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श्रम विभाजन और जाति-प्रथा SUBJECTIVE 

1. लेखक किस विंडवना कि बात करते है ? वींड्वना का स्वरुप क्या है ? 

उतर:- लेखक भीमराव अम्बेडकर जी वींड्वना कि बात करते हुए कहते है कि इस युग मे जातिवाद के पोषको कि कमी नहींहै जिसका स्वरुप है कि जतिप्रथा श्रम विभाजन के साथ- साथ श्रमिक विभाजन का भी रुप ले रखा है , जो अस्वभविक है।


2. जातिवाद के पोषक उसके पक्ष मे क्या तर्क देते है ? 

उतर:-  जातिवाद के पोषको का तर्क है कि आधुनिक सभ्य समाज कार्य कुशलता के लिए श्रम विभाजन आवश्यक मानता है और जाति प्रथा श्रम विभाजन का ही रूप है इसलिए इसमें कोई बुराई नहीं है।


3. जातिवाद के पक्ष में दिए गए तर्को पर लेखक की प्रमुख आपत्तियाँ क्या है ?

उतर:-  जातिवाद के पक्ष में दिए गए तर्क पर लेखक के प्रमुख आपतियाँ इस प्रकार है कि जाति प्रथा श्रम विभाजन का रूप ले लिया है और किसी सभ्य समाज में श्रम विभाजन व्यवस्था श्रमिकों के विभिन्न पहलुओं में अस्वाभाविक विभाजन नहीं करता है ।


4. जाति भारतीय समाज में श्रम विभाजन का स्वाभाविक रूप क्यों नहीं कही जा सकती है ?

उतर:- भारतीय समाज में जातिवाद के आधार पर श्रम विभाजन और अस्वाभाविक है क्योंकि जातिगत श्रम विभाजन श्रमिकों की रुचि अथवा कार्यकुशलता के आधार पर नहीं होता, बल्कि माता के गर्भ में ही श्रम विभाजन कर दिया जाता है जो विवशता ,अरुचिपूर्ण होने के कारण गरीबी और अकर्मव्यता को बढ़ाने वाला है ।


5. जाति प्रथा भारत में बेरोजगारी का एक प्रमुख और प्रत्यक्ष कारण कैसे बनी हुई है ?

उतर:- जाति प्रथा भारत में बेरोजगारी का एक प्रमुख और प्रत्यक्ष कारण है क्योंकि भारतीय समाज में श्रम विभाजन का आधार जाति है चाहे श्रमिक कार्य कुशल हो या नहीं उस कार्य में रुचि रखता हो या नहीं इस प्रकार हम कह सकते हैं कि जब श्रमिकों कार्य करने में न दिल लगे ना दिमाग तो कोई कार्य कुशलता पूर्वक कैसे प्राप्त कर सकता है यही कारण है कि भारत में जतिप्रथा बेरोजगारी का प्रत्यक्ष और प्रमुख कारण बना हुआ है ।


6. लेखक आज के उद्योगों में गरीबी और उत्पीड़न से भी बड़ी समस्या किसे मनते है, और क्यो ?

उतर:- लेखक भीमराव अंबेडकर आज के उद्योगों में गरीबी और उत्पीड़न से भी बड़ी समस्या लोगों का निर्धारित कार्य को मानते हैं ,क्योंकि अरुचि और विवस्ता वस मनुष्य काम को टालने लगता है और कम काम करने के लिए प्रेरित हो जाता है। ऐसी स्थिति में जहां काम करने में नद दिल लगे ना दिमाग तो कोई कुशलता कैसे प्राप्त कर सकता है ।


7. लेखक ने पाठ के किन पहलुओं में जाति प्रथा को एक  हानिकारक प्रथा के रूप में दिखाया है ?

उतर:- लेखक ने पाठ के विभिन्न पहलुओं में जाति प्रथा को एक हानिकारक प्रथा के रूप में दिखाया है जो इस प्रकार है, अस्वाभाविक श्रम विभाजन ,बढ़ती बेरोजगारी, अरुचि और विवस्ता में श्रम का चुनाव ,गतिशील एवं आदर्श समाज ,तथा वास्तविक लोकतंत्र का स्वरूप, आदि ।


8. सच्चे लोकतंत्र की स्थापना के लिए लेखक ने किन विशेषताओ को आवश्यक माना है ?

उतर:- सच्चे लोकतंत्र कि स्थापना के लिए लेखक अनेक विशेषताओं को आवश्यक माना है। बहू विध हितो में सब का भाग समान होना चाहिए सबको उनकी रक्षा के प्रति सजग होनी चाहिए तात्पर्य है कि हमें समाज में दूध और पानी के मिश्रण की तरह भाईचारे की भावना होनी चाहिए हमें साथियों के प्रति श्रद्धा और सम्मान होनी चाहिए ?


9. श्रम विभाजन और जाति-प्रथा’ पाठ का सारांश लिखें।

उतर:-आज के युग में भी जाति-प्रथा की वकालत सबसे बड़ी बिडंबना है। ये लोग तर्क देते हैं कि जाति-प्रथा श्रम-विभाजन का ही एक रूप है। ऐसे लोग भूल जाते हैं कि श्रम-विभाजन श्रमिक-विभाजन नहीं है। श्रम-विभाजन निस्संदेह आधुनिक युग की आवश्यकता है, श्रमिक-विभाजन नहीं। जाति-प्रथा श्रमिकों का अस्वाभाविक विभाजन और इनमें ऊँच-नीच का भेद करती है।

वस्तुत: जाति-प्रथा को श्रम-विभाजन नहीं माना जा सकता क्योंकि श्रम-विभाजन मनुष्य की रूचि पर होता है, जबकि जाति-प्रथा मनुष्य पर जन्मना पेशा थोप देती है। मनुष्य की रूचि-अरूचि इसमें कोई मायने नहीं रखती। ऐसी हालत में व्यक्ति अपना काम टालू ढंग से करता है, न कुशलता आती है न श्रेष्ठ उत्पादन होता है। चूँकि व्यवसाय में, ऊँच-नीच होता रहता है, अतः जरूरी है पेशा बदलने का विकल्प। चूँकि जाति-प्रथा में पेशा बदलने की गुंजाइश नहीं है,

इसलिए यह प्रथा गरीबी और उत्पीडन तथा बेरोजगारी को जन्म देती है। भारत की गरीबी और बेरोजगारी के मुल में जाति-प्रथा ही है। अतः स्पष्ट है कि हमारा समाज आदर्श समाज नहीं है। आदर्श समाज में । बहविध हितों में सबका भाग होता है। इसमें अवाध संपर्क के अनेक साधन एवं अवसर उपलब्ध होते हैं। लोग दूध-पानी की तरह हिले-मिले रहते हैं। इसी का नाम लोकतंत्र है। लोकतंत्र मूल रूप से सामूहिक जीवन-चर्या और सम्मिलित अनुभवों के आदान प्रदान का नाम है

Class 10th Hindi पाठ-2 विष के दांत Subjective Question 2022 | Vish Ke Dant Question Answer 2022 | विष के दांत Matric Exam 2022

प्रश्न 1. विष के दाँत शीर्षक कहानी का नायक कौन है ? तर्कपूर्ण उत्तर दें ।

उत्तर विष के ‘दाँत’ कहानी में मदन ऐसा पात्र है जो अहंकारी के अहंकार को नहीं सहन करता है बल्कि उसका स्वाभिमान जाग्रत होता है और वह ‘खोखा’ जैसे बालक को ठोकर देकर वर्षों से दबे अपने पिता की आँखें भी खोल देता है। सम्पूर्ण कहानी में मदन
की क्रांतिकारी भूमिका है। अतः इसका नायक मदन है।


प्रश्न 2. खोखा किन मामलों में अपवाद था ?

उत्तर सेन साहब एक अमीर आदमी थे । खोखा उनके बुढापे की आँखों का तारा था। इसीलिए मिसेज सेन ने उसे काफी छूट दे रखी थी । खोखा जीवन के नियम का जैसे अपवाद था और इसलिए यह भी स्वाभाविक था कि वह घर के नियमों का भी अपवाद था।


प्रश्न 3. ‘विष के दाँत’ शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।

उत्तर:- ‘विष के दाँत’ शीर्षक महल और झोपड़ी की लड़ाई की कहानी है। मदन द्वारा पिटे जाने पर खोखा के जो दाँत टूट जाते हैं वे अमीरों की प्रदर्शन-प्रियता और गरीबों पर उनके अत्याचार के विरुद्ध एक चेतावनी है, सशक्त विद्रोह है। यहीं। इस कहानी का लक्ष्य है। अत: निसंदेह कहा जा सकता है कि ‘विष के दाँत’ इस दृष्टि से बड़ा ही सार्थक शीर्षक है।

अमीरों के विष के दाँत तोड़कर मदन ने जिस उत्साह, ओज और आग का परिचय दिया है वह समाज के जाने कितने गिरधर लालों के लिए गर्वोल्लास की बात है । इसमें लेखक द्वारा दिया गया संदेश मार्मिक बन पड़ा है।


प्रश्न 4. काशू का चरित-चित्रण करें।

उत्तर:- काशू समृद्ध पिता का शोख लडका है। माता-पिता और बहनों को अतिशय प्रेम पाकर उसके स्वभाव में एक प्रकार का दुराग्रह व्याप्त हो गया है। वह जिद्दी स्वभाव का है, उसके मन में जो आता है, वही करता है। उसमें अहंकारवृत्ति भी है।


प्रश्न 5. आपकी दृष्टि में कहानी’विष के दाँत’ का नायक कौन है तर्कपूर्ण उत्तर दें ।

उत्तर:- हमारी दृष्टि में ‘विष के दाँत’ शीर्षक कहानी का नायक मदन है। सारे पात्रों में सर्वाधिक प्रभावशाली है और कथावस्तु में उसका ही महत्त्व सर्वोपरि है।। इस दृष्टि से विचार करने पर स्पष्ट ज्ञात होता है कि इस कहानी का नायम् मदन। ही है। इसमें मदन का ही चरित्र है जो सबसे अधिक प्रभावशाली है। पूरी कथावस्तु में इसी के चरित्र का महत्त्व है। खोखे के विष के दाँत उखाड़ने की महत्त्वपूर्ण घटना।का भी वही संचालक है। अतः निर्विवाद रूप से मदन की कहानी का नायक है।


प्रश्न 6. सेन साहब के परिवार में बच्चों के पालन-पोषण में किए जा रहे |लिंग-आधारित भेद भाव का अपने शब्दों में वर्णन कीजिए।

उत्तर:- सेन साहब अमीर आदमी थे। उनकी पाँच लड़कियाँ थी एवं एक लड़का था । उस परिवार में लड़कियों के लिए घर में अलग नियम तथा शिक्षा थी। लेकिन लड़का, के लिए अलग नियम एवं अलग शिक्षा ।


प्रश्न 7. मदन और ड्राइवर के बीच के विवाद के द्वारा कहानीकार क्या बताना चाहता है ?

उत्तर:- मदन और ड्राइवर के बीच विवाद के द्वारा कहानीकार बताना चाहते हैं। कि अपने पर किये गये अत्याचार का विरोध करना पाप नहीं है। सेन साहब की नयी चमकती काली गाड़ी को केवल छूने भर के तथाकथित अपराध के लिए मदन शोफर द्वारा घसीटा जाता है। यह गरीब बालक पर अत्याचार है। मदन द्वारा उसका मुकाबला करना अत्याचारियों पर विजय प्राप्त करने का प्रयास है।


प्रश्न 8. आरंभ से ही कहानीकार को स्वर व्यंग्यपूर्ण है। ऐसे कुछ प्रमाण उपस्थित करे ।

उत्तर:- ‘विष के दाँत’ कहानी के प्रारंभ में मोटर कार की बात की प्रस्तुति व्यंग्यात्मक शैली में है। उनके लड़कियाँ के गुणों की चर्चा, सेन साहब द्वारा खोखा को एक इंजीनियर के रूप मे
देखना, उसकी हमेशा प्रशंसा करना भी लेखक का व्यंग्य ही है ।


Long Answer Type Question


प्रश्न 1. विष के दाँत’ कहानी का सारांश लिखें।

उत्तर:- सेन साहब को अपनी कार पर बडा नाज था । घर में कोई ऐसा न था जो गाड़ी तक बिना इजाजत फटके । पाँचों लड़कियाँ माता-पिता का कहना। अक्षरशः पालन करतीं। किन्तु बुढ़ापे में उत्पन्न खोखा पर घर का कोई नियम लागू। न होता था । अतः गाड़ी को खतरा था तो इसी खोखा अर्थात् काश से। सेन साहब अपने लाडले को इंजीनियर बनाना चाहते थे। ये बड़ी शान से मित्रों से अपने बेटे की काबलियत की चर्चा करते थे। एक दिन मित्रों की गप्प-गो और काश के गुण-गान से उठे ही थे कि बाहर गुल-गपाड़ा सुना। निकले तो देखा कि गिरधारी की पत्नी से शोफर उलझ रहा है और उसका बेटा मुदन शोफर पर झपट रहा है। शोफर ने कहा कि मदन गाडी छ रहा था और मना करने पर उथम मचा रहा है। सेन साहब ने मदन क स को चेतावनी दी और अपने किरानी गिरधर को बुलाकर डाँटा-अपने बेटे को संभालो। घर आकर गिरधारी ने मदन को खूब पीटा।। दूसरे दिन बगल वाली गली में मदन दोस्तों के साथ लट्टू खेल रहा था। काशू भी खेलने को मचल गया। किन्तु मदन ने लट्टू देने से इनकार कर दिया काशू की।आदत तो बिगड़ी थी। बस, आदतवश हाथ चला दिया। मदन भी पिल पड़ा और मार मार कर काश के दाँत तोड दिए ।देर रात मदन घर आया तो सुना कि सेन साहब ने उसके पिता को नौकरी में हुआ दिया है और आउट हाउस से भी जाने का हुक्म दिया है। मदन के पैर से लोटा। लुढ़क गया। आवाज सुनकर उसके माता-पिता निकल आए। मदन मार खाने को तैयार हो गया। गिरधारी उसकी ओर तेजी से बढ़ा किन्तु सहसा उसका चेहरा बदल गया। उसने सदन को गोद में उठा लिया-‘शावास बेटा  एक मैं हैं और एक तू है जो खोखा के दो-दो दाँत तोड़ डाले।’ इस प्रकार हम देखते हैं कि कहानीकार ने ‘विष के दाँत’ उच्च वर्ग के सेन साहब की महत्त्वाकांक्षा, सफेदपोशी के भीतर लड़के-लड़कियों में विभेद भावना, नौकरी-पेशा वाले गिरधारी की हीन-भावना और उसके बीच अन्याय का प्रतिकार करनेवाली बहादुरी ओर साहस के प्रति प्यार और श्रद्धा को प्रस्तुत करते हुए प्यार-दुलार के परिणामों को बुखबी दर्शाया है।


प्रश्न 2. सेन साहब के और उनके मित्रों के बीच क्या बातचीत हुई और पत्रकार मित्र ने उन्हें किस तरह उत्तर दिया ?

उत्तर:- एक दिन सेन साहब के कुछ दोस्त बैठे गपशप कर रहे थे। उनमें एक साहब साधारण हैसियत के अखबारनवीस थे और साथ में उनका लड़का भी था, जो था तो खोखा से भी छोटा, पर बड़ा समझदार और होनहार मालूम पड़ता था। किसी ने उसकी कोई हरकत देखकर उसकी कुछ तारीफ कर दी और उन साहब से पूछा कि बच्चा स्कूल तो जाता ही होगा ? इसके पहले कि पत्रकार महोदय कुछ जवाब देत, सेन साहब ने शुरू किया- मैं तो खोखा को इंजीनियर बनाने जा रहा हैं, और वे हो बातें दुहराकर वे थकते नहीं थे। पत्रकार महोदय चुप मुस्कुराते रहे। जब उनसे फिर पूछा गया कि अपने बच्चे के विषय में उनका क्या ख्याल है, तब उन्होंने कहा मै चाहता हूँ कि वह जेंटलमैन जरूर बने और जो कुछ बने, उसका काम है, उसे पूरी आजादी रहेगी।” सेन साहब इस उत्तर के शिष्ट और प्रच्छन्न व्यंग्य पर ऐठकर रह गए ।


प्रश्न 3. सेन साहब, मदन, काशू और गिरधर का चरित्र-चित्रण करे।

उत्तर :- प्रस्तुत कहानी में लेखक ने अमीरों की तथाकथित मर्यादा पर करारा व्यंग्य किया है । महल और झोपड़ी की लड़ाई में महल की खिल्ली उडाना हो इस कहानी में कहानीकार का मुख्य संदेश है। सेन साहब प्रदर्शन, प्रिय अमीर आदमी हैं । वे गरीबों का शोषण करके उन्हें प्रताड़ित करके अपनी प्रतिष्ठा स्थापित करने वाले बाह्याडम्बर से युक्त धनी आदमी के रूप में दिखाये गये हैं। खोखा महल में रहकर लाड़-प्यार से बिगड़ा हुआ बड़े बाप की औलाद के रूप में चित्रित है। वह अहंकारी बालक है ।वह देश का प्रतीक है। मदन अमीरों की प्रदर्शन-प्रियता और गरीबों पर उनके अत्याचार के विरुद्ध एक चेतावनी है, सशक्त विद्रोह है। गिरधर अत्याचार, शोषण एवं अन्याय को सहनेवाला लाचार एवं विवश इनसान है। लेकिन अंतर्मन से वह अत्याचार का समर्थन नहीं करता है, बल्कि उसका प्रतिकार करने की इच्छा रखता है। वैसे तो कहानी में कई पात्र आये हैं. मि सेन, खोखा. गिरधरलाल आदि मगर सभी पात्रों में यह मदन का ही चरित्र है जो सवाधिक प्रभावशाली है । मदन का चरित्र उसके व्यक्तित्व को हँक लेता है। मदन के चरित्र की विशेषता है. निर्भीकता । वह दुलियों के दिल की चिनगारी है।


प्रश्न 4. सेन साहब के परिवार में बचा के पालन पोषण में जा रहे लिंग-आधारित भेद भाव को अपने शब्दों में वर्णन कीजिए।

उत्तर:- सेन साहब अमीर आदमी थे। उनकी पाँच लड़कियाँ थी एक लड़का था। उस परिवार में लड़कियों के लिए घर में अलग नियम तथा शिक्षा थी। लेकिन लड़का, के लिए अलग नियम एवं अलग शिक्षा । लड़कियों के लिए सामान्य शिक्षा की व्यवस्था थी। वहीं खोखा को प्रारंभ से ही इंजीनियर के रूप में देखा जा रहा था।लड़कियाँ कठपुतली स्वरूप थीं । उन्हें क्या नहीं करना चाहिए यह पूरी तरह से सिखाया गया था। दूसरी ओर खोखा (लड़का) के दुर्ललित स्वभाव के अनुसार सिद्धान्तों को बदल देना सेन परिवार के लिए सामान्य बात थी । इस तरह से उस परिवार में लिंग-आधारित भेद भाव व्याप्त था।

Class 10th Hindi पाठ -3 भारत से हम क्या सीखें Subjective Question 2022 | Bharat Se Ham Kya Sikhe Subjective Question 2022


प्रश्न 1. भारत को पहचान सकने वाली दृष्टि की आवश्यकता किनके लिए वांछनीय है और क्यों ?

