If You Sell A Product, Use Online Marketing, Part 2

After all, im alone isn’t enough to build solid relationships. Plan can vary greatly with regards to the information want. Primary disadvantage of hand tweezing is period required. In this rapidly …

In Order To Look For Simple Payday Loan Companies

Consumerism generated by money advanced often through false financial statements, commercial and personal. Payday loan companies make life a little easier through the use of easy funds. A payday advance is …

The Benefits of Implementing a Virtual Info Room

A electronic data space is a cloud-based storage formula for a wide variety of files. This forms a great essential part of a complex work flow. This system permits workers to …

How to pick a Data Room Solution

If you’re considering setting up a info room within your business, you’ll likely be interested in the many benefits of by using a secure info room formula. These solutions offer a …

Tips on how to Select the Greatest Due Diligence Equipment

Due diligence studies a key aspect in risk minimization. A good program will help you collect information from a variety of resources, such as videos, websites, and calamite. Open up web …

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर Home Science Part – 1 (20 Marks)


1. गृह विज्ञान शिक्षा से लाभ क्या है ?

(What are the benefits of Home science ?)

उत्तर⇒ गृह विज्ञान विषय में आहार एवं पोषण, स्वास्थ्य, सफाई व शिशु कल्याण आदि का वैज्ञानिक ज्ञान दिया जाता है जिससे वह व्यक्ति प्रतिदिन के प्रत्येक कार्य को वैज्ञानिक रूप से कर सकते हैं।


2. गृह विज्ञान का महत्त्व बताइए।

(Describe the importance of home science.)

उत्तर⇒ गृह विज्ञान का महत्त्व इस प्रकार है

(i) गृह संबंधी कार्यों की समुचित जानकारी प्राप्त होती है।
(ii) बच्चों एवं पारिवारिक सदस्यों की देखभाल की जानकारी प्राप्त होती है।
(iii) सिलाई, गृह विज्ञान, गृह वाटिका आदि की जानकारी प्राप्त होती है।


3. गृह-प्रबंध से आप क्या समझती हैं ?

(What do you mean by Home Management ?)

उत्तर⇒ गृह-प्रबंध- साधारण शब्दों में प्रबंध एक साधन है। हमारे पास जिस परिस्थिति में जो भी साधन उपलब्ध रहते हैं उसका सर्वोत्तम उपयोग करें जिससे हमारी इच्छाएँ और उद्देश्य पूरा हो सके। परिवार के लक्ष्यों को प्राप्त करने के उद्देश्य से परिवार के साधनों के प्रयोग के लिए किया गया आयोजन नियंत्रण एवं मूल्यांकन ही गृह प्रबंध है।


4. पीयूष ग्रंथि

(Pituitary Gland)

उत्तर⇒ पीयूष ग्रंथि एक अंतःस्रावी ग्रंथि है, जिसका आकार एक मटर के दाने जैसा होता है। इससे पैदा होने वाला हार्मोन अन्य अंतःस्रावी ग्रंथियों की सक्रियता को उत्तेजित करता है। इसे मास्टर ग्रंथि भी कहते हैं। पीयूष विकार होने का मतलब है हार्मोन्स का बहुत अधिक या कम हो जाना।


5. मासिक धर्म  (Menstruation)

उत्तर⇒ मासिक धर्म लड़कियों/ स्त्रियों को हर महीने योनि से होने वाले लाल रंग के स्राव को कहते हैं। 10 से 15 साल की आयु की लड़की का अंडाशय हर महीने एक विकसित अंडा उत्पन्न करना शुरू करता है। यह अंडा डिंबवाही नली द्वारा गर्भाशय में पहुँचता है। यदि इस डिम्ब का पुरुष के शुक्राणु से सम्मिलिन न हो तो स्राव बन जाता है, जो योनि से निष्कासित हो जाता है। इसी स्राव को मासिक धर्म या रजोधर्म या माहवारी कहते हैं। यह महीने में एक बार होता है।


6. गर्भाशय  (Uterus)

उत्तर⇒ गर्भाशय लगभग नाशपाति के आकार की श्लेष्मिक कला और माँसपेशी की बनी एक खोखला थैला है जो श्रोणि के भीतर स्थित रहती है। इसके सामने मूत्राशय और पीछे मलाशय रहता है। गर्भाशय के दाएँ और बाएँ कोण पर डिम्बवाहिनी नली खुलती है। नीचे की ओर की ग्रीवा योनि के मुख में खुलती है। इस तरह गर्भाशय में दो छिद्र एक ऊपर तथा एक नीचे होता है। गर्भाशय में ही निषेचित डिम्ब का विकास होता है।


7. कान (Ear)

उत्तर⇒ कान पाँच ज्ञानेन्द्रियों में से एक है। इससे ध्वनि या बोले हुए शब्दों का बोध होता है। ध्वनि के द्वारा एक व्यक्ति का अन्य लोगों से सम्पर्क एवं सम्बन्ध स्थापित होता है। रचना की दृष्टि से कान को तीन प्रमुख भागों में बाँटा गया है-

(i) बाह्य कर्ण
(ii) मध्य कर्ण
(iii) अंतः कर्ण।


8. जीभ (Tongue)

उत्तर⇒ जीभ से स्वाद की अनभति होती है। जीभ एक मांसल अवयव है जो मुखगुहा के नीचले तल में जबड़े और ‘हाइड’ नामक अस्थि से लगा है जिसका रंग गुलाबी होता है। यह भोजन को मुख में इधर-उधर घुमाने, चबाने एवं निगलने में सहायक होता है। इससे वस्तु गर्म है या डा, एवं स्वाद का ज्ञान होता है। जीभ के अगले भाग से मिठास, पीछे के भाग से तीखापन तथा दोनों किनारे वाले भाग से खट्टेपन का ज्ञान होता है।


9. बाल्यावस्था के विभिन्न रोगों के नाम। (Names of Childhood disease.)

उत्तर⇒ बाल्यावस्था के विभिन्न रोग हैं

(i) अतिसार,
(ii) खसरा,
(iii) हैजा,
(iv) गलसुआ,
(v) सर्दी जुकाम,
(vi) न्यूमोनिया,
(vii) कान दर्द,
(viii) आँख दुखना,
(ix) गोलकृमि आदि।


10. निमोनिया (Pneumonia)

उत्तर⇒ निमोनिया शिशुओं को फेफड़ों की वायु कोशिकाओं तथा श्वास नली में संक्रमण के कारण उत्पन्न होता है। यह कोकस (cocus) नामक जीवाणुओं के कारण होता है। इससे बचने के लिए बच्चों को ठंड के दिनों में उपयुक्त कपड़े पहनाने चाहिए।


11. विकलांगता क्या है ? (What is disabiliry?)

उत्तर-विकलांगता वह है जो किसी क्षति अथवा अक्षमता से किसी व्यक्ति की होने वाला । वह नुकसान जो उसे उसकी आयु, लिंग, सामाजिक तथा सांस्कृतिक कारकों से जुड़ी सामान्य भूमिका को निभाने से रोकता है।


12. तीक्ष्ण अतिसार एवं दीर्घकालिक अतिसार

(Acute Diarrhoea and chronic Diarrhea)

उत्तर⇒ (i) तीक्ष्ण अतिसार (अत्यधिक अतिसार)- यह थोड़े समय के लिए परंतु बहुत गंभीर रूप से होता है। 24-48 घंटे तक रहने वाला यह अतिसार अस्वच्छ, गले-सड़े और बासी भोजन से होता है। अत्यधिक अतिसार में रोगी को ज्वर, पेट में दर्द व पतले दस्त आते हैं। इसका प्रभाव एक से दो दिन तक रहता है।

(ii) दीर्घकालिन अतिसार- दीर्घकालीन अतिसार अधिक समय तक रहता है। जब रोगी की किसी बीमारी के कारण आँतों की अवशोषण शक्ति कमजोर हो जाती है तब यह रोग हो जाती है। इसमें इलैक्ट्रोलाइट असंतुलन के साथ-साथ पाचन तथा जठर संक्रमण भी हो सकता है। मल के साथ रक्त भी आता है।


13. डिप्थीरिया रोग (Diphtheria disease)

उत्तर⇒ डिप्थीरिया अत्यंत भयानक संक्रमण रोग है जो कोरीने बैक्टीरियम डिफ्थीरिए । (Coryne Bacterium Diptherae) नामक जीवाणु के कारण होता है। यह जीवाणु शरीर में प्रवेश करके गले में पनपते हैं और बच्चे में रोग के लक्षण उत्पन्न करते हैं।


14. चेचक (Chicken pox)

उत्तर⇒ चेचक वायु के माध्यम से होने वाला एक रोग है। चेचक से मानव जाति को मुक्त कराने का श्रेय एडवर्ड जैनर को जाता हैं जिसने चेचक के टीके का आविष्कार किया था।


15. पोलियो (ओ पी वी) (Polio (OPV))

उत्तर⇒ सबीन (Sabin) द्वारा विकसित मौखिक पोलियो विषाणु टीका पोलियो तथा लकवा की रोकथाम के लिए विश्वभर में प्रयोग किया जाता है। ओपीवी की एक खुराक में 10 से 106 तक माध्यिका अणु होते हैं। यह दवा तीन प्रकार से तरल रूप में पिलाई जाती है। पहली खुराक जन्म के समय दी जाती हैं। दूसरी तथा तीसरी खुराक प्रति 4 से 8 सप्ताह के अंतराल पर दी जाती है।


16. ज्वर (Fever)

उत्तर⇒ जब किसी व्यक्ति में शरीर से उत्पन्न तथा निष्कासित ताप में संतुलन नहीं रहता तथा ताप सामान्य से अधिक हो जाता हैं तो ऐसी स्थिति को ज्वर कहते हैं। मानव शरीर का सामान्य ताप 37° सेन्टीग्रेट (98.6 फॉरेनहाइट) होता है। एक व्यक्ति को ज्वर कई कारणों जैसे- संक्रमण, कीड़ों के कारण, प्रतिरोध, मध्यस्थता, दुर्भावनापूर्ण तथा नशे आदि से आ सकता है।


17. स्थायी दाँत। (Permanant teeth)

उत्तर⇒ बालक में अस्थायी 20 दाँत निकलने के बाद स्थायी दाँत निकलता है। जब ये अस्थायी दाँत टूटते हैं उनकी जगह स्थायी दाँत निकलते हैं। ये दाँत छ: वर्ष से निकलना प्रारंभ होते हैं। स्थायी दाँत 25 वर्ष की आयु तक निकलने जारी रहते हैं।


18. क्षय रोग/ तपेदिक/ टी०बी० (Tuberculosis)

उत्तर⇒ इस रोग को टी० बी०, तपेदिक या ट्यूबरकुलोसिस भी कहा जाता है। यह रोग वायु के द्वारा फैलता है। इस रोग को फैलाने वाले जीवाणु का नाम ट्यूबर्किल बेसिलस (Tubercle Bacillus) है। यह रोग शरीर के विभिन्न भागों में हो सकता है। जैसे—फेफड़ों का तपेदिक, आँतों का तपेदिक, ग्रंथियों का तपेदिक, रीढ़ की हड्डी का तपेदिक। इसमें से फेफड़ों का तपेदिक सबसे अधिक फैलता है। यह रोग मनुष्यों के अतिरिक्त जानवरों में भी हो सकता है।


19. टेटनस रोग क्या है ? (What is disease of Tetanus ?)

उत्तर⇒ यह रोग अधिकतर जंग लगे धातु के टुकड़ों पर गिरकर चोट लगने के कारण होता है। धूल, मिट्टी के साथ भी टेटनस के जीवाणु चिपक जाते हैं। यदि रोगी को तत्काल टेटनस का इंजेक्शन न लगाया जाय तो यह रोग हो जाता है। इस रोग के जीवाणु मांसपेशियों को अधिक प्रभावित करते हैं।


20. अतिसार (Diarrhoea)

उत्तर⇒ अतिसार- जब बच्चा दूध हजम नहीं कर पाता है तो उसके पेट में दर्द होता है और दस्त प्रारम्भ हो जाता है। साथ ही उसके पेट दर्द के साथ फूल जाता है। पेट एवं पैरों में ऐठन भी होने लगता है। वह बार-बार टाँगों को पेट की तरफ मोड़ता है। जिसे अतिसार कहते हैं। यह दूध पीने वाले बोतलों या निप्पल की ठीक से सफाई नहीं करने के कारण तथा माँ के भोजन में गड़बड़ी या बदलाव (अधिक मिर्च एवं मसालेदार भोजन) द्वारा उत्पन्न होता है।


21. ग्रामीण स्वच्छता (Rural Sanitation)

उत्तर⇒ ग्रामीण स्वच्छता से तात्पर्य है ग्रामीण क्षेत्रों में तरल एवं ठोस अपशिष्ट निपटान, व्यक्तिगत एवं भोजन सम्बन्धी स्वच्छता, घरेलू एवं पर्यावरणीय स्वच्छता। इन सभी का मिलाजुला प्रयास ग्रामीणों के स्वस्थ रहने में सहायक होता है। ग्रामीण स्वच्छता के लिए आवश्यक है- स्वस्थ निवास स्थान, शुद्ध पेयजल, मल-मूत्र एवं कूड़े का उचित निवारण, गंदे पानी का निकास, भोजन संबंधी स्वच्छता का उचित ज्ञान आदि।


22. पर्यावरण (Environment)

उत्तर⇒ वायुमंडल, जलमंडल, प्राणिमंडल में अवस्थित क्रमशः भूमि, वायु, जल और इन पर आश्रित समस्त प्राणियों के लिए एक वातावरण तैयार होता है। इसी वातावरण के सामूहिक रूप को पर्यावरण कहते हैं।


23. अपमिश्रित भोजन (Food adulteration)

उत्तर⇒ मिलावट अथवा अपमिश्रण एक ऐसी प्रक्रिया हैं जिसके द्वारा खाद्य पदार्थों के गण पोषकता अथवा प्रकृति में परिवर्तन आ जाता है। यह परिवर्तन खाद्य पदार्थ में कोई अन्य मिलता-जुलता पदार्थ मिलाने अथवा खाद्य पदार्थ में से कोई तत्त्व निकालने के कारण आता है।


24. बी० सी० जी० (B.C.G.)

उत्तर⇒ बी० सी० जी० का पूरा नाम बैसिलस कामेट ग्यूरिन हैं। बी०सी०जी० का टीका तपेदिक अथवा क्षय रोग का निवारण करता है। सभी नवजात शिशुओं को जन्म के तत्काल बाद से एक माह तक बी०सी०जी० का टीका लगाया जाता है।


25. फफूंदी (Mildew)

उत्तर⇒ ♦ फफूंदी एक प्रकार के सूक्ष्मजीवाणु होता है, जिसका अनाजों को बर्बाद करने वाले सभी सूक्ष्मजीवों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्थान है।

♦  फफूंदी लग जाने से भोज्य पदार्थों का तापमान बढ़ जाता है। उनमें से बदबू आने लगती हैं। पोषक मूल्य कम हो      जाते हैं। स्वाद बिगड़ जाता है। भोजन जहरीला एवं विषाक्त हो जाता है।

♦  पनीर, फल, डबलरोटी तथा जैम आदि में फफूंदी कोमल आवरण के रूप में जम जाती है।

♦  सभी प्रकार की फफूंदी हानिकारक नहीं होती है। कुछ भोज्य पदार्थों के स्वाद में वृद्धि भी करती हैं।


26. बिम्बाणु (Platelets)

उत्तर⇒ प्लेटलेट्स छोटी रक्त कोशिका होती है जो शरीर के रक्त स्त्राव को रोकने के लिए थक्के बनाने में मदद करती है। प्लेटलेट्स कुछ लसीले होते हैं इसलिए कही कट जाने पर ये अधिक संख्या में इक्कठे होकर आपस में चिपक जाते हैं और कटे स्थान को भर देते हैं, जिससे रक्त स्त्राव बंद हो जाता है। सामान्य प्लेटलेट्स काउंट 1,50,000 से 4,50,000 प्रति मोइक्रोलीटर रक्त होता है।


27. पाचन तंत्र (Digestive System)

उत्तर⇒ मानव पाचन तंत्र जठरांत्र सम्बंधी मार्ग से बना होता है। जिसे जी०आई० ट्रेक्ट (GI Tract) या पाचनतंत्र कहा जाता है। पाचन तंत्र के सहायक अंग हैं। यकृत, अग्नाशय और पिताशय। जी० आई० ट्रैक्ट अंगों की एक श्रृंखला है जो मुँह से गुदा तक एक लम्बी नली के रूप में होती है। पाचन में भोजन के टूटने को छोटे घटकों में शामिल किया जाता है जब तक वह शरीर में अवशोषित नहीं हो जाता है।


28. गलशोध (Mumps)

उत्तर⇒ गलशोध एक संक्रमण रोग है जो अति सूक्ष्म जीवाणु “पारा मैक्सोवाइरस” (Paramaxovirus) के कारण होता है। यह एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में लार, नाक स्राव और व्यक्तिगत सम्पर्क से हो जाता है। इस रोग में कान के नीचे दर्द होने लगता है और गाल में सूजन हो जाती है। रोगी को मुँह खोलने और खाने में दर्द होता है।


29. परावट ग्रंथियाँ (Parathyraid glands)

उत्तर⇒ परावट ग्रंथियाँ छोटी-छोटी चार होती है। ये थाइराइड की ऊपरी और निचले किनार के पीछे दाहिनी और बायी ओर स्थित रहती है। आकार में यह मटर के दाने के समान होती है। ये ग्रंथियों ग्रंथीय ऊतक की बनी होती है। एक तरफ की दो ग्रंथियाँ अवटु ग्रंथि (Thyroid gland) में एक ऊपर और एक नीचे की ओर रहती है। इसका रंग भूरापन लिए लाल होता है।


30. थाइमस ग्रंथि (Thymus gland)

उत्तर⇒ यह ग्रंथि अवटु ग्रंथि (Thyroid glands) के नीचे और श्वास प्रणाली के अग्रभाग में रहती है। बाल्यकाल में ग्रंथि का आकार बड़ा रहता है जो आयु बढ़ने के साथ-साथ छोटा हो जाता है। इस ग्रंथि के स्राव का प्रभाव जननेन्द्रियों के विकास तथा यौवनारंभ पर पड़ता है। इस ग्रंथि के स्राव के द्वारा ही अस्थियों में खनिज लवण एकत्र होता है और इसकी मात्रा संतुलित रहती है।


लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर Home Science Part – 2 (20 Marks)


31. रजोनिवृत्ति (Menopause)

उत्तर⇒ रजोनिवृत्ति काल प्रायः स्त्रियों में 40 वर्ष के बाद ही होता है। इस अवस्था में स्तन के ऊतक ढीले हो जाते हैं, डिम्बग्रंथियों (overies) में जराकालीन परिवर्तन (Senile changes) आ जाता है, वह छोटा हो जाता है और उससे रक्त स्राव होना बंद हो जाता है।


32. विभिन्न प्रकार की असमर्थता/विकलांगता बताइए।

(Describe the different types of disability/handicap.)

उत्तर⇒ विकलांगता शारीरिक, वाणी दोष तथा तंत्रिकीय दोष संबंधी होता है

(i) अपंगता, (ii) दृष्टि क्षति, (iii) श्रवण शक्ति में क्षति, (iv) हकलाने या दोषमुक्त वाणी वाले बालक तथा (v) मानसिक न्यूनता।


33. बच्चों में विकलांगता के कारण।

(Reasons of disability among children.)

उत्तर⇒ शारीरिक विकलांगता/असमर्थता के निम्नलिखित कारण हैं-

(i) वंशानुक्रम
(ii) माता-पिता का अरुचिपूर्ण व्यवहार
(iii) जन्म के समय चोट लगना
(iv) शैशव काल में किसी दुर्घटना के कारण हड्डियों की समस्या
(v) शल्य चिकित्सा के कारण शरीर के किसी अंग का कटना
(vi) मानसिक तथा भावात्मक तनाव के कारण हकलाना और वाणी संबंधी दोष
(vii) कान में किसी संक्रमण अथवा दुर्घटना के कारण सुनने में दोष।


34. शारीरिक एवं मानसिक अक्षमता से युक्त बालक

(Physically handicapped and mentally handicapped children.)

उत्तर⇒ शारीरिक अक्षमता से युक्त बालक-ऐसे बालक जिनमें कोई शारीरिक दोष होता हैं और यह दोष उन्हें सामान्य क्रियाओं में भाग लेने से रोकता हैं, उन्हें शारीरिक रूप से अक्षम बालक कहते हैं। जैसे- अंधता, अपंगता, गंगापन, बहरापन आदि शारीरिक अक्षमता के अंतर्गत आते हैं।

मानसिक अक्षमता से युक्त बालक- ऐसे बालक जिनका मानसिक विकास किन्हीं कारणों से सामान्य बालकों की तरह नहीं हो पाता या सीमित रह जाता हैं, जो उन्हें सामान्य क्रियाओं में भाग लेने से रोकता है, उन्हें मानसिक अक्षमता से युक्त बालक कहते हैं।


35. प्राकृतिक या जन्मजात रोधक्षमता (Natural Immunity.)

उत्तर⇒ प्राकृतिक रोधक्षमता को प्राकृतिक रोगप्रतिरोधक क्षमता भी कहते हैं। यह क्षमता शरीर में प्राकृतिक रूप से पाये जाने वाले विरोधी तत्त्वों के कारण होती है। शरीर में रोग प्रतिरोधी तत्त्व निम्नलिखित कार्य करते हैं

(i) रोगाणुओं का शरीर में प्रवेश रोकते हैं।
(ii) यदि रोगाणु शरीर में प्रवेश हो जाय तो उनसे संघर्ष करते हैं।
(iii) रोगाणुओं को नष्ट कर देते हैं जिससे वह रोग के बाहय लक्षणों को प्रकट न कर सके।


36. मंदबुद्धि बालक (Mentally retarded children.)

उत्तर⇒ इस प्रकार के बालकों में सीमित मानसिक विकास पाया जाता है। यह बालक प्रशिक्षण द्वारा पूर्णतया ठीक नहीं किये जा सकते हैं। इनको विशेष रूप से बनाये गये मंद बुद्धि विद्यालयों म शिक्षा देनी चाहिए। ऐसे बालकों के लिए प्रशिक्षित शिक्षक तथा विशिष्ट कार्यक्रमों का किया जा सकता है। सामान्य बालकों के विद्यालय में विशिष्ट कक्षाएँ खोलकर भी इनको प्रशिक्षित किया जा सकता है।


37. मंदबुद्धि बालक की क्या आवश्यकताएँ हैं ?

(What are the needs of imbecile child ?)

उत्तर⇒ मंदबुद्धि बालक की निम्नलिखित आवश्यकताएँ हैं

(i) इनकी शिक्षा विशेष मंदबुद्धि विद्यालय में करायी जाती है।
(ii) इनकी शिक्षा का प्रबंध सामान्य स्कूलों में होती है ।
(iii) इसके लिए प्रशिक्षित शिक्षक एवं विशिष्ट कार्यक्रमों का प्रबंध किया जाता है।


38. प्रतिभाशाली बालक (Gified children)

उत्तर⇒ इन बालकों की बौद्धिक क्षमताएँ सर्वोत्तम होती है। ये बालक देश तथा समाज के प्रत्येक क्षेत्र में पाये जाते हैं। ये विशिष्ट बालक होते हैं परंतु सामान्य बालकों से पृथक आवश्यकताएँ रखते हैं। इन बालकों का समायोजन सामान्य बालकों के साथ नहीं हो पाता है।


39. वैकल्पिक शिशुपालन का क्या अर्थ है ?

(What is meaning of substitute child care ?)

उत्तर⇒ माता-पिता अथवा माता की अनुपस्थिति में बच्चे की मूल जरूरतों को पूरा करने के लिए उसकी देखभाल करना है। उसकी देखभाल या पालन की सुविधा घर में (भाई-बहन तथा संबंधियों द्वारा) व घर के बाहर क्रेच व डे केयर केन्द्रों (Day care centres) दोनों जगह प्राप्त हो सकती हैं।


40. बाल अपराध में बालक का व्यवहार क्या है?

(What is child behaviour in child crime ?)

उत्तर⇒ जो बालक समाज द्वारा तथा कानून द्वारा बनाये गए नियमों की अवहेलना करते हैं और एक निश्चित आयु से कम आयु वर्ग के होते हैं। बाल अपराधी कहलाते हैं। बाल-अपराध में बालकों का निम्नलिखित व्यवहार सम्मिलित होता हैं

(i) अवज्ञा,
(ii) चोरी,
(iii) मारपीट,
(iv) यौन अपराध,
(v) आत्महत्या,
(vi) झूठ बोलना,
(vii) मद्यपान,
(viii) हड़ताल करना,
(ix) विद्यालय से भागना,
(x) धोखा देना,
(xi) बेईमानी करना,
(xii) आवारागर्दी,
(xiii) तोड़फोड़ करना,
(xiv) कक्षा में हँसना और सीटी बजाना इत्यादि।


41. सुपोषण एवं कुपोषण में अंतर स्पष्ट कीजिए।

(Differentiate between good Nutrition and malnutrition.)

उत्तर⇒  सपोषण- जब भोजन द्वारा मनुष्य को अपनी आवश्यकतानुसार सभी पोषक तत्त्व उचित मात्रा में मिलते हैं तो ऐसी स्थिति को सुपोषण या उत्तम पोषण की स्थिति कहते हैं। उत्तम पोषण द्वारा ही व्यक्ति उत्तम स्वास्थ्य ग्रहण करता है।

कुपोषण- कुपोषण का शाब्दिक अर्थ हैं “अव्यवस्थित पोषण”। जब मनुष्य को इसकी शारीरिक आवश्यकताओं के अनुकूल उपयुक्त मात्रा में सभी पौष्टिक तत्त्व नहीं मिलते या आवश्यकता से अधिक मिलते हैं तो उसे कुपोषण कहते हैं। कपोषण के कारण मनुष्य के शरार की वृद्धि, विकास एवं कार्य पर कुप्रभाव पड़ता है।


42. पूर्ण पोषक तत्त्व एवं सूक्ष्म पोषक तत्त्व

(Macronutrients and Micronutrients)

उत्तर⇒ पूर्ण पोषक तत्त्व- शरीर द्वारा बड़ी मात्रा में आवश्यक पोषक तत्त्व। जैसे- कार्बोहाइड्रेट्स, वसा तथा प्रोटीन।
सूक्ष्म पोषक तत्त्व- शरीर द्वारा छोटी मात्रा में आवश्यक पोषक तत्त्व। जैसे- विटामिन तथा खनिज लवण।


43. अतिपोषण से क्या समझते हैं ?

(What do you understand by over nutrition ?)

उत्तर⇒ अत्यधिक आहार ग्रहण करने की पोषण की वह अवस्था है जिसमें मोटापा हो जाता है, उच्च रक्तचाप, पथरी तथा हृदय संबंधी अन्य रोग हो जाते हैं। अतिपोषण कहलाती है। यहाँ तक कि आयोडीन व लौह तत्त्व अधिक मात्रा में लेने से एकसोपथैलमिया तथा हाइपरसाईथिमिया हो जाता है। अतिपोषण के कारण निम्नलिखित हैं-

(i) अधिक भोजन ग्रहण करना,
(ii) उच्च आर्थिक स्तर,
(iii) खाने की त्रुटिपूर्ण आदतों का होना।


44. पोषक तत्त्व क्या है ? इसके क्या कार्य हैं ?

(What is Nutrient Element ? What are its functions ?)

उत्तर⇒ पोषक तत्त्व- तत्त्व, जो हमारे शरीर की आवश्यकताओं के अनुरूप पोषण प्रदान करते हैं अर्थात् अपेक्षित रासायनिक ऊर्जा देते हैं उसे पोषक तत्त्व कहते हैं।

प्रमुख पोषक तत्त्व निम्नलिखित हैं-

(i) कार्बोहाइड्रेट- यह शरीर को ऊर्जा प्रदान करता है।
(ii) प्रोटीन- यह शरीर की वृद्धि करता है।
(iii) वसा- इससे शरीर को तीन प्रकार के अम्ल प्राप्त होते हैं।

(i) लिनोलीन, (ii) लिनोलोनिक तथा (iii) अरकिडोनिक। शरीर में घुलनशील विटामिनों के अवशोषण के लिए इसकी उपस्थिति आवश्यक है।

(iv) कैल्शियम- यह अस्थि के विकास एवं मजबूती के लिए आवश्यक है।
(v) फॉस्फोरस- यह भी अस्थि के विकास के लिए आवश्यक है।
(vi) लोहा- यह शरीर की रक्त-अल्पता, हिमोग्लोबिन और लाल रक्तकण प्रदान कर दूर करता है। गर्भावस्था एवं स्तनपान कराने वाली महिलाओं के लिए अति आवश्यक है।
(vii) विटामिन- यह दो प्रकार के होते हैं (i) जल में घुलनशील विटामिन, जैसे- विटामिन-B, विटामिन-C तथा (ii) वसा में घुलनशील विटामिन जैसे- विटामिन-A, विटामिन-D, विटामिन-E, विटामिन-K। यह शरीर के लिए अति आवश्यक है।

यह कई रोगों से बचाता है।


45. सुपोषण किसे कहते हैं ?

(What do you understand by good nutrition ?)

उत्तर⇒ सुपोषण के अंतर्गत वैसे भोज्य पदार्थ ग्रहण किये जाते हैं जिनमें सभी पौष्टिक तत्त्व शरीर की आवश्यकतानुसार उचित अनुपात एवं मात्रा में मौजूद होते हैं। सुपोषण में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा, विटामिन, खनिज लवण तथा जल आवश्यक होते हैं। इस प्रकार के भोजन से भी क्रियाओं को समुचित संचालन की क्षमता रहती है। शरीर की सभी कोशिकाओं का पोषण होता है। रोग-निरोधन क्षमता बढ़ती है।


46. स्तनपान क्यों जरूरी है ?

(Why does breast feeding essential ?)

उत्तर⇒ शिशुओं के लिए निम्नलिखित कारणों के कारण माँ का स्तनपान जरूरी है-

(i) माँ के दूध में सभी पोषक तत्त्व उपस्थित होते हैं तथा
(ii) माँ का दूध शुद्ध, स्वच्छ तथा प्रतिद्रव्य यक्त होने के साथ-साथ रोगाणुओं की प्रतिकारिता होती है।


47. स्तनपान के चार लाभ लिखिए।

(Write the four advantages of breast feeding.)

