता है। वह अपने मामा के यहाँ आया हुआ है। वहीं बाजार में उसकी मुलाकात 8 वर्ष की एक लड़की से होती है। अपनी शरारत करने की आदत के कारण वह लड़की से पूछता है-“तेरी कुड़माई हो गई।” और फिर यह मजाक ही उस लड़की से उसका संबंध सत्र बन जाता है। लेकिन मजाक-मजाक में पूछा गया यह सवाल उसके दिल में उस अनजान लड़की के प्रति मोह पैदा कर देता है। ऐसा ‘मोह’ जिसे ठीक-ठीक समझने की उसकी उम्र नहीं है। लेकिन जब लड़की बताती है कि हाँ उसकी सगाई हो गई है, तो उसके हृदय को आघात लगता है। शायद उस लड़की के प्रति उसका लगाव इस खबर को सहन नहीं कर पाता और वह अपना गुस्सा दूसरों पर निकालता है। लहनासिंह के चरित्र का यह पक्ष अत्यंत महत्त्वपूर्ण तो है लेकिन असामान्य नहीं। लड़की के प्रति लहनासिंह का सारा व्यवहार बालकोचित है। लड़की के प्रति उसका मोह लगातार एक माह तक मिलने-जुलने से पैदा हुआ है और यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। लेकिन लहनासिंह के चरित्र की एक और विशेषता का प्रकाशन बचपन में ही हो जाता है, वह है उसका साहस। अपनी जान जोखिम में डालकर दूसरे को बचाने की कोशिश। लहनासिंह जब सूबेदारनी से मिलता है तो वह बताती है कि किस तरह एक बार उसने उसे तांगे के नीचे आने से बचाया था और इसके लिए वह स्वयं घोड़े के आगे चला गया था। इस तरह लहनासिंह के चरित्र के ये दोनों पक्ष आगे कहानी में उसके व्यक्तित्व को निर्धारित. करने में मुख्य भूमिका निभाते हैं। एक अनजान बालिका के प्रति मन में पैदा हुआ स्नेह भाव और दूसरा उसका साहस।

लहनासिंह किसान का बेटा है, खेती छोड़कर सिपाही बन जाता है। लेकिन सिपाही बन जाने के बाद भी उसकी मानसिकताएँ उसके स्वप्न और उसकी आकांक्षाएँ किसानों-सी ही रहती है। सेना में वह मामली सिपाही है जमादार के पद पर। लेकिन वहाँ भी किसानी जीवन की समस्याएँ उसका पीछा नहीं छोड़तीं। वह छुट्टी लेकर अपने गाँव जाता है। जमीन के किसी मुकदमे की पैरवी के लिए। कहानीकार यह संकेत नहीं देता है कि लहनासिंह विवाहित है या
अविवाहित। लेकिन लहनासिंह की बातों से यही लगता है कि वह अविवाहित है। उसका एक भतीजा है-कीरतसिंह जिसकी गोद में सिर रखकर वह अपने बाकी दिन गुजारना चाहता है। अपने गाँव, अपने खेत, अपने बाग में। उसे सरकार से किसी जमीन-जायदाद की उम्मीद नहीं है न ही खिताब की। एक साधारण जिन्दगी जी रहा है उतना ही साधारण जितनी कि किसी भी किसान या सिपाही की हो सकती है। उस लड़की की स्मृति भी समय की पर्तों के नीचे दब चुकी है जिससे उसने कभी पूछा था कि क्या तेरी कुड़माई हो गई।

लेकिन उसके साधारण जीवन में जबर्दस्त मोड़ तब आता है जब उसकी मुलाकात 25 साल बाद सूबेदारनी से होती है। सूबेदारनी उसे इतने सालों बाद भी देखते ही पहचान लेती है। इससे पता चलता है कि बचपन की घटना उसको कितनी अधिक प्रभावित कर गई थी। जब वह उसे बचपन की घटनाओं का स्मरण कराती है तो वह आवाक्-सा रह जाता है। भूला वह भी नहीं है, लेकिन समय ने उस पर एक गहरी पर्त बिछा दी थी, आज एकाएक धूल पोछकर साफ हो गई है। सूबेदारनी ने बचपन के उन संबंधों को अबतक अपने मन में जिलाये रखा। यह लहनासिंह के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण था। उसी संबंध के बल पर सूबेदारनी का यह विश्वास करना कि लहनासिंह उसकी बात टालेगा नहीं लहनासिंह के लिए और भी विस्मयकारी था। वस्तुतः उसका लहनासिंह पर यह विश्वास ही बचपन के उन संबंधों की गहराई को व्यक्त करता है और इसी विश्वास की रक्षा करना लहनासिंह के जीवन की धुरी बन जाता है।

लहनासिंह एक वीर सिपाही है और खतरे के समय भी अपना मानसिक संतुलन नहीं खोता। खंदक में पड़े-पड़े उकताने से वह शत्रु पर आक्रमण बेहतर समझता है। यहाँ उसकी कृषक मानसिकता प्रकट होती है जो निकम्मेपन और ऊब से बेहतर तो लड़ते हुए अपनी जान
देना समझता है।

जब उसकी टुकड़ी में जर्मन जासूस कैप्टन साहब बनकर घुस आता है तब उसकी सूझबूझ और चतुराई देखते ही बनती है। उसे यह पहचानने में देर नहीं लगती कि यह कैप्टन साहब नहीं बल्कि जर्मन जासूस है और तब वह उसी के अनुकूल कदम उठाने में नहीं हिचकिचाया
और बाद में उस जर्मन जासूस के साथ मुठभेड़ या लड़ाई के दौरान भी उसका साहसिकता और चतुराई स्पष्ट उभर कर प्रकट होती है। किन्तु इस सारे घटनाचक्र में भी वह सूबेदारनी को दिये वचन के प्रति सजग रहता है और अपने जीते जी हजारासिंह व बोधासिंह पर किसी तरह की आँच नहीं आने देता। यही नहीं उनके प्रति अपनी आंतरिक भावना के कारण ही वह अपने घावों के बारे में सूबेदार को कुछ नहीं बताता। पसलियों में लगी गोली उसके लिए प्राणघातक होती है और अंत में वह मर जाता है।

लेकिन मृत्यु शय्या पर उसकी नजरों के आगे दो ही चीजें मंडराती हैं-एक सूबेदारनी का कहा वचन और उसका आम के बाग में कीरतसिंह के साथ आम खाना। सूबेदारनी ने बचपन के उन संबंधों के बल पर लहना सिंह पर जो भरोसा किया था उसी भरोसे के बल पर उसने अपने पति और पुत्र की जीवन की रक्षा की भीख माँगी थी, लहनासिंह अपनी जान देकर उस भरोसे की रक्षा करता है। यह विश्वास और त्याग सूबेदारनी और लहनासिंह के संबंधों की पवित्रता और गहराई पर मोहर लगा देता है। स्त्री-पुरुष के बीच यह बिलकुल नये तरह
का संबंध है. और इस दृष्टि से लहनासिंह एक नये तरह का नायक है जो नये सूक्ष्म रूमानी मानवीय संबंधों की एक आदर्श मिसाल सामने रखता है।

अपने व्यक्तित्व की उन ऊँचाइयों के बावजूद उसकी मृत्यु त्रासद कही जाएगी। उसकी चतराई एवं उसकी साहसिकता जिसके कारण जर्मनों को शिकस्त खानी पड़ी इस योग्य भी नहीं समझी जाती कि कम से कम मृत्यु की सूचना में इतना उल्लेख तो होता कि युद्ध के .दौरान उसने साहस दिखलाते हुए प्राणोत्सर्ग किया बल्कि समाचार इस रूप में छपता है कि “मैदान में घावों से मरा”। इससे यह जाहिर होता है कि जिस सबेदारनी के कारण इसके पति और पत्र की रक्षा करता है उसके लिए भी लहनासिंह का बलिदान अकारध ही चला जाता है। लहनासिंह का ऐसा दुखद अंत उसे त्रासद (frezedy) नायक बना देता है।

3. संपूर्ण क्रांति ( लघु उत्तरीय प्रश्न एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्न )


1. आंदोलन के नेतृत्व के संबंध में जयप्रकाश नारायण के क्या विचार थे, आंदोलन का नेतृत्व किस शर्त पर करते हैं ?

उत्तर ⇒ आंदोलन के नेतृत्व के संबंध में जयप्रकाश नारायण कहते हैं मैं सबकी सलाह लूँगा, सबकी बात सुनूँगा। छात्रों की बात जितना भी ज्यादा होगा, जितना भी समय मेरे पास होगा, उनसे बहस करूँगा समझूगा और अधिक से अधिक बात करूँगा। आपकी बात स्वीकार करूँगा, जनसंघर्ष समितियों की लेकिन फैसला मेरा होगा। इस फैसले को मानना होगा और आपको मानना होगा। जयप्रकाश आंदोलन का नेतृत्व अपने फैसले पर मानते हैं और कहते हैं कि तब तो इस नेतृत्व का कोई मतलब है, तब यह क्रांति सफल हो सकती है। और नहीं, तो आपस की बहसों में पता नहीं हम किधर बिखर जाएँगे और क्या नतीजा निकलेगा।


2. जय प्रकाश नारायण कम्युनिस्ट पार्टी में क्यों नहीं शामिल हए ?

उत्तर ⇒ जय प्रकाश नारायण अमेरिका में घोर कम्युनिस्ट थे। वह लेनिन का जमाना था वह ट्राटस्की का जमाना था। 1924 में लेनिन के मरने के बाद वे मार्क्सवादी बन गये। वे जब भारत लौटे तो घोर कम्युनिस्ट बनकर लौटे, लेकिन वे कम्युनिस्ट पार्टी में नहीं शामिल हुए। वे काँग्रेस में दाखिल हुए।

जय प्रकाश नारायण कम्युनिस्ट पार्टी में इसलिए शामिल नहीं हुए क्योंकि उस समय भारत गुलाम था। उन्होंने लेनिन से जो सीखा था वह यह सीखा था कि जो गुलाम देश हैं, वहाँ के जो कम्युनिस्ट हैं, उनको कदापि वहाँ की आजादी की लड़ाई से अपने को अलग नहीं रखना चाहिए। चाहे उस लड़ाई का नेतृत्व ‘बुर्जुआ क्लास’ करता हो या पूँजीपतियों के हाथ में उसका नेतृत्व हो।


3. जयप्रकाश नारायण के छात्र जीवन और अमेरिका प्रवास का परिचय दें। इस अवधि की कौन-कौन सी बातें आपको प्रभावित करती हैं ?

उत्तर ⇒ जयप्रकाश नारायण बताते हैं कि 1921 ई० की जनवरी महीने में पटना कॉलेज में वे आई. एस. सी. के छात्र थे। उसी समय वे गाँधी जी के असहयोग आंदोलन के आवाहन पर असहयोग किया। और असहयोग के करीब डेढ़ वर्ष ही मेरा जीवन बीता था की मैं फूलदेव सहाय वर्मा के पास भेज दिया गया कि प्रयोगशाला में कुछ करो और सीखो। मैंने हिंद विश्वविद्यालय में दाखिला इसलिए नहीं लिया क्योंकि विश्वविद्यालय को सरकारी मदद मिलती थी। बिहार विद्यापीठ से परीक्षा पास की। बचपन में स्वामी सत्यदेव के भाषण से प्रभावित होकर अमेरिका गया। ऐसे मैं कोई धनी घर का नहीं था परन्तु मैंने सुना था कि कोई भी अमेरिका में मजदूरी करके पढ़ सकता है। मेरी इच्छा थी कि आगे पढ़ना है मुझे। अमेरिका के बागानों में जयप्रकाश ने काम किया, कारखानों में काम किया लोहे के कारखानों में। जहाँ जानवर मारे जोते हैं उन कारखानों में काम किया। जब वे युनिवर्सिटी में पढ़ते ही, तब वे छुट्टियों में काम कर इतना कमा लेते थे कि दो-चार विद्यार्थी सस्ते में खा-पी लेते थे। एक कोठरी में कई

आदमी मिलकर रहते थे। रविवार की छुट्टी नहीं बल्कि एक घंटा रेस्ट्रां में, होटल में बर्तन धोया या वेटर का काम किया। बराबर दो तीन वर्षों तक दो-तीन लड़के एक ही रजाई में सोकर पढ़े थे। जब बी० ए० पास कर गये तो स्कॉलरशिप मिल गई, तीन महीने के बाद असिस्टेंट हो गये डिर्पाटमेंट के ट्यूटोरियल क्लास लेने लगे। इस तरह अमेरिका में इनका प्रवास रहा।

4. अर्द्धनारीश्वर ( लघु उत्तरीय प्रश्न एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्न )


1. ‘यदि संधि की वार्ता कुंती और गांधारी के बीच हुई होती, तो बहुत सम्भव था कि महाभारत न मचता’। लेखक के इस कथन से क्या आप सहमत हैं ? अपना पक्ष रखें।

उत्तर ⇒ प्रस्तुत निबंध ‘अर्द्धनारीश्वर’. में राष्ट्रकवि दिनकर ने नारी शक्ति की मर्यादा एवं महानता को दर्शाने का प्रयास किया है। इसी प्रसंग में उन्होंने चर्चा की है कि यदि संधि की वार्ता कृष्ण और दुर्योधन के बीच न होकर कुंती और गांधारी के बीच हुई होती, तो बहुत सम्भव
था कि महाभारत नहीं होता।

दिनकरजी की इस उक्ति से मैं सहमत हूँ। प्रथम तो, पुरुष स्वभाव से निष्ठुर और कठोर होता है। युद्ध के समय उसे इसका ध्यान ही नहीं रहता कि रक्तपात के पीछे जिनका सिन्दूर बहनेवाला है, उनका क्या हाल होगा। दूसरे, ऐसे अवसरों पर नारियों में इस भावना की फिक्र होने की सम्भावना प्रबल होती है कि दूसरी नारियों का सुहाग उसी प्रकार कायम रहे जैसा वे अपने बारे में सोचती हैं। ऐसा इसलिए कि नारियाँ पुरुषों की तुलना में कम निष्ठुर एवं कठोर हुआ करती हैं। कुंती एवं गांधारी दोनों अपने-अपने पुत्रों को राजा बनते देखना चाहती थीं, लेकिन इतना तय है कि वे इसके लिए इतने बड़े रक्तपात को स्वीकार नहीं करतीं। दोनों चाहती थीं कि युद्ध न हो। वार्ता से ही कोई-न-कोई रास्ता निकल आये।


2. अर्द्धनारीश्वर की कल्पना क्यों की गई होगी ? आज इसकी क्या सार्थकता है ?

उत्तर ⇒ अर्द्धनारीश्वर, शंकर और पार्वती का कल्पित रूप है; जिसका आधा अंग पुरुष __ और आधा अंग नारी का होता है। स्पष्ट ही यह कल्पना शिव और शक्ति के बीच पूर्ण समन्वय दिखाने के लिए की गई होगी। इतना ही नहीं, अर्द्धनारीश्वर की कल्पना में कुछ इस बात का भी संकेत मिलता है कि नर-नारी पूर्ण रूप से समान हैं। उनमें से एक के गुण दूसरे के दोष नहीं हो सकते। अर्थात् नरों में नारियों के गुण आये तो इससे उनकी मर्यादा हीन नहीं होगी, बल्कि उनकी पूर्णता में वृद्धि ही होगी। पुरुष अगर नारी की कोमलता, दया, सरलता जैसे गुण अपने में ले आये तो उसके जीवन में पूर्णता का बोध होता है। उसी प्रकार अगर नारी अपने में पौरुष भाव का समावेश करे, माता एवं पिता दोनों की भूमिका निभाए तो समाज में पूर्णता का भाव पैदा होगा।

वर्तमान युग में भी अर्द्धनारीश्वर की सार्थकता है। लेखक के अनुसार आज पुरुष और स्त्री में अर्द्धनारीश्वर का यह रूप कहीं भी देखने में नहीं आता। संसार में स्त्री एवं पुरुष में दूरियाँ बढ़ती जा रही हैं। संसार में सर्वत्र पुरुष-पुरुष है और स्त्री-स्त्री। नारी समझती है कि पुरुष भी स्त्रियोचित गुणों को अपनाकर समाज में स्त्रैण कहलाने से घबराता है। स्त्री और पुरुष के गुणों के बीच एक प्रकार का विभाजन हो गया है और विभाजन की रेखा को लाँघने में नर और नारी दोनों को भय लगता है।

लेकिन आज नर एवं नारी में सामंजस्य की आवश्यकता कहीं अधिक बढ़ गई है। आज के युग में दोनों की समान अनिवार्यता है। नर-नारी एक दूसरे के पूरक हैं। एक के बिना दूसरे का कार्य अधूरा है। नर काया है तो नारी उसकी छाया। आज नर-नारी समान रूप से मिलजुलकर परिवार, समाज एवं देश को आगे बढ़ा सकते हैं। अत: अर्द्धनारीश्वर की कल्पना आज कहीं ज्यादा सार्थक है।


3. रवीन्द्रनाथ, प्रसाद और प्रेमचन्द के चिंतन से दिनकर क्यों असंतष्ट है?

उत्तर ⇒ रवीन्द्रनाथ, जयशंकर प्रसाद एवं प्रेमचंद के चिंतन नारियों के प्रति भिन्न रहे हैं। इन कवियों और रोमांटिक चिंतकों में नारी का जो रूप प्रकट हुआ वह भी उसका अर्द्धनारीश्वरी रूप नहीं है।

प्रेमचन्द ने कहा है कि “पुरुष जब नारी के गुण लेता है तब वह देवता बन जाता है. किन्तु नारी जब नर के गण सीखती है तब वह राक्षसी हो जाती है।”

इसी प्रकार जयशंकर प्रसादजी की झड़ा के विषय में यह कहा जाय कि इड़ा वह नारी है जिसने पुरुषों के गुण सीखे हैं तो निष्कर्ष यही निकलेगा कि प्रसादजी भी नारी को पुरुषों के क्षेत्र से अलग रखना चाहते थे।

कवि रवीन्द्रनाथ ने भी नारियों के बारे में कुछ ऐसे ही विचार दिये हैं। उनके अनुसार नारी की सार्थकता उसकी भंगिमा के मोहक और आकर्षक होने में है, केवल पृथ्वी की शोभा, केवल आलोक, केवल प्रेम की प्रतिमा बनने में है। कर्मकीर्ति, वीर्यबल और शिक्षा-दीक्षा लेकर वह क्या करेगी ?

परन्तु राष्ट्रकवि दिनकर उक्त कवियों एवं लेखकों के विचार से असंतुष्ट हैं। उनका मानना है कि नारियाँ अब अभिशप्त नहीं हैं। यतियों का अभिशप्त काल समाप्त हो गया है। अब नारी विकारों की खान और पुरुषों की बाधा नहीं मानी जाती है। अब नारी प्रेरणा का उद्गम है, शक्ति का स्रोत है। अब वह पुरुषों की थकान की महौषधि बन गई है। अतः नारी और नर एक ही द्रव की ढली दो प्रतिमाएँ हैं। वे एक दूसरे की पूरक हैं। प्रारम्भिक काल में दोनों बहुत कुछ समान थे। आज भी वैसा ही होना चाहिए।


4. प्रवृत्तिमार्ग और निवृत्तिमार्ग क्या है ?

उत्तर ⇒ पुरुषों की मान्यता है कि नारी आनंद की खान है। जो पुरुष जीवन से आनंद चाहते थे उन्होंने नारी को गले लगाया। वे प्रवृत्तिमार्गी हैं अर्थात् जिस मार्ग के प्रचार से नारी की पद-मर्यादा उठती है उसे प्रवृत्तिमार्ग कहा गया। निवृत्तिमार्ग वे हैं जिन्होंने अपने जीवन के साथ नारी को भी ढकेल दिया, क्योंकि नारी उनके किसी काम की चीज नहीं थी। इसके लिए उन्होंने संन्यास ग्रहण किया और वैयक्तिक मुक्ति की खोज को जीवन का सबसे बड़ा साधन माना। संन्यासी मार्ग ही निवृत्ति मार्ग है।


5. बद्ध ने आनंद से क्या कहा ?

उत्तर ⇒ “आनंद” ! मैंने जो धर्म चलाया था, वह पाँच सहस्र वर्ष तक चलनेवाला, किन्तु अब वह पाँच सौ वर्ष चलेगा, क्योंकि नारियों को मैंने भिक्षुणी होने का अधिकार दे दिया है।”


23. स्त्री को अहेरिन, नागिन और जादूगरनी कहने के पीछे क्या मंशा होती है ? क्या यह उचित है ?

उत्तर ⇒ स्त्री को अहेरिन, नागिन और जादूगरनी कहने के पीछे उनकी मंशा अवहेलना करना है। इनकी इजाद इसलिए पुरुष करता है क्योंकि उनसे उसे अपनी दुर्बलता अथवा कल्पित श्रेष्ठता को दुलारने में सहायता मिलती है। यह जरूरी नहीं है कि यह विकार दोनों में है। नाग और जादूगर के गुण भी नारी में कम पुरुष में अधिक होते हैं एवं आखेट तो मुख्यतः पुरुष का ही स्वभाव है। अतः स्त्री को इस तरह निकृष्ट उपाधियों से विभूषित करना उचित नहीं है।


6. अर्द्धनारीश्वर शीर्षक पाठ का सारांश लिखें। अथवा, ‘अर्द्धनारीश्वर’ शीर्षक निबंध में व्यक्त विचारों को स्पष्ट करें।

उत्तर ⇒ दिनकर अर्द्धनारीश्वर निबंध के माध्यम से यह बताते हैं कि नर-नारी पूर्ण रूप से समान हैं एवं उनमें एक के गुण दूसरे के दोष नहीं हो सकते। अर्थात् नरों में नारियों के गुण आएँ तो इससे उनकी मर्यादा हीन नहीं होती बल्कि उसकी पूर्णता में वृद्धि होती है। दिनकर को यह रूप कहीं देखने को नहीं मिलता है। इसलिए वे क्षुब्ध हैं। उनका मानना है कि संसार में सर्वत्र पुरुष हैं और स्त्री। वे कहते हैं कि नारी समझती है कि पुरुष के गुण सीखने से उसके नारीत्व में बट्टा लगेगा। इसी प्रकार पुरुष समझता है कि स्त्रियोचित गुण अपनाकर वह स्त्रैण हो जायेगा। इस विभाजन से दिनकर दुखी है। यही नहीं भारतीय समाज को जाननेवाले तीन बड़े चिंतकों रवीन्द्रनाथ, प्रेमचंद, प्रसाद के चिंतन से भी दुखी हैं। दिनकर मानते हैं कि यदि ईश्वर ने आपस में धूप और चाँदनी का बँटवारा नहीं किया तो हम कौन होते हैं आपसी गुणों को बाँटने वाले। वे नारी के पराधीनता का संक्षिप्त इतिहास बताने के संदर्भ में कहते हैं कि पुरुष वर्चस्ववादी तरीके अपनाकर नारी को गुलाम बना लिया है। जब कृषि व्यवस्था का आविष्कार किया जिसके चलते नारी घर में और पुरुष बाहर रहने लगा। यहाँ से जिंदगी दो टुकड़ों में बँट गई। नारी पराधीन होकर अपने समस्त मूल्य भुल गयी। अपने अस्तित्व की अधिकारिणी भी नहीं रही। उसे यह लगने लगा कि मेरा अस्तित्व पुरुष को होने को लेकर है। समाज ने भी नारी को भोग्या समझकर उसका उपभोग खूब किया। वसुंधरा भोगीयों ने नारी को आनंद की खान मानकर उसका जी भर उपभोग किया। दिनकर मानते हैं कि नर और नारी एक ही द्रव्य की दली दो प्रतिभाएँ हैं। जिसे भी पुरुष अपना कर्मक्षेत्र मानता है, वह नारी का भी कर्मक्षेत्र है। अत: अर्द्धनारीश्वर केवल इसी बात का प्रतीक नहीं हैं कि नारी और नर जब तक अलग हैं तब तक दोनों अधूरे हैं बल्कि इस बात का भी कि जिस पुरुष में नारीत्व की ज्योति जगे, बल्कि यह कि प्रत्येक नारी में भी पौरुष का स्पष्ट आभास हो।

5. रोज ( लघु उत्तरीय प्रश्न एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्न )


1. मालती के घर का वातावरण आपको कैसा लगा ? अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर ⇒ रोज’ शीर्षक कहानी में प्रख्यात साहित्यकार अज्ञेय जी ने एक मध्यमवर्गीय परिवार के अकथ्य, बोझिल और प्रकपमय वातावरण को बड़ी चतुराई से शब्दों में ढला है। कहानी की नायिका मालती अपने डॉक्टर पति के साथ रहती है। कमरे में बिजली की व्यवस्था नहीं है। चौबीसों घंटे पानी भी नहीं मिल पाता है। घर में दो पलंग हैं, जिसपर कायदे का विस्तर भी नहीं है। मालती और लेखक के बीच संवाद से उक्त बातें स्पष्ट होती हैं

ऐसे ही आए हो ?”
“नहीं, कुली पीछे आ रहा है, सामान लेकर।”
“मैंने सोचा, विस्तरा ले चलूँ।”
“अच्छा किया, यहाँ तो बस……….”
मालती के घर का वातावरण ऊब और उदासी के बीच ऐसा लग रहा है, मानो उस पर किसी शाम की छाया मँडरा रही हो। वातावरण बोझिल, अकथ्य एवं प्रकपमय बना हुआ रहता है।


2. दोपहर में उस सूने आँगन में पैर रखते ही मुझे जान पड़ा, मानो उस पर किसी शाम की छाया मँडरा रही हो, यह कैसी शाम की छाया है ? वर्णन कीजिए।

उत्तर ⇒ लेखक अपने दूर के रिश्ते की बहन जिससे उनका परस्पर संबंध मित्र का ही ‘ था, से मिलने उसके घर पर पहुँचता है। वह बुद्धिजीवी तथा अनुभवी व्यक्ति है। तुरन्त ही वातावरण तथा वहाँ रहनेवालों की दशा को भाँप जाता है। मालती और घर दोनों की स्थिति एक समान है। दोपहर का समय है फिर भी वहाँ लेखक को संध्या की छाया मँडराती हुई दिखाई पड़ती है। वह घर नया होने के बावजूद दोपहर अर्थात अपनी युवाकाल में ही नीरस और शुष्क लग रहा था। मालती भी युवती है परन्तु यंत्रवत और नीरस जिन्दगी ने उसे जीर्ण-शीर्णकाया में परिवर्तित कर दिया है। मालती का रूप लावण्य जवानी में ही ढलान पर है, ऐसा लगता है मानो किसी जीवित प्राणी के गले में किसी मृत जंतु का तौक डाल दिया गया हो। वह सरकारी क्वार्टर भी ऐसा लगता है जैसे उस पर किसी शाम की छाया मँडरा रही हो। वहाँ का वातावरण कुछ ऐसा अकथ्य, अस्पृश्य, किन्तु फिर भी बोझिल और प्रदीपमय-सा सन्नाटा फैला रहा था। ऐसा स्पष्ट होता है कि दोपहर में ही वक्त ने उसपर शाम की छाया ला दिया हो।


3. मालती के पति महेश्वर की कैसी छवि आपके मन में बनती है, कहानी में महेश्वर की उपस्थिति क्या अर्थ रखती है ? अपने विचार दें।

उत्तर ⇒ महेश्वर मालती का पति है जो एक पहाड़ी गाँव में सरकारी डिस्पेंसरी में डॉक्टर है। उनका जीवन यंत्रवत है। अस्पताल में रोगियों को देखने और अन्य जरूरी हिदायतें करने ……. उनका जीवन भी बिल्कुल निर्दिष्ट ढर्रे पर चलता है, नित्य वही काम, उसी प्रकार का मरीज, वही हिदायतें, वही नुस्खे, वही दवाइयाँ। वह स्वयं उकताए हुए हैं और साथ ही इस भयंकर गर्मी के कारण वह अपने फुरसत के समय में भी सुस्त रहते हैं।

लेखक ने कहानी में महेश्वर की उपस्थिति कराकर कहानी को जीवंत बना दिया है। कहानी की नायिका मालती का जीवन उसी के इन्तजार एवं थकान की लम्बी साँस। महेश्वर .. की जिन्दगी के समान ही मालती की जिन्दगी ऊब और उदासी के बीच यंत्रवत चल रही है। किसी तरह के मनोविनोद, उल्लास उसके जीवन में नहीं रह गये हैं। महेश्वर मरीज और डिस्पेंसरी के चक्कर में अपने जीवन को भार समान ढो रहा है तो मालती चूल्हा-चक्की, पति का इन्तजार तथा बच्चे के लालन-पालन में।


4. लेखक और मालती के संबंध का परिचय पाठ के आधार पर दें।।

उत्तर ⇒ लेखक मालती के दूर के रिश्ते का भाई है। किंतु लेखक का संबंध सख्य का ही रहा है। लेखक और मालती बचपन में एक साथ इकट्ठे खेले हैं, लड़े हैं और पिटे भी | हैं। लेखक की पढ़ाई भी मालती के साथ ही हुई है। लेखक और मालती का व्यवहार एक-दूसरे के प्रति सख्य की स्वेच्छा और स्वच्छंदता भरा रहा है। कभी भ्रातृत्व के रूप में या कभी किसी और रूप में। कभी बड़े-छोटेपन के बंधनों में नहीं बंधे।


5. गैंग्रीन क्या होता है ?

उत्तर ⇒ पहाड़ियों पर रहने वाले व्यक्तियों को काँटा चुभना आम बात है। परन्तु काँटा चुभने के बाद बहुत दिनों तक छोड़ देने के बाद व्यक्ति का पाँव जख्म का शक्ल अख्तियार कर लेता है जिसका इलाज मात्र पाँव का काटना ही है। काँटा चुभने पर जख्म ही गैंग्रीन कहते हैं।


6. यह कहानी गैंग्रीन शीर्षक से भी प्रसिद्ध है, दोनों शीर्षक में कौन-सा शीर्षक आपको अधिक सार्थक लगता है, और क्यों ?