उत्तर:- भारत को पहचान सकनेवाली दृष्टि की आवश्यकता यूरोपियन लोगों के लिए वांछनीय है, क्योंकि भारत ऐसी अनेक समस्याओं से भरपूर है जिनका समाधान होने पर यूरोपियन लोगों की अनेक समस्याओं का निदान संभव है।


प्रश्न 2. लेखन ने किन विशेष क्षेत्रों में अभिरुचि रखने वालों के लिए भारत का प्रत्यक्ष ज्ञान आवश्यक बताया है ?

उत्तर:- लेखक ने बताया है कि जिन्हें भू-विज्ञान में, वनस्पति जगत में, जीवों के अध्ययन में, पुरातत्त्व के ज्ञान में एवं नीतिशास्त्र जैसे विषयों में विशेष अभिरुचि है उन्हें भारत का प्रत्यक्ष ज्ञान आवश्यक है।


प्रश्न 3. लेखक की दृष्टि में सच्चे भारत के दर्शन कहाँ हो सकते हैं और क्यों ?

उत्तर लेखक की दृष्टि में सच्चे भारत के दर्शन भारतीय ग्रामीण जीवन में हो सकते हैं। भारतीय ग्राम्य संस्कृति में सच्चा भारत निहित है। क्योंकि सच्चाई, प्रेम, करुणा, सहयोग की भावना ग्रामीणों में कूट-कूट कर भरा होता है।


प्रश्न 4. भारत की ग्राम पंचायतों को किस अर्थ में और किनके लिए लेखक ने महत्त्वपूर्ण बतलाया है ? स्पष्ट करें।

उत्तर:- प्राचीन स्थानीय शासन प्रणाली या पंचायत-प्रथा को समझने-समझाने का बहुत बड़ा क्षेत्र भारतीय ग्राम पंचायत में विद्यमान है। जिन लोगों को अत्यंत सरल राजनैतिक इकाइयों के निर्माण और विकास से सम्बद्ध प्राचीनयुगीन कानून के पुरातन रूपों के विषय में हुए अनुसंधान की महत्ता को समझने की क्षमता प्राप्त करनी है, उनके लिए भारत की ग्राम पंचायतों को लेखक ने महत्त्वपूर्ण बताया है।


प्रश्न 5. लेखक ने वारेन हेस्टिंग्स से संबंधित किस दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना का हवाला दिया है और क्यों ?

उत्तर:- लेखक ने वारेन हेस्टिंग्स द्वारा 172 दारिस नामक सोने के सिक्के इस्ट इंडिया कंपनी के निदेशक मंडल की सेवा में भेजे जाने पर कम्पनी के मालिक द्वारा उसका महत्त्व नहीं समझना एवं मुद्राओं को गला देना दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना कहा है।क्योंकि, वह एक धरोहर था, अन्वेषण का विषय था ।


प्रश्न 6. भारत के साथ यूरोप के व्यापारिक संबंध के प्राचीन प्रमाण लेखक ने क्या दिखाए हैं ?

उत्तर:- लेखक के अनुसार सोलोमन के समय में ही भारत, सीरिया और फिलीस्तीन के मध्य आवागमन के साधन सुलभ हो चुके थे । साथ ही इन देशों के व्यापारिक अध्ययन के आधार पर प्रमाणित होता है कि हाथी-दाँत, बन्दर, मोर और चन्दन आदि जिन वस्तुओं के ओफिर से निर्यात की बात बाइबिल में कही गयी है, वे वस्तुएँ भारत के सिवा किसी अन्य देश से नहीं लाई जा
सकती।


प्रश्न 7. भारत किस तरह अतीत और सुदूर भविष्य को जोड़ता है ? अस्पष्ट करें

उत्तर:- भारत अतीत और भविष्य को जोड़ता है। यहाँ मानवीय जीवन का प्राचीनतम ज्ञान विद्यमान है। यहाँ की भूमि प्राचीन इतिहास से जुड़ी रही है । यहाँ की संस्कृत भाषा के द्वारा विश्व को चिंतन की ऐसी धारा में अवगाहन का अवसर मिलता है जो अभी तक अज्ञात थी । अतः यह बीते हुए काल और आने वाले समय के लिए सेतु के रूप में मान्य है।


प्रश्न 8. मैक्समूलर ने संस्कृत की कौन-सी विशेषताएँ और महत्त्व बतलाए हैं ?

उत्तर:- मैक्समूलर के अनुसार संस्कृत की पहली विशेषता इसकी प्राचीनता है। इसके वर्तमान रूप में भी अत्यन्त प्राचीन तत्त्व भलीभाँति सुरक्षित है । संस्कृत की मदद से, ग्रीक-लैटिन, गॉथिक और एंग्लो-सैक्सन जैसी ट्यूटानिक भाषाओं केल्टिक तथा स्लाव भाषाओं में विद्यमान समानता की समस्या को आसानी से हल किया जा सका।


प्रश्न 9. संस्कृत और दूसरी भारतीय भाषाओं के अध्ययन से पाश्चात्य जगत् को प्रमुख लाभु क्या-क्या हुए ?

उत्तर:- संस्कृत और दूसरी भारतीय भाषाओं के अध्ययन से मानव जाति के बारे में पाश्चात्य जगत के विचार व्यापक और उदार बने हैं। लाखों-करोडों अजनबियों तथा बर्बर समझे जानेवाले लोगों को भी अपने परिवार के सदस्य की भाँति गले लगाने की संस्कृति का विकास हुआ । इसके अध्ययन ने मानव-जाति के सम्पूर्ण इतिहास को एक वास्तविक रूप में प्रकट कर दिखाया, जो पहले नहीं हो पाया था। इसके अध्ययन से पाश्चात्य जगत में विश्व के प्राचीनतम अवस्था का ज्ञान प्राप्त किया जा
सका।


प्रश्न 10. समस्त भूमंडल में सर्वविद सम्पदा और प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण देश भारत है । लेखक ने ऐसा क्यों कहा है ?

उत्तर:- भारत ऐसा देश है, जहाँ मानव मस्तिष्क की उत्कृष्टतम उपलब्धियाँ का सर्वप्रथम साक्षात्कार हुआ है । यहाँ जीवन की बड़ी-से-बड़ी समस्याओं के ऐसे समाधान ढूंढ निकाले गये हैं जो विश्व के दार्शनिकों के लिए चिन्तन का विषय है। यहाँ जीवन को सुखद बनाने के लिए उपयुक्त ज्ञान एवं वातावरण का सान्निध्य मिलता है जो भूमंडल में अन्यत्र नहीं है।


प्रश्न 11. लेखक ने नया सिकंदर किसे कहा है? ऐसा कहना क्या उचित है ? लेखक का अभिप्राय स्पष्ट कीजिए।

उत्तर:- लेखक ने नया सिकंदर भारत को समझन, जानन एवं सम्पूण लाभ प्राप्त करने हेतु भारत आनेवाले नवागंतुक अन्वेषकों, पर्यटकों एवं अधिकारियों को कहा है। उसी प्रकार आज भी भारतीयता को निकट से जानने के नवीन स्वप्नदशी को आज का सिकंदर कहना अतिशयोक्ति नहीं है, यह उचित है।


प्रश्न 12. धर्मों की दृष्टि से भारत का क्या महत्त्व है? अथवा, धर्म की दृष्टि से भारत का क्या महत्त्व है? भारत से हम क्या सीखें’ पाठ के आधार पर बतायें।

उत्तर:- भारत प्राचीन काल से ही धार्मिक विकास का केन्द्र रहा है। यहाँ धर्म के वास्तविक उद्भव, उसके प्राकृतिक विकास तथा उसके अपरिहार्य झीयमा रूप का प्रत्यक्ष परिचय मिलता है। भारत वैदिक धर्म की भूमि है, बौद्ध धर्म की यह जन्मभूमि है, पारसियों के जरथुस्त्र धर्म की यह शरण-स्थली है। आज भी यहाँ नित्य नये मत-मतान्तर प्रकट एवं विकसित होते रहते हैं। इस तरह से भारत धार्मिक क्षेत्र में विश्व को आलोकित करनेवाला एक महत्त्वपूर्ण देश है।


प्रश्न 13. लेखक ने नीति कथाओं के क्षेत्र में किस तरह भारतीय अवदान को रेखांकित किया है ?

उत्तर:- लेखक ने बताया है कि नीति कथाओं के अध्ययन-क्षेत्र में नवजीवन का संचार हुआ है। समय-समय पर विविध साधनों और मार्गों द्वारा अनेक नीति कथाएँ पूर्व से पश्चिम की ओर प्रवाहित रही हैं।


प्रश्न 14. लेखक वास्तविक इतिहास किसे मानता है और क्यों ?

उत्तर:- लेखक किसी विषय के भूल उद्गम-स्रोत तक पहुँचने को उसका वास्तविक इतिहास मानता है। क्योंकि, वहीं से उस विषय की मौलिकता, उसका विकास तथा उसकी शाखाओं, प्रशाखाओं तथा जीवन-मूल्य ज्ञात होता है तथा उसका अध्ययन फलदायी होता है।


प्रश्न 2. लेखक ने नीति कथाओं के क्षेत्र में किस तरह भारतीय अवदान को रेखांकित किया है ?

उत्तर:- लेखक ने बताया है कि नीति कथाओं के अध्ययन-क्षेत्र में नवजीवन का संचार हुआ है। समय-समय पर विविध साधनों और मार्गों द्वारा अनेक नीति कथाएँ पूर्व से पश्चिम की ओर प्रवाहित रही हैं। भारत में प्रचलित कहावतों और दन्तकथाओं का प्रमुख स्रोत बौद्ध धर्म को माना जाने लगा है, किन्तु इसमें निहित समस्याएँ समाधान की प्रतीक्षा में हैं। लेखक ने एक उदाहरण देकर बताया है कि ‘शेर की खाल में गदहा’ वाली कहावत सबसे पहले यूनानी दार्शनिक प्लेटो के क्रटिलस में मिलती है। इसी तरह संस्कृत की एक कथा यूनान के एक नीति कथा से मिलती है अर्थात् भारतीय नीति कथाएँ यूनान से कैसे जुड़ी यह एक शोध का विषय है ।

Class 10th Hindi पाठ -4 नाखून क्यों बढ़ते हैं प्रश्न उत्तर Subjective Question Answer Matric Exam 2021

नाखून क्यों बढ़ते हैं प्रश्न उत्तर SUBJECTIVE 


1. मनुष्य बार-बार नाखूनों को क्यों काटता है ?

उत्तर-मनुष्य निरंतर सभ्य हीने के लिए प्रयासरत रहा है। प्रारंभिक काल में मानव एवं पशु एकसमान थे। नाखून अस्त्र थे। लेकिन जैसे-जैसे मानवीय विकास की धारा अग्रसर होती गई मनुष्य पशु से भिन्न होता गया। उसके अस्त्र-शस्त्र, — आहार-विहार, सभ्यता-संस्कृति में निरंतर नवीनता आती गयी । वह पुरानी जीवन-शैली को परिवर्तित करता गया । जो नाखून अस्त्र थे उसे अब सौंदर्य का रूप देने लगा। । इसमें नयापन लाने, इसे सँवारने एवं पशु से भिन्न दिखने हेतु नाखूनों को मनुष्य काट देता है।


2. नाखून क्यों बढ़ते हैं ? यह प्रश्न लेखक के आगे कैसे उपस्थित हुआ ?

उत्तर-– नाखून क्यों बढ़ते हैं ? यह प्रश्न एक दिन लेखक की छोटी लड़की ने उनसे पूछ दिया । उस दिन से यह प्रश्न लेखक के सोचने का विषय बन गया ।


3.लेखक द्वारा नाखूनों को अस्त्र के रूप में देखना कहाँ तक संगत है ?

उत्तर- कुछ लाख वर्षों पहले मनुष्य जब जंगली थो, उसे नाखून की जरूरत थी। वनमानुष के समान मनुष्य के लिए नाखून अस्त्र था क्योंकि आत्मरक्षा एवं भोजन हेतु नख की महत्ता अधिक थी। उन दिनों प्रतिद्वंदियों को पछाड़ने के लिए नाखून आवश्यक था । असल में वही उसके अस्त्र थे। उस समय उसके पास लोहे या कारतूस वाले अस्त्र नहीं थे, इसलिए नाखून को अस्त्र कहा जाना उपयुक्त है, तर्कसंगत है।


4. “स्वाधीनता’ शब्द की सार्थकता लेखक क्या बताता है ?

उत्तर- लेखक कहते हैं कि स्वाधीनता शब्द का अर्थ है अपने ही अधीन रहना। क्योंकि यहाँ के लोगों ने अपनी आजादी के जितने भी नामकरण किये उनमें हैं. स्वतंत्रता, स्वराज, स्वाधीनता। उनमें स्व का बंधन अवश्य है।


5. नख बढ़ाना और उन्हें काटना कैसे मनुष्य की सहजात वृत्तियाँ हैं ? इनका क्या अभिप्राय है?

उत्तर- मानव शरीर में बहुत-सी अभ्यास-जन्य सहज वृत्तियाँ अंतर्निहित हैं। दीर्घकालीन आवश्यकता बनकर मानव शरीर में विद्यमान रही सहज वृत्तियाँ ऐसे गुण हैं जो अनायास ही अनजाने में अपने आप काम करती हैं। नाखून का बढ़ना उनमें से एक है । वास्तव में सहजात वृत्तियाँ अनजान स्मृतियों को कहा जाता है। नख बढ़ाने की सहजात वृत्ति मनुष्य में निहित पशुत्व का प्रमाण है। उन्हें काटने की जो प्रवृति है वह मनुष्यता की निशानी है। मनुष्य के भीतर पशुत्व है लेकिन वह उसे बढ़ाना नहीं चाहता है। मानव पशुता को छोड़ चुका है क्योंकि पशु बनकर वह आगे नहीं बढ़ सकता। इसलिए पशुता की पहचान नाखून को मनुष्य काट देता है।


6.निबंध में लेखक ने किस बूढ़े का जिक्र किया है ? लेखक की दृष्टि में बूढ़े के कथनों की सार्थकता क्या है ?

उत्तर- लेखक ने महात्मा गाँधी को बूढ़े के प्रतीक रूप में जिक्र किया है। लेखक की दृष्टि से महात्मा गाँधी के कथनों की सार्थकता उभरकर इस प्रकार आती है-आज मनुष्य में जो पाशविक प्रवृत्ति है उसमें सत्यता, सौंदर्यबोध एवं विश्वसनीयता का लेशमात्र भी स्थान नहीं है । महात्मा गाँधी ने समस्त जनसमुदाय को हिंसा, क्रोध, मोह और लोभ से दूर रहने की सलाह दी। उच्छृखलता से दूर रहकर गंभीरता को धारण करने की सलाह दी लेकिन इनके सारे उपदेश बुद्धिजीवी वर्ग के लिए उपेक्षित रहा।


7. लेखक की दृष्टि में हमारी संस्कृति की बड़ी भारी विशेषता क्या है ? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- लेखक की दृष्टि में हमारी संस्कृति की बड़ी भारी विशेषता है अपने आप पर अपने आपके द्वारा लगाया हुआ बंधन । भारतीय चित्त जो आज का अनधीनता के रूप में न सोचकर स्वाधीनता के रूप में सोचता है। यह भारतीय संस्कृति की विशेषता का ही फल है। यह विशेषता हमारे दीर्घकालीन संस्कारों से आयी है, इसलिए स्व के बंधन को आसानी से नहीं छोड़ा जा सकता है ।


8. बढ़ते नाखूनों द्वारा प्रकृति मनुष्य को क्या याद दिलाती है ?

उत्तर- प्राचीन काल में मनुष्य जंगली था । वह वनमानुष की तरह था । उस समय वह अपने नाखून की सहायता से जीवन की रक्षा करता था। आज नखधर मनुष्य अत्याधुनिक हथियार पर भरोसा करके आगे की ओर चल पड़ा है। पर उसके नाखून अब भी बढ़ रहे हैं । बढ़ते नाखूनों द्वारा प्रकृति मनुष्य को याद दिलाती है कि तुम भीतर वाले अस्त्र से अब भी वंचित नहीं हो। तुम्हारे नाखून को भुलाया नहीं जा सकता । तुम वही प्राचीनतम नख एवं दंत पर आश्रित रहने वाला जीव हो । पशु की समानता तुममें अब भी विद्यमान है।


9. लेखक ने किस प्रसंग में कहा है कि बंदरिया मनुष्य का आदर्श नहीं बन सकती ? लेखक का अभिप्राय स्पष्ट करें।

उत्तर- लेखक ने रूढ़िवादी विचारधारा और प्राचीन संवेदनाओं से हटकर जीवनयापन करने के प्रसंग में कहा है कि बंदरिया मनुष्य का आदर्श नहीं बन सकती। लेखक के कहने का अभिप्राय है कि मरे बच्चे को गोद में दबाये रहनेवाली बंदरियाँ मनुष्य का. आदर्श कभी नहीं बन सकती। यानी केवल प्राचीन विचारधारा या रूढ़िवादी विचारधारा विकासवाद के लिए उपयुक्त नहीं हो सकती। मनुष्य को एक बुद्धिजीवी होने के नाते परिस्थिति के अनुसार साधन का प्रयोग करना चाहिए।


10. मनुष्य की पूँछ की तरह उसके नाखून भी एक दिन झड़ जाएँगे। प्राणिशास्त्रियों के इस अनुमान से लेखक के मन में कैसी आशा जगती है?

उत्तर-प्राणीशास्त्रियों का ऐसा अनुमान है कि एक दिन मनुष्य की पूँछ की तरह उसके नाखून भी झड़ जायेंगे । इस तथ्य के आधार पर ही लेखक के मन में यह आशा जगती है कि भविष्य में मनुष्य के नाखूनों का बढ़ना बंद हो जायेगा और मनुष्य का अनावश्यक अंग उसी प्रकार झड़ जायेगा जिस प्रकार उसकी पूँछ झड़. गयी है अर्थात् मनुष्य पशुता को पूर्णतः त्याग कर पूर्णरूपेण मानवता को प्राप्त कर लेगा।


11. “सफलता और चरितार्थता शब्दों में लेखक अर्थ की भिन्नता किस प्रकार प्रतिपादित करता है ?