उत्तर⇒ स्तनपान से लाभ निम्न हैं

(i) माता के दूध में लैक्टोएल्बयुयमिन नामक प्रोटीन होता है जो कैसीन की अपेक्षा अधि क सुपाच्य होता है।
(ii) माता के दूध में बाह्य कीटाणुओं के प्रवेश की गुंजाइश नहीं होती।
(iii) क्लोस्ट्रम (माँ के स्तन से निकला पहला दूध) में एंटीबाडी होती है जो प्रतिरक्षा उत्पन्न करता है।
(iv) माता का दूध सामान्य तापक्रम पर उपलब्ध होता है। इसे न गर्म करने की जरूरत होती और न ही ठंडा।


48. क्रेच क्या है ? (What is a Creche ?)

उत्तर⇒ क्रेच में बच्चों को सुरक्षित रखने की व्यवस्था होती है। क्रेच एक ऐसा सुरक्षित स्थान है जहाँ बच्चे की सही देख-भाल में तब तक छोड़ा जा सकता है जब-तक माता-पिता काम में व्यस्त रहते हैं। क्रेच में तीन वर्ष तक के बच्चों को रखा जाता है।


49. अनौपचारिक शिक्षाएँ (Non-Formal Education)

उत्तर⇒ वे महिलाएँ जो ग्रामीण क्षेत्रों व पिछड़ी जनजाति की हैं उन्हें औपचारिक शिक्षाएँ प्रदान की जाती हैं। उन्हें ऐसे तरीके सिखाये जाते हैं जो परिवार की आय बढ़ाने में सहायक हो सकते हैं।


50. वृद्धि तथा विकास को परिभाषित करें।

(Define Growth and Development.)

उत्तर⇒ वद्धि आकार, लम्बाई एवं वजन में होने वाला प्रत्येक परिवर्तन वृद्धि कहलाता है। इसकी माप की जाती है । यह सामान्यतः शरीर के आकार, लम्बाई तथा वजन में वद्धि हेतू प्रयोग होता है।

विकास- स्वभाव में परिवर्तन जैसे त्वचा का कठोर होना, बालों का शरीर पर उगना, बालों का सफेद होना आदि क्रियाएँ विकास के अंतर्गत आती हैं। मानसिक, भावात्मक. नैतिक एवं सामाजिक आदि पक्षों में विकास होते हैं। विकास की विभिन्न अवस्थाएँ होती हैं, जो एक दूसरे से संबद्ध होती हैं।


51. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) से आप क्या समझते हैं?

[What do you mean by World Health Organisation (WHO) ?]

उत्तर⇒ विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO)- विश्व स्वास्थ्य संगठन की स्थापना 1948 ई० में कुपोषण-निवारण हेतु की गयी, जिसके 148 देश सदस्य हैं। इसके द्वारा भारत को 220 स्वास्थ्य योजनाओं के लिए सहायता प्रदान की गयी है। बीस मेडिकल कॉलेजों में नये विभाग खोलने के लिए 20 विजिटिंग प्रोफेसर भेजे गये हैं। इसने सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को 1300 से अधिक शिक्षा-वृत्तियाँ प्रदान की हैं।


52. संक्रामक रोग किसे कहते हैं ? इसके फैलने के कारण लिखें।

(What is called Infected disease ? Write cause of its expansion.)

उत्तर⇒ संक्रामक रोग-ऐसे रोग जो एक रोगी से दूसरे व्यक्ति को हो जाते हैं इसे संक्रामक रोग कहते हैं। यह सूक्ष्म रोगाणुओं द्वारा होते हैं तथा तीव्रता से फैलते हैं। संक्रामक रोग निम्नलिखित माध्यमों द्वारा फैलते हैं

(i) वायु द्वारा,
(ii) जल द्वारा,
(iii) भोजन द्वारा,
(iv) संपर्क द्वारा,
(v) कीड़ों द्वारा तथा
(vi) अन्य स्रोतों द्वारा।


53. नि:संक्रामक से आप क्या समझते हैं ?

(What do you mean by disinfectants ?)

उत्तर⇒ नि:संक्रामक वैसे पदार्थ नि:संक्रामक कहलाते हैं, जो रोगों के जीवाणुओं तथा उसके विष को नाश करने के लिए व्यवहृत होते हैं। वैसे पदार्थों में जीवाणुओं के समूह को नष्ट करने की शक्ति होती है, जैसे- फिनायल, फार्मेलिन, कार्बोलिक अम्ल, मरकरी वाट्नक्लोराइड, क्रीसोल, ब्लीचिंग पाउडर, ताजा चूना आदि।


54. एक अच्छे कैच की चार सुविधाएँ क्या हैं ?

(What are the four facilities of good a creche ?)

उत्तर⇒ एक अच्छे कैच की चार सुविधाएँ निम्नलिखित हैं-

(i) यह बच्चों को निश्चित समय तथा तापमान पर दूध तथा आहार प्रदान करते हैं।
(ii) यह बच्चों को मेज पर बैठकर खाने के तरीके सिखाते हैं।
(iii) यह प्रत्येक छोटे बच्चों को चारपाई प्रदान करते हैं।
(iv) यह बच्चों को साफ तथा सुरक्षित वातावरण प्रदान करते हैं।


55. अस्थायी दाँत (Temporary Teeth)

उत्तर⇒ बालक में छ: से आठ माह के बीच दाँत निकलना प्रारंभ हो जाता है और पाँच वर्ष से टूटने लगता है। इनकी संख्या 20 होती है। स्थायी दाँतों को तुलना में यह छोटे एवं गुण में हीन होते हैं।


56. गर्भवती माता (Pregnant Women)

उत्तर- जब बच्चा महिला के गर्भ में रहता है तो उसे गर्भवती माता कहते हैं। इस समय इसे विशेष देखभाल, पोषण, आराम, हल्का व्यायाम तथा चिकित्सीय देखभाल की आवश्यकता होती है। साधारण अवस्था की तुलना में इस समय 300 अतिरिक्त कैलोरी की आवश्यकता होती है।


57. स्तन्यमोचन (Weaning)

उत्तर⇒ स्तन्यमोचन का अर्थ हैं बच्चे को माता के दूध के अतिरिक्त अन्य भोज्य पदार्थों से परिचित कराना। शिशु माता के दूध पर पूर्णतया निर्भर रहता है। इस अवस्था में उसे अन्य ठोस तथा अर्द्धठोस एवं पाचक भोज्य पदार्थ खिलाये जाते हैं जिससे धीरे-धीरे वह माता का दध पीना बंद कर देता है।


58. रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity)

उत्तर⇒ प्रकृति ने व्यक्ति को रोगों से लड़ने की स्वाभाविक क्षमता प्रदान की है, जिसे रोग प्रतिरोधक क्षमता कहते हैं। ये दो प्रकार की होती हैं

(i) प्राकृतिक प्रतिरक्षण- इसके अंतर्गत श्वेत रक्ताणु द्वारा जैसे- एंटी टॉक्सिन का निर्माण होता है जो संक्रमण से बचाता है। माता का दूध, त्वचा, नाक की बाल तथा अंगों के श्लेष्मा से प्रतिरक्षण होता है।
(ii) कृत्रिम प्रतिरक्षण- कृत्रिम प्रतिरक्षण टीकाकरण द्वारा किया जाता है।


59. कोलस्ट्रम (Colustrum)

उत्तर⇒ कोलस्ट्रम माता का प्रथम दूध है जो शिश के लिए अमृत के समान होता है, यह शिशु को विभिन्न रोगों से सुरक्षा एवं रोग प्रतिरोधक क्षमता बढाता है। कोलस्ट्रम में इमुनोग्लोब्यूलिन्स (immunoglobuline) की मात्रा दध की अपेक्षा अधिक होती है जो शिशु को विभिन्न सूक्ष्म जीवाणु-विषाणुओं के संक्रमण से बचाता है तथा रोगों से रक्षा करता है।


60. जीवन रक्षक घोल क्या है? इसे कब प्रयोग करते हैं?

(What is ORS ? When does it used ?)

उत्तर⇒ जीवन रक्षक घोल ओरल डिहाइडेशन साल्ट सोल्यूशन (ORAL DEHYDRATION SALT SOLUTION) को जीवन रक्षक घोल कहा जाता है। जब हैजा या अतिसार होने से या वमन होने से शरीर में जल की कमी हो जाती है तो डिहाइड्रेशन हो जाता है। जिसके अधिक होने से शरीर में जलापानी चदाना पडता है। उसके अभाव में रोगी की जान भा जा सकता है। इसलिए शरीर में जल की मात्रा बढाने हेत सर्वप्रथम जीवन रक्षक घोल जो कि ओरल डिहाइड्रेशन साल्ट घोल जल मिला कर तैयार किया जाता है। बच्चों को या वयस्कों को भी दिया जाता है। वस नमक तथा चीनी को जल में मिलाने से जो घोल बनता है उसे जीवन रक्षक घोल कहते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर Home Science Part – 3 (20 Marks)


61. उपभोक्ता दिवस से क्या समझते हैं ?

(What do you understand by consumer’s day ?)

उत्तर⇒ प्रतिवर्ष 18 मार्च को उपभोक्ता दिवस के रूप में मनाया जाता है। उपभोक्ता दिवस का उद्देश्य एक ओर उपभोक्ता में शुद्ध तथा गुणवत्ता युक्त वस्तु लेने की जागरूकता पैदा करना है तो दूसरी ओर उत्पादकों को यह अनुभव करना है कि उन्हें अपने उत्पादों के लिए प्रामाणित मानकों का प्रयोग करना चाहिए जिससे उनके उत्पादकों की ओर भारतीय के साथ-साथ विदेशी उपभोक्ता भी आकर्षित हो।


62. उपभोक्ता का अर्थ क्या है ?

(What do you mean by consumer ?)

उत्तर⇒ जो व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए वस्तुओं/सेवाओं को खरीदता है तथा उनका उपभोग करता है उसे उपभोक्ता कहते हैं। हम सभी किसी किसी रूप में उपभोक्ता हैं।


63. उपभोक्ता के कर्तव्य क्या हैं ?

(What are the duties of consumer ?)

उत्तर⇒ उपभोक्ता के निम्न कर्तव्य होते हैं जैसे- वस्तु विशेष की जानकारी, कीमत की जानकारी, फिजूलखर्ची से बचाव, विज्ञापन के प्रलोभन से बचाव, वस्तु की खरीददारी का बिल लेना, उपयुक्त माप और तौल का परीक्षण करना, विश्वसनीय एवं मान्यता प्राप्त दुकानों से खरीददारी तथा अपने अधिकारों की जानकारी इत्यादि।


64. उपभोक्ता के अधिकार

(Right of Consumer)

उत्तर⇒ समाज में जितनी भी वस्तुएँ हैं वे सभी उपभोक्ताओं के लिए है। उपभोक्ता द्वारा खरीदी जाने वाली वस्तु किसी भी प्रकार से उनके लिए हानिकारक नहीं होनी चाहिए। इनके लिए उपभोक्ता को कुछ अधिकार दिए गये हैं वे हैं-

(i) चयन का अधिकार
(ii) सूचना प्राप्त करने का अधिकार
(iii) सुरक्षा का अधिकार
(iv) स्वस्थ वातावरण का अधिकार
(v) क्षतिपूर्ति पाने का अधिकार
(vi) उपभोक्ता शिक्षा का अधिकार
(v) शिकायत दर्ज करने एवं सुनवाई का अधिकार।


65. शिशु सदन एवं चलते-फिरते शिशु सदन।
(Creche and mobile creches.)

उत्तर⇒ शिशु सदन- वह सदन जहाँ बच्चों की देखरेख की उचित व्यवस्था की जाती है शिशु सदन कहलाता है। यह सरकार, स्वयं सेवी संगठनों तथा व्यावसायिक संगठनों द्वारा चलाया जाता है। क्योंकि उनका उद्देश्य धन कमाना होता है। इस कारण वे बच्चों की सुविधाओं का ख्याल रखते हैं।

चलते- फिरते शिशु सदन वह शिशु सदन जिसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया जाता है, उसे चलते-फिरते शिशु सदन कहा जाता है। मजदूरी करने वाली महिलाओं के लिए कार्य स्थल पर ही चलते-फिरते शिशु सदन बना दिये जाते हैं।


66. समेकित बाल विकास सेवा योजना (ICDS) क्या है?

(What is Integrated child development service ? What its aim.)

उत्तर⇒ समेकित बाल विकास सेवा योजना 2 अक्टूबर, 1975 में प्रारंभ की गई थी। यह योजना भारत सरकार के सौजन्य से मानव संसाधन विकास मंत्रालय तथा महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा चलाई जा रही है। वर्तमान समय में देश में लगभग 2761 स्वीकृत आई० सी० डी० एस० परियोजनाएँ हैं जिनसे लाखों माताएँ एवं बच्चे लाभ उठा रहे हैं।


67. ज्ञानात्मक विकास किसे कहते हैं?

(What is cognitive Development ?)

उत्तर⇒ ज्ञानात्मक विकास का अभिप्राय बच्चे की उन मानसिक प्रक्रियाओं का विकास है जिसके परिणामस्वरूप वह अपने तथा अपने आस-पास के बारे में ज्ञान प्राप्त करता है। वह अपनी आस-पास के बारे में ज्ञान प्राप्त करता है। वह अपनी समस्याएँ स्वयं सुलझाता है।


68. भाषा किसे कहते हैं ? (What is Language ?)

उत्तर⇒ भाषा एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा हम अपने विचारों एवं भावों को दूसरों के समक्ष प्रस्तुत करते हैं तथा उनके विचारों तथा भावों को समझते हैं।


69. आँगनबाड़ी के बारे में लिखें। (Write about Anganbari.)

उत्तर⇒ आँगनबाड़ी संस्थाओं की स्थापना सरकार द्वारा की गयी है। इसमें ग्रामीण क्षेत्र के शिशु का देखभाल होता है। आँगनबाड़ी कार्यकर्ता माताओं को बच्चों की सामान्य बीमारियों एवं सामान्य वृद्धि के बारे में शिक्षा देती है। इसमें 0-6 वर्ष के सभी बच्चों को डिप्थीरिया, कुकुरखाँसी, टेटनस, पोलियो, टी०बी० तथा खसरे के टीका लगवाया जाता है। इसमें गरीब बच्चों. माताओं तथा गर्भवती स्त्रियों को पोषाहार दिया जाता है।


70. नर्सरी स्कूल/ बालबाड़ी के उद्देश्य (Aims of nursery school/Balbari.)

उत्तर⇒ नर्सरी स्कूल/ बालबाड़ी के उद्देश्य निम्न हैं-

(i) 3-5 वर्ष के बच्चों को बालबाड़ी भेजा जाता है।
(ii) बच्चों को खेल के माध्यम से भिन्न आकृतियों व रंगों को पहचानना, चित्रकला, गीत कहानी सुनाते हैं।
(iii) इससे बच्चे में सुनने, स्मरण करने की तथा समझने की क्षमता बढ़ती है।


71. विकास के मील पत्थर। (Milestones of Development.)

उत्तर⇒ विकास रूपी मीलपत्थर बालक के वृद्धि तथा विकास में विराम चिह्नों का कार्य करते हैं। शारीरिक विकास में मील पत्थर सिर से पंजे की ओर अग्रसर होते हैं। अतः बालक पहले अपने सिर पर नियंत्रण रखना सीखता है तब शरीर, भुजाओं तथा टाँगों पर नियंत्रण रखना सीखता है। ये मील पत्थर माता-पिता को चिकित्सा संबंधी राय बताने के लिए एक मार्गदर्शन प्रदान करता है।


72. दिवस देखभाल केंद्र/ डे केयर सेन्टर (Day care centre)

उत्तर⇒ कुछ स्वयंसेवी संगठन 0-5 वर्ष की आयु वर्ग के लिए दिवस देखभाल केंद्र उपल कराते हैं। इस देखभाल केंद्रों में बच्चों की देखभाल के अतिरिक्त रोग प्रतिरोधक टीके लगवाना पूरक पोषाहार देना, मनोरंजन तथा चिकित्सा एवं जाँच की सुविधाएँ भी प्रदान की जाती है। इन देखभाल केंद्रों को बच्चों के माता-पिता का विकल्प माना जाता है।


73. हैपेटाइटिस बी का टीके पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

(Write a short note on vaccine of Hepatitis B.)

उत्तर⇒ हैपेटाइटिस बी० का टीका यकृत को प्रभावित कर पीलिया नामक रोग उत्पन्न करने वाले विषाणु से सुरक्षा प्रदान करता है। यह वायरस दूषित सूई, सिरिंज, शेविंग रेजर तथा रक्त परिवर्तन द्वारा फैलता है। चूंकि विषाणु दूसरे जीव वैज्ञानिक द्रव्यों, जैसे रक्त, मूत्र, स्तन, दूध आदि
में पाया जाता है। यह मौखिक मार्ग या आंतरिक संक्रमण द्वारा भी हो सकता है। यह एक गंभीर रोग है। पहली खुराक जन्म के समय दूसरी 1-2 माह बाद तथा तीसरी पहली खुराक के 6-8 माह बाद दी जा सकती है।


74. केयर (CARE) से आप क्या समझते हैं ?

[What do you mean by CARE (Co-operative for American Relief Everywhere ?)]

उत्तर⇒ केयर (CARE)-केयर की स्थापना कुपोषण-निवारण हेतु 1946 ई० में की गयी. जिसने 1951 ई० में भारत की प्राथमिक पाठशालाओं में दोपहर का आहार भेजना शुरू किया। यह मेटरनल और चाइल्ड हेल्थ केन्द्र में भी दूध, सोयाबीन तथा पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराता है।
इसके द्वारा गेहूँ, ड्राई मिल्क, मक्खन, चीज तथा सोयाबीन तेल वितरित किये जाते हैं। यह प्रांतीय स्तर पर सेमिनार, वर्कशॉपों आदि का आयोजन करता है। अप्लाइड न्यूट्रीशन प्रोग्राम केयर का सराहनीय प्रोग्राम है।


75. बालबाड़ी के चार कार्यों को लिखें। (Write four functions of Balbari.)

उत्तर⇒ बालबाड़ी के चार कार्य निम्नलिखित हैं-

नौकरी करने वाली तथा बीमार महिलाओं के पाँच वर्ष तक की आयु के बच्चों की-

(i) दिन में देख-भाल करना,
(ii) सोने की सुविधाएँ प्रदान करना,
(iii) पोषाहार की कमी को पूरा करना तथा
(iv) पूर्व स्कूल-शिक्षा व्यवस्था करना।


76. भोजन नियोजन के समय कौन-कौन से तत्त्व प्रभाव डालते हैं ?

(What are the factors affected at the time of Food Planning ?)

उत्तर⇒ भोजन नियोजन के समय निम्नलिखित तत्त्व प्रभावित करते हैं

(i) आयु,
(ii) लिंग,
(iii) जलवायु,
(iv) रोग की स्थिति,
(v) उत्सव तथा
(vi) व्यवसाय।

बच्चों में शारीरिक वृद्धि तेजी से होने के कारण उसके आहार में प्रोटीन की प्रचरता रखनी पड़ती है। मानसिक कार्य करने वालों के आहार में सुपाच्य भोज्य पदार्थों का समावेश होना चाहिए। पुरुषों का भोजन उसके श्रम को ध्यान में रखकर संतुलित किया जाता है। हलका श्रम करने वाले को 72 कैलोरी प्रति घंटा, मध्यम कोटि के श्रम करने वाले को 75 से 150 कैलोरी प्रति घंटा तथा कठिन परिश्रम करने वाले को 140 से 360 कैलोरी प्रति घंटा की आवश्यकता होती है।


77. गर्भवती स्त्रियों को भोजन में लोहा होना क्यों अनिवार्य है ?

(Why is iron essential in the food of Pregnant Women ?)

उत्तर⇒ गर्भवती स्त्रियों को भोजन में लोहा का होना अनिवार्य गर्भवती स्त्रियों को भोजन में लोहा की अधिक मात्रा की आवश्यकता होती है। नवें माह के अन्त तक भ्रूण में 100 मि० ग्रा० से 150 मि० ग्रा० लोहा होता है । नाभि-नाल में 150 मि० ग्रा० लौह तत्त्व होता है। इसलिए गर्भवती स्त्रियों को प्रतिदिन 10 मि० ग्रा० से 20 मि० ग्रा० लौह तत्त्व लेना चाहिए। हरी सब्जियाँ, यकृत और गोश्त में लौह तत्त्व की अधिक मात्रा होती है। यह पालक, मटर या सेम, गेहूँ, अंडा, खमीर, दालें, लाल चौलाई, शलजम के पत्ते, हल्दी, हींग, राई, गुड़, फूल, चने के साग में भी उपस्थित होता है।


78. खाद्य पदार्थों को खरीदते समय आप किन-किन बातों पर ध्यान देंगी ?

(What will be the matters taken care at the time of purchasing food materials ?)

उत्तर⇒ खाद्य पदार्थों को खरीदते समय निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना चाहिए

(i) मिलावट नहीं रहने हेतु खरीदारी विश्वसनीय दुकानों से करनी चाहिए।
(ii) खरीदारी करते समय अपने एवं दूसरे के अनुभवों का फायदा उठाना चाहिए।
(iii) आई० एस० आई०, एगमार्क या एफ० पी० ओ० मार्क वाले मानक खाद्य पदार्थ ही खरीदने चाहिए क्योंकि इसकी शुद्धता की गारंटी होती है।


79. समाजीकरण (Sociolization)

उत्तर⇒ यह एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया हैं, जिससे बच्चा जिस समाज में रहता हैं, जिसके नियमों को जानता है तथा अपने व्यवहार को समाज द्वारा बनायी गई परम्पराओं में ढालता है।


80. भोजन पकाने के क्या कारण हैं ?

(What is the reasons for cooking of food ?)

उत्तर⇒ भोजन पकाने के समय खाद्य पदार्थों के रंग, रूप, आकार तथा सुगंध का ठीक समायोजन भोजन को आकर्षक बनाता है और भूख को उत्तेजित करता है।


81. संतुलित आहार (Balance diet)

उत्तर⇒ वह आहार जिसमें सभी आहार वर्ग जैसे-ऊर्जा देने व शरीर का निर्माण करने वाले. सुरक्षा देने वाला आहार उचित मात्रा में हो। जिससे व्यक्ति को सभी पोषक तत्त्व न्यूनतम मात्रा में प्राप्त हो, उसे संतुलित आहार कहते हैं।


82. आहार नियोजन तथा आहार तालिका में अंतर बताएँ।

(Differentiate between meal planning and meal table.)

उत्तर⇒ आहार नियोजन करते समय विभिन्न सदस्यों की आयु, लिंग, जलवायु एवं व्यवसाय को ध्यान में रखा जाता है। जबकि आहार तालिका बनाते समय आहार नियोजन को ध्यान में रखकर उसे प्रतिदिन के आहार में क्रियान्वित रूप प्रदान किया जाता है।


83. आहार नियोजन को परिभाषित करें। (Define food planning.)

उत्तर⇒ आहार नियोजन-उम्र के अनुसार वृद्धि एवं विकास के लिए आहार की आवश्यकता के साथ-साथ पोषक तत्वों की आवश्यकता समयानुसार पूर्ति करने को आहार नियोजन कहते हैं। इसमें परिवार के प्रत्येक सदस्य की पौष्टिक आवश्यकताएँ उनके लिंग, आयु तथा श्रम पर निर्भर करती है। सातों खाद्य समूहों में से कुछ न कुछ आवश्यक भोजन में उपयोग करना चाहिए। गर्भवती, बच्चों तथा रुग्ण व्यक्ति के लिए अलग से विशेष भोजन देना चाहिए। सुबह का नाश्ता, दोपहर का भोजन, शाम.का नाश्ता, रात्रि का भोजन क्रमानुसार संतुलित होना चाहिए।


84. पूरक आहार कितने प्रकार का होता है ?

(What are the types of complimentary food ?)

उत्तर⇒ पूरक आहार निम्नलिखित प्रकार का होता है

(i) तरल पूरक आहार—(a) ताजे फलों का रस, (b) मछली के यकृत का तेल, (c) दाल का पानी, (d) अंडे का पीला भाग तथा (e) हरी सब्जी का सूप।।

(ii) ठोस पूरक आहार- (a) फल एवं सब्जियाँ इसे अच्छी तरह पकाकर, मसलकर या छानकर दिया जाता है । (b) अनाज (इसे बारीक दला हुआ या पिसा हुआ करके दिया जाता है।) तथा (c) मांस और मछली—(बिना मिर्च मसाले के पकाकर तथा कचलकर दिया जाता है।


85. भोजन की परिभाषा (Define food)

उत्तर⇒ अच्छे स्वास्थ्य तथा शारीरिक कुशलता को बनाये रखने के लिए पर्याप्त मात्रा में भोजन प्राप्त होना चाहिए। जिसमें सभी पौष्टिक तत्त्व संतुलित मात्रा में हों।

सुमंगिनी जोशी के अनुसार ” भोजन जीवन के लिए एक आधारीय आवश्यकता है। भोजन ही शरीर का पोषण करता है।”

उषा टंडन के अनुसार- ” भोजन वह पदार्थ है जो हमारे शरीर को पोषित करता है। प्रत्येक भोज्य पदार्थ में शरीर को पोषित करने की अलग-अलग क्षमता होती है क्योंकि भोज्य पदार्थ में पोषक तत्त्व की मात्रा विभिन्न होती है।”


86. अपराधी बालक (Juvenil Delinquent)

उत्तर⇒ जो बालक समाज द्वारा तथा कानून द्वारा बनाये गये नियमों की अवहेलना करते हैं और एक निश्चित आयु से कम आयु वर्ग के होते हैं। बाल अपराधी कहलाते हैं। जैसे-चोरी,मारपीट, यौन अपराध, विद्यालय से भागना, आवारागर्दी करना इत्यादि।


87. बच्चों की वैकल्पिक देख-भाल की आवश्यकता

(Need for substitute care for children.)

उत्तर⇒ बच्चों की वैकल्पिक देखभाल की आवश्यकता निम्नलिखित कारणों से पड़ती हैं

(i) माता-पिता में से किसी की मृत्यु हो जाने पर
(ii) छोटे एकांकी परिवार होने पर
(iii) माता का घर से बाहर जाकर काम करना
(iv) वैवाहिक संबंध टूटने के कारण इत्यादि


88. हार्मोन्स (Hormones)

उत्तर⇒ अंतःस्रावी ग्रंथी से स्रावित होने वाले पदार्थ को हार्मोन्स कहते हैं। यह हमारे शरीर की विभिन्न गतिविधियों को नियंत्रित करती है।


89. टीकाकरण (Immunization)

उत्तर⇒ किसी बीमारी के विरुद्ध प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने के लिए जो दवा पिलायो या खिलायी या अन्य किसी रूप में दी जाती है उसे टीका कहते है तथा यह क्रिया टीकाकरण कहलाती है।


90. प्रदूषण (Pollution)

उत्तर⇒ पर्यावरण में दूषक पदार्थों के प्रवेश होने से अवांछनीय परिवर्तन होता है जिससे जाव जगत पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, प्रदूषण कहलाता है।

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर Home Science Part – 4 (20 Marks)


91. प्रदूषित जल (Polluted water)

उत्तर⇒ पानी के विभिन्न साधन जैसे- झीलें, तालाब, नदियाँ, कुएँ तथा वर्षा का पानी मानव तथा जानवरों के द्वारा दूषित हो जाता है। पानी को दूषित करने में व्यर्थ का कुड़ा-कचरा, मरे हए जानवरों को पानी में डाल देना, पानी के स्रोतों के निकट मल-मूत्र त्याग करना, तालाबों में जानवरों को नहलाना आदि सहयोगी हैं। इन क्रियाओं के द्वारा सूक्ष्मजीव पानी को प्रदूषित कर देते हैं तथा यह पानी फिर पीने योग्य नहीं रहता।


92. वायु प्रदूषण (Air Pollution)

उत्तर⇒ जब वायु में अनेक दूषित पदार्थ मिल जाते हैं तो वायु प्रदूषित हो जाता है। वायु प्रदूषण कल-करखाने में प्रयोग होने वाली धातु, पदार्थ, रासायनिक पदार्थ आदि से विषैले गैस निकलती है जो हवा को दूषित कर देती है। इसके अतिरिक्त कच्चे पदार्थों को सड़ाना, चमड़ा पकाना, चर्बी गलाना, कसाईखाना, पत्थर तोड़ने, कोयले खदान, ईंट की भट्टियाँ, धुआँ, धूल, मिट्टी, कचरा, खुले गंदे नाले, प्राणियों के मलमूत्र इत्यादि के कारण वायु प्रदूषित हो जाती है।


93. पर्यावरण प्रदूषण से आप क्या समझते हैं ?

(What do you understand by Environment Pollution ?)

उत्तर⇒ पर्यावरण- वायुमंडल, जलमंडल और प्राणिमंडल में अवस्थित क्रमशः भूमि, वायु, जल और आश्रित समस्त प्राणियों के लिए वातावरण के सामूहिक रूप को पर्यावरण कहते हैं।

प्रदूषण-सजीव या निर्जीव सृष्टि को किसी प्रकार से अस्वच्छ या अशुद्ध करने वाली प्रक्रिया प्रदूषण कहलाती है। यह मुख्यतः पाँच प्रकार के होते हैं

(i) जल प्रदूषण, (ii) वायु प्रदूषण, (iii) ऊष्मा प्रदूषण, (iv) ध्वनि प्रदूषण तथा (v) भूमि प्रदूषण।


94. सुरक्षित पीने योग्य पानी के चार गुण लिखिये।

(Write down four characteristic of safe drinking water.)

उत्तर⇒ (i) यह रंगहीन, गंधहीन तथा स्वादहीन होना चाहिए।
(ii) यह मृदुजल होना चाहिए कठोर नहीं।
(iii) यह पूर्णतया सूक्ष्म जीवाणुओं से रहित होना चाहिए।
(iv) इसमें कोई रेडियोधर्मी तत्त्व नहीं होना चाहिए।


95. कठोर जल तथा नरम जल क्या है ?

(What is hard water and soft water ?)