उत्तर ⇒ ‘विपथगा’ कहानी-संग्रह के पाँचवें संस्करण में यह कहानी, ‘गैंग्रीन’ शीर्षक से प्रकाशित है। पहाड़ पर रहने वाले व्यक्तियों को काँटा चुभना आम बात है परन्तु उनकी लापरवाही के कारण वह पैर में चुभा काँटा एक बड़ा जख्म का शक्ल ले लेता है जिसे बाद में उसका इलाज सिर्फ पैर का काटना ही है। काँटा चुभने के बाद का जख्म ही गैंग्रीन है। कहानी में गैंग्रीन डाक्टर महेश्वर के साथ ही आता है और उन्हीं तक सीमित भी है। डाक्टर रोज-रोज गैंग्रीन से पीड़ित का इलाज उसका पैर काटकर करते हैं। यह घटना उन्हीं तक सीमित रहती है और कहानी पर अपना ज्यादा प्रभाव नहीं छोड़ती। इस कहानी ‘रोज’ द्वारा एक दाम्पत्य जीवन के राग-विराग, जीवन की एकरसता, घुटन, संत्रास, यंत्रवत् जीवन, बच्चे का रोज-रोज पलंग से गिरने के कारण माँ की एक पुत्र के प्रति संवेदना, रोज एक ही ढर्रे पर चलती मालती की ऊबाहट-भरी दिनचर्या ध्वन्ति होती है। साथ ही इस कहानी का उद्देश्य एक युवती मालती के यान्त्रिक वैवाहिक जीवन के माध्यम से नारी के यन्त्रवत् जीवन और उसके सीमित घरेलू परिवेश में बीतते ऊबाऊ जीवन को भी चित्रित करना है।


7. ‘रोज’ शीर्षक कहानी का सारांश लिखें।

उत्तर ⇒ कहानी के पहले भाग में मालती द्वारा अपने भाई के औपचारिक स्वागत का उल्लेख है जिसमें कोई उत्साह नहीं है, बल्कि कर्त्तव्यपालक की औपचारिकता अधिक है। वह अतिथि का कुशलक्षेम तक नहीं पूछती, पर पंखा अवश्य झलती है। उसके प्रश्नों का संक्षिप्त उत्तर
देती है। बचपन की बातूनी चंचल लड़की शादी के दो वर्षों बाद इतनी बदल जाती है कि वह चप रहने लगती है। उसका व्यक्तित्व बुझ-सा गया है। अतिथि का आना उस घर के ऊपर कोई काली छाया मँडराती हुई लगती है।

मालती और अतिथि के बीच के मौन को मालती का बच्चा सोते-सोते रोने से तोड़ता है। वह बच्चे को सँभालने के कर्त्तव्य का पालन करने के लिए दूसरे कमरे में चली जाती है। अतिथि एक तीखा प्रश्न पूछता है तो उसका उत्तर वह एक प्रश्नवाचक ‘हूँ’ से देती है। मानो उसके पास कहने के लिए कुछ नहीं है। यह आचरण उसकी उदासी, ऊबाहट और यांत्रिक जीवन की यंत्रणा को प्रकट करता है। दो वर्षों के वैवाहिक जीवन के बाद नारी कितनी बदल जाती है. यह कहानी के इस भाग में प्रकट हो जाती है। कहानी के इस भाग में मालती कर्तव्यपालन की औपचारिकता पूरी करती प्रतीत होती है पर उस कर्त्तव्यपालन में कोई उत्साह नहीं है, जिससे उसके नीरस, उदास, यांत्रिक जीवन की ओर संकेत करता है। अतिथि से हुए उसके संवादों में भी एक उत्साहहीनता और ठंढापन है। उसका व्यवहार उसकी द्वन्द्वग्रस्त मनोदशा का सूचक . है। इस प्रकार कहानीकार बाह्य स्थिति और मन:स्थित के संश्लिष्ट अंकन में सफल हुआ है।

रोज कहानी के दूसरे भाग में मालती का अंतर्द्वन्द्वग्रस्त मानसिक स्थिति, बीते बचपन की स्मृतियों में खोने से एक असंज्ञा की स्थिति, शारीरिक जड़ता और थकान का कुशल अंकन हुआ है। साथ ही उसके पति के यांत्रिक जीवन, पानी, सब्जी, नौकर आदि के अभावों का भी उल्लेख हुआ है। मालती पति के खाने के बाद दोपहर को तीन बजे और रात को दस बजे ही भोजन करेगी और यह रोज का क्रम है। बच्चे का रोना, मालती का देर से भोजन करना, पानी का नियमित रूप से वक्त पर न आना, पति का सवेरे डिस्पेन्सरी जाकर दोपहर को लौटना और शाम को फिर डिस्पेन्सरी में रोगियों को देखना, यह सबकुछ मालती के जीवन में रोज एक जैसा ही है। घंटा खडकने पर समय की गिनती करना मालती के नीरस जीवन की सूचना देता है अथवा यह बताता है कि समय काटना उसके लिए कठिन हो रहा है।

इस भाग में मालती, महेश्वर, अतिथि के बहुत कम क्रियाकलापों और अत्यंत संक्षिप्त संवादों के अंकन से पात्रों की बदलती मानसिक स्थितियों को प्रस्तुत किया गया है, जिससे यही लगता है कि लेखक का ध्यान बाह्य दृश्य के बजाए अंतर्दृश्य पर अधिक है।

कहानी के तीसरे भाग में महेश्वर की यांत्रिक दिनचर्या, अस्पताल के एक जैसे ढर्रे, रोगियों की टांग काटने या उसके मरने के नित्य चिकित्सा-कर्म का पता चलता है, पर अज्ञेय का ध्यान मालती के जीवन-संघर्ष को चित्रित करने पर केद्रित है।

महेश्वर और अतिथि बाहर पलंग पर बैठ कर गपशप करते रहे और चाँदनी रात का आनन्द लेते रहे, पर मालती घर के अंदर बर्तन माँजती रही, क्योंकि यही उसकी नियति थी।

बच्चे का बार-बार पलंग से नीचे गिर पड़ना और उस पर मालती की चिड़चिड़ी प्रतिक्रिया मानो पूछती है वह बच्चे को सँभाले या बर्तन मले ? यह काम नारी को ही क्यों करना पड़ता है ? क्या यही उसकी नियति है ?

इस अचानक प्रकट होने वाली जीवनेच्छा के बावजूद कहानी का मुख्य स्वर चुनौती के बजाए समझौते का और मालती की सहनशीलता का है। इसमें नारी जीवन की विषम स्थितियों का कुशल अंकन हुआ है। बच्चे की चोटें भी मामूली बात है, क्योंकि उसे चोटें रोज लगती हैं। मालती के मन पर लगने वाली चोटें भी चिन्ता का विषय नहीं है, क्योंकि वह रोज इन
चोटों को सहती रहती है। ‘रोज’ की ध्वनि कहानी में निरन्तर गूंजती रहती है।

कहानी का अंत ‘ग्यारह’ बजने की घंटा-ध्वनि से होता है और तब मालती करुण स्वर में कहती है ‘ग्यारह बज गए”। उसका घंटा गिनना उसके जीवन की निराशा और करुण स्थिति को प्रकट करता है।

कहानी एक रोचक मोड़ पर वहाँ पहुँचती है, जहाँ महेश्वर अपनी पत्नी को आम धोकर लाने का आदेश देता है। आम एक अखबार के टुकड़े में लिपटे हैं। जब वह अखबार का टकडा देखती है, तो उसे पढ़ने में तल्लीन हो जाती है। उसके घर में अखबार का भी है। वह अखबार के लिए भी तरसती है। इसलिए अखबार का टुकड़ा हाथ में आने पर उसे पढ़ने में तल्लीन हो जाती है। यह इस बात का सूचक है कि अपनी सीमित दनिया में बाहर निकल कर वह उसके आस-पास की व्यापक दुनिया से जुड़ना चाहती है। जीवन की जड़ता के बीच भी उसमें कुछ जिज्ञासा बनी है, जो उसकी जिजीविषा की सूचक है। मालती की जिजीविषा के लक्षण कहानी में यदा-कदा प्रकट होते हैं, पर कहानी का मुख्य स्वर चुनौती का नहीं है, बल्कि समझौते और परिस्थितियों के प्रति सहनशीलता का है जो उसके मूल में उसकी पति के प्रतिनिष्ठा और कर्त्तव्यपरायणता को अभिव्यक्त करता है। वह भी परंपरागत सोच की शिकार है, जो इसमें विश्वास करती है कि यह उसके जीवन का सच है। इससे इतर वह सोच भी नहीं सकती। जिस प्रकार से समाज के सरोकारों से वह कटी हुई है, उसे रोज का अखबार तक हासिल नहीं है, जिससे अपने ऊबाउपन जीवन से दो क्षण निकालकर बाहर की दुनिया में क्या कुछ घटित हो रहा है, उससे जुड़ने का मौका मिल सके। ऐसी स्थिति में एक आम महिला से अपने अस्तित्व के प्रति चिंतित होकर सोचते, उसके लिए संघर्ष करने अथवा उबाउ जीवन से उबरने हेतु जीवन में कुछ परिवर्तन लाने की उम्मीद ही नहीं बचती।


8. ‘रोज’ शीर्षक कहानी के आधार पर मालती का चरित्र-चित्रण कीजिए।

उत्तर ⇒ रोज’ शीर्षक कहानी के रचयिता आधुनिक हिन्दी साहित्य के मूर्धन्य विद्वान श्री सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ हैं। ये एक प्रमुख कवि, कथाकार उपन्यासकार, विचारक, पत्रकार और सम्पादक हैं। इन्होंने साहित्य की अनेक नई विधाएँ यात्रा-साहित्य, डायरी, आलोचना, जीवनी इत्यादि पर्याप्त मात्रा में लिखे हैं।

‘रोज’ अज्ञेय जी की बहुचर्चित कहानी है। इन्होंने मध्यमवर्गीय भारतीय समाज में घरेलू स्त्री के जीवन और मनोदशा पर सहानुभूति पूर्वक विचार किया है। इस कहानी में मालती नामक एक नारी पात्र है, जो लेखक की रिश्ते में बहन लगती है। दोनों बचपन में साथ-साथ पले और बढ़े हैं। विद्यार्थी जीवन में मालती अत्यन्त चंचल और उच्छृखल प्रवृत्ति की लड़की थी। उसे पढ़ने से अधिक खेलने में रुचि थी। उसकी शादी डॉक्टर से होती है। डॉक्टर साहब अच्छे स्वभाव के व्यक्ति हैं, उसका नाम महेश्वर है। वे शहर से दूर किसी पठारी क्षेत्र में पदस्थापित हैं। मालती उनके साथ उसी पहाड़ी क्षेत्र में सरकारी क्वार्टर में रहती है। लेखक एक बार मालती से मिलने आते हैं।

विवाह के बाद मालती की मनोदशा पूर्णतः बदल गयी है। उसका जीवन मशीन तुल्य हो गया है। वह सुबह उठकर अपने पति के लिए नाश्ता बनाती है। फिर दोपहर के लिए खाना बनाती है। फिर शाम में खाना बनाती है। वह गृहकार्य में इस प्रकार लगी रहती है मानो कोई यंत्र हो। उसका जीवन यंत्रवत् हो गया है। लेखक के आने पर मालती उनका स्वागत अपेक्षित खुशी के साथ नहीं करती है। मात्र औपचारिकता वश उनसे बातें करती हैं। डॉक्टर साहब दोपहर को डिक्सपेंशरी से घर आते हैं। लेखक का परिचय उनसे होता हैं। वे अपनी मरीजों के बारे में बताते हैं कि वे अक्सर मरीजों के हाथ-पैर काटा करते है। छोटे-छोटे जख्म गैंग्रीन हो जाता है। फिर किसी के हाथ-पैर काटकर ऑपरेशन करते हैं।

मालती का एक छोटा बच्चा है, जिसका नाम टिटी है। वे सदैव रोते रहता है। वह काफी चिड़चिड़ा-सा है। लेखक अनुभव करते हैं कि मालती के घर में जैसे किसी अभिशाप की छाया फैली हो। इस घर का वातावरण अत्यन्त बोझिल और हताशापूर्ण है। कहीं उत्साह और उमंग नहीं है। यद्यपि डॉक्टर साहब बुरे नहीं हैं वे अपने काम में लगे रहते हैं। मालती भी घर के काम में सदैव लगी रहती है। पहाड़ पर स्थित इस सरकारी क्वार्टर में न तो ठीक से पानी आता है, न तो हरी सब्जी उपलब्ध होती है। यहाँ कोई समाचार-पत्र भी नहीं आता। यहाँ पढ़ने-लिखने का कोई वातावरण नहीं है।

इस तरह हम देखते हैं कि मालती न तो सफल पत्नी है और न एक सफल माँ। इसमें उसके चरित्र का कोई दोष नहीं है। परिस्थिति और वातावरण ऐसी है कि मालती पूर्णतः बदल गयी है। उसमें किसी प्रकार का राग भाव नहीं। निश्चय ही व्यक्ति के चरित्र पर परिस्थिति
और वातावरण का प्रभाव पड़ता है। मालती जैसी चंचल लड़की विवाह के बाद इस एकांत वातावरण में पूर्णतः यंत्रवत् हो जाती है। मालती एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक वर्ग का प्रतिनिधि है। ध्यान से देखने पर अनेक घरों में मालती मिलेगी, जिसका जीवन यंत्रवत् है। महिलाओं
को गृह-कार्य का दायित्व यंत्रवत् बना देती है। उसके जीवन में कोई संवेदना नहीं, कोई राग – नहीं।

6. एक लेख और एक पत्र ( लघु उत्तरीय प्रश्न एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्न )


1. विद्यार्थी को राजनीति में भाग क्यों लेना चाहिए ?

उत्तर ⇒ विद्यार्थी का मुख्य काम पढ़ाई करना होता है। उन्हें पढ़ाये जाने वाले विषयों को लगन एवं तन्मयता के साथ अध्ययन करना भी चाहिए। यह उनकी प्राथमिकता होती है। अच्छे अंक तथा अच्छी श्रेणी; विद्यार्थी द्वारा विषय के गहन अध्ययन एवं उसकी बुद्धि की प्रखरता पर पूर्णतः निर्भर करते हैं। अतः विद्यार्थी का मुख्य कार्य पढ़ाई करना है तथा अपना ध्यान पूरे मनोयोग से उस ओर लगाना है। किन्तु देश की परिस्थितियों का ज्ञान होना तथा उनके सुधार के उपाय सोचने की योग्यता विकसित करना भी उसके लिए आवश्यक है। इसके बिना इसकी शिक्षा अधूरी रहेगी एवं वांछित लक्ष्य भी प्राप्त नहीं हो सकेंगे।

अभिभावकीय दृष्टिकोण वाले लोग यह राय प्रकट करते हैं कि छात्रों को राजनीति से अलग रहना चाहिए क्योंकि उनका काम पढ़ाई करना और अपनी योग्यता बढ़ाना है। राजनीति में उलझना नहीं। किन्तु यह विचार पूर्णतया अव्यावहारिक एवं निरर्थक है। छात्र एवं युवाशक्ति राष्ट्र की रीढ़ होते हैं। महान स्वतंत्रता सेनानी भगत सिंह विद्यार्थियों का राजनीति में योगदान अपरिहार्य मानते थे। उनका कहना था कि विद्यार्थियों को अपनी पढ़ाई तन्मयता से करते हुए देश के हित में भी भाग लें तथा अपने जीवन का बलिदान भी करने में गर्व का अनुभव करें। उसी प्रकार जिस प्रकार भगत सिंह इस पुनीत कार्य में जुट गए हैं।


2. भगत सिंह के अनुसार, “केवल कष्ट सहकर भी देश की सेवा की जा सकती है।” उनके जीवन के आधार पर इसे प्रमाणित करें।

उत्तर ⇒ भगत सिंह के अनुसार केवल कष्ट सहकर भी देश की सेवा की जा सकती है। सुखदेव को लिखे अपने पत्र में उन्होंने इस तथ्य का वर्णन किया है। उनकी यह स्पष्ट मान्यता है कि बिना कष्ट सहे देश के लिए कुछ कर पाना संभव नहीं है। उनके शब्दों में, “नौजवान भारत सभा के ध्येय, ‘सेवा द्वारा कष्टों को सहन करना एवं बलिदान करना है’ को हमने सोच समझ कर इसका निर्माण किया था।” मानव किसी भी कार्य को उचित मानकर ही करता है, कार्य करने के पश्चात उसका परिणाम और उसका फल भोगने की बारी आती है। उसी प्रकार जैसे लेजिस्लेटिव असेंबली में बम फेंकने का कार्य भगत सिंह ने किया था, क्योंकि बिना परिणाम की परवाह किए ही उन्होंने यह कार्य किया। यदि उन्होंने दया के लिए गिड़गिड़ाते हुए दंड से बचने का प्रयत्न किया होता तो संभवतः यह कार्य कदापि न किया होता।

निश्चित रूप से भगत सिंह ने किसी कार्य से होने वाले आत्मघाती परिणाम की परवाह कभी नहीं की। वे कष्ट सहकर देश की सेवा के लिए बड़ा-से-बड़ा बलिदान करने के लिए सदैव तत्पर रहते थे। उनका जीवन एक खुली किताब था जिसमें उनके देश सेवा के लिए किए जाने वाले आत्मोसर्ग के कार्यों को पढ़ा जा सकता है।


3. भगत सिंह की विद्यार्थियों से क्या अपेक्षाएँ हैं ?

उत्तर ⇒ भगत सिंह कहते हैं कि हिन्दुस्तान को ऐसे देशसेवकों की जरूरत है जो तन-मन-धन __देश पर अर्पित कर दें और पागलों की तरह सारी उम्र देश की आजादी के लिए या देश के विकास में न्योछावर कर दे। यह कार्य सिर्फ विद्यार्थी ही कर सकते हैं। सभी देशों को आजाद करने वाले वहाँ के विद्यार्थी और नौजवान ही हुआ करते हैं। वे ही क्रांति कर सकते हैं। अत: विद्यार्थी पढ़े। जरूर पढ़े। साथ ही पॉलिटिक्स का भी ज्ञान हासिल करे और जब जरूरत हो तो मैदान में कूद पड़े और अपना जीवन इसी काम में लगा दे। अपने प्राणों को इसी में उत्सर्ग कर दे। यही अपेक्षाएँ हैं विद्यार्थियों से भगत सिंह की।


4. जब देश के भाग्य का निर्णय हो रहा हो तो व्यक्तियों को भाग्य को पूर्णतया भुला देना चाहिए। आज जब देश आजाद है, भगत सिंह के इस विचार का | आप किस तरह मूल्यांकन करेंगे ? अपना पक्ष प्रस्तुत करें।

उत्तर ⇒ भगत सिंह का यह कथन उनकी मानवतावादी दृष्टि का परिचय देता है जिसमें । व्यक्ति को अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर समष्टि के बारे में सोचना चाहिए। उसके लिए तन, मन, धन से अपना स्वयं अर्पित कर देना चाहिए। परन्तु आज देश की आजादी तिहत्तर वर्ष हो गये फिर भी इस प्रकार की भावना का लेशमात्र भी व्यक्ति के मन में नहीं है। व्यक्ति अपनी स्वार्थपरता थोड़े-से सुख के लिए अपना सारा मूल्य खो बैठा है। आज भारतवासी अपने ही देश में भ्रष्टाचार की भट्ठी में जल रहे हैं, गोरे अंग्रेजों के चंगुल से छूटने के बाद आज देश अपने देशी भूरे अंग्रेजों द्वारा विनाश के गर्त में जा रहा है। अपराधी और घूसखोर जनता को लूट रहे हैं। राजनीति का अपराधीकरण चरम सीमा पर है। इस शासन व्यवस्था के कारण अपने ही लोग देश के दुश्मन हो चुके हैं। आतंकवादी गतिविधियाँ बढ़ रही है। आज के राजनीतिक दल. धार्मिक, भाषाई और क्षेत्रीय उन्माद फैलाकर सत्ता पर काबिज होने को प्रयासरत हैं। सिर्फ थोड़े-से स्वार्थ के लिए।


5. उन्हें चाहिए कि वे उन विधियों का उल्लंघन करें परंतु उन्हें औचित्य का ध्यान रखना चाहिए, क्योंकि अनावश्यक एवं अनुचित प्रयत्न कभी भी न्यायपूर्ण नहीं माना जा सकता। भगत सिंह के इस कथन का आशय बताएँ। इससे उनके चिंतन का कौन-सा पक्ष उभरता है वर्णन करें।

उत्तर ⇒ भगत सिंह क्रांतिकारियों से कहते हैं कि क्रांतिकारी शासक यदि शोषक हो कानून व्यवस्था यदि गरीब-विरोधी मानवता-विरोधी हो तो उन्हें चाहिए कि वे उसका पुरजोर विरोध करें। परंतु इस बात का भी ख्याल करें कि आम जनता पर इसका कोई असर न हो, वह संघर्ष आवश्यक हो अनुचित नहीं। संघर्ष आवश्यकता के लिए हो तो उसे न्यायपूर्ण माना जाता है। परंतु सिर्फ बदले की भावना से हो तो अन्यायपूर्ण। इस संदर्भ में रूस की जारशाही का हवाला देते हुए कहते हैं कि रूस में बंदियों को बंदी गृहों में विपत्तियाँ सहन करना ही जारशाही का तख्ता उलटने के पश्चात् उनके द्वारा जेलों के प्रबंध में क्रांति लाये जाने का सबसे बड़ा कारण था विरोध करो परंतु तरीका उचित होना चाहिए, न्यायपूर्ण होना चाहिए। इस दृष्टि से देखा जाए तो भगत सिंह का चिंतन मानवतावादी है, जिसमें समस्त मानव जाति का कल्याण निहित है। यदि मानवता पर तनिक भी प्रहार हो, तो उन्हें पूरी लगन के साथ वर्तमान व्यवस्था के विरुद्ध आरंभ कर देना चाहिए।


6. एक लेख और एक पत्र शीर्षक कहानी का सारांश लिखें।

उत्तर ⇒ भगत सिंह ‘विद्यार्थी और राजनीति’ के माध्यम से बताते हैं कि विद्यार्थी को पढ़ने के साथ ही राजनीति में भी दिलचस्पी लेनी चाहिए। यदि कोई इसे मना कर रहा है तो समझना चाहिए कि यह राजनीति के पीछे घोर षड्यंत्र है। क्योंकि विद्यार्थी युवा होते हैं। उन्हीं के हाथ में देश की बागडोर है। भगत सिंह व्यावहारिक राजनीति का उदाहरण देते हुए नौजवानों को यह समझाते हैं कि महात्मा गाँधी, जवाहर लाल नेहरू, और सुभाष चन्द्र बोस का स्वागत करना और भाषण सुनना यह व्यावहारिक राजनीति नहीं तो और क्या है। इसी बहाने वे हिन्दुस्तानी राजनीति पर तीक्ष्ण नजर भी डालते हैं। भगत सिंह मानते हैं कि हिन्दुस्तान को इस समय ऐसे देश सेवकों की जरूरत हैं जो तन-मन-धन देश पर अर्पित कर दें और पागलों की तरह सारी उम्र देश की आजादी या उसके विकास में न्योछावर कर दे। क्योंकि विद्यार्थी देश-दुनिया के हर समस्यायों से परिचित होते हैं। उनके पास अपना विवेक होता है। वे इन समस्यायों के समाधान में योगदान दे सकते हैं। अतः विद्यार्थी को पॉलिटिक्स में भाग लेनी चाहिए।


7. भगत सिंह ने कैसी मृत्यु को सुंदर कहा है ? वे आत्महत्या को कायरता कहते हैं, इस संबंध में उनके विचारों को स्पष्ट करें।

उत्तर ⇒ भगत सिंह देश सेवा के बदले दी गई फाँसी (मृत्युदंड) को सुंदर मृत्यु कहा है। भगत सिंह इस संदर्भ में कहते हैं कि जब देश के भाग्य का निर्णय हो रहा हो तो व्यक्तियों के भाग्य को पूर्णतया भुला देनी चाहिए। इसी दृढ़ इच्छा के साथ हमारी मुक्ति का प्रस्ताव सम्मिलित रूप में और विश्वव्यापी हो और उसके साथ ही जब यह आंदोलन अपनी चरम सीमा पर पहुँचे तो हमें फाँसी दे दी जाय। यह मृत्यु भगत सिंह के लिए सुंदर होगी जिसमें हमारे देश का कल्याण होगा। शोषक यहाँ से चले जायेंगे और हम अपना कार्य आप करेंगे। इसी के साथ व्यापक समाजवाद की कल्पना भी करते हैं जिसमें हमारी मृत्यु बेकार न जाय। अर्थात् संघर्ष में मरना एक आदर्श मृत्यु है। भगत सिंह आत्महत्या को कयरता कहते हैं क्योंकि कोई भी व्यक्ति जो आत्महत्या करेगा वह थोड़ा दुख, कष्ट सहने के चलते करेगा। वह अपना समस्त मूल्य एक ही क्षण में खो देगा। इस संदर्भ में उनका विचार है कि मेरे जैसे विश्वास और विचारों वाला व्यक्ति व्यर्थ में मरना कदापि सहन नहीं कर सकता। हम तो अपने जीवन का अधिक-से-अधिक मूल्य प्राप्त करना चाहते हैं। हम मानवता की अधिक-से-अधिक सेवा करना चाहते हैं। संघर्ष में मरना एक आदर्श मृत्यु है। प्रयत्नशील होना एवं श्रेष्ठ और उत्कृष्ट आदर्श के लिए जीवन दे देना कदापि आत्महत्या नहीं कही जा सकती। आत्महत्या को कायरता इसलिए कहते हैं कि केवल कुछ दुखों से बचने के लिए अपने जीवन को समाप्त कर देते हैं। इस संदर्भ में वे एक विचार भी देते हैं कि विपत्तियाँ व्यक्ति को पूर्ण बनाने वाली होती है।

7. ओ सदानीरा ( लघु उत्तरीय प्रश्न एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्न )


1. चम्पारण क्षेत्र में बाढ़ के क्या कारण हैं ?

उत्तर ⇒ चम्पारण क्षेत्र में बाढ़ का प्रमुख कारण जंगलों का कटना है। वन के वृक्ष जल राशि को अपनी जड़ों में थामें रहते हैं। नदियों को उन्मुक्त नवयौवना बनने से बचाते हैं। उत्ताल वक्ष नदी की धाराओं की गति को भी संतुलित करने का काम करते हैं। यदि जलराशि नदी की सीमाओं से ज्यादा हो जाती है, तब बाढ़ आती ही हैं, लेकिन जब बीच में उनकी शक्तियों को ललकारने वाले ये गगनचुम्बी वन न हो तब नदियाँ प्रचंड कालिका रूप धारण कर लेती हैं। वृक्ष उस प्रचंडिका को रोकने वाले हैं। आज चंपारन में वृक्ष को काट कर कृषियुक्त समतल भूमि बना दी गई है। अब उन्मुक्त नवयौवना को रोकने वाला कोई न रहा, इसलिए अपनी ताकत का अहसास कराती है। लगता है मानो मानव के कर्मों पर अट्टाहास करने के लिए, उसे दंड देने के लिए नदी में भयानक बाढ़ आते हैं।


2. धाँगड़ शब्द का क्या आशय है ?

उत्तर ⇒ धाँगड़ शब्द का अर्थ ओराँब भाषा में है-भाड़े का मजदूर। धाँगड़ एक आदिवासी जाति है, जिसे 18 वीं शताब्दी के अंत में नील की खेती के सिलसिले में दक्षिण बिहार के छोटानागपुर पठार से चंपारण के इलाके में लाया गया था। धाँगड़ जाति आदिवासी जातियों-ओराँव, मुंडा, लोहार इत्यादि के वंशज हैं, लेकिन ये अपने आप को आदिवासी नहीं मानते हैं। धाँगड़ मिश्रित ओराँव भाषा में बात करते हैं। धाँगड़ों का सामाजिक जीवन बेहद उल्लासपूर्ण है, स्त्री-पुरुष ढलती शाम के मंद प्रकाश में सामूहिक नृत्य करते हैं।


3. थारूओं की कला का परिचय पाठ के आधार पर दें।

उत्तर ⇒ थारूओं की गृहकला अनुपम है। कला उनकी दैनन्दिन जिंदगी का अंग है। धान पात्र सींक का बनाया जाता है, आकर्षक रंगों और डिजायनों में। सींक और मूंज से घरेलू उपयोगिता के सामान बनाने में उनका कोई सानी नहीं है। उनके गृह सामानों में उनकी कला और उसके सौन्दर्य की झलक मिलती है। धवल सीपों और बीज विशेष से बनाए जाने वाले आभूषण जो उनकी संस्कृति की झलक दिखलाते हैं, जिनका उदाहरण लेखक ने नववधू के अपने प्रियतम को कलेउ कराने के संदर्भ में झंकृत होने वाली वेणियों से दिया है।

उनकी कला उनकी मधुर और स्निग्ध संस्कृति की मनमोहक झलक दिखलाती है। :


4. अंग्रेज नीलहे किसानों पर क्या अत्याचार करते थे ?