उत्तर- सफलता और चरितार्थता में इस प्रकार की भिन्नता प्रतिपादित होती है कि मनुष्य मारणास्त्रों के संचयन से तथा बाह्य उपकरणों के बाहुल्य से उस वस्तु को पा भी सकता है जिसे वह बड़े आडम्बर के साथ सफलता नाम दे सकता है। परंतु मनुष्य की चरितार्थता प्रेम में है, मैत्री में है, त्याग में है, अपने को सबके मंगल के लिए नि:शेष भाव से दे देने में है। नाखून का बढ़ना मनुष्य की उस अंध सहजात वृत्ति का परिणाम है जो उसके जीवन में सफलता ले आना चाहती है, उसको काट देना आत्मबंधन का फल है जो उसे चरितार्थता की ओर ले जाती है।


12. लेखक क्यों पूछता है कि मनुष्य किस ओर बढ़ रहा है, पशुता की ओर या मनुष्यता की ओर? स्पष्ट करें।

उत्तर- लेखक के प्रश्न में अंतर्द्वन्द्व की भावना उभर रही है कि मनुष्य इस समय पशुता की ओर या मनुष्यता की ओर बढ़ रहा है। अतः इसी जिज्ञासा को शांत करने के लिए स्पष्ट रूप से इसे प्रश्न के रूप में लोगों के सामने रखता है।
लेखक के अनुसार, इस विचारात्मक प्रश्न पर अध्ययन करने से पता चलता है कि मनुष्य पशुता की ओर बढ़ रहा है। मनुष्य में बंदूक, पिस्तौल, बम से लेकर नये-नये महाविनाश के अस्त्र-शस्त्रों को रखने की प्रवृत्ति जो बढ़ रही है वह स्पष्ट रूप से पशुता की निशानी है। पशु प्रवृत्ति वाले ही इस प्रकार के अस्त्रों के होड़ में आगे बढ़ते हैं।


13. काट दीजिए, वे चुपचाप दंड स्वीकार कर लेंगे; पर निर्लज्ज अपराधी की भाँति फिर छूटते ही सेंध पर हाजिर । व्याख्या करें।

उत्तर- प्रस्तत व्याख्येय पंक्ति हिंदी पाठ्य पुस्तक के नाखून क्यों बढ़ते हैं शीर्षक से उद्धत है। यहाँ हिन्दी गद्य साहित्य के महान लेखक हजारी प्रसाद द्विवेदी ने मानवतावादी दृष्टिकोण प्रकट किया है। निबंधकार प्रस्तुत अंश में नाखून के बढ़ने-बढ़ाने और कटने-काटने को लाक्षणिक शब्द शक्ति में बाँधने का पूरा प्रयत्न किया है। इनका कहना है कि नाखून काट दीजिए तो फिर तीसरे दिन, चौथे दिन बढ़ जाते हैं। ये चुपचाप दंड स्वीकार कर लेते हैं जैसे कोई निर्लज्ज अपराधी हो लेकिन जिस प्रकार दंड से छूटने के बाद वह अपराधी फिर अपराध कर बैठता है उसी प्रकार ये नाखून फिर अपने स्थान पर जम जाते हैं। लेखक यहाँ एक ओर नाखूनों का बढ़ना मनुष्य की आदिम पाश्विक वृत्ति और संघर्ष चेतना का प्रमाण मानता है तो दूसरी ओर उन्हें बार-बार काटते रहना और अलंकृत करते रहना मनुष्य के सौंदर्य बोध और सांस्कृतिक चेतना को भी निरूपित करता है।


14. ‘कमबख्त नाखून बढ़ते हैं तो बढ़े, मनुष्य उन्हें बढ़ने नहीं देगा’ की व्याख्या करें।

उत्तर- प्रस्तुत व्याख्येय पंक्ति हिंदी पाठ्य-पुस्तक के ललित निबंध ‘नाखून क्यों बढ़ते हैं’ पाठ से ली गई है । इस पंक्ति के माध्यम से निबंधकार हजारी प्रसाद द्विवेदी ने नाखून बढ़ाना पाश्विक प्रवृत्ति और काटना मानवीय प्रवृत्ति का अत्यन्त लाक्षणिक और स्वाभाविक रूप में वर्णन किया है। निबंधकार यहाँ मनोवैज्ञानिक रूप का अंश भी प्रस्तुत करते हैं। यह स्पष्ट है कि मनुष्य वर्तमान परिवेश में बौद्धिकता का महानतम स्वरूप है। सभ्यता और संस्कृति के सोपान पर हमेशा अग्रसर है। दिनों-दिन पाशविक प्रवृत्ति को समाप्त करने में अपनी ईमानदारी का परिचय दे रहा है । इस आधार पर लेखक को विश्वास है कि यदि नाखून बढ़ते हैं तो मनुष्य उन्हें निश्चित रूप से बढ़ने नहीं देगा । अर्थात् पाशविक प्रवृत्ति का लक्षण ज्यों ही दिखाई पड़ता है मनुष्य उसे काट देता है। यह आशावादी विचारधारा लेखक को एक सुसंस्कृत और सभ्य समाज स्थापित होने में सहायक होता है।


15. मैं मनुष्य के नाखून की ओर देखता हूँ तो कभी-कभी निराश हो जाता हूँ। व्याख्या करें। .

उत्तर- प्रस्तुत पंक्ति हमारी पाठ्यपुस्तक हिंदी साहित्य के ललित निबंध नाखून क्यों बढ़ते हैं शीर्षक से उद्धृत है । इस अंश में प्रख्यात निबंधकार हजारी प्रसाद द्विवेदी बार-बार काटे जाने पर भी बढ़ जानेवाले नाखूनों के बहाने अत्यन्त सहज शैली में सभ्यता और संस्कृति की विकास गाथा उद्घाटित करते हैं।
          प्रस्तुत व्याख्येय अंश पूर्ण रूप से लाक्षणिक वृत्ति पर आधारित है। लाक्षणिक धारा में ही निबंध का यह अंश प्रवाहित हो रहा है लेखक अपने वैचारिक बिन्दु को सार्वजनिक करते हैं। मनुष्य नाखून को अब नहीं चाहता। उसके भीतर प्राचीन बर्बरता का यह अंश है जिसे भी मनुष्य समाप्त कर देना चाहता है लेकिन अगर नाखून काटना मानवीय प्रवृत्ति और नाखून बढ़ाना पाश्विक प्रवृति है तो मनुष्य पाश्विक प्रवृत्ति को अभी भी अंग लगाये हुए है। लेखक यही सोचकर कभी-कभी निराश हो जाते हैं कि इस विकासवादी सभ्य युग में भी मनुष्य का बर्बरता नहीं घटी है। वह तो बढ़ती ही जा रही है। हिरोशिमा जैसा हत्याकांड. पाश्विक प्रवृत्ति का महानतम उदाहरण है। साथ ही लेखक की उदासीनता इस पर है कि मनुष्य की पशुता को जितनी बार काट दो वह मरना नहीं जानती।

Class 10th Hindi 2022 पाठ -5 नागरी लिपि प्रश्न उत्तर कक्षा-10 हिन्दी गोधूलि भाग 2 Subjective Question Answer

1. लेखक ने किन भारतीय लिपियों से देवनागरी का संबंध बताया है ?

उत्तर :- लेखक ने गुजराती, बांग्ला और ब्राह्मी लिपियों से देवनागरी का संबंध बताया है।

2. देवनागरी लिपि में कौन-कौन सी भाषाएँ लिखी जाती हैं ?

उत्तर :- देवनागरी लिपि में मुख्यतः नेपाली, मराठी, संस्कृत, प्राकृत और हिन्दीभाषाएँ लिखी जाती हैं।

3. नागरी लिपि के आरंभिक लेख कहाँ प्राप्त हुए हैं। उनके विवरण दें।

उत्तर :- विद्वानों के अनुसार नागरी लिपि के आरंभिक लेख विध्य पर्वत के नीचे के दक्कन प्रदेश से प्राप्त हुए हैं।

4. नागरी लिपि कब एक सार्वदेशिक लिपि थी ?

उत्तर :- ईसा की 8वीं-11वीं सदियों में नागरी लिपि पूरे देश में व्याप्त थी। अतः उस समय यह एक सार्वदेशिक लिपि थी।

5. देवनागरी लिपि के अक्षरों में स्थिरता कैसे आयी है?

उत्तर :- करीब दो सदी पहले पहली बार देवनागरी लिपि के टाइप बने और इसमेंपुस्तकें छपने लगी। इस प्रकार ही देवनागरी लिपि के अक्षरों में स्थिरता आयी है।

6. उत्तर भारत में किन शासकों के प्राचीन नागरी लेख प्राप्त होते हैं ?

उत्तर :- विद्वानों का विचार है कि उत्तर भारत में मिहिरभोज, महेन्द्रपाल आदि गुर्जर प्रतिहार राजाओं के अभिलेख में पहले-पहल नागरी लिपि लेख प्राप्त होते हैं।

7. गुर्जर प्रतिहार कौन थे ?

उत्तर :- विद्वानों का विचार है कि गुर्जर-प्रतिहार बाहर से भारत आए थे। ईसा की आठवीं सदी के पूवार्द्ध में अवंती प्रदेश में इन्होंने अपना शासन स्थापित किया और बाद में कन्नौज पर भी अधिकार कर लिया था। मिहिरभोज, महेन्द्रपाल आदि प्रख्यात प्रतिहार शासक हुए।

8. ब्राह्मी और सिद्धम लिपि की तुलना में नागरी लिपि की मुख्यपहचान क्या है?

उत्तर :- गुप्तकाल की ब्राह्मी लिपि तथा उसके बाद की सिद्धम लिपि के अक्षरों के सिरों पर छोटी आड़ी लकीरें या छोटे ठोस तिकोन हैं। लेकिन नागरी लिपि की मुख्य पहचान यह है कि इसके अक्षरों के सिरों पर पूरी लकीरें बन जाती हैं और ये सिरो रेखाएँ उतनी ही लम्बी रहती हैं जितनी की अक्षरों की चौड़ाई होती है।

9. नागरी को देवनागरी क्यों कहते हैं ? लेखक इस संबंध में क्या जानकारी देता है ?

उत्तर :- नागरी नाम की उत्पत्ति तथा इसके अर्थ के बारे में विद्वानों में बड़ामतभेद है । एक मत के अनुसार गुजरात के नागर ब्राह्मणों ने पहले-पहल नागरी लिपि का इस्तेमाल किया। इसलिए इसका नाम नागरी पड़ा। एक दूसरे मत के अनुसार बाकी नगर सिर्फ नगर है, परन्तु काशी देवनगरी है। इसलिए काशी में प्रयुक्त लिपि का नाम देवनागरी पड़ा।

10. नागरी लिपि के साथ-साथ किसका जन्म होता है ? इस संबंध में लेखक क्या जानकारी देता है?

उत्तर :- नागरी लिपि के साथ-साथ अनेक प्रादेशिक भाषाओं ने भी जन्म लियाहै। 8वीं-9वीं सदी से आरंभिक हिन्दी का साहित्य मिलने लग जाता है । इसी काल में आर्य भाषा परिवार की आधुनिक भाषाएँ मराठी, बँगला आदि जन्म ले रही थीं।

11. नंदिनागरी किसे कहते हैं ? किस प्रसंग में लेखक ने उसकाउल्लेख किया है ?

उत्तर :- दक्षिण भारत की यह नागरी लिपि नंदिनागरी कहलाती थी। कोकण के शिलाहार, मान्यखेट के राष्ट्रकूट, देवगिरि के यादव तथा विजयनगर के शासकों के लेख नंदिनागरी लिपि में है। पहले-पहल विजयनगर के राजाओं के लेखों की लिपि को ही नंदिनागरी लिपि नाम दिया गया था। 1

12. ‘नागरी लिपि’ पाठ का सारांश लिखें।

अथवा, देवनागरी लिपि में कौन-कौन सी भाषाएँ लिखी जाती हैं ?

उत्तर :- हिन्दी तथा इसकी विविध बोलियाँ देवनागरी लिपि में लिखी जाती हैं।नेपाली, जेवारी और मराठी की लिपि भी नागरी है। संस्कृत और प्राकृत की पुस्तक भी देवनागरी में ही प्रकाशित होती है। गुजराती हापि भी देवनागरी से बहुत भिन्न नहीं। बंगला लिपि भी प्राचीन नागरी लिपि की वहन ही है। सच तो यह है कि दक्षिण भारत की अनेक लिपियाँ नागरी की भाँति ही प्राचीन ब्राहमो से विकसित हैं। बारहवीं सदी के श्रीलंका के शासकों के सिक्के पर भी नगई अवर मिलते हैं महमूट गजनवी, मुहम्मद गोरी, अलाउदीन खिलजी, शेरशाह ने भी अपने नाम नागरी में खुदवाए हैं और अकबर के सिक्के में भी ‘रामसीय’ शब्द ऑकत है। वस्तुतः ईसा की आठवीं-नौवीं सदी से नागरी लिपि का प्रचलन सारे देश में था। नागरी नाम को लेकर तरह तरह के विचाः हैं। किन्तु इतना निश्चित है कि ‘नागरी’ शब्द किसी बड़े नगर से संबंधित है। कशी को देवनगर कहते थे, हो सकता है, वहाँ प्रयुक्त लिपि का नाम ‘देवनागरी’ पड़ा हो। बैस, गुप्तों की राजधानी पटना भी ‘देवनगर’ थी इसके नाम पर यह नामकरण हो सकता है। जो भी हो, यह नगर-विशेष की लिपि नहीं थी। आठवीं-ग्यारहवीं सदी में यह सार्वदेशिक लिपि थी। नागरी लिपि के साथ अनेक प्रादेशिक भाषाएँ जन्म लेती हैं, यथा, मराठी, बंगला आदि। नागरी लिपि के लेख न कंवल पश्चिम तथा पूर्व बल्कि सूदूर दक्षिण से भी मिले हैं।

13. नागरी की उत्पत्ति के संबंध में लेखक का क्या कहना है ? पटना से नागरी का क्या संबंध लेखक ने बताया है ?

उत्तर :- यह मान्य है कि नागरी लिपि किसी नगर अर्थात् किसी बड़े शहर से संबंधित है । ‘पादताडितकम्’ नामक एक नाटक से जानकारी मिलती है कि पटलीपुत्र अर्थात् पटना को नगर नाम से पुकारते थे। अतः इम यह भी जानते हैं कि स्थापत्य की उत्तर भारत की एक विशेष शैली को नागर शैली कहते हैं । अत: नागर या नागरी शब्द उत्तर भारत के किसी बड़े नगर से संबंध रखता है। विद्वानों के अनुसार उत्तर भारत का यह बड़ा नगर निश्चित रूप से पटना ही होगा। चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य का व्यक्तिगत नाम देव था। इसलिए गुणों की राजधानी पटना को देवनगर भी कहा जाता था । देवनगर की लिपि होने से उत्तर भारत की प्रमुख लिपि को बाद में देवनागरी नाम दिया गया था।

14. निबंध के आधार पर काल-क्रम से नागरी लेखों से संबंधित प्रमाण प्रस्तुत करें ।

उत्तर :- निबंध के आधार पर कालक्रम से नगरी लेखों से संबंधित प्रमाण इसप्रकार मिलते हैं-11वीं सदी में राजेन्द्र जैसे प्रतापी चेर राजाओं के सिक्कों पर नागर अक्षर देखने को मिलते हैं। 12वीं सदी के केरल के शसकों के सिक्कों पर ‘वीर केरलस्य’ जैसे शब्द नागरी लिपि में अंकित हैं। दक्षिण से प्राप्त वरगुण क पलयम ताम्रपत्र भी नागरी लिपि में 9वीं सदी की है। 1000 ई० के आस-पास मालवा नगर में नागर लिपि का इस्तेमाल होता था। विक्रमादित्य के समय पटना में देवनागरी का प्रयोग मिलता है। ईसा की 8वीं से 11वीं सदियों में नागरी लिपि पूरे भारत में व्याप्त थी। 8वीं सदी में दोहाकोश की तिब्बत से जो हस्तलिपि मिली है, वह नागरी लिपि में है। 754 ई० में राष्ट्रकूट राजा दंतिदुर्ग का दानपत्र नागरी लिपि में प्राप्त हुआ है। 850 ई० में जैन गणितज्ञ महावीराचार्य के गणित सार-संग्रह की रचना मलती है जो नागरी लिपि में है।

Class 10th Hindi पाठ -6 बहादुर Question Answer 2022 बहादुर कहानी का प्रश्न उत्तर कक्षा-10 हिन्दी गोधूलि भाग 2


1. अपने शब्दों में पहली बार दिखे बहादुर का वर्णन कीजिए।

उत्तर :- पहला बार दिखे बहादुर की उम्र बारह-तेरह वर्ष की थी। उसका रंग गोरा, मुँह चपटा एवं शरीर ठिगना चकैठ था । वह सफेद नेकर, आधी बाँह की सफेद कमीज और भूरे रंग का पुराना जूता पहने था।

2. कहानीकार ‘अमरकान्त’ को क्यों लगता है कि नौकर रखना बहुत जरूरी हो गया था ?

उत्तर :- लेखक की पत्नी निर्मला सबेरे से शाम तक खटती रही थीं। सभी रिश्तेदारों के यहाँ नौकर देखकर लेखक को उनसे जलन भी हुई थी। नौकर नहीं होने के कारण लेखक और उसकी पत्नी लगभग अपने को अभागे समझने लगे थे। इन परिस्थितियों में नौकर रखना बहुत जरूरी हो गया था।

3. लेखक को क्यों लगता है कि जैसे उस पर एक भारी दायित्व आ गया हो ?

उत्तर :- लेखक के घर में ऐसा वातावरण उपस्थित हो गया था जिससे लगता था कि लेखक को नौकर रखना अब बहुत जरूरी है। लेकिन नौकर कैसा हो और कहाँ मिलेगा यही प्रश्न लेखक को एक भारी दायित्व के रूप में महसूस हो रहा था । इसी कारण लगता है कि उस पर एक भारी दायित्व आ गया है।

4. बहादुर के नाम से ‘दिल’ शब्द क्यों उड़ा दिया गया ? विचार करें।

उत्तर :- प्रथम बार नाम पूछने में बहादुर ने अपना नाम दिलबहादुर बताया । यहाँ दिल शब्द का अभिप्राय भावात्मक परिवेश में है। बहादुर को उदारता से दूर रहकर मन और मस्तिष्क से केवल अपने घर के कार्यों में लीन रहने का उपदेश दिया गया। इस प्रकार से निर्मला द्वारा उसके नाम से दिल शब्द उड़ा दिया गया ।

5. बहादुर अपने घर से क्यों भाग गया था ?

उत्तर :- एक बार बहादुर ने अपनी माँ की प्यारी भैंस को बहुत मारा । माना भैंस की मार का काल्पनिक अनुमान करके एक डंडे से उसकी दुगुनी पिटाई की। लड़के का मन माँ से फट गया और वह चुपके से कुछ रुपया लिया और घर से भाग गया।

6. किन कारणों से बहादुर ने एक दिन लेखक का घर छोड़ दिया ?

उत्तर :- लेखक के घर में प्रारंभ में बहादुर को अच्छा से रखा गया । कुछ समय पश्चात् पत्नी एवं पुत्र दोनों उसकी पिटाई बात-बात पर कर देते थे। एक रिश्तेदार लेखक ने भी बहादुर की पिटाई कर दी। बार-बार प्रताड़ित होने से एवं मार खाने के कारण एक दिन अचानक बहादुर भाग गया।

7. घर आए रिश्तेदारों ने कैसा प्रपंच रचा और उसका क्या परिणाम निकला ?

उत्तर :- लेखक के घर आए रिश्तेदारों ने अपनी झूठी प्रतिष्ठा कायम करने के लिए रुपया-चोरी का प्रपंच रचा । उन्होंने बहादुर पर इस चोरी का दोषारोपण किया । इस आरोप से बहादुर को पिटाई लगी। रिश्तेदार के प्रपंच के चलते लेखक के घर का काम करने वाले बहादुर के जाने की घटना घटी और घर अस्त-व्यस्त हो गया।

8. बहादर के आने से लेखक के घर और परिवार के सदस्यों पर कैसा प्रभाव पड़ा ?

उत्तर :- बहादुर क आन स घर क सदस्या को आराम मिल रहा था। घर खब साफ और चिकना रहता। सभी कपड़े चमाचम सफेद दिखाई देते । निर्मला की तबीयत काफी सुधर गई।

9. बहादूर पर ही चोरी का आरोप क्यों लगाया जाता है और उस ‘पर इस आरोप का क्या असर पड़ता है ?

उत्तर :- रिश्तेदार न सोचा कि नौकर पर आरोप लगाने से लोगों को लगेगा कि ऐसा हो सकता है। बहादुर इस आरोप से बहुत दु:खी होता है। उसके अंतरात्मा पर गहरी चोट लगती है। उस दिन से वह उदास रहने लगता है।

10. निर्मला को बहादुर के चले जाने पर किस बात का अफसोस हुआ ?