उत्तर⇒ जल धुलाई प्रक्रिया के लिए सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। जल धोने तथा खंगालने में 99% तक प्रयुक्त होता है। साधारणत: जल दो प्रकार के होते हैं। कठोर जल तथा नरम जल। नरम जल में नमक की मात्रा कम होती है जिससे साबुन घोल आसानी से बनता है और वस्त्र की अशद्धियाँ आसानी से निकल जाता है। जबकि जल में कैल्सियम और मैग्नीशियम के सल्फेट और कार्बोनेट के मिल जाने से जल कठोर हो जाता है। कठोर जल में साबुन का झाग देर से होता है तथा वस्त्र को अशुद्धियाँ भी देर से निकलती है।


96. पानी के प्राकृतिक स्रोत क्या हैं ?

(What are the natural sources of water ?)

उत्तर⇒ पानी के प्राकृतिक स्रोत–हमें जल हमेशा प्राकृतिक स्रोतों से ही प्राप्त होता है, ये स्रोत हैं- (i) वर्षा का जल (ii) पृथ्वी के ऊँचे तलों का जल (iii) नदी का जल, (iv) झरने का जल, (v) गहरे कुएँ, (vi) उथले कुएँ, (vii) समुद्र का जल, (viii) तालाब तथा (ix) पानी का पम्प अथवा नलकूप।


97. आहार परिवर्तन लाने का अर्थ बताइए।

(What is the meaning of food changing ?)

उत्तर⇒ शारीरिक अवस्था तथा आवश्यकता के अनुसार आहार में परिवर्तन करना पड़ता है। शारीरिक परिवर्तन तथा विकास की अवस्थाओं में आहार की संरचना में परिवर्तन किया जाता है। जैसे-किशोरी, गर्भवती महिला, धात्री माता (दूध पिलाने वाली) तथा रोग की अवस्था में परिवर्तित आहार आदि।


98. मानवीय साधन
(Human resources)

उत्तर⇒ ♦  मानवीय साधन व्यक्ति के भीतर अन्तर्निहित गुण होते हैं।
♦ परिवार के सदस्यों की रुचियाँ, समय, शक्ति, ज्ञान, कौशल अभिवृत्तियाँ आदि प्रमख मानवीय साधन है।
♦ प्रत्येक व्यक्ति की मानसिक एवं बौद्धिक क्षमताएँ सीमित होती हैं। परन्तु निरंतर अभ्यास और ज्ञानवृद्धि द्वारा इसे बढ़ाया जा सकता है।
♦ मानवीय साधन जन्मजात एवं अर्जित दोनों होता है।


99. आंतरिक सजावट (Interior decoration)

उत्तर⇒ घर को सजाने-सँवारने की कला को गृह सज्जा या आंतरिक सज्जा कहते हैं। घर के प्रत्येक चीज को सुन्दर एवं सुविधापूर्ण बना देना ताकि यह देखनेवाले को अपनी ओर लुभा सके, आकर्षित कर सके साथ ही कार्यात्मकता भी बनी रहे गृह सज्जा है। दूसरे शब्दों में सजावट का उद्देश्य न केवल घर को सौन्दर्य प्रदान करना हैं अपितु घर के अंदर की अस्त-व्यस्त वस्तुओं को इस प्रकार से क्रमबद्ध करके व्यवस्थित रूप देना हैं ताकि इनमें एकता के साथ-साथ लय, अनुपात, संतुलन एवं समानता का भाव प्रकट हो।


100. विनियोग (Investment)

उत्तर⇒ ♦ आय का वह भाग जो प्रतिमाह या प्रतिवर्ष किसी सुव्यवस्थित योजना में लगाते हैं और जिससे हमें आय होती है विनियोग कहलाता है।
♦  राशि विनियोजन के बहुत से साधन हैं, जिनकी जानकारी व्यक्ति को होनी चाहिए ताकि वह अपनी बचत की राशि का उचित विनियोजन कर सके।


101. प्राथमिक रंग (Primary Colours)

उत्तर⇒ लाल, पीला एवं नीला-ये तीन प्राथमिक रंग है। इन्हीं रंगों के सम्मिश्रण से विविध प्रकार के रंग बनते हैं। द्वितीयक, मध्यवर्ती, तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी के रंग सभी का निर्माण इन्हीं तीनों रंगों के मिलने से होता है। परन्तु इन तीनों प्राथमिक रंग ऐसे होते हैं, जिन्हें किसी अन्य रंग से नहीं प्राप्त किया जा सकता है।


102. प्राकृतिक तन्तु (Natural Fibre)

उत्तर⇒ प्राकृतिक तंतु के अंतर्गत वे सभी तंतु आते हैं जो हमें प्रकृति से प्राप्त होते हैं। पेड़-पौधों से प्राप्त रेशों की वनस्पतिक रेशे (कपास, जूट, लिनन) पशुओं (ऊन) तथा कीड़ों (रेशम) से प्राप्त को जान्तव रेशे तथा धातुओं (सोना, चाँदी, ताँबा) से तैयार रेशे खनिज रेशे कहलाते हैं।


103. रेडीमेड वस्त्र (Readymade garments)

उत्तर⇒ ♦ रेडीमेड वस्त्र से तात्पर्य उन सिले-सिलाये वस्त्रों से है जिसकी खरीददारी के पश्चात तुरंत उपयोग हो सके।
♦ रेडीमेड वस्त्र को दो भागों में बाँटा जा सकता है :

(i) बाह्य वस्त्र-यूनीफार्म, पैंट-शर्ट, साड़ी ब्लाऊज, टाई कार्डीगन आदि।
(ii) अंतः वस्त्र-जैसे-गंजी, जाँघिया, मोजे आदि।

♦ सिले-सिलाये वस्त्रों की विशेषता है- (i) बड़े-बड़े शो रूम से लेकर फुटपाथ तक उपलब्ध (ii) सभी आय वर्ग, प्रत्येक नाप में (छोटे-बड़े, मोटे-पतले) सभी उम्र, दोनों लिंग (स्त्री-पुरुष) के लिए उपलब्ध (iii) हर मौसम के अनुकूल उपलब्धता (iv) रख-रखाव आसान (v) नवीनतम फैशनानुसार (vi) सुंदर एवं आकर्षक।

♦ आज के भागदौड़ एवं व्यस्त जीवन शैली के लिए वरदान है।


104. कपड़े धोने की रासायनिक विधि (Chemical method of washing clothes)

उत्तर⇒ ♦ जब कपड़ा से दाग-धब्बे नहीं निकल पाते तो रासायनिक विधि का प्रयोग किया जाता है। इसी कारण इसे दाग-धब्बा छुड़ाने की सबसे अंतिम विधि माना जाता है।

♦ इस विधि में प्रयुक्त रासायनिक पदार्थ हैं ऑक्जैलिक एसिड, क्लोरीन एवं हाइड्रोजन पेरोक्साइड। ये पदार्थ वस्त्र के रेशे नष्ट कर सकते हैं। कभी-कभी रंग भी पूरी तरह से बेरंग हो जाता है। अतः रासायनिक विधि से दाग-धब्बा उतारते समय अतिरिक्त सावधानी बरतनी पड़ती है।

♦ रासायनिक पदार्थ का प्रभाव पूरी तरह से समाप्त करने के लिए वस्त्रों को कई बार जल में खंगाल लेना चाहिए।


105. डिटर्जेंट/ अपमार्जक (Detergent)

उत्तर⇒ ♦ यह कपड़ों की सफाई का एक तत्व है जो साबून के समान ही कार्य करता है, किन्तु इसका निर्माण रसायनों द्वारा होता है। अतः यह फैक्टरियों में ही निर्मित होता है।

♦ यह कठोर एवं कोमल जल तथा गर्म एवं ठंडा जल दोनों में ही अच्छी सफाई करता है। 

♦ यह आसानी से कपड़ों को धोने के बाद निकल जाता है।
♦ वस्त्र धोने में शारीरिक श्रम तथा समय कम लगता है।
♦ इसके निर्माण के समय ही इसमें विरंजक तथा उज्जवलकारी तत्त्व मिला दिये जाते हैं जिस कारण धुले वस्त्र को अलग से ब्लीच तथा नील देने की आवश्यकता नहीं होती है।
♦ यह साबुन की अपेक्षा महँगा होता है।


106. रंग व्यक्तित्व को कैसे प्रभावित करते हैं ?

(How the colour affects personality ?)

उत्तर⇒ परिधान का रंग किसी विशेष व्यक्तित्व की झलक है। रंग से हम व्यक्तियों की रुचियों का अनुमान लगा सकते हैं। परिधान में रंगों का चुनाव इस प्रकार होना चाहिए जो व्यक्तित्व को उभारे। कुछ लोग को भड़कीले तथा चटख रंग पसंद होते हैं तो कुछ को हल्के रंग/विभिन्न रंग विभिन्न तरह के भाव को अभिव्यक्त करते हैं। जैसे-

नारंगी- प्रसन्नचित, शांति देने वाला रंग है।
हरा- मैत्रीपूर्ण, हर्षित, शान्ति देने वाला।
सफेद- साफ, स्वच्छ, विकार रहित, शांति, पवित्रता
काला- प्रतिष्ठित, पुराना, वैभवशाली, रहस्यमय


107. रेशमी वस्त्रों का संचयन आप किस प्रकार करेंगी ?

(How will you storage the silk clothes ?)

उत्तर⇒ रेशमी वस्त्र का संचयन- रेशमी वस्त्रों के संचयन के लिए अलग बक्सा होना चाहिए। रेशमी वस्त्र को कपड़े या पॉलिथीन में लपेटकर रखना चाहिए। नेप्थलीन की गोलियां या लाल मिर्च या गोल मिर्च की पोटलियाँ रखनी चाहिए।


108. वस्त्रों को कीड़े एवं फफूंदी से कैसे बचाया जाता है ?

(How can you save the clothes from insects and fafundi ?)

उत्तर⇒ वस्त्रों को कीड़े एवं फफंदी से बचाया जाना-वस्त्रों को कीड़े एवं फफूंदी से बचाने के लिए नेप्थलीन की गोलियाँ, नीम की पत्तियाँ, सूखी लाल मिर्च, गोल मिर्च आदि का प्रयोग किया जाता है।
वस्त्रों में नमी की स्थिति में फफूंदी लगते हैं, जिससे भद्दे दाग वस्त्रों पर लग जाते हैं। फर्फेदी लग जाने पर उसके धब्बों को तुरंत छुड़ा लेना चाहिए।


109. साबुन के बारे में लिखें। (Describe about soap.)

उत्तर⇒ साबुन वसीय अम्ल के लवण होते हैं। उनका निर्माण वसा तथा क्षार के मिश्रण से होता है। साबुन घरेलू स्तर पर भी आसानी से बनाये जा सकते हैं। साबुन अपेक्षाकृत महँगे पड़ते हैं। यह कठोर जल में निष्क्रिय होते हैं इसलिए इसकी बहुत मात्रा की आवश्यकता होती है।


110. कॉफी के धब्बे किस प्रकार छुड़ाये जायेंगे ?

(How to remove stains of coffee ?)

उत्तर⇒ कॉफी के ताजे धब्बे सोहागा और जल की मदद से छूट जाते हैं। धब्बे वाले स्थान को सोहागा के जलीय घोल में कुछ समय तक डुबों देते हैं। अगर धब्बे सूती पर हो तो गर्म जल की धार उस पर डालेंगे। रेशमी वस्त्र पर लगे कॉफी के धब्बे को हाइड्रोजन पेरॉक्साइड से छुड़ायेंगे।


111. एक धुलाई मशीन का चयन करते समय किन-किन बातों का ख्याल रखना चाहिए ?

(What are the facts should considered at the time of selection of a washing machine ?)

उत्तर⇒ कपड़े धोने की मशीन बाजार में कई प्रकार के मॉडलों में उपलब्ध होती है जिनमें विभिन्न प्रकार की आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। इसलिए इनके मॉडलों को देखते हुए ISI मार्क का ध्यान देते हुए उचित प्रकार के धुलाई मशीन का चयन करना चाहिए। यह मशीन विद्यत चालित होती है तथा कई वस्त्र इसमें एक साथ धोए जा सकते हैं। सामान्यतः बाजार में चार प्रकार के धुलाई मशीन उपलब्ध हैं- (i) डोली मशीन, (ii) सिलिन्डर या रोटरी मशीन, (ii) ऑसिलेटिंग या रोकर मशीन एवं (iv) दबाव या चूषण मशीन।


112. डिटर्जेन्ट (अपमार्जक) से लाभ (Advantages of using detergent.)

उत्तर⇒ लाभ निम्नलिखित हैं-

(i) ये पानी में भरपूर झाग देते हैं।
(ii) ये कठोर एवं मीठे जल दोनों में कपड़ा साफ करते हैं।
(ii) इनमें विरंजक व कपड़ों में चमक लाने वाले तत्त्व भी मिले होते हैं।
(iv) इनका उपयोग ठंडे और गर्म जल में भी किया जा सकता है व इनसे कपड़े धोना भी आसान है।


113. खाद्य स्वच्छता (Food hygiene)

उत्तर⇒ उत्पादन से लेकर बिक्री तक अथवा उपभोग तक सभी व्यवहारिक उपाय जिसस भोज्य पदार्थों को सुरक्षित एवं पौष्टिक रखा जाता है खाद्य स्वच्छता कहलाता है।


114. वृद्धावस्था में पोषक तत्त्व (Geniatric Nutrition)

उत्तर⇒ वृद्धावस्था में 60 वर्ष व उससे ऊपर के व्यक्ति होते हैं। ये लोग अधिक श्रम नहीं कर पाते हैं। इसलिए इनके आहार में कम कैलोरी वाला आहार होना चाहिए। इन्हें विटामिन, प्रोटीन, खनिज लवण पूरी मात्रा में मिले हुए आहार संतुलित होने चाहिए।


115. खाद्य स्वच्छता के सिद्धांत (Principles of Food Hygiene)

उत्तर⇒ बचे हुए भोजन को तुरन्त समाप्त करें। गुणात्मक रूप से बढ़े सूक्ष्म जीवाणुओं की रोकथाम करें। हानिकारक सूक्ष्म जीवाणुओं को नष्ट करें। रसायनों द्वारा दूषण के विरुद्ध खाद्य को बचाएँ।


116. रेडीमेड कपड़े क्यों लोकप्रिय होते जा रहे हैं?

(Why ready made cloths becoming more popular ?)

उत्तर⇒ रेडीमेड कपड़े खरीद कर ही पहन लिए जाते हैं। इन्हें सिलने की झंझट नहीं होती। ये आकर्षक भी दिखते हैं। यह समय के हिसाब से प्रचलित फैशन एवं शैली के होते हैं और इसके दाम भी कम होते हैं।


117. डिजाइन क्या है?

(What is design ?)

उत्तर⇒ डिजाइन के सभी मूल सिद्धांत जैसे—लकीरें, आकृतियाँ, रंग, रचना आदि पहनने वाले व्यक्ति और जिस मौके पर उसे पहनना है उसमें एकता या सही ताल मेल बैठना चाहिए। इसे डिजाइन कहते हैं।


118. डिजाइन के सिद्धांत कौन-कौन से है?

(How may principles of design ?)

उत्तर⇒  डिजाइन के सिद्धांत निम्न हैं -(i) एकता, (ii) संतुलन, (iii) अनुपात, (iv) दबाव, (v) लयबद्धता एवं (vi) समन्वय इत्यादि।


119. आरामदेह कपड़े कौन से हैं?

(What are the comfortable clothes ?)

उत्तर⇒ जो कपड़े ठंडे, वजन में हल्के, देखने में सुंदर और छूने में अच्छे होते हैं, वे पहनने वाले को बहुत आराम देते हैं।


120. स्याही का दाग कैसे हटाये जायेंगे?

(How can we remove ink stain ?)

उत्तर⇒ स्याही का दाग लगने पर उसे साबुन तथा पानी से धोकर हटाएँ। स्याही के ताजे धब्बों को दूर करने के लिए कटे हुए नींबू तथा नमक से रगड़कर धूप में सुखाएँ। दाग हटाने के लिए कच्चे दूध के अलावा हाइड्रोजन पेरोक्साइड के घोल के प्रयोग से भी धब्बे दूर किये जा सकते हैं।

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर Home Science Part – 5 (20 Marks)


121. वस्त्र की किस्म से आप क्या समझते हैं ?

(What do you understand by the different type of cloths.)

उत्तर⇒ वस्त्रों की किस्म के अंतर्गत निम्न बातों पर ध्यान देना चाहिए

(i) रेशे के प्रकार, (ii) बनावट का प्रकार, (iii) अलंकरण के साजों सामान की क्वालिटी, (iv) मिश्रित किया है या नहीं, (v) सेनफोरोइज्ड (sanforized) है या नहीं, (vi) वस्त्रों की देख रेख की विधि सरल है या कठिन है।


122. डिजाइन बनाते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए ?

(What facts should be kept in mind at the time of making design ?)

उत्तर⇒ डिजाइन बनाते समय निम्न बातों को ध्यान में रखना चाहिए-

(i) डिजाइन पहनने वाले व्यक्ति की आयु, लिंग, त्वचा के रंग तथा व्यक्तित्व के अनुरूप हो।
(ii) डिजाइन फैशन के अनुकूल हो।
(iii) परिधान में दो या दो से अधिक डिजाइन हो तो उनमें पर्याप्त सामंजस्य स्थापित होना चाहिए।
(iv) डिजाइन देने के लिए उपयुक्त सामग्री निम्न कोटी की हो अन्यथा पहली धुलाई के बाद यह बेकार हो जायेगी।


123. नायलोन वस्त्रों की धुलाई कैसे की जाती है ?

(How are the Nylon Clothes washed?)

उत्तर⇒ मायलोन वस्त्रों की ध्रुलाई नायलोन वस्त्रों को किसी भी प्रकार के साबुन से धोया जा सकता है । वैसे इन्हें धोने में सिल्क के बने वस्त्रों की धुलाई की तरह नियमों का पालन करना चाहिए। साबुन के फेन में वस्त्रों को साफ करके, कई बार साफ पानी में खंगालने के बाद पानी से निकालकर अच्छी तरह जोर से झटका देकर झाड़ने के बाद अलगनी पर रख देना चाहिए, इससे अधिकांश पानी निकल जाता है। कपड़ों को छायादार स्थान पर हैंगर में लटकाकर सुखाना चाहिए। उन्हें निचोड़ना नहीं चाहिए।


124. मौसम तथा समय के अनुसार कैसे रंग के कपड़े पहनने चाहिए ?

(Which colour of clothes should be wear according to the season and time ?)

उत्तर⇒ मौसम सर्दियों में गरम रंग (लाल, पीला, नारंगी आदि) तथा गर्मियों में शीतल रंगों (नीला, हरा, बैंगनी) का प्रयोग करना चाहिए।
समय-किस समय कौन से रंग के वस्त्र पहनना चाहिए इसका भी ज्ञान होना चाहिए। खशी के समय सुंदर, भड़कीले, चमकीले तीव्र रंगों वाले वस्त्र पहनने चाहिए। शोक के समय सफेद रंग के वस्त्र पहनने चाहिए।


125. बेरोजगारी (Unemployment)

उत्तर⇒ जब देश में कार्य करने वाली जनशक्ति अधिक होती हैं, किन्तु काम करने के लिए राजी होते हुए भी बहुतों को प्रचलित मजदूरी पर कार्य नहीं मिलता, तो उस विशेष अवस्था को बेरोजगारी की संज्ञा दी जाती है।


126. अस्थायी दाँत (Temporary teeth)

उत्तर⇒ दाँतों का निर्माण मसूड़ों में गर्भावस्था में ही शुरू हो जाता है। जन्म के पश्चात 6 महीने से दाँत निकलने शुरू हो जाते हैं और 2 वर्ष तक सभी अस्थायी दाँत निकल आते हैं। यह दाँत अस्थायी होते हैं और इनकी संख्या 20 होती है।


127. मस्तिष्क (Brain)

उत्तर⇒ मस्तिष्क एवं सुषुम्ना केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र का सबसे बड़ा एवं महत्वपूर्ण अंग है। यह खोपड़ी के ऊपरी भाग में स्थित हैं। मस्तिष्क ही बुद्धि, इच्छा, संवेगों तथा संवेदनाओं का केन्द्र है। शरीररूपी जीवित यंत्र का संचालन इसी के द्वारा होता है। किसी कार्य को सीखने, समझने तथा उस पर विचार करने का कार्य मस्तिष्क ही करता है।


128. श्वसन तंत्र (Respiratory System)

उत्तर⇒ श्वसन तंत्र का प्रमुख कार्य वायु से ऑक्सीजन ग्रहण करना तथा शरीर में उत्पन्न कार्बनडाइऑक्साइड को बाहर निकालना है। श्वास लेने और छोडने की क्रिया को श्वसन क्रिया कहते हैं। इसका प्रमुख अंग हैं—मुख, नासिका द्वार, गला, कण्ठ, श्वासनली तथा फेफड़ा। ,व, नासिका द्वारलने और छोड़ने की क्रिया कारीर में उत्पन्न


129. तंत्रिका तंत्र (Nervous System)

उत्तर⇒ मस्तिष्क, सुषुम्ना तथा तंत्रिकाएँ सम्मिलित रूप से तंत्रिका तंत्र बनाती है। शरीर को विभिन्न क्रियाओं तथा अंगों की गति का नियंत्रण इसी तंत्र द्वारा होता है। इस तंत्र द्वारा बाह्य जगत का या शरीर में उत्पन्न संवेदनाओं का बोध होता है।


130. प्रजनन तंत्र (Reproductive System)

उत्तर⇒ प्रजननतंत्र का कार्य संतानोत्पति है। जीव के निर्माण में नर एवं मादा दोनों का बराबर योगदान रहता है किन्त गर्भधारण करने तथा शिश को जन्म देने का कार्य मादा ही करती है। स्त्री तथा पुरुष के प्रजनन अंगों में कुछ ऐसे उत्पादक कोष बनते हैं जिनके संयोग से नये जीव की उत्पत्ति होती हैं। संभोग क्रिया से स्त्री और पुरुष के उत्पादक कोष एक दूसरे के समीप पहुँचकर मिल जाते हैं जिससे गर्भ की स्थापना होती है।


131. भोजन संक्रमण (Food Infection)

उत्तर⇒ शरीर को स्वस्थ एवं हृस्ट-पुस्ट रखने के लिए स्वच्छ, समुचित मात्रा में पौष्टिक एवं संतुलित भोजन की आवश्यकता पड़ती है। लेकिन पौष्टिक एवं संतुलित आहार सेवन करने पर भी शरीर स्वस्थ नहीं रहता और रोगग्रस्त हो जाता है क्योंकि पौष्टिक आहार जीवाणुओं, रोगाणुओं, खमीर, फफूंदी या रासायनिक पदार्थों द्वारा संदूषित हो जाता है। जिससे भोजन का रंग-रूप एवं स्वाद बिगड़ जाता है जिसको खाने से बुखार, सिरदर्द, दस्त, उल्टी आदि होने लगती है।

भोजन के हानिकारक तत्त्वों से सम्पर्क होने की क्रिया को संदूषण कहते हैं।


132. MMR क्या है ?
(What is MMR?)

उत्तर⇒ बालकों को प्रतिरक्षित करने के लिए विभिन्न प्रकार के टीके लगवाये जाते हैं। शिशु को MMR का टीका तीन बीमारियों खसरा (Measles), मम्मस (Mumps) व रूबैला (Rubells) से बचाव के लिए दिया जाता है। यह टीका 15 से 18 माह की आयु में दिया जाता है।


133. वस्त्रों का चयन
(Choosing of clothes)

उत्तर⇒ वस्त्रों का चयन करते समय कुछ वस्त्रों पर विशेष ध्यान देना चाहिए। जैसे-कपड़े की किस्म, कपड़े का रेशा, बुनावट, मजबूती, कपड़े का रंग, छपाई एवं नमूने, उसकी कटाई एवं सिलाई, तुरपन, देखरेख, जिप, स्ट्रेप, बटन, फैशन एवं शैली, मूल्य आदि पर ध्यान देना चाहिए।


134. मिलावट के दुष्परिणामों से बचने के उपाय बताइए।
(State about ways or preventive measure to keep away the bad effects of
adulteration.)

उत्तर⇒ मिलावट से बचने के लिए उपभोक्ता को चाहिए कि उन खाद्य पदार्थों को ही खरीदे जिन पर आई० एस० आई० (ISI), एफ० पी० ओ० (F.P.O.) या एगमार्क (Agmark) की मोहर लगी हो। खाद्य पदार्थों को हमेशा मान्यता प्राप्त दुकान से ही खरीदने चाहिए। कई बार गलत स्थानों से सस्ती चीजें खरीदने से पैसा तो बच जाता है पर लेने के देने पड़ जाते हैं। जहाँ तक हो सके गृहिणी को प्राकृतिक रूप से प्राप्त होने वाले रंगों का प्रयोग करना चाहिए, जैसे-फल, सब्जियों तथा मसालों से प्राप्त होने वाले रंग। यदि किसी कारणवश कृत्रिम रंगों का प्रयोग करना पड़ जाय तो इनको थोड़ी मात्रा में ही प्रयोग में लाने चाहिए।


135. अमीनो अम्ल (Amino Acid)

उत्तर⇒ प्रोटीन जल अपघटन के बाद वह अपनी सबसे सरलतम इकाई अमीनो अम्ल में टट जाता है। अतः अमीनो अम्ल प्रोटीन की लघुत्तम इकाई है। दूसरे शब्दों में कई अमीनो अम्ल आपस में मिलकर प्रोटीन का निर्माण करते हैं। इसलिए अमीनो अम्ल को प्रोटीन का आधारीय स्तंभ कहते हैं।


136. प्रोटीन के प्रकार (Types of Protein)

उत्तर⇒ (A) गुणवत्ता के आधार पर प्रोटीन के प्रकार

(i) पूर्ण प्रोटीन
(ii) आंशिक पूर्ण प्रोटीन
(iii) अपूर्ण प्रोटीन

(B) भौतिक गुण एवं घुलनशीलता के आधार पर

(i) साधारण प्रोटीन
(ii) संयुग्मी प्रोटीन
(iii) व्युत्पन्न प्रोटीन

(C) प्राप्ति के साधन के आधार पर

(i) वानस्पतिक प्रोटीन
(ii) प्राणिज प्रोटीन


137. स्वच्छता (Sanitation)

उत्तर⇒ स्वच्छता से तात्पर्य है अपने आस-पास के जगह को साफ एवं स्वास्थ्यकर रखने की प्रक्रिया विशेषकर मलजल पद्धति एवं स्वच्छ जल की आपूर्ति उपलब्ध कराकर किया जा सकता है।


138. मिलावट की परिभाषा (Definition of Adulteration)

उत्तर⇒ खाद्य पदार्थ में कोई मिलता-जुलता पदार्थ मिलाने अथवा उसमें से कोई तत्त्व निकालने या उसमें कोई हानिकारक तत्त्व मिलाने से खाद्य पदार्थ की गुणवत्ता में परिवर्तन लाने को मिलावट कहा जा सकता है।


139. कार्य सरलीकरण से क्या समझते हैं ?

(What do you understand by work simplification ?)

उत्तर⇒ एक निर्धारित समय और शक्ति के परिणाम के अंतर्गत अधिक कार्य सम्पादित करना या कार्य की निश्चित मात्रा को सम्पन्न करने के लिए समय या शक्ति या दोनों की मात्रा को कम करने की प्रक्रिया को सरलीकरण कहते हैं।


140. मौद्रिक तथा वास्तविक आय में अंतर स्पष्ट करें।
(Differentiate between Cash income and Actual income.)

उत्तर⇒ मौद्रिक आय-वह आय जो व्यक्ति एक निश्चित अवधि में कार्य करके मुद्रा के रूप में प्राप्त करता है, मौद्रिक आय कहलाता है। जैसे-मासिक वेतन, मजदूरी, पेंशन आदि।

वास्तविक आय-किसी निश्चित समय के लिए जो सेवाएँ और सुविधाएँ परिवार के सदस्य प्राप्त करते हैं उसे वास्तविक आय कहते हैं। यह आय परिवार के सदस्यों के प्रयास द्वारा या मुद्रा हस्तांतरण द्वारा प्राप्त किया जाता है।


141. पारिवारिक आय (Family Income)

उत्तर⇒ परिवार के सभी सदस्यों की सम्मिलित आय को पारिवारिक आय कहते हैं। पारिवारिक आय के अंतर्गत मासिक वेतन, मजदूरी, पेंशन, ब्याज एवं लाभांश, किराया, भविष्य निधि, ग्रेच्युटी आदि को शामिल किया जाता है।


142. बॉण्ड्स (Bonds)

उत्तर⇒ यह सरकारी, गैर सरकारी कम्पनियों द्वारा निश्चित अवधि के लिए निर्गमित किये जाते हैं। इस पर अधिक ब्याज मिलता है, परंतु जमाराशि की सुरक्षा की सरकार की गारंटी नहीं होती है। इसके बावजूद कम्पनी की साख के अनुसार इनके बॉण्ड्स काफी प्रचलित हैं। ये बॉण्ड्स शेयर बाजार के दलालों द्वारा खरीदे तथा बेचे जाते हैं। कुछ सरकारी बॉण्ड्स जैसे—रेलवे, रिजर्व बैंक ऑफ इण्डिया के बॉण्ड्स पूर्णरूप से आयकर से मुक्त होते हैं।


143. रंग चक्र (Colour Wheel)

उत्तर⇒  (i) प्राथमिक रंग ये प्रथम श्रेणी के मुख्य रंग होते हैं। जैसे लाल, पीला व नीला रंग।
(ii) द्वितीयक तथा माध्यमिक रंग- ये दूसरी श्रेणी के रंग होते हैं। ये रंग दो प्राथमिक रंगों को मिलाकर बनाये जाते हैं। जैसे—हरा, बैंगनी, केसरी। पीला और नीला रंग समान मात्रा में मिलाने से हरा रंग बनता है लाल एवं नीला से बैंगनी रंग बनता है तथा लाल और पीला मिलाने से, केसरी रंग बनता है।
(ii) मध्यवर्ती रंग मध्यवर्ती रंग प्राथमिक रंगों तथा माध्यमिक रंगों को मिलाकर बनते हैं। जैसे—लाल-केसरी, लाल-बैंगनी, पीला-केसरी, नीला-हरा, पीला-हरा।


144. वैसे उत्पाद के नाम लिखें जिनमें आई० एस० आई० चिन्ह हो।
(Write the name of products which have I.S.I. mark.)