उत्तर ⇒ अंग्रेज नीलहे किसानों पर बहुत अत्याचार किया करते थे। किसानों से जबरदस्ती नील की खेती कराई जाती थी। हर बीस कट्ठा जमीन में तीन कट्ठा नील की खेती करना हर किसान के लिए लाजिमी था, जिसे तिनकठिया प्रणाली कही जाती थी। नील की खेती जिस भूमि में की जाती थी, उसकी उर्वरा शक्ति लगभग समाप्त हो जाती थी और भूमि बंजर हो जाती थी। केमिकल रंगों के ईजाद होने के बाद तिनकठिया से मुक्ति पाने के लिए किसानों को मोटी रकम गोरे ठेकेदारों को देना पड़ता था। जिस रास्ते पर साहब की सवारी जाती थी उसपर हिन्दुस्तानी अपने जानवर तक नहीं ले जा सकते थे। साहब के यहाँ कुछ भी हो तो सारा खर्चा रैयत को देना पड़ता था।


5. गंगा पर पुल बनाने में अंग्रेजों ने क्यों दिलचस्पी नहीं ली ?

उत्तर ⇒ संवादों के प्रसार में आधारभूत सुविधाओं का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है। इन सुविधाओं में परिवहन का साधन अत्यंत ही महत्वपूर्ण है। अंग्रेज किसानों पर बेहद अत्याचार किया करते थे। बागी विचारों के संप्रेषण को फैलने से बचाने के लिए उन्होंने गंगा पर पल बनाने में दिलचस्पी नहीं दिखाई। बिना परिवहन के साधन के विचारों संप्रेषण नहीं हो पाता है. वह स्थानिक रह जाता है. जिसे आसानी से दमन किया जा सकता है। गगा पर पुल बन जाने से अंग्रेजों को डर था कि दक्षिण बिहार के बागी विचार वहाँ भी न पहुँच जाएँ और शेष भाग का सहयोग उन्हें न मिल जाए। यह उनकी सत्ता के बहुत ही खतरनाक था।


6. चंपारण में शिक्षा की व्यवस्था के लिए गाँधीजी ने क्या किया ?

उत्तर ⇒ चंपारण में शिक्षा की व्यवस्था के लिए गाँधी जी ने महत्त्वपूर्ण काम किए। उनका विचार था कि ग्रामीण बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था किए बिना केवल आर्थिक समस्याओं को सुलझाने से काम नहीं चलेगा। इसके लिए उन्होंने तीन गाँवों में आश्रम विद्यालय स्थापित किया-बड़हरवा, मधुबन और भितिहरवा। कुछ निष्ठावान कार्यकर्ताओं को तीनों गाँवों में तैनात किया। बड़हरवा के विद्यालय में श्री बवनजी गोखले और उनकी विदुषी अवंतिकाबाई गोखले ने चलाया। मधुबन में नरहरिदास पारिख और उनकी पत्नी तथा अपने सेक्रेटरी महादेव देसाई को नियुक्त किया। भितिहरवा में वयोवृद्ध डॉक्टर देव और सोपन जी ने चलाया। बाद में पुंडलिक जी गए। स्वयं कस्तूरबा भितिहरवा आश्रम में रहीं और इन कर्मठ और विद्वान स्वयंसेवकों की देखभाल की।


7. गाँधीजी के शिक्षा संबंधी आदर्श क्या थे ?

उत्तर ⇒ गाँधीजी शिक्षा का मतलब सुसंस्कृत बनाने और निष्कलुष चरित्र निर्माण समझते थे। अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए आचार्य पद्धति के समर्थक थे अर्थात् बच्चे सुसंस्कृत और निष्कलुष चरित्र वाले व्यक्तियों के सानिध्य से ज्ञान प्राप्त करें। अक्षर ज्ञान को वे इस उद्देश्य
की प्राप्ति में विधेय मात्र मानते थे।

वर्तमान शिक्षा पद्धति को वे खौफनाक और हेय मानते थे, क्योंकि शिक्षा का मतलब है-बौद्धिक और चारित्रिक विकास, लेकिन यह पद्धति उसे कुंठित करती है। इस पद्धति में बच्चों को दस्तावेज रटाया जाता है ताकि आगे चलकर वे क्लर्क का काम कर सकें, उनका सर्वांगीण विकास से कोई सरोकार नहीं है।

जीविका के लिए नये साधन सीखने के इच्छुक बच्चों के लिए औद्योगिक शिक्षा के पक्षधर थे। तात्पर्य यह न था कि हमारी परंपरागत व्यवसाय में खोट है वरन् यह कि हम ज्ञान प्राप्त कर उसका उपयोग अपने पेशे और जीवन को परिष्कृत करें।


8. इतिहास की क्रीमियाई प्रक्रिया का क्या अर्थ है ?

उत्तर ⇒ चंपारण का इतिहास अपने में अनेक संस्कतियों को समेटे हए हैं। यहा समय पर बाहरी आक्रमण होते रहे। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार यहाँ बारहवीं शता तान सौ वर्षों तक कर्णाट वंश का शासन था। प्रथम राजा नान्यदेव, चालुक्य नृपात सा के पुत्र विक्रमादित्य के सेनापति, नेपाल और मिथिला की विजय यात्रा पर आए और बस गए। इसके फलस्वरूप सुदूर दक्षिण भारत का रक्त तथा संस्कृति इस प्रदश क का संस्कृति में घुल मिल गए तथा यहाँ की निधि बन गए।

“क्रीमियाई प्रक्रिया” से तात्पर्य इस प्रकार का घुल मिल जाना है। इस श का शाब्दिक अर्थ रासायनिक प्रक्रिया है जिसका विशेष अर्थ हुआ विभिन्न रक्त समूह परस्पर सम्मिलन जिसे प्रकारान्तर में रासायनिक मिश्रण प्रक्रिया कहा जा सकता है। इस पर में बसने वाले लोगों में परस्पर वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित होते गए तथा इस प्रकार का प्रक्रिया चलती रही। इस क्षेत्र के निवासी भी प्राचीन और नवीन के मिश्रण ह, आदि काल से आने जाने वालों का ताँता बँधा रहा है तथा आज भी जारी है।


9. पुंडलीक जी कौन थे ?

उत्तर ⇒ पुंडलीक जी को महात्मा गाँधी ने भितिहरवा में रहकर बच्चों को पढ़ाने के लिए भेजा था। उन्हें दूसरा कार्य यह सौंपा गया था कि ग्रामवासियों के दिल से भय दूर कर। उन्ह ग्रामवासियों के हृदय में नई आशा तथा सरक्षा का भाव जाग्रत करना था। वे लगभग एक साल रह सके। अंग्रेज सरकार ने उन्हें जिले से निलंबित कर दिया लेकिन फिर भी वह हर दा तान साल में अपने पराने स्थान को देखने आ जाते थे। लेखक की मलाकात संयोग से पुडलाक जी से भितहरवा आश्रम में हुई। वह उनके व्यक्तित्व से काफी प्रभावित हुए।


10. यह पाठ आपके समक्ष कैसे प्रश्न खड़े करता है ?

उत्तर ⇒ हमारे जीवन का प्रत्येक क्षण एक प्रश्न, एक समस्या लेकर उपस्थित होता है। उसमें अपने जीवन के घटनाक्रमों से अनेक बातों को सीखने तथा समझने का अवसर मिलता है। ऐसे अनेक प्रश्न हमारे इर्द गिर्द मँडराते रहते हैं जिनसे निपटने के लिए अनथक तथा सार्थक प्रयास अपेक्षित है इस दिशा में हमारा व्यावहारिक ज्ञान सहायक होता है।

प्रस्तुत पाठ में हमारे समक्ष इसी प्रकार के कतिपय प्रश्न उपस्थित हुए हैं। पहली समस्या यह है कि हमारे अनुत्तरदायित्वपूर्ण रवैये से वनों का निरन्तर विनाश किया जा रहा है। चंपारण की शस्य श्यामला भूमि जो हरे-भरे वनों से आच्छादित है, वहाँ एक लम्बे अरसे से वृक्षों का काटा जाना जारी है। उसने हमारे पर्यावरण को तो प्रभावित किया ही है, हमारी नदियों ने वर्षाकाल में अप्रत्याशित बाढ़ एवं तबाही का दृश्य प्रस्तुत किया है। वृक्षों के क्षरण से उनके तटों में जल-अवरोध की क्षमता का ह्रास हुआ है। वनों का विनाश कर कृषि योग्य भूमि बनाने. भवन. कल-कारखानों एवं उद्योगों की स्थापना करने से इन सारी विपदाओं का सामना करना पड़ रहा है। वृक्षों की घटती संख्या तथा धरती की हरियाली में निरंतर ह्रास से वर्षा की मात्रा भी काफी घट गई है।

इस पाठ में चंपारण में प्रवाहित होने वाली गंडक, पंडई, भसान, सिकराना आदि नदिया किसी जमाने में वनश्री के ढंके वक्षस्थल में किलकती रहती थीं. अब विलाप करती हैं, निर्वस्त्र हो गई हैं। इससे अनेक समस्याओं ने जन्म लिया है-नादियों का कटाव, अप्रत्याशित वीभत्स बाढ़ की विनाश लीला, पर्यावरण प्रदूषण, अनियमित तथा कम मात्रा में वर्षा का होना आदि।

हमें इन समस्याओं से निदान हेतु वनों की कटाई पर तत्काल रोक तथा वृक्षारोपण करना होगा। सौभाग्य से गंडक घाटी योजना के अन्तर्गत सरकार द्वारा नहरों का निर्माण कर गडक को दूरवस्था से मुक्ति दिलाने का प्रयास किया गया। इसी प्रकार की अनेक योजनाएँ अन्य नदियों के साथ भी अपेक्षित हैं।

8. सिपाही की माँ ( लघु उत्तरीय प्रश्न एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्न )

8. सिपाही की माँ


1. बिशनी और मुन्नी को किसकी प्रतीक्षा है वे डाकिये की राह क्यों क्यों देखती है ?

उत्तर ⇒ बिशनी को अपने सिपाही पुत्र एवं मुन्नी को सिपाही भाई की प्रतीक्षा है। वे टा । राह चिटठी आने को देखती है। क्योंकि उसने पिछली चिट्ठी में लिखा था वे वर्मा की लडाई पर जा रहे हैं। माँ और बेटी किसी अनिष्ट की शंका के कारण चिट्ठी का इंतजार करते


2. बिशनी मानक को लड़ाई में क्यों भेजती है ?

उत्तर ⇒ बिशनी एक निम्नमध्यवगीय परिवार की महिला है। उसे अपनी मुन्नी की शादी के लिए पैसों की जरूरत है। इसलिए वह मानक को पैसा कमाने के उद्देश्य से लड़ाई में भेजती है। यह एकांकी एक तरह से भारतीय समाज के विवाह परंपरा पर कुठाराघात भी. जहाँ पैसे के कारण लड़कियों का विवाह नहीं हो पाता है।


3. ‘भैया मेरे लिए जो कड़े लायेंगे वे तारों और बेतों के कड़ों से भी अच्छे होगें न’ मुन्नी के इस कथन को ध्यान में रखते हुए उसका परिचय आप अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर ⇒ मुन्नी सिपाही मानक की बहन और विशनी की पुत्री है। उसकी उम्र इस लायक दो चकी है कि शादी की जा सके। वह एक निम्नमध्यवर्गीय परिवार से संबंध रखती है। उसके सारे सपने उसके भाई सिपाही मानक के साथ जुड़े हुए हैं। वह गाँव की लडकियों को पहने देखकर अपने माँ से कहती माँ भैया मेरे लिए जो कड़े लायेंगे वे तारों और वेतों के कडों से भी अच्छे होंगे ना। मुन्नी अपने भाई से बेइंतहा प्रेम करती है। अपने भाई के लडाई में जाने के बाद मानक की चिट्ठी का इंतजार बड़ी बेसब्री से करती है। और माँ से तरह-तरह के प्रश्न करती है। क्योंकि उसके सारे अरमान उसके भाई मानक के साथ जुड़े हुए हैं और वही पूरा करने वाला भी है।


4. बिशनी मानक की माँ है, पर उसमें किसी भी सिपाही की माँ को ढूँढा जा सकता है, कैसे ?

उत्तर ⇒ एकांकी के दूसरे भाग में बिशनी के स्वप्न में जो घटना घटती है उसमें जो संवाद होता है उस संवाद से उसमें किसी भी सिपाही की माँ की ढूँढा जा सकता है। जब सिपाही मानक को खदेड़ते हुए बिशनी के पास ले आता है तो मानक गले से लिपट जाता है और सिपाही के पूछने पर कि इसकी तू क्या लगती है बिशनी का जबाव आता है-मैं इसकी माँ हूँ। मैं तुझे इसे मारने नहीं दूंगी। तब सिपाही का जबाव आता है यह हजारों का दुश्मन है वे उसको खोज रहे हैं तब बिशनी कहती है-तू भी तो आदमी है; तेरा भी घर-बार होगा। तेरी भी माँ होगी। तू माँ के दिल को नहीं समझता। मैं अपने बच्चे को अच्छी तरह से जानती हूँ। साथ ही जब मानक का पलटवार सिपाही पर होता है तब बिशनी मानक को यह कहती है कि बेटा ! तू इसे नहीं मारेगा। तुझे तेरी माँ की सौगन्ध तू इसे नहीं मारेगा इन संवादों से पता चलता है कि बिशनी मानक को जितना बचाना चाहती है उतना ही उस सिपाही को भी। उसका दिल दोनों के लिए एक है। अत: उसमें किसी भी सिपाही की माँ को ढूँढा जा सकता है।


5. मानक और सिपाही एक-दूसरे को क्यों मारना चाहते हैं ?

उत्तर ⇒ मानक वर्मा की लड़ाई में भारत की ओर से अंग्रेजों के साथ लड़ने गया था और दूसरी ओर के पक्ष जापानी थे। सेना एक दूसरे का दुश्मन है। क्योंकि वे अपने-अपने देश का प्रतिनिधित्व करते हैं। मानक और सिपाही अपने को एक दूसरे का दुश्मन समझते हैं इसलिए चे एक- दूसरे को मारना चाहते हैं।


6.मुन्नी के विवाह की चिंता न होती तो मानक लड़ाई पर न जाता आर उसकी यह दशा न होती यह चिंता किसी लड़ाई से कम नहीं है। क्या आप इस कथन से सहमत हैं ? अपना पक्ष दें।

उत्तर ⇒ निम्नमध्यवर्गीय व्यक्ति के लिए सबसे बडी उसकी समस्या आर्थिक समस्या होता है। वह मुन्नी के विवाह की चिंता के कारण ही युद्ध पर जाता है। मुन्नी की शादी की चिता एक त्रासदी है। जिस समाज में बिना दहेज के बिना पैसे के शादी न हो वह समाज कलुष ह। हम उस समाज से लडाई लडनी चाहिए। इस सडे हा समाज को बदलने के लिए यद्ध के समान ही लड़ना होगा। तब जाकर इसका निदान होगा। इसलिए विवाह की चिंता लड़ाई से कम नहीं है।


7. एकांकी और नाटक में क्या अंतर है ? संक्षेप में बताएँ।

उत्तर ⇒ एकांकी और नाटक में निम्नलिखित अंतर हैं –

1. एकांकी में एक ही अंक होता है और उस एक अंक में एक से अधिक दृश्य होते हैं जबकि नाटक में एक से अधिक अंक या एक्ट होते हैं और प्रत्येक अंक कई दृश्यों में विभाजित होकर प्रस्तुत होता है।

2. एकांकी नाटक में एकल कथा होती है अर्थात् वहाँ केवल आधिकारिक कथा प्रासंगिक नहीं। साथ ही नाटक में आधिकारिक कथा आकार की दृष्टि से छोटी होती है तथा कोई एक लक्ष्य लेकर चलती है।

3. एकांकी और नाटक में क्रिया व्यापार की सत्ता प्रधान होती है। इसे संघर्ष या द्वन्द्व कहा जाता है। यही कथा और पात्र को लक्ष्य तक पहुंचाता है। एकांकी में यह क्रिया व्यापार सीधी रेखा में चलता है लेकिन नाटक में प्रायः टेढ़ी-सीधी रेखा चलती है। नाटक में इतर प्रसंगों के लिये अवसर होता है लेकिन एकांकी में भटकने की गुंजाइश नहीं होती है।

4. एकांकी में यथासाध्य जरूरी स्थितियों को ही कहने की चेष्टा की जाती है जबकि नाटक में देशकाल और वातावरण को थोड़े विस्तार से चित्रित करने का अवसर होता है।

5. भारतीय दृष्टि से नाटक में कथा को नियोजित संघटित करने के लिए अर्थ प्रकति कार्यावस्था और नाट्य संधि का विधान किया गया है लेकिन एकांकी में इनकी आवश्यकता नहीं पड़ती है।


8. दोनों लड़कियाँ कौन हैं ?

उत्तर ⇒ ‘सिपाही की माँ’ शीर्षक एकांकी में दो लड़कियों के नाम से दो पात्र है। एक को पहली लड़की व दूसरे को दूसरी लड़की के रूप में संबोधित किया गया है। दोनों लड़कियाँ रंगून नगर की है। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय जब जापानी व हिन्दुस्तानी सेना बर्मा में युद्ध कर रही थी तब वहाँ भयंकर रक्तपात हआ था। लाखों बर्मा निवासी घर-द्वार छोड़कर भारत की सीमा में घुस आये थे। उन्हीं में से दो लड़कियों ने अपने परिवार के ग्यारह सदस्यों के साथ दुर्गम एवं बीहड़ जंगलों एवं दलदलों को पार करते हुए भारत में प्रवेश किया था। उन्हीं दोनों लड़कियों की भेंट इस एकांकी की मुख्य पात्र बिशनी से हो जाती है एवं खाने के लिये अन्न की माँग करती है। बिशनी इन्हें भर कटोरा चावल देती है।


9. कुंती का परिचय आप किस तरह देंगे ?

उत्तर ⇒ कुंती ‘सिपाही की माँ’ शीर्षक एकांकी में एक प्रमुख पात्र है। वह एक अच्छी पड़ोसन के रूप में रंगमंच पर प्रस्तुत हुई है। यद्यपि कुंती की भूमिका थोड़े समय के लिये है। तब भी उसे थोड़े में आँका नहीं जा सकता। वह बिशनी की पुत्री मुन्नी के विवाह के लिये चिंतित है। वह स्वयं मुन्नी के लिये वर-घर खोजने को भी तैयार है। वह बिशनी को सांत्वना भी देती है। बिशनी के पुत्र नामक के बर्मा से सकुशल लौटने की बात भी वह करती है। बिशनी के प्रति उसकी सहानुभूति उसके शब्दों में स्पष्ट दिखाई पड़ती है। वह कहती है तू इस तरह दिल क्यों हल्का कर रही है। कुंती वर्मा के लड़कियों के प्रति थोड़ा कठोर दिखाई देती है। उनके हाव-भाव एवं पहनावे तथा भिक्षाटन पर थोड़ा क्रुद्ध भी हो जाती है। उनका इस तरह से भिक्षा माँगना कतई अच्छा नहीं लगता है। यह कहती भी है- ‘हाय रे राम । लड़कियाँ कि………………..l

9. प्रगीत और समाज ( लघु उत्तरीय प्रश्न एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्न )

9. प्रगीत और समाज


1. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के काव्य-आदर्श क्या थे ? पाठ के आधार , स्पष्ट करें।

उत्तर ⇒आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के काव्य आदर्श प्रबंधकाव्य थे क्योंकि प्रबन्धकाव्य में मानव जीवन का एक पर्ण दृश्य होता है। प्रबन्धकाव्य जीवन के सम्पूर्ण पक्ष को प्रकाशित करता है। आचार्य शुक्ल को यह इसलिए परिसीमित लगा क्योंकि वह गीतिकाव्य है। आधनिक का से उन्हें शिकायत भी थी, इसका कारण था-“कला कला” की पुकार, जिसके फलस्वरूप यूरोप में प्रगीत-मुक्तकों (लिरिक्स) का ही चलन अधिक देखकर यह कहा जाने लगा कि अब यहाँ भी उसी का जमाना आ गया है। इस तर्क के पक्ष में यह कहा जाने लगा कि अब ऐसी लंबी कविताएँ पढ़ने की किसी को फुरसत कहाँ है जिनमें कुछ इतिवृत्त भी मिला रहता हो। ऐसी धारणा बन गई कि अब तो विशुद्ध काव्य की सामग्री जुटाकर सामने रख देनी चाहिए जो छोटे-छोटे प्रगीत मुक्तकों में ही संभव है। इस प्रकार काव्य में जीवन को अनेक परिस्थितियों की ओर ले जाने वाले प्रसंगों या आख्यानों की उद्भावना बन्द सी हो गई। यही कारण था कि ज्यों ही प्रसाद की “कामायनी”, “शेरसिंह का शस्त्र समर्पण”, “पंसोला की प्रतिध्वनि”, “प्रलय की छाया” तथा निराला की “राम की शक्तिपूजा” तथा “तुलसीदास’ जैसे आख्यानक काव्य सामने आए तो आचार्य शुक्ल ने संतोष व्यक्त किया।


2. प्रगीत को आप किस रूप में परिभाषित करेंगे ? इसके बारे में क्या धारणा प्रचलित रही है ?

उत्तर ⇒अपनी वैयक्तिकता और आत्मपरकता के कारण “लिरिक” अथवा “प्रगीत” काव्य की कोटि में आती है। प्रगीतधर्मी कविताएँ न तो सामाजिक यथार्थ की अभिव्यक्ति के लिए पर्याप्त समझी जाती है, न उनसे इसकी अपेक्षा की जाती है। आधुनिक हिन्दी कविता में गीति और मुक्तक के मिश्रण से नूतन भाव भूमि पर जो गीत लिखे जाते हैं उन्हें ही ‘प्रगीत’ की संज्ञा दी जाती है। सामान्य समझ के अनुसार प्रगीतधर्मी कविताएँ नितांत वैयक्तिक और आत्मपरक अनुभूतियों की अभिव्यक्ति मात्र है, यह सामान्य धारणा है। इसके विपरीत अब कुछ लोगों द्वास यह भी कहा जाने लगा है कि अब ऐसी लम्बी कविताएँ जिसमें कुछ इतिवृत्त भी मिला रहता है, इन्हें पढ़ने तथा सुनने की किसी की फुरसत कहाँ है अर्थात् नहीं है।


3. वस्तुपरक नाट्यधर्मी कविताओं से क्या तात्पर्य है ? आत्मपरक प्रगीत और नाट्यधर्मी कविताओं की यथार्थ-व्यंजना में क्या अंतर है ?

उत्तर ⇒वस्तुपरक नाट्यधर्मी कविताएँ प्राय: लम्बी होती हैं, उनमें जीवन की किसी समस्या अथवा घटना का विस्तृत चित्रण रहता है। यह वस्तुनिष्ठ होती है, समाज निरपेक्ष होती है। आत्मपरक प्रगीत व्यक्तिनिष्ट होते हैं। मुक्तिबोध के अधिकांश प्रगीत लम्बे तथा आत्मनिष्ठ होते हैं।

मुक्तिबोध का समूचा काव्य मूलतः आत्मपरक है। रचना विन्यास से कहीं वह पूर्णतः नाट्यधर्मी है, कहीं नाटकीय एकालाप हैं, कहीं नाटकीय प्रगीत है और कहीं शुद्ध प्रगीत। इस प्रकार नाट्यधर्मी एवं आत्मपरक प्रगीत पूर्णरूपेण भिन्न हैं।


4. हिन्दी कविता के इतिहास में प्रगीतों का क्या स्थान है ? सोदाहरण स्पष्ट करें।

उत्तर ⇒हिन्दी कविता का इतिहास मुख्यतः प्रगीत मक्तकों का है। इतना ही नहीं बल्कि गीतों ने ही जनमानस को बदलने में क्रान्तिकारी भूमिका अदा की है। “रामचरितमानस” की महिमा एक निर्विवाद सत्य है, इस सत्य से किसी को इन्कार नहीं, लेकिन ‘विनय-पत्रिका’ के पद एक व्यक्ति का अरण्यरोदन मात्र नहीं है। मानस के मर्मी भी यह मानते हैं कि तुलसी के विनय के पदों में पूरे युग की वेदना व्यक्त हुई है और उनकी चरम वैयक्तिकता ही परम सामाजिकता है। तुलसी के अलावा कबीर, सूर, मीरा, नानक, रैदास आदि अधिकांश संतों ने प्रायः दोहे और गेय पद ही लिखे हैं। यदि विद्यापति को हिन्दी का पहला कवि माना जाय तो हिन्दी कविता का उदय ही गीत से हुआ जिसका विकास आगे चलकर संतों और भक्तों की वाणी में हुआ। गीतों के साथ हिन्दी कविता का उदय कोई सामान्य घटना नहीं, बल्कि एक नई प्रगीतात्मकता (लिरिसिज्म) के विस्फोट का ऐतिहासिक क्षण है जिसके धमाके से मध्ययुगीन भारतीय समाज की रूढ़ि-जर्जर दीवारें हिल उठीं, साथ ही जिसकी माधुरी सामान्य जन के लिए संजीवनी सिद्ध हुई। कहने की आवश्यकता नहीं कि लोकभाषा की परिष्कृत प्रतीकात्मकता का उन्मेष भारतीय साहित्य की अभूतपूर्व घटना है, जिसकी अभिव्यक्ति हिन्दी के साथ ही भारत की सभी आधुनिक भाषाओं में लगभग साथ-साथ हुई।


6. आधुनिक प्रगीत काव्य किन अर्थों में भक्तिकाव्य से भिन्न एवं गुप्तजी आदि के प्रबन्ध काव्य से विशिष्ट हैं ?

उत्तर ⇒आधुनिक प्रगीत काल का उन्मेष बीसवीं सदी में रोमान्टिक उत्थान के साथ हुआ तथा इसका सम्बन्ध भारत के राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष से है। इसके भक्तिकाव्य से भिन्न इस रोमान्टिक प्रगीतात्मकता के मूल में एक नया व्यक्तिववाद है जहाँ समाज के बहिष्कार के द्वारा ही व्यक्ति अपनी सामाजिकता प्रमाणित करता है। इन रोमान्टिक प्रगीतों में भक्तिकाव्य जैसी तन्मयता नहीं होती किन्तु आत्मीयता और एन्द्रियता उससे कहीं अधिक है। इस दौरान सीधे-सीधे राष्ट्रीयता संबंधी विचारों तथा भावों को काव्यरूप देने वाले मैथिलीशरण गुप्त जैसे राष्ट्रकवि हुए और आधकाशतः उन्होंने प्रबन्धात्मक काव्य ही लिखे जिन्हें उस समय ज्यादा सामाजिक माना गया। रोमांटिक प्रगीत उस युग की चेतना को कहीं अधिक गहराई से वाणी दे रहे थे और उनकी ‘असामाजिकता’ में ही सच्ची सामाजिकता है। इस प्रकार आधुनिक प्रगीतकाव्य भक्तिकाव्य से भिन्न हैं तथा गुप्तजी आदि के प्रबंधकाव्य से विशिष्ट हैं।

10. जूठन प्रश्न ( लघु उत्तरीय प्रश्न एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्न )


1. विद्यालय में लेखक के साथ कैसी घटनाएँ घटती हैं ?

उत्तर ⇒ विद्यालय में लेखक के साथ बड़ी ही दारुण घटनाएँ घटती है। बाल सुलभ मन पर बीतने वाली हृदय विदारक घटनाएँ लेखक के मन:पटल पर आज भी अंकित है। विद्यालय में प्रवेश के प्रथम ही दिन हेडमास्टर बड़े बेदब आवाज में लेखक से उनका नाम पूछता है। फिर उनकी जाति का नाम लेकर तिरस्कृत करता है। हेडमास्टर लेखक को एक बालक नहीं समझकर उसे नीची जाति का कामगार समझता है और उससे शीशम के पेड़ की टहनियों का झाडू बनाकर पूरे विद्यालय को साफ करवाता है। बालक की छोटी उम्र के बावजूद उससे बड़ा मैदान भी साफ करवाता है, जो काम चूहड़े जाति का होकर भी अभी तक उसने नहीं किया था। दूसरे दिन भी उससे हेडमास्टर वही काम करवाता है। तीसरे दिन जब लेखक कक्षा के कोने में बैठा होता है, तब हेडमास्टर उस बाल लेखक की गर्दन दबोच लेता है तथा कक्षा से बाहर लाकर बरामदे में पटक देता है। उससे पुराने काम को करने के लिए कहा जाता भी लेखक के पिताजी अचानक देख लेते हैं। उन्हें यह सब करते हुए बेहद तकलीफ होती है और वे हेडमास्टर से बकझक कर लेते हैं।


2. दिन रात मर खप कर भी हमारे पसीने की कीमत मात्र जूठन’, फिर भी किसी को शिकायत नहीं। कोई शर्मिंदगी नहीं, कोई पश्चाताप नहीं। ऐसा क्यों ? सोचिए और उत्तर दीजिए।

उत्तर ⇒ जब समाज की चेतना मर जाती है, अमीरी और गरीबी का अंतर इतना बड़ा हो जाता है कि गरीब को जूठन भी नसीब नहीं हो, धन-लोलुपता घर कर जाती है, मनुष्य-मात्र का कोई महत्त्व नहीं रह जाता है। सृष्टि की सबसे उत्तम कृति माने जाने वाले मनुष्य में मनुष्यत्व का अधोपतन हो जाता है, श्रम निरर्थक हो जाता है, उसे मनुष्यत्व की हानि पर कोई शर्मिंदगी नहीं होती है, कोई पश्चाताप नहीं रह जाता है।

कुरीतियों के कारण अमीरों ने ऐसा बना दिया कि गरीब की गरीबी कभी न जाए और अमीर की अमीरी बनी रहे। यही नहीं, इस क्रूर समाज में काम के बदले जूठन तो नसीब हो . जाती है परन्तु श्रम का मोल नहीं दिया जाता है। मिलती हैं सिर्फ गालियाँ। शोषण का एक
चक्र है जिसके चलते निर्धनता बरकरार रहे। परन्तु जो निर्धन है, दलित है उसे जीना है संघर्ष करना है इसलिए उसे कोई शिकायत नहीं, कोई शर्मिंदगी, कोई पश्चाताप नहीं।


3. सरेन्द्र की बातों को सुनकर लेखक विचलित क्यों हो जाते हैं ?