उत्तर :- जब रिश्तेदार की सच्चाई का आभास हुआ और यह बात समझ में आ गई कि बहादुर निदोष था तब निर्मला को पश्चात्ताप हआ। वह यह सोचकर अफसोस कर रही थी कि वह बिना बताये क्यों चला गया।

11. बहादुर के चले जाने पर सबको पछतावा क्यों होता है ?

उत्तर :- बहादुर घर के सभी कार्य को कुशलतापूर्वक करता था। घर के सभी सदस्य को आराम मिलता था । किसी भी कार्य हेतु हर सदस्य बहादुर को पुकारते रहते थे। वह घर के कार्य से सभी को मुक्त रखता था। साथ रहते-रहते सबसे हिलमिल गया था। डाँट-फटकार के बावजूद काम करते रहता था। यही सब कारणों से उसके चले जाने पर सबको पछतावा होता है।

12. साले साहब से लेखक को कौन-सा किस्सा असाधारण विस्तार से सुनना पड़ा ?

उत्तर :- लेखक को साले साहब से एक दुखी लड़का का किस्सा असाधारण विस्तार से सुनना पड़ा । किस्सा था कि बहादुर नेपाली था, उसका बाप युद्ध में मारा गया था और उसकी माँ सारे परिवार का भरण-पोषण करती थी।

13. ‘बहादुर’ का चरित-चित्रण करें।

उत्तर :- ‘बहादुर’ कहानी का नायक है। उम्र तेरह-चौदह है। ठिगना कद, गोरा शरीर और चपटे मुँह वाला बहादुर अपनी माँ की उपेक्षा और प्रताड़ना का शिकार है। अपने काम में चुस्त-दुरुस्त और फुर्तीला है। मानवीय भावनाएँ हैं, सबसे बड़ी बात है कि वह स्वाभिमानी और ईमानदार है।

14. काम-धाम के बाद रात को अपने बिस्तर पर गये बहादुर का लेखक किन शब्दों में चित्रण करता है ?

उत्तर :- रात को काम-धाम करने के बाद वह भीतर के बरामदे में एक टटी हुई बँसखट पर अपना बिस्तर बिछाता था। वह बिस्तरे पर बैठ जाता और अपनी जेब से कपड़े की एक गोल-सी नेपाली टोपी निकालकर पहन लेता, जो बाईं ओर काफी झुकी रहती थी। फिर वह छोटा-सा आइना निकालकर बन्दर की तरह उसमें अपना मुँह देखता था। वह बहुत ही प्रसन्न नजर आता था। इसके बाद कुछ और भी चीजें जेब से निकालकर बिस्तर पर खेलता था। गीत गाता था।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

1. “बहादुर’ कहानी का सारांश लिखिए।

उत्तर :- कथाकार अपनी बहन के विवाह में घर गय तो भाभियों के आगे-पीछे नौकरी की भीड़ और पत्नी की खटनी देख ईर्ष्या हुई। प नो निर्मला भी ‘नोकर’ की रट लगाने लगी। अंत में साले साहब एक नेपाली ले आए। नाम दिल बहादुर। बहादुर के आने पर महल्ले वालों पर रौब जमा। ‘बहादुर ने भी इतनी खूबी से काम सभाला कि अब हर काम के लिए सभी उसी पर निर्भर हो गए। बेटे किशोर न न सिर्फ अपने सभी काम बहादुर पर छोड़ दिए अपितु जरा-सी चूक पर मार-पीट करने लगा। पत्नी ने भी पड़ोसियों के उकसावे में आकर उसकी रोटी सेकनी बंद कर दी ओर हाथ भी चलाने लगी। एक दिन मेहमान आए। उनकी पत्नी ने कहा अभी-अभी रूपये रखे थे, मिल नहीं रहे हैं। बहादुर आया था, तत्काल चला गया। बहादुर से पूछ-ताछ शुरू हुई। उसने कहा कि न रूपये देखे, न लिया। कथाकार ने भी पूछा ओर मेहमान ने भी अलग ले जाकर पूछा, पुलिस में देने की धमकी दी लेकिन बहादुर मुकरता रहा। अंत में कथाकार ने झल्लाकर एक तमाचा जड़ दिया। बहादुर रोने लगा। इसके बाद तो जैसे सभी उसके पीछे पड़ गए। – एक दिन कथाकार जब घर आए तो मालूम हुआ कि बहादुर चला गया, ताज्जुब तो तब हुआ जब पाया गया कि बहादुर यहाँ का कुछ भी लेकर नहीं गया बल्कि अपने सामान भी छोड़ गया है। लेखक व्यथित हो गया-चोरी का आरोपी न मालिक का कोई समान ले गया, अपना।इस प्रकार हम पाते हैं कि ‘बहादुर’ कहानी छोटा-मुँह बड़ी बात कहती है क्योंकि ‘नौकर’ जैसे आदमी को नायकात्व प्रदान करती है और कथाकार के अन्तर की व्यथा को अभिव्यक्त करती है।

2. कहानी के शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए । लेखक ने इसका शीर्षक नौकर क्यों नहीं रखा।

उत्तर :- प्रस्तुत कहानी में एक बालक का चित्रण किया गया है। बालक जो लेखक के घर में नौकर का काम करता है कहानी का मुख्य पात्र है। इसमें बहादुर नौकरी करने के पूर्व स्वछंद था। वहाँ माँ से मार खाने के बाद घर से भाग गया था। उसके बाद लेखक के घर काम करने के लिए रखा जाता है। यहाँ उसके नौकर के रूप में चित्रण के साथ-साथ उसके बाल-सुलभ मनोभाव का चित्रण भी किया गया है। ईमानदार, कर्मठ एवं सहनशील बालक के रूप में चित्रित है। प्रताड़ना, झूठा आरोप उसे पसंद नहीं था । अंतत: फिर वह भागकर स्वछंद हो जाता है साथ ही लेखक के पूरे परिवार पर अपने अच्छी छवि का चित्र अंकित कर जाता है। ऐसे में बहादुर ही इसका नायक कहा जा सकता है। इस कहानी के केन्द्र में बहादुर है। अतः यह शीर्षक सार्थक है। इसमें बालक को केवल नौकर की भूमिका में नहीं रखा गया है बल्कि उसमें विद्यमान अन्य गुणों की चर्चा की गई है। इसलिए नौकर शीर्षक नहीं रखा गया।

सप्रसंग व्याख्या

1. ‘यदि मैं न मारता, तो शायद वह न जाता’ की व्याख्या कीजिए।

उत्तर :- प्रस्तुत गद्यांश हिन्दी साहित्य के सशक्त कथाकार अमरकांत के द्वारा रचित ‘बहादुर’ नामक शीर्षक से उद्धृत है। यहाँ बहादुर के भागने पर लेखक के पश्चात्ताप में एक अजीब सी लघुता का अनुभव कराया गया है।
– इस गद्यांश से पता चलता है कि बहादुर को भगाने में लेखक की भूमिका भी कार्य कर रही है। घर के सभी सदस्य बहादुर को तिरस्कृत और प्रताड़ित कर रहे थे। केवल लेखक ही उससे प्यार और ममता का भाव रखते थे। बहादुर लेखक की सहानुभूति के आधार पर ही अभी तक उस घर में उपस्थित था। लेकिन जब एक दिन लेखक ने भी उसकी मारपीट की तो वह अंत:करण से कराह उठा और बर्दाश्त करने की क्षमता नष्ट हो गयी जिससे घर से भाग गया।

2. उसकी हँसी बड़ी कोमल और मीठी थी, जैसे फूल की पंखुड़ियाँ बिखर गई हों। व्याख्या कीजिए।

उत्तर :- प्रस्तुत गद्यांश हिन्दी साहित्य के प्रमुख कथाकार अमरकांत द्वारा लिखित ‘बहादुर’ शीर्षक से अवतरित है। प्रस्तुत अंश में कथा के प्रमुख नायक बहादुर की स्वाभाविक, निश्छल और निष्कपट हँसी का वर्णन किया गया है।
प्रस्तुत व्याख्यांश में लेखक दफ्तर से आने के बाद परिवार के सदस्यों से घर के अनुभव सुनते, बाद में बहादुर की बारी आती। बहादुर कोई बहुत-सी मामूली घटना का रिपोर्ट देता। रिपोर्ट देते समय वह बिल्कुल निडर, नि:संकोच और स्वाभाविक हो जाता। उसे लगता कि मैं साहब को बहुत मजेदार बात सुना रहा हूँ। बात सुनाते समय अंदर ही अंदर इतना आनंदित होता कि वह हँसने लगता । उसकी हँसी इतनी कोमल और मीठी होती थी जैसे फूल की पंखुडियाँ बिखर गई हों।

3. पर अब बहादुर से भूल-गलतियाँ अधिक होने लगी थीं । व्याख्या कीजिए।

उत्तर :- प्रस्तत गद्याश हिन्दा कथा जगत के प्रकांड पंडित भो लिखित ‘बहादुर’ नामक शीर्षक से अवतरित है । इस गद्यांश में बहादा की भल और गलतियों के स्वरूप को एक रेखाचित्र के रूप में दर्शाया गया है।
प्रस्तुत अंश के माध्यम से पता चलता है कि बहादुर एक ईमानदार नेक. कर्मठ. सुशील और भावुक नौकर था। वह दबाव में रहकर काम करने का इच्छुक नहीं था। वह प्यार और मधुरता का कायल था। लेकिन इधर कुछ दिनों से लेखक के परिवार के कुछ सदस्य उसके साथ काफी कठोरता बरतने लगे, जिससे बहादुर के भावुक हृदय पर ठेस लगी। इसी कारण वह अन्यमनस्क रूप से कार्य करने लगा। उसके हृदय में हमेशा डर व्याप्त रहता । इसी कारण अब उससे भूल और गलतियाँ अधिक होने लगी थीं।

4. अगर वह कुछ चुराकर ले गया होता तो संतोष हो जाता। व्याख्या कीजिए।

उत्तर : – प्रस्तुत गद्यांश हिन्दी साहित्य जगत के सुप्रसिद्ध कथाकार अमरकांत के द्वारा लिखित बहादुर नामक शीर्षक से उद्धृत है। इस गद्यांश में लेखक ने निर्मला के माध्यम से भीतर और बाहर के यथार्थ एवं सहजता को चित्रित किया है। बहादुर के भाग जाने पर निर्मला अपनी भूल और पश्चात्ताप की ज्वाला में जल रही है। बहादुर पर रुपया चोरी का झूठा लांछन लगाये गये थे। इसी तथ्य पर स्वाभाविक अफसोस निर्मला के हृदय से उभरकर सामने आता है कि इतना दिन काम किया लेकिन एक पैसा वह वेतन के रूप में नहीं लिया । यहाँ तक कि अपने कुछ सामान भी छोड़कर चला गया। शायद अगर कुछ पैसा लेकर जाता तो इतना अफसोस नहीं होता।

Class 10th Hindi पाठ – 7 परंपरा का मूल्यांकन कक्षा-10 हिन्दी गोधूलि भाग 2class 10th Hindi Parampara Ka Mulyankan Question 2022

1. परंपरा का ज्ञान किनके लिए सबसे ज्यादा आवश्यक है और क्यों ?

उत्तर :- जो लोग साहित्य में युग-परिवर्तन करना चाहते हैं, क्रांतिकारी साहित्य रचना चाहते हैं, उनके लिए साहित्य की परंपरा का ज्ञान आवश्यक है। क्योंकि साहित्य की परंपरा से प्रगतिशील आलोचना का ज्ञान होता है जिससे साहित्य की धारा को मोड़कर नए प्रगतिशील साहित्य का निर्माण किया जा सकता है।

2. जातीय अस्मिता का लेखक किस प्रसंग में उल्लेख करता है और उसका क्या महत्व बताता है ?

उत्तर :- साहित्य के विकास में जातियों की भूमिका विशेष होती है। जन समुदाय जब एक व्यवस्था से दूसरी व्यवस्था में प्रवेश करते हैं, तब उनकी अस्मिता नष्ट नहीं हो जाती । मानव समाज बदलता है और अपनी पुरानी अस्मिता कायम रखता है । जो तत्व मानव समुदाय को एक जाति के रूप में संगठित करते हैं, उनमें इतिहास और सांस्कृतिक परम्परा के आधार पर निर्मित यह अस्मिता का ज्ञान अत्यन्त ‘महत्वपूर्ण है। जातीय अस्मिता साहित्यिक परम्परा के ज्ञान का वाहक है।

3. किस तरह समाजवाद हमारी राष्ट्रीय आवश्यकता है ? इस प्रसंग में लेखक के विचारों पर प्रकाश डालें।

उत्तर :- लेखक के अनुसार पूँजीवादी व्यवस्था में शक्ति का अपव्यय होता है । देश के साधनों का सबसे अच्छा उपयोग समाजवादी व्यवस्था में ही सम्भव है। अनेक छोटे-बड़े राष्ट्र समाजवादी व्यवस्था कायम करने के बाद पहले की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली हो गए । भारत की राष्ट्रीय क्षमता का पूर्ण विकास समाजवादी व्यवस्था में ही संभव है। वास्तव में समाजवाद हमारी राष्ट्रीय आवश्यकता है।

4. परंपरा के मूल्यांकन में साहित्य के वर्गीय आधार का विवेक लेखक क्यों महत्वपूर्ण मानता है ?

उत्तर :- लेखक के अनुसार परंपरा के मूल्यांकन में साहित्य के वर्गीय आधार का ज्ञान महत्वपूर्ण है । इसका मूल्यांकन करते हुए सबसे पहले हम उस साहित्य का मूल्य निर्धारित करते हैं जो शोषक वर्गों के विरुद्ध जनता के हितों को प्रतिबिम्बित करता है। इसके साथ हम उस साहित्य पर ध्यान देते हैं जिसकी रचना का आधार शोषित जनता का श्रम है।

5. साहित्य के निर्माण में प्रतिभा की भूमिका स्वीकार करते हुए लेखक किन खतरों से आगाह करता है ?

उत्तर :- लखक साहित्य के निर्माण में प्रतिभाशाली मनुष्यों की भूमिका निर्णायक मानत हैं। लेकिन उन्होंने इस संबंध में सावधान किया है कि ये मनुष्य जो करते ह वह स्व अच्छा ही होता है, यह आवश्यक नहीं। उनके श्रेष्ठ रचना में दोष नहीं हो सकते ऐसी कोई बात नहीं। उनके कृतित्व को दोषमुक्त मान लेना साहित्य के विकास में खतरनाक सिद्ध हो सकता है। प्रतिभाशाली मनुष्यों की अद्वितीय उपलव्धियों के बाद कुछ नया और उल्लेखनीय करने की गुंजाइश बनी रहती है।

6. साहित्य का कौन-सा पक्ष अपेक्षाकृत स्थायी होता है ? इस संबंध में लेखक की राय स्पष्ट करें।

उत्तर :- साहित्य मनुष्य के सम्पूर्ण जीवन से संबद्ध है। आर्थिक जीवन के अलावा मनुष्य एक प्राणी के रूप में भी अपना जीवन बिताता है । साहित्य में उसकी बहुत-सी आदिम भावनाएँ प्रतिफलित होती हैं जो उसे प्राणी मात्र से जोड़ती हैं । इस बात को बार-बार कहने में कोई हानि नहीं है कि साहित्य विचारधारा मात्र नहीं है । ठसमें मनुष्य का इन्द्रिय बोध, उसकी भावनाएँ भी व्यजित होती हैं। साहित्य का यह पक्ष अपेक्षाकृत स्थायी होता है।

7. बहुजातीय राष्ट्र की हैसियत से कोई भी देश भारत का मुकाबला क्यों नहीं कर सकता ?

उत्तर :- संसार का कोई भी देश, बहुजातीय राष्ट्र की हैसियत से, इतिहास को ध्यान में रखें, तो भारत का मुकाबला नहीं कर सकता । यहाँ राष्ट्रीयता एक जाति द्वारा दूसरी जातियों पर राजनीतिक प्रभुत्व कायम करके स्थापित नहीं हुई। वह. मुख्यत: संस्कृति और इतिहास की देन है । इस देश की तरह अन्यत्र साहित्य परंपरा
का मूल्यांकन महत्वपूर्ण नहीं है। अन्य देश की तुलना में इस राष्ट्र के सामाजिक विकास में कवियों की विशिष्ट भूमिका है।

8. राजनीतिक मूल्यों से साहित्य के मूल्य अधिक स्थायी कैसे होते हैं ?

उत्तर :- लेखक कहते हैं कि साहित्य के मूल्य राजनीतिक मूल्यों की अपेक्षा अधिक स्थायी हैं। इसकी पुष्टि में अंग्रेज कवि टेनिसन द्वारा लैटिन कवि वर्जिल पर रचित उस कविता की चर्चा करते हैं जिसमें कहा गया है कि रोमन साम्राज्य का वैभव समाप्त हो गया पर वर्जिल के काव्य सागर की ध्वनि तरंगें हमें आज भी सुनाई देती हैं और हृदय को आनन्द-विह्वल कर देती है।

9. भारत की बहुजातीयता मुख्यतः संस्कृति और इतिहास की देन है। कैसे ?

उत्तर :- भारतीय सामाजिक विकास में व्यास और वाल्मीकि जैसे कवियों की विशेष भूनिका रही है। महाभारत और रामायण भारतीय साहित्य की एकता स्थापित करती है। इस देश के कवियों ने अनेक जाति की अस्मिता के सहारे यहाँ की संस्कति का निर्माण किया है। भारत में विभिन्न जातियों का मिला-जुला इतिहास रहा है । समरसता स्थापित करना सिखाया है। यही भाव राष्ट्रीयता की जड़ को मजबत किया है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

1. “परम्परा का मूल्यांकन’ पाठ का सारांश लिखिए।
अथवा, साहित्य और समाज में युग-परिवर्तन के लिए साहित्य की परम्परा का ज्ञान और विवेक दृष्टि आवश्यक है। कैसे ? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर :- जो लोग साहित्य में युग-परिवर्तन चाहते हैं, रूढ़ियाँ तोड़कर साहित्य-रचना करना चाहते हैं, उनके लिए साहित्य की परम्परा का ज्ञान जरूरी है। साहितय की परम्परा का मूल्यांकन करते हुए, सबसे पहले उस साहित्य का मूल्य निर्धारित किया जाता है जो जनहित को प्रतिबिम्बित करता है। नकल करके लिखा जानेवाला साहितय अधम कोटि का होता है। महान् रचनाकार किसी का अनुसरण नहीं करते, पूर्ववर्ती कवियों की रचनाओं का मनन कर, स्वयं सीखते और नयी पराम्पराओं को जन्म देते हैं। उनकी आवृत्ति नहीं होती। शेक्सपियर के नाटक दुबारा नहीं लिखे गए।
साहित्य के निर्माण में प्रतिभाशाली मनुष्यों की भूमिका निर्णायक होती है। किन्त सब श्रेष्ठतम हो यह जरूरी नहीं है। पूर्णत: निर्दोष होना भी कला का दोष है। यही कारण है कि अद्वितीय उपलब्धियों के बाद भी कुछ नये संभावना बनी रहती है। यही कारण है कि राजनीतिक मूल्यों की अपेक्षा साहित्यिक मूल्य अधिक स्थायी हैं।
साहित्य के विकास में जन-समुदायों और जातियों की विशेष भूमिका होती है। यूरोप के सांस्कृतिक विकास में यूनानियों की भूमिका कौन नहीं जानता? दरअसल, इतिहास का प्रवाह विच्छिन्न है और अविच्छिन्न भी। मानव ज्ञान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। जिस समय राष्ट्र पर मुसीबत आती है, यह अस्मिता प्रकट हो जाती हैं यह प्रेरक शक्ति का काम करती है। हिटलर के आक्रमण के समय रूस में इसी अस्मिता का ज्ञान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। जिस समय राष्ट्र पर मुसीबत आती है, यह अस्तिमता प्रकट हो जाती है। यह प्रेरक शक्ति का काम करती है। हिटलर के आक्रमण के समय रूस में इसी अस्मिता ने काम किया। इसी प्रकार, भारत में राष्ट्रीयत राजनीति की नहीं, इसके इतिहास और संस्कृति की देन है और इसका श्रेय व्यास और वाल्मीकि को है। कोई भी देश, बहुजातीय राष्ट्र के रूप में भारत का मुकाबला नहीं कर सकता।
साहित्य की परम्परा का पूर्ण ज्ञान समाजवादी व्यवस्था में ही संभव है। समाजवादी संस्कृति पुरानी संस्कृति को आत्मसात कर आगे बढ़ती है। हमारे देश की जनता जब साक्षार हो जाएगी तो व्यास और वाल्मीकि के करोडों पाठक होंगे। सब्रहमण्यम भारती और रवीन्द्रनाथ ठाकुर को सारी जनता पढ़ेगी। तब मानव संस्कृति में भारतीय साहित्य का गौरवशाली नवीन योगदान हो

2. लेखक मानव चेतना को आर्थिक संबंधों से प्रभावित मानते हुए भी उसकी सापेक्ष स्वाधीनता किन दष्टांतों द्वारा प्रमाणित करता है ?