उत्तर⇒आई० एस० आई० चिन्ह वाले कुछ प्रमुख उत्पाद निम्नलिखित हैं। जैसे-साबुन, गैस का चूल्हा, सिलेन्डर, विद्युत उत्पाद, सीमेंट, साधारण नमक, बिस्कुट, मिल्क पाउडर, मिनरल वाटर इत्यादि।


145. भविष्य निधि योजना। (Provident Fund Scheme)

उत्तर⇒ यह नौकरी करने वाले व्यक्तियों के लिए अनिवार्य योजना है। इसके अंतर्गत प्रति मास वेतन में से एक निश्चित राशि भविष्य निधि में जमा करवा दी जाती है। आवश्यकता पड़ने पर विभिन्न उचित कार्य जैसे विवाह, शिक्षा, घुमने आदि के लिए तीन मास के वेतन जितनी . राशि ऋण के रूप में मिल सकती है जिसका भुगतान कर्मचारी आसान किस्तों में करता है।


146. विज्ञापन क्या है ? (What is Advertisement ?)

उत्तर⇒ विज्ञापन द्वारा विक्रेता का उत्पाद कम्पनी उपभोक्ता को अपने माल की सूचना देने और बिक्री बढ़ाने के उद्देश्य से इसका सहारा लेते हैं। विज्ञापन का अच्छा असर उपभोक्ताओं पर पड़ता है। खासतौर से जबकि विज्ञापन देखने में अच्छे, सचित्र और अच्छे शब्दों या नारों के रूप में हो। निर्माताओं का यह फर्ज बनता है कि वे अपने माल की बिक्री बढ़ाने के उद्देश्य से झूठा
और भ्रामक प्रचार न करे।


147. ECO मार्क क्या है ? (What is ECO mark ?)

उत्तर⇒ Egg Control Organisation


148. समय व्यवस्थापन (Time Management)

उत्तर⇒ न्यूनतम समय में अधिकतम कार्यों को गुणवतापूर्वक सम्पन्न करना ताकि व्यक्ति एवं पारिवारिक लक्ष्यों की प्राप्ति हो सके, समय व्यवस्थापन कहलाता है।


149. मौद्रिक आय (Money Income)

उत्तर⇒ परिवार के सभी सदस्यों को एक निश्चित समय में कार्य करने के बाद मुद्रा के रूप में जो. आय प्राप्त होती है, उसे मौद्रिक आय कहते हैं।


150. वास्तविक आय (Real Income)

उत्तर⇒ किसी विशेष अवधि में प्राप्त होने वाले सामान या सेवा को वास्तविक आय कहते हैं। ऐसी वस्तुओं, सेवाओं तथा साधनों के लिए परिवार को मुद्रा व्यय नहीं करनी पड़ती हैं परंतु इनके प्राप्त न होने पर अपनी मौद्रिक आय से व्यय करना पड़ता है।

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर Home Science Part – 6 (20 Marks)


151. खनिज धब्बे क्या हैं ? (What is mineral stains ?)

उत्तर⇒ खनिज पदार्थों से लगे धब्बों को खनिज धब्बे कहते हैं। जैसे—जंग, स्याही तथा औषधियों द्वारा लगे धब्बे खनिज धब्बे हैं। इन धब्बों को दूर करने के लिए हल्के अम्ल का प्रयोग करते हैं तथा इसके बाद हल्का क्षार लगाकर वस्त्र पर लगे अम्ल के प्रभाव को दूर कर दिया जाता है।


152. प्राणिज्य धब्बे क्या हैं ? (What is animal stains ?)

उत्तर⇒ प्राणिज्य पदार्थों के द्वारा लगने वाले धब्बों को प्राणिज्य धब्बे कहते हैं। जैसे-अण्डा, दूध, मांस, मछली आदि। इन खाद्यों के धब्बों में प्रोटीन होता है। अतः इन धब्बों को छुड़ाने के समय गर्म पानी का प्रयोग नहीं करना चाहिए। गर्म पानी से ये धब्बे पके हो जाते हैं। इन्हें ठण्डे पानी से रगड़कर साफ किया जा सकता है।


153. चिकनाई के धब्बे बताएँ। (Mention about grease stains.)

उत्तर⇒ घी, तेल, मक्खन, क्रीम, रसेदार सब्जी, पेंट, वार्निश, तारकोल आदि पदार्थों से लगने वाले धब्बे चिकनाई के धब्बे होते हैं। इन धब्बों को दूर करने के लिए ऐसे घोलकों का प्रयोग किया जाता है, जिसमें वे घुल जाए।


154. अपमार्जक क्या है ?
(What is Detergent ?)

उत्तर⇒ अपमार्जक के रूप में साबुन, रीठा, शिकाकाई आदि का प्रयोग किया जाता है। आजकल रासायनिक विधि से बनाए अपमार्जक उपलब्ध हैं। इनका प्रयोग रेशमी एवं कीमती वस्त्रों पर हो रहा है। रीठा एवं शिकाकाई का प्रयोग प्राचीनकालीन है।


155. वानस्पतिक धब्बा क्या है ? इसे कैसे हटाया जाता है?
(What is botanical spot ? How does it removed ?)

उत्तर⇒ पेड-पौधों से प्राप्त पदार्थों द्वारा लगनेवाले धब्बे वानस्पतिक धब्बे कहे जाते हैं, जैसे—चाय, कॉफी, फल, फूल तथा सब्जियों के धब्बे। इसे क्षारीय माध्यमों द्वारा हटाया जाता है। क्षारीय अभिकर्मक बोरेक्स, सुहागा, अमोनिया एवं वाशिंग सोडा हैं। सब्जी एवं हल्दी के धब्बे साबुन, जैबेल घोल द्वारा छुड़ाए जाते हैं। फल एवं सब्जी के धब्बे सहागा और नमक के घोल से भी छुट जाते हैं।


156. प्राथमिक रंग
(Primary Colour)

उत्तर⇒ ये प्रथम श्रेणी के मुख्य रंग हैं। यह किसी रंग को मिलाने से नहीं बनता है। जैसे लाल, पीला और नीला रंग।


157. प्राकृतिक तंतु (Natural Fibres)

उत्तर⇒  जो तंतु. हम प्रकृति से प्राप्त करते हैं, उसे प्राकृतिक तंतु कहते हैं। जैसे-कुछ पर-पौधों से, कुछ जानवरों और कीड़ों से प्राप्त होते हैं। ये तीन प्रकार के होते हैं

(i) वनस्पति-कपास, लिनन, कापोक, जूट, हेम्प, नारियल, सन।
(ii) प्राणिज-रेशम, ऊन
(ii) खनिज-सोना, चाँदी, स्टील, ससबेस्टस।


158. तंतु या रेशे (Fibre)

उत्तर⇒ तंतु वस्त्र निर्माण की मूलभूत इकाई है। तंतु आकार में बहुत छोटी-छोटी इकाई के रूप में रहते हैं। कई तंतुओं को मिलाकर सूत बनता है, जिससे वस्त्र तैयार होता है।


159. कपड़ों की वार्षिक देखभाल (Annual care of clothes)

उत्तर⇒ वस्त्रों का उपयोग प्रतिदिन होता है। लेकिन कुछ वस्त्र ऐसे होते हैं जिनका उपयोग कम अथवा कभी कभी अथवा मौसम के अनुसार होता है। अतः इनकी देखभाल भी दैनिक ना होकर वार्षिक होती है, जैसे-ऊनी तथा रेशमी वस्त्र।


160. स्टार्च लगाना (कड़ा करना) (Starching)

उत्तर⇒ वस्त्रों पर कड़ापन लाने एवं नवीन रूप प्रदान करने के लिए कलफ लगाने की विधि को स्टार्च लगाना कहते हैं।


161. विटामिन (Vitamin)

उत्तर⇒  विटामिन शरीर को विभिन्न रोगों से सुरक्षा प्रदान करती है तथा शरीर को रोगों से लड़ने की क्षमता प्रदान करती है। शरीर के उत्तम स्वास्थ्य के लिए यह आवश्यक होते हैं। विटामिन एक प्रकार का रासायनिक तत्त्व होता हैं जो शरीर में बहत ही अल्पमात्रा में पाए जाते हैं। यह छः प्रकार के होते हैं जैसे-A, B, C, D, E एवं KI ये शरीर में भिन्न-भिन्न कार्य करते हैं।


162: खमीरीकरण (Fermentation)

उत्तर⇒ यह वह प्रक्रिया है जिसमें कुछ सूक्ष्मजीवों को भोजन में मिलाया जाता हैं। इस तरह खमीरीकरण की प्रक्रिया से पौष्टिक तत्त्वों में परिवर्तन आ जाता है तथा नवीन पौष्टिक तत्त्व बढ़ जाते हैं। इससे दही, खमन, ढोकला, इडली, डोसा आदि बनते हैं।


163. अंकुरीकरण (Germination)

उत्तर⇒ अंकुरीकरण वह प्रक्रिया हैं जिसमें दाल तथा अनाजों में छोटे-छोटे अंकुर निकल आते हैं जब इनको थोड़े पानी में भिंगोकर रखा जाता है।


164. जीवन बीमा (Life Insurance)

उत्तर⇒ जीवन बीमा बचत का उत्तम साधन है। यह जीवन-बीमा निगम द्वारा किया गया एक बंधपत्र (Agreement) है, जिसमें भविष्य में अनिश्चित विपत्तियों या घटना घटने पर बीमाधारक को या उसके उत्तराधिकारी को एक पूर्व निश्चित धनराशि निगम द्वारा प्रदान की जाती है।


165. प्रोटीन के कार्य लिखें। (Write functions of protein.)

उत्तर⇒ प्रोटीन के कार्य प्रोटीन के कार्य नवीन तंतु का निर्माण, तंतु का मरम्मत, मानसिक शक्ति बढ़ाना, ऊर्जा और उष्मा का उत्पादन, हार्मोन का निर्माण, पाचक रसों का निर्माण तथा त्वचा को स्वस्थ रखना है।


166. जल की उपयोगिता बताइये। (Explain about utility of water.)

उत्तर⇒ जल का प्रयोग पीने, भोजन पकाने, सफाई करने, नहाने व गंदगी को बहा ले जाने के उद्देश्य से करते हैं। प्राणी के शरीर को ऑक्सीजन के बाद जल की ही सबसे अधिक आवश्यकता होती है।


167. रसोईघर को स्वच्छ रखने के चार उपाय लिखिए।
(Write down four methods to keep the kitchen clean.)

उत्तर⇒ रसोईघर साफ रखने के चार उपाय निम्नलिखित हैं

(i) रसोईघर सदा प्रकाशमय व हवादार होना चाहिए जिससे दुर्गन्ध नहीं आती तथा अंधेरे कोने में रहने वाले कीड़े-मकोड़े भी पैदा नहीं होते।
(ii) रसोईघर के दरवाजे व खिड़कियों में जाली लगी होनी चाहिए ताकि मक्खियाँ अंदर न आ सके।
(iii) रसोईघर के स्लेब व जमीन सरलता से साफ होने वाला होने चाहिए। भोजन के टुकड़ों को साथ-साथ फेंक देना चाहिए। इससे तिलचट्टे तथा चूहे दूर रहते हैं।
(iv) भोजन पकाने की बर्तन साफ करने के लिए भरपूर ठंडा तथा गर्म पानी उपलब्ध होना चाहिए।


168. शुद्ध तथा अशुद्ध जल में क्या अंतर है ?

(What is difference between pure and impure water?)

उत्तर⇒ शुद्ध तथा अशुद्ध जल में निम्नलिखित अंतर हैं-

शुद्ध जलअशुद्ध जल
(i) यह जल स्वच्छ, रंगहीन तथा चमकीला होता है।(i) यह गंदा, रंगीन तथा मटमैला होता है।
(ii) इसमें किसी प्रकार का मिठास, नमक एवं खारापन नहीं होता।(ii) इसमें किसी-न-किसी प्रकार के कैल्सियम अथवा मैग्नीशियम आदि तत्त्व होने के कारण खारापन होता है।
(iii) यह कीटाणुरहित होता है।(ii) यह कीटाणुयुक्त होता है।
(iv) इस जल में घुले पदार्थ स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नहीं होते।(iv) इसका प्रत्येक पदार्थ हानिकारक होता है
(v) चूनारहित होने के कारण यह हलका या मृदु जल कहलाता है।(v) चूना होने के कारण यह भारी या कठोर जल कहलाता है।
(vi) यह अवलंबित अशुद्धियाँ छोटे-छोटे लकड़ी के टुकड़े, रेत, मिट्टी के कण तथा सूक्ष्म कीड़े आदि से रहित होती हैं |(vi) सामान्यतः इसमें अवलंबित अशुद्धियाँ होती हैं।
(vii) यह शुद्ध जल पीने योग्य होता है।(vii) अशुद्ध जल पीने योग्य नहीं होता है

169. हिमीकरण क्या होता है ? (What is freezing ?)

उत्तर⇒ हिमीकरण हिमीकरण में खाद्य पदार्थों को इतना ठंढा किया जाता है कि वे बर्फ की तरह जम जाते हैं जिससे खाद्य पदार्थों के जीवाणुओं एवं एन्जाइम निष्क्रिय हो जाते हैं और वे अधिक समय तक खराब नहीं होते हैं। इस विधि में वैसे फल एवं सब्जियाँ संरक्षित किये जाते हैं, जो पकाने पर पिलपिले नहीं होते हैं। पैकिंग करने में बॉक्स पेपर, पोलीथीन, सेलोफेन एवं टीन-फॉयल आदि प्रयुक्त किये जाते हैं। इससे बँधे खाद्य पदार्थों को हिमीकरण यंत्र में रख दिया जाता है। इसका तापक्रम 30° F से 35° F तक रहता है।


170. वसा के कार्यों को लिखिए। (Write the fiunctions of fats.)

अथवा, वसा क्या है ? इसके कार्य एवं प्राप्ति के साधन लिखिए।
Or, (What is fats ? Write its functions & sources.)

उत्तर⇒ वसा- वसा में कार्बन, ऑक्सीजन और हाइड्रोजन होते हैं। वसा के ग्रहण से शरीर . में शक्ति और गर्मी उत्पन्न होती है। इसमें कार्बोहाइड्रेट से ढाई गुनी अधिक शक्ति और गर्मी प्रदान करने की क्षमता है। यह चरबीदार अम्ल और ग्लिसरिन का मिश्रण है।

वसा के कार्य- वसा के निम्नलिखित कार्य हैं-

(i) शरीर को ऊष्मा और ऊर्जा प्रदान करना।
(ii) शरीर की बाहरी रचना को सुडौल और सुगठित रूप देना।
(iii) शरीर को चिकना रखना।
(iv) विटामिनों की प्राप्ति।
(v) शीत से रक्षा करना और अधिक श्रम करने की क्षमता देना।

वसा प्राप्ति के साधन- सरसों, नारियल, मूंगफली, तिल, बादाम, सूखे मेवे, मछली, चरबी, अण्डे, घी, मक्खन आदि से वसा प्राप्त होते हैं।


171. शरीर में जल का क्या कार्य है ?

(What is the function of trater in the body ?)

उत्तर⇒ शरीर में जल का निम्नलिखित कार्य है-

(i) शरीर का निर्माण कार्य- शरीर के पूरे भार का 56% भाग जल का होता है। गुर्दे में 83%, रक्त में 85%, मस्तिष्क में 79%, मांसपेशियाँ में 72%, जियर में 70% तथा अस्थियाँ में 25% जल होता है।

(ii) तापक्रम नियंत्रक के रूप में- जल शरीर के तापक्रम को नियंत्रित रखता है।
(iii) घोलक के रूप में- यही माध्यम है जिससे पोषक तत्त्वों को कोषों तक ले जाया जाता है तथा चयापचय के निरर्थक पदार्थों को निष्काषित किया जाता है। पाचन क्रिया में जल का प्रयोग होता है। मूत्र में 96% जल होता है। मल-विसर्जन में इसकी आवश्यकता होती है। इसकी कमी से कब्जियत होती है।

(iv) स्नेहक कार्य- यह शरीर के अस्थियों के जोड़ों में होने वाले रगड़ से बचाता है। संधियों के चारों तरफ थैलीनुमा ऊतक में यह उपस्थित होता है, जिसके नष्ट होने से संधियाँ जकड़ जाती हैं।

(v) शरीर के निरूपयोगी पदार्थों को बाहर निकालना- शरीर के विषैले पदार्थों को मूत्र तथा पसीने द्वारा यह बाहर निकालने में सहायक होता है।


172. प्रत्यक्ष आय एवं अप्रत्यक्ष आय। (Direct income and indirect income.)

उत्तर⇒ प्रत्यक्ष आय-प्रत्यक्ष आय उन सभी वस्तुओं और सेवाओं से प्राप्त आय को कहते हैं जो एक परिवार को बिना मुद्रा व्यय के प्रत्यक्ष रूप से प्राप्त होती हैं जैसे-मुफ्त घर, निःशल्क शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएँ आदि।

अप्रत्यक्ष आय-अप्रत्यक्ष आय उन सभी वस्तुओं और सेवाओं से प्राप्त आय को कहते हैं जो मौद्रिक आय के माध्यम से प्राप्त होता है जैसे-कपड़ा टिकाऊ एवं सस्ता खरीदना आदि।


173. बचत खाता (Saving Account)

उत्तर⇒ बचत खाते में बैंक जमा धारक को चेक बुक तथा पासबुक प्रदान करती है। इसे अकेले या दो व्यक्ति संयुक्त रूप से खोल सकते हैं। बैंक निश्चित दर पर जमा राशि पर ब्याज देती है। सैलरी अकाऊंट इसी प्रकार के खाते के अंतर्गत आता है। यह खाता साधारण स्थिति वाले व्यक्ति के लिए सुलभ और लाभप्रद है।


174. अमानवीय संसाधन (Non-Human Resources)

उत्तर⇒ इसके अंतर्गत वैसी सुविधाएँ आती हैं जिन्हें हम पैसा देकर या धन देकर प्राप्त करते है। इसके अंतर्गत भौतिक साधन (मकान, वस्त्र, उपकरण, चल तथा अचल सम्पत्ति) तथा सामुदायिक सुविधाएँ (पार्क, अस्पताल, डाक सेवा, रेल तथा बस सेवाएँ, बिजली, पानी) आती हैं।


175. बचत (Saving)

उत्तर⇒ आय का वह अंश जो व्यक्ति बचाता है, बचत कहलाता है। बचत व्यक्ति की आय का वह भाग है जो भविष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए बचाकर रखा जाता है। कुल आय में से व्यय को घटा देने से जो कुछ शेष बचता है वह बचत कहलाता है।


176. निवेश
(Investment)

उत्तर⇒ जिस बचत राशि पर ब्याज अथवा प्रीमियम प्राप्त होता है, उसे निवेश या विनियोग कहते हैं। आय का वह भाग जो प्रतिमाहं या प्रतिवर्ष किसी सुव्यवस्थित योजना में लगाते हैं और जिसमें हमें आय होती है, निवेश कहलाता है।


177. चेक बुक (Cheque Book)

उत्तर⇒  बैंक में खाता खोलने के बाद खाताधारी को बैंक चेक बुक देती है। चेक बुक के द्वारा पैसा निकासी की जा सकती है। चेक के द्वारा एक-दूसरे से पैसे का लेन-देन किया जा सकता है।


178. बैंक खाता से क्या लाभ है ?
(What are the advantages of bank account ?)

उत्तर⇒ बैंक खाता से निम्न लाभ होते हैं

(i) बैंक में जमा रुपयों पर ब्याज मिलता है।
(ii) बैंक कम खर्च करना सिखाता है। अपने पास रुपये रखने से कुछ न कुछ खर्च हो । जाने की संभावना बनी रहती है।
(iii) बैंकों द्वारा रुपयों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजा तथा मँगाया जा सकता है।
(iv) बैंकों में रुपया रखने पर चोरी की संभावना नहीं रहती है।
(v) बैंक में रुपये रखने पर ही लॉकर सुविधा प्राप्त होती है।


179. घरेलू हिसाब-किताब से लाभ (Advantages of keeping Domestic Calculation)

उत्तर⇒ लाभ निम्न हैं-

(i) इससे अधिक व्यय करने से बचा जा सकता है।
(ii) लाभ का रिकार्ड रखने से परिवार की कुल आय व व्यय को जाना जा सकता है।
(iii) उधार लेने की आदत से बचा जा सकता है।
(iv) आय और व्यय में संतुलन बनाये रखना सरल हो जाता है।
(v) अपव्यय को कम किया जा सकता है।


180. घरेलू लेखा-जोखा कितने प्रकार का होता है ?

(How many types of Household accounts ?)

उत्तर⇒ घरेलू लेखा-जोखा तीन प्रकार से किया जाता है-

(i) दैनिक हिसाब लिखना- इसमें विभिन्न मद में किये गए खर्च का लेखा-जोखा रहता है।
(ii) साप्ताहिक एवं मासिक हिसाब– इसमें सप्ताह में या माह में किये गए व्यय का लेखा-जोखा रहता है।
(iii) वार्षिक आय-व्यय और बचत का रिकार्ड- इसमें सभी स्रोतों से प्राप्त आय का हिसाब एक तरफ रहता है और दूसरी तरफ व्यय का हिसाब रहता है जिसमें आकस्मिक खर्च, टैक्स, बचत आदि सभी का ब्योरा रहता है।


181. वस्त्रों को प्रभावित करने वाले तत्त्व
(Factor’s affecting the selection of clothes)

उत्तर⇒ वस्त्रों के चयन को प्रभावित करने वाले निम्न तत्त्व हैं-

(i) फैशन, (ii) आर्थिक स्थिति, (iii) अवसर, (iv) व्यक्तित्व, (v) जलवायु, (vi) आयु, (vii) व्यवसाय, (viii) शारीरिक बनावट।


182. रेडीमेड वस्त्र (Readymade Gaments)

उत्तर⇒  आज बढ़ती हुई महँगाई के कारण कपड़ों की कीमत तथा सिलाई दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। आज बाजार में विभिन्न प्रकार के बने बनाए वस्त्र कम कीमत में बहुतायत मात्रा में उपलब्ध हैं। आज उपभोक्ता को रेडीमेड उपलब्ध वस्त्रों में से चयन का मौका मिलता है। रेडीमेड वस्त्र बड़े-बड़े शोरूम से लेकर फुटपाथ तक सभी जगह मिलते हैं। यही नहीं रेडीमेड वस्त्रों की भिन्न-भिन्न किस्मों के कारण इनका व्यापार अधिक बढ़ गया है।


183. धुलाई मशीन

(Washing Machine)

उत्तर⇒ धुलाई मशीन के वास्तविक मूल्य की गणना समय तथा ऊर्जा बचाने की शर्तों के साथ-साथ धन विनियोग के रूप में की जाने लगी है। धुलाई मशीन समय एवं शक्ति बचाने का महत्त्वपूर्ण साधन मानी जाती है। यह विद्युत चालित होती हैं तथा कई वस्त्र इसमें एक साथ धोए जा सकते हैं।


184. सूती वस्त्रों का संग्रह कैसे करें ?

(How can we store the cotton clothes ?)

उत्तर⇒ सूती वस्त्रों का संग्रह निम्न प्रकार से कर सकते हैं।

(i) अलमारी में ठीक प्रकार से तह लगाकर रखें।
(ii) वस्त्रों को पूरी तरह से सुखाकर रखें।
(iii) विभिन्न प्रकार के कपड़े अलग-अलग ढेर में रखें।
(iv) वस्त्रों का संरक्षण करते समय उसमें स्टार्च न लगाएँ।
(v) दुर्गन्ध नाशक का प्रयोग करें।


185. कपड़े की शीट्र मरम्मत क्यों आवश्यक हैं?
(Why immediate repair of dress is necessary ?)

उत्तर⇒ कपडे की शीघ्र मरम्मत करवाने के निम्नलिखित कारण हैं-

(i) शीघ्र मरम्मत नहीं करवाने से कपड़े फट सकते हैं।
(ii) फटा कपड़ा बेतरतीब दीखता है।
(iii) फटे कपड़े से अंग दिखाई पड़ते हैं।


186. सिले-सिलाए वस्त्र कितने प्रकार के होते हैं ?
(What are the types of Readymade Garment ?)

उत्तर⇒ सिले-सिलाए वस्त्र निम्नलिखित दो प्रकार के होते हैं-

(i) बाह्य वस्त्र- यह निम्नलिखित होते हैं—कार्य करने के वस्त्र, यूनीफार्म, आराम के वस्त्र, खेल के वस्त्र, सूट, पैंट, ड्रेस, स्त्रियों के सूट, ब्लाऊज, ब्लेजर, जैकेट, कार्डीगन, पुलोवर, कोट, स्कर्ट, शर्ट, जीन्स, टाई, नहाने के वस्त्र, ट्रेक सूट आदि।
(ii) अन्तः वस्त्र- यह निम्नलिखित होते हैं जर्सी, नीचे पहने जाने वाले पैंट, मौजे, स्टाकिंग, ब्रा, पेन्टी, आदि।


187. भविष्य निधि में धन रखने के क्या लाभ हैं ?
(What are the advantages of keeping wealth or money in Provident Fund ?

उत्तर⇒  यह सरकारी या गैर-सरकारी सेवा में कार्यरत कर्मियों के लिए अनिवार्य योजना है। इसके अंतर्गत प्रति माह वेतन में से एक निश्चित राशि इस योजना में जमा कराई जाती है। आवश्यकता पड़ने पर विभिन्न कार्यों जैसे बच्ची का विवाह, शिक्षा, घूमने आदि के लिए उससे राशि ऋण के रूप में संस्थान प्रधान द्वारा प्राप्त होती है। भविष्य निधि में धन रखने के निम्नलिखित लाभ हैं-

(i) धन सुरक्षित रहता है।
(ii) धन ब्याजसहित वापस प्राप्त होता है।
(iii) आवश्यकता पड़ने पर सरलता से ऋण प्राप्त होता है।


188. F.P.O से आप क्या समझते हैं ?
(What do you mean by F.P.O.?)

उत्तर⇒ F.P.O. द्वारा फलों और सब्जियों की गुणवत्ता का न्यूनतम स्तर आवश्यक रूप से रखने का प्रावधान है। कारखानों में तैयार पदार्थों की उचित पैकिंग, मार्का और लेवल होना चाहिए। F.P.o. मार्का वाले पदार्थ निम्नलिखित हैं- जैम, जेली, मामलेड, कैचअप, स्कैवाश, अचार, चटनी, चाशनी, सीरप आदि।


189. आई० एस० आई० क्या है ? चार खाद्य पदार्थों के नाम लिखें जिन पर आई० एस० आई० चिह्न हों।

(What is I.S.I. ? Give the names of four food products having I.S.I. mark.)

उत्तर⇒ आई० एस० आई० (I. S. I.)- यह चिह्न पदार्थों की शुद्धता की गारन्टी देता है। भारतीय मानक संस्थान द्वारा निम्नलिखित विश्वास दिलाए जाते हैं –

उपभोक्ता को पदार्थ की गुणवत्ता, सुरक्षा तथा स्थिरता के आश्वासन के लिए विभिन्न प्रकार के उपभोक्ता पदार्थों पर आई० एस० आई (I.S.I.) चिह्न लगाया जाता है। कुछ भी खरीदने के पूर्व सामान की गुणवत्ता हेतु यह चिह्न अवश्य देख लेना चाहिए।

पदार्थों के नाम जिन पर I. S. I. चिह्न अंकित होते हैं-

(i) L.P.G.
(ii) बाल आहार,
(iii) बिस्कुट और
(iv) छत के पंखें।


190. घरेलू बजट का क्या महत्त्व है ?
(What are the importance of House Budget ?)

उत्तर⇒ घरेलू बजट किसी भी घर के परिवार का आर्थिक दपर्ण होता है। इसका महत्त्व निम्न हैं आय व्यय में संतुलन, बजट के अनुसार व्यय, बजट बनाने से बचत, बजट के अनुसार खच, सीमित आय में अधिकतम आवश्यकताओं की पूर्ति तथा परिवार को कर्ज नहीं लेना पड़ता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर Home Science Part – 1 (15 Marks)


1. थाइराईड ग्रंथि से आप क्या समझते हैं? मानव शरीर में इसके कार्यों का वर्णन करें।
(What do you understand by thyroid gland ! Describe its functions in human Body.)

उतर⇒ थाइराईड ग्रंथि मानव शरीर में पाये जाने वाले अंत: स्रावी ग्रंथियों में से एक है। थाइराईड ग्रंथि गर्दन के श्वसन नली के ऊपर एवं स्वरयंत्र के दोनों ओर दो भागों में बनी होती है। इसका आकार तितली के पंख के समान फैली होती है। यह थाइरॉक्सीय नामक हार्मोन बनाती है।

थाइराईड ग्रंथि शारीरिक वृद्धि और शारीरिक रासायनिक प्रक्रियाओं को नियंत्रित करता है। थाइराईड अंत:स्राव शरीर की प्रत्येक कोशिका में चयापचय के नियमन में सहायता प्रदान करता है। भिती की कोशिकाओं में ये पदार्थ बनाती है। शरीर के ऊर्जा क्षय, प्रोटीन उत्पादन एवं अन्य हार्मोन के प्रति होने वाली संवेदनशीलता करता है।


2. लिंग ग्रंथियाँ क्या है? इनके कार्यों को लिखें।
(What are sex glands? Write their functions.)