उत्तर ⇒ सुरेन्द्र के द्वारा कहे गये वचन “भाभीजी, आपके हाथ का खाना तो बहुत जायकेदार है। हमारे घर में तो कोई भी ऐसा खाना नहीं बना सकता है” लेखक को विचलित कर देता है। सुरेन्द्र के दादा और पिता के जूठों पर ही लेखक का बचपन बीता था। उन जूठों की कीमत थी दिनभर की हाड़-तोड़ मेहनत और भन्ना देने वाली दुर्गन्ध और ऊपर से गालियाँ, धिक्कार।

सुरेन्द्र की बड़ी बुआ की शादी में हाड़-तोड़ मेहनत करने के बावजूद सुरेन्द्र के दादाजी ने उनकी माँ के द्वारा एक पत्तल भोजन माँगे जाने पर कितना धिक्कारा था। उनकी औकात दिखाई थी, यह सब लेखक की स्मृतियों में किसी चित्रपटल की भाँति पलटने लगा था।

आज सुरेन्द्र उनके घर का भोजन कर रहा है और उसकी बड़ाई कर रहा है। सुरेन्द्र के द्वारा कहा वचन स्वतः स्फूर्त स्मृतियों में उभर आता है और लेखक को विचलित कर देता है।


4. घर पहुंचने पर लेखक को देख उनकी माँ क्यों रो पड़ती है ?

उत्तर ⇒ लेखक अपने बाल समय में अपने परिवार का सबसे ज्यादा दुलारा था। उसके घर का हर सदस्य गालियाँ खाकर भूखे सोना पसन्द कर सकता था लेकिन अपने लाड़ले को अपने घृणित पेशे में लाना नामंजूर था। लेखक के द्वारा मजबूरीवश उन्हीं पेशे में आने पर उनकी
माँ रो पड़ती है।

वह अपनी बेवसी, लाचारी और दुर्दशा पर रोती है। वह समाज की उन तथाकथित रईसों पर रोती है। वह समाज की उन कुरीतियों पर रोती है, जो उन्हें इस हाड़-तोड़ घृणित पेशे के बावजूद जूठन पर जीने को मजबूर करती है। वह उसे क्रूर समाज की विडंबनाओं पर रोती है, जहाँ श्रम का कोई मोल नहीं है, जहाँ निर्धनता को बरकरार रखने का षड्यंत्र रचा गया है।


5. पिताजी ने स्कूल में क्या देखा ? उन्होंने आगे क्या किया? पूरा विवरण अपने शब्दों में लिखें।

उत्तर ⇒ लेखक ओमप्रकाश के पिता अचानक तीसरे दिन विद्यालय के सामने से जा रहे थे कि बेटे ओम प्रकाश को विद्यालय के मैदान में झाडू लगाते देखकर ठिठक गये और वहीं से आवाज लगाई। ओमप्रकाश जिसे मुंशीजी कहकर वे सम्बोधित करते थे। पूछते हैं कि मुंशीजी ये क्या कर रहा है ? उन्हें देखकर लेखक फफक-फफककर रोने लगता है। इतने में उनके पिताजी सड़क से मैदान में उसके समीप पहुँचकर, पुचकार कर पूछते हैं तो लेखक पिता को सारी बात बताते हुए कहता है-तीन दिन से रोज झाडू लगवा रहे हैं। कक्षा में पढ़ने भी नहीं देते।”

इतना सुनकर पिता ने पुत्र के हाथ से झाडू छीन कर दूर फेंक दिया। उनकी आँखों में आग की गर्मी उतर आयी। हमेशा दूसरे के सामने कमान बने रहनेवाले पिता की लंबी-लंबी मूंछे गुस्से में फड़कने लगीं और चीखते हुए बोले “कौन-सा मास्टर है वो, जो मेरे लड़क से झाडू लगवावे है…….”।

लेखक ओमप्रकाश के पिताजी की आवाज पूरे स्कूल में गूंज रही थी, जिसे सुनकर हेडमास्टर के साथ सभी मास्टर लोग भी बाहर आ गये और हेडमास्टर ने गाली देकर उसके पिता को धमकाया। किन्तु धमकी का कोई असर न दिखाते हुए लेखक के पिता ने पूरे साहस
और हौसले से और उच्च स्वर में हेडमास्टर कालीराम का सामना किया और इस घटना का लेखक पर ऐसा असर हुआ कि लेखक कभी भूल नहीं पाया।


6. बचपन में लेखक के साथ जो कुछ हुआ, आप कल्पना करें कि आपके साथ भी हुआ हो-ऐसी स्थिति में आप अपने अनुभव और प्रतिक्रिया को अपनी भाषा में लिखिए।

उत्तर ⇒ “जुठन” शीर्षक आत्मकथा के माध्यम से लेखक और ओमप्रकाश वाल्मीकि ने अपने बचपन के जो अनुभव प्रस्तुत किये हैं भारतीय समाज के लिये एक चिन्ता का विषय है। बचपन ईश्वर का दिया हआ एक अद्वितीय उपहार है। बचपन में बालक निश्छल एव सरल होता है। जीवन का यह बहमल्य समय शिक्षा ग्रहण एवं बडों द्वारा लाड़-प्यार की प्राप्ति का अवसर है। ऐसे में किसी बालक को दलित अछुत समझ कर प्रताड़ित करना समाजविराधा, मानवताविरोधी एवं राष्ट्रविरोधी कार्य है।

लेखक के साथ उनके बचपन में जो घटनायें घटी वे घोर निंदनीय हैं। अगर मैं उनकी जगह बालक होता तो मेरे मन में वही प्रभाव पड़ता जो लेखक के दिलोदिमाग पर पड़ा।

मैं लेखक की भावनाओं का आदर करता हूँ। समाज की कुरीतियाँ शीघ्र दूर होनी चाहिये। मानव-मानव में भेद करना ईश्वर को अपमानित करने जैसा है।


7. किन बातों को सोचकर लेखक के भीतर काँटे जैसा उगने लगते हैं ?

उत्तर ⇒  “जूठन’ शीर्षक आत्मकथा में लेखक ओमप्रकाश वाल्मीकि ने प्रस्तुत पंक्तियों में अपने बचपन की गरीबी, समाज में व्याप्त भेदभाव उपेक्षा तथा प्रताड़ना का बड़ा ही मार्मिक चित्र प्रस्तुत किया है।

लेखक का पूरा परिवार गाँव में मेहनत-मजदूरी का काम करता था जिसमें एक-एक घर में 10-15 मवेशियों का काम, बैठकखाने की सफाई का काम करना पड़ता था। सर्दी के महीनों में यह काम और कठिन हो जाता था, क्योंकि प्रत्येक घरों से मवेशियों के गोबर उठाकर गाँव से बाहर कुरड़ियों पर या उपले बनाने की जगह तक पहुँचाना पड़ता था। इन सब कामों – के बदले दो जानवर पीछे 25 सेर (20-22 किलो) अनाज ही मिलता था। दोपहर में बची-खुची रोटी ही मिलती थी। खासतौर पर चूहड़ों को देने के लिये आटे में भूसी मिला कर बनाई जाती थी। कभी-कभी जूठन भी भंगन की टोकरी में डाल दी जाती थी।

शादी-ब्याह के मौके पर जूठे पत्तल चूहड़ों (अछूतों) के टोकरे में डाल दिये जाते थे, जिन्हें घर ले जाकर वे जूठन इकट्ठी कर लिया करते थे। पत्तलों से पूड़ियों के टुकड़े जो बचे होते थे उन्हें चरपाई पर कोई कपड़ा डालकर उस पर सुखा कर रख लिये जाते थे। मिठाइयाँ जो इकट्ठी होती थी वे कई-कई दिनों तक अथवा बड़ी बारातों की मिठाइयाँ कई-कई महीने तक आपस में चर्चा कर-करके खाते रहते थे। सुखी हुई पूरियाँ की लुग्दी बनाकर अथवा उबाल कर मिर्च-मसाले डालकर खाने में क्या मजा आता था। आज जब इन सब बातों के बारे में लेखक सोचता है तो “मन के भीतर काँटे जैसा उगने लगता है। कैसा जीवन था।”

11. हँसते हुए मेरा अकेलापन ( लघु उत्तरीय प्रश्न एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्न )

11. हँसते हुए मेरा अकेलापन


1. डायरी क्या है ?

उत्तर ⇒ डायरी दैनिक वृत्त की पुस्तक है, इसे दैनंदिनी भी कहा जाता है। इसमें जीवन के प्रतिदिन की घटनाओं व अनुभवों का वर्णन होता है। किसी व्यक्ति की डायरी से उसके मन के भाव, उसके जीवन के लक्ष्य, जीवन की स्थितियाँ परिलक्षित होती है। डायरी किसी के जीवन का दर्पण है।


2. किस तारीख की डायरी आपको सबसे प्रभावी लगी और क्यों ?

उत्तर ⇒ हमें 3 मार्च 81 की डायरी सबसे ज्यादा प्रभावली लगी। इस तिथि की डायरी में लेखक ने मनुष्य जीवन का बड़ा ही सटीक एवं यथार्थ चित्र प्रस्तुत किया है। मनुष्य विभिन्न प्रकार की कठिनाइयों को झेलते हुए इस संसार में अपना अस्तित्व बनाये रखने का प्रयास करता है। वह तनाव में जीता है। लक्ष्य प्राप्ति की इच्छा से वह सदा प्रयत्नशील रहता है। मानव-जीवन इस विशिष्टता से विशेष प्रभावित होता है।


3. ‘धरती का क्षण’ से क्या आशय है ?

उत्तर ⇒ लेखक कविता के मूड में जब डायरी लिखते हैं तो शब्द और अर्थ के मध्य की दूरी अनिर्धारित हो जाती है। शब्द अर्थ में और अर्थ शब्द में बदलते चले जाते हैं, एक दूसरे को पकड़ते-छोड़ते हुए। शब्द और अर्थ का जब साथ नहीं होता तो वह आकाश होता है जिसमें रचनाएँ बिजली के फूल की तरह खिल उठती हैं किन्तु जब इनका साथ होता है तो वह धरती का क्षण होता है और उसमें रचनाएँ जड़ पा लेती हैं। प्रस्फटन का आदि मोत पा जाती है। अतः यह कहना उचित है कि शब्द और अर्थ दोनों एक-दूसरे के पूरक है।


4. रचे हुए यथार्थ और भोगे हुए यथार्थ में क्या संबांध है ?

उत्तर ⇒ मनुष्य अपना-अपना यथार्थ स्वयं रचता है और उस रचे हये यथार्थ का दसरो को दे देता है। प्रत्येक का भोगा हुआ यथार्थ एक दिया हुआ यथार्थ है। भोगा दसरों के दिये हए हिस्से होते हैं। हिस्से यथार्थ का एक सामूहिक नाम है। का रिश्ता द्वंद्वात्मक होते हुए भी इन दोनों की जड़े एक-दूसरे में हैं और वहीं से ले जा पोषण रस पाती है। ये दोनों एक-दूसरे को बनाते-मिटाते भी रहते हैं। हर आदमी ऐसे को रचता है, जिसमें वह जीता है और भोगता है। लेकिन रचा हुआ यथार्थ से भोग यथार्थ अलग होता है, ऐसा कहा जा सकता है।


5. लेखक के अनुसार सुरक्षा कहाँ है ? वह डायरी को किस रूप में देखना चाहता है ?

उत्तर ⇒ लेखक मलयज के अनुसार सुरक्षा डायरी में नहीं, बल्कि सूरज के पूर्ण प्रकाश में है। अंधेरे में तो पल भर की धुक-धुकी के साथ छुपा जा सकता है। किन्तु लड़ने, पिसने, खटने और चुनौती को स्वीकारने में ही वास्तविक जीवन है। पलायन व स्वयं को बचाने में जीवन की सुरक्षा नहीं बल्कि साहस के साथ चुनौती को स्वीकार कर पूर्ण संघर्षरत प्रकाशित जीवन जीने में ही सुरक्षा माननी चाहिये, लेखक का अभिमत भी ऐसा ही है।


6. हरिचरण को हरचरना क्यों कहा गया है ?

उत्तर ⇒ हरिचरण तत्सम (संस्कृतनिष्ठ) शब्द है और वह संभ्रांत नाम की संस्कृति का परिचायक है तथा हरचरणा ग्रामीण संस्कृति का शब्द है। हरिचरण विशिष्ट आदमी का प्रतिनिधि हो सकता है। हरिचरण शब्द से परिस्थिति के अनुकूल गाँव की फटेहाली, उसकी गरीबी एवं उसका क्षोभ व्यक्त नहीं होता है जो हरिचरण से होता है। इसलिए कवि ने हरिचरण को हरचरणा कहा है।


7. डायरी का लिखा जाना क्यों मुश्किल है ? ।

उत्तर ⇒ डायरी मन का कूड़ा है। डायरी में शब्दों और अर्थों के बीच तटस्थता कम रहती है। डायरी में व्यक्ति अपने मन की बातों को कागज पर उतारता है। वह अपने यथार्थ को अपने ढंग से अपने समझने योग्य शब्दों में लिखता है। डायरी खुद के लिए लिखी जाती है, दूसरों के लिए नहीं। डायरी लिखने में अपने भाव के अनुसार शब्द नहीं मिल पाते हैं। यदि शब्दों का भंडार है भी तो उन शब्दों के लायक वे भाव ही न होते हैं। डायरी में मुक्ताकाश भी होता है, तो सूक्ष्मता भी। शब्दार्थ और भावार्थ मेल के कारण डायरी का लिखा जाना मुश्किल है।

12. तिरिछ प्रश्न ( लघु उत्तरीय प्रश्न एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्न )

12. तिरिछ प्रश्न


1. तिरिछ क्या है ? कहानी में यह किसका प्रतीक है ?

उत्तर ⇒ ‘तिरिछ’ छिपकली प्रजाति का जहरीला लिजार्ड है जिसे विषखापर भी कहते है। कहानी में ‘तिरिछ’ प्रचलित विश्वासों और रूढ़ियों का प्रतीक है।


2. “तिरिछ’ लेखक के सपने में आता था और वह इतनी परिचित आँखों से देखता था कि लेखक अपने आपको रोक नहीं पाता. था। यहाँ परिचित आंखों से क्या आशय है ?

उत्तर ⇒ हमारे यहाँ प्रचलित विश्वास है कि तिरिछ काटने के लिए तभी दौड़ता है, जब उससे नजर टकरा जाए। अगर तिरिछ को देखो तो उससे कभी आँख मत मिलाओ। आँख मिलते ही वह आदमी की गंध पहचान लेता है और फिर पीछे लग जाता है। फिर तो आदमी चाह पूरी पृथ्वी का चक्कर लगा ले तिरिछ पीछे-पीछे जाता है। लेखक के सपने में तिरिछ आता था, वह कोशिश करता था कि उससे नजर न मिलने पाये। तिरिछ लेखक को इतनी परिचित आँखों से देखता था कि लेखक को उसकी आँखों में परिचय की जो चमक नजर आती थी उससे लगता था कि वह लेखक का शत्रु है और उसे लेखक के दिमाग में आनेवाले हर विचार के बारे में पता है।


3. तिरिछ को जलाने गए लेखक को पूरा जंगल परिचित लगता है। क्यों ?

उत्तर ⇒ लेखक को पूरा जंगल परिचित इसीलिए लगता है कि इसी जगह से कई बार सपने में तिरिछ से बचने के लिए भागा था। लेखक गौर से हर तरफ देखता है कि और उसके सपने के बाद थान को बताया भी था कि एक सँकरा-सा नाला इस जगह बहता है। नाले के ऊपर जहाँ बड़ी-बड़ी चट्टानें हैं, वहीं कीकर का एक बहुत पुराना पेड़ है, जिस पर बड़े शहद के छत्ते हैं। लेखक को एक भूरा रंग का चट्टान मिलता है जो बरसात भर नाले के पानी में आधी डुबी रहती थी। लेखक को उसी जगह तिरिछ की लाश भी मिल जाती है। सपने में आयी बातों का सच होना लेखक को जंगल से परिचित कराता है। इसीलिए लेखक को जंगल परिचित लगता है। क्योंकि इन सब चीजों को वह सपने में देख चुका था।


4. लेखक को अब तिरिछ का सपना नहीं आता, क्यों ?

उत्तर ⇒  लेखक को अब तिरिछ का सपना नहीं आने का कारण लेखक को सपना सत्य प्रतीत होना था। परन्तु अब लेखक विश्वास करता है कि …… मैं विश्वास करना चाहता हूँ कि यह सब सपना है। अभी आँख खोलते ही सब ठीक हो जायेगा।
इससे पहले लेखक को सपने की बात प्रचलित विश्वास सपने सच हुआ करते सत्य प्रतीत होती थी। लेखक फैंटेसी में जीता था परन्तु अनुभव से यह जान गया कि सपना बस सपना भर. है। लेखक ने जटिल यथार्थ को सफलतापूर्वक अभिव्यक्त करने के लिए दुःस्वप्न का प्रयोग किया है। परन्तु जैसे ही लेखक का भ्रम टूटता है तो उसे डर नहीं लगता और तिरिछ के सपने नहीं आते।


5. लेखक के पिताजी ने एक पत्र लिफाफे में देकर लेखक को शहर के डॉक्टर के पास भेजा, उसके बाद क्या हुआ, उन बातों पर प्रकाश डालें।

उत्तर ⇒ लेखक ने स्कूल फीस की बात पिताजी से कही थी। दो दिनों तक वे गम रहे। इसपर लेखक और उसकी माँ को लगा कि पिताजी फीस की बात भूल गए हैं। लेकिन तीसरे दिन लिफाफा युक्त एक पत्र लेखक को देते हुए शहर के डॉ. पंत के पास भेजा तब लेखक अचरज में पड़ गए क्योंकि पत्र प्राप्ति के बाद डॉ. पंत ने लेखक को शरबत पिलाकर घर के अंदर प्रेमपूर्वक ले गए। अपने बेटे से परिचय कराकर सी-सी के तीन नोट भी दिए।


6. लेखक पिताजी को किस रूप में देखता था ?

उत्तर ⇒ लेखक अपने पिताजी के गंभीर, मितभाषी स्वभाव से परिचित था। अतः वे स्वयं तथा परिवार के अन्य लोग पिताजी पर गर्व करते थे। परिवार के सभी लोग पिता जी से डरते भी थे। वें अपनी आवश्यकता और कठिनाई को किसी पर प्रकट नहीं करते थे। वे ग्रामीण परिवेश के सीदे-सादे इन्सान थे। इन्हीं गुणों के कारण लेखक एवं परिवार के लोग पिताजी पर गर्व करते थे एवं सम्मान की दृष्टि से देखते थे।


7. “तिरिछ’ क्या होता है, क्या उसके काटने से आदमी बचता है ?

उत्तर ⇒ ‘तिरिछ’ एक विषैला और भयानक जन्तु है। इसके काटने पर मनुष्य इसक विष के प्रभाव से बच नहीं पाता है। ठीक उस जंत ‘तिरिछ’ के समान ही हमारे समाज में भी विषैले ‘तिरिछ’ रूपी मनुष्य हैं जिनके दुर्व्यवहार से कोई बच नहीं सकता। वे भी भयानक एवं खतरनाक होते हैं। उनके विष-वाण से बचना मुश्किल होता है।


8. ‘तिरिछ’ ज्यादा कहाँ पाया जाता है ?

उत्तर ⇒ ‘तिरिछ’ प्रायः पहाड़ की कन्दराओं, जंगलों अथवा घनी झाड़ियों में पाया जाता है। आदमी को देखते ही तथा नजर मिलते ही उसका पीछा कर काटकर ही दम लेता है। ठीक उसी के सदृश समाज में भी विषैले ‘तिरिछ’ रूपी मनुष्य पाए जाते हैं।


9. लेखक किन-किन जीव-जंतुओं से डरता था ?

उत्तर ⇒ लेखक ने अपने बचपन के अनुभव को व्यक्त किया है। वह सामान्य बच्चों की तरह ‘तिरिछ’ से बहुत डरता था। वह सपने में दो चीजें बराबर देखता था-एक हाथी और दूसरी ‘तिरिछ’। लेखक प्रायः हमेशा कोशिश करता था कि इन दोनों से कभी भेंट न हो इन दोनों के देखते ही लेखक नजर बचाकर भागता दौड़ता था। अपनी जान बचाने की कोशिश करता था।


10. सपने में लेखक क्या-क्या करता था ?

उत्तर ⇒ लेखक के लिए सबसे खौफनाक, यातनादायक, भयाक्रांत और बेचैनी से भरा सपना था कि हाथी और ‘तिरिछ’ से प्राण को कैसे बचाया जाय। वह जब भी सपने में या सामने हाथी या ‘तिरिछ’ को देखता था तो प्राण रक्षा के लिए बेदम हो जाता था। भागते-भागते उसका पूरा शरीर थक जाता था। फेफड़े फूल जाते थे। शरीर पसीने से लथ-पथ हो जाता था। एक डरावनी, सुन्न कर डालने वाली मृत्यु बिल्कुल करीब दिखाई पड़ती थी। वह चीखने, चिल्लाने और रोने लगता था।


11. साँप के बारे में लोगों की एवं लेखक की क्या धारणा है, लिखें ?

उत्तर ⇒ लेखक एवं आम लोगों की धारणा है कि अगर कोई व्यक्ति साँप को मार रहा हो तो अपने मरने के पूर्व वह साँप अंतिम बार अपने हत्यारे के चेहरे को पूरी तरह से, बहुत गौर से देखता है। आदमी उसकी हत्या कर रहा होता है, और साँप टक-टकी बाँधकर उस आदमी के चेहरे की एक-एक बारीकी को अपनी आँख के भीतरी पर्दे में दर्ज कर रहा होता है। बाद में, आदमी के जाने के बाद साँप का दूसरा जोड़ा उस मरे हुए साँप की आँख में झाँककर हत्यारे की पहचान कर लेता है। वह हत्यारा कहीं भी चला जाए साँप बदला लेने की फिराक में रहता है।


12. थानू कौन था ? लेखक के साथ क्या संबंध था ?

उत्तर ⇒ थानू लेखक का मित्र है। थानू लेखक का प्रिय एवं विश्वसनीय मित्र होने के नाते ‘तिरिछ’ के बारे में बता रहा था। जब लेखक के पिता को ‘तिरिछ’ जैसा विषैला जंत काट लेता है तब वह (थान) कहता है कि ‘तिरिछ’ द्वारा काटा गया व्यक्ति जीवित नहीं रह पाता तथा उसकी मृत्यु चौबीस घंटे के भीतर हो जाती है। अब चूँकि उनकी (पिताजी की मृत्यु हो चुकी है इसलिए थानू अपने पूर्व कथन की पुनः पुष्टि कर रहा है।

13. शिक्षा ( लघु उत्तरीय प्रश्न एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्न )


1. शिक्षा का क्या अर्थ है एवं इसके क्या कार्य हैं ? स्पष्ट करें।

उत्तर ⇒ मानव जीवन के सर्वांगीण विकास का अर्थ शिक्षा है। इसमें मनुष्य का साक्षरता बुद्धिमत्ता, जीवन-कौशल व अन्य सभी समाजोपयोगी गुण पाये जाते हैं। शिक्षा के अन्तर्गत विद्यार्थी का विद्यालय जाना, विविध विषयों की पढ़ाई करना, परीक्षाएँ उत्तीर्ण होना, जीवन में ऊँचा स्थान प्राप्त करना, दूसरों से स्पर्धा करना, संघर्ष करना एवं जीवन के सर्व पहलुओं का समुचित अध्ययन करना-ये सारी चीजें शिक्षा के अन्तर्गत आती हैं। साथ ही जीवन को ही समझना शिक्षा है।

शिक्षा के कार्य-शिक्षा का कार्य केवल मात्र कुछ नौकरियों और व्यवसायों के योग्य बनाना ही नहीं है बल्कि संपूर्ण जीवन की प्रक्रिया बाल्यकाल से ही समझाने में सहयोग करना है एवं स्वतंत्रतापूर्ण परिवेश हेतु प्रेरित करना भी।


2. जीवन क्या है ? इसका परिचय लेखक ने किस रूप में दिया है ?

उत्तर ⇒ लेखक जे. कृष्णमूर्ति ने जीवन के व्यापक स्वरूप को हमारे समक्ष प्रस्तुत किया है। जीवन बडा अदभत. असीम और अगाध तत्व है। जीवन अनंत रहस्यों से युक्त एक विशाल साम्राज्य है, जिसमें मानव कर्म करते हैं। जीवन समुदायों, जातियों और देशों का पारस्परिक सघष है। जीवन ध्यान है, जीवन धर्म है, जीवन गूढ़ है, जीवन विराट है, जीवन सुख-दुख और भय से युक्त होते हुये भी आनंदमय है।

जीवन का परिचय देते हुए लेखक का मानना है कि इसमें अनेक विविधताओं, अनंतताओं के साथ रहस्य अनेकों भी मौजूद हैं। यह कितना विलक्षण है। प्रकृति में उपस्थित पक्षीगण, फूल, वैभवशाली वृक्षों, सरिताओं, आसमान के तारों में भी लेखक को जीवन का रूप दिखाई पड़ता है। लेखक जे. कृष्णमूर्ति ने जीवन का परिचय सर्वरूपों में दिया है।


3. ‘बचपन से ही आपका ऐसे वातावरण में रहना अत्यंत आवश्यक है जो स्वतंत्रतापूर्ण हो।’ क्यों ?

उत्तर ⇒ बचपन से ही स्वतंत्रतापूर्ण वातावरण में रहना आवश्यक है जहाँ भय की गुंजाइश नहीं हो। मनचाहे कार्य करने की स्वतंत्रता नहीं बल्कि ऐसा वातावरण जहाँ स्वतंत्रतापूर्वक जीवन की संपूर्ण प्रक्रिया समझी जा सके। जिससे सच्चे जीवन का विकास संभव हो पाये। क्योंकि भयपूर्ण वातावरण मनुष्य का ह्रास कर सकता है विकास नहीं। इसलिए लेखक जे० कृष्णमूर्ति का यह सत्य और सार्थक कथन है कि बचपन से ही आपका ऐसे वातावरण में रहना अत्यंत आवश्यक है जो स्वतंत्रतापूर्ण हो।


4. जहाँ भय है वहाँ मेधा नहीं हो सकती, क्यों ?

उत्तर ⇒ मेधा वह शक्ति है जिससे मनुष्य सिद्धान्तों की अनुपस्थिति में भी निर्भयतापूर्वक सोचता है ताकि वह सत्य और यथार्थ को समझ सके। यदि मनुष्य भयभीत रहता है तो कभी मेधावी नहीं हो सकेगा। किसी प्रकार की महत्वाकांक्षा चाहे आध्यात्मिक हो या सांसारिक-चिन्ता और भय का निर्माण करती है। जबकि ठीक इसके विपरीत निर्भीक वातावरण में मेधा का जन्म होता है। इसलिये जहाँ भय है वहाँ मेधा नहीं हो सकती।


5. जीवन में विद्रोह का क्या स्थान है ?

उत्तर ⇒ जीवन में अनुभवों के उच्च शिखर पर विद्रोह का स्थान तय हआ है। अधिकांश व्यक्ति किसी-न-किसी रूप में भयभीत रहता है। गहराई से इसकी अद्भुत सौंदर्य क्षमता का मनुष्य तभी एहसास कर पाता है, जब वह प्रत्येक वस्तु के साथ विद्रोह करता है। संगठित धर्म के खिलाफ, परम्परा के खिलाफ और सड़े हुए समाज के खिलाफ जब कोई विद्रोह करता है तो उसे वास्तविक जीवन के सत्य का साक्षात्कार होता है। विद्रोह से लक्ष्य की प्राप्ति होती है। इससे समस्याग्रस्त जीवन समाधान पा लेता है। अत: जीवन में विद्रोह का बड़ा महत्वपूर्ण स्थान है।


6. नूतन विश्व का निर्माण कैसे हो सकता है ?

उत्तर ⇒ समाज में सर्वत्र भय का संचार है, लोग एक-दूसरे के प्रति ईर्ष्या-द्वेष से भरे हुए । इस स्थिति से दूर पूर्ण स्वतंत्र निर्भयतापूर्ण वातावरण बनाकर एक भिन्न समाज का निर्माण हैं। कर हम नूतन विश्व का निर्माण कर सकते हैं। हमें स्वतंत्रतापूर्ण वातावरण तैयार करना होगा जिसमें व्यक्ति अपने लिए सत्य की खोज कर सके, मेधावी बन सके। क्योंकि सत्य की खोज तो केवल वे ही कर सकते हैं जो सतत इस विद्रोह की अवस्था में रह सकते हैं, वे नहीं, जो परंपराओं को स्वीकार करते हैं और उनका अनुकरण करते हैं। हमें सत्य, परमात्मा अथवा प्रेम तभी उपलब्ध हो सकते हैं जब हम अविच्छिन्न खोज करते हैं, सतत् निरीक्षण करते हैं और निरंतर सीखते हैं। इस तरह हमारे समाज में न ईर्ष्या द्वेष और न भय का वातावरण रहेगा, मेधाशक्ति का पूर्ण उपयोग हो । स्वतंत्रतापूर्ण व्यक्ति जीवन जिएगा तो निसंदेह ही नूतन विश्व का निर्माण होगा।

1. कड़बक ( लघु उत्तरीय प्रश्न एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्न )

1. कवि ने अपनी एक आँख से तलना दर्पण से क्यों की है ?