उत्तर :- लेखक के अनसार आर्थिक सम्बन्धों से प्रभावित हाना एक उनके द्वारा चेतना का निर्धारित होना और बात है। अमरीका और एथेन्स दोनों में गुलामी थी किन्तु एथेन्स की सभ्यता से यूरोप प्रभावित हुआ और गुलामों के अमरीका मालिकों ने मानव संस्कृति को कंछ भी नहीं दिया । सामान्तवाद दुनिया भर में कायम रहा पर इस सामन्ती दुनिया में महान कविता के दो ही केन्द्र थे—भारत और ईरान । पूँजीवादी विकास यूरोप के तमाम देशों में हआ पर रैफेल, लेओनार्दो दा विंची और माइकल एजोलो इटली की देन हैं। इन दृष्टांतों के माध्यम से कहा गया है कि सामाजिक परिस्थितियों में कला का विकास सम्भव होता है साथ ही यह भी देखा जाता है कि समान सामाजिक परिस्थितियाँ होने पर भी कला का समान विकास नहीं होता।

3. साहित्य सापेक्ष रूप में स्वाधीन होता है। इस मत को प्रमाणित करने के लिए लेखक ने कौन-से तर्क और प्रमाण उपस्थित किए हैं ?

उत्तर :- साहित्य सापेक्ष रूप में स्वाधीन होता है इसे प्रमाणित करने हेतु लेखक ने कहा है कि गुलामी अमरीका और एथेन्स दोनों में थी किन्तु एथेन्स की सभ्यता ने सारे यूरोप को प्रभावित किया और गुलामों के अमरीकी मालिकों ने मानव संस्कृति को कुछ भी नहीं दिया। पूँजीवादी विकास यूरोप के तमाम देशों में हुआ पर रैफेल, लेओनार्दो दा विंची और माइकेल एंजेलो इटली की देन है। अंततः यहाँ प्रतिभाशाली मनुष्यों की भूमिका देखी जा सकती है। जब हम विचार करें तो पाते हैं कि साहित्य के निर्माण में प्रतिभाशाली मनुष्यों की भूमिका होते हुए भी साहित्य वहीं तक सीमित नहीं है । साहित्य के क्षेत्र में हमेशा कुछ नया करने की गुंजाइश बनी रहती है । अतः साहित्य सापेक्ष रूप में स्वाधीन होता है।

4. “साहित्य में विकास प्रक्रिया उसी तरह सम्पन्न नहीं होती’, जैसे समाज में’ लेखक का आशय स्पष्ट कीजिए।

उत्तर :- लेखक कहते हैं कि साहित्य में विकास प्रक्रिया सामाजिक विकास-क्रम की तरह नहीं होती है। सामाजिक विकास-क्रम में पूँजीवादी सभ्यता और समाजवादी सभ्यता में तुलना की सकती है और एक-दूसरे को श्रेष्ठ एवं अधिक प्रगतिशील कहा जा सकता है। लेकिन, साहित्य के विकास में इस तरह की बात नहीं है। यह आवश्यक नहीं है कि सामन्ती समाज के कवि की अपेक्षा पूँजीवादी समाज का कवि श्रेष्ठ है। कवि अपने-अपने पूर्ववर्ती कवियों की रचनाओं का मनन करते हैं लेकिन अनुकरण नहीं करके स्वयं नई परम्पराओं को जन्म देते हैं। औद्योगिक उत्पादन और कलात्मक सौंदर्य ज्यों-का-त्यों नहीं बना रहता । अमेरिका ने एटम बम बनाया, रूस ने भी बनाया पर शेक्सपीयर के नाटकों जैसे चीज का उत्पादन दुबारा इंग्लैंड में भी नहीं हुआ। अतः साहित्य और समाज के विकास-क्रम में समानता नहीं हो सकती है।

5. जातीय और राष्ट्रीय अस्मिताओं के स्वरूप का अंतर करते हुए लेखक दोनों में क्या समानता बताता है ?

उत्तर :- लेखक ने जातीय अस्मिता एवं राष्ट्रीय अस्मिता के स्वरूप का अन्तर करते हुए दोनों में कुछ समानता की चर्चा की है। जिस समय राष्ट्र के सभी तत्वों पर मसीबत आती है, तब राष्ट्रीय अस्मिता का ज्ञान अच्छा हो जाता है। उस समय साहित्य परम्परा का ज्ञान भी राष्ट्रीय भाव जागृत. करता है। जिस समय हिटलर ने सोवियत संघ पर आक्रमण किया, उस समय यह राष्ट्रीय अस्मिता जनता के स्वाधीनता संग्राम की समर्थ. प्रेरक शक्ति बनी । इस युद्ध के दौरान खासतौर से रूसी जाति ने बार-बार अपनी साहित्य परम्परा का स्मरण किया। समाजवादी व्यवस्था कायम होने पर जातीय अस्मिता खण्डितं नहीं होती वरन् और पुष्ट होती है।

Class 10th Hindi पाठ – 8  जित-जित मैं निरखत हूँ कक्षा-10 हिन्दी गोधूलि भाग 2-Jeet Jeet Main Nirkhat Hun Question Answer Class 10th Hindi Bihar Board

1. बिरजू महाराज कौन-कौन से वाद्य बजाते थे ? 

उत्तर :- बिरजू महाराज सितार, गिटार, हारमोनियम, बाँसुरी इत्यादि वाद्य यंत्र बजाते थे।

2. किनके साथ नाचते हुए बिरजू महाराज को पहली बार प्रथम पुरस्कार मिला ? 

उत्तर :- शम्भू महाराज चाचाजी एवं बाबूजी के साथ नाचते हुए बिरजू महाराज को पहली बार प्रथम पुरस्कार मिला। 

3. लखनऊ और रामपुर से बिरजू महाराज का क्या संबंध है ? 

उत्तर :- बिरजू महाराज का जन्म लखनऊ में हुआ था। रामपुर में महाराज जी का अत्यधिक समय व्यतीत हुआ था एवं वहाँ विकास का सुअवसर मिला था । 

4. नृत्य की शिक्षा के लिए पहले-पहल बिरजू महाराज किस संस्था से जुड़े और वहाँ किनके संपर्क में आए ? 

उत्तर :- नृत्य की शिक्षा के लिए पहले-पहल बिरजू महाराज जी दिल्ली में हिन्दुस्तानी डान्स म्यूजिक स जुई और वहाँ निर्मला जी जोशी के संपर्क में आए । 

5. बिरजू महाराज की कला के बारे में आप क्या जानते हैं ? समझाकर लिखें। 

उत्तर :- बिरजू महाराज नृत्य की कला में माहिर थे । वे नाचने की कला के मर्मज्ञ थे, बचपन से नाचने का अभ्यास करते थे और कला का सम्मान करते थे। इसलिए, उनका नृत्य देशभर में सम्मानित था। वे सिर्फ कमाई के लिए नृत्य नहीं करते थे बल्कि कला-प्रदर्शन उनका सही लक्ष्य था।

6. कलकत्ते के दर्शकों की प्रशंसा का बिरजू महाराज के नर्तक जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा ? 

उत्तर :- कलकत्ते के एक कांफ्रेंस में महाराजजी नाचे । उस नाच की कलकत्ते की ऑडियन्स ने प्रशंसा की। तमाम अखबारों में छा गये। वहाँ से इनके जीवन में एक मोड़ आया। उस समय से निरंतर आगे बढ़ते गये। 

7. बिरजू महाराज अपना सबसे बड़ा जज किसको मानते थे ? 

उत्तर :- बिरजू महाराज अपना सबसे बड़ा जज अपनी अम्मा को मानते थे। जब वे नाचते थे और अम्मा देखती थी तब वे अम्मा से अपनी कमी या अच्छाई के बारे में पूछा करते थे। उसने बाबूजी से तुलना करके इनमें निखार लाने का काम किया । 

8. संगीत भारती में बिरजू महाराज की दिनचर्या क्या थी ?

उत्तर :- संगीत भारती में प्रारंभ में 250 रु० मिलते थे। उस समय दरियागंज में रहते थे । वहाँ से प्रत्येक दिन पाँच या नौ नंबर का बस पकड़कर संगीत भारती पहुँचते थे। संगीत भारती में इन्हें प्रदर्शन का अवसर कम मिलता था। अंततः दुःखी होकर नौकरी छोड़ दी। 

9. अपने विवाह के बारे में बिरजू महाराज क्या बताते हैं ? 

उत्तर :- बिरजू महाराज की शादी 18 साल की उम्र में हुई थी। उस समय विवाह करना महाराज अपनी गलती मानते हैं । लेकिन बाबूजी की मृत्यु के बाद माँ घबराकर जल्दी में शादी कर दी । शादी को नुकसानदेह मानते हैं। विवाह की वजह से नौकरी करते रहे। 

10. बिरजू महाराज के गुरु कौन थे ? उनका संक्षिप्त परिचय दें। 

उत्तर :- बिरजू महाराज के गुरु उनके बाबूजी थे । वे अच्छे स्वभाव के थे । वे अपने दु:ख को व्यक्त नहीं करते थे। उन्हें कला से बेहद प्रेम था । जब बिरजू. महाराज साढ़े नौ साल के थे, उसी समय बाबूजी की मृत्यु हो गई। महाराज को तालीम बाबूजी ने ही दिया । 

11. शम्भू महाराज के साथ बिरजू महाराज के संबंध पर प्रकाश डालिए। 

उत्तर :- शंभू महाराज के साथ बिरजू महाराज बचपन में नाचा करते थे। आगे भारतीय कला केन्द्र में उनका सान्निध्य मिला । शम्भू महाराज के साथ सहायक रहकर कला के क्षेत्र में विकास किया । शम्भू महाराज उनके चांचा थे। बचपन से महाराज को उनका मार्गदर्शन मिला।

12. रामपुर के नवाब की नौकरी छूटने पर हनुमान जी को प्रसाद क्यों चढ़ाया ? 

उत्तर :- रामपुर के नवाब की नौकरी छूटने पर हनुमान जी को प्रसाद चढ़ाया क्योंकि महाराज जी छह साल की उम्र में नवाब साहब के यहाँ नाचते थे। अम्मा परेशान थी। बाबूजी नौकरी छूटने के लिए हनुमान जी का प्रसाद माँगते थे। नौकरी से जान छूटी इसलिए हनुमान जी को प्रसाद चढ़ाया गया। 

13. बिरजू महाराज की अपने शार्गिदों के बारे में क्या राय है ? 

उत्तर :- बिरजू महाराज अपने शिष्या रश्मि वाजपेयी को भी अपना शार्गिद बताते हैं। वे उन्हें शाश्वती कहते हैं। इसके साथ ही वैरोनिक, फिलिप, मेक्लीन, टॉक, तीरथ प्रताप प्रदीप, दुर्गा इत्यादि को प्रमुख शार्गिद बताये हैं। वे लोग तरक्की कर रहे हैं, प्रगतिशील बने हुए हैं, इसकी भी चर्चा किये हैं।

14. बिरजू महाराज के जीवन में सबसे दुःखद समय कब आया ? उससे संबंधित प्रसंग का वर्णन कीजिए। 

उत्तर :- जब महाराज जी के बाबूजी की मृत्यु हुई तब उनके लिए बहुत दुखदायी समय व्यतीत हुआ । घर में इतना भी पैसा नहीं था कि दसवाँ किया जा सके । इन्होंने दस दिन के अन्दर दो प्रोग्राम किए । उन दो प्रोग्राम से 500रु० इकट्ठे हुए तब दसवाँ और तेरह की गई। ऐसी हालत में नाचना एवं पैसा इकट्ठा करना महाराजजी के जीवन में दुःखद समय आया। 

15. पुराने और आज के नर्तकों के बीच बिरजू महाराज क्या फर्क पाते हैं ? 

उत्तर- :- पुराने नर्तक कला प्रदर्शन करते थे। कला प्रदर्शन शौक था । साधन के अभाव में भी उत्साह होता था। कम जगह में गलीचे पर गड्ढा, खाँचा इत्यादि होने के बावजूद बेपरवाह होकर कला प्रदर्शन करते थे। लेकिन आज के कलाकार मंच की छोटी-छोटी गलतियों को ढूँढ़ते हैं। चर्चा का विषय बनाते हैं । 

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

1. ‘जित-जित मैं निरखत हूँ’ का सारांश लिखें। 

उत्तर :- बिरजू महाराज कथक नृत्य के महान कलाकार हैं। उनका जन्म लखनऊ के जफरीन अस्पताल में 4 फरवरी, 1938 को हुआ। वे घर में आखिरी संतान थे। तीन बहनों के बाद उनका जन्म हुआ था। बिरजू महाराज के पिताजी भी नृत्यकला विशारद थे। वे रामगढ़, पटियाला और रामपुर के राजदरबारों से जुड़े रहे। छह साल की उम्र में ही बिरजू महाराज रामपुर के नवाब साहब के यहाँ जाकर नाचने लगे। बाद में वे दिल्ली में हिंदुस्तानी डान्स म्यूजिक में चले गए और वहाँ दो-तीन साल काम करते रहे। उसके बाद वे अपनी अम्मा के साथ लखनऊ चले गए।बिरजू महाराज के पिताजी अपने जमाने के प्रसिद्ध नर्तक थे। जहाँ-जहाँ उनका प्राग्राम होता था, वहाँ-वहाँ वे बिरजू महाराज को अपने साथ ले जाते थे। इस तरह बिरजू महाराज अपने पिताजी के साथ जौनपुर, मैनपुरी, कानपुर, देहरादून, कलकत्ता (कोलकाता), बंबई (मुंबई) आदि स्थलों की बराबर यात्रा किया करते थे। आठ साल की उम्र में ही बिरजू महाराज नृत्यकला में पारंगत हो गए। बिरजू महाराज को नृत्य की शिक्षा उनके पिताजी से ही मिली थी। 
बिरजू महाराज जब साढ़े नौ साल के थे तब उनके पिताजी की मृत्यु हो गई। उनके साथ बिरजू महाराज का आखिरी प्रोग्राम मैनपुरी में था। पिताजी की मृत्यु के पश्चात उस छोटी-सी अवस्था में बिरजू महाराज नेपाल चले गए। फिर, वहा स मुजफ्फरपुर और बाँसबरेली भी गए। बिरजू महाराज कानपुर में दो-ढाई साल रह। उन्होंने आर्यनगर में 25-25 रुपए की दो टयूशन की। टयूशन से प्राप्त पैसों से इन्होंन अपने पढ़ाई जारी रखी। पारिवारिक चिंताओं के कारण वे हाईस्कूल की परीक्षा पास नहीं कर सके। 
चौदह साल की उम्र में वे लखनऊ गए। वहाँ उनकी भेंट कपिलाजी से हुई। उनकी कृपा से बिरजू महाराज ‘संगीत-भारती’ से जुड़े। बिरजू महाराज वहां चार साल रहे। स्वच्छंदता नहीं होने के कारण बिरजू महाराज ने वहाँ की नौकरी छोड़ दो। लखनऊ आकर वे भारतीय कला केंद्र से संबद्ध हो गए। वहाँ उन्होंने रश्मि नाम का एक लड़की को नृत्यकला में पारंगत किया। इससे प्रभावित होकर दूसरी सयानी लड़किया उनकी ओर आकृष्ट हुईं जिनको उन्होंने मनोयोगपूर्वक नृत्यकला की शिक्षा दी। 
कलकत्ते में (कोलकाता में) इनके नत्य का आयोजन हुआ। वहा का दर्शक मंडली ने इनकी खूब प्रशंसा की। उसके बाद उनका प्रोग्राम मुंबई में हुआ आर इस तरह वे भारत के विभिन्न प्रसिद्ध महानगरों और नगरो म नृत्य दिन-प्रतिदिन उनकी ख्याति बढ़ने लगी। इन्होंने उन आयोजनों से अच्छी कमाई का। वे तीन साल तक ‘संगीत भारती’ में रहे। इन्हीं दिनों उन्होंने नृत्य का खूब रियाज किया। इन्होंने उन दिनों विभिन्न वाद्ययंत्रों का भी अच्छा-खासा अभ्यास किया। मध्य यौवन में ही इन्हें काफी प्रसिद्धि मिल गई। उन्होंने 27 साल की उम्र में ही दुनिया भर में अनेक नृत्य किए और खूब नाम और पैसा अर्जित किया । बिरजू महाराज का पहला विदेशी ट्रिप रूस का था। 
अठारह साल की उम्र में बिरजू महाराज की शादी हो गई। छोटी उम्र में ही वे परिवार की नानाविध चिंताओं से घिर गए। पर, वे अपनी कला के प्रति निष्ठावान बने रहे। बिरजू महाराज के भीतर यह भावना बराबर बनी रही कि जब शागिर्द को सिखा रहे हैं तब पूर्ण रूप से मेहनत करके सिखाना और अच्छा बना देना है। ऐसा बना देना जैसा कि मैं स्वयं हूँ। बिरजू महाराज के प्रसिद्ध शागिर्दो में कुछ नाम इस प्रकार हैं-शाश्वती, वैरोनिक (विदेशी लड़की), फिलिप मेक्लीन टॉक (विदेशी लड़का), तीरथ प्रताप, प्रदीप, दुर्गा आदि। बिरजू महाराज की माँ ही उनकी असली गुरवाइन थीं। 