उतर⇒ लिंग ग्रंथि एक जीव के सेक्स कोशिकाओं और सेक्स हार्मोन का उत्पाद करती है। पुरुष के वृषण (Testes) और स्त्री में डिम्ब ग्रंथि (overies) “लिंग ग्रंथियाँ” या यौन ग्रंथियाँ कहलाती है। डिम्ब ग्रंथि से दो तथा वृषण से एक अंत: स्राव निकलता है।

लिंग ग्रंथि के कार्य
लिंग ग्रंथि के कार्य निम्न हैं-

(1) वृषण (Testis)- इसकी संख्या दो होती हैं। यह शरीर के बाहर शिशन के नीचे अंडकोष या वृषण कोष नामक थैली में अवस्थित रहता है। इसके दो भाग होते हैं एक भाग शुक्राणु उत्पन्न करता है जो शुक्रवाहिनी नलिका द्वारा शुक्राशय में पहुँचकर एक होते हैं तथा मैथुन के समय बाहर निकलते हैं। ग्रंथि का दूसरा भाग एक प्रकार का पुरुष हार्मोन अत:स्राव उत्पन्न करता है जिसे ऐंड्रोजन (Androgen) कहते हैं जो सीधे रक्त में अवशोषित हो जाता है। इसी अंत:स्राव से पुरुष की जननेन्द्रियों में वृद्धि होती है।

(2) डिम्ब ग्रंथि- यह नारी यौन ग्रंथि है। इसकी संख्या दो होती है। यह बादाम के आकार की तथा उदर के नीचले भाग (श्रोणी) गुहा में रहती है। यह गर्भाशय की दाहिनी और बायीं ओर स्थित रहती है। डिम्ब ग्रंथि के अंत:स्राव को आस्ट्रोजन (Oestrogen) तथा “प्रोजेस्ट्रान” (Progestrone) कहते हैं। ऑस्ट्रोजन स्त्री अंगों को गर्भधारण योग्य बनाता है। गर्भाधान से गर्भाशय तथा योनि प्रणाली में जो परिवर्तन होता है इसी अंत: स्राव के कारण होता है। किशोरियों को युवती बनाने में यह सहायक होता है।


3. हार्मोन्स के क्या कार्य है ? (What are the functions of Hormones?)

उत्तर⇒ प्रत्येक. अंत: स्रावी ग्रंथियों से विभिन्न प्रकार के हार्मोन निकलते हैं जिनका काम शरीर में भिन्न-भिन्न होता है जो इस प्रकार हैं-

(i) थाइराइड ग्रंथि का स्त्राव- थाइरॉक्सिन नामक स्राव थाइरॉइड ग्रंथि से निकलता है। इसमें आयोडीन की पर्याप्त मात्रा होती है। यह कोशिकाओं की वृद्धि तथा उनमें होने वाली क्रियाओं को नियत्रित करता है। इसकी कमी से शारीरिक वृद्धि रुकना, नाटा, मानसिक विकास रुक जाता है।

(ii) उपचुल्लिका ग्रंथि का स्त्राव- यह हार्मोन परावटु ग्रंथि (Parathyroid gland) से निकलता है। यह हार्मोन कैल्सियम तथा फॉस्फोरस के चयापचय को नियंत्रित करता है। इस हार्मोन के कम स्रावित होने पर रक्त में कैल्सियम की मात्रा कम हो जाती है जिससे शरीर की अस्थियों की वृद्धि रुक जाती है।

(iii) पीयुष ग्रंथि का स्त्राव- इस स्राव में पिट्रेसिन एवं पिपटोसिन नामक स्राव मिला रहता है। पिट्रोसिन रक्त के दाब की शरीर में नियंत्रित रखता है एवं मूत्र में जल की मात्रा बढ़ने नहीं देता। यह गर्भाशय के पेशियों के संकचन एवं नियमन के कार्य को नियंत्रित रखता है।

(iv) अधिवृक्क ग्रंथियों का स्त्राव- इसका प्रभाव स्वायत्त नाड़ी संस्थान पर पड़ता है। यह शरीर में उत्तेजना एवं साहस भरता है।

(v) थाइमस ग्रंथि को स्नाव- यह स्राव प्रजनन संस्थान के विकास एवं यौवनारंभ के लिए आवश्यक है। यह शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ाता है। .


4. गृह विज्ञान का स्वरोजगार के लिए क्या-क्या उपयोग है ?
(What are the applications of Home Science for self employment ?)

उत्तर⇒ गृह विज्ञान का स्वरोजगार के लिए निम्नलिखित उपयोग हैं-

(i) प्रिंटिंग खोलकर- गृह विज्ञान में सिखाए गए सिद्धांतों, नियमों तथा विधियों का प्रयोग करने पर ब्लॉक-प्रिंटिंग तथा बंधेज खोलकर आर्थिक लाभ प्राप्त किया जा सकता है।

(ii) शिशु-गृह (क्रेच) खोलकर- शिशु-गृह खोलने की विधि, आवश्यक साज-सामान तथा कार्यक्रमों की जानकारी होने से शिशु-गृह खोला जा सकता है।

(iii) साबुन तथा अपमार्जक का निर्माण कर- महिलाएँ व्यवस्थित तथा बुद्धिपूर्ण ढंग से संगठित होकर यह कार्य कर धनोपार्जन कर सकती हैं।

(iv) संरक्षण संबंधी व्यवसाय करके- महिलाएँ जैम, जेली, अचार, मुरब्बे आदि बनाकर तथा उसके डिब्बाबंदी कर बेचकर आर्थिक स्थिति सुधार कर धनोपार्जन कर सकती हैं इसके अतिरिक्त पापड़, बड़ियाँ आदि बनाकर उसे पैक कर बेच सकती हैं।

(v) वस्त्र सिलाई (बुटीक) करके- आधुनिकतम वस्त्रों की डिजाइनिंग की जानकारी होने से विभिन्न प्रकार के वस्त्रों की सिलाई कर धनोपार्जन कर सकती हैं। साथ ही कढ़ाई कर, स्वेटर बुनाई कर, पुस्तकों में जिल्द बाँधकर, कागज के फूल-पत्ती बनाकर, कपड़ों पर विभिन्न प्रकार रंगाई कर धन कमा सकती हैं।

(vi) ड्राइंग तथा ड्राइक्लीनिंग खोलकर- महिलाएँ गृह विज्ञान अध्ययन कर विभिन्न प्रकार के कपड़ों की धुलाई के साथ-साथ सूखी धुलाई करके धनोपार्जन कर सकती हैं।

(vii) प्रशिक्षण कक्षाएँ चलाकर- गृह विज्ञान के उपविषयों का पर्याप्त ज्ञान प्राप्त कर ‘महिलाएँ प्रशिक्षण कक्षाएँ खोलकर तथा उसे कुशलतापूर्वक चला कर धनोपार्जन करती हैं, जैसे—कुकरी कक्षाएँ, स्टिचिंग कक्षाएँ, संरक्षण तथा डिब्बाबंदी कक्षाएँ, साथ ही सिलाई कक्षाएँ आदि।

(viii)लघु उद्योग स्थापित कर- गृह विज्ञान के अध्ययन द्वारा महिलाएँ भी लघु उद्योग स्थापित कर धनोपार्जन कर सकती हैं, जैसे—कपड़े बुनाई, दरी एवं कालीन बुनाई, मोमबत्ती बनाना आदि।


5. प्रसवोपरांत देखभाल के पहलू क्या है ?
(What are the aspects of postamatal curve?)

उत्तर⇒ प्रसवोपरांत देखभाल के पहलू निम्नलिखित हैं-

प्रसवोपरांत माता की देखभाल-

(1) भोजन- प्रसव के बाद प्रसूता को संतुलित आहार देना आवश्यक हो जाता है। प्रसूता के भोजन में गर्म, तरल, बलवर्द्धक, सुपाच्य होना चाहिए।

(2) विश्राम- एवं नींद प्रसव के बाद उसके गर्भ सम्बंधी अंगों में परिवर्तन आ जाता है। उसे स्वभाविक स्थिति में आने में काफी समय लगता है। इसलिए विश्राम करना जरूरी है। प्रसूता को प्रसव कष्ट एवं थकान के बाद अच्छी नींद आती है।

(3) स्वच्छता- एवं स्नान-प्रसव के बाद प्रसूता के जननांग पर सेनेटरी पैड लगा देना चाहिए। तेल मालिश के बाद प्रसता को गर्म पानी में तौलिया भिंगोकर उसके शरीर को पोंछ देना चाहिए।

(4) व्यायाम- प्रसव के बाद प्रसूता का शरीर बेडौल हो जाता है। उसे पूर्व स्थिति में लाने के लिए हल्का व्यायाम करना चाहिए।

प्रसवोपरांत नवजात की देखभाल-

(1) स्तनपान- माता का दूध बच्चों को अनेक रोगों से बचाता है इसलिए बच्चे के जन्म के बाद स्तनपान कराना चाहिए।

(2) निंद्रा- स्वस्थ बच्चा 18-22 घंटा तक सोता रहता है। वह केवल भूख लगने तथा मल-मूत्र त्याग से उठता है।

(3) अंगों की सफाई- बच्चे को प्रथम स्नान कराते समय उसके विभिन्न अंगों की सफाई पर ध्यान देना आवश्यक है। जैसे-नाक, आँख, कान, गले की सफाई इत्यादि।

(4), टीकाकरण- शिशु जन्म के कुछ घंटों के बाद B.C.G.का टीका लगा देना चाहिए।


6. गृह प्रसव एवं अस्पताल प्रसव का तुलनात्मक विवरण दें।

(Give a comparative description of home delivery and hospital delivery?)

उत्तर⇒ गृह प्रसव एवं अस्पताल में प्रसव के तुलनात्मक विवरण निम्न हैं-

गृह प्रसवअस्पताल प्रसव
1. गृह में प्रसव करना कम खर्चीला होता है।1. अस्पताल में प्रसव कराने पर अधिक खर्चीला होता है।
2. चिकित्सीय दृष्टि से घर पर प्रसव कराना असुविधाजनक होता है।2. चिकित्सीय दृष्टि से अस्पताल में प्रसव कराना उत्तम होता है।
3. अनौपचारिक वातावरण रहता है।3. औपचारिक वातावरण रहता है।
4. गृह पर प्रसव कराने से जच्चा और बच्चा के साथ अनहोनी होने की समस्या रहती है।4. अस्पताल में प्रसव कराने से जच्चा और बच्चा के साथ अनहोनी का खतरा कम हो जाता है।
5. घर पर प्रसव कराने से बाहर ले जाने के लिए यातायात की समस्या नहीं रहती है।5. अस्पताल में प्रसव कराने के लिए गर्भवती को प्रसव केन्द्र ले जाने के लिए यातायात की समस्या हो सकती है।

7. गर्भवती महिलाओं के संतुलित आहार का आयोजन आप कैसे करेंगी ? गर्भावस्था में मुख्यत: कौन-कौन से पौष्टिक तत्त्वों की आवश्यकता होती है ? वर्णन करें।

(How will you planning of balance diet for pregnant women ? What are the main nutrients essential during pregnancy ? Explain.)

उत्तर⇒ गर्भवती महिलाओं के संतुलित आहार का आयोजन- गर्भवती एवं भावी शिश दोनों के स्वास्थ्य के लिए पौष्टिक आहार का अधिक महत्त्व होता है। गर्भावस्था में भ्रूण निर्माण के कारण शरीर में तीव्र गति से कई परिवर्तन होते हैं उपापचय क्रियाएँ तीव्र गति से होने लगती हैं जो पोषक तत्त्वों की आवश्यकता को बढ़ा देती हैं।

गर्भावस्था में प्रोटीन, कैल्सियम, फॉस्फोरस एवं लौह-लवण की अधिक आवश्यकता पड़ती है। जन्म के समय शिशु का भार 3.2 किलोग्राम होने के लिए उसके शरीर में 500 ग्राम प्रोटीन, 30 ग्राम कैल्शियम, 14 ग्राम फॉस्फोरस, 0.4 ग्राम लौह लवण तथा अन्य विटामिनों की विविध मात्रा होनी चाहिए। गर्भकाल के सातवें, आठवें एवं नवें महीने में शिशु का विकास अत्यन्त तीव्र गति से होता है। वह माँ के रक्त से प्रोटीन, कैल्शियम, फॉस्फोरस, लौह-लवण, विटामिन एवं अन्य खनिज लवण अधिक मात्रा में शोषित करता है। भ्रूण उन्हीं तीन अन्तिम महीनों में अपने वजन का ¾ भाग पोषक तत्त्वां से प्राप्त करता है।

गर्भावस्था में विभिन्न पोषक तत्त्वों की आवश्यकताएँ निम्नलिखित होती हैं-

ऊर्जा, प्रोटीन, कैल्शियम, लौह-लवण, आयोडीन, विटामिन A, विटामिन B, विटामिन D


8. किशोरावस्था के लिए आहार आयोजन किस प्रकार करेंगी ? एक आहार तालिका प्रस्तुत करें।

(How will you make food planning for adolescence ? Represent a menu ..table.)

उत्तर⇒ किशोरावस्था तीव्रगति से वृद्धि एवं विकास की अवस्था है। यह अवस्था 12 वर्ष से 20 वर्ष तक होती है। इस अवस्था में अधिक पोषक तत्त्वों की आवश्यकता होती है। किशोरावस्था में आहार आयोजन करते समय निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना चाहिए-

(i) ऊर्जा, प्रोटीन, लौह तत्त्व एवं कैल्सियम पोषक तत्त्व अति आवश्यक होते हैं।

(ii) अत्यधिक नहीं खाना चाहिए तथा व्यायाम आवश्यक है।

(iii) पोषक तत्त्वों की आवश्यकता- कैलोरी-2060, प्रोटीन-63 ग्राम, वसा- 22 ग्राम, कैल्सियम-500 ग्राम तथा लौह तत्त्व—30 मि० ग्राम, विटामिन A–6 मि०ग्राम, – थायमीन-121 मि०ग्रा० तथा विटामिन D-40 मिग्रा० होती है।

(iv) आहार आवश्यकता खाद्यान्न- 350 ग्राम, दाल-70 ग्राम, हरी सब्जियाँ-150 ग्राम, अन्य सब्जियाँ-75 ग्राम, जडें या कंद-75 ग्राम, फल/दूध-150 ग्राम/200 ग्राम, वसा/तेल/शक्कर/गुड-250 मि०ली०/50 ग्राम।

किशोरावस्था के लिए आहार तालिका

खाद्य-पदार्थमात्राएँ/अदद
(i) सुबहदूध,1 कप
 भरा हुआ पराठा
टमाटर चटनी2 चम्मच
टिफिन टमाटर सैंडविच,4
सेब तथा संतरा।
(ii) दोपहर सांभर1 कटोरी
उबले चावल,1 प्लेट 
मेथी आलू सब्जी    ¼ कटोरी
खीरा रायता1 कटोरी
(iii) शाम 
 
दूध शेक स्लाइस ब्रेड मक्खन सहित।1 ग्लास4
(iv) रात्रि
 
दाल,1 कटोरी
आलू-पालक सब्जी ,½ कटोरी
रोटी,4
सलाद, 1 प्लेट
 खीर या कस्टर्ड 1 कटोरी
(v) सोने के पहले बादाम – दुध 1 कप

9. भोजन का हमारे जीवन में क्या महत्त्व है ?

(What is the importance of food in our life ?)

उत्तर⇒ भोजन का हमारे जीवन में बहुत महत्त्व है जो इस प्रकार है-

A. भोजन का शारीरिक महत्च-

(i) भोजन शरीर को ऊर्जा प्रदान करता है- शरीर में ऊष्मा बनाए रखने, शारीरिक कार्य करने के लिए मांसपेशियों की सक्रियता प्रदान करने तथा शरीर के विभिन्न अंगों को क्रियाशील बनाये रखने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है।

(ii) भोजन शारीरिक वृद्धि एवं विकास करता है- जब शिशु जन्म लेता है तो वह 2 किलोग्राम से 3.5 किलोग्राम तथा लंबाई 40-50 सेमी० होती है। युवावस्था तक आते-आते 50-70 किग्रा० तथा 5-6 फीट की लंबाई तक पहुँच जाता है।

(iii) भोजन शरीर के रोगों से रक्षा प्रदान करता है- भोजन में सभी पोषक तत्त्व होते हैं जो शरीर के लिए सुरक्षात्मक कार्य करते हैं। ये पोषक तत्त्व सभी प्रकार के विटामिनों तथा खनिज लवण में होते हैं। शरीर को रोगों से संघर्ष करने की शक्ति इन्हीं पोषक तत्त्वों के भोजन में रहने से प्राप्त होती है।

(iv) भोजन शारीरिक क्रियाओं का संचालन, नियंत्रण एवं नियमन करता है-

शरीर में रक्त का थक्का बनना, शारीरिक तापक्रम पर नियंत्रण, जल संतुलन पर नियंत्रण, श्वसन गति का नियमन, हृदय की धड़कन, उत्सर्जन आदि क्रियाओं का भोजन द्वारा नियमन एवं नियंत्रण होता है।

(B) सामाजिक महत्त्व

(i) भोजन आर्थिक स्तर का प्रतीक है- उच्च आर्थिक स्तर के लोग महँगे फल, मेवे, बड़े होटलों में खाना खाते हैं। मध्यमवर्गीय लोग मौसम के फल, सब्जियों का प्रयोग करते हैं। जन्मदिन, विवाह, त्योहार पर भोजन का आयोजन कर अपनी आर्थिक स्तर को दिखाते हैं।

(ii) भोजन आतिथ्य का प्रतीक है- भोजन द्वारा अतिथि सत्कार भी किया जाता है। विशेष तीज त्योहार पर विशिष्ट एवं स्वादिष्ट भोजन बनाया जाता है और भोज का आयोजन कर अपनी खुशी प्रकट करते हैं।

(C) भोजन का मनोवैज्ञानिक महत्त्व

(i) भोजन द्वारा संवेगों को प्रकट करना- भोजन द्वारा संवेगों को प्रकट किया जाता है। जैसे-दुःखी मन से कम भोजन खाया जाता है तथा मन खुश होने पर अधिक भोजन खाया जाता है।

(ii) सुरक्षा की भावना के रूप में- भोजन सुरक्षा की भावना का प्रतीक है। घर का बना भोजन न केवल पौष्टिक और स्वच्छ होता है बल्कि एक सुरक्षा की भावना प्रदान करता है।

(iii) भोजन का प्रयोग बल के रूप में- कई बार लोग विद्रोह दर्शाने के लिए भूख हड़ताल करते हैं। यदि प्रशंसनीय कार्य करता है तो उसे इनाम के रूप में उसका प्रिय भोजन बनाकर दिया जाता है।


10. भोजन पकानें, परोसने और खाने में किन-किन नियमों का पालन करना चाहिए ?

(What are the rules that should be followed while cooking, serving and eating food ?)

उत्तर⇒ भोजन पकाने के नियम- भोजन पकाने के निम्नलिखित चार नियम हैं-

(i) जल द्वारा- पाक क्रिया आर्द्रता के माध्यम से उबालकर की जाती है।
(ii) वाष्प द्वारा- स्वास्थ्य की दृष्टि से यह उत्तम है क्योंकि खाद्य पदार्थ जल की वाष्प द्वारा पकाया जाता है।
(ii) चिकनाई द्वारा- उसके लिए तेल, घी आदि का प्रयोग किया जाता है। इसे निम्नलिखित विधि द्वारा पकाए जाते हैं-

(a) तलने की अथली विधि
(b) तलने की गहरी विधि तथा
(c) तलने की शुष्क विधि।

तलने की अथली विधि द्वारा चीला, डोंसा और मछली पकाये जाते हैं। तलने की गहरी विधि द्वारा पूड़ी, कचौड़ी, समोसे पकाये जाते हैं। तलने की शुष्क विधि द्वारा सॉसेज तथा बेलन बनाए जाते हैं।

(iv) वायु द्वारा- वायु का प्रयोग भुंजने तथा सेकने में किया जाता है। सब्जियों को पकाते
समय धीमी आँच का प्रयोग करना चाहिए। ढंककर भोज्य पदार्थों को पकाने से, वाष्प के दबाव से शीघ्र पकते हैं तथा उसकी सुगंध भी बनी रहती है। दूध को उबलनांक पर लाकर आँच धीमी कर देना चाहिए और उसे कुछ देर उबलने देना चाहिए।

भोजन परोसने तथा खाने के नियम- इसके चार नियम हैं-

(A) विशद्ध भारतीय शैली- इसमें फर्श पर आसनी, दरी या लकडी के पटरे पर बैठकर भोजन किया जाता है।
(B) भारतीय-विदेशी मिली- जुली शैली-इस शैली में मेज और कुर्सी पर बैठकर भोजन ग्रहण किया जाता है।
(C) पाश्चात्य शैली- इसमें मेज पर रखे काँटे, चम्मच तथा छुरी के प्रयोग से भोजन किया जाता है। भोजन परोसने का कार्य वेटर करते हैं।
(D) स्वाहार (बफे) शैली- स्थान की कमी तथा अतिथि के अधिक होने की स्थिति में इसका प्रयोग किया जाता है। इसमें एक बड़ी मेज पर खाने की सभी सामग्रियों को डोंगों में रख दिया जाता है। इसमें स्वयं ही खाना निकालकर लोग खड़े होकर या घुमकर खाते हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर Home Science Part – 2 (15 Marks)


11. विकास के विभिन्न क्षेत्रों में गृह विज्ञान का क्या योगदान एवं उपयोगिताएँ हैं? वर्णन करें।

(What are the applications of Home Science in the different field of development ? Describe.)

उत्तर⇒ विकास के विभिन्न क्षेत्रों में गृह विज्ञान का योगदान निम्न हैं :

(i) पारिवारिक स्तर के उत्थान में- गृह विज्ञान की शिक्षा प्राप्त लड़कियाँ जिन घरों में खती है उन्हें अपने सुझावों द्वारा लाभान्वित करती हैं। गह विज्ञान की छात्राएँ रेडियो एवं टी०वी० कार्यक्रमों के माध्यम से पत्र-पत्रिका लिखकर जन-जीवन का पारिवारिक स्तर ऊँचा उठाने में सहायता प्रदान करती है।

(ii) स्वास्थ्य के क्षेत्र में- गृह विज्ञान शिक्षा प्राप्त लड़कियाँ स्वयं के एवं परिवार के स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहती है। स्वच्छता बच्चों को समय पर टीका लगवाना आदि कार्य कुशलता से करती है।

(iii) पोषण के क्षेत्र में- गृह विज्ञान के अंतर्गत पोषण ज्ञान प्राप्त कर लड़कियाँ कम खर्च में प्रत्येक आयु वर्ग के लिए पोषक तत्वों से युक्त आहार आयोजन करती है।

(iv) रोजगार के क्षेत्र में- गृह विज्ञान स्नातक लड़कियाँ कृषि अनुसंधान, पशुपालन, डेयरी, प्रसार शिक्षा निदेशालय, शिक्षण संस्थानों, पाक कला, सिलाई, हस्त शिल्प एवं स्वयं प्रशिक्षण केन्द्र आरम्भ करके धन अर्जित कर सकती है एवं दूसरों को रोजगार दे सकती है।

(v) बाल शिक्षा एवं स्त्री शिक्षा के क्षेत्र में- गृह विज्ञान शिक्षा प्राप्त लड़कियाँ बच्चों के पठन-पाठन में सहयोग देती है। ये लड़कियाँ स्त्रियों को शिक्षित कर एवं रोजगार के नये अवसर प्रदान कर उन्हें आत्मनिर्भर बनाता है।


12. भारत में खुले में शौच समस्या का समाधान क्यों मुश्किल है ?
(Why problem of defection in open areas is difficult to solve in India?)

उत्तर⇒ भारत में शौच समस्या का समाधान निम्न कारणों से मुश्किल है-

(1) शौचालय की खुबियों से अनभिज्ञता के कारण भारत के लोग शौच की समस्या से ग्रस्त हैं।
(2) भारत के लोग पुरानी दिनचर्या को छोड़ने से इंकार के कारण भी शौच की समस्या है।
(3) रूढ़िवादी परम्पराओं के कारण भी शौच की समस्या है। लोग अपनी आदतों को बदलना नहीं चाहते।
(4) “खुले में शौच करने के कई फायदे हैं” का समर्थन करना भी इसका कारण है।
(5) भारत गाँवों का देश है। गाँवों में लोग अशिक्षित, गरीब तथा अज्ञानता के कारण सरकार द्वारा दी गयी शौचालय निर्माण सहायता की जानकारी की कमी या उससे अंजान रहते हैं।


13. आहार आयोजन के महत्त्व क्या हैं ?
(What is the importance of meal planning ?)

उत्तर⇒ परिवार के सभी सदस्यों को स्वस्थ रखने के लिए आहार का आयोजन आवश्यक है। आहार आयोजन का महत्त्व निम्न कारणों से है-

(i) श्रम, समय एवं ऊर्जा की बचत- आहार आयोजन में आहार बनाने के लिए ही इसकी योजना बना ली जाती है। आवश्यकतानुसार यह आयोजन दैनिक, साप्ताहिक, अर्द्धमासिक तथा मासिक बनाया जा सकता है। इससे समय, श्रम तथा ऊर्जा की बचत होती है।

(ii) आहार में विविधता एवं आकर्षण- आहार में सभी भोज्य वर्गों का समायोजन करने से आहार में विविधता तथा आकर्षण उत्पन्न होता है। साथ ही आहार पौष्टिक, संतुलित तथा स्वादिष्ट हो जाता है।

(iii) बच्चों में अच्छी आदतों का विकास करना- चूँकि आहार में सभी खादय वर्गों को शामिल किया जाता है। इससे बच्चों को सभी भोज्य पदार्थ खाने की आदत पड़ जाती है। इससे ऐसा नहीं होता कि बच्चा किसी विशेष भोज्य पदार्थ को ही पसंद करे तथा अन्य को ना पसंद करे।

(iv) निर्धारित बजट में संतुलित एवं रुचिकर भोजन- आहार का आयोजन करते समय निर्धारित आय की राशि को परिवार की आहार आवश्यकताओं के लिए इस प्रकार वितरित किया जाता है। जिससे प्रत्येक व्यक्ति की रुचि तथा अरुचि का भी ध्यान रखा जाता है और प्रत्येक व्यक्ति को संतुलित आहार भी प्रदान किया जाता है। आहार आयोजन के बिना कोई भी व्यक्ति कभी भी आहार ले सकता है। परंतु व्यक्ति को पौष्टिक आवश्यकताओं को पूरा करने में समर्थ नहीं हो सकता है। आहार आयोजन के बिना परिवार की आय को आहार पर खर्च करने से बजट भी असंतुलित हो जाता है।


14. आहार आयोजन क्या है? आहार आयोजन को प्रभावित करने वाले कारकों का वर्णन करें।
(What is meal planning? Describe the factors affecting meal plannig.)

उत्तर⇒ आहार आयोजन का अर्थ आहार की ऐसी योजना बनाने से है जिससे सभी पोषक तत्त्व उचित तथा संतुलित मात्रा में प्राप्त हो सके। आहार का आयोजन इस प्रकार से करना चाहिए कि आहार लेने वाले व्यक्ति के लिए यह पौष्टिक, सुरक्षित, संतुलित हो तथा उसके सामार्थ्य में हो।
आहार आयोजन को प्रभावित करने वाले कारक निम्न हैं-

(i) परिवार के सदस्यों की संख्या- परिवार के सदस्यों की संख्या आहार आयोजन को प्रभावित करती हैं। गृहिणी को आहार आयोजन करते समय घर के सदस्यों की संख्या के अनुसार विभिन्न भोज्य पदार्थों की मात्रा का अनुमान लगाया जाये। कम सदस्यों में कम तथा अधिक सदस्यों में अधिक भोज्य पदार्थों की आवश्यकता होती है।

(ii) आयु-भिन्न-भिन्न आयु जैसे-बच्चे, बुढ़े, किशोर तथा प्रौढ़ के लिए पोषण संबंधी माँग भी भिन्न-भिन्न होती है। बाल्यावस्था में अधिक ऊर्जा वाले भोज्य पदार्थ तथा वृद्धावस्था में पाचन शक्ति कमजोर होने से ऊजो की मांग कम हो जाती है।

(iii) लिंग- आहार आयोजन में स्त्री तथा पुरुष की पोषण आवश्यकताओं में अन्तर होता है। एक आयु के पुरुष और महिला के एक ही व्यवसाय में होने पर भी उनकी पोषण आवश्यकताएँ भिन्न होती हैं। पुरुष की पोषण संबंधी माँग स्त्री की अपेक्षा अधिक होती है।

(iv) शारीरिक आकार- शारीरिक आकार के अनुसार पोषण माँग भी भिन्न-भिन्न होती है। लम्बे चौड़े व्यक्तियों को दुबले-पतले व्यक्तियों की अपेक्षा अधिक पौष्टिक तत्त्वों की आवश्यकता पड़ती है।

(v) रुचि- परिवार में सभी सदस्यों की रुचियों में विभिन्नता होती है। आहार आयोजन करते समय सभी सदस्यों की रुचियों को ध्यान में रखना चाहिए। बच्चों को दूध-पसंद नहीं हो तो उसकी जगह हॉर्लिक्स, खीर, कस्टर्ड आदि दिया जा सकता है।

(vi) धर्म- कुछ धर्मों में माँस, मछली, अण्डा, प्याज तथा लहसून आदि खाना वर्जित है। इस बात का आहार आयोजन करते समय ध्यान रखना चाहिए।

(vii) व्यवसाय- प्रत्येक व्यक्ति का व्यवसाय अलग-अलग होता है। कोई व्यक्ति शारीरिक परिश्रम अधिक करता है तो कोई मानसिक परिश्रम अधिक करता है। शारीरिक श्रम करने वाले को कार्बोज तथा वसा देना चाहिए इसके विपरीत मानसिक श्रम करने वाले को प्रोटीन, खनिज तत्त्व तथा विटामिन देना चाहिए।

(viii)जलवायु तथा मौसम-जलवायु तथा मौसम भी आहार आयोजन को प्रभावित करता गर्मी में ठण्डे पेय पदार्थ तथा सर्दियों में गर्म चाय, कॉफी तथा सप आदि पदार्थ दिये जाते दी जलवायु में वसा वाले भोज्य पदार्थ शामिल किये जाते हैं।

(ix)आदत-आहार आयोजन आदतों को प्रभावित करता है। किसी को चाय अधिक पीने आदत है, किसी को दूध पीना अच्छा लगता है, किसी को हरी सब्जी सलाद पसंद है। बच्चा लाई चाकलेट, आइसक्रीम, चाट, पकौड़ा पसंद होती है। आहार आयोजन में इसका भी ध्यान रखा जाता है।

(x) विशेष अवस्था- गर्भावस्था तथा धात्री अवस्था में पोषक तत्त्वों की माँग बढ़ जाती ही रोगावस्था में क्रियाशीलता कम होने के कारण ऊर्जा की माँग कम हो जाती है। मधुमेह में कार्बोज हानिकारक होता है। आहार में इसे शामिल नहीं करना चाहिए।


15. स्तनपान क्या है? यह शिशु के लिए आवश्यक क्यों है?
(What is breast feeding? Why it is necessary for the child ?)