उत्तर ⇒ महाकवि जायसी ने अपनी एक आँख की तुलना दर्पण से इसलिए की है कि दर्पण जिस प्रकार स्वच्छ और निर्मल होता है, ठीक उसी प्रकार कवि की आख ह। काइ मा व्यक्ति अपनी छवि जिस प्रकार साफ एवं स्पष्ट रूप से दर्पण में देख पाता ह, ठाक उसी प्रकार कवि की आँख भी स्वच्छता और पारदर्शिता का प्रतीक है। एक आख स अध होकर भी कवि काव्य-प्रतिभा से युक्त है, अतः वह पूजनीय है, वंदनीय है। कवि अपनी निर्मल वाणी द्वारा सारे जनमानस को प्रभावित करता है जिसके कारण सभी लोग कवि की प्रशंसा करते है और नमन करते हैं। जैसी छवि वैसा ही प्रतिबिंब दर्पण में उभरता है। ठीक उसी प्रकार कवि की निर्मलता और लोक कल्याणकारी भावना उनकी कविताओं में दृष्टिगत होती है।


2. पहले कड़बक में कलंक, काँच और कंचन से क्या तात्पर्य है ?

उत्तर ⇒ अपनी कविताओं में कवि ने कलंक, काँच और कंचन आदि शब्दों का प्रयोग किया है। इन शब्दों की कविता में अपनी अलग-अलग विशेषताएँ हैं। कवि ने इन शब्दों के माध्यम से अपने विचारों को अभिव्यक्ति देने का कार्य किया है।

जिस प्रकार काले धब्बे के कारण चन्द्रमा कलंकित हो गया फिर भी अपनी प्रभा से जग को आलोकित करने का काम किया। जिस प्रभा के आगे चन्द्रमा का काला धब्बा ओझल हो जाता है, ठीक उसी प्रकार गुणीजन की कीर्तियों के सामने उनके एकाध दोष लोगों की नजरों से ओझल हो जाते हैं।

कंचन शब्द के प्रयोग करने के पीछे कवि की धारणा है कि जिस प्रकार शिव त्रिशल द्वारा नष्ट किए जाने पर सुमेरू पर्वत सोने का हो गया ठीक उसी प्रकार सज्जनों के संगति से दुर्जन भी श्रेष्ठ मानव बन जाता है। संपर्क और संसर्ग में ही यह गुण निहित है लेकिन पात्रता भी अनिवार्य है। यहाँ भी कवि ने गुण-कर्म की विशेषता का वर्णन किया है।

काँच शब्द की सार्थकता भी कवि ने अपनी कविताओं में स्पष्ट करने की चेष्टा की । बिना धारिया में (सोना गलाने के पात्र में कच्चा सोना गलाया जाता है, उसे धारिया कहते है ) गलाए काँच (कच्चा सोना) असली स्वर्ण रूप को प्राप्त नहीं कर सकता है ठीक उसी प्रकार संसार में किसी मानव को बिना संघर्ष, तपस्या और त्याग के श्रेष्ठता नहीं प्राप्त हो सकती है।


3. पहले कड़बक में व्यंजित जायसी के आत्मविश्वास का परिचय अपने शब्दों में दें।

उत्तर ⇒ महाकवि जायसी अपनी करूपता और एक आँख से अंधे होने पर शाक प्रकट नहीं करते है बल्कि आत्मविश्वास के साथ अपनी काव्य प्रतिभा के बल पर लोकहित का बातें करते हैं। प्राकृतिक प्रतीकों द्वारा जीवन में गण की महत्ता की विशेषताओं का वर्णन करत ह।

जिस प्रकार चन्द्रमा काले धब्बे के कारण कलंकित तो हो गया किन्तु अपनी प्रभायुक्त आभा से सारे जग को आलोकित करता है। अत: उसका दोष गण के आगे ओझल हो जाता है।

समेरु पर्वत की यश गाथा भी शिव-त्रिशल के स्पर्श बिना निरर्थक है। घरिया म तपाए बिना सोना में निखार नहीं आता है ठीक उसी प्रकार कवि का जीवन भी नेत्रहीनता के कारण दोषभाव उत्पन्न तो करता है किन्तु उसकी काव्य-प्रतिभा के आगे सबकुछ गौण पड़ जाता है।

कहने का तात्पर्य यह है कि कवि का नेत्र नक्षत्रों के बीच चमकते शुक्र तारा का तरह है जिसके काव्य का श्रवण कर सभी जन मोहित हो जाते हैं।


4. कवि ने किस रूप में स्वयं को याद रखे जाने की इच्छा व्यक्त की है ? उनकी इस इच्छा का मर्म बताएँ।

उत्तर ⇒  कवि मलिक मुहम्मद जायसी ने अपनी स्मृति के रक्षार्थ जो इच्छा प्रकट की है, उसका वर्णन अपनी कविताओं में किया है।

कवि का कहना है कि मैंने जान-बूझकर संगीतमय काव्य की रचना की है ताकि इस प्रबंध के रूप में संसार में मेरी स्मृति बरकरार रहे। इस काव्य-कृति में वर्णित प्रगाढ़ प्रेम सर्वथा नयनों की अश्रुधारा से सिंचित है यानि कठिन विरह प्रधान काव्य है।

दूसरे शब्दों में जायसी ने उस कारण का उल्लेख किया है जिससे प्रेरित होकर उन्होंने लौकिक कथा का आध्यात्मिक विरह और कठोर सूफी साधना के सिद्धान्तों से परिपुष्ट किया है। इसका कारण उनकी लोकैषणा है। उनकी हार्दिक इच्छा है कि संसार में उनकी मृत्यु के बाद उनकी कीर्ति नष्ट न हो। अगर वह केवल लौकिक कथा-मात्र लिखते तो उससे उनकी कीर्ति चिरस्थायी नहीं होती। अपनी कीर्ति चिरस्थायी करने के लिए ही उन्होंने पदमावती की लौकिक कथा को सूफी साधना की आध्यात्मिक पृष्ठभूमि पर प्रतिष्ठित किया है। लोकेषणा भी मनुष्य की सबसे प्रमुख वृत्ति है। अंग्रेज कवि मिल्टन ने तो इसे श्रेष्ठ व्यक्ति की अंतिम दुर्बलता कहा है।


5. रक्त के लेई का क्या अर्थ है ?

उत्तर ⇒ यहाँ पर लेखक ने लेई के रूपक से यह बताने की चेष्टा की है कि उसने अपने कथा के विभिन्न प्रसंगों को किस प्रकार एक ही सूत्र में बाँधा है। कवि कहता है कि मैंने अपने रक्त की लेई बनाई है अर्थात् कठिन साधना की है। यह लेई या साधना प्रेमरूपी आँसो से अप्लावित की गई है। कवि का व्यंग्यार्थ है कि इस कथा की रचना उसने कठोर सफी साधना के फलस्वरूप की है और फिर इसको उसने प्रेमरूपी आँसुओं से विशिष्ट आध्यात्मिक विरह द्वारा पुष्ट किया है। लौकिक कथा को इस प्रकार अलौकिक साधना और आध्यात्मिक विरह से परिपुष्ट करने का कारण भी जायसी ने अपनी काव्यकृति के द्वारा लोक जगत में अमरत्व प्राप्ति की प्रबल इच्छा बताया है।


6. मुहम्मद यहि कबि जोरि सुनावा। यहाँ कवि ने जोरि शब्द का प्रयोग किस अर्थ में किया है ?

उत्तर ⇒ मलिक महम्मद जायसी ने अपने जीवन काल में समय-समय पर लिखे गए प्रसंगों को एक व्यवस्थित प्रबंध के रूप में प्रस्तुत किया है। यह जोरि-जोड़ना यानि व्यवस्थित करने के लिए प्रयुक्त हुआ है।

कवि ने विविध प्रसंगों या घटनाओं को एक साथ प्रबंध-स्वरूप में व्यवस्थित कर लोक जगत में अपनी काव्यकति को प्रस्तुत किया है। कवि ने अपनी कविता में ‘प्रेमपीर’ की चर्चा की है। सूफी साधना का सर्वस्व है-प्रेमपीर। इस प्रेमपीर की चर्चा सभी सूफी कवियों ने अपनी काव्य कृतियों में की है। जब साधक किसी गुरु की कृपा से उस दिव्य सौंदर्य स्वरूपी परमात्मा की झलक पा लेता है और उसके पश्चात जब उसकी वृत्ति की संसार की ओर पुन: पुनरावृत्ति होती है तब उसका हृदय प्रेम की पीर या आध्यात्मिक विरह-वेदना से व्यथित हो उठता है। यह विरह वेदना या प्रेम की पीर ही साधक के कल्ब के कालुल्यों को धीरे-धीरे जलाती रहती है और जब कल्ब के कालुष्य नष्ट हो जाते हैं तब वह सरलता से भावना लोक में उस सौंदर्य स्वरूपी परमात्मा के सतत दर्शन करने में समर्थ होते हैं।

2. सूरदास ( लघु उत्तरीय प्रश्न एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्न )

1. प्रथम पद में किस रस की व्यंजना हुई है ?

उत्तर ⇒ सूरदास रचित ‘प्रथम पद’ में वात्सल्य रस की व्यंजना हुई है। वात्सल्य पदों की विशेषता यह है कि पाठक जीवन की नीरस और जटिल समस्याओं को भूलकर उन तन्मय और विभोर हो उठता है। प्रथम पद में दुलार भरे कोमल-मधुर स्वर में सोए हए बाल कृष्ण को भोर होने की सूचना देते हुए जगाया जा रहा है।


2. गायें किस ओर दौड़ रही हैं ?

उत्तर ⇒ भोर हो गयी है, दुलार भरे कोमल मधुर स्वर में सोए हुए बालक कृष्ण को भोर होने का संकेत देते हुए जगाया जा रहा है। प्रथम पद में भोर होने के संकेत दिए गए हैं. कमल के फूल खिल उठे हैं, पक्षीगण शोर मचा रहे हैं, गायें अपनी गौशालाओं से अपने-अपने बछड़ों की ओर दूध पिलाने हेतु दौड़ पड़ी।


3. पठित पदों के आधार पर सूर के वात्सल्य वर्णन की विशेषताएँ लिखिए।

उत्तर ⇒ सूर के काव्य के तीन प्रधान विषय हैं-विनय भक्ति, वात्सल्य और प्रेम शृंगार। इन्हीं तीन भाब-वृत्तों में उनका काव्य सीमित है। उसमें जीवन का व्यापक और बहुरूपी विस्तार नहीं है, किन्तु भावों की ऐसी गहराई और तल्लीनता है कि व्यापकता और विस्तार पीछे छूट जाते हैं। वात्सल्य के सूर ही विश्व में अद्वितीय कवि हैं। बालक की प्रकृति का इतना स्वाभाविक वर्णन अन्यत्र दुर्लभ है। बाल-स्वभाव के बहुरंगी आयाम का सफल एवं स्वाभाविक चित्रण उनके काव्य की विशेषता है। बालक की बाल सुलभ प्रकृति-उसका रोना, मचलना, रूठना, जिद करना आदि प्रवृत्तियों को उन्होंने अपने काव्य में बड़े मनोवैज्ञानिक ढंग से सजाया है।

पाठ्य-पुस्तक से संकलित पदों में सूरदासजी ने वात्सल्य रस की अनेक विशेषताओं का वर्णन किया है। बालक कृष्ण सोए हुए हैं, भोर हो गई है। उन्हें दुलार से जगाया जा रहा है। जगाने के स्वर भी मधुर हैं। चहचहाते. पक्षियों के, कमल के फूलों के, बोलती और दौड़ती हुई गायों के उदाहरण देकर बालक कृष्ण को जगाने का प्रयास किया जा रहा है।

दूसरे पद में भी वात्सल्य रस की सहज अभिव्यक्ति के क्रम में अनेक विशेषताओं को निरूपित किया गया है। नंद बाबा की गोद में बालक कष्ण भोजन कर रहे हैं। कुछ खा रह हैं, कुछ धरती पर गिरा रहे हैं। बालक कृष्ण को मना-मनाकर खिलाया जा रहा है। विविध प्रकार के व्यंजन दिए जा रहे हैं। यहाँ पर वात्सल्य रस अपने चरम उत्कर्ष पर है। सूरदासजी लिखते है –

“जो रस नंद-जसोदा विलसत, सो नहिं विहँ भवनियाँ।”


4. सूरदास का कवि परिचय लिखें।

उत्तर ⇒ धर्म, साहित्य आर संगीत के संदर्भ में महाकवि सरदास का स्थान न हिन्दी-भाषी क्षेत्र बल्कि सम्पूर्ण भारत में मध्ययुग की महान विभातियों में अग्रगण्य है। यह सूरदास की लोकप्रियता और महत्ता का ही परिणाम है कि ‘सरदास ना किसी भी अच्छी भक्त गाय के लिए रूढ़ सा हो गया है। मध्ययुग में इस नाम के कई भक्त कवि और गायक हो गये है अपने विषय में मध्ययुग के ये भक्त कवि इतने उदासीन थे कि उनका जीवन-वृत्त निश्चित रूप से पुनः निर्मित करना असम्भवप्राय है परन्तु इतना कहा जा सकता है कि सूरसागर के रचयिता सूरदास इस नाम के व्यक्तियों में सर्वाधिक प्रसिद्ध और महान थे और उन्हीं के कारण कदाचित यह नाम उपर्युक्त विशिष्ट अर्थ के द्योतक सामान्य अभिधान के रूप में प्रयुक्त होने लगा। ये सूरदास विट्ठलनाथ द्वारा स्थापित अष्टछाप के अग्रणी भक्त कवि थे और पुष्टिमार्ग में उनकी वाणी का आदर बहुत कुछ सिद्धान्त वाक्य के रूप में होता है।

सूरदास का जन्म संभवतया 1492 ई. में दिल्ली के निकट ‘सीही’ नामक ग्रामक में हुआ था। सूरदास विषय में जो भी ज्ञात है, उसका आधार मुख्यतया ‘चौरासी वैष्णवन की वार्ता’ है। ‘चौरासी वैष्णवन की वार्ता’ में सूर का जीवनवृत गऊ घाट पर हुई बल्लभाचार्य से उनकी भेंट के साथ प्रारम्भ होता है। गऊ घाट पर भी उनके अनेक सेवक उनके साथ रहते थे तथा ‘स्वामी’ के रूप में उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैल गयी थी। कदाचित इसी कारण एक बार अरैल से जाते समय बल्लभाचार्य ने उनसे भेंट की और उन्हें पुष्टिमार्ग में दीक्षित किया। बल्लभाचार्य ने उन्हें श्रीमद्भागवत पुराण की कथा सुनाई और विनय के पद रचने के लिए कहा। सूर ने भागवत के द्वादश स्कन्ध के पदों पर पद-रचना की। उन्होंने जो सहस्त्रावधि पद रचे जो ‘सागर’ कहलाये। सूरदास की पद-रचना और गान-विधा की ख्याति सुनकर अकबर ने उनसे मिलने की इच्छा व्यक्त की। तानसेन की मदद से मिले भी सूर बड़े विनम्र स्वभाववाले मृदुभाषी व्यक्ति थे। सूरदास की सर्वसम्मत प्रामाणिक रचना ‘सूरसागर’ है। सूरसागर के अलावा साहित्य लहरी और ‘सूरसागर सारावली’ है।

सूरदास के काव्य से उनके बहुश्रुत अनुभव सम्पन्न विवेकशील और चिन्तनशील व्यक्तित्व का परिचय मिलता है। उनका हृदय गोप बालकों की भाँति सरल और निष्पाप ब्रज गोपियों की भाँति सहज संवेदनशील प्रेम-प्रवण और माधुर्यपूर्ण तथा नन्द और यशोदा की भाँति सरल विश्वासी, स्नेह-कातर और आत्मबलिदान की भावना से अनुप्राणित था। साथ ही उनमें कृष्ण जैसी गम्भीरता और विदग्धाता तथा राधा जैसी वचन चातुरी और आत्मोत्सर्गपूर्ण प्रेम विवशता थी। काव्य में प्रयुक्त पात्रों के विविध भावों से पूर्ण चरित्रों का निर्माण करते हुए वस्तुतः उन्होंने अपने महान व्यक्तित्व की ही अभिव्यक्ति की है। उनकी प्रेम-भक्ति के सख्य वात्सल्य और माधुर्य भावों का चित्रण जिन असंख्य संचारी भावों अनगिनत घटना-प्रसंगों बाह्य जगत प्राकृतिक और सामाजिक के अन्त सौन्दर्य चित्रों के आश्रय से हुआ है। उनके अन्तराल में उनकी गम्भीर वैराग्य-वृति तथा अत्यन्त दीनतापूर्ण आत्म निवेदात्मक भक्ति-भावना की अन्तर्धाय सतत प्रवहमान रही है परन्तु उनकी स्वाभाविक विनोदवृति तथा हास्य प्रियता के कारण उनका वैराग्य और दैन्य उनके चित को अधिक ग्लानियुक्त और मलिन नहीं बना सका। आत्महीनता की चरम अनुभूति के बीच भी उल्लास व्यक्त कर सकें। उनकी गोपियों विरह की हृदय विदारक वेदना को भी हास-परिहास के नीचे दबा सकीं। करुण और हास का जैसा एकरस रूप सूर के काव्य में मिलता है अन्यत्र दर्लभ है। सूर ने मानवीय मनोभावों और चितवृतियों को लगता है नि:शेष कर दिया है। सूरदास प्रमुख रूप से वात्सल्य रस के अप्रतिम कवि हैं। प्रस्तुत पद में भी इसकी झाँकी मिलती है।


5. सूरदास रचित पद शीर्षक कविता का सारांश लिखें।

उत्तर ⇒ इस पद में दुलार भरे कोमल मधुर स्वर में सोए हुए बालक कृष्ण को भोर होने की सूचना देते हुए यह कहा जा रहा है कि हे ! ब्रजराज नंद के पुत्र ! जागिए ! कमल के फूल खिल उठे, कुमुदिनियों का समूह संकुचित हो गया, भ्रमर लताओं को भूल गए। मुर्गे तथा अन्य पक्षियों के कोलाहल को सुनो जो पेड़ों पर बोल रहे हैं। गायें बाड़ों में रँभाने लगी है और बछड़ों के लिए दौड़ रही है। चन्द्रमा फीका पड़ गया, सूर्य का प्रकाश फैल गया। स्त्री-पुरुष गा रहे हैं। कमल सदृश हाथों वाले श्याम उठो, अब प्रात:काल हो गया।

श्याम नंद की गोद में बैठे भोजन कर रहे हैं। वे कुछ खाते हैं, कुछ भूमि पर गिराते हैं। इस छवि को नंदरानी देख रही है। बड़ी, बड़ा बेसन के बहुत से प्रकार तथा विविध प्रकार के अनगिनत व्यंजन हैं। वे अपने हाथों से लेकर डालते हुए खा रहे हैं। दही के दोनों की ओर उनकी विशेष रुचि है। मिश्री, दही और मक्खन को मिलाकर छवि के घानी कृष्ण मुख में डालते हैं। वे आप भी खाते हैं और नंद के मुख में भी डालते हैं। इस छवि का वर्णन करते नहीं बनता। इस प्रकार जो आनन्द नंद और यशोदा पा रहे हैं वह तीनों लोकों में नहीं है। कृष्ण भोजन करके जब आचमन (कुल्ला ) किया तो सूरदास जूठन माँग रहे हैं।”


6. सूरदास की भक्ति भावना पर प्रकाश डालिए।

उत्तर ⇒ सगुण भक्ति धारा की कृष्णाश्रयी शाखा के अग्रगण्य कवि सूरदास की भक्ति-भावना में बल्लभाचार्य का चिंतन और पुष्टि-मार्गी भावना की झलक मिलती है। शंकराचार्य के निर्गुणवादी चिन्तन का विरोध स्वभावतः हो जाता है क्योंकि सूरदास शंकराचार्य के विरोधी बल्लभाचार्य के शिष्य हैं। बल्लभाचार्य ने सगुण को ही असली पारमार्थिक रूप बतलाया और निर्गुण को उसका अंशतः तिरोहित रूप कहा। सूरदास ने अपने विनय के पदों में जिस भक्ति-भावना की व्यंजना की है उसमें बल्लभ की उपर्युक्त बातें स्पष्ट हैं। उन्होंने जीव अर्थात् भक्त की दयनीयता
और ईश्वर की सर्वशक्तिमता को व्यजित किया है। उन्होंने यह भी बतलाया कि निर्गुण का कोई रूप-गुण और आकार नहीं होती है। इसलिए उसके प्रति हमारी आस्था स्थापित होना सम्भव नहीं है। आखिर मनुष्य अपनी विपदाओं की बात किसे कहे ? निर्गुण तो अगोचर है। उसे जो जानता है वही समझ सकता है। वह अनुभवगम्य है, उसे परखना सबसे सम्भव नहीं । इसलिए तो उन्होंने कहा –

रूप-रेख-गुन-जाति-जुगुति-बिनु निरालम्ब मन चक्रित धावै । सब विधि अगम अगोचर विचारहिं तातें सूर सगुन लीला पद गावै ॥

सूरदास की भक्ति में एकनिष्ठ समर्पण और आत्म-निवेदन का भाव है। सूर को कृष्ण की लीला का ज्ञान है, उनकी महिमा का ज्ञान है और है अपनी भक्ति पर अभिमान। उन्होंने कृष्णभक्ति के प्रति अपनी एकनिष्ठता दिखाते हुए कहा है कि ‘मेरो मन अनंत कहा सुख पावै।’ कहने का तात्पर्य यह है कि सगुण के अलावे अन्य मतों पर उनका कतई विश्वास नहीं है। वे तो केवल सगुण रूप श्रीकृष्ण के उपासक हैं। मन-पंछी के लिए सगुण रूप कृष्ण उस जहाज की तरह हैं जो विशाल सागर के बीच उतर चला है। इतना ही नहीं, सगुण अगर गंगा है तो निर्गुण कूप, सगुण अगर कमल और कामधेनु है तो निर्गुण करील और बकरी के समान है। इतजनी असमानता होने पर कोई मूढमति क्यों निर्गुण की बात करेगा?

कमल नैन को छाड़ि महातप और देव को ध्यावै।
परमगंग को छाड़ि पियासो दुरमति कूप खनावै॥
जिहिं मधुकर अम्बुज-रस चाख्यौ, क्यो करील फल भावै।
सूरदास प्रभु कामधेनु तजि छेरी कौन दुहावै॥

सूरदास की भक्ति-भावना में सांसारिकता अर्थात् काम-क्रोध, मद-मोह आदि भावनाओं का निराकरण आवश्यक है। इन दुर्गुणों से पोषित मानव-मन हमेशा दुखी रहता है। जब तक सांसारिक वृत्तियों में आदमी बँधा हुआ है तब तक उसके भीतर विपदाओं की पीडा रहेगी। लेकिन इस अविद्या का नाश तभी हो सकता है जब भगवान की कृपा हो जाय

“अब मैं नाच्यौ बहुत गोपाल।
काम-क्रोध को पहिरि चोलना, कंठ विषय की माल ॥
महामोह के नूपुर बाजत, निन्दा शब्द रसाल ।
भ्रम-भर्यो मन भयौ पखावज, चलत असंगत चाल ॥
कोटि कला काछि दिखराई, जल-थल सुधि नहीं काल ।
सूरदास की सबै अविद्या दूरि करौ नन्दलाल ।”

सूरदास की भक्ति-भावना में ईश्वर सभी कर्मों का कर्ता माना गया है। संसार की सारी क्रियाओं का वही नियंता है। जीव तो निमित्त मात्र है। अपने पुरुषार्थ पर. अहंकार करने वाला जीव सचमुच मूढ़मति है। ईश्वर ने जो कुछ लिखा है वही होगा –

“करी गोपाल की सब होई।
जो आपन पुरुषारथ मानत, अति झूठौ है सोई॥
साधन, मंत्र, जंत्र, उद्यम, बल ये सब डारौ दोई।
जो कुछ लिखि राखि नन्दनन्दन, मेटि सकै नहिं कोई॥”

सूरदास ने यह स्वीकार किया है कि सम्पूर्ण सृष्टि ब्रह्म की लीला के लिए आत्मकृति है। वह अपने को असंख्य जीवों में बिखेर कर लीला करता है। भक्ति की साधना के लिए बल्लभ ने जिस प्रेम-लक्षणा भक्ति की बात कही, सूरदास ने उसे अपने साहित्य में स्थापित किया। इसका प्रमाण हमें उनके “भ्रमरगीत” में मिल जाता है।

संक्षेप में कहा जा सकता है कि सूरदास की भक्ति-भावना में पुष्टिमार्गीय भक्ति है जिसमें बल्लभाचार्य का चिंतन दिखायी पड़ता है। उनकी भक्ति में प्रेम-लक्षणा भक्ति की झलक मिलती है। इनके ‘विनय’ में इनकी विनयशीलता सचमुच हृदय को छू जाती है। इसके साथ-साथ सूरदास ने अपनी भक्ति में सांख्य भाव को स्थापित किया है, जिसके लिए वे प्रसिद्ध माने जाते हैं।

3. तुलसीदास ( लघु उत्तरीय प्रश्न एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्न )

1. प्रथम पद में तुलसीदास ने अपना परिचय किस प्रकार दिया है ? लिखिए।

उत्तर ⇒  प्रथम पद में तलसीदास ने अपने विषय में हीनभाव प्रकट किया है। अपनी भावना को व्यक्त करते हए कहते हैं कि वह दीन, पापी. दर्बल, मलिन तथा असहाय व्यक्ति है। व अनेकों अवगुणों से युक्त हैं। ‘अंगहीन’ से उनका आशय संभवत: ‘असहाय’ होने से है।


2. तुलसीदास सीता से कैसी सहायता माँगते हैं ?

उत्तर ⇒ तुलसीदास माँ सीता से भवसागर पार कराने वाले श्रीराम को गुणगान करत हुए भक्ति-प्राप्ति की सहायता की याचना करते हैं। हे जगत की जननी ! अपने वचन द्वारा मेरी सहायता कीजिए।


3. तुलसीदास सीधे राम से न कहकर सीता से क्यों कहलवाना चाहते थे ?

उत्तर ⇒ ऐसा संभवतः तुलसीदास इसलिए चाहते थे क्योंकि (i) उनको अपनी बातें स्वयं राम के समक्ष रखने का साहस नहीं हो रहा होगा, वे संकोच का अनुभव कर रहे होंगे। (ii) सीता जी सशक्त ढंग से (जोर देकर) उनकी बातों को भगवान श्रीराम के समक्ष रख सकेंगी। ऐसा प्रायः देखा जाता है कि किसी व्यक्ति से उनकी पत्नी के माध्यम से कार्य करवाना अधिक आसान होता है। (iii) तुलसी ने सीताजी को माँ माना है तथा पूरे रामचरितमानस में अनेकों बार माँ कहकर ही संबोधित किया है। अत: माता सीता द्वारा अपनी बातें राम के समक्ष रखना ही उन्होंने श्रेयस्कर समझा।


4. दूसरे पद में तुलसी ने अपना परिचय किस तरह दिया है, लिखिए।

उत्तर ⇒ दूसरे पद में तुलसीदास ने अपना परिचय देते हुए बड़ी-बड़ी (ऊँची) बातें करने वाला अधम (क्षुद्र जीव) कहा है। छोटा मुँह बड़ी बात (बड़बोला) करने वाला व्यक्ति के रूप में स्वयं को प्रस्तुत किया है, जो कोढ़ में खोज (खुजली) की तरह है।


5. दोनों पदों में किस रस की व्यंजना हुई है ?

उत्तर ⇒ दोनों पदों में भक्ति-रस की व्यंजना हुई है। तुलसीदासजी ने मर्यादा पुरुषोत्तम राम तथा जगत जननी सीता की स्तुति द्वारा भक्तिभाव की अभिव्यक्ति इन पदों में की है।


6. तुलसी के हृदय में किसका डर है ?

उत्तर ⇒ तुलसी की दयनीय अवस्था में उनके सगे-संबंधियों आदि किसी ने भी उनकी सहायता नहीं की। उनके हृदय में इसका संताप था। इससे मुक्ति पाने के लिए उन्हें संतों की शरण में जाना पड़ा और उन्हें वहाँ इसका आश्वासन भी मिला कि श्रीराम की शरण में जाने से बस संकट दूर हो जाते हैं। भौतिक अर्थ है-संसार के सुख-दुःख से भयभीत हुए और आध्यात्मिक अर्थ है-विषय वासना से मुक्ति का भय। कवि की उक्त पक्तियाँ द्विअर्थी हैं। क्योंकि कवि ने भौतिक जगत की अनेक व्याधियों से मुक्ति और भगवद्-भक्ति के लिए समर्पण भाव की ओर ध्यान आकृष्ट किया है।


7. राम स्वभाव से कैसे हैं ? पठित पदों के आधार पर बताइए।

उत्तर ⇒ प्रस्तुत पदों में राम के लिए संत तुलसीदासजी ने कई शब्दों का प्रयोग किया है जिससे राम के चारित्रिक गुणों के बारे में जानकारी प्राप्त होती है।

श्रीराम को कवि ने कृपालु कहा है। श्रीराम का व्यक्तित्व जन-जीवन के लिए अनुकरणीय और वंदनीय है। प्रस्तुत पदों में तुलसी ने राम की कल्पना मानव और मानवेतर दो रूपों में की है। राम के कुछ चरित्र प्रगट रूप में और कुछ चरित्र गुप्त रूप में दृष्टिगत होते हैं। उपर्युक्त पदों में परब्रह्म राम और दाशरथि राम के व्यक्तित्व की व्याख्या की गयी है। राम में सर्वश्रेष्ठ मानव गुण है। राम स्वभाव से ही उदार और भक्तवत्सल हैं। दाशरथि राम का दानी के रूप में तुलसीदासजी ने चित्रण किया है। पहली कविता में प्रभु, बिगड़ा काम बनाने वाले, भवनाथ आदि शब्द श्रीराम के लिए आए हैं। इन शब्दों द्वारा परब्रह्म अलौकिक प्रतिभासंपन्न श्रीराम की चर्चा है।

दूसरी कविता में कोसलराजु, दाशरथि, राम, गरीब निवाजू आदि शब्द श्रीराम के लिए प्रयुक्त हुए हैं। अतः, उपर्युक्त पद्यांशों के आधार पर हम श्रीराम के दोनों रूपों का दर्शन पाते हैं। वे दीनबंधु, कृपालु, गरीबों के त्राता के रूप में हमारे समक्ष उपस्थित होते हैं। दूसरी ओर कोसलराजा, दसरथ राज आदि शब्द मानव राम के लिए प्रयुक्त हुआ है।

इस प्रकार राम के व्यक्तित्व में भक्तवत्सलता, शरणागत वत्सलता, दयालुता अमित ऐश्वर्य वाला, अलौकिकशील और अलौकिक सौन्दर्यवाला के रूप में हुआ है।


8. ‘कबहुँक अंब अवसर पाई’ में ‘अंब’ का संबोधन किनके लिए हुआ?