उपलब्धियाँ :- पंडित बिरजू महाराज कथक नृत्य के महान कलाकार हैं। कलाप्रेमी जनसाधारण तथा नृत्य रसिकों के बीच कथक और बिरजू महाराज एक-दूसरे के पर्याय से बन गए हैं। अपनी अथक साधना, एकांत तपस्या, कल्पनाशील सर्जनात्मकता और अटूट लगन के कारण ही बिरजू महाराज को यह सफलता प्राप्त हो सकी है। कथक नृत्य को बिरजू महाराज ने एक नया व्याकरण दिया है और नई अभिव्यक्ति भंगिमा से सँवारा है। परंपरा की रक्षा करते हुए उन्होंने इस नृत्य के साथ कतिपय नई रुचिकर परंपराएँ जोड़ी हैं। बिरजू महाराज ने कथक को नई दिशा और विस्तृति दी है। उन्होंने इस नृत्य की शास्त्रीयता में विमोहक गतिशीलता और समकालीन बोध का समावेश किया है। बिरजू महाराज की निश्छल एवं सहज प्रकति में प्रतिभा वैभव सबको आश्चर्य विमूढ़ कर देता है। अपने नृत्य ‘के माध्यम से बिरजू महाराज ने भरतीय कला और संस्कृति के सौरभ को दिगंतव्यापी बनाया है। निश्चय रूप से बिरजू महाराज भारतीय कला के जीवंत प्रमाण हैं। अपने नृत्य आयोजनों से उन्होंने देश-विदेश में अपनी प्रतिभा का लोहा तो मनवाया ही है, साथ ही साथ भारतीय कला एवं संस्कृति की भव्यता की प्रस्तुति से उन्होंने सारी दुनिया में भारत का सिर ऊँचा किया है। 

सप्रसंग व्याख्या

1. ‘पाँच सौ रुपये देकर मैंने गण्डा बँधवाया’ की व्याख्या कीजिए। 

उत्तर :- प्रस्तुत पंक्ति हिन्दी पाठ्य-पुस्तक के जित-जित मैं निरखत हूँ शीर्षक से उद्धृत है । यह शीर्षक हिन्दी साहित्य की साक्षात्कार विधा है । इस पंक्ति से बिरजू 
महाराज अपने गुरुस्वरूप पिता की कर्तव्यनिष्ठा एवं उदारशीलता का यथार्थ चित्रण किया है। 
इस प्रक्ति से पता चलता है कि बिरजू महाराज के पिता ही उनके गुरु थे। उनके पिता में गुरुत्व की भावना थी। बिरजू महाराज अपने गुरु के प्रति असीम आस्था और विश्वास व्यक्त करते हुए अपने ही शब्दों में कहते हैं कि यह तालीम मुझे बाबूजी से मिली है। गुरु दीक्षा भी उन्होंने ही मुझे दी है। गण्डा भी उन्होंने ही मुझे बाँधा । गण्डा का अभिप्राय यहाँ शिष्य स्वीकार करने की एक लौकिक परंपरा का स्वरूप है । जब बिरजू महाराज के पिता उन्हें शिष्य स्वीकार कर लिये तो बिरजू महाराज ने गुरु दक्षिणा के रूप में अपनी कमाई का 500 रुपये उन्हें दिये । 

2. ‘मैं तो बेचारा उसका असिस्टेंट हूँ। उस नाचने वाले का’, व्याख्या कीजिए। 

उत्तर :-प्रस्तुत व्याख्येय पंक्ति हिन्दी पाठ्यपुस्तक के ‘जित-जित मैं निरखत हूँ’ शीर्षक से ली गई है। यह शीर्षक हिन्दी साहित्य की साक्षात्कार विधा है। इसमें भारतीय कत्थक के महानतम नायक बिरजू महाराज स्वयं अपने मुखारविन्द से कत्थक के प्रति अपनी समर्पण भावना का वर्णन किया है। 
प्रस्तुत पंक्ति में साक्षात्कार के दरम्यान अपनी कत्थक के प्रति निष्ठा, समर्पण एवं अंतर्बोध की प्रामाणिकता को उजागर किया है। उनकी दृष्टि में लाखों लोग उनके आशिक हैं। लेकिन बिरजू महाराज का स्वीकार करना है कि लाखों लोग मेरे हाड़-मांस के बने शरीर पर फिदा नहीं हैं बल्कि मेरे जो आशिक हैं वे मेरे व्यक्तित्व अर्थात् नाच के प्रति । मैं भी तो नाच के कारण ही लोगों के बीच दर्शन का पात्र हूँ। आशिक किसी व्यक्ति का कोई नहीं होता बल्कि उसके आंतरिक व्यक्तित्व के प्रति होता है। मेरा नाच तो एक व्यक्ति है जिसमें व्यक्तित्व की गरिमा भरी हुई है। उसी नाचरूपी व्यक्ति का मैं भी सहायक हूँ। मैं तो उसे केवल सहयोग करता हूँ। मूल रूप से मेरा आंतरिक व्यक्तित्व ही मझे नचाकर लोगों को आशिक बनाया है। 

3. “मैं कोई चीज चुराता नहीं हूँ कि अपने बेटे के लिए ये रखना है, उसको सिखाना है’ की व्याख्या कीजिए। 

उत्तर :- प्रस्तुत पंक्ति हिन्दी साहित्य पाठ्यपुस्तक के ‘जित-जित मैं निरखत हूँ’ से ली गई है। यह शीर्षक हिन्दी साहित्य की साक्षात्कार विधा है। यहाँ स्वयं साक्षात्कार के दरम्यान अपने शिष्य के प्रति निष्ठा, वात्सल्यता एवं निश्छलता की अंतरंग भावना का प्रमाणिकता के आधार पर वर्णन किये हैं। 
इस व्याख्यांश में बिरजू महाराज अपने गुरु के रूप में पिता की शिष्य के प्रति निश्छलता और वात्सल्यता की भावना का वर्णन करते हुए कहते हैं कि मेरे गुरु में किसी प्रकार की स्वार्थपरता एवं व्यावसायिकता नहीं थी। उनकी भावना शिष्य के प्रति सहानुभूतिपूर्ण थी। उन्होंने बिरजू महाराज को पूर्ण समर्पित भावों से कथक की शिक्षा दी थी। उनमें इस प्रकार की भावना नहीं थी कि संपूर्ण ज्ञान में से कुछ अपने पास रखें और कुछ शिष्य को दें बल्कि उन्हें लगता था कि जो कुछ मेरे पास है वह केवल मेरे बेटे के लिए नहीं बल्कि सभी शिष्य और शिष्याओं को समान रूप से समर्पित करने के लिए है। मतभेद का लेश मात्र भी भावना उनके हृदय के किसी कोने में उपस्थित नहीं थी।

Class 10th Hindi पाठ – 9 आवियों कक्षा-10 हिन्दी गोधूलि भाग 2 Avenue Question Answer Bihar Board Class 10th Hindi

1. आविन्यों क्या है और वह कहाँ अवस्थित है ? हर बरस आविन्यों में कब और कैसा समारोह हुआ करता है ? 
अथवा, आविन्यों में प्रत्येक बर्ष आविन्यों में कब और कैसा समारोह हुआ करता है ? 

उत्तर :- आविन्यों मध्ययुगीन ईसाई मठ है। यह दक्षिणी फ्रांस में अवस्थित है। आविन्यों फ्रांस का एक प्रमुख कलाकेंद्र रहा है। यहाँ गर्मियों में फ्रांस और यूरोप का एक अत्यंत प्रसिद्ध और लोकप्रिय रंग-समारोह प्रतिवर्ष होता है।

2. नदी तट पर लेखक को किसकी याद आती है और क्यों ? 
अथवा, आविन्यो पाठ के लेखक को नदी तट पर किसकी याद आती है और क्यों ? 

उत्तर :- नदी तट पर लेखक को विनोद कुमार शुक्ल की एक कविता याद आती है। क्योंकि लेखक नदी तट पर बैठकर अनुभव करते हैं कि वे स्वयं नदी हो गये हैं। इसी बात की पुष्टि करते हुए शुक्ल जी ने “नदी-चेहरा लोगों” से मिलने जाने की बात कहते हैं। 

3. नदी के तट पर बैठे हुए लेखक को क्या अनुभव होता है ? 

उत्तर :- नदी के तट पर बैठे हुए लेखक को लगता है कि जल स्थिर है और तट ही बह रहा है। उन्हें अनुभव हो रहा है कि वे नदी के साथ बह रहे हैं। नदी के पास रहने से लगता है कि स्वयं नदी हो गये हैं। स्वयं में नदी की झलक देखते हैं।

4. किसके पास तटस्थ रह पाना संभव नहीं हो पाता और क्यों ? 

उत्तर :- नदी के किनारे और कविता के पास तटस्थ रह पाना संभव नहीं हो पाता। क्योंकि दोनों की अभिभूति से बची नहीं जा सकती। नदी और कविता में हम बरबस ही शामिल हो जाते हैं। निरन्तरता नदी और कविता दोनों में हमारी नश्वरता का अनन्त से अभिषेक करती है। 

5. लेखक आविन्यों क्या साथ लेकर गए थे और वहाँ कितने दिनों तक रहे ? लेखक की उपलब्धि क्या रही ? 

उत्तर :- लेखक आविन्यों में उन्नीस दिनों तक रहे। वे वहाँ अपने साथ हिंदी का टाइपराइटर, तीन-चार पुस्तकें और कुछ संगीत के टेप्स ही ले गए थे। वे उस निपट एकांत में अपने में और लेखन में डूबे रहे । लेखक की उपलब्धि यही रही कि उन्होंने उन्नीस दिनों में पैंतीस कविताएँ और सत्ताईस गद्य रचनाएँ लिखीं।

6. मनुष्य जीवन से पत्थर की क्या समानता और विषमता है ? 

उत्तर :- मानवीय जीवन में सुख और दु:ख के समय व्यतीत होते हैं। जीवन परिवर्तनशील पथ पर अग्रसर होता है । मानव उतार-चढ़ाव देखता है । पत्थर भी मानव की तरह परिवर्तनशील समय का सामना करता है। पत्थर भी शीत और ताप दोनों का सान्निध्य पाता है। मानव अपनी प्राचीन गाथा को गाता है। पत्थर भी प्राचीनता को अपने में सहेजे रखता है। मानव अपनी भावनाओं को प्रकट करता है। परन्तु पत्थर मूक रहता है। 

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

1. ‘आविन्यों’ पाठ का सारांश लिखें। 
अथवा, ‘आविन्यों’ में लेखक ने क्या देखा क्या पाया ? वर्णन करें।

उत्तर–आविन्यों फ्रांस में रोन नदी के तट पर बसा एक पुराना शहर है। कभी यह पोप की राजधानी था। आज यह गर्मियों में प्रति वर्ष होने वाले रंग-समारोह का केन्द्र है।  रोन नदी के दूसरी और आविन्यों का एक स्वतंत्र भाग वीलनव्व ल आविन्यों अर्थात् नई बस्ती हैं। पोप की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए फ्रेच शासकों ने यहाँ किला बनवाया था। उसी में अब ईसाई मठ है-ला शत्रूज। क्रांति होने पर आम लोगों ने इस पर कब्जा कर लिया। सदी के आरम्भ में इसका जीर्णोद्वार किया गया और उसमें एक कला-केन्द्र की स्थापना की गई। यहाँ रंगकर्मी, अभिनेता, नाटककार कुछ समय रहकर रचनात्मक कार्य करते हैं। यहाँ अनेक सुविधाएँ हैं- पत्र पत्रिकाओं की दुकान है, एक डिपार्टमेंटल स्टोर, रेस्तराँ आदि। अशोक वाजपेयी को फ्रेंच सरकार ने ला शत्रूज में रहकर कुछ काम करने का न्योता दिया। वे गए और वहाँ उन्नीस दिन रहे और उस निपट एकान्त में पैंतीस कविताएँ और सत्ताइस गद्य रचनाएँ की। दरअसल, आविन्यों फ्रांस का प्रमुख कला-केन्द्र है। सुप्रसिद्ध चित्रकार पिकासो की विख्यात कृति का नाम ही है-‘ला मादामोजेल द आविन्यों।’ यहीं यथार्थवादी आन्द्रे ब्रेताँ, देने शॉ और पाल एलुआर ने संयुक्त रूप से तीस कविताएँ रचीं। इन कविताओं में वहाँ का एकान्त, निबिड़, सुनसान रातें और दिन प्रतिबिंबित हैं। यहाँ के रोन नदी के तट पर बैठना भी नदी के साथ बहना है। नदी किसी की अनदेखी नहीं करती-सबको भिंगोती है। निरन्तरता, नदी ओर कविता दोनों में हमारी नश्वरता का अनन्त से अभिषेक करती है।

2. (i) लेखक आविन्यों किस सिलसिले में गए थे ? वहाँ उन्होंने क्या देखा-सुना ? 

(ii) ला शत्रूज क्या है और वह कहाँ अवस्थित है ? आजकल उसका क्या उपयोग होता है ? 

उत्तर :- (i) लेखक को आविन्यों के कलाकेंद्र में पीटर क्रुक द्वारा की जा रही ‘महाभारत’ की प्रस्तुति में दर्शक की हैसियत से आमंत्रित किया गया था। पत्थरों की एक खदान में, आविन्यों के कुछ किलोमीटर दूर पीटर क्रुक के विवादास्पद ‘महाभारत’ का प्रस्तुतीकरण किया गया था। वह प्रस्तुति सच्चे अर्थों में भव्य और महाकाव्यात्मक थी। लेखक ने देखा कि गर्मियों में आविन्यों के अनेक चर्च और पुरातन ऐतिहासिक महत्त्व के स्थान रंगस्थल में बदल जाते हैं। 

(ii) ला शत्रूज काथूसियन संप्रदाय का एक ईसाई मठ है। यह ‘वीलनव्व ल आविन्यों’ (अर्थात आविन्यों का नया गाँव) में अवस्थित है जो रोन नदी के दूसरी ओर है और लगभग स्वतंत्र है। आजकल इसका उपयोग एक कलाकेंद्र के रूप में होता है। यह केंद्र आजकल रंगमंच और लेखन से जुड़ा हुआ है। यहाँ नाटककार, अभिनेता, गीत-संगीतकार, रंगकर्मी आदि आते हैं और पुराने ईसाई संतों के चैंबर्स में रहकर रचनात्मक लेखन करते हैं। 

3. नदी और कविता में लेखक क्या समानता पाता है ?

उत्तर :- जिस प्रकार नदी सदियों से हमारे साथ रही है उसी प्रकार कविता भी मानव की जीवन-संगिनी रही है। नदी में विभिन्न जगहों से जल आकर मिलते हैं और वह प्रवाहित होकर सागर में समाहित होते रहते हैं। हर दिन सागर में समाहित होने के बावजूद उसमें जल का टोटा नहीं पड़ता । कविता में भी विभिन्न विडम्बनाएँ, शब्द भंगिमा, जीवन छवियाँ और प्रतीतियाँ आकर मिलती और तदाकार होती रहती हैं। जैसे नदी जल-रिक्त नहीं होती, वैसे ही कविता शब्द-रिक्त नहीं होती । इस प्रकार नदी और कविता में लेखक अनेक समानता पाता है।

Class 10th Hindi पाठ – 10  मछली कक्षा-10 हिन्दी गोधूलि भाग 2 Machli Portion Answer Class 10th Bihar Board

1. मछली को छूते हुए संतू क्यों हिचक रहा था ?

उत्तर :- संतू मछलियों को छूते हुए हिचक रहा था, क्योंकि उसे डर था कि मछली काट लेगी।

2. मछलियाँ लिए घर आने के बाद बच्चों ने क्या किया ?

उत्तर—मछलियाँ घर लाने के बाद बच्चों ने नहानघर में भरी हुई बाल्टी को आधी करके उसमें मछलियाँ को रख दिया ।

3. मछलियों को लेकर बच्चों की अभिलाषा क्या थी ?

उत्तर :- मछलियों को लेकर बच्चों के मन में अभिलाषा थी कि एक मछली पिताजी से माँगकर उसे कुएँ में डालकर बहुत बड़ी करेंगे ।

4. झोले में मछलियाँ लेकर बच्चे दौड़ते हुए पतली गली में क्यों घुस गए ?

उत्तर :- झोले में मछलियाँ लेकर बच्चे दौड़ते हुए पतली गली में घुस गए, क्योंकि इस गली में घर नजदीक पड़ता था। दूसरे रास्तों में बहुत भीड़ थी।

5. दीदी कहाँ थी और क्या कर रही थी ?

उत्तर :- दीदी घर के एक कमरे में थी । वह लेटी हुई थी और सिसक-सिसककर रो रही थी। वह बार-बार हिचकी ले रही थी जिससे उसका शरीर सिहर उठता था ।

6. मछली के बारे में दीदी ने क्या जानकारी दी थी? बच्चों ने उसकी परख कैसे की ?

उत्तर :- मछली के बारे में दीदी ने जानकारी दी थी कि मरी हुई मछली की आँख में अपनी परछाईं नहीं दिखती है। बच्चों ने उसकी परख एक मृत मछली की आँख में झाँककर की।

7. संतू क्यों उदास हो गया ?

उत्तर :- संतू यह जानकर उदास हो गया था कि मछली कुछ देर बाद कट जायेगी । वह मछली को जीवित पालना चाहता था । मछली को बिछुड़ते हुए जानकर वह दु:खी हो गया।

8. अरे-अरे कहता हुआ भग्गू किसके पीछे भागा और क्यों ?

उत्तर :- अरे-अरे कहता हुआ भग्गू संतू के पीछे भागा क्योंकि संतू एक मछली को लेकर भाग रहा था। भग्गू को डर था कि संतू मछली को कुआँ में डाल देगा जिसके चलते उसे डाँट पड़ेगी । संतू से मछली लेने के लिए वह उसके पीछे भागा ।

9. घर में मछली कौन खाता था और वह कैसे बनायी जाती थी ?

उत्तर :- घर में मछली केवल पिताजी खाते थे। मछली को उस घर का नौकर काटता था। उसे काटने के लिए अलग पाटा था। पहले मछली को पत्थर पर पटककर मार दिया जाता था, फिर राख से मलने के बाद पाटा पर रखकर चाकू से काटा जाता था। मछली बनाने का कार्य नहानघर में होता था ।

10. मछली और दीदी में क्या समानता दिखलाई पड़ी? स्पष्ट करें।

उत्तर :- आदमी के चंगुल में आकर मछली कटने को विवश थी। पानी के अभाव में अंगोछा में लिपटी मछली लहरा रही थी। दीदी कमरा में करवट लिए. पहनी हुई साड़ी को सर तक ओढ़े, सिसक-सिसक कर रो रही थी। हिचकी लेते ही दीदी का पूरा शरीर सिहर उठता था । दीदी का सिहरना एवं मछली का लहराना दोनों में समानता दिखलाई पड़ी।

11. पिताजी किससे नाराज थे और क्यों ?