उत्तर⇒ संसार में आने के बाद शिशु के पोषण के लिए आहार के रूप में माँ का दूध सर्वोत्तम माना जाता है। जन्म के बाद दूध ही शिशु का आहार होता है। शिशु के इस आहार का प्रबंध माता के स्तन द्वारा होता है। यह प्राकृतिक आहार है जो शिशु के लिए अमृत समान होता है। माता द्वारा अपने शिशु को स्तनों से दूध पिलाने की क्रिया स्तनपान कहलाती है।

स्तनपान शिशु को कई कारणों से आवश्यक है-

(i) माता के स्तनों से निकला पहला पीला गाढ़ा दूध जिसे कोलेस्ट्रम कहते हैं, शिशुओं को रोगों से लड़ने की क्षमता प्रदान करता है।
(ii) शिशु के लिए सर्वाधिक पौष्टिक और संतुलित आहार है।
(iii) शिशु के लिए सर्वाधिक पाचन तंत्र के अनुकूल है।
(iv) दूषणरहित है।
(v) उचित तापक्रम पर उपलब्ध है।
(vi) मिलावट रहित है।
(vii) सुरक्षित और आसानी से उपलब्ध है।
(viii)आर्थिक दृष्टि से लाभप्रद है।
(ix) माँ एवं बच्चे के सुदृढ़ भावनात्मक सम्बंध को विकसित करने में सहायक है।
(x) दूध को बनाना नहीं पड़ा या गर्म ठंडा नहीं करना पड़ता, यह स्वतः ही माँ के स्तनों से प्राप्त हो जाता है। जिससे समय की बचत होती है।


16. बचत क्या है? इससे होने वाले लाभों का वर्णन करें।
(What is Saving ? Describe the benefits of Saving.)

उत्तर⇒ बचत-किन्स के अनुसार, “वर्तमान आय का. वर्तमान उपभोग व्यय पर आधिक्य. का बचत कहा जाता है।” उसे नियमित रूप से जमा करें। छोटी बचत की रकम ही इकट्ठी हाकर बड़ी रकम बनकर हमारा कार्य पूरा करती है। अतः बचत वह धन है, जो उत्पादक कार्यों म विनियोजित किया जाए और निश्चित समयोपरांत बढ़ी हुई धनराशि के रूप में प्राप्त हो।

बचत के लक्ष्य या महत्त्व- बचत के लक्ष्य या महत्त्व निम्नलिखित हैं-

(i) मितव्ययिता की आदत- एक प्रसिद्ध उक्ति है-“महत्त्वपूर्ण यह नहीं है कि हम कितना कमाते हैं। महत्त्वपूर्ण यह है कि हम कितना बचा लेते हैं।” व्यय करने की कोई सीमा नहीं होती है। बचत से परिवार के सदस्यों में मितव्ययिता की आदत पड़ जाती है। मितव्ययी नहीं होने स मनुष्य सदैव अपनी आमदनी से अधिक खर्च कर डालता है।

(ii) आकस्मिक आवश्यकताओं की पूर्ति- प्रत्येक परिवार में आकस्मिक दुर्घटना तथा शारीरिक असमर्थता, चाहे वह गंभीर रोग से हो या बुढ़ापे से, आदमी को आर्थिक कष्ट में डाल देती है। जो परिवार नियमित रूप से बचत करता है वह अपने भविष्य के प्रति निश्चित रहता है।

(ii) भविष्य में अपरिहार्य कारणों से आय बंद होने की स्थिति में बचत का महत्त्व समझ में आने लगता है।

(iv) आकस्मिक खर्च की पूर्ति- घर में आग लग जाने, चोरी हो जाने, महँगाई बढ़ जाने, परिवार के मुखिया की मृत्यु हो जाने आदि पर संचयित राशि ही परिवार को आर्थिक संकट से उबारती है।

(v) अनावश्यक खर्चों पर प्रतिबंध- बचत करने के लिए व्यय की रूपरेखा बनाकर ही परिवार के सदस्य व्यय करते हैं। बचत की आदत पड़ जाने से अनावश्यक खर्च कम किया जा सकता है।

(vi) बचत की राशि के उचित विनियोग से लाभांश की रकम काफी बढ़ जाती है।

(vii) स्थायी संपत्ति की खरीद- इस राशि का उपयोग कर मकान या जमीन जैसी अचल संपत्ति क्रय की जा सकती है जो आय के साधन के साथ ही सामाजिक प्रतिष्ठा प्रदान करती है।

(viii) बचत किया हुआ धन अपने पास रहने पर व्यक्ति अधिक संतुष्टि का अनुभव करता है। वह किसी भी स्थिति से निपटने का हौसला रखता है जिससे उसकी हीन भावना दूर होकर उसमें मनोवैज्ञानिक निचिंतता आती है।

(ix) राष्ट्रीय योजनाओं के संचालन में मदद- बैंकों में संचयित राशि राष्ट्रीय योजनाओं को पूर्ण करने में या उनके संचालन में विनियोग कर दी जाती है। अतः राष्ट्र के विकास एवं रक्षा के आवश्यक साधनों पर भी बचत का उपयोग होता है।

(x) बचत करने से मुद्रास्फीति पर भी नियंत्रण किया जा सकता है। बचत का सदुपयोग के क्रम में भारत सरकार ने दो प्रकार की प्रणाली का निर्माण किया पहली बैंकिंग प्रणाली तथा दूसरी नॉनबैंकिंग प्रणाली कहलाती है। दोनों संस्थाएँ भारतीय रिजर्व बैंक के मानदंडों के अनुसार ही चलती हैं, किंतु दोनों संस्थाओं के कार्य करने के तरीके अलग-अलग हैं।

इसके अलावा भारतीय डाक एवं तार विभाग के द्वारा संचालित पोस्ट ऑफिस का बचत विभाग है। यह पूर्णरूप से सरकार की ही संस्था है। इस पर भारतीय रिजर्व बैंक का विधान ला नहीं होता है। सरकारी या अर्द्ध-सरकारी निकायों में कार्यरत व्यक्तियों के लिए अनिवार्य भवि निधि योजना एवं कन्ट्रीब्यूटरी प्रोविडेंड फंड एवं सामूहिक बीमा योजना आदि द्वारा बचत एवं उनपर मिलने वाले ब्याज दर पर सीधे राज्य या केंद्र सरकार का नियंत्रण होता है। पोस्ट ऑफिस में भी सामान्य बैंकों की तरह साधारण बचत खाता, आवर्ती जमा योजना, सावधि बचत योजना. किसान विकास-पत्र, राष्ट्रीय बचत पत्र आदि हैं तथा नॉनबैंकिंग प्रणाली की तरह डाक जीवन बीमा (पोस्टल लाइफ इंश्योरेन्स) स्कीम आदि हैं।


17. बच्चों की देखरेख की क्या-क्या वैकल्पिक व्यवस्था की जा सकती है ?
(What are the substitute arrangement for caring of children ?)

उत्तर⇒ बच्चों की वृद्धि एवं विकास के लिए उसकी उचित देख-भाल होना आवश्यक होता है। बच्चे की देख-भाल करने का पूर्ण दायित्व उसके माता-पिता पर होता है परंतु आवश्यकता पड़ने पर वे किसी-न-किसी प्रकार के वैकल्पिक व्यवस्था का चुनाव कर सकते हैं जो निम्नलिखित से प्राप्त की जा सकती है-

(i) परिवार में भाई-बहन- माता-पिता की अनुपस्थिति में बड़े भाई-बहन अपने छोटे भाई-बहन की देख-भाल कर सकते हैं। बड़े भाई-बहन बच्चे के साथ खेल सकते हैं, उसे घुमा सकते हैं, उसे दूध पिला सकते हैं, कहानी सुना सकते हैं आदि।

(ii) परिवार में दादा-दादी या नाना-नानी- संयुक्त परिवार में जहाँ दादा-दादी, चाचा-चाची, आ. ताई आदि एक ही घर में एक साथ रहते हैं, वहाँ माता-पिता की अनुपस्थिति में परिवार के अन्य सदस्य बच्चे की देख-रेख कर लेते हैं। परिवार में दादा-दादी तथा अन्य सदस्यों की अनपस्थिति बच्चे के व्यक्तित्व पर अनुकूल प्रभाव डालती है। दादा-दादी या नाना-नानी बच्चे को प्यार तथा सुरक्षा प्रदान करते हैं और आवश्यकता पड़ने पर बच्चे के माता-पिता को भी मार्ग दर्शन प्रदान करते हैं। बच्चों में इससे नैतिक गुणों का विकास होता है।

(iii) पड़ोसी- पड़ोसियों के साथ चाहे कितने ही परिवर्तन आये हों फिर भी हमारे यहाँ आने जाने वाले लोगों से हम घनिष्ठ हो जाते हैं और एक-दूसरे की सहायता करने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। आवश्यकता पड़ने पर पड़ोसियों के संरक्षण में बच्चे को छोड़ा जा सकता है।

(iv) परिवार में आया- अमीर शहरी घरानों में आया व्यापक रूप से पायी जाती है। आया/नौकरानी की अच्छी तरह छानबीन करके उसकी विश्वसनीयता और योग्यता परख कर ही आया रखनी चाहिए। अपने बच्चे की सुरक्षा के लिए. माता-पिता को इन पर कड़ी निगरानी रखनी चाहिए।

(v) शिशु सदन- वर्तमान समय में शिशु सदन (क्रेच) बच्चों की देखभाल में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। यह शिशु सदन सरकार, स्वयंसेवी संगठनों तथा व्यवसायिक संगठनों द्वारा चलाये जाते हैं। यह एक ऐसा सुरक्षित स्थान है जहाँ बच्चों को सही देख-भाल में तब तक छोड़ा जा सकता है जब तक माता-पिता काम में व्यस्त हों।


18. बच्चों को क्रेच में रखने से क्या लाभ है ?
(What are the benefits of keeping children in creche ?)

उत्तर⇒ बच्चे को उचित देखभाल जिस संस्थान में की जाती है वह क्रेच (शिशु सदन) दलाती है। शिशु सदन द्वारा उपलब्ध सुविधाएँ निम्नलिखित हैं

(i) यह बच्चे को निश्चित समय तथा तापमान पर दूध तथा आहार प्रदान करता है।
(ii) इसमें बच्चों को खिलौने प्रदान किये जाते हैं जो बच्चों को प्रसन्न वातावरण में सामाजिक बनाने में सहायता करते हैं।
(iii) यह बच्चे को साफ और सुरक्षित वातावरण प्रदान करता है।
(iv) यह बच्चों को औषधि तथा प्राथमिक चिकित्सा प्रदान करता है।
(v). छोटे बच्चे को इसके स्टाफ द्वारा खाना खिलाया जाता है।
(vi) यह प्रत्येक छोटे बच्चे को चारपाई प्रदान करता है।
(vii) इसमें छोटे बच्चे खिलौने होने से खेलने का आनंद उठाते हैं।
(viii) यह बच्चों को मेज पर बैठकर खाने का ढंग सिखाता है।


19. बच्चों में असमर्थता के क्या कारण होते हैं ?
(What are the reasons of disability in children ?)

उत्तर⇒ लगभग प्रत्येक व्यक्ति में कुछ न कुछ शारीरिक, मानसिक या सामाजिक असमर्थता पायी जाती है। उसे समूह का हिस्सा बनने से रोकती है। कुछ ऐसे व्यक्ति भी होते हैं जो अधिक गंभीर असमर्थता से ग्रसित होते हैं, ऐसा व्यक्ति हो सकता है. व्हील चेयर का उपयोग करते हों या कान में सुनने वाली मशीन पहनते हों या लम्बे समय से अपनी मानसिक विकलांगता का इलाज करा रहे हों, यह सभी स्थितियाँ किसी व्यक्ति की असमर्थता का प्रतीक मानी जाती हैं।

बच्चों में असमर्थता के निम्नलिखित कारण हैं-

(i) जन्म से पूर्व- गर्भ के समय माँ को किसी पौष्टिक तत्त्व की कमी से शिश को शारीरिक तथा मानसिक असमर्थता हो सकती है। माँ के गर्भ में चोट लगने तथा गर्भ के समय किसी प्रकार की बीमारी या संक्रमण का भी गर्भस्थ शिशु पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

(ii) जन्म के समय- जन्म के समय प्रसव में देर होने पर कई बार शिशु के मस्तिष्क को ऑक्सीजन नहीं मिलती है जिससे उसके स्नायुतंत्र तथा मस्तिष्क की कोशिकाओं को चोट पहुँचती है और वह मानसिक न्यूनता से ग्रस्त हो सकता है। कई बार वह शारीरिक रूप से भी अक्षम हो जाता है।

(iii) जन्म के पश्चात्- जन्म के बाद शिशु की उचित देखभाल बहुत आवश्यक है। यदि शिशु की देखभाल सही ढंग से नहीं हो तो वह शारीरिक और मानसिक रूप से असमर्थ हो सकता है।

(iv) कुपोषण- शिशु में संतुलित आहार की कमी के कारण भी असमर्थता हो जाता हैं। जब शिशु विकास की अवस्था में होता है तो उसे संतुलित आहार मिलना चाहिए। उदाहरण के लिए कैल्सियम की कमी से हड्डियों का विकास नहीं होता, प्रोटीन की कमी से शारीरिक विकास
और वृद्धि ठीक नहीं होती, विटामिन ‘A’ की कमी से अंधापन होता हैं आदि।

(v) दुर्घटना- किसी दुर्घटना के कारण बालक शारीरिक रूप से अक्षम हो जाता है।
(vi) आनुवंशिकता- आनुवंशिकता के कारण असमर्थता के जीन्स माता-पिता द्वारा प्राप्त होते हैं और जन्म से ही बच्चा अंधा, बहरा या गुंगा होता है।
(vii) संक्रमण रोग- बच्चे को संक्रमण रोग हो जाता है वैसी स्थिति में बच्चा असमर्थ हो जाता है। जैसे—पोलियो होने पर वह टाँगों से लाचार हो जाता है।


20. जन्म से लेकर एक वर्ष तक के बच्चों के शारीरिक विकास का वर्णन करें।
(Describe the body development of children from birth to one year old.)

उत्तर⇒ जन्म से लेकर एक वर्ष तक के बच्चों के शारीरिक विकास निम्नलिखित हैं-

(i) भार या वजन- शिशु का वजन जन्म के समय लगभग 27 से 3 किलोग्राम का होता है। चार माह में दोगुना और एक वर्ष में 8.5 से 9 किलोग्राम हो जाता है।

(ii) आकार एवं लम्बाई- नवजात शिशु के जन्म के समय 270 अस्थियाँ होती है जो नर्म एवं स्पंजनुमा होती है। जन्म के समय लम्बाई 45-52 सेमी० एक वर्ष में लम्बाई लगभग 68 सेमी० एक वर्ष में लम्बाई लगभग 68 सेमी० हो जाती है।

(ii) चेहरा एवं सिर- जन्म के समय शिशु का अनुपात उसकी कुल लम्बाई का 22% होता है। जैसे-जैसे आयु बढ़ती है सिर का क्षेत्रफल शरीर के अनुपात में कम हो जाती है।

(iv) हाथ पैर और दाँत- जन्म के समय शरीर के अन्य अंगों की तुलना में हाथ पैर छोटे होते हैं। आयु के साथ पैर की लम्बाई बढ़ने लगती है। शिशु के दाँत 6 माह से 1 वर्ष की आयु के बीच मसूढों से बाहर निकलते हैं।

(v) नाडी एवं पाचन संस्थान- शिशु में नाड़ी संस्थान का विकास गर्भावस्था से ही प्रारंभ हो जाता है। जन्म के समय शिशु के पेट की क्षमता 25 ग्राम होती है। एक माह के शिशु की पेट की क्षमता 80 ग्राम हो जाती है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर Home Science Part – 3 (15 Marks)


21. एक नवजात शिशु की देख-रेख आप किस प्रकार करेंगी?
(How will you care to a new born infant?)

उत्तर⇒ प्रसवोपरांत नवजात शिशु अत्यंत कोमल एवं मुलायम रहता है। इसलिए इसकी देख-रेख चिकित्सालयों में महिला चिकित्सक, मिडवाइफ, नर्सी तथा घर में माँ एवं दाइयों द्वारा संपादित की जाती है। जो इस प्रकार हैं-

(i) नवजात शिशु का प्रथम स्नान- नवजात शिशु जब जन्म लेता है तो उसके शरीर पर सफेद मोम जैसा चिकना पदार्थ चढ़ा होता है, जो गर्म में उसकी रक्षा करता है। शिशु के शरीर पर जैतुन या नारियल का तेल लगाकर निःसंक्रमित शोषक रूई से पोंछने से मोम जैसा द्रव साफ हो जाता है। फिर हल्के गुनगुने जल और बेबी साबुन द्वारा उसे स्नान कराना चाहिए। उस समय नाभी पर जल नहीं पड़ना चाहिए। स्नान कराने के बाद शिशु को मुलायम तौलिए से पोंछ देना चाहिए।

(ii) अंगों की सफाई-
(a) नाक की सफाई- जन्म के बाद शिशु की नाक द्वारा श्वसन क्रिया को सुचारू रूप से चलने के लिए नाक की सफाई आवश्यक है। नि:संक्रमित रूई की पतली बत्ती बनाकर तथा उसमें ग्लिसरीन लगाकर नाक के छिद्रों में डालकर धीरे-धीरे घुमाकर साफ करना चाहिए। इससे शिशु को छिक आती है और नाक के अंदर भरी श्लेष्मा बाहर आ जाती है।

(b) आँखों की सफाई- शिशु के आँखों को बोरिक एसिड लोशन में निःसंक्रमित रूई भिंगोकर अच्छी तरह से साफ करना चाहिए। उसके बाद एक प्रतिशत सिल्वर नाइट्रेट लोशन की दो-दो बूंदें आँखों में डालना लाभप्रद होता है।

(c) कानों की सफाई- कान के बाहरी भाग को स्वच्छ एवं निःसंक्रमित रूई में जैतून के तेल लगाकर कानों की सफाई करनी चाहिए।

(d) गले की सफाई- नवजात शिशु के गले में एकत्र श्लेष्मा की सफाई के लिए किसी मुलायम कपड़े को उँगली में लपेटकर बोरिक एसिड लोशन में डुबोकर गले के अंदर चारों तरफ धीरे-धीरे. घुमाना चाहिए।

उपर्युक्त अंगों की सफाई के अतिरिक्त जाँघ, पैर, धड़ तथा गाल आदि को भी मुलायम कपड़े से साफ कर देना चाहिए।

(iii) शिशु का वस्त्र– शिशु का वस्त्र मुलायम, स्वच्छ और ढीला होना चाहिए।

(iv) निंद्रा- स्वस्थ शिशु 24 घंटे में 22 घंटे सोता रहता है। केवल भूख लगने पर या मलमूत्र त्यागने पर उठता-जगता है।

(v) शिशु का आहार- माँ का दूध शिशु का सर्वोत्तम आहार होता है। सामान्यतः शिशु को जन्म के 8 घंटे के बाद से माँ का दूध देना चाहिए। उसके पहले शिशु को शहद एवं ग्लूकोज मिलाकर चम्मच या अंगुली से पिलाना चाहिए। प्रसवोपरांत माँ के स्तनों से पीला एवं गाढ़ा प्रथम दूध निकलता है, जिसे कोलोस्ट्रम कहते हैं। उसे शिशु को अवश्य पिलाना चाहिए। इससे शिशु में विभिन्न रोगों से प्रतिरक्षा प्राप्त होती है।


22. बच्चों के सामाजिक विकास को प्रभावित करने वाले तत्त्वों के बारे में लिखें।
(Write the factors affecting the social development in children.)

उत्तर⇒ बच्चों के सामाजिक विकास को प्रभावित करने वाले कारक निम्नलिखित हैं-

(i) परिवार- परिवार ही बच्चों के सामाजिक मानकों का आदर करता है और आचरण करता है तो आगे चलकर बच्चे के सामाजिक व्यक्ति बनने की संभावनाएँ हैं।

(ii) पास-पड़ोस- 2 वर्ष का बच्चा अपने पास-पड़ोस में जाने लगता है। दूसरे बच्चों के सम्पर्क में आता है। वह सबके साथ मिलकर खेलना सीखता है। अगर आस-पड़ोस में लोग उसे . प्यार करते हैं तो वह उनके प्रति स्वस्थ सामाजिक मूल्यों का निर्माण करता है।

(ii) विद्यालय- 3 वर्ष का बच्चा विद्यालय जाने लगता है और सामाजिक मूल्यों को तेजी से सीखता है। स्कूल में शिक्षकों व साथियों के सम्पर्क में आता है। गीत, संगीत, नाटक आदि खेलों में भाग लेता है।

(iv) तीज, त्योहार व परम्पराएँ- हर समाज एवं धर्म की अपनी तीज, त्योहार एवं परम्पराएँ होती हैं। उनको मनाने सभी लोग एकत्रित होते हैं। जैसे—रक्षाबंधन, दीपावली, ईद आदि। सभी आपस में मिलते-जुलते मिठाई व बधाई देते हैं। बच्चा देखता है कि एक-दूसरे के बिना त्योहार मनाना संभव ही नहीं है। खुशी के लिए समाज में सभी लोगों का होना आवश्यक है। यही समाजिकता का पाठ हमारी संस्कृति व त्योहार सिखाते हैं।

इस प्रकार परिवार, स्कूल, साथी, आस-पड़ोस सभी किसी-न-किसी प्रकार से बच्चे के समाजीकरण में सहायक होते हैं। माता-पिता और शिक्षक दोनों ही अपने अपने स्तर पर बच्चों का मार्ग-दर्शन करते हैं कि बच्चे को क्या करना चाहिए और क्या नहीं? शेष बच्चा दूसरों का अनुकरण करके सीख जाता है।


23. बच्चे के शारीरिक विकास को प्रभावित करने वाले तत्त्व क्या हैं ?
(What are the factors influencing physical development of a child ?)

उत्तर⇒ मानव शरीर के विभिन्न अंग प्रत्यंग जैसे-हड्डियाँ, माँसपेशियाँ, आंतरिक अवयव आदि के बढ़ने और इनकी कार्य करने की क्षमता में लगातार विकास होना ही शारीरिक विकास कहलाता है। बच्चों के शारीरिक विकास को बहुत तत्त्व प्रभावित करते हैं, जो इस प्रकार हैं-

(i) वंशानुक्रम- बच्चे की लंबाई, भार, शारीरिक गठन आदि विकास के शीलगुण एवं सीमाएँ माता-पिता और पूर्वजों से प्राप्त होती है।

(ii) पोषण- जन्म से पहले और जन्म के बाद शिशु को जैसा पोषण मिलता है उसी पर उसका शारीरिक विकास निर्भर करता है। पौष्टिक आहार से शिशु का विकास सही हो सकता है।

(iii) टीकाकरण- बालकों का सही टीकाकरण उन्हें कई गंभीर रोगों से बचाता हैं। जिससे वह निरंतर शारीरिक विकास कर पाता है। इसके अभाव में बीमारियों से ग्रस्त होने पर उनका शारीरिक विकास पिछड़ जाता है।

(iv) अन्तःस्त्रावी ग्रंथियाँ- बालक के शारीरिक विकास पर हार्मोन्स का बहुत प्रभाव पड़ता हैं। थाइराइड, पैराथाइराइड के स्राव से शरीर की वृद्धि एवं हड्डियों के विकास पर प्रभाव डालते हैं। पीयूषका ग्रंथि के कम स्राव करने से बालक बौने हो जाते हैं और अधिक स्राव होने से
असामान्य रूप से लंबे हो जाते हैं।

(v) गर्भावस्था- माँ के गर्भधारण के समय का स्वास्थ्य, पोषण, टीकाकरण, मानसिक स्थिति आदि बालक को गर्भ के 9 (नौ) महीने में प्रभावित करता है।

(vi) परिवार- परिवार की आर्थिक और आंतरिक वातावरण बच्चे के शारीरिक और मानसिक विकास को प्रभावित करता है। जैसे—जो परिवार बच्चे के खेल-कूद को प्रोत्साहित करेगा, अवसर प्रदान करेगा उस परिवार के बच्चे का शारीरिक स्वास्थ्य अच्छा होगा।


24. क्षय रोग या तपेदिक या टी०बी० (T.B.) क्या है ? इसके कारण, लक्षण तथा उपचार के बारे में बताएँ।
(What is T.B. ? Describe about its reason, symptom and treatment.)

उत्तर⇒ क्षय रोग वायु द्वारा फैलता है। यह रोग सूक्ष्म जीवाणु बैक्टीरियम ट्यूबर्किल बेसियस से फैलता है। क्षयरोग शरीर के कई भागों में हो सकता है। जैसे—फेफड़े, आँत, ग्रंथियों, हड्डियों (रीढ़) तथा मस्तिष्क आदि।

रोग का कारण

(i)रोगी के मल, बलगम तथा खाँसने से रोग फैलता हैं।
(ii) माता-पिता को यदि क्षय रोग हो तो बच्चों में इस रोग की संभावना हो जाती है।
(ii) इस रोग से ग्रस्त गाय, भैंस का दूध पीने से हो सकता है।

रोग के लक्षण

(i) भूख में कमी, थकावट और कमजोरी। लामा
(ii) वजन कम होना तथा हड्डियाँ दिखाई देना।
(iii) छाती तथा गले में दर्द, खाँसी तथा बलगम में खून आना। मा
(iv) सांस फूलना तथा हृदय की धड़कन कम होना।

उपचार तथा रोकथाम-

(i) रोगी को दूसरे लोगों से अलग रखना चाहिए।
(ii) रोगी के विसर्जन को जला देना चाहिए।
(iii) बच्चों को जन्म के पश्चात एक सप्ताह के अंदर बी०सी०जी० का टीका लगा दें।
(iv) डॉक्टर की सलाह से रोगी को स्ट्रेप्टोमाइसिन के टीके 2½ महीने तक लगवाना चाहिए।


25. एकीकृत (समेकित) बाल विकास योजना की सेवाएँ और लाभ क्या है ?
(What are the services and advantages of Integrated Child Development
Scheme (ICDS).)

उत्तर⇒ एकीकृत (समेकित) बाल विकास योजना में छोटे बच्चों, गर्भवती माता की स्वास्थ्य संबंधी देख-रेख की जाती है।

⇒ इस संगठन द्वारा बच्चों, गर्भवती एवं धात्री को पूरक पोषक तत्त्व प्रदान किया जाता है।

⇒ बच्चों एवं गर्भवती को संक्रामक रोगों से बचाव के लिए टीके उपलब्ध करवाता है। इसके माध्यम से निम्न सेवाएँ उपलब्ध हैं-

(i) पूरक आहार
(ii) टीकाकरण
(iii) स्वास्थ्य सेवाएँ
(iv) स्वास्थ्य एवं आहार शिक्षा
(v) अनौपचारिक शिक्षा
(vi) रोधक्षमतात्मकता (रोग प्रतिकारक)

⇒ इस संस्था में बच्चों को अपराहन भोजन दिए जाते हैं जिसके माध्यम से उन्हें पोषक तत्त्व उपलब्ध कराया जाता है।

⇒ बच्चों को टीके लगाकर टिटनेस, डिप्थेरिया, कुकुर खाँसी, पोलियो, मिजिल्स, क्षयरोग से दूर रखा जाता है।

⇒ बच्चों एवं गर्भवती स्त्रियों को स्वास्थ्य चिकित्सा उपलब्ध कराई जाती है।

⇒ स्वास्थ्य एवं पोषण की शिक्षा सामुहिक रूप से कभी-कभी व्यक्तिगत रूप से दी जाती है।

⇒ भावी माता को टिटनेस का टीका, आयरन और फौलिक एसिड टेबलेट तथा प्रोटीन की गोली दी जाती है।

⇒ 6-8 सप्ताह तक प्रसवोपरांत माता की जाँच की जाती हैं। साथ ही महिलाओं को जनसंख्या संबंधी शिक्षा भी दी जाती है।


26. पूरक आहार देते समय किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए।
(What factors should be considered while giving supplementary diet?)

उत्तर⇒ पूरक आहार देते समय निम्न बातों को ध्यान में रखेंगे-

(i) एक समय में एक ही पूरक आहार दें। दूसरा आहार शुरू करने से पहले शिशु को पहले आहार से परिचित होने के लिए पर्याप्त समय दें।

(ii) एक समय में शिशु को उतना ही आहार दें जितना वह आसानी से पचा सके। बच्चे के साथ जोर-जबरदस्ती न करें।

(iii) यदि शिशु किसी विशेष खाद्य पदार्थ को पसंद नहीं करता है तो उसका रूप बदल कर दें।

(iv) नया पदार्थ थोड़ी मात्रा में दें।

(v) शिशु को विभिन्न प्रकार के खाद्य पदार्थों से परिचित कराएँ जिससे वह आगे चलकर – विभिन्न खाद्य पदार्थ को स्वीकार करना सीख ले।

(vi) पूरक आहार के साथ शिशु को काफी मात्रा में तरल पदार्थ भी देते रहना चाहिए।

(vii) आहार में नमक का प्रयोग करना चाहिए लेकिन मिर्च-मसालों का बिल्कुल प्रयोग न करें।

(viii) बच्चे का जब दाँत निकल जाए और वह आसानी से चबाने लगे तो कुचले आहार के स्थान पर उसे पतले-पतले टुकड़ों में कटे हुए फल और सब्जियाँ देनी चाहिए।

(ix) शिशु को जिस बर्तन में पूरक आहार दें वे साफ एवं स्वच्छ होने चाहिए।


27. भोजन संरक्षण की कौन-कौन-सी विधियाँ हैं ?

(What are the various methods of food preservation ?)