उत्तर ⇒ यहाँ ‘अंब’ सीता माता के लिए आया है। इस सम्बोधन के द्वारा तुलसी राम का ध्यान अपनी ओर दिलाने की चेष्टा सीता माता से कहते हैं। हे माता! कभी अवसर हो तो कुछ करुणा की बात छोड़कर श्रीरामचन्द्र को मेरी भी याद दिला देना। इसी से मेरा काम बन जायेगा। एक पुत्र द्वारा जगत जननी माता से जगत कृपालु रामचन्द्रजी का ध्यान आकृष्ट करने की बात कही गयी है।


9. कवि कृष्ण को जगाने के लिए क्या-क्या उपमा दे रहा है ?

उत्तर ⇒ ब्रजराज कुँवर जागिए। कमल के फूल खिल चुके, कुमुदनियों का समूह संकुचित हो गया है। कमल स्दुश हाथो वाले कृष्ण जागिये।


10. तुलसी सीधे राम से न कहकर सीता से क्यों कहलवाना चाहते हैं ?

उत्तर ⇒ तुलसी सीधे राम से न कहकर बात सीधे सीता से इसलिए कहलवाना चाहते हैं कि सीता राम की प्रिया, धर्मपत्नी है। कोई भी पुरुष अपनी पत्नी को अधिकतम प्रेम करता है उसकी हर बात मानता है और हर नारी अपने पति के लिए मानिनी होती है। पति पत्नी को कहे बात टाल नहीं पाते हैं। उसे ज्यादा ध्यान से सुनते हैं और उसपर अमल करते हैं उसी तरह राम की सीता भी हैं। अतः अपनी बात को प्रभावी ढंग से पहुँचाने के लिए कवि सीता से कहते हैं।


11. राम के सुनते ही तुलसी की बिगड़ी बात बन जाएगी, तुलसी के इस भरोसे का क्या कारण है ?

उत्तर ⇒ तुलसी कहते हैं कि हे प्रभु मैं अत्यन्त दीन सर्वसाधनों से हीन मनमलीन दुर्बल और पापी मनष्य हूँ फिर भी आपका नाम लेकर अपना पेट भरता हूँ। तुलसी को यह विश्वास है कि उनके राम कृपालु हैं, दयानिधान हैं वे हर बात को अच्छी तरह समझकर उसका समाधान
करते हैं यही उनके भरोसे का कारण है।


12. तुलसी को किस वस्तु की भूख है ?

उत्तर ⇒ तुलसी को भक्तिरूपी अमृत के समान सुन्दर भोजन की भूख है। अर्थात् हे प्रभु अपने चरणों में ऐसी भक्ति दे दीजिए कि फिर कोई दूसरी कामना न रह जाए।


13. तुलसीदास का कवि परिचय लिखें।

उत्तर ⇒ गोस्वामी तुलसीदास किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। उनके ‘मानस’ की प्रतिष्ठा धर्मग्रन्थ के रूप में है। अतः तुलसीदास प्रत्येक परिवार के घर-घर में हैं। तुलसी का ‘मानस’ साहित्य उच्च कोटि का ग्रन्थ है जिसके कारण वह धर्मग्रन्थ के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। जनता के हर राग-रंग की कथा है। तुलसी जनता के सुख-दुख में शामिल होते हैं इसलिए वे घर-घर के कवि हैं। रचना की उत्कृष्टता के कारण महाकवि हैं।

तुलसीदास जी का जन्म 1543 ई. के लगभग राजापुर जिला-बाँदा उत्तरप्रदेश में हुआ। इनके बचपन का नाम रामबोला था। इनकी माता हुलसी तथा पिता आत्माराम दुबे थे। इनकी पत्नी रत्नावली थी। परन्तु विवाह के कुछ ही समय बाद विछोह हो गया। तुलसी का जीवन संघर्ष की महागाथा है। उनका बालपन बड़ा कठिनाइयों में बीता। जीवन के प्रारम्भिक वर्षों में ही उनके माता-पिता का साथ छूट गया और तदन्तर वेभिक्षा माँग-माँगकर उदरपूर्ति करते रहे। कदाचित इसके कुछ ही समय पश्चात् तुलसीदास ने रामभक्ति की दीक्षा ली। उनके गुरु कौन थे, यह भी निश्चित रूप से ज्ञात नहीं है। ‘मानस’ में उनके गुरु का नाम बाबा नरहरिदास के रूप में आता है। तुलसी ने उन्हीं से शिक्षा ली और बाल्मीकि रामायण का अध्ययन कर । राम कथा कों अवधी भाषा में लिखा। तुलसी की (12) बारह रचनायें मिलती हैं जो निम्न हैं-

1. रामचरित मानस 2. रामलला नहछू 3. रामाज्ञा प्रश्न 4. जानकीमंगल 5. पार्वतीमंगल 6. गीतावली 7. कृष्णगीतावली 8. विनय पत्रिका 9. बरबै रामायण 10. दोहावली 11. कवितावली 12. हनुमान बाहुक इत्यादि।

तुलसीदास की ये कृतियाँ तत्कालीन अनेक काव्य-रूपों की प्रतिनिधि रचनाएँ हैं। उनका ‘रामचरित मानस’ चौपाईबन्ध परम्परा का काव्य है। जिसमें मुख्य छन्द चौपाई है और बीच-बीच में दोहे-सोरठे, हरिगीतिका तथा अन्य छन्द भी आते हैं। कवितावली कवित्त-सवैया-पद्धति की मुक्तक रचना है। गीतावली-कृष्णगीतावली, विनय पत्रिका गीत बन्ध परिपाटी के अन्तर्गत आते हैं।

तुलसीदास ने रामभक्ति से प्रेरित होकर अपने राम-कथा ग्रंथों में राम तथा अनेक भक्तों का जो चरित्र प्रस्तुत किया है, वह मानवता के सर्वोच्च आदर्श की स्थापना करता है। इस सम्बन्ध में ‘मानस’ एक अद्वितीय रचना है। उनके गीतिकाव्यों गीतावली और कृष्णगीतावली में भावनाओं की जो सरिता उमड़ी है उसकी तुलना हिन्दी साहित्य में केवल सूरदास की भावधारा से की जा सकती है। पुन: विनय पत्रिका के पदों में जो द्रवित कर देनेवाला आत्मनिवेदन उन्होंने प्रस्तुत किया है वह बेजोड़ है।

गोस्वामी जी की संवेदना गहन और अपरिमित थी, अंतर्दृष्टि सूक्ष्म और व्यापक थी, विवेक प्रखर और क्रांतिकारी था। कवि में इतिहास एवं संस्कृति का व्यापक परिप्रेक्ष्य बोध था और लोकप्रज्ञा थी। इन युगांतर कवि ने बौद्धिक नैतिक रचनाओं द्वारा ऐसा आदर्श उपस्थित किया है जो अतुलनीय है।

गोस्वामीजी की भाषा में लचीलापन अधिक है। उन्होंने जहाँ संस्कृत के तत्समनिष्ठ शब्दों को लिया वहीं भाव के अनुसार देशज और विदेशज शब्दों को भी इसी अंतर्दृष्टि के कारण उनका काव्य भाव को अभिव्यक्त करने में अत्यधिक सक्षम है।

4. छप्पय प्रश्न ( लघु उत्तरीय प्रश्न एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्न )

1. नाभादास ने कबीर की किन विशेषताओं का उल्लेख किया है ? उनकी क्रम से सूची बनाइए।

उत्तर ⇒ नाभादास ने कबीर की भक्ति के संदर्भ में कही बातों का उल्लेख करते हुए कहा है कि जो मनुष्य भक्ति से विमुख होता है वह अपना सर्व धर्म अधर्म कर लेता है। योग, व्रत, दान, भजन, हित की भाषा आदि को तुच्छ बना लेता है।


2. सूर के काव्य की किन विशेषताओं का उल्लेख कवि ने किया है ?

उत्तर ⇒ नाभादास ने सूर के काव्य के चमत्कार, अनुप्रास एवं उनकी भाषा की सुन्दरता की सराहना की है। सूर के कष्ठ में उपस्थित ‘प्रीति तत्व’ एवं इनकी भाषा में उपस्थित ‘तुक’ की प्रशंसा की है। नाभादास के अनुसार सूर के काव्य के श्रवण से बुद्धि विमल होती है। सूर ने अपने काव्य में कृष्ण के जन्म, कर्म, गुण रूप आदि को प्रतिबिम्बित कर दिया है।


3. ‘मुख देखी नाहिन भनी’ का क्या अर्थ है ? कबीर पर यह कैसे लागू होता है ?

उत्तर ⇒ प्रस्तुत पद्यांश में कबीर के अक्खड़ व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला गया है। कबीर ऐसे प्रखर चेतना संपन्न कवि हैं जिन्होंने कभी भी मुँह देखी बातें नहीं की। उन्हें सच को सच कहने में तनिक भी संकोच नहीं था। राज सत्ता हो या समाज की जनता, पंडित हों या मुल्ला-मौलवी सबकी बखिया उधेड़ने में उन्होंने तनिक भी कोताही नहीं की। उन्होंने इसलिए अपनी अक्खड़ता, स्पष्टवादिता, पक्षपातरहित कथन द्वारा लोकमंगल के लिए अथक संघर्ष किया।


4. ‘पक्षपात नहीं वचन सबहिके हित की भाखी।’ इस पंक्ति में कबीर के किस गुण का परिचय दिया गया है ?

उत्तर ⇒ प्रस्तुत पंक्तियाँ महाकवि नाभादासजी द्वारा विरचित ‘भक्तमाल’ काव्य कृति से ली गयी है। इन पंक्तियों में भक्त कवि ने महाकवि कबीर के व्यक्तित्व का स्पष्ट चित्रण किया है। कबीर के जीवन की विशेषताओं की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट किया है।

क्या हिन्दू और क्या तुरक, सभी के प्रति कबीर ने आदर भाव प्रदर्शित किया और मानवीय पक्षों के उद्घाटन में महारत हासिल की। कबीर के वचनों में पक्षपात नहीं है। वे सबके हित की बातें सोचते हैं और वैसा ही आचरण करने के लिए सबको कविता द्वारा जगाते हैं। सत्य को सत्य कहने में तनिक झिझक नहीं, भय नहीं, लोभ नहीं। इस प्रकार क्रांतिकारी कबीर का जीवन-दर्शन सबके लिए अनुकरणीय और वंदनीय है। लोकमंगल की भावना जगानेवाले इस तेजस्वी कवि की जितनी प्रशंसा की जाय, थोड़ी ही होगी। कबीर क्रांतिकारी कवि, प्रखर चिंतक तथा महान दार्शनिक थे।


5. कविता में तुक का क्या महत्व है ? इनका छप्पयों के संदर्भ में स्पष्ट करें।

उत्तर ⇒ कविता में ‘तुक’ का अर्थ अन्तिम वर्णों की आवृत्ति है। कविता के चरणों के अंत में वर्णों की आवृत्ति को ‘तुक’ कहते हैं। साधारणतः पाँच मात्राओं की ‘तुक’ उत्तम मानी गयी है।

संस्कृत छंदों में ‘तुक’ का महत्व नहीं था, किन्तु हिन्दी में तुक ही छन्द का प्राण है।
‘छप्पय’- यह मात्रिक विषम और संयुक्त छंद है। इस छंद के छः चरण होते हैं इसलिए इसे ‘छप्पय’ कहते हैं।

प्रथम चार चरण रोला के और शेष दो चरण उल्लाला के, प्रथम-द्वितीय और तृतीय चतुथ के योग होते हैं। छप्पय में उल्लाला के सम-विषम (प्रथम-द्वितीय और तृतीय-चतुर्थ) चरणों का यह योग 15 + 13 = 28 मात्राओं वाला ही अधिक प्रचलित है। जैसे भगति विमख जे धर्म स अब अधरम करि गाए। योग, यज्ञ, व्रत, दान, भजन बिनु, तुच्छ, दिखाओ।


6. ‘कबीर कानि राखी नहिं’ से क्या तात्पर्य है ?

उत्तर ⇒ कबीरदास महान क्रांतिकारी कवि थे। उन्होंने सदैव पाखंड का विरोध किया। भारतीय षड्दर्शन और वर्णाश्रम की ओर तनिक भी ध्यान नहीं दिया। वर्णाश्रम व्यवस्था का पोषक धर्म था-षडदर्शन। भारत के प्रसिद्ध छ: दर्शन हिन्दुओं के लिए अनिवार्य थे। इनकी ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए कबीर ने षड्दर्शन की बुराइयों की तीखी आलोचना की और उनके विचारों की ओर तनिक भी ध्यान नहीं दिया यानी कानों से सुनकर ग्रहण नहीं किया बल्कि उसके पाखंड की धज्जी-धज्जी उड़ा दी। कबीर ने जनमानस को भी षडदर्शन द्वारा पोषित वर्णाश्रम की बुराइयों की ओर सबका ध्यान आकृष्ट किया और उसके विचारों को मानने का प्रबल विरोध किया।


7. कबीर ने भक्ति को कितना महत्त्व दिया ?

उत्तर ⇒ कबीर ने अपनी सबदी, साख और रमैनी द्वारा धर्म की सटीक व्याख्या प्रस्तुत की। लोक जगत में परिव्याप्त पाखंड, व्यभिचार, मूर्तिपूजा, जाति-पाँति और छुआछूत का प्रबल विरोध किया। उन्होंने योग, यज्ञ, व्रत, दान और भजन की सही व्याख्या कर उसके समक्ष उपस्थित किया।

कबीर ने भक्ति में पाखंडवादी विचारों की जमकर खिल्लियाँ उड़ायी और मानव-मानव के बीच समन्वयवादी संस्कृति की स्थापना की। लोगों के बीच भक्ति के सही स्वरूप की व्याख्या की। भक्ति की पवित्र धारा को बहाने, उसे अनवरत गतिमय रहने में कबीर ने अपने प्रखर विचारों से उसे बल दिया। उन्होंने विधर्मियों की आलोचना की। भक्ति विमुख लोगों द्वारा भक्ति की परिभाषा गढ़ने की तीव्र आलोचना की। भक्ति के सत्य स्वरूप का उन्होंने उद्घाटन किया और जन-जन के बीच एकता, भाईचारा प्रेम की अजस्र गंगा बहायी। वे निर्गुण विचारधारा के तेजस्वी कवि थे। उन्होंने ईश्वर के निर्गुण स्वरूप का चित्रण किया। उसकी सही व्याख्या की। सत्य स्वरूप का सबको दर्शन कराया।

5. कवित्त प्रश्न ( लघु उत्तरीय प्रश्न एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्न )

1. शिवाजी की तुलना भूषण ने किन-किन-से की है ?

उत्तर ⇒ शिवाजी की तुलना भूषण ने इन्द्र, राम, परशुराम, चीता, सिंह (मृगराज) कृष्ण, आदि से की है।


2. भूषण रीतिकाल की किस धारा के कवि हैं ? वे अन्य रीतिकालीन कवियों से कैसे विशिष्ट हैं ?

उत्तर ⇒ भूषण रीतिकाल के रीतिमुक्त धारा के कवि हैं। भूषण रीतिकालीन कवियों से अलग या विशिष्ट इस संदर्भ में हैं कि उन्होंने रीतिकालीन कविता जो शृंगारिक होती थी उससे अलग हटकर वीर काव्यों की रचना की।


3. शिवाजी की तुलना भूषण ने मृगराज से क्यों की है ?

उत्तर ⇒ लना कवि ने इन्द्र, समुद्र की आग, श्रीरामचन्द्रजी, पवन, शिव, परशुराम, जंगल की आग, शेर (चीता), सूर्य के प्रखर प्रकाश और कृष्ण से की है। छत्रपति शिवाजी के व्यक्तित्व में उपरोक्त सभी देवताओं के गुण विराजमान थे। जैसे-उपरोक्त सभी अंधकार, अराजकता, दंभ, अत्याचार को दूर करने में सफल हैं, ठीक उसी प्रकार मगराज अर्थात शेर के रूप में महाराज शिवाजी मलेच्छ वंश के औरंगजेब से लोहा ले रहे हैं। वे अत्याचार और शोषण-दमन के विरुद्ध लोकहित के लिए संघर्ष कर रहे हैं। छत्रपति का व्यक्तित्व एक प्रखर राष्ट्रवीर, राष्ट्रचिंतक, सच्चे कर्मवीर के रूप में हमारे सामने दृष्टिगत होता है। जिस प्रकार इन्द्र द्वारा यम का, वाड़वाग्नि द्वारा जल का, और घमंडी रावण का दमन श्रीराम करते हैं ठीक उसी प्रकार शिवाजी का व्यक्तित्व है। महावीर शिवाजी, भूषण कवि के राष्ट्रनायक हैं। इनके व्यक्तित्व के सभी पक्षों को कवि ने अपनी कविताओं में उद्घाटित किया है। छत्रपति शिवाजी को उनकी धीरता, वीरता और न्यायोचित सद्गुणों के कारण ही मृगराज के रूप में चित्रित किया है।


4. छत्रसाल की तलवार कैसी है ? वर्णन कीजिए।

उत्तर ⇒ प्रस्तुत कविता में महाराजा छत्रसाल की तलवार की भयंकरता का चित्रण हुआ है। उनकी तलवार सूर्य की किरणों के समान प्रखर और प्रचण्ड है। उनकी तलवार की भयंकरता से शत्रु दल थर्रा उठता है।

उनकी तलवार युद्धभूमि में प्रलयंकारी सूर्य की किरणों की तरह म्यान से निकलती है। वह विशाल हाथियों के झूड को क्षणभर में काट-काटकर समाप्त कर देती है। हाथियों का झुण्ड गहन अंधकार की तरह प्रतीत होता है। जिस प्रकार सूर्य किरणों के समक्ष अंधकार का साम्राज्य समाप्त हो जाता है की ठीक उसी प्रकार तलवार की तेज के आगे अंधकार रूपी हाथियों का समूह भी मृत्यु को प्राप्त करता है।

छत्रसाल की तलवार ऐसी नागिन की तरह है जो शत्रुओं के गले में लिपट जाती है और मुण्डों की भीड़ लगा देती है, लगता है कि रूद्रदेव को रिझाने के लिए ऐसा कर रही है।

महाकवि भूषण छत्रसाल की वीरता धीरता से मुग्ध होकर कहते हैं कि हे बलिष्ठ और विशाल भुजा वाले महाराज छत्रसाल ! मैं आपकी तलवार का गुणगान कहाँ तक करूँ ? आपकी तलवार शत्रु-योद्धाओं के कटक जाल को काट-काटकर रणचण्डी की तरह किलकारी भरती हुई काल को भोजन कराती है।


5. आपके अनुसार दोनों छंदों में अधिक प्रभावी कौन है और क्यों ?

उत्तर ⇒ पाठ्य-पुस्तक के दोनों कवित्त छंदों में अधिक प्रभावकारी प्रथम छंद है। इसमें महाकवि भूषण ने राष्ट्रनायक छत्रपति शिवाजी के वीरोचित गुणों का गुणगान किया है। कवि ने अपने कवित्त में छत्रपति शिवाजी के व्यक्तित्व के गुणों की तुलना अनेक लोगों से करते हुए लोकमानस में उन्हें महिमा-मंडित करने का काम किया है।

कवि ने कथन को प्रभावकारी बनाने के लिए अनुप्रास और उपमा अलंकारों का प्रयोग कर अपनी कुशलता का परिचय दिया है। वीर रस में रचित इस कवित्त में अनेक प्रसंगों की तुलना करते हुए शिवाजी के जीवन से तालमेल बैठाते हुए एक सच्चे राष्ट्रवीर के गुणों का बखान किया है। इन्द्र, राम, कृष्ण, परशुराम, शेर, कृष्ण, पवन आदि के गुण कर्म और गुण धर्म से शिवाजी के व्यक्तित्व की तुलना की गयी है। वीर शिवाजी शेरों के शेर हैं, जिन्होंने अपने अभियान में कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

भाषा में ओजस्विता, शब्द प्रयोग में सूक्ष्मता, कथन के प्रस्तुतीकरण की दक्षता भूषण के कवि गुण हैं। अनेक भाषाओं के ठेठ और तत्सम, तद्भव शब्दों का भी उन्होंने प्रयोग किया है।

6. तुमुल कोलाहल कलह में ( लघु उत्तरीय प्रश्न एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्न )

1. ‘हृदय की बात’ का क्या कार्य है ?

उत्तर ⇒ घनघोर कोलाहल, अशांति और कलह के बीच हृदय की बात का कार्य मस्तिष्क को शांति पहुँचाना, उसे आराम देना है। मस्तिष्क जब विचारों के कोलाहल से घिर जाता है तो हृदय की बात उसे आराम देती है। हृदय कोमल भावनाओं का प्रतीक है जो मस्तिष्क को विचारों के कोलाहल से दूर करता है।


2. बरसात को ‘सरस’ कहने का क्या अभिप्राय है ?

उत्तर ⇒ हम जानते हैं कि बरसात में पानी आकाश से धरती पर गिरकर उसे रसभरी बनाती है। इसके पहले धरती गर्मी की प्रचंडता के कारण पानी के लिए तरसती रहती है। धरती जब पानी से भर जाती है तो पूरी धरती हरी-भरी रसभरी हो जाती है इसलिए बरसात को सरस (रस के साथ) कहा जाता है। यहाँ दूसरा अर्थ यह ध्वनित होता है कि धरती पर जीवन का नया संचार हो जाता है जिससे धरती सरस हो जाती है।


3. ‘सजल जलजात’ का क्या अर्थ है ?

उत्तर ⇒ शब्द के अर्थ का दृष्टि से ‘सजल जलजात’ का अर्थ जल में खिला हुआ कमल है। कवि का आशय जीवन के मार्मिक क्षणों में मैं सदा कमल की तरह खिलने वाला हूँ से है।


4. कविता में उषा की किस भूमिका का उल्लेख है ?

उत्तर ⇒ छायावादी कवि जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित ‘तमल कोलाहल कलह में’ शीर्षक कविता में उषाकाल की एक महत्वपूर्ण भूमिका का उल्लेख किया गया है। उषाकाल अंधकार का नाश करता है। उषाकाल के पूर्व सम्पूर्ण विश्व अंधकार में डुबा रहता है। उषाकाल होते ही सूर्य की रोशनी अंधकाररूपी जगत में आने लगती है। सारा विश्व प्रकाशमय हो जाता है। सभी जीव-जंतु अपनी गतिविधियाँ प्रारम्भ कर देते हैं। जगत् में एक आशा एवं विश्वास का वातावरण प्रस्तुत हो जाता है। उषा की भूमिका का वर्णन कवि ने अपनी कविता में किया है।


5. चातकी किसके लिए तरसती है ?

उत्तर ⇒ चातकी एक पक्षी है जो स्वाति की बूंद के लिए तरसती है। चातकी केवल स्वाति का जल ग्रहण करती है। वह सालोभर स्वाति के जल की प्रतीक्षा करती रहती है और जब स्वाति की बूंद आकाश से गिरता है तभी वह जल ग्रहण करती है। इस कविता में यह उदाहरण सांकेतिक है। दु:खी व्यक्ति सुख प्राप्ति की आशा में चातकी के समान उम्मीद बाँधे रहते हैं। कवि के अनुसार, एक-न-एक दिन उनके दु:खों का अंत होता है।


6. कविता का केन्द्रीय भाव क्या है ? संक्षेप में लिखिए।

उत्तर ⇒ प्रस्तुत कविता ‘तुमुल कोलाहल कलह में’ शीर्षक कविता आधुनिक काल के सर्वश्रेष्ठ कवि जयशंकर प्रसाद द्वारा विरचित है। प्रस्तुत कविता में कवि ने जीवन रहस्य को सरल और सांकेतिक भाषा में सहज ही अभिव्यक्त किया है।

कवि कहना चाहता है कि रे मन, इस तूफानी रणक्षेत्र जैसे कोलाहलपूर्ण जीवन में मैं हृदय की आवाज के समान हूँ। कवि के अनुसार भीषण कोलाहल कलह विक्षोभ है तथा शान्त हृदय के भीतर छिपी हुई निजी बात आशा है।

कवि कहता है कि जब नित्य चंचल रहनेवाली चेतना (जीवन के कार्य-व्यापार से) विकल …होकर नींद के पल खोजती है और थककर अचेतन-सी होने लगती है, उस समय मैं नींद के लिए विकल शरीर को मादक और स्पर्शी सुख मलयानिल के मंद झोंके के रूप में आनन्द
के रस की बरसात करता हूँ।

कवि के अनुसार जब मन चिर-विषाद में विलीन है, व्यथा का अन्धकार घना बना हुआ है, तब मैं उसके लिए उषा-सी ज्योति रेखा हूँ, पुष्प के समान खिला हुआ प्रात:काल हूँ। अर्थात् कवि को दु:ख में भी सुख की अरुण किरणें फूटती दीख पड़ती है।

कवि के अनुसार जीवन मरुभूमि की धधकती ज्वाला के समान है जहाँ चातकी जल के कण प्राप्ति हेतु तरसती है। इस दुर्गम, विषम और ज्वालामय जीवन में मैं (श्रद्धा) मरुस्थल  की वर्षा के समान परम सुख का स्वाद चखानेवाली हूँ। अर्थात् आशा की प्राप्ति से जीवन
में मधु-रस की वर्षा होने लगती है।

कवि को अभागा मानव-जीवन पवन की परिधि में सिर झुकाये हुए रुका हुआ-सा प्रतीत होता है। इस प्रकार जिनका सम्पूर्ण जीवन-झुलस रहा हो ऐसे दु:ख-दग्ध लोगों को आशा वसन्त की रात के समान जीवन को सरस बनाकर फूल-सा खिला देती है।

कवि अनुभव करता है कि जीवन आँसुओं का सरोवर है, उसमें निराशारूपी बादलों की छाया पड़ रही है। उस हाहाकारी सरोवर में आशा ऐसा सजल कमल है जिस पर भौंरे मँडराते हैं और जो मकरन्द से परिपूर्ण है। आशा एक ऐसा चमत्कार है जिससे स्वप्न भी सत्य हो जाता है।


7. कविता में “विषाद’ और ‘व्यथा’ का उल्लेख है, यह किस कारण से है? अपनी कल्पना से उत्तर दीजिए।

उत्तर ⇒ ‘तुमुल कोलाहल कलह में’ शीर्षक कविता के द्वितीय पद में ‘विषाद’ और है। कवि के अनुसार संसार की वर्तमान स्थिति कोलाहलपूर्ण है। कवि संसार की वतमान कालाहलपूण स्थिात स क्षुब्ध है। इससे मनुष्य का मन चिर-विषाद मन में घटन महसूस होने लगती है। कवि अंधकाररूपी वन में व्यथा (दु:ख) का अनुभव करता है। सचमुच, वर्तमान संसार में सर्वत्र विषाद एवं ‘व्यथा’ ही परिलक्षित होती है।


8. इस कविता में स्त्री को प्रेम और सौंदर्य का स्रोत बताया गया है। आप अपने पारिवारिक जीवन के अनुभवों के आधार पर इस कथन की परीक्षा कीजिए।

उत्तर ⇒ प्रसादजी के काव्यों में प्रेम और सौन्दर्य का चित्रण किया गया है। ‘तमल कोलाहल कलह में’ शीर्षक कविता में कवि ने स्त्री को प्रेम और सौंदर्य का स्रोत बताया है। कवि का कथन सही है। जब पुरुष सांसारिक उलझनों से उबकर घर आता है तो स्त्री शीतल पवन का रूप धारण कर जीवन को शीतलता प्रदान करती है। व्यथा एवं विषाद में स्त्री पुरुष की सहायता करती है।

7. पुत्र वियोग प्रश्न ( लघु उत्तरीय प्रश्न एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्न )


1. कवयित्री का खिलौना क्या है ?

उत्तर- कवयित्री का खिलौना उसका बेटा है। बच्चों को खिलौना प्रिय होता है, वह उनकी सर्वोत्तम प्रिय वस्तु होती है। उसी प्रकार कवयित्री के लिए उसका बेटा उसके जीवन का सर्वोत्तम उपहार है। इसलिए वह कवयित्री का खिलौना है।


2. पत्र के लिए माँ क्या-क्या करती है ?