उत्तर :- पिताजी नरेन से नाराज थे । क्योंकि, बच्चों मछलियों के चलते स्वयं परेशान रहे साथ ही भग्गू को भी परेशान किया । बच्चे मछली को पालना चाहते थे, कोमल बालमन मछली को कटते देख विह्वल हो उठा और बच्चा एक मछली को लेकर भाग गया। पीछे-पीछे भग्गू को भागना पड़ा । छीना-झपटी की स्थिति आई । पिताजी इन हरकतों के कारण नाराज हुए।

1. कहानी के शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट करें।

उत्तर :- ‘मछली’ शीर्षक कहानी में एक किशोर की स्मृतियाँ, दृष्टिकोण और समस्याए है। मछलियों के माध्यम से, मक रहकर प्राणांत को स्वीकार लेना ही लाचार, शोषित, पीडित जनों की नियति है, बताया गया है । जीवन क्षणभंगुर है । कल्पनाएँ क्षणिक हैं एवं स्वप्न कभी भी बिखर सकते हैं। बाल सुलभ मनोभाव मछलियों के इर्द-गिई घूमते हैं। पूरी कहानी मछली पर ही आधारित है। मछली की दशा का जीवन्त चित्रण है । अंततः दीदी की तुलना भी बालक मछली से करता है। इस कहानी का ‘मछली’ शीर्षक पूर्ण रूपेण सार्थक कहा जा सकता है।

2. मछली कहानी का सारांश प्रस्तुत करें।

अथवा, अपने पाठ्य-पुस्तक की उस कहानी का सारांश लिखें जिसमें शहर के निम्न मध्वर्गीय परिवार का घरेलू वातावरण, जीवन-यथार्थ और लिंग-भेद की समस्या का मार्मिक स्पर्श है।

उतर :- बूंदा-बूंदी शुरू होते ही दोनों भाई दौड़ते हुए गली में घुस गए-इसबलिए कि मछलियाँ पानी बिना झोले में ही मर न जाएँ। भाइयों की इच्छा थी कि एक मछली पिताजी से माँग कर, कुएँ में डाल, बड़ा करेंगे।
संतू ठंड से काँपने लगा था। दोनों ने नहानघर में घुस अपनी-अपनी कमीजें निचोड़ी। संत मछली छूने से डर रहा था। नरेन मछली की आँखों में अपनी छाया देखना चाहता था। दीदी ने कहा था कि मरी मछली की आँख में अपनी परछाई नही दिखती। संत् से न बना तो नरेन ने खुद देखा किन्तु. पता ही नहीं चला कि अपनी परछाई थी या मछली की आँखों का रंग। पता चला कि दीदी सो रही है। माँ उधर मसाला पीस रही थी। भाइयों का मन छोटा हो गया-आज ही बनेंगी। इतने में भग्ग आया और मछलियाँ ले गया। मछली पालने का उत्साह ठंडा पड़ गया। दोनों कमरे में गए-दीदी लेटी हुई थी। गीले कपड़ों में देख नाराज हई। संत को अच्छे-अच्छे कपडे पहनाए, नरेन को भी धुल कपड़ पहनने को कहा। दीदी ने ही संत् के बाल पोंछे-झाड़े। भग्गू मछलियाँ काटने में लगा कि संत एक मछली लेकर भागा। भग्गू दौड़ा। नरेन कमरे में गया-दीदी सिसक-सिसक कर रो रही थी, शरीर सिहर रहा था। उध र भग्गू संतू से मछली छीनने में लगा था ओर इधर घर में पिताजी जोर-जोर से चिल्ला रहे थे। दीदी सिसक रही थी। शायद पिताजी ने दीदी को मारा था।
पिताजी नरेन को घर में आने से रोकने को भग्ग से कह रहे थे। संत सहमा खड़ा था। दीदी के संवरे बाल बिखर गए थे। नरेन नहान-घर में गया। बाल्टी उलट दी। उसे लगा कि पूरे घर में मछली की गंध आ रही है।

3. दीदी की चरित्र चित्रण करें।

उत्तर :- प्रस्तुत कहानी में मध्यम वर्गीय परिवार की यथार्थ झलक है। दीदी घर, क चहार दीवारी के बीच कठपुतली बन कर रहने वाली एक बाला है। लिंग-भेद परिवार में निहित है। पिता की ओर से स्वतंत्रता नहीं है जिसके चलते घर में हा रहकर समय व्यतीत करती है। वह ममता की मर्ति है। अपने भाइयों के प्रति अट श्रद्धा रखती है। उन्हें प्रत्येक जीवों में अपनी परछाईं देखने की शिक्षा देती है । मछली को विवश होकर कट-जाना उसके लिए पीड़ादायक है। वह समाज की रूढ़िवादिता के बीच मूक रहकर लाचारं, बेबस एवं निर्ममतापूर्वक प्रहार को सहन करने वाले की आत्मा की पुकार को अनुभव करके सिसकियाँ एवं आहभर कर रह जाने वाला कन्या है।

4. संतू के विरोध का क्या अभिप्राय है ?

उत्तर :- संतू मानवीय गुणों को उजागर करता है। मानव में सेवा, परमार्थ, ममता जैसे गुण विद्यमान होते हैं। परन्तु आज मानव अपने आदर्श को भूलकर, इन गुणों को त्यागकर, स्वार्थ में अंधा होकर विवश और लाचार की मदद में नहीं बल्कि शोषण में लिप्त है। मूक मछलियों को निर्ममता पूर्वक काटते देख संतू उसकी रक्षा को आतुर हो उठता है और उसे बचाने हेतु झपट कर भग्गू के सामने से मछली को. लेकर भाग जाता है। इस विरोध का मतलब है कि आज नि:स्वार्थ भाव से बेबस, लाचार, शोषित, पीड़ित जनों की रक्षा, उत्थान एवं कल्याण के लिए अग्रसर होना परमावश्यक है। ममत्व में धैर्य टूट जाता है। सभी प्राणी में अपनी परछाईं दिखनी चाहिए।

सप्रसंग व्याख्या प्रश्न

1. ‘अगर बाल्टी भरी होती तो पछली उछल कर नीचे आ जाती’ की सप्रसंग व्याख्या कीजिए।

उत्तर :- प्रस्तुत पंक्ति विनोद कुमार शुक्ल के ‘मछली’ शीर्ष की है । प्रस्तुत पंक्ति में बच्चों का मछली की रक्षा के लिए सजगता परिलक्षित होता है। बच्चे की हार्दिक इच्छा थी कि हम मछली को मरने नहीं देंगे बल्कि जीवित अवस्था में रहने के लिए कआँ में डाल देंगे । इसके लिए पिताजी से एक मछली माँगने का इंतजार कर रहे थे। जबतक पिताजी नहीं आ जाते तब तक कुआँ में डालना नहीं था। इसलिए उसे बाल्टी में रखना अनिवार्य था । उन्हें डर था कि बाल्टी भरी होगी तो मछलियाँ बाहर जमीन पर कूद जायेंगी। इसलिए भरी बाल्टी आधा कर के उसमें मछलियों को रखा गया ।

2. ‘और पास से देख परछाई’ दिखती है की सप्रसंग व्याख्या कीजिए।

उत्तर :- प्रस्तुत पंक्ति विनोद कुमार शुक्ल की रचना ‘मछली’ की है। बच्चे मछलियों को परखना चाहते थे कि इनमें जीवित कौन है और मृत कौन । दीदी ने बताया था कि मरी हुई मछली की आँखों में मनुष्य की परछाईं दिखाई नहीं देती है। जब संतू को मछली की आँखों में देखने के लिए कहा गया तब वह निकट जाने से डर रहा था। वह दूर से देखने का प्रयास कर रहा था। इसलिए दूसरा बच्चा उसे निकट से देखने को प्रेरित करता है ताकि परछाईं दिखाई पड़े और मछली जीवित है ऐसा पता चल जाय । मछली में अपनी छाया देखने का तात्पर्य है अपने समान मछली को भी समझना। उससे आत्मीय स्नेह स्थापित करना ही निकट से देखना कहा गया है।

3. नहानघर की नाली क्षणभर के लिए पूरी भर गई, फिर बिल्कुल खाली हो गई की सप्रसंग व्याख्या कीजिए।

उत्तर :- प्रस्तुत पंक्ति विनोद कुमार शुक्ल की रचना ‘मछली’ से ली गई है। बच्चों के मन में अभिलाषा थी कि मछली को कुआँ में डालकर पालेंगे । उसको लेकर कल्पना किया। उसे बचाने का प्रयास किया। लेकिन सब कुछ-कुछ देर के लिए चला। अंततः मछलियाँ काट दी गयीं। उनकी इच्छाएँ अधूरी रह गयीं । बच्चा नहानघर में जाकर मछली को याद करता है। पानी को बाल्टी से नाली में गिराता है जो क्षण भर के लिए नाली को भर देता है लेकिन फिर नाली खाली हो जाती है। इसी प्रकार उसकी मनोकामनाओं का पुँज मन को सुखद अवस्था में पहुँचाता है लेकिन कुछ देर पश्चात् परिस्थितियाँ विपरीत हो जाती है और स्वप्न बिखर जाते हैं। पश्चात्ताप के अलावा कुछ भी शेष नहीं रह जाता है।

Class 10th Hindi पाठ – 11 नौबत खाने में इबादत कक्षा-10 हिन्दी गोधूलि भाग 2 Naubatkhane Mein Ibadat Class 10th Hindi Question Answer

1. डुमराँव की महत्ता किस कारण से है ?

उत्तर :- डुमराँव की महत्ता शहनाई के कारण है। प्रसिद्ध शहनाईवादक बिस्मिल्ला खाँ का जन्म डमराँव में हआ था । शहनाई बजाने के लिए जिस ‘रीड’ का प्रयोग होता है, जो एक विशेष प्रकार की घास ‘नरकट’ से बनाई जाती है, वह डुमराव में सोन नदी के किनारे पाई जाती है।

2. बिस्मिल्ला खाँ सजदे में किस चीज के लिए गिड़गिड़ाते थे ? इससे उनके व्यक्तित्व का कौन- सा पक्ष उद्घाटित होता है ?

उत्तर :- बिस्मिल्लाह खान इबादत में खुदा के सामने झुकते तो सजद में गिड़ागड़ाकर खुदा से सच्चे सुर का वरदान माँगते । इससे पता चलता है कि खाँ साहब धार्मिक, संवेदनशील एवं निरभिमानी थे। संगीत-साधना हेतु समर्पित थे। अत्यन्त विनम्र थे।

3. सुषिर वाद्य किन्हें कहा जाता है ? ‘शहनाई’ शब्द की व्युत्पत्ति किस प्रकार हुई ?

उत्तर :- सुशीर वाद्य ऐसे वाद्य हैं, जिनमें नाड़ी( नरकट या रीड ) होती है । जिन्हे फूँककर बजाया जाता है। अरब देशों में ऐसे वाद्यों को नय कहा जाता है और उनमें शाह को शहनाई की उपाधि दी गई है, क्योंकि यह वाद्य मुरली, शृंगी जैसे अनेक वाद्यों से अधिक मोहक है।

4. “संगीतमय कचौडी” का आप, क्या, अर्थ समझते हैं ?

उत्तर :- कुलसुम हलवाइन की कचौड़ी को संगीतमय कहाँ गया है । वह जैब बहुत गरम घी में कचौड़ी डालती थी, तो उस समय छन्न से आवाज उठती थी जिसमें अमीरुद्दीन को संगीत के आरोह-अवरोह की आवाज सुनाई देती थी। इसीलिए कचौड़ी को ‘संगीतमय कचौड़ी’ कहा गया है।

5. पठित पाठ के आधार पर मुहर्रम पर्व से बिस्मिल्ला खाँ के जुड़ाव का परिचय दे।

उत्तर :- महर्रम से बिस्मिल्ला खाँ का अत्यधिक जडाव था। महर्रम के महीने में वे न तो शहनाई बजाते थे और न ही किसी संगीत-कार्यक्रम में सम्मिलित होते थे । मुहर्रम की आठवीं तारीख को बिस्मिल्ला खाँ खड़े होकर ही शहनाई बजाते थे। वे दालमंडी में फातमान के लगभग आठ किलोमीटर की दूरी तक रोते हुए नौहा बजाते पैदल ही जाते थे।

6. बिस्मिल्ला खाँ जब काशी से बाहर प्रदर्शन करते थे तो क्या करते थे ? इससे हमें क्या सीख मिलती है ?

उत्तर :- बिस्मिल्ला खाँ जब कभी काशी से बाहर होते तब भी काशी विश्वनाथ को नहीं भूलते। काशी से बाहर रहने पर वे उस दिशा में मुँह करके थोड़ी देर तक शहनाई अवश्य बजाते थे। इससे हमें धार्मिक दृष्टि से उदारता एवं समन्वयता की सीख मिलती है । हमें धर्म को लेकर किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं रखना चाहिए ।

7. पठित पाठ के आधार पर बिस्मिल्ला खाँ के बचपन का वर्णन करें।

उत्तर :- अमीरुद्दीन यानी उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ चार साल की उम्र में ही नाना की शहनाई को सुनते और शहनाई को ढूँढते थे। उन्हें अपने मामा का सान्निध्य भी बचपन में शहनाईवादन की कौशल विकास में लाभान्वित किया । 14 साल की उम्र में वे बालाजी के मंदिर में रियाज़ करने के क्रम में संगीत साधनारत हुए और आगे चलकर महान कलाकार हुए।

8. आशय स्पष्ट करें – “काशी को संस्कृति की पाठशाला है “

उत्तर :- काशी को संस्कृति की पाठशाला कहा गया है। यह भारत की ज्ञान नगरी रही है । यहाँ भारतीय शास्त्रों का ज्ञान है। यहाँ कला-शिरोमणि रहते हैं। यहाँ का इतिहास पुराना है। यह प्रकांड विद्वानों, धर्मगुरुओं तथा कला प्रेमियों की नगरी है, अर्थात् काशी संस्कृति विकास का मूल केन्द्र है।

9. आशय स्पष्ट करें–

“फटा सुर न बख्शें । लुंगिया का वया है,
आज फटी है, तो कल सील जाएगी।”

उत्तर :- बिस्मिल्ला खाँ प्राय: खुदा से दुआ माँगा करते थे कि वे उन्हें सच्चा सुर बख्श दे, जो संगीत की कसौटी पर हर दृष्टि से पूर्ण तथा खरा है। एक दिन जब उनकी शिष्या ने उनकी फटी लुंगी को बदलने का आग्रह किया तो उत्तर देते हुए कहा कि लुंगी तो सिली या बदली जा सकती है, पर सुर सुरीला होना चाहिए बेसुरा नहीं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

1. “बिस्मिल्ला खाँ का मतलब बिस्मिल्ला खाँ की शहनाई।’ एक कलाकार के रूप में बिस्मिल्ला खाँ का परिचय पाठ के आधार पर दें।

अथवा, एक कलाकार के रूप में बिस्मिल्ला खाँ का परिचय ‘नौवतखाने में इबादत’ शीर्षक पाठ के आधार पर दें।

उत्तर :- बिस्मिल्ला खाँ एक उत्कृष्ट कलाकार थे। शहनाई के माध्यम से उन्होंने संगीत-साधना को ही अपना जीवन मान लिया था। शहनाईवादक के रूप में वे अद्वितीय पहचान बना लिये थे। बिस्मिल्ला खाँ का मतलब है-बिस्मिल्ला खाँ की शहनाई। शहनाई का तात्पर्य बिस्मिल्ला खाँ का हाथ। हाथ से आशय इतना भर कि बिस्मिल्ला खाँ की फूंक और शहनाई की जादुई आवाज का असर हमारे सिर चढ़कर बोलने लगता है। खाँ साहब की शहनाई से सात सुरताल के साथ निकल पड़ते थे। इनका संसार सुरीला था। इनकी शहनाई में परवरदिगार, गंगा मइया, उस्ताद की नसीहत उतर पड़ती थी। खाँ साहब और शहनाई एक-दूसरे के पर्याय बनकर संसार के सामने उभरे।

Class 10th Hindi पाठ – 12 शिक्षा और संस्कृति कक्षा-10 हिन्दी गोधूलि भाग 2 Class 10th Hindi Shiksha Aur Sanskriti Question Answer

1. गाँधीजी बढ़िया शिक्षा किसे कहते हैं ?

उत्तर :- आहिसक प्रतिरोध का गाधाजी बढ़िया शिक्षा कहते हैं। यह शिक्षा अक्षर-ज्ञान से पूर्व मिलना चाहिए।

2. इंद्रियों का बुद्धिपूर्वक, उपयोग सीखना क्यों जरूरी है ?

उत्तर :- इन्द्रियों का बुद्धिपूर्वक उपयोग उसकी बुद्धि के विकास का जल्द-से-जल्द और उत्तम तरीका है।

3. मस्तिष्क और आत्मा का उच्चतम विकास कैसे संभव है ?

उत्तर :- शिक्षा का प्रारंभ इस तरह किया जाए कि बच्चे उपयोगी दस्तकारी सीखें और जिस क्षण से वह अपनी तालीम शुरु करें उसी क्षण उन्हें उत्पादन का काम करने योग्य बना दिया जाए। इस प्रकार की शिक्षा-पद्धति में मस्तिष्क और आत्मा का उच्चतम विकास संभव है।

4. शिक्षा का ध्येय गाँधीजी क्या मानते थे और क्यों ?

उत्तर :- शिक्षा का ध्येय गाँधीजी चरित्र-निर्माण करना मानते थे। उनके विचार से शिक्षा के माध्यम से मनुष्य में साहस, बल, सदाचार जैसे गुणों का विकास होना -चाहिए, क्योंकि चरित्र-निर्माण होने से सामाजिक उत्थान स्वयं होगा । साहसी और सदाचारी व्यक्ति के हाथों में समाज के संगठन का काम आसानी से सौंपा जा सकता है ।

5. गाँधीजी किस तरह के सामंजस्य को भारत के लिए बेहतर मानते हैं और क्यों ?

उतर :- गाँधीजी भिन्न-भिन्न संस्कृतियों के सामंजस्य को भारत के लिए बेहतर मानते हैं, क्योंकि भिन्न-भिन्न संस्कृतियों के सामंजस्य भारतीय जीवन को प्रभावित किया है और स्वयं भी भारतीय जीवन से प्रभावित हुई है। यह सामंजस्य कुदरती तौर पर स्वदेशी ढंग का होगा, जिसमें प्रत्येक संस्कृति के लिए अपना उचित स्थान सुरक्षित होगा।

6. गाँधीजी देशी भाषाओं में बड़े पैमाने पर अनुवाद-कार्य क्यों आवश्यक मानते थे ?

उतर :- गाँधीजी का मानना था कि देशी भाषाओं में अनुवाद के माध्यम से किसी भी भाषा के विचारों को तथा ज्ञान को आसानी से ग्रहण किया जा सकता है। अंग्रेजी या संसार के अन्य भाषाओं में जो ज्ञान-भंडार पड़ा है, उसे अपनी ही मातृभाषा के द्वारा प्राप्त करना सरल है। सभी भाषाओं से ग्राह्य ज्ञान के लिए अनुवाद की कला परमावश्यक है। अत: इसकी आवश्यकता बड़े पैमाने पर है।

7. दूसरी संस्कृति से पहले अपनी संस्कृति की गहरी समझ क्यों जरूरी है ?

उत्तर :- दूसरी संस्कृतियों की समझ और कद्र स्वयं अपनी संस्कृति की कद्र होने और उसे हजम कर लेने के बाद होनी चाहिए, पहले हरगिज नहीं। कोई संस्कृति इतने रत्न-भण्डार से भरी हुई नहीं है जितनी हमारी अपनी संस्कृति है। सर्वप्रथम हमें अपनी संस्कृति को जानकर उसमें निहित बातों को अपनाना होगा। इससे चरित्र-निर्माण होगा जो संसार के अन्य संस्कृति से कुछ सीखने की क्षमता प्रदान करेगा।

8. अपनी संस्कृति और मातृभाषा की बुनियाद पर दूसरी संस्कृतियों और भाषाओं से संपर्क क्यों बनाया जाना चाहिए ? गाँधीजी की राय स्पष्ट कीजिए।

उत्तर :- गाँधीजी के विचारानुसार अपनी मातृभाषा के माध्यम बनाकर हम अत्यधिक विकास कर सकते हैं। अपनी संस्कृति के माध्यम से जीवन में तेज गति से उत्थान किया जा सकता है । लेकिन हम कूपमंडूक नहीं बनें । दूसरी संस्कृति की अच्छी बातों को अपनाने में परहेज नहीं किया जाय । बल्कि अपनी संस्कृति एवं भाषा को आधार बनाकर अन्य भाषा एवं संस्कृति को भी अपने जीवन से युक्त करें।

9. गाँधीजी कताई और धुनाई जैसे ग्रामोद्योगों द्वारा सामाजिक क्रांति कैसे संभव मानते थे ?