उत्तर⇒ भोज्य पदार्थ के खराब होने का मुख्य कारण जीवाणु है। ये जीवाणु. भोज्य पदार्थों में रासायनिक परिवर्तन करते हैं जिससे भोजन सड़ता है। भोज्य पदार्थ को संरक्षण करने वाली विधियों का प्रमुख उद्देश्य उन कीटाणुओं के द्वारा किये गये रासायनिक परिवर्तन को रोकना है। भोज्य पदार्थों के संरक्षण की विधियाँ इस प्रकार हैं

(i) हिमीकरण विधि- (Freezing method)-इस विधि में भोज्य पदार्थ के तापक्रम को बहुत ही कम कर दिया जाता है जिससे सूक्ष्म जीवों की वृद्धि रुक जाती है। इस विधि से मछली, माँस, दूध, आइसक्रीम, दही, सूप तथा सब्जियाँ संग्रहित की जाती है।

(ii) शुष्कीकरण द्वारा- हर भोज्य पदार्थ में कुछ न कुछ नमी अवश्य ही पायी जाती है। उसमें उपस्थित नमी को हटा देने से भोज्य पदार्थ अधिक दिनों तक संरक्षित रहता है। इस विधि से अनाज, मेवे, दाल, हरी सब्जी, फल, पापड़, बड़ियाँ, चिप्स आदि घर में सुखाकर संरक्षित किया जाता है। उपकरणों जैसे स्प्रे ड्रायर, रोटरी-ड्रायर आदि से दूध पाउडर तथा मछली सुखाये जाते हैं।

(iii) वायु को निकालकर संरक्षण- इसके अंतर्गत कैनिंग तथा बॉटलिंग की विधि आती है। इन विधि में भोज्य पदार्थ को पहले भाप में पका लिया जाता है। फिर डब्बों में भर दिया जाता है। इन डब्बों को एक बड़े बर्तन में रखे पानी में रखकर गर्म करते हैं। ताप के प्रभाव से वायु उड़ जाती हैं उसी समय डिब्बा को बंद कर दिया जाता है।

(iv) रासायनिक पदार्थों के द्वारा संरक्षण- सोडियम बेन्जोएट, पोटैशियम मेटाबाइसल्फाइड बाटि डालकर शर्बत, केचप आदि को संरक्षण किया जाता है।

(v) कीटाणुनाशक वस्तुओं के द्वारा संरक्षण विभिन्न प्रकार के सब्जियों तथा फलों, बाबा. जैम, जेली, अचार आदि को नमक, चीनी, सिरका, राई आदि से संरक्षित किया जाता है।


28. उपभोक्ता के क्या अधिकार हैं ? खरीददारी करते समय उपभोक्ता को किन-किन समस्याओं का सामना करना पड़ता है ?

(What are the rights of consumer ? What major problems does a consumer
face during purchasing ?)

उत्तर⇒ “किसी भी उत्पादित वस्तु को खरीदने वाला उपभोक्ता कहलाता है।” उपभोक्ता द्वारा खरीदी जाने वाली वस्तु उनके लिए किसी प्रकार से हानिकारक नहीं होनी चाहिए तथा उसे खरीददारी करते समय किसी प्रकार का धोखाधड़ी का सामना न करना पड़े, इसके लिए उपभोक्ताओं के कुछ अधिकार दिये गये हैं जो निम्नलिखित हैं-

(i) सुरक्षा का अधिकार- उपभोक्ता स्वास्थ्य के लिए हानिकारक खाद्य पदार्थों, नकली . दवाइयाँ आदि के बिक्री पर रोक की माँग कर सकते हैं।

(ii) जानकारी का अधिकार- उपभोक्ता किसी भी वस्तु की गुणवत्ता, शुद्धता, कीमत, तौल आदि की जानकारी की माँग कर सकते हैं।

(ii) चयन का अधिकार- उपभोक्ता को अधिकार है कि विक्रेता उसे सभी निर्माताओं की बनी हुई वस्तु दिखाएँ ताकि वह उनका तुलनात्मक अध्ययन करके उचित कीमत पर गुणवत्ता वाली वस्तु खरीद सके।

(iv) सनवाई का अधिकार- खरीदी हई वस्तु में कोई कमी होने पर उपभोक्ता को यह अधि कार है कि वे वस्तु निर्माता विक्रेता तथा संबंधित अधिकारी से शिकायत कर सकते हैं।

(v) क्षतिपूर्ति का अधिकार- वस्तुओं तथा सेवाओं से होने वाले नुकसान की क्षतिपूर्ति की माँग कर सकते हैं।

(vi) उपभोक्ता शिक्षा का अधिकार- उपभोक्ता सही जानकारी तथा सही चुनाव करने के ज्ञान की माँग कर सके।

उपभोक्ताओं की समस्याएँ

(i) वस्तुओं में मिलावट- प्रतिदिन की खरीददारी में उपभोक्ता को वस्तुओं में मिलावट का सामना करना पड़ता है। मिलावट के कारण मुनाफाखोरी वस्तुओं की कम उपलब्धता, बढ़ती महँगाई आदि है।

(ii) दोषपूर्ण माप- तौल के साधन बाजार में प्रायः मानक माप-तौल के साधनों का प्रयोग नहीं किया जाता हैं बल्कि नकली, कम वजन के बाट की जगह ईंट-पत्थर का प्रयोग होता है।

(iii) वस्तुओं का अपूर्ण लेबल- प्रायः उत्पादक वस्तुओं पर अपूर्ण लेबल लगाकर उपभोक्ताओं को धोखा देने का प्रयास करते हैं, जिससे उपभोक्ता भ्रम में गलत वस्तु खरीद लेता है।

(iv) बाजार में घटिया किस्म की वस्तुओं की उपलब्धि- आजकल उपभोक्ताओं को घटिया किस्म की वस्तुएँ खरीदना पड़ रहा है जिसके लिए अधिक कीमत भी देना पड़ता है। जैसे घटिया लकड़ी से बने फर्नीचर रंग करके बेचना, घटिया लोहे के चादरों की अलमारी आदि।

(v) नकली वस्तुओं की बिक्री- आज बाजार में नकली वस्तुओं की भरमार हैं। असली पैकिंग में नकली सामान, दवाई, सौन्दर्य प्रसाधन, तेल, घी, आदि भर कर बेचा जाता है।

(vi) भ्रामक और असत्य विज्ञापन- प्रत्येक उत्पादनकर्ता अपने उत्पादन की बिक्री बढाने के लिए भ्रामक और असत्य विज्ञापनों का सहारा लेते हैं। वस्तुओं की गुणवत्ता को बढ़ा-चढ़ाकर बतलाते हैं।

(vii) निर्माता या विक्रेता द्वारा गलत हथकण्डे अपनाना- मुफ्त उपहार, दामों में भारी छट जैसी भ्रामक घोषणाएँ द्वारा उपभोक्ता धोखा खा जाते हैं और अच्छे ब्राण्ड के धोखे में गलत वस्तु खरीद लेते हैं।


29. उपभोक्ताओं की समस्याओं का उल्लेख करें।

(Explain the problems faced by Consumers.)

उत्तर⇒ उपभोक्ताओं की निम्नलिखित समस्याएँ हैं-

(i) कीमतों में अस्थिरता- कुछ दुकानों पर सामान की कीमतें बहुत अधिक होती हैं, जिससे दुकानदार अधिक लाभ कमाता है। दुकान की देख-रेख, बिलपत्र और खरीद की कीमत को पूरा करता है, वातानुकुलित एवं कम्प्यूटरयुक्त होने से उसकी सुविधाओं की कीमत वसूलता है। घर पर निःशुल्क सामान पहुँचाने की सेवा अधिक कीमत लेकर उपलब्ध कराता है। समृद्ध रिहायशी क्षेत्रों में नए आकार-प्रकार की बाजारों में भी सामान की कीमत अधिक होती है।

(ii) मिलावट- यह वांछित तथा प्रासंगिक दोनों हो सकते हैं। दुर्घटनावश जब दो अलग-अलग वस्तुएँ मिल जाती हैं तो उसे प्रासंगिक मिलावट तथा जान-बूझ कर जब उपभोक्ता को ठगने और अधिक लाभ कमाने हेतु अपमिश्रित वस्तुएँ को वांछित मिलावट कहते हैं।

(iii) अपूर्ण एवं धोखा देने वाले लेबल- उस प्रकार के लेबल से उपभोक्ता असली तथा नकली लेबल की पहचान करने में असमर्थ होता है। निम्न गुणवत्ता वाले सामान का प्रतिष्ठित सामान के आकार और रंग के लेबल लगाकर उपभोक्ताओं को गुमराह कर देते हैं। सजग उपभोक्ता ही उसे पहचान पाता है।

(iv) दुकानदारों द्वारा उपभोक्ता को प्रेरित करना- अधिक कमीशन जिस ब्राण्ड वाले सामान में मिलता है उसे खरीदने के लिए दुकानदार उपभोक्ता को प्रेरित करते हैं।

(v) भ्रामक विज्ञापन- उपभोक्ता को आकर्षित करने के लिए दुकानदार विज्ञापन की सहायता से उपभोक्ता को प्रेरित कर देते हैं।

(vi) विलम्बित/अपूर्ण उपभोक्ता सेवाएँ- स्वास्थ्य, पानी, विद्युत, डाक और तार की दोषपूर्ण सेवाएँ भी उपभोक्ताओं को परेशान करती हैं।


30. धन का विनियोग (Investment) करते समय किन-किन बातों को ध्यान में रखना चाहिए ?
(What should be considered before investing money ?)

उत्तर⇒ धन का विनियोग करते समय निम्न बातों को ध्यान में रखना चाहिए-

(i) बचत कर्ता की बचत विनियोग की क्षमता- धन को जमा करना जमाकर्ता के सामर्थ्य पर निर्भर करता है। कई योजनाओं में जैसे यनिट्स में जमा करने की न्यूनतम राशि निर्धरित की जाती है। यदि वह न्यूनतम राशि जमाकर्ता के सामर्थ्य से बाहर है तो उसके लिए यह योजना उचित नहीं है। ऐसी स्थिति में उसे दूसरी बचत योजनाए देखनी चाहिए।

(ii) विनियोग की सुरक्षा- परिवार के लिए विनियोग का साधन चुनते समय इस बात का अवश्य ही ध्यान रखना चाहिए कि धन राशि हर तरह से सुरक्षित है। जैसे आग, चोरी, बचत की हानि आदि।

(iii) विनियोग राशि पर उच्च ब्याज दर- विनियोग का वही साधन अच्छा होता है, जिसमें हमें अपनी विनियोग की गयी धनराशि पर ब्याज अधिक मिलता हो।

(iv) पूँजी की तरलता (Liquidity)- पूँजी की तरलता का अर्थ है कि आपातकालीन स्थिति में अपनी राशि को भुना सकते हैं। इस प्रकार बचत का विनियोग करना चाहिए जिससे आपातकाल में बिना ब्याज खोए धन राशि शीघ्र प्राप्त हो सके।

(v) विनियोग का सरल व उपयुक्त स्थान- विनियोग का स्थान दूर नहीं होना चाहिए अन्यथा धन के भुगतान व अन्य तकनीकी कठिनाइयों के कारण काफी समय नष्ट हो जाता है।

(vi) क्रय क्षमता- बढ़ती कीमतों से विनियोग की राशि की क्रय क्षमता भी सुरक्षित होना चाहिए। शेयर, जमीन, यूनिट्स आदि का लाभांश बढ़ती महँगाई को देखते हुए अधिक होता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर Home Science Part – 4 (15 Marks)


31. व्यय को प्रभावित करने वाले तत्त्वों का विवरण दें।
(Describe the factors that influence expenditure.)

उत्तर⇒ व्यय को प्रभावित करने वाले तत्त्व निम्नलिखित हैं-

(i) परिवार ढाँचा- हमारे देश में गाँवों में सयुक्त परिवार व्यवस्था तथा शहरों में एकांकी परिवार व्यवस्था है। संयुक्त परिवार में कई मदों पर संयुक्त व्यय किए जाते हैं। जैसे मकान किराया, भोजन, बिजली तथा नौकर दाई आदि। इसलिए प्रत्येक सदस्य पर आर्थिक बोझ कम होता है। एकांकी परिवार को इन मदों पर शत-प्रतिशत व्यय करना पड़ेगा और उसे कम बचत होगी।

(ii) परिवार के सदस्यों की संख्या- एक परिवार में यदि कई व्यक्ति कमानेवाले हों तो वहाँ अधिक आमदनी होने के कारण शिक्षा, मनोरंजन, खेलकूद तथा विलासिता पर अधिक व्यय होगा। एकांकी परिवार में ऐसा संभव नहीं है।

(iii) व्यक्ति का पेशा- व्यक्ति का पेशा भी व्यय को प्रभावित करता है। यदि व्यक्ति नौकरी पेशावाला हो तो उसका रहन-सहन का स्तर उच्च रखना पड़ता है। वहीं मजदूर वर्ग के लोग अपने रहन-सहन पर कम व्यय करते हैं।

(iv) सामाजिक एवं धार्मिक परम्पराएँ- प्रत्येक समाज में कुछ ऐसे आयोजन होते हैं जिन पर अन्य मदों पर कटौती कर अधिक खर्च करना पड़ता है। जैसे-छट्ठी, विवाह, गृह प्रवेश, श्राद्ध, जन्मदिन, दिवाली, दशहरा, होली, ईद, बकरीद, क्रिसमस, वैशाखी,-ओणम आदि पर लोगों को अधिक व्यय करना पड़ता है।

(v) निवास स्थान एवं भौगोलिक स्थिति- गाँवों तथा कस्बों में रहने वाले लोगों का रहन-सहन, नगरों में बसने वाले लोगों की अपेक्षा निम्न स्तर का होता है। यदि निवास कार्यस्थल से बहुत दूर हो तो वहाँ तक यातायात से पहुँचने में भी अधिक खर्च करना पड़ता है।

(vi) परिवार के मुखिया की विवेकशीलता- परिवार का मुखिया विवेकशील है तो यह अच्छी तरह समझता है कि कब, किस मद में और कितना खर्च किया जाए ताकि परिवार के सभी सदस्यों को अधिकतम सुख-संतोष प्राप्त हो सके।


32. जल प्रदूषण से आप क्या समझते हैं? जल को शुद्ध करने की विधि का वर्णन करें।

(What do you understand by water pollution ? Describe the method of water purification.)

उत्तर⇒ जिस जल में कुछ पदार्थों की भौतिक अशुद्धता के कारण जल के स्वाद, गंध आदि में परिवर्तन आ जाए तो उसे प्रदूषित जल कहते हैं।
शुद्ध जल एवं स्वच्छ जल में अवांछित पदार्थों का मिश्रण जल प्रदूषण कहलाता है।

शुद्ध जल प्राप्त करने के तरीके या विधियाँ-

(i) घरेलू विधि- घरेलू तौर पर पानी को शुद्ध किया जाता है जैसे-कपड़े से छानना उबालना, विशेष छन्नियों का प्रयोग करके किया जाता है।

(ii) रासायनिक विधि- रासायनिक विधि से जल को शुद्ध करने के लिए क्लोरीन, पोटासियम परमैंगनेट, कॉपर सल्फेट, बुझा हुआ चुना इत्यादि का प्रयोग किया जाता है।

(iii) यांत्रिक विधि- जल को साफ करने के लिए यह विधि सबसे प्रचलित हैं। इस विधि में जल शुद्ध करने के लिए फिल्टर, वाटर प्यूरिफायर, आर० ओ० आदि का प्रयोग किया जाता है।


33. पारिवारिक आय के विभिन्न प्रकारों का वर्णन करें।
(Describe the different types of family income.)

उत्तर⇒ पारिवारिक आय को मुख्य रूप से तीन भागों में बाँटा जा सकता है

(i) मौद्रिक आय
(ii) वास्तविक आय और
(iii) मानसिक आय

(i) मौद्रिक आय- एक निश्चित समय में परिवार को मुद्रा के रूप में जो आय प्राप्त होती है उसे मौद्रिक आय कहते हैं। ग्रौस और कैण्डले के अनुसार “मौद्रिक आय से तात्पर्य उस क्रय शक्ति से हैं जो मुद्रा के रूप में एक निश्चित समय में एक परिवार को प्राप्त होती है। परिवार में मौद्रिक आय विभिन्न रूपों से प्राप्त की जा सकती है। जैसे-वेतन, मजदूरी, बोनस, पेंशन, ब्याज, लाभ, उपहार, लगान, किराया, रॉयल्टी आदि।

(ii) वास्तविक आय- यह दो प्रकार का होता हैं-

(a) प्रत्यक्ष वास्तविक आय- प्रत्यक्ष वास्तविक आय में वे सभी सेवाएँ तथा सुविधाएँ आती हैं जिनका उपयोग प्रत्यक्ष रूप से परिवार द्वारा बिना धन व्यय किए किया जाता है। इनके प्राप्त न होने पर परिवार को अपने मौद्रिक आय से व्यय करना पड़ता है। उदाहरणस्वरूप कार्य स्थल पर मुफ्त मकान, नौकर की सुविधा, माली. की सुविधा, टेलीफोन की सुविधा, गाडी की सुविधा आदि।

(b) अप्रत्यक्ष वास्तविक आय- यह आय मुख्य रूप से परिवार के सदस्यों के ज्ञान, निपुणता और कौशल के कारण प्राप्त होने वाली आय हैं। जैसे-खाना बनाना, कपड़े सिलना, कपड़ा धोना, आयरन करना, बच्चों को पढ़ाना, घर में बागवानी कर सब्जियाँ प्राप्त करना, उपकरण की मरम्मत आदि।

(c) मानसिक आय- मौद्रिक आय एवं वास्तविक आय के व्यय से जो संतुष्टि प्राप्त होती हैं वह मानसिक आय हैं। यह पूर्ण रूप से व्यक्तिगत है। यह प्रत्येक व्यक्ति तथा परिवार की अलग-अलग हो सकती है।


34. घरेलू बजट का क्या महत्त्व है? परिवार के लिए बजट बनाते समय किन-किन न बातों को ध्यान में रखना चाहिए?
(What is the importance of domestic budget ? What are the elements to be considered at the time of preparation of domestic budget?)

उत्तर⇒ प्रत्येक परिवार अपनी आय का व्यय बहुत सोच समझकर कर सकता है क्योंकि धन एक सीमित साधन है तथा यह प्रयास करता है कि अपनी सीमित आय द्वारा अपने परिवार की समस्त आवश्यकताओं को पूर्ण करके भविष्य के लिए कछ-न-कछ बचत कर सके। यही कारण है कि गह स्वामी तथा गृहस्वामिनी मिलकर सोच समझ करके अपने परिवार की आय का उचित व्यय करने के लिए लिखित एवं मौखिक योजना बनाते हैं और उस योजना को क्रियान्वित करने के लिए उन्हें अपने व्यय का पूरा हिसाब-किताब रखना पड़ता है। कोई भी परिवार घरेलू बजट बनाकर ही व्यय को नियंत्रित कर सकता है।

घरेलू बजट बनाने के निम्नलिखित लाभ हैं-

(i) घरेलू हिसाब-किताब प्रतिदिन लिखने से हमें यह ज्ञात रहता है कि हमारे पास कितना पैसा शेष बचा है जो परिवार की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अत्यंत आवश्यक है जिससे पारिवारिक लक्ष्य की प्राप्ति हो सके।

(ii) घरेलू हिसाब-किताब रखने से अधिक व्यय पर अंकुश रहता है।

(iii) विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए एक सामान्य दिशा निर्देश का आभास होता है।

(iv) असीमित आवश्यकताओं और सीमित आय के बीच संतुलन बनाने में मदद मिलती है।

(v) सही ढंग से व्यय करने के फलस्वरूप बचत व निवेश में प्रोत्साहन मिलती है।

(vi) इससे परिवार का भविष्य सुरक्षित रहता है।

परिवार के लिए बजट बनाते समय निम्नलिखित बातों पर ध्यान रखना चाहिए

(i) आय और व्यय के बीच ज्यादा फासला न हो अर्थात् आय की तुलना में व्यय बहुत अधिक नहीं हो।

(ii) बजट से जीवन लक्ष्यों की पूर्ति हो यानी परिवार को उच्च जीवन स्तर की ओरं प्रेरित कर सके।

(iii) बजट बनाते समय अनिवार्य आवश्यकताओं को ध्यान में रखना चाहिए।

(iv) सुरक्षित भविष्य को ध्यान में रखकर बजट बनानी चाहिए ताकि आकस्मिक खर्चों जैसे बीमारी, दुर्घटना तथा विवाह आदि के लिए धन की आवश्यकता की पूर्ति समय पर हो सके।

(v) व्यय को आय के साथ समायोजित होना चाहिए ताकि ऋण का सहारा न लेना पड़े।

(vi) बजट बनाते समय महँगाई को भी ध्यान में रखना चाहिए।


35. डाकघर पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
(Write a brief note about post office.)

उत्तर⇒ डाकघर एक सरकारी संस्थान है। यह धन को सुरक्षित रखने का अच्छा माध्यम माना जाता है। डाकघर की सुविधा बैंकों से अधिक स्थानों पर उपलब्ध है। दूर दराज के क्षेत्रों में रहनेवालों के लिए डाकघर अधिक सुविधाजनक होते हैं। डाकघर प्रायः हर आवासीय कॉलोनी में होते हैं। डाकघर में विनियोग की सुविधा को बहुत ही सरल रखा गया है। एक अनपढ़ व्यक्ति भी थोड़े से ज्ञान से अपना धन जमा करा सकता हैं। डाकघर योजनाएँ बैंकों की योजनाओं से .. काफी मिलती जुलती हैं। डाकघरों द्वारा बहुत-सी योजनाएँ चालू की गयीं जो निम्नलिखित हैं –

(i) डाकघर बचत खाता
(i) डाकघर सावधि जमा योजना
(iii) रेकरिंग डिपॉजिट
(iv) मासिक आय योजना
(v) किसान विकास पत्र
(vi) राष्ट्रीय बचत पत्र
(vii) 15 वर्षीय जन भविष्य निधि
(viii) राष्ट्रीय बचत योजना खाता
(ix) सेवानिवृत्त होने वाले सरकारी कर्मचारियों के लिए जमा योजना आदि।


36. बैंक खातों के विभिन्न प्रकार कौन-कौन से हैं ?
(What are the different types of Bank Accounts ?)

उत्तर⇒ बैंक वह संस्थान है जहाँ रुपये का लेन-देन होता है। कोई भी व्यक्ति अपने रुपये को बैंक में जमा कर सकता है और आवश्यकता पड़ने पर निकाल भी सकता है। बैंक इस धन राशि पर कुछ ब्याज भी देती है।

बैंक में खातों के प्रकार- बैक में निम्न प्रकार के खाते खोले जा सकते हैं

(i) बचत खाता- अधिकांश बैंकों में यह खाता 500 रु० से खोला जा सकता है। इसमें कभी धन जमा करवा सकते हैं। बैंक इस धन पर कुछ राशि ब्याज के रूप में दे देता है। ये खाता एक, दो या अधिक व्यक्तियों के साथ संयुक्त रूप से खोला जा सकता है।

(i) चालू खाता- चालू खाता व्यापारी वर्ग के लिए होता है। आवश्यकता पड़ने पर इस – खाते से जितनी बार चाहे धन निकाला जा सकता है। इस खाते में जमा राशि पर ब्याज नहीं मिलता।

(iii) निश्चित अवधि जमा योजना (F.D.)- इस खाते में धन राशि एक निश्चित अवधि के लिए जमा की जाती है। यह अवधि तिमाही, छमाही या वार्षिक या अवधि समाप्त होने पर ब्याज के साथ धन राशि ले सकता है। आवश्यकता पड़ने पर कुछ धन राशि कटौती के साथ निकाली जा सकती है।

(iv) आवर्ती जमा खाता (R.D.)- इस योजना के अंतर्गत एक निश्चित धनराशि एक निश्चित समय तक निरन्तर प्रतिमाह जमा करने पर ब्याज के रूप में मोटी रकम प्राप्त ‘कर सकते हैं। इस खाते में 12, 24, 36, 48, 60 माह तक एक निश्चित धनराशि जमा करनी होती है।

(v) संचयी सावधि जमा- संचयी सावधि जमा वह है जहाँ जमा की अवधि केवल अंत में न कि मध्य में आप बकाया ब्याज प्राप्ति के लिए चुनते हैं। प्राप्त होने वाली ब्याज आपकी जमा राशि में जुड़कर प्राप्त होती है।


37. चेक कितने प्रकार के होते हैं? चेक द्वारा भुगतान करने के लाभों का उल्लेख करें।
(How many types of cheques ? Points out the advantages of paying by cheques.)

उत्तर⇒ चेक तीन प्रकार के होते हैं

(i) वाहक चेक- इसमें प्राप्तकर्ता के सामने वाहक लिखा होता है। इसकी राशि कोई भी व्यक्ति प्राप्त कर सकता है, इसे खो जाने का खतरा रहता है।

(ii) आदेशक चेक- इसमें वाहक शब्द काटकर आदेशक लिखा होता है, जिस व्यक्ति के नाम से चेक लिखा होता है। भुगतान उसी को दिया जाता है अथवा वाहक जिसका नाम चेक के दूसरे तरफ लिखा होता है। बैंक वाहक काहस्ताक्षर लेकर ही भुगतान करता है।

(iii) रेखांकित चेक- इस चेक की बायीं ओर के ऊपरी सिरे पर दो तिरक्षी समानान्तर रेखाएँ खींची होती है। इसकी राशि का भगतान नहीं किया जाता है। व्यक्ति के नाम के खाते में राशि जमा कर दी जाती है। इस प्रकार के चेक खोने पर दूसरे व्यक्ति को राशि मिलने की संभावना कतई नहीं होती।

चेकों द्वारा भुगतान करने के लाभ निम्न हैं-

(i) सुरक्षित- केवल नामित प्राप्तकर्ता ही बैंक या अन्य वित्तीय संस्थान में चेक भूना सकता है। इसलिए यह सुरक्षित है।

(ii) विश्वसनीय- चेक द्वारा भुगतान का यह विश्वसनीय तरीका हैं जो पीढ़ी दर पीढी चलता आ रहा है।

(iii) संसाधित किया गयां बैच- इससे कॉल्टयूमर्स को पोस्ट डेटेड चेक बताने की अनुमति मिलती है जो उन्हें अपने खातों में फंड डालने के लिए समय देता है।


38. दाग-धब्बों को कितनी श्रेणियों में बाँटा गया है ?

(In how many classes are the Stains divided ?)

उत्तर⇒ दाग-धब्बों को निम्नलिखित आठ श्रेणियों में बाँटा गया है-

(i) जान्तव धब्बे, उदाहरण—अंडे, दूध, मांस, रक्त आदि।

(ii) वानस्पतिक धब्बे, उदाहरण—चाय, कोको, कॉफी, फल, मधु आदि।

(iii) चिकनाईयुक्त धब्बे, उदाहरण—मक्खन, तेल, घी, पेंट, वार्निश, सब्जियाँ आदि।

(iv) खनिज धब्बे, उदाहरण—जंग, स्याही, दवाएँ आदि।

(v) रंगीन धब्बे, उदाहरण—रंग के धब्बे (आम्लिक एवं क्षारीय दोनों)

(vi) पसीने के धब्बे, उदाहरण—पसीने के धब्बे मात्र।

(vii) झुलसने के धब्बे, उदाहरण—गर्म इस्तिरी या गर्म धातु के छूने से प्राप्त धब्बे।

(vi) घास के धब्बे, उदाहरण—घास के धब्बे (क्लोरोफिलयक्त)।


39. पोषक तत्त्व क्या है? इसके क्या कार्य हैं ?
(What is Nutrient Element ? What are its functions?)

उत्तर⇒ पोषक तत्त्व- तत्त्व, जो हमार शरार का आवश्यकता तत्त्व, जो हमारे शरीर की आवश्यकताओं के अनुरूप पोषण प्रदान करते हैं अर्थात् अपेक्षित रासायनिक ऊर्जा देते हैं उसे पोषक तत्त्व कहते हैं।

प्रमुख पोषक तत्त्व निम्नलिखित हैं-

(i) कार्बोहाइड्रेट- यह शरीर को ऊर्जा प्रदान करता है।
(ii) प्रोटीन- यह शरीर की वृद्धि करता है।
(iii) वसा- इससे शरीर को तीन प्रकार के अम्ल प्राप्त होते हैं-

(i) लिनोलीन, (ii) लिनोलोनिक तथा (iii) अरंकिडोनिक। शरीर में घुलनशील विटामिनों के अवशोषण के लिए इसकी उपस्थिति आवश्यक है।

(iv) कैल्शियम- यह अस्थि के विकास एवं मजबती के लिए आवश्यक है।
(v) फास्फोरस- यह भी अस्थि के विकास के लिए आवश्यक है।
(vi) लोहा- यह शरीर की रक्त-अल्पता, हिमोग्लोबिन और लाल रक्तकण प्रदान कर दर. करता है। गर्भावस्था एवं स्तनपान कराने वाली महिलाओं के लिए अति आवश्यक है।

(vii) विटामिन- यह दो प्रकार के होते हैं- (i) जल में घुलनशील विटामिन, जैसे विटामिन- B, विटामिन- C तथा (ii) वसा में घुलनशील विटामिन जैसे-विटामिन- A, विटामिन- D, विटामिन-E, विटामिन-K। यह शरीर के लिए अति आवश्यक है। यह
कई रोगों से बचाता है।


40. वस्त्र क्यों आवश्यक है? वस्त्र खरीदते समय किन-किन बातों पर ध्यान देना चाहिए ?

(Why clothes are needed ? Wliat things should be kept in mind while purchasing clothes ?)