उत्तर- पुत्र के लिए माँ निजी सुख-दुख भूल जाती है। उसे अपनी सुख-सुविधा के विषय में सोचने का अवकाश नहीं रहता। वह उसके स्वास्थ्य एवं सुरक्षा का पूरा ध्यान रखती है। बेटा को ठंड न लग जाए अथवा बीमार न पड़ जाए, इसके लिए उसे सदैव गोद में लेकर उसका मनोरंजन करती रहती है। उसे लोरी-गीत सुनाकर सुलाती है। उसके लिए मंदिरों में जाकर पूजा-अर्चना करती है तथा मन्नतें माँगती है।


3. माँ के लिए अपना मन समझाना कब कठिन है और क्यों ?

उत्तर- माँ के लिए अपने मन को समझाना तब कठिन हो जाता है, जब वह अपना बेटा खो देती है। बेटा माँ की अमूल्य धरोहर होता है। माँ की आँखों का तारा होता है। माँ का सर्वस्व यदि क्रूर नियति द्वारा उससे छीन लिया जाता है, उसके बेटे की मृत्यु हो जाती है तो माँ के लिए अपने मन को समझाना कठिन होता है।


4. पुत्र को ‘छौना’ कहने से क्या भाव छुपा है, उसे उद्घाटित करें।

उत्तर- ‘छौना’ का अर्थ होता है हिरण आदि पशुओं का बच्चा। ‘पुत्र वियोग’ शीर्षक कविता में कवयित्री ने ‘छौना’ शब्द का प्रयोग अपने बेटा के लिए किया है। हिरण अथवा बाघ का बच्चा बड़ा भोला तथा सुन्दर दीखता है। इसके अतिरिक्त चंचल तथा तेज भी होता है। अतः, कवयित्री द्वारा अपने बेटा को छौना कहने के पीछे यह विशेष अर्थ भी हो सकता है।


5. कविता का भावार्थ संक्षेप में लिखिए।

उत्तर- ‘पुत्र वियोग’ शीर्षक कविता में अपने बेटे की मौत के बाद शोकाकुल माँ के मन में उठनेवाले अनेक निराशाजनक तथा असंयमित विचार तथा उससे उपजी विषादपूर्ण मन:स्थिति को उद्घाटित किया गया है। कवयित्री अपने बेटे के आकस्मिक तथा अप्रत्याशित निधन से मानसिक तौर पर अशान्त है। वह अपनी विगत स्मृतियों को याद कर उद्विग्न है। एक माँ के हृदय में उठनेवाले झंझावात की वह स्वयं भुक्तभोगी है। कविता में कवयित्री द्वारा नितांत मनोवैज्ञानिक तथा स्वाभाविक चित्रण किया गया है।

वस्तुतः कवयित्री ने अपने बेटे की मौत से उपजे दुःखिया माँ के शोकपूर्ण उद्गारों का स्वाभाविक एवं मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया है। ऐसी युक्तियुक्तपूर्ण एवं मार्मिक प्रस्तुति अन्यत्र दर्लभ है। महादेवी वर्मा की एक मार्मिक कविता इस प्रकार है, जो माँ की ममता को प्रतिबिंबित करती है, “आँचल में है दूध और आँखों में पानी।”


6. इस कविता को पढ़ने पर आपके मन पर क्या प्रभाव पड़ा, उसे लिखिए ?

उत्तर- पुत्र वियोग’ कविता में कवयित्री ने अपने बेटा की मृत्यु तथा उससे उपजे विषाद की अभिव्यक्ति की है।

मेरे मन में भी कुछ इसी प्रकार के मनोभावों का आना स्वाभाविक है। किसका हृदय संवेदना से नहीं भर उठेगा? कौन कवयित्री के शोकोद्गारों की गहराई में गए बिना रहेगा।

एक माँ का अपने बेटे की दिन-रात देखभाल करना, बीमारी, ठंड आदि से रक्षा के लिए उसे गोदी में खिलाते रहना, स्वयं रात में जागकर उसे लोरी गीत सुनाकर सुलाना, अपने दाम्पत्य जीवन की खुशी को संतान पर केन्द्रित करना, अंत में नियति के क्रूर-चक्र की चपेट में बेटा की मौत ! इन सारे घटनाक्रमों से मैं मानसिक रूप से अशांत हो गया। मुझे ऐसा अहसास हुआ जैसे यह त्रासदी मेरे साथ हुई। कविता में कवयित्री ने अपनी सम्पूर्ण संवेदना को उड़ेल दिया है, मन में करुणा उमड़ पड़ी तथा असह्य दर्द की अनुभूति होती है।


7. कवयित्री स्वयं को असहाय और विवश क्यों कहती हैं ?

उत्तर- कवयित्री असमय पुत्र की मृत्यु के कारण उसे आगे का सहारा नहीं दीखता है इसलिए वह अपने को असहाय और विवश कहती है। जब उसका पुत्र उसके साथ था तो वह उस खिलौने की भाँति उसी में खोयी रहती थी जिस प्रकार बच्चे माँ अपने बच्चों का तरह-तरह से ध्यान रखती है। कहीं उसे सर्दी न लग जाए। कहीं उसे लू न लग जाए। कभी उसे लोरियाँ गाकर सुनाती, कभी थपकी देकर इसमें माँ का मन लगा रहता था। परन्तु पुत्र के बिछड़ने के साथ ही वह असहाय हो जाती है और केवल उसके वियोग में आँसू बहाने को विवश हो जाती है।


8. ‘पुत्र वियोग’ शीर्षक कविता का सारांश लिखें। अथवा, “पुत्र वियोग’ शीर्षक कविता का भावार्थ संक्षेप में लिखिए।

उत्तर- सुभद्रा कुमारी चौहान मूलतः राष्ट्रीय सांस्कृतिक धारा की कवयित्री हैं। परन्तु सामाजिकता पर ध्यान गया है उनका। कवयित्री इस कविता में एक माँ की पुत्र की असमय मृत्यु होने पर उसकी स्थिति क्या हो सकती है उसी का चित्रण किया है इस कविता में। कवयित्री कहती है कि आज पूरा विश्व, संसार हँस रहा है, सभी ओर खुशी की लहर है परन्तु इस विश्व में सिर्फ एक मैं दु:खी हूँ जो मेरा ‘खिलौना’ खो गया है। ‘खिलौना’ यहाँ पुत्र के प्रतीक के रूप में आया है। एक बच्चे के लिए सबसे प्यारी वस्तु उसका खिलौना होता है। यदि उसका खिलौना खो जाता है तो वह दुखी हो जाता है परन्तु जैसे ही मिलता है खुशी का ठिकाना न रहता है। उसी तरह एक माँ के लिए पुत्र खिलौने की भाँति ही होता है। माँ जिधर से आती है बच्चे को पुचकारती हुई आती है। बच्चा उसकी जिन्दगी का अहम हिस्सा हो जाता है। वह एक पल भी उसके बिना रह नहीं पाती। माँ अपने पुत्र को कहीं जाने नहीं देती इसलिए कि उसे कहीं सर्दी न लग जाए। अतः आँचल की ओट में अपने गोद से नहीं उतारती। पुत्र जैसे ही ‘माँ’ पुकारा कि माँ सब काम छोड़ते हुए दौड़ी चली आयी। ये पंक्तियाँ माँ का पुत्र के प्रति प्रगाढ़ प्रेम को दर्शाती हैं। यही नहीं बच्चा जब नहीं सोता है तब उसे थपकी दे-देकर लोरी सुनाकर सुलाती है। अपने पुत्र के मुख पर मलिनता देखकर रात भर जाग कर बिताती है।

माँ अपने पुत्र की खुशी या उसे पाने के लिए क्या-क्या नहीं करती। पत्थर जैसे अमूर्त को मूर्त मानकर उसकी पूजा करती है। कहीं नारियल, बताशे, कहीं दूध चढ़ाकर शीश नवाती है। फिर भी इतना करने के बावजूद उसका पुत्र (खिलौना) छिन ही जाता है। इसलिए वह असहाय हो जाती है। उसके प्राण व्याकुल हो जाते हैं।

उसकी शांति छिन जाती है। वह सोचती है कि मैंने अनमोल धन खो दिया है और फिर इसे मैं नहीं पा सकती। इस कारण माँ का जीवन सूना-सूना सा हो जाता है। पुत्र की याद में रोते रहना नियति बन गयी है। उसे जीवन नीरस लगने लगता है। उसे लगता है काश ! एक बार भी यदि पा जाती तो जी भरकर उसे प्यार करती। वह कल्पना करती है कि मेरे भैया, बेटे, अब माँ को छोड़कर तुम नहीं जाना। परन्तु जो विछुड़ गया वह पुनः मिलता कहाँ।. अतः कवयित्री कहती है कि बेटा खोकर मन को समझाना बड़ा कठिन है। भाई-बहन, पिता सब भूल सकते हैं तुम्हें, परन्तु रात-दिन की साथिन माँ तुम्हें कैसे भूल सकती है।

8. उषा ( लघु उत्तरीय प्रश्न एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्न )

1. प्रातःकाल का नभ कैसा था ?

उत्तर ⇒ प्रात:काल का नभ बिलकुल नीले राख के समान स्वच्छ था। उसकी नीलिमा के बीच आनेवाल उजाला हल्के रूप में झाँकता सा नजर आता है। प्रात:काल की उस वेला में आकाश नीले राख सा लगता है।


2. उषा का जादू कैसा है ?

उत्तर ⇒ उषा का जादू उषाकालीन नभ की प्राकृतिक सुंदरता है जिसके लिए कवि ने बहुविध उपमान जैसे नीले शंख, राख से लीपे हुए गीले चौक, काली सिल जो लाल केसर में धुली हो, लाल खड़िया से लिखी स्लेट के समान आदि प्रस्तुत किया है। सूर्योदय के पूर्व तक ही आकाश की गोद में उषा का जादू चलता रहता है। उषा का जादू नीले शंख के समान, राख से लीपे हुए नीले चौक आदि के समान है।


3. ‘राख से लीपा हुआ चौका’ के द्वारा कवि ने क्या कहना चाहा है ?

उत्तर ⇒ सूर्योदय के समय आसमान के वातावरण में नमी दिखाई दे रही है और वह राख से लीपा गीला चौका-सा लग रहा है। इससे उसकी पवित्रता झलक रही है। कवि ने सूर्योदय से पहले आकाश को राख से लीपे चौके के समान इसलिये बताया है ताकि वह उसकी पवित्रता को अभिव्यक्त कर सके।


4. “लाल केसर’ और ‘लाल खड़िया चाक’ किसके लिये प्रयुक्त है ?

उत्तर ⇒ लाल केसर-सूर्योदय के समय आकाश की लालिमा से कवि ने लाल केसर से तुलना की है। रात्रि को उन्होंने काली सिल से तुलना की है। काली सिल को लाल केसर से मलने पर सिलवट साफ हो जाती है। उसी प्रकार सूर्योदय होते ही अंधकार दूर हो जाता है एवं आकाश में लालिमा छा जाती है।

लाल खड़िया चाक-लाल खड़िया चाक उषाकाल के लिये प्रयुक्त हुई है। उषाकाल में हल्के अंधकार के आवरण में मन का स्वरूप ऐसा लगता है मानो किसी ने स्लेट पर लाल खली घिस दी हो।


5. ‘उषा’ कविता में प्रातःकालीन आकाश की पवित्रता, निर्मलता और उज्ज्वलता के लिए प्रयुक्त कथनों को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर ⇒ पवित्रता-जिस स्थान पर मंगल कार्य करना हो, उसे राख से लीप कर पवित्र बना लिया जाता है। लीपे हुए चौके के समान ही प्रात:कालीन आकाश भी पवित्र है।

निर्मलता-कालापन मलिन अथवा दोषपूर्ण माना जाता है। उसको निर्मल बनाने के लिए उसे जल आदि से धो लेते हैं। जिस प्रकार काली सिल पर लाल केसर रगड़ने से तथा बाद में उसे धोने से उस पर झलकनेवाली लालिमा उसकी निर्मलता की सूचक बन जाती है, उसी प्रकार प्रात:कालीन आकाश भी हल्की लालिमा से युक्त होने के कारण निर्मल दिखाई देता है।

उज्ज्वलता – जिस प्रकार नीले जल में गोरा शरीर उज्ज्वल चमक से युक्त तथा मोहक लगता है उसी प्रकार प्रात:कालीन आकाश भी उज्ज्वल प्रतीत होता है।”नील जल में किसी की गौर, झिलमिल देह जैसे हिल रही हो।


6. सिल और स्लेट का उदाहरण देकर कवि ने आकाश के रंग के बारे में क्या कहा है ?

उत्तर ⇒ कवि ने आकाश के रंग के बारे में सिल का उदाहरण देते हुए स्पष्ट किया है कि यह आकाश ऐसा लगता है जैसे किसी सिल पर से केसर धुल गई हो। स्लेट का उदाहरण देते हुए कहा गया है कि आकाश ऐसा लगता है जैसे किसी ने स्लेट पर लाल रंग की खड़िया मिट्टी मल दी हो। इस उदाहरण द्वारा कवि ने श्वेतिमा तथा कालिमा के समन्वय का वर्णन कर आकाश की शोभा का वर्णन किया है।


7. भोर के नभ को राख से लीपा गया चौका के द्वारा कवि ने क्या कहना चाहा है ?

उत्तर ⇒ भोर के नभ का रंग नीला होता है. पर साथ ही उसमें सफेदी भी झलकती है। राख से लीपे हुए चौके में भी नीलिमा अथवा श्यामलता के साथ सफेदी का मिश्रण होता है। यही कारण है कि कवि ने भोर के नभ को राख से लीपे चौके की संज्ञा दी है। राख के ताजे लीपे चौके में नमी भी होती है। भोर के नभ में भी ओस के कारण गीलापन है।


8. प्रातः नभ की तुलना बहुत नीला शंख से क्यों की गई है ?

उत्तर ⇒ प्रातः नभ की तुलना बहुत नीला शंख से की गयी है क्योंकि कवि के अनुसार प्रात:कालीन आकाश (नभ) गहरा नीला प्रतीत हो रहा है। वह नीले शंख के समान पवित्र और उज्ज्वल है। नीला शंख पवित्रता का प्रतीक है। प्रात:कालीन नभ भी पवित्रता का प्रतीक है। लोग. उषाकाल में सूर्य नमस्कार करते हैं। शंख का प्रयोग भी पवित्र कार्यों में होता है। अतः, यह तुलना युक्तिसंगत है।


9. नील जल में किसकी गौर देह हिल रही है ?

उत्तर ⇒ नीले आकाश में सूर्य की प्रात:कालीन किरण झिलमिल कर रही है मानो नीले जल में किसी गौरांगी का गौर शरीर हिल रहा हो।

9. जन-जन चेहरा एक ( लघु उत्तरीय प्रश्न एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्न )

1. “जन-जन का चेहरा एक” से कवि का क्या तात्पर्य है ? अथवा, “जन-जन का चेहरा एक’ शीर्षक कविता का भावार्थ लिखें।

उत्तर ⇒ “जन-जन का चेहरा एक” अपने में एक विशिष्ट एवं व्यापक अर्थ समेटे हुए हैं। कवि पीडित संघर्षशील जनता की एकरूपता तथा समान चिन्तनशीलता का वर्णन कर रहा है। कवि की संवेदना, विश्व के तमाम देशों में संघर्षरत जनता के प्रति मुखरित हो गई है, जो अपने मानवोचित अधिकारों के लिए कार्यरत हैं। एशिया, यूरोप, अमेरिका अथवा कोई भी अन्य महादेश या प्रदेश में निवास करने वाले समस्त प्राणियों का शोषण तथा उत्पीड़न के प्रतिकार का स्वरूप एक जैसा है। उनमें एक अदृश्य एवं अप्रत्यक्ष एकता है।

उनकी भाषा, संस्कृति एवं जीवन शैली भिन्न हो सकती है, किन्तु उन सभी के चेहरों में कोई अन्तर नहीं दीखता, अर्थात् उनके चेहरे पर हर्ष एवं विषाद, आशा तथा निराशा की प्रतिक्रिया, एक जैसी होती है। समस्याओं से जूझने (संघर्ष करने) का स्वरूप एवं पद्धति भी समान है।

कहने का तात्पर्य यह है कि यह जनता दुनिया के समस्त देशों में संघर्ष कर रही है अथवा इस प्रकार कहा जाए कि विश्व के समस्त देश, प्रान्त तथा नगर सभी स्थान के “जन-जन” (प्रत्येक व्यक्ति) के चेहरे एक समान हैं। उनकी मुखाकृति में किसी प्रकार की भिन्नता नहीं है। आशय स्पष्ट है विश्वबंधुत्व एवं उत्पीड़ित जनता जो सतत् संघर्षरत् है उसी की पीडा का वर्णन कवि कर रहा है।


2. नदियों की वेदना का क्या कारण है ?

उत्तर ⇒ नदियों की वेगवती धारा में जिन्दगी की धारा के बहाव. कवि के अन्त:मन की वेदना को प्रतिबिम्बित करता है। कवि को उनके कल-कल करते प्रवाह में वेदना की अनुभूति होती है। गंगा, इरावतीय अधिकारों के विदना के गीत कवि होती है। गंगा, इरावती, नील, अमेजन नदियों की धारा मानव-मन की वेदना को प्रकट करती है, जो अपने मानवीय अधिकारों के लिए संघर्षरत हैं। जनता की पीड़ा तथा संघर्ष को जनता से जोड़ते हुए बहती हुई नदियों में वेदना के गीत कवि को सुनाई पड़ते हैं।


3. “दानव दुरात्मा” से क्या अर्थ है ?

उत्तर ⇒ पूरे विश्व की स्थिति अत्यन्त भयावह, दारुण तथा अराजक हो गई है। दानव और दुरात्मा का अर्थ है-जो अमानवीय कृत्यों में संलग्न रहते हैं, जिनका आचरण पाश्विक होता है उन्हें दानव कहा जाता है। जो दुष्ट प्रकृति के होते हैं तथा दुराचारी प्रवृत्ति के होते हैं उन्हें ‘दुरात्मा’ कहते हैं। वस्तुतः दोनों में कोई भेद नहीं है, एक ही सिक्के के दो पहलू होते हैं। ये सर्वत्र पाए जाते हैं।


4. ज्वाला कहाँ से उठती है ? कवि ने इसे ‘अतिक्रुद्ध’ क्यों कहा है ?

उत्तर ⇒ ज्वाला का उद्गम स्थान मस्तिष्क तथा हृदय के अन्तर की ऊष्मा है। इसका अर्थ यह होता है कि जब मस्तिष्क में कोई कार्य-योजना बनती है तथा हृदय की गहराई में उसके प्रति तीव्र उत्कंठा की भावना निर्मित होती है तब वह एक प्रज्जवलित ज्वाला का रूप धारण कर लेती है। “अतिक्रुद्ध” का अर्थ होता है अत्यन्त कुपित मुद्रा में। आक्रोश की अभिव्यक्ति कुछ इसी प्रकार होती है। अत्याचार, शोषण आदि के विरुद्ध संघर्ष का आह्वान हृदय की अतिक्रुद्ध ज्वाला की मन:स्थिति में होता है।


5. समुची दुनिया में जन-जन का युद्ध क्यों चल रहा है ?

उत्तर ⇒ सम्पूर्ण विश्व में जन-जन का युद्ध जन-मुक्ति के लिए चल रहा है। शोषक, खूनी चोर तथा अन्य अराजक तत्वों द्वारा सर्वत्र व्याप्त असन्तोष तथा आक्रोश की परिणति जन-जन के युद्ध अर्थात् जनता द्वारा छेड़े गए संघर्ष के रूप में हो रहा है।


6. कविता का केन्द्रीय विषय क्या है ?

उत्तर ⇒ कविता का केन्द्रीय विषय पीड़ित और संघर्षशील जनता है। वह शोषण, उत्पीड़न तथा अनाचार के विरुद्ध संघर्षरत है। अपने मानवोचित अधिकारों तथा दमन की दानवी क्रूरता के विरुद्ध यह उसका युद्ध का उद्घोष है। यह किसी एक देश की जनता नहीं है, दुनिया के तमाम देशों में संघर्षरत जन-समूह है जो अपने संघर्षपूर्ण प्रयास से न्याय, शान्ति, सुरक्षा, बंधुत्व आदि की दिशा में प्रयासरत है। सम्पूर्ण विश्व की इस जनता (जन-जन) में अपूर्व एकता तथा एकरूपता है।


7. पृथ्वी के प्रसार को किन लोगों ने अपनी सेनाओं से गिरफ्तार किया है ?

उत्तर ⇒ पृथ्वी के प्रसार को दुराचारियों तथा दानवी प्रकृति वाले लोगों ने अपनी सेनाओं द्वारा गिरफ्तार किया है। उन्होंने अपने काले कारनामों द्वारा प्रताड़ित किया है। उनके दुष्कर्मों तथा अनैतिक कृत्यों से पृथ्वी प्रताड़ित हुई है। इन मानवता के शत्रुओं ने पृथ्वी को गम्भीर यंत्रणा दी है।


8. बंधी हुई मुट्ठियों का क्या लक्ष्य है ?

उत्तर ⇒ कवि बंधी हुई मुट्ठियों के लक्ष्य के माध्यम से जनता की ताकत का एहसास कराना चाहता है जो किसी भी विपरीत परिस्थितियों को अपने अनुकूल कर सकती है। यह ताकत इतनी ताकतवर होती है कि जन-शोषक शत्रु को सत्ताच्युत कर देती है। मुट्ठियों की ताकत सामान्य जनता की ताकत है। यदि इस ताकत के साथ कोई खिलवाड़ करे तो उसकी मिट्टी पलद हो जाती है। चाहे वह कितना भी बड़ा जन-शोषक क्यों न हो, जब यह ताकत क्रुद्ध होती है तो अपनी ज्वाला में जलाकर राख कर देती है। अतः कवि बंधी हई मटिठयों के माध्यम से जन-शोषक को इनसे न टकराने की नसीहत देता है।


9. प्यार का इशारा और क्रोध का दुधारा से क्या तात्पर्य है ?

उत्तर ⇒ प्यार का इशारा और क्रोध का दुधारा से कवि का तात्पर्य यह है कि चाहे वह यानि जनता जिस देश में निवास करती हो, उनके प्यार का इशारा यानि मानवतावादी दृष्टिकोण कल मुक्तिबोध की कविता का सारांश लिखे कविता का कहना चाहिए एक होता है, उसमें किसी प्रकार का बदलाव नहीं होता, ठीक उसी प्रकार जब शोषक वर्ग के खिलाफ क्रोध की धारा उबल पड़ती है तो वह दो नहीं, बल्कि एक समान नजर आती है।


10. ‘जन-जन का चेहरा एक’ शीर्षक कविता का सारांश लिखें।

उत्तर ⇒ मुक्तिबोध की कविता अकेले मुक्तिबोध की कविता नहीं है। उसमें हमारे भारतीय जन-समूह की कहना चाहिए समूह मन की कविता शामिल और सक्रिय है। मुक्तिबोध की कविता और कथा कृतित्व एक चीख है उस अयथार्थ बौद्धिकता और अयथार्थ कलात्मकता के विरुद्ध जिसके चलते बहुत जल्दी नयी कविता में गतिरोध आ गये थे। मुक्तिबोध की कविता का प्राणतत्व है उनका निरन्तर आत्मसंघर्ष। इसी से वह हमें बाँधती नहीं, मुक्त करती है। उनसे असहमत होना भी उतना ही स्फूर्तिदायक होता है, जितना उनसे सहमत होना। उनका यह आत्म संघर्ष उनकी कविता ‘जन-जन का चेहरा एक’ में भी दिखलाई पड़ता है। कवि पीडित और संघर्षशील जनता का, जो अपने मानवोचित अधिकारों के लिए कर्मरत है, चित्र प्रस्तत करता है। यह जनता दुनिया के तमाम देशों में संघर्षरत है और अपने कर्म और श्रम से न्याय. शांति बंधत्व दिशा में प्रयासरत है। कवि इस जनता में एक अन्तर्वर्ती एकता देखता है और इस एकता को कविता का कथ्य बनाकर संघर्षकारी संकल्प में प्रेरणा और उत्साह का संचार करता है। कवि कहते हैं कि चाहे जिस देश, प्रांत, पुर का ही जन-जन का चेहरा एक के बाद एशिया. यरोप. अमेरीका सभी जगह के मजदूर एक है। कवि पूँजीवादी समाज का भी शोषित वर्ग के रूप में देखता है। एक को शोषक और एक शोषित के का सभी के लिए धूप एक है, कष्ट-दुख संताप एक है। और सभी मठिठयों का शोषण से मक्ति। कवि विभिन्न प्रतीकों के सहारे जनता की अंतवर्ती एकता का है। वह प्रकृति के हर अंग में मजदूरों को दुख देखता है। वह मजदरों मो की वेदना में देखता है। यही नहीं शोषक भी एक हैं बल्कि उनके चेहरे अलग ” संसार के भौगोलिक वातावरण की चर्चा करते हुए कहता है कि चाहे एशिया अमेरीका भिन्न वास स्थान के मानव एक हैं। सभी ओर खुशियाँ व्याप्त पर मन’”‘ के द्वारा शोषण एक गहरा संताप है। जब सब वस्तुए एक ही ढाचे से बनी है तो क्यों ? कवि क्रांति के निर्माण में किसी एक को आगे आने की कामना करता है और समाज की कल्पना करता है। व्यवस्था को बदलने की कोशिश करता है।

10. अधिनायक प्रश्न ( लघु उत्तरीय प्रश्न एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्न )

1. हरचरना कौन है ? उसकी क्या पहचान है ?

उत्तर ⇒ हरचरना ‘अधिनायक’ शीर्षक कविता में एक आम आदमी का प्रतिनिधित्व करता है। वह एक स्कूल जाने वाला बदहाल गरीब लड़का है। राष्ट्रीय त्योहार के दिन झंडा फहराए जाने के जलसे में राष्ट्रगान दुहराता है। हरचरना की पहचान ‘फटा सुथन्ना’ पहने एक गरीब छात्र के रूप में है।


2. हरचरना ‘हरिचरण’ का तद्भव रूप है। कवि ने कविता में हरचरना’ को रखा है, हरिचरण को नहीं; क्यों ?

उत्तर ⇒ हरचरना’ हरिचरण का तद्भव रूप है। कवि रघुवीर सहाय ने अपनी कविता ‘अधिनायक’ में ‘हरचरना’ शब्द का प्रयोग किया है, ‘हरिचरण’ नहीं। यहाँ कवि ने लोक संस्कति की पूर्ण अभिव्यक्ति के लिए ठेठ तद्भव शब्द का प्रयोग किया है। इससे कविता की लोकप्रियता बढती है। कविता में लोच एवं उसे सरल बनाने हेतु ठेठ तद्भव शब्दों का प्रयोग किया जाता है। इसके अतिरिक्त हरचरना उपेक्षित गरीब बालक का प्रतीक है।


3. ‘बाजा-बजाना’ का क्या अर्थ है ?

उत्तर ⇒ कविता ‘अधिनायक’ में कवि रघुवीर सहाय ने ‘बाजा-बजाना’ शब्द का गुणगान करने के अर्थ में किया है। आम जनता जो गरीब एवं लाचार है, बाहबली राजनेताओं के भय से उनके गुणगान में बेमन से लगी रहती है। कवि ने आधुनिक राजनेताओं पर कठोर व्यंग्य किया है।


4. डरा हुआ मन बेमन जिसका / बाजा रोज बजाता है। यहाँ ‘बेमन’ का क्या अर्थ है ?

उत्तर ⇒ कविता की इस पर्पोक्त में ‘बेमन’ का अर्थ बिना रुचि से है। आज राष्ट्रीय गान गाने में आम जनता की कोई रुचि नहीं है। वे बिना मन से एक चली आती हुई परम्परा का निर्वहन करते हैं।


5. “कौन-कौन है वह जन-गण-मन अधिनायक वह महाबली” कवि यहाँ किसकी पहचान कराना चाहता है ?

उत्तर ⇒ कवि रघुवीर सहाय अपनी कविता ‘अधिनायक’ में प्रस्तुत पंक्ति की रचना कर उस सत्ताधारी वर्ग के जन प्रतिनिधियों की पहचान कराना चाहता है जो राजसी ठाट-बाट में जी रहे हैं। गरीबों पर, आम आदमी पर उनका रोब-दाब है। वे ही अपने को जनता का अधिनायक मानते हैं। वे बाहुबली हैं। लोग उनसे डरे-सहमे रहते हैं। कवि उन्हीं की पहचान उक्त पंक्तियों में कराना चाहता है।


6. ‘कौन-कौन’ में पुनरुक्ति है। कवि ने यह प्रयोग किसलिए किया है ?

उत्तर ⇒ कवि रघुवीर सहाय ने अपनी कविता ‘अधिनायक’ के अंतिम पद में कौन-कौन का प्रयोग किया है। यहाँ कवि यह बताना चाहता है कि आज देश में अधिनायकों एवं तानाशाहों की संख्या अनेक है। अनेक बाहुबली आज जनता के भाग्यविधाता बने हुए हैं। इसलिए कविता के अतिम भाग में ‘कौन-कौन’ पुनरुक्ति अलंकार का प्रयोग किया गया।


7. ‘अधिनायक’ कविता का केन्द्रीय भाव क्या है ?

उत्तर ⇒ ‘अधिनायक’ कविता का केन्द्रीय कथ्य भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। यह ऐसी व्यवस्था पर व्यंग्य करता है जो सत्ताधारी वर्ग के राजसी ठाट-बाट, भड़कीले रोब-दाब के साथ अपना गुणगान करवा अपने को ‘अधिनायक’ (तानाशाह) सिद्ध कराना चाहती है।
पाराला पारा ए।


8. रघुवीर सहाय ने हिन्दी के विकास में क्या योगदान किया, प्रकाश डालें ?