उत्तर⇒ वस्त्र मानव के लिए निम्न कारणों से आवश्यक है-

(i) शरीर की सुरक्षा- वस्त्र हमारे शरीर की सुरक्षा प्रदान करता है। वस्त्र हमें सर्दी, गर्मी तथा वर्षा से बचाते हैं।
(ii) व्यक्ति की पहचान- वस्त्र से ही व्यक्ति की पहचान बनती है। उदाहरण के लिए वर्दियों के आधार पर ही हम पहचानते है कि यह फौज का व्यक्ति है या पुलिस का या होटल का या वकील, डॉक्टर इत्यादि।

(iii) व्यक्तित्व निर्माण में- व्यक्ति को सुन्दर एवं आकर्षक बनाने में वस्त्र का महत्त्वपूर्ण स्थान हैं। सुन्दर परिधान शारीरिक एवं मानसिक विकास में सहायक होकर सामाजिक जीवन को सुन्दर एवं सुखमय बनाते हैं। व्यक्ति के भीतर आत्मविश्वास जगता है।

(iv) शारीरिक सौन्दर्य एवं आकर्षण बढ़ाने में- आज हरेक व्यक्ति सुन्दर दिखना चाहता हैं। सभी व्यक्ति की शरीर की आकृति एक समान नहीं होती। कोई नाटा, लम्बा, कंधा चौड़ा आदि होती है। उचित परिधान के प्रयोग से बेढंग अंगों को छिपाया जाता है। यह काम परिधान ही करता है।

(v) सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए- आजकल वस्त्रों से हमारी सामाजिक प्रतिष्ठा का मूल्यांकन होता है।

(vi) मनोवैज्ञानिक सुरक्षा- सही परिधान हमें आत्मबल तथा आत्मविश्वास जागृत करता है। दूसरे के सामने आने में हीन भावना नहीं जागृत होती है। अच्छे एवं सुन्दर वस्त्रों को धारण करने से मन प्रसन्न एवं आनंदित रहता है।

वस्त्र खरीदते समय निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना चाहिए-

(i) टिकाऊपन- वही वस्त्र अच्छा माना जाता है जो मजबूत तथा अधिक दिनों तक चलता है। अतः कपड़े खरीदते समय टिकाऊपन पर ध्यान देना चाहिए।

(ii) पसीना सोखने की क्षमता- जो कपड़ा पसीना आसानी से सोख लेता है वह अच्छे किस्म का माना जाता है। पसीना नहीं सोखने वाला वस्त्र मनुष्य को बेचैनी बढ़ा देता है। मिश्रित तंतओं से बने वस्त्र आसानी से पसीना सोख लेते हैं। इसलिए खरीदते समय इसका ध्यान रखना चाहिए।

(ii) सिलवट अवरोधक- कपड़ा खरीदते समय तन्तुओं को कुछ समय के लिए पकड़ कर रखें उसके बाद देखें कि उसमें सिलवटे तो नहीं पड़ रही है। जिन वस्त्रों पर शीघ्रता से सिलवटे पड जाती है उसे अतिरिक्त देखभाल की जरूरत पड़ती है।

(iv) धोने में सविधा- कपड़े खरीदते समय यह ध्यान देना चाहिए कि वस्त्र धोने में सुविधाजनक हो। जिन कपड़ों को धोना कठिन होता उन पर ड्राईक्लीन कराने में अधिक व्यय करना पड़ता है।

(v) रंग का पक्कापन- कपड़े का रंग पक्का होना चाहिए। घटिया किस्म के कपड़ों का रंग पक्का नहीं होता वे एक दो बार धोने के बाद पहनने योग्य नहीं रहते। जबकि पक्के रंग का कपड़ों का आकर्षण अधिक समय तक बना रहता है।

(vi) प्रायोजन वस्त्र- का चुनाव प्रायोजन के अनुसार करना चाहिए। जैसे-सूती वस्त्र, परिध न के काम आते हैं। इसका उपयोग घरेलू उपयोग में जैसे-तौलिया, झाड़न, मेजपोश, चादर, बेडशीट आदि के लिए किया जाता है।

(vii) मौसम- मौसम के अनुकूल वस्त्रों को चुनने, खरीदने एवं पहनने की समझ सबको होनी चाहिए। गर्मी के मौसम के लिए हल्के रंग के सूती वस्त्र अच्छे रहते हैं क्योंकि इनमें ताप के संवहन . की क्षमता होती है। वर्षा ऋतु में जल अभेद्य, सर्दी के दिनों में गहरे रंग के ऊनी वस्त्रों का प्रयोग
करना चाहिए।

(viii) फैशन- फैशन समय-समय पर परिवर्तित होते रहते हैं। कौन-सा फैशन किस तरह के व्यक्तित्व पर फबेगा किस पर नहीं फबेगा खरीदारी करते समय इसका ध्यान रखना चाहिए।

(ix) मल्य- वस्त्र विभिन्न मूल्य के बाजार में उपलब्ध है। आवश्यक हैं सही मूल्य में सही वस्त्र खरीदे जाए। अच्छी चीज प्राप्त करने के लिए यदि थोड़े अधिक मूल्य चुकाने पड़े तो भी चुकाने के लिए तैयार रहना चाहिए।

(x) वस्त्रों की देखरेख एवं संचयन- वस्त्र की खरीदारी करते समय यह ध्यान देना चाहिए कि कौन से वस्त्र फफूंदी के प्रति ज्यादा संवेदनशील हैं, कौन से वस्त्र को कीड़े खा सकते हैं, वस्त्र कितने समय के लिए बंद करके रखा जा सकता है, कीड़ों से बचाव कैसे करें आदि।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर Home Science Part – 5 (15 Marks)


41. सिले-सिलाये (रेडीमेड) वस्त्र खरीदते समय किन-किन बातों पर ध्यान रखना चाहिए ?

(What should be taken care at the time of purchasing readymade clothes?)

उत्तर⇒ सिले-सिलाये वस्त्र खरीदने से कई लाभ होते हैं। सिले-सिलाये वस्त्र खरीदने से वस्त्र कम समय में उपलब्ध हो जाते हैं। आजकल अधिकांश लोग रेडीमेड वस्त्र ही खरीदना पसंद करते हैं। रेडीमेड वस्त्र खरीदते समय निम्न बातों को ध्यान में रखना चाहिए-

(i) सीवन- रेडीमेड वस्त्र खरीदते समय उलट-पुलट कर देख लें कि कपड़े का जोड़ सफाई से लगा हो, सिलाई मजबूत हो, कपड़े का दबाव ऐसा हो जिसे जरूरत पड़ने पर बढ़ाया जा सके, किनारों पर पिको हो।

(ii) तूरपन- रेडीमेड वस्त्र पर तुरपन इकहरे धागे से एवं पास-पास हो, तुरपन उसी रंग के धागे से हो जिस रंग का वस्त्र है।

(iii) प्लैकेट या बटन की पट्टी- वस्त्रों पर बटन पट्टी के अनुरूप लगायी गयी हो। पट्टी लगाते समय वस्त्रों पर झोल न पड़े। बटन या हुक पास-पास लगे हो।

(iv) बटन, हुक, काज- बटन पट्टी पर लगे बटन, कपड़े के रंग से मेल खाते हुए हो। काज पूर्ण रूप से सही तरह से भरा होना चाहिए।

(v) आकर्षक- रेडीमेड वस्त्रों को आकर्षक बनाने के लिए उन पर मोती, सितारे, कढ़ाई, टाइपिन, फ्रिल, लेस आदि लगाये जाते हैं। यह देखने में आकर्षक हो। यह पहनने वाले व्यक्ति पर अच्छा लगेगा या नहीं।


42. शिशुओं के वस्त्रों के चुनाव आप किस प्रकार करेंगी ?
(How can you select children cloths ?)

उत्तर⇒ शिशुओं के लिए वस्त्रों का चुनाव निम्न प्रकार से करेंगे

(i) शिशु के लिए सूती कपड़ा सबसे अच्छा होता है। सूती वस्त्र में भी कोमल तथा हल्का वस्त्र शिशु की कोमल त्वचा को क्षति नहीं पहुँचाता। सूती वस्त्र में सरंध्रता (porous) होने के कारण शिशु की त्वचा की पसीना सोख लेता है, उसे चिपचिपा नहीं होने देता। शिशुओं के लिए रेशमी या नायलान वस्त्र कष्टदायक होता है।

(ii) शिशु के वस्त्रों को बार-बार गंदे होने के कारण कई बार धोना पड़ता है। इसलिए शिशुओं के वस्त्र ऐसी होनी चाहिए जिन्हें बार-बार धोया तथा सुखाया जा सके। वस्त्र ऐसा नहीं होना चाहिए जिसे घर में धोया जा सके या जिसे सूखने में बहुत अधिक – समय लगता हो।

(iii) शिशुओं के वस्त्र हमेशा साफ तथा कीटाणुरहित होना चाहिए। वस्त्रों को कीटाणुरहित करने के लिए उन्हें गर्म पानी में धोना चाहिए तथा डेटॉल के पानी में भिगोना चाहिए। इसलिए वस्त्र ऐसा होना चाहिए जो गर्म पानी तथा डेटॉल या कीटाणुनाशक पदार्थ को सहन कर सके।

(iv) उसके गर्म कपड़े भी ऐसे होने चाहिए. जो गर्म पानी में सिकुड़े नहीं।

(v) शिशुओं के कपड़ों की संख्या अधिक होनी चाहिए क्योंकि उसके कपड़े गंदे हो जाने पर कई दिन में कई बार बदलने पड़ते हैं।

(vi) शिशुओं के कपड़े मांड रहित होने चाहिए तथा इलास्टिक वाले नहीं होने चाहिए।

(vii) शिशुओं के कपड़े सामने, पीछे या ऊपर की ओर खुलने चाहिए, जिससे शिशु को सिर से कपड़ा न डालना पड़े।

(viii) शिशुओं के वस्त्रों में पीछे की ओर बटनों के स्थान पर कपड़े से बाँधने वाली पेटियाँ (ties) या बंधक होने चाहिए क्योंकि बटन पीछे होने से शिशु के लेटने पर उसे चुभ सकते हैं।

(ix) शिशुओं के कपड़ों के रंग व डिजाइन अपनी रुचि के अनुसार होने चाहिए, परंतु रंग ऐसा होना चाहिए जो धोने पर निकले नहीं क्योंकि शिशु के वस्त्रों को अधिक धोना पड़ता है।

(x) शिशुओं के वस्त्रों में मजबूती का इतना महत्त्व नहीं होता है क्योंकि शिशुओं की वृद्धि बहुत तीव्र गति से होती है। जब तक शिशु के कपड़ों के फटने की स्थिति आती है वे छोटे हो चुके होते हैं।


43. वस्त्रों की देखरेख और उसका संचयन आप किस प्रकार करेंगी?
(How will you care and storage of clothes ?)

उत्तर⇒ वस्त्रों की देखरेख और उसका संचयन निम्नलिखित विधि से करना चाहिए

(i) ब्रश करना और धूप-हवा दिखाना- मोटे सूती या ऊनी वस्त्रों को उतारकर टाँगने के पूर्व मुलायम ब्रश से झाड़कर, पसीना लगे वस्त्र को धूप हवा लगाने के बाद संचयन करना चाहिए।

(ii) स्वच्छ संरक्षण- सभी वस्त्रों को अल्प या अधिक समय के लिए सहेज कर रखना पड़ता है। अलमारी के भीतर फिनाइल की गोली, नीम की सुखी पत्तियाँ, कीटनाशक. पदार्थ अवश्य डाल देना चाहिए। इसके अतिरिक्त अलमारी की सफाई एवं पॉलिश समय-समय पर करना चाहिए।

(iii) तत्क्षण मरम्मत- प्रयोग के दरम्यान प्रायः वस्त्रों की सिलाई उघड़ जाती है या खोंच लगकर फट जाती है। इसे तुरत मरम्मत कर लेना चाहिए।

(iv) दाग छुड़ाना एवं धुलाई की उचित विधि- वस्त्रों पर खाने-पीने या अन्य वस्तुओं – के दाग लग जाते हैं। इन्हें छुड़ाने के लिए कई प्रकार की विधियाँ अपनाई जाती है। जो विधि एवं अपमार्जक जिस वस्त्र के लिए उपयुक्त हो उसका प्रयोग करें।

(v) विधिपूर्वक सुखाना- आजकल बाजार में ऑटोमेटिक ड्रायर उपलब्ध है। किन्तु, सभी वस्त्रों को ड्रायर में सुखाना उचित नहीं है। अतः कपड़े को धूप-छाँव आदि में विधिपूर्वक ही सुखाना चाहिए।

(vi) विधिपूर्वक इस्तिरी करना- वस्त्रों पर उचित विधि से इस्तिरी करना आवश्यक है। रासायनिक रेशों पर अधिक गर्म इस्तिरी के प्रयोग से वे जल जाते हैं। अत: उन पर हल्की गर्म इस्तिरी का प्रयोग करना चाहिए।


44. वस्त्रों के धुलाई के सामान्य नियम क्या है ?
(What are the general methods/principles of cleaning of clothes ?)

उत्तर⇒ वस्त्रों की धुलाई के सामान्य नियम निम्नलिखित हैं-

(i) मैले वस्त्रों को शीघ्र धोना चाहिए। मैले वस्त्रों को दोबारा पहनने से उनमें मैल जम जाती है जिससे उसे साफ करना कठिन हो जाता है।

(ii) मैले वस्त्र को उतार कर किसी टोकरी, टब या थैले में रखना चाहिए। मैले कपड़े इधर-उधर फेंकना नहीं चाहिए अन्यथा धोते समय एकत्र करने में कठिनाई होती है।

(iii) कपड़ों को धोने से पूर्व उनकी प्रकृति के अनुसार अलग-अलग कर लेना चाहिए। . ऊनी, रेशमी, सूती तथा कृत्रिम तंतुओं से बने वस्त्रों को अलग-अलग विधियों द्वारा धोना चाहिए। सूती तथा रंगीन कपड़ों को भी अलग-अलग करके धोना चाहिए।

(iv) वस्त्रों को धोने से पहले उनकी मरम्मत अवश्य कर लेनी चाहिए तथा उन पर लगे दाग धब्बे को भी सुखाना चाहिए।

(v) धुलाई के लिए कपड़े की प्रकृति के अनुसार ही साबुन तथा डिटर्जेन्ट का चुनाव करना चाहिए।

(vi) वस्त्रों की धुलाई से पूर्व धोने के लिए प्रयोग में आने वाले सभी सामानों को एक स्थान पर एकत्र कर लेना चाहिए।

(vii) वस्त्रों को स्वच्छ पानी में ठीक तरह से धोकर उनमें से साबुन या डिटर्जेंट निकाल देना चाहिए अन्यथा वस्त्र के तंतु कमजोर हो जाते हैं।

(viii) सुखाने के लिए सफेद वस्त्रों को उल्टा करके धूप में सुखाना चाहिए तथा रंगीन वस्त्रों .’ को छाया में सुखाना चाहिए अन्यथा. उनके रंग खराब होने की संभावना रहती है। सफेद वस्त्रों को अधिक समय तक धूप में पड़ा रहने दिया जाय तो उन पर पीलापन आ जाता है।

(ix) सुखाते समय वस्त्रों को हैंगर पर लटका कर सुखाना चाहिए, जिससे उन पर अनावश्यक दबाव न पड़े।

(x) सुखाने के बाद वस्त्रों को इस्तरी करके ही रखना चाहिए।


45. एक किशोरी के लिए परिधानों के चुनाव में किन बातों को ध्यान में रखना चाहिए ?

(What are the points you will keep in your mind while selecting garments for
an adolescent girl?)

उत्तर⇒ एक किशोरी के लिए वस्त्र खरीदते समय निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखूगी-

(i) प्रयोजन- वस्त्र प्रयोजन के अनुकूल लूंगी। इसके लिए रेशों की विशेषताओं, उसके गुण, सूत बनाने की विधि, सूत से की गयी बुनाई, उसके गुण-अवगुण तथा विशेषताओं को ध्यान में रखूगी।

(ii) टिकाऊपन- वस्त्र की मजबूती/टिकाऊपन, धागों की बँटाई, वस्त्र की बुनाई एवं उसकी देखरेख पर ध्यान दूंगी।

(ii) ऋतु एवं मौसम से अनुकूलता- मौसम के अनुकूल वस्त्रों को पहनने वाली खरीदूंगी, क्योंकि वस्त्र का कार्य शरीर की गर्मी और सर्दी से रक्षा करना होता है और शरीर के सामान्य तापक्रम को प्रतिकूल परिस्थितियों में बनाये रखता है।

(iv) उचित रंग- रंग हमारी मनोभावनाओं को किसी न किसी रूप में प्रभावित करते हैं। व्यक्ति, त्वचा और समय के अनुरूप रंगों का चुनाव कर वस्त्र खरीदूगी।

(v) वस्त्रों की धुलाई- कुछ वस्त्रों को प्रतिदिन तथा कुछ को यदा-कदा समय-समय पर धोना पड़ता है। कौन-से साबुन किस वस्त्र के सौन्दर्य एवं रंग को नष्ट नहीं करेंगे? कौन से रेशे क्षारीय माध्यम में नष्ट नहीं होते हैं और किन पर अम्लों का बरा प्रभाव पड़ता है? उसी के अनुरूप शोधक सामग्रियों का चुनाव करना अति आवश्यक है।

(vi) वस्त्रों की देखरेख, सुरक्षा एवं संचयन- पहनने के बाद वस्त्रों को किस प्रकार टाँगना है? किस प्रकार के रेशों में कीडे लगते हैं? किसे कितने समय तक बक्से में बंद रखा जा सकता है आदि बातों पर ध्यान देना. अति अनिवार्य है।

(vii) फैशन और शैली- इसका महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। वैसे तो फैशन और शैली में परिवर्तन होते रहते हैं किन्तु वर्तमान में यह किस स्थान के लिए तथा किसके अनुकूल है, इसकी जानकारी आवश्यक होती है।

(vii) किस्म और श्रेणी- वस्त्रों के मूल उद्गम और रचना संबंधी विभिन्न प्रक्रियाओं की जानकारी से उसके किस्म एवं श्रेणी को समझने का अवसर प्राप्त होता है, इससे वस्त्र का प्रयोजनार्थ, उचित चयन की क्षमता बढ़ती है। की मल्य यह अति आवश्यक है। आर्थिक स्थिति के अनुसार महँगे तथा सस्ते वस्त्रों का चयन करूँगी।


46. धब्बे छुड़ाने की प्रमुख विधियाँ क्या हैं ?
(What are the important methods for removing stain or spot ?)

अथवा, वस्त्रों पर विभिन्न प्रकार के धब्बों को छुड़ाने की तालिका प्रस्तुत करें।
Or, Represent the table for removing different types of stain or spot on clothes.)

उत्तर⇒ धब्बे छुड़ाने की प्रमुख विधियों या वस्त्रों पर विभिन्न प्रकार के धब्बों को छुड़ाने की तालिका

धब्बेसूती तथा लिनन वस्त्रोरेशमी ,उनि तथा कृत्रिम वस्त्रो 
(i)रसदार सब्जी
(घी एवं हल्दी)
स्याही सोख्ता (चूस) ऊपर तथानीचे रखकर इस्तिरी करने से चिकनाई स्याही चूस पर आ जाती है। उसके बाद साबुन तथा गर्म जल से धोकर धूप में सुखानी चाहिए। स्प्रिट, पेट्रोल या मिट्टी तेल का प्रयोग करके इस धब्बे को हटाया जाता है। जैविक घोल में भींगाकर साबुन से धोने से भी धब्बे को हटाया जाता है।हलकी गर्म इस्तिरी से चिकनाई हटाई जाती है। पोटेशियम परमैंगनेट तथा अमोनिया घोलमें बारी-बारी से डुबोकर धब्बे को हटाया जाता है। पेट्रोल, स्प्रिट या मिट्टी के तेल का प्रयोग कर धब्बे को हटाया जाता है।
(ii)चाय या कॉफीउबलता हुआ जल डालने से धब्बे हट जाते हैं। ग्लिसरोल में भींगाने पर भी. धब्बे हट जाते हैं। सोडा या सुहागा फैलाकर उबलता जल उस पर डालने से धब्बे हट जाते हैं।गुनगुने जल में भींगाने तथा
सुहागा के घोल में डालने से
धब्बे हट जाते हैं। हलके
हाइड्रोजन पेरोक्साइड के घोल
में डालने से भी धब्बे हट जाते
हैं।
(iii)रक्त.ठंढे जल से धोने से धब्बे हट जाते हैं। नमक के घोल में डालने से भी धब्बे हट जाते हैं।ठंढे जल से धोने से तथा स्टार्च या मैदा फैलाकर सुखाने के बाद ब्रश से रगड़ने पर धब्बे हट जाते हैं।
(iv)स्याहीसाबुन तथा जल से धोकर, नींबू तथा नमक रखकर धूप में सुखाने पर, दूध या खट्टे दही में भींगाकर रखने से, पोटेशियम परमैंगनेट के घोल में रखकर, ऑक्जैलिक अम्ल में रखकर तथा जैविक घोल के प्रयोग कर धब्बे
हटाये जाते हैं।
साबुन तथा जल से धोकर नींबू
तथा नमक रखकर धूप में
सुखाने पर तथा हाइड्रोजन
पेरोक्साइड के घोल के प्रयोग
से भी धब्बे हटाये जाते हैं।

47. धुलाई की विभिन्न विधियों के बारे में लिखें।
(Write about different methods of washing.)

उत्तर⇒ घरेलू प्रयोग में तथा सभी पारिवारिक सदस्यों के परिधानों में तरह-तरह के वस्त्र प्रयोग में आते हैं। सूती, ऊनी, रेशमी, लिनन, रेयन और रासायनिक भी रहते हैं। धुलाई की उचित विधि के प्रयोग से वस्त्रों का सौन्दर्य स्थायी और टिकाऊ होता है, साथ ही कार्यक्षमता भी बढ़ती है।

कपड़े धोने की विधियाँ

(i) रगड़कर- रगड़कर केवल उन्हीं वस्त्रों को स्वच्छ किया जा सकता है जो मजबूत और मोटे होते हैं। रगड़ क्रिया को विधिपूर्वक करने के कई तरीके हैं। वस्त्र के अनुरूप तरीके का प्रयोग करना चाहिए।

(a) रगड़ने की क्रिया हाथों से घिसकर- रगड़ने का काम हाथों से भी किया जा सकता है। हाथों से उन्हीं कपड़ों को रगड़ा जा सकता है जो हाथों में आ सके अर्थात् छोटे कपड़े।

(b) रगड़ने की क्रिया मार्जक ब्रश द्वारा- कुछ बड़े वस्त्रों को जो कुछ मोटे और मजबूत भी होते हैं, ब्रश से मार्जन के द्वारा गंदगी से मुक्त किया जाता है।।

(c) रंगड़ने की क्रिया घिसने और मार्जन द्वारा- मजबूत रचना के कपड़ों पर ही इस विधि का प्रयोग किया जा सकता है।

(i) हलका दबाव डालकर- हलका दबाव डालकर धोने की क्रिया उन वस्त्रों के लिए अच्छी रहती हैं। जिनके घिसाई और रगड़ाई से क्षतिग्रस्त हो जाने का शंका रहती है। हल्के, कोमल तथा सूक्ष्म रचना के वस्त्रों को इस विधि से धोया जाता है।

(iii) सक्शन विधि का प्रयोग- सक्शन विधि का प्रयोग भारी कपड़ों को धोने के लिए किया जाता है। बड़े कपड़ों को हाथों से गूंथकर तथा निपीडन करके धोना कठिन होता है। जो वस्त्र रगड़कर धोने से खराब हो सकते हैं जिन्हें गूंथने में हाथ थक जा सकते हैं और वस्त्र भी साफ नहीं होता है उन्हें सक्शन विधि की सहायता से स्वच्छ किया जाता है।

(iv) मशीन से धलाई करना- वस्त्रों को मशीन से भी धोया जाता है। धुलाई मशीन कई प्रकार की मिलती है, कार्य प्रणाली के आधार पर ये तीन टाइप की होती हैं सिलेंडर टाइप, वैक्यूम कप टाइप और टेजीटेटर टाइप। मशीन की धुलाई तभी सार्थक होती है जब अधिक वस्त्रों को धोना पड़ता है और समय कम रहता है।


48. वस्त्रों का सामाजिक और मनोवैज्ञानिक महत्त्व क्या है ?
(What are the social and psychological importance of garments?)

उत्तर⇒ वस्त्रों का सामाजिक और मनोवैज्ञानिक महत्त्व- किसी व्यक्ति को व्यक्तिगत रूप से जानने से पहले सबसे पहला प्रभाव जो पड़ता है वह उसके परिधानों का होता है। वह व्यक्ति किस तरह से अपने आपको सजाता है, उसके चलने का तरीका, उसके बात करने का तरीका, वह किस तरह से अपने आप को ध्यान रखता है। इन सब बातों पर उसका पूरा व्यक्तित्व निर्भर करता है और यही तथ्य व्यक्तित्व को उभार कर सामने लाते हैं। उस व्यक्ति के परिधान किस हद तक उस व्यक्ति को सामने लाते हैं यह बात पहने गए वस्त्रों के डिजाइन, रंग आदि पर निर्भर करती है।

किंतु, एक प्रश्न हर व्यक्ति के दिमाग में आता है कि आखिर मनुष्य ने कपड़ा पहनना शुरू क्यों किया ? विभिन्न प्रकार की ड्रेस कैसे बनी ?

बहुत से एंथ्रोपालोजिस्ट्स ने इन प्रश्नों के जवाब ढूँढने की कोशिश की है और इसके चलते काफी जानकारियाँ सामने आई हैं। समाज में बहुत से मनोवैज्ञानिकों ने भी अपने-अपने विचार इसमें जोडे हैं। प्रत्येक देश में अपनी-अपनी कथाएँ और मनोविज्ञान. परिधानों के बारे में अलग-अलग
हैं। हम एकदम निश्चित रूप से यह नहीं कह सकते कि आखिर मनुष्य ने कपड़ा पहनना क्यों शुरू किया था ? किंतु कुछ सिद्धांत ऐसे सामने आए हैं जिनके ऊपर बहुत से लोग विश्वास कायम करते हैं और बहुत से नहीं भी करते हैं।


49. रोग प्रतिरक्षण सारणी बताइए।
(Explain table of immunization schedule.)

उत्तर⇒रोग प्रतिरक्षण सारणी (Immunization schedule) के अनुसार कौन कौन से टीके कब लगवाये जाते हैं, उनका विवरण निम्न प्रकार हैं-

कबक्याक्यों
16 से 36 सप्ताहटी ० टी ० के दो टीकेगर्भवती महिला को लगाए जाते
हैं। इससे माँ और नवजात शिशु
को टेटनस से बचाव होता है।
3 से 9 महीने के
बीच
एक महीने के अंतर पर डी ०
पी ० टी ० के तीन टीके और
पोलियो की तीन खुराके देनी
चाहिए
गलघोंटू (डिप्थीरिया), काली खाँसी
(कुकुर खाँसी, टेटनस और
पोलियो से बच्चे का बचाव।
0 से एक महीने
के बीच
बी ० सी ० जी ० टीकातपेदिक (T.B.) से बचाव के लिए
9 से 12 महीने
के बीच
खसरे का एक टीकाखसरे से बच्चे का बचावा
18 से 24 महीने
के बीच
डी ० पी ० टी ० और पोलियो की
एक-एक बूस्टर खुराक
गलघोंटू (डिप्थीरिया), काली खाँसी (कुकुर खाँसी) और टेटनस से बच्चे का बचावा
15 माहएम ० एम ० आरखसरा, कनफेड, रूबैला सेबचावा
5 से 6 वर्ष के
बीच
टाइफाइड और डी ० पी ० टी ० के दो बूस्टर टीकेगलघोंटू (डिप्थीरिया), टिटनेस और ययफाइड बुखार से बच्चे काबचावा
10 वर्षटी० टी० और टायफाइड के दो टीकेटिटनेस और टायफाइड से बचाव।
16 वर्षटी ० टी ० और टायफाइड के दो टीकेटिटनेस और टायफाइड से बचाव।

50. खाद्य-पद्धार्थों के मानक प्रमाण चिह्न के नाम उदाहरण सहित लिखें।
(Write the name with example of Standard Proof Symbol of food materials.)

उत्तर⇒ खाद्य पदार्थों के मानक प्रमाण चिह्नों के नाम उदाहरणसहित निम्नलिखित हैं-

मानक प्रमाण चिह्नों के नामउदाहरण
1.एफ ० पी ० ओ ० (Fruit Product Order)संरक्षित फल, सब्जियाँ, फलों के रस, फलों के पेय, स्कवैश, जैम, जैली, सूखे फल,शरबत, कृत्रिम सिरका, अचार, सीरप आदि।
2.आई ० एस ० आई ० (I.S.I.).(शिशु दुग्ध आहार, पाउडर दूध, कोको
पाउडर, आइसक्रीम, सेक्रीन, बिस्कुट, बेकिंग
पाउडर, नमक, बेसन, पनीर, बीयर, रम, कस्टर्ड
पाउडर, विद्युत-पंखे, इस्तिरी, चूल्हा, केतली,
स्विच मिक्सी, प्रेशर कुकर एवं गैस चूल्हा
आदि)
कृषि एवं खाद्य, रसायन, सिविल इंजीनियरींग,
चिकित्सा उपकरण, इलेक्ट्रोनिकी एवं दूर
संचार, विद्युत तकनीकी, जहाजरानी भारवहन,
पेट्रोलियम, कोयला, यांत्रिक इंजी ० संरचना
और धातु एवं वस्त्रादि।
3.एगमार्क (AGMARK)घी, मक्खन, खाद्य तेल, शहद, दालें, मसालें,
आटा, बेसन आदि

51. शरीर में जल का क्या कार्य है ?
(What is the function of water in the botty ?)

उत्तर⇒ शरीर में जल का निम्नलिखित कार्य हैं

(i) शरीर का निर्माण कार्य- शरीर के पूरे भार का 56% भाग जल का होता है। गुर्दे में 83%, रक्त में 85%, मस्तिष्क में 79%, मांसपेशियाँ में 72%, जिगर में 70% तथा अस्थियाँ में 25% जल होता है।

(ii) तापक्रम नियंत्रक के रूप में- जल शरीर के तापक्रम को नियंत्रित रखता है।

(iii) घोलक के रूप में- यही माध्यम है जिससे पोषक तत्वों को कोषों तक ले जाया जाता है तथा चयापचय के निरर्थक पदार्थों को निष्काषित किया जाता है। पाचन क्रिया में जल का प्रयोग होता है। मूत्र में 96% जल होता है। मल-विसर्जन में इसकी आवश्यकता होती है। इसकी कमी से कब्जियत होती है।

(iv) स्नेहक कार्य- यह शरीर के अस्थियों के जोड़ों में होने वाले रगड़ से बचाता है। संधियों के चारों तरफ थैलीनुमा ऊतक में यह उपस्थित होता है, जिसके नष्ट होने से संधियाँ जकड़ जाती हैं।

(v) शरीर के निरूपयोगी पदार्थों को बाहर निकालना- शरीर के विषैले पदार्थों को मूत्र तथा पसीने द्वारा यह बाहर निकालने में सहायक होता है।

(vi) नाजुक अंगों की सुरक्षा तथा पोषक तत्वों का हस्तांतरण करना- यह पोषक तत्त्वों को एक स्थान से दूसरे स्थान पहुंचाता है। साथ ही नाजुक अंगों का सुरक्षा भी करता है।

Author

examunlocker@gmail.com

Leave a Reply

Your email address will not be published.