उत्तर ⇒ बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध के प्रमुख एवं महत्वपूर्ण कवि पत्रकार के रूप में रघुवीर सहायजी हिन्दी जगत में स्थापित हैं। इन्होंने अनेक काव्य कृतियों, नाट्य कृतियों, निबंध एवं आलोचनात्मक ग्रंथों का सृजन कर हिन्दी साहित्य के विकास में अमूल्य योगदान किया। विश्व साहित्य के नाटकों कहानियों का हिन्दी में अनुवाद कर समृद्ध किया। इनके साहित्यिक एवं पत्रकार व्यक्तित्व से नयी पीढ़ी अधिक प्रभावित हुई है।


9. ‘अधिनायक’ कविता कवि के किस काव्य कृति से संकलित है ? इस कविता की संक्षिप्त टिप्पणी करें।

उत्तर ⇒ रघुवीर सहाय की ‘अधिनायक’ कविता ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ काव्य कृति से लेकर पाठ्यपुस्तक दिगन्त भाग-II में संकलित की गयी है। यह एक व्यंग्य कविता है। आजादी के बाद के सत्ताधारी वर्ग के प्रति रोषपूर्ण एवं तिक्त कटाक्ष है। ‘राष्ट्रीय गान’ में निहित ‘अधिनायक’ शब्द को लेकर यह व्यंग्यात्मक कटाक्ष है। आजादी हासिल होने के इतने वर्षो के बाद भी आम आदमी के हालत में कोई बदलाव नहीं आया। कविता में ‘हरचरना’ इसी आम आदमी का प्रतिनिधि है।


10. अधिनायक कौन है ? उसकी क्या पहचान है ?

उत्तर ⇒ लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ताधारी वर्ग अधिनायक के रूप में है। उनकी राजसी ठाठ-बाठ, भड़कीले रोब-दाब उसकी पहचान है।


11. ‘जय-जय कराना’ का क्या अर्थ है ?

उत्तर ⇒ अपना गुणगान कराना अहम् (1990) का मुख्य हिस्सा है। इससे व्यक्ति में अधिनायकवाद एवं तानाशाही प्रवृति आती है। सत्ताधारी वर्ग की प्रच्छन्न लालसा है कि जनता उसकी जय-जय करे।


12. हरचरना अधिनायक के गुण क्यों गाता है ? इसके डर के क्या कारण हैं ?

उत्तर ⇒ सत्ता प्रतिष्ठान के शोषण के कई रूप हैं, इसी डर से वह अधिनायक का गुण गाता है और शोषण के कई रूप, पूरी तंत्र व्यवस्था ही शोषण में लगी हुई है। यही हरचरना के डर का कारण है।


13. ‘अधिनायक’ शीर्षक कविता का सारांश अपने शब्दों में लिखें।

उत्तर ⇒ ‘अधिनायक’ शीर्षक कविता रघुवीर सहाय द्वारा लिखित एक व्यंग्य कविता है। इसमें आजादी के बाद के सत्ताधारी वर्ग के प्रति रोषपूर्ण कटाक्ष है। राष्ट्रीय गीत में निहित ‘अधिनायक’ शब्द को लेकर यह व्यंग्यात्मक कटाक्ष है। आजादी मिलने के इतने वर्षों के बाद भी आम आदमी की हालत में कोई बदलाव नहीं आया। कविता में ‘हरचरना’ इसी आम आदमी का प्रतिनिधि है।

हरचरना स्कूल जाने वाला एक बदहाल गरीब लड़का है। कवि प्रश्न करता है कि राष्ट्रगीत में वह कौन भारत भाग्य विधाता है जिसका गुणगान पुराने ढंग की ढीली हाली हाफ पैंट पहने हुए गरीब हरचरना गाता है। कवि का कहना है कि राष्ट्रीय त्योहार के दिन झंडा फहराए जाने के जलसे में वह ‘फटा-सुथन्ना’ पहने वही राष्ट्रगान दुहराता है जिसमें इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी न जाने किस ‘अधिनायक’ का गुणगान किया गया है।

कवि प्रश्न करता है कि वह कौन है. जो मखमल, टमटम, वल्लभ तुरही के साथ माथे पर पगडी एवं चँवर के साथ तोपों की सलामी लेकर ढोल बजाकर अपना जय-जयकार करवाता है। अर्थात् सत्ताधारी वर्ग बदले हुए जनतांत्रिक संविधान से चलती इस व्यवस्था में भी राजसी ठाठ-बाट वाले भड़कीले रोब-दाब के साथ इस जलसे में शिरकत कर अपना गुणगान अधिनायक के रूप में करवाये जा रहा हैं।

कवि प्रश्न करता है कि कौन वह सिंहासन (मंच) पर बैठा जिसे दर-दर से नंगे पैर एवं नरकंकाल की भाँति दुबले-पतले लोग आकर उसे (अधिनायक) तमगा एवं माला पहनाते हैं। कौन है वह जन-गण-मन अधिनायक महाबली से डरे हुए लोग से मन के रोग किसका गुणगान बजा बजाकर करते हैं।

इस प्रकार इस कविता में रघुवीर सहाय ने वर्तमान जनप्रतिनिधियों पर व्यंग्य किया है। कविता का निहितार्थ यह है मानो इस सत्ताधारी वर्ग की प्रच्छन्न लालसा ही सचमुच अधिनायक अर्थात् तानाशाह बनने की है।

11. प्यारे नन्हें बेटे को ( लघु उत्तरीय प्रश्न एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्न )

1. बिटिया से क्या सवाल किया गया है ?

उत्तर ⇒ कवि द्वारा बिटिया से सवाल किया जाता है-कहाँ, कहाँ लोहा है ? अर्थात् वह जानना चाहता है कि लोहा कहाँ-कहाँ वर्तमान है।


2. बिटिया कहाँ-कहाँ लोहा पहचान पाती है ?

उत्तर ⇒ बिटिया की समझ (जानकारी) में चिमटा, कलछुल, कढ़ाई, सड़सी, दरवाजे की साँकल (सिकरी), कब्जा, पेंच तथा सिटकिनी आदि में लोहा है। इसके अतिरिक्त सेफ्टी पिन, साईकिल तथा अरगनी के तार में भी वह लोहा पाती है।


3. लोहा क्या है ? इसकी खोज क्यों की जा रही है ?

उत्तर ⇒  हर मेहनतकश आदमी लोहा है। हर बोझ उठाने वाली, अथक परिश्रम करने वाली औरत लोहा है। लोहा शक्ति का प्रतीक है। वह स्वयं भी शक्तिशाली होता है वजनदार होता है तथा मेहनतकश लोगों को भी शक्ति प्रदान करता है। लोहा शक्ति तथा ऊर्जा का प्रतीक है। इसका निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान है। यह निर्माण पारिवारिक, सामाजिक तथा राष्ट्रीय सभी क्षेत्रों में समान रूप से अनवरत चल रहा है।

अत: लोहा की उपयोगिता जो उसकी अपार शक्ति में निहित है, को देखते हुए उसकी खोज की जा रही है।


4. “इस घटना से उस घटना तक”-यहाँ किन घटनाओं की चर्चा है ?

उत्तर ⇒ ‘प्यारे नन्हें बेटे को’ शीर्षक कविता में ‘इस घटना से उस घटना तक’ उक्ति का प्रयोग दो बार किया गया है।

पिता अपनी नन्हीं बिटिया से पूछता है कि आस-पास लोहा कहाँ-कहाँ है। पुनः वह उसे लोहा के विषय में जानकारी देता है, उसकी माँ भी उसे समझाती है। फिर वह सपरिवार लोहा को ढूँढ़ने का विचार करता है। अत: बेटी को सिखलाने से लेकर ढूँढ़ने तक का अन्तराल “इस घटना से उस घटना तक” है। यह सब वह कल्पना के संसार में कर रहा है। पुनः जब उसकी बिटिया बड़ी हो जाती है, तो वह उसके विवाह के विषय में, उसके लिए एक प्यारा-सा दूल्हा के लिए सोंचता है। यहाँ पर पुनः कवि-“इस घटना से उस घटना तक” उक्ति की पुनरोक्ति करता है।


5. कविता में लोहे की पहचान अपने आस-पास में की गई है। बिटिया, कवि और उनकी पत्नी जिन रूपों में इसकी पहचान करते हैं, ये आपके मन में क्या प्रभाव उत्पन्न करते हैं ? बताइए।

उत्तर ⇒ प्रस्तुत कविता में लोहे की पहचान अपने आस-पास में की गई है अर्थात् अपने आस-पास बिखरी वस्तुओं में ही लोहे की पड़ताल की गयी है। पहचान की परिधि में जो वस्तुएँ आई हैं वह तीन क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करती है। लड़की द्वारा पहचान की गई वस्तुएँ पारिवारिक उपयोग की है। जैसे-चिमटा, कलछुल आदि। कवि द्वारा जिन वस्तुओं का चयन किया गया है उनका व्यवहार अधिकतर पुरुषों द्वारा किया जाता है तथा उनका उपयोग सामाजिक तथा राष्ट्रीय हित में किया जाता है, जैसे-फावड़ा, कुदाली आदि। कवि की पत्नी ने उन वस्तुओं का आर संकेत किया है जिसका व्यवहार प्रायः महिलाओं द्वारा किया जाता है तथा जिसे व बाहर धनोपार्जन अथवा पारिवारिक आवश्यकता की पूर्ति हेतु करती है, जैसे-पानी की बाल्टी, हँसिया, चाकू आदि।

इस प्रकार कवि, उनकी पत्नी तथा बिटिया द्वारा तीन विविध रूपों में लोहे की पहचान “ना रूप पारिवारिक, क्षेत्रीय तथा राष्ट्रीय मूल्यों तथा आवश्यकताओं का प्रतिनिधित्व । हो मेहनतकश पुरुषों तथा दबी, सतायी मेहनती महिलाओं के प्रयासों को भी निरूापत करता है


6. मेहनतकश आदमी और दबी-सतायी बोझ उठाने वाली औरत में कवि द्वारा लोहे की खोज का क्या आशय है ?

उत्तर ⇒ लोहा कठोर धातु है। यह शक्ति का प्रतीक भी है। इससे निर्मित असंख्य सामग्रियाँ, मनुष्य के दैनिक जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति करती हैं। लोहा राष्ट्र की जीवनधारा है। धरती के गर्भ में दबे लोहे को अनेक यातनाएँ सहनी होती हैं। बाहर आकर भी उसे कठिन संघर्ष का सामना करना पड़ता है।

कवि मेहनतकश आदमी और दबी-सतायी, बोझ उठाने वाली औरत के जीवन में लोहा के संघर्षमय जीवन की झलक पाता है। उसे एक अपूर्व साम्य का बोध होता है। लोहे के समान ही मेहनतकश आदमी और दबी-सतायी, बोझ उठाने वाली औरत का जीवन भी कठोर एवं संघर्षमय है। लोहे के समान ही वे अपने कठोर श्रम तथा संघर्षमय जीवन द्वारा सृजन तथा निर्माण का कार्य कर रहे हैं तथा विविध रूपों में ढाल रहे हैं।


7. बिटिया को पिता सिखलाते हैं तो माँ समझाती है, ऐसा क्यों ?

उत्तर ⇒ इस कविता में बिटिया को उसके पिता लोहा के विषय में सिखलाते हैं, वे उसकी बुद्धि को परीक्षा लेते हुए उससे पूछते हैं कि उसके आस-पास लोहा कहाँ-कहाँ है। नन्हीं बिटिया आत्मविश्वास के साथ उनके प्रश्नों का उत्तर सहज भाव से देती है। पुनः माँ उससे वही प्रश्न पूछते हुए लोहे के विषय में समझाती है तथा कुछ अन्य जानकारी देती है।

इस प्रसंग में पिता उसे सिखलाते हैं जबकि माँ उसे इस विषय में समझाती है। दोनों की भूमिका में स्पष्ट अन्तर है इसका कारण यह है कि यह प्रायः देखा जाता है कि पिता द्वारा अपने बच्चों को सिखलाया जाता है, किसी कार्य को करने की सीख दी जाती है, अभ्यास कराया जाता है। माँ द्वारा उन्हें स्नेह भाव से किसी कार्य के लिए समझाया जाता है।


8. कवि लोहे की पहचान किस रूप में कराते हैं ? यही पहचान उनकी पत्नी किस रूप में कराती है ? ।

उत्तर ⇒ कवि लोहे की पहचान फावड़ा, कुदाली, टंगिया, बसुला, खुरपी, पास खड़ी बैलगाड़ी के चक्के का पट्टा, बैलों के गले में काँसे की घंटे के अंदर लोहे की गोली के रूप में कराते हैं।

यही पहचान उनकी पत्नी बाल्टी, सामने कुएँ में लगी लोहे की छिरीं, छत्ते की काड़ी-डंडी और घमेला-हँसिया-चाकू और भिलाई बलाडिला के जगह-जगह के लोहे के टीले के रूप में कराती है।

12. हार-जीत प्रश्न ( लघु उत्तरीय प्रश्न एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्न )

1. उत्सव कौन और क्यों मना रहे हैं ?

उत्तर ⇒ तटस्थ प्रजा उत्सव मना रही है। ऐसा राज्यादेश है। प्रजा अंधानुकरण और गैर-जवाबदेही का शिकार है।


2. किसकी विजय हुई सेना की, कि नागरिकों की ? कवि ने यह प्रश्न क्यों खड़ा किया है ? यह विजय किनकी है ? आप क्या सोचते हैं ? बताएँ।

उत्तर ⇒  किसी की विजय नहीं हुई। विजय प्रतिपक्ष की हुई। कवि ने देश की वस्तुस्थिति से अवगत कराया है।

कवि के विचारों पर चिंतन करते हुए यही बात समझ में आती है कि झूठ-मूठ के आश्वासनों एवं भुलावे में हमें रखा गया है। यथार्थ का ज्ञान हमें नहीं कराया जाता। यानि सत्य से दूर रखने का प्रयास शासन की ओर से किया जा रहा है।


3. ‘खेत रहनेवालों की सूची अप्रकाशित है।’ इस पंक्ति के द्वारा कवि ने क्या कहना चाहा है ? कविता में इस पंक्ति की क्या सार्थकता है ? बताइए।

उत्तर ⇒ कवि कहना चाहता है कि खेत रहनेवालों की सूची अप्रकाशित है, यानि आजादी की लडाई में जिन-जिन लोगों ने कुर्बानी दी है उनका सही आकलन एवं मूल्यांकन नहीं किया गया है। शहीदों का पूरा ब्योरेवार इतिहास अभी भी अपूर्ण है। राष्ट्र के लिए जिन राष्टवीरों ने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया आज हम उन्हें भुला बैठे हैं। उनका न उचित सम्मान राष्ट्र की ओर से मिला, न हम याद ही रख पाते हैं। उनके प्रति कृतज्ञ न होकर हम कतघ्न हो गए हैं। इसमें इतिहास की और शहीदों की शहादत की ओर कवि ने सबका ध्यान आकृष्ट किया है।


4. बूढ़ा मशकवाला क्या कहता है और क्यों कहता है ?

उत्तर ⇒  बुढा मशंकवाला प्रतीक प्रयोग है। वह देश के बुद्धिजीवी वर्ग से तात्पर्य रखता है। वह वास्तविक स्थिति से अवगत है। वह कहता है कि किसी की भी जीत नहीं हुई है। सेना विजयी नहीं है बल्कि हारी हुई सेना है। इन पंक्तियों में बूढ़ा मशकवाला देश की जो भयावह स्थिति है, उससे वह अवगत होते हुए सत्य के निकट है। सभी लोग तो धोखा में जी रहे हैं लेकिन मशकवाला यथार्थ का जानकार है। इसलिए वह कहता है कि जीत न शार की, न नागरिक की, न सेना की हुई। ये सारी बातें झूठे प्रचार तंत्र का खेल है। प्रजा के साथ छल है, धोखा है। सबको धोखे में रखा जा रहा है और सत्य को छिपाया जा रहा है।


5. बूढ़ा, मशकवाला किस जिम्मेवारी से मुक्त है ? सोचिए, अगर वह जिम्मेवारी उसे मिलती तो क्या होता ?

उत्तर ⇒ बूढ़ा मशकवाला देश की राजनीति में हिस्सा लेने से वंचित है। अगर उसे जिम्मेवारी मिली होती तो हार को हार कहता जीत नहीं कहता। वह सत्य प्रकट करता। उसे तो मात्र सड़क सींचने का काम सौंपा गया है। यही उसकी जिम्मेवारी है। सत्य लिखने और बोलने की मनाही है। इसलिए वह मौन है और अपनी सीमाओं के भीतर ही जी रहा है। वह विवश है, विकल है फिर भी दूसरे क्षेत्र में दखल नहीं देता केवल सींचने से ही मतलब रखता है। इसमें बौद्धिक वर्ग की विवशता झलकती है। अगर उसे सत्य कहने और लिखने की जिम्मेवारी मिली होती तो राष्ट्र की यह स्थिति नहीं होती तथा झूठी बातों और झूठी शान में जश्न नहीं मनाया जाता। जीवन के हर क्षेत्र में अमन-चैन, शिक्षा-दीक्षा, विकास की धारा बहती। अबोधता और अंधकार में प्रजा विवश बनकर नहीं जीती।


6. नागरिक क्यों व्यस्त हैं ? क्या उनकी व्यस्तता जायज है ?

उत्तर ⇒ नागरिक विजयपर्व मनाने में व्यस्त हैं। उनकी व्यस्तता जायज नहीं है क्योंकि उन्हें यह पता ही नहीं है कि विजय किसकी हुई है। सेना की, शासक की या नागरिकों की। बिना जाने विजयपर्व मनाना अपनी क्षमता का क्षरण करना है।


7. सड़कों को क्यों सींचा जा रहा है ?

उत्तर ⇒ सड़कों को इसलिए सींचा जा रहा है कि राजा अपने छत्र चँवर के साथ गाजे बाजे के साथ आ रहे हैं। कहीं धूल न उड़े इसलिए सड़कों को सींचा जा रहा है।

13. गाँव का घर प्रश्न ( लघु उत्तरीय प्रश्न एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्न )

1. कवि की स्मृति में “घर का चौखट” इतना जीवित क्यों है ?

उत्तर ⇒ कवि की स्मृति में “घर का चौखट” जीवन की ताजगी से लवरेज है। उसे चौखट इतना जीवित इसलिए प्रतीत होता है कि इस चौखट की सीमा पर सदैव चहल-पहल रहती. है। कवि अतीत की अपनी स्मृति के झरोखे से इस हलचल को स्पष्ट रूप से देखता है अर्थात् ऐसा अनुभव करता है, क्योंकि उस चौखट पर बुजुर्गों को घर के अन्दर अपने आने की सूचना के लिए खाँसना पड़ता था तथा उनकी खड़ाऊँ की “खट-पट” की स्वर-लहरी सुनाई पड़ती थी। इसके अतिरिक्त बिना किसी का नाम पुकारे अन्दर आने की सूचना हेतु पुकारना पड़ता था। चौखट के बगल में गेरू से रंगी हुई दीवार थी। ग्वाल दादा (दूध देने वाले) प्रतिदिन आकर दूध की आपूर्ति करते थे। दूध की मात्रा का विवरण दूध से सने अपने अंगूठे की उस दीवार पर छाप द्वारा करते थे, जिनकी गिनती महीने के अंत में दूध का हिसाब करने के लिए की जाती थी। यह गाँवों की पुरानी परिपाटी थी।

उपरोक्त वर्णित उन समस्त औपचारिकताओं के बीच “घर का चौखट” सदैव जाग्रत रहती थी, जीवन्तता का अहसास दिलाती थी।


2. “पंच परमेश्वर” के खो जाने को लेकर कवि चिंतित क्यों है ?

उत्तर ⇒ ‘पंच परमेश्वर’ का अर्थ है-‘पंच’ परमेश्वर का रूप होता है। वस्तुतः पंच के पद पर विराजमान व्यक्ति अपने दायित्व-निर्वाह के प्रति पूर्ण सचेष्ट एवं सतर्क रहता है। वह निष्पक्ष न्याय करता है। उस पर सम्बन्धित व्यक्तियों की पूर्ण आस्था रहती है तथा उसका निर्णय ‘देव वाक्य’ होता है।

कवि यह देखकर खिन्न है कि आधुनिक पंचायती राज व्यवस्था में पंच परमेश्वर की सार्थकता विलुप्त हो गई। एक प्रकार से अन्याय और अनैतिकता ने व्यवस्था को निष्क्रिय कर दिया है, पंगु बना दिया है। पंच परमेश्वर शब्द अपनी सार्थकता खो चुका है। कवि उपरोक्त कारणों से ही चिन्तित है।


3. “कि आवाज भी नहीं आती यहाँ तक, न आवाज की रोशनी न रोशनी की आवाज” यह आवाज क्यों नहीं आती ?

उत्तर ⇒ कवि का इशारा रोशनी के तीव्र प्रकाश में आर्केस्ट्रा के बज रहे संगीत से भी रोशनी की चकाचौंध में बंद कमरे में आर्केस्ट्रा की स्वर-लहरी गूंज रही है, किन्तु कमरा बंद होने के कारण यह बाहर में सुनी नहीं जा सकती। अतः कवि रोशनी तथा आर्केस्ट्रा के संगीत दोनों से वंचित. है। आवाज की रोशनी का संभवतः अर्थ आवाज से मिलनेवाला आनंद है उसी प्रकार रोशनी की आवाज का अर्थ प्रकाश से मिलने वाला सुख इसके अतिरिक्त एक विशेष अर्थ यह भी हो सकता है कि आधुनिक समय की बिजली का आना तथा जाना अनिश्चित और अनियमित है। कवि उसके बने रहने से अधिक “गई रहने वाली” मानते हैं। उसमें लालटेन के समान स्निग्धता तथा सौम्यता की भी उन्हें अनभति नहीं होती। उसी प्रकार आर्केस्ट्रा में उन्हें उस नैसर्गिक आनन्द की प्रतीति नहीं होती जो लोकगीतों बिरहा-आल्हा, चैती तथा होरी आदि गीतों से होती है। कवि संभवतः आर्केस्ट्रा को शोकगीत की संज्ञा देता है। इस प्रकार यह कवितांश द्विअर्थक प्रतीत होता है।


4. आवाज की रोशनी या रोशनी की आवाज का क्या अर्थ है ?

उत्तर ⇒ उपरोक्त उक्ति (कथन) कवि की काव्यगत जादूगरी का उदाहरण है, उनकी वर्णन शैली का उत्कृष्ट प्रमाण है। आवाज की रोशनी से संभवतः उनका अर्थ संगीत से है। संगीत में अभूतपूर्व शक्ति है, ऊर्जा है। वह व्यक्ति के हृदय को अपने मधुर स्वर से आलोकित कर देता है। इस प्रकार वह प्रकाश के समान धवल है तथा उसे रोशन करता है।

रोशनी की आवाज से उनका तात्पर्य प्रकाश की शक्ति तथा स्थायित्व से है। प्रकाश में तीव्रता चाहे जितनी अधिक हो किन्तु यदि उसमें स्थिरता नहीं हो, अनिश्चितता अधिक हो तो वह असविधा एवं संकट का कारण बन जाती है। संभव है कवि का आशय यही रहा हो।

कविता की पूरी पंक्ति है कि आवाज भी नहीं आती यहाँ तक, न आवाज की रोशनी, न रोशनी की आवाज। कवि के कथन की गहराइयों में जाने पर एक अनुमानित अर्थ यह भी . है-दर पर एक बंद कमरे में प्रकाश की चकाचौंध के बीच आर्केस्ट्रा का संगीत ऊँची आवाज
में अपना रंग बिखेर रहा है. किन्तु कमरा बंद होने के कारण अपने संकुचित परिवेश में सीमित श्रोताओं को ही आनंद बिखेर रहा है। उसके बाहर रहकर कवि स्वयं को उसके रसास्वादन (अनुभूति) से वंचित पाता है।


5. सर्कस का प्रकाश बलौआ किन कारणों से भरा होगा ?

उत्तर ⇒ सर्कस में प्रकाश बुलौआ दूर-दराज के क्षेत्रों में रहनेवाले लोगों को अपनी ओर आकृष्ट करता था। उसकी तीव्र-प्रकाश तरंगों से लोगों को सर्कस के आने की सूचना प्राप्त हो जाया करती थी। यह प्रकाश बुलाओ एक प्रकार से दर्शकों को सर्कस में आने का निमंत्रण होता था। इस प्रकार उस क्षेत्र के निवासियों से अच्छी खासी रकम आसानी से सर्कस कम्पनी वाले प्राप्त कर लेते थे। यह सिलसिला एक लम्बे अरसे से चला आ रहा था। अचानक यह बन्द हो गया है। अब सर्कस का प्रकाश बुलौआ लुप्त हो गया है, कहीं गुमनामी में खो गया है। ग्रामीणों की जेब खाली कराने की उसकी रणनीति भी उसके साथ ही बिदा हो गई है। प्रकाश बुलौआ का गायब होना भी रहस्यमय है। संभवतः सरकार को उसकी यह नीति पसंद नहीं आई तथा इसी कारण अपने शासनादेश में प्रकाश बुलौआ पर प्रतिबिंब लगा दिया गया। अब सर्कस इसका (प्रकाश बुलौआ) का सहारा नहीं ले सकता। कवि का कथन “सर्कस का प्रकाश बुलौआ तो कब का मर चुका है” इस परिप्रेक्ष्य में कहा गया लगता है।


6. गाँव के घर की रीढ़ क्यों झुरझुराती है ?

उत्तर ⇒ कवि ने गाँवों की वर्तमान स्थिति का वर्णन करने के क्रम में उपरोक्त बातें कही हैं। हमारे गाँवों की अतीत में गौरवशाली परंपरा रही है।
सौहार्द, बंधुत्व एवं करुणा की अमृतमयी धारा यहाँ प्रवाहित होती थी। दुर्भाग्य से आज वही गाँव जड़ता एवं निष्क्रियता के शिकार हो गए हैं। इनकी वर्तमान स्थिति अत्यन्त दयनीय हो गई है। अशिक्षा एवं अंधविश्वास के कारण परस्पर विवाद में उलझे हए तथा स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से त्रस्त हैं। शहर के अस्पताल एवं अदालतें इसकी साक्षी हैं। इसी संदर्भ में कवि विचलित होते हुए अपने विचार प्रकट करते हैं

“लीलने वाले मुँह खोले शहर में बुलाते हैं बस
अदालतों और अस्पतालों के फैले-फैले भी रुंधते-गंधाते अमित्र परिवार”

कवि के कहने का आशय यह प्रतीत होता है कि शहर के अस्पतालों में गाँव के लोग रोगमुक्त होने के लिए इलाज कराने आते हैं। इसी प्रकार अदालतों में आपसी विवाद में उलझकर अपने मुकदमों के संबंध में आते हैं। ऐसा लगता है कि इन निरीह ग्रामीणों को निगल जाने के लिए नगरों के अस्पतालों तथा अदालतों का शत्रुवत परिसर मुँह खोल कर खड़ा है। इसका परिणाम ग्रामीण जनता की त्रासदी है। गाँव के लोगों की आर्थिक तथा सामाजिक स्थिति चरमरा गई है। अतः उनके घरों की दशा दयनीय हो गई है।

कवि ने संभवतः इसी संदर्भ में कहा है कि जिन बुलौओं से गाँव के घर की रीढ़ झुरझुराती है अर्थात् शहर के अस्पतालों तथा अदालतों द्वारा वहाँ आने का न्यौता देने से उन गाँवों की रीढ़ झुरझुराती है। कवि की अपने अनुभव के आधार पर ऐसी मान्यता है कि गाँववालों का अदालतों तथा अस्पतालों का अपनी समस्या के समाधान में चक्कर लगाना दु:खद है। इसके कारण गाँव के घर की रीढ़ झुरझुरा गई है। गाँव में रहने वालों की स्थिति जीर्ण-शीर्ण हो गई है।


7. कविता में कवि की कई स्मृतियाँ दर्ज हैं। स्मृतियों का हमारे लिए क्या महत्व होता है, इस विषय पर अपने विचार विस्तार से लिखें।

उत्तर ⇒ “गाँव का घर’ शीर्षक कविता में कवि के जीवन की कई स्मृतियाँ दर्ज हैं। अपनी कविता के माध्यम से कवि उन स्मृतियों में खो जाता है। बचपन में गाँव का वह घर, घर की परंपरा, ग्रामीण जीवन-शैली तथा उसके विविध रंग, इन सब तथ्यों को युक्तियुक्त ढंग से इस कविता में दर्शाया गया है।

वस्तुतः स्मृतियों का हमारे जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है। स्मृतियों के द्वारा हम आत्मनिरीक्षण करते हैं तथा वे अन्य व्यक्तियों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत होती हैं। इसके द्वारा हमें अपने जीवन की कतिपय विसंगतियों से स्वयं को मुक्त करने का अवसर मिलता है। बाल्यावस्था की अनेक भूलें हमारे भविष्य को बुरी तरह प्रभावित करती है। अपने जीवन के उषाकाल में उपजी कुप्रवृत्तियाँ हमारी दिशा तथा दशा दोनों ही बुरी तरह प्रभावित करती हैं।


8. कविता में किस शोकगीत की चर्चा है ?

उत्तर ⇒ नवपूँजीवाद आर्थिक उदारीकरण के युग बदलाव का युग आ जाने के कारण कवि के यहाँ जो लोकगीत की धुनें सुनाई पड़ती थी वह अब सुनाई नहीं देती जिसके कारण जन्मभूमि के छूटने का मोह, उसके बदलने का मोह शोकगीत में बदल जाता है। कविता में इसी शोकगीत की चर्चा है जो आज न गाया जानेवाला अनसुना है।

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examunlocker@gmail.com

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