उत्तर :- कताई और धुनाई जैसे ग्रामोद्योगों के संबंध में गाँधीजी की कल्पना थी कि यह एक ऐसी शांत सामाजिक क्रांति की अग्रदूत बने । जिसमें अत्यंत दूरगामी परिणाम भरे हुए हैं। इससे नगर और ग्राम के संबंधों का एक स्वास्थ्यप्रद और नैतिक आधार प्राप्त होगा और समाज की मौजूदा आरक्षित अवस्था और वर्गों के परस्पर विषाक्त संबंधों की कुछ बड़ी-से-बड़ी बुराइयों को दूर करने में बहुत सहायता मिलेगी। इससे ग्रामीण जन-जीवन विकसित होगा और गरीब-अमीर का अप्राकृतिक भेद नहीं रहेगा।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

1. ‘शिक्षा और संस्कृति’ पाठ का सारांश लिखिए।
अथवा, शिक्षा और संस्कृति के संबंध में महात्मा गाँधी के विचारों को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर :- गाँधीजी के विचार से अहिंसक प्रतिरोध सबसे उदात्त ओर बढिया शिक्षा है। वर्णमाला सीखने के पहले बच्चे को आत्मा,, सत्य, प्रेम और आत्मा की छिपी शक्तियों का पता होना चाहिए। यह बताया जाना चाहिए कि सत्य से असत्य को और कष्ट-सहन से हिंसा को कैसे जीता जा सकता है। बुद्धि की सच्ची शिक्षा शरीर की स्थूल इन्द्रियों अर्थात् हाथ, पैर आदि के ठीक-टोक प्रयोग से ही हो सकती है। इससे बुद्धि का विकास जल्दी-जल्दी होगा।
प्रारम्भिक शिक्षा में सफाई और तन्दुरूस्त रहने के ढंग बताए जाने चाहिए। प्राथमिक शिक्षा में कताई-धुनाई को शामिल करना चाहिए। ताकि नगर और गाँव एक दूसरे से जुड़े। इससे गाँवों का हवास रूकेगा।
शिक्षा का ध्येय चरित्र-निर्माण होना चाहिए। दरअसल, लोगों में साहस, बल, सदाचार ओर बड़े उद्येश्य के लिए आत्मोत्सर्ग की शक्ति विकसित की जानी चाहिए।संसार की सर्वश्रेष्ठ कृतियों का अनुवाद देश की भाषाओं में होना चाहिए ताकि अपनी भाषा में टॉल्सटाय, शेक्सपियर, मिल्टन, रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कतियों का आनन्द उठा सकें।
हमें अपनी संस्कृति के बारे में पहले जानना चाहिए। हमें दूसरी संस्कतियों के बारे में भी जानना चाहिए, उन्हें तुच्छ समझना गलती होगी। वह संस्कृति जिन्दा नहीं रह सकती जो दूसरों का वहिष्कार करने की कोशिश करती है।
भारतीय संस्कृति उन भिन्न-भिन्न संस्कृतियों के सामंजस्य का प्रतीक है जिनके पाँव भारत में जम गए हैं, जिनका भारतीय जीवन पर प्रभाव पड़ा है और वे स्वयं भारतीय जीवन से प्रभावित हुई हैं।

1.(क) राम नाम बिनु बिरथ जाग जनमा


Q 1. गुरु की कृपा से किस युक्ति की पहचान हो पाती है ?

उत्तर :- कवि कहते हैं कि ब्रह्म से साक्षात्कार करने हेतु लोभ, मोह, ईर्ष्या, द्वेष, निंदा आदि से दूर होना आवश्यक है। ब्रह्म की सान्निध्य के लिए सांसारिक विषयों – से रहित होना अत्यन्त जरूरी है । ब्रह्म-प्राप्ति की इसी युक्ति की पहचान गुरुकृपा से हो पाती है।


Q 2. नाम-कीर्तन के आगे कवि किन कर्मों की व्यर्थता सिद्ध करता है ?

उत्तर :- पुस्तक-पाठ, व्याकरण के ज्ञान का बखान, दंड-कमण्डल धारण करना, शिखा बढ़ाना, तीर्थ-भ्रमण, जटा बढ़ाना, तन में भस्म लगाना, वसनहीन होकर नग्न-रूप में घूमना इत्यादि के अनुसार नाम-कीर्तन के आगे व्यर्थ हैं।


Q 3. कवि की दृष्टि में ब्रह्म का निवास कहाँ है ? अथवा, गुरुनानक की दृष्टि में ब्रह्म का निवास कहाँ है ?

उत्तर :- जो प्राणी सांसारिक विषयों की आसक्ति से रहित है, जो मान-अपमान से परे है, हर्ष-शोक दोनों से जो दूर है, उन प्राणियों में ही ब्रह्म का निवास बताया गया है। काम, क्रोध, लोभ, मोह जिसे नहीं छूते वैसे प्राणियों में निश्चित ही ब्रह्म का निवास है।


Q 4. हरि रस से कवि का अभिप्राय क्या है ?

उत्तर :- कवि राम नाम की महिमा का बखान करते हुए कहते हैं कि भगवान के नाम से बढ़कर अन्य कोई धर्मसाधना नहीं है। भगवत् कीर्तन से प्राप्त परमानंद को हरि रस कहा गया है।


Q 5. प्रथम पद के आधार पर बताएँ कि कवि ने अपने युग में धर्म साधना के कैसे-कैसे रूप देखे थे ?

उत्तर :- प्रथम पद में कवि के अनुसार शिखा बढ़ाना, ग्रंथों का पाठ करना, व्याकरण वाचना भस्म रमाकर साधुवेश धारण करना, तीर्थ करना, दंड कमण्डलधारी होना, वस्त्र त्याग करके नग्नरूप में घूमना कवि के युग में धर्म-साधना के रूप रहे हैं।


Q 6. आधुनिक जीवन में उपासना के प्रचलित रूपों को देखते हुए नानक के इन पदों की क्या प्रासंगिकता है ? अपने शब्दों में विचार करें।

उत्तर :- नानक के पद में वर्णित राम-नाम की महिमा आधुनिक जीवन में प्रासंगिक है। हरि-कीर्तन सरल मार्ग है जिसमें न अत्यधिक धन की आवश्यकता है, न ही कोई बाह्याडम्बर की। आज भगवत् नामरूपी रस का पान किया जाये तो जीवन में उल्लास, शांति, परमानन्द, सुख तथा ईश्वरीय अनुभूति को सरलता से प्राप्त किया जा सकता है।


Q 7. ‘राम नाम बिनु बिस्थे जगि जनमा’ और ‘जो नर दुख में दुख नहि मानै।” कविता का सारांश लिखें।

उत्तर :- पाठयपुस्तक में गुरुनानक के दो पद संगृहित हैं : ‘राम नाम बिन बिरथे जगि जनमा’ और ‘जो नर दुख में दुख नहिं माने।” प्रथम पद में गुरु नानक ने बाहरी वेश-भूषा , पूजा-पाठ और कर्मकांड के स्थान पर निश्छल-निर्मल हृदय से राम नाम के कीर्तन। पर जोर दिया है। गुरु नानक ऐसा मानते हैं कि राम नाम कीर्तन से ही व्यक्ति को स्थायी शांति मिल सकती है और उसके सारे सांसारिक दु:ख-दर्द मिट सकते हैं। दूसरे पद में गुरु नानक ने कहा है कि सुख-दु:ख, हर्ष-विषाद आदि में एक सम्मान उदासीन रहते हुए हमें अपने मानसिक दुर्गुणों से ऊपर उठकर अंत:करण को विश् शुद्ध और निर्मल रखना चाहिए, क्योंकि इसी स्थिति में गोविंद से एकाकार होने की संभावना रहती है। गुरु नानक कहते हैं कि राम नाम के बिना इस संसार में जन्म होना व्यर्थ है। राम नाम के बिना हम विष खाते हैं और विष ही बोलते हैं। अर्थात, राम नाम के बिना हमारा खाना जहर के समान होता है और हमारी वाणी जरह के समान होती है। पुर तक पढ़ने, शास्त्रों पर चर्चा करने और संध्याकालीन उपासना करने से हमें मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती। राम के बिना हम विभिन्न जंजालों में उलझकर मर जाते हैं। जीवन में स्थायी शांति धार्मिक बाह्याडंबरों और तीर्थाटन करने से नहीं प्राप्त होती, राम नाम के जपने से ही प्राप्त होती है। भवसागर पार करने का सबसे सुगम मार्ग है राम नाम का जप करना। गुरु नानक कहते हैं कि जो नर दु:ख में दु:ख नहीं मानता, सुख-दु:ख में जो उदासीन रहता है प्रीति और भय जिसके लिए एक समान है, सोना और मिट्टी में जो द नहीं करता; हर्ष और शोक जिसके लिए पृथक्-पृथक् नहीं हैं, वह नर गुरु की कृपा प्राप्त करता है और उसे ही प्रभु के सान्निध्य का सुख मिलता है।


Q 8. “जो नर दुःख में दुःख नहीं मानै’ कविता का भावार्थ लिखें।

उत्तर :- प्रस्तुत कविता में कवि ईश्वर की निर्गुणवादी सत्ता को स्वीकार करते हुए कहते हैं कि जो मनुष्य दु:ख को दुःख नहीं समझता है अर्थात् दुःखमय जीवन में भी समानरूप में रहता है उसी का जीवन सार्थक होता है। जिसके जीवन में सुख, धार भय नहीं आता है अर्थात् इस परिस्थिति में भी तटस्थ रहकर मानसिक दुर्गुणों को दूर करता है, लोभ से रहित सोने को भी माटी के समान समझता है वही प्रभु की कृपा प्राप्त कर सकता है । जो मनुष्य न किसी की निंदा करता है, न किसी की स्तुति करता है, लोभ, मोह अभिमान से दूर रहता है, न सुख में प्रसन्नता जाहिर करता है और न संकट में शोक उपस्थित करता है तथा मान-अपमान से रहित होता है वही ईश्वर भक्ति के सुख को प्राप्त कर सकता है।


Q 9. निम्नलिखित पंक्तियों की सप्रसंग व्याख्या करें :

“आसा मनसा सकल त्यागि के जग ते रहै निरासा।
काम क्रोध जेहि परसे नाहिन तेहि घट ब्रह्म निवासा।।”

उत्तर :- प्रस्तुत पद्यांश कवि गुरुनानक देव द्वारा रचित राम नाम बिनु विरुथे जगी जनमा पाठ से उद्धृत है।
उपर्युक्त पंक्तियों में संत कवि नानक कहते हैं कि जिसने आशा-आकांक्षा और सांसारिक मोह-माया का त्याग कर दिया है, जिसके जीवन में काम-क्रोध के लिए कोई स्थान नहीं है, अर्थात् जो विगत काम और क्रोधरहित है, उसकी अंतरात्मा में ब्रह्म का निवास होता है।


Q 10. ‘राम नाम बिनु अरूझि मरै’ की व्याख्या करें ।

उत्तर :- प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक हिंदी साहित्य के महान संत कवि गुरुनानक के द्वारा लिखित “राम नाम बिनु निर्गुण जगि जनमा” शीर्षक से उद्धृत है । गुरुनानक निर्गुण, निराकार ईश्वर के उपासक तथा हिंदी की निर्गुण भक्तिधारा के प्रमुख कवि हैं। यहाँ राम नाम की महत्ता पर प्रकाश डालते हैं। ‘ प्रस्तुत व्याख्येय पंक्ति में निर्गुणवादी विचारधारा के कवि गुरुनानक राम-नाम की गरिमा मानवीय जीवन में कितनी है इसका उजागर सच्चे हृदय से किये हैं। कवि कहते हैं कि राम-नाम का अध्ययन, संध्यावंदन, सीहिन रंगीन वस्त्रधारण, यहाँ तक कि जटाजूट बढ़ाकर इधर-उधर घूमना, ये सभी, भक्ति-भाव के बाह्याडम्बर है। इससे जीवन सार्थक कभी भी नहीं हो सकता है । राम-नाम की सत्ता को स्वीकार नहीं करते हैं तब तक मानवीय मूल चेतना उजागर नहीं हो सकता है । राम-नाम के बिना बहुत-से सांसारिक कार्यों में उलझकर व्यक्ति जीवनलीला समाप्त कर लेता है।


Q 11. ‘हरष शोक तें रहै नियारो, नाहि मान अपमाना’ की व्याख्या करें।

उत्तर :- प्रस्तुत पंक्ति हमारी पाठ्य-पुस्तक हिंदी साहित्य के संत कवि गुरुनानक द्वारा रचित “जो नर दु:ख में दु:ख नहिं मान” शीर्षक से उद्धृत है। प्रस्तुत पंक्ति में संत गुरुनानक उपदेश देते हैं कि ब्रह्म के उपासक प्राणी को हर्ष-शोक, सुख-दुख, निंदा-प्रशंसा, मान-अपमान से परे होना चाहिए । इन सबसे पृथक् रहने वाले प्राणियों में ब्रह्म का निवास होता है।
प्रस्तुत पंक्ति में कवि कहते हैं, ब्रह्म निर्गुण एवं निराकार है। वैराग्य भाव रखकर ही हम उसे पा सकते हैं। झूठी ‘मान, बड़ाई या निंदा-शिकायत की उलझन मनुर्घ्य को ब्रह्म से दूर ले जाता है । ब्रह्म को पाने के लिए, सच्ची मुक्ति के लिए हर्ष-शोक, मान-अपमान से दूर रहकर, उदासीन रहते हुए ब्रम की उपासना करना
चाहिए।


Q 12. ‘नानक लीन भयो गोविंद सो, ज्यों पानी संग पानी की व्याख्या करें।

उत्तर :- प्रस्तुत पंक्ति हमारी पाठ्य-पुस्तक के महान संत कषि गुरुनानक के द्वारा रचित “जो नर दु:ख में दुःख नहिं मान” पाठ से उद्धत हैं। इसमें कवि ब्रह्म की सत्ता की महत्ता को बताते हैं।
प्रस्तुत व्याख्येय पंक्ति के माध्यम से कवि कहना चाहते हैं इस मानवीय जीवन में ब्रह्म को पाने की सच्ची युक्ति, यथार्थ उपाय करना आवश्यक है । परब्रह्म को पाना प्राणी का अंतिम लक्ष्य होना चाहिए। जिस प्रकार पानी के साथ पानी मिलकर एकसमान हो जाता है उसी प्रकार जीव जब ब्रह्म के सान्निध्य में जाता है तब ब्रह्ममय हो जाता है । जीवात्मा एवं परमात्मा में जब मिलन होता है तब जीवात्मा भी परमात्मा बन जाता है। दोनों का भेद मिट जाता है।


Q 13. ‘कंचन माटी जानै’ की व्याख्या करें।

उत्तर :- प्रस्तुत पंक्ति हमारी पाठ्य-पुस्तक हिंदी साहित्य के “जो नर दुःख में दुख नहिं मानै’ शीर्षक से उद्धृत है। प्रस्तुत गद्यांश में निर्गुण निराकार ईश्वर के उपासक गुरुनानक सुख-दुख में एकसमान उदासीन रहते हुए लोभ और मोह से दूर रहने की सलाह देते हैं।
प्रस्तुत व्याख्येय पंक्ति में कवि ब्रह्म को पाने के लिए सुख-दु:खं से परे होना परमावश्यक बताते हैं। वे कहते हैं कि ब्रह्म को वही प्राप्त कर सकता है जा लोक-मोह, ईर्ष्या-द्वेष; काम-क्रोध से परे हो । जो व्यक्ति सोना को अर्थात् धन का मिट्टी के समान समझकर परब्रह्म की सच्चे हृदय से उपासना करता है वह ब्रह्ममय हो जाता है। जो प्राणी सांसारिक विषयों में आसक्ति नहीं रखता है। उस प्राणा , ब्रह्म निवास करता है।

2. प्रेम अयनि श्री राधिका – रसखान


Q 1. रसखान रचित सवैये का भावार्थ अपने शब्दों में लिखें।

उत्तर :- रसखान रचित सवैये में ब्रजभूमि के प्रति उनका हार्दिक प्रेम प्रकट होता है। सवैये में उन्होंने कहा है कि ब्रजभूमि की एक-एक वस्तु, स्थान, सरोवर, कँटीली झाड़ियाँ सुखदायक हैं क्योंकि यहाँ ब्रह्म के अवतार श्रीकृष्ण अवतरित हुए।


Q 2. रसखान ने माली-मलिन किन्हें और क्यों कहा है ?

उत्तर :- कवि ने माली-मालिन कृष्ण और राधा को कहा है। क्योंकि, कवि राधा-कृष्ण के प्रेममय युगल को प्रेम-भरे नेत्र से देखा है । यहाँ प्रेम को वाटिका मानते हैं और उस प्रेम-वाटिका के माली-मालिन कृष्ण-राधा को मानते हैं।


Q 3. रसखान के द्वितीय दोहे का काव्य-सौंदर्य स्पष्ट करें ?

उत्तर :- प्रस्तुत दोहे में सवैया छन्द में भाव के अनुसार भाषा का प्रयोग अत्यन्त मार्मिक है। सम्पूर्ण छन्द में ब्रजभाषा की सरलता, सहजता और मोहकता देखी जा सकती है। कहीं-कहीं तद्भव और तत्सम के सामासिक रूप भी मिल रहे हैं।


Q 4. कृष्ण को चोर क्यों कहा गया है ? कवि का अभिप्राय स्पष्ट करें ?

उत्तर :- कवि कृष्ण और राधा के प्रेम में मनमुग्ध हो गये हैं। उनकी मनमोहक छवि को देखकर मन पूर्णत: उस युगल में रम जाता है। इसलिए इन्हें लगता है कि इस देह से मनरूपी मणि को कृष्ण ने चुरा लिया है।


Q 5. ‘प्रेम-अयनि श्री राधिका, करील के कुंजन ऊपर वारौं’ कविता का सारांश लिखें।

उत्तर :- पाठयपुस्तक में ‘प्रेम-अयनि श्री राधिका’ शीर्षक के अंतर्गत चार दोहे संकलित हैं तथा ‘करील के कुंजन ऊपर वारौं’ शीर्षक कविता के अंतर्गत एक सवैया संकलित है। रसखान कवि कहते हैं कि श्री राधिका प्रेम की खान हैं और श्रीकृष्ण का सारा व्यक्तित्व प्रेम के रंग में सराबोर है। प्रेम रूपी वाटिका (प्रेमोद्यान) के ये दोनों मालिन-माली हैं। प्रेमिका राधा की आँखें जबसे श्रीकृष्ण की आँखों से मिली हैं, तब से वे कृष्ण मिलन के लिए बेचैन रहने लगी हैं। धनुष पर खींचे गए बाण के समान उनकी आँखें बड़ी कोशिश के बाद उनके वश में होती हैं, पर कृष्ण दर्शन की विवशता में उनकी आँखें स्थायी रूप से उनके वश में नहीं रह पातीं; वे धनुष से छूटे तीर की तरह श्रीकृष्ण की आकर्षक छवि की ओर बड़ी तेजी से चल पड़ती हैं। नंद किशोर श्रीकृष्ण ने राधा का मन रूपी माणिक्य चुरा लिया है। मन-माणिक्य के चोरी चले जाने से राधा फेर में पड़ गई हैं। ‘बेमन’ होने के कारण (मन के अभाव में) राधा का जीना मुश्किल हो गया है। जिस दिन से राधा (गोपिका) की आँखें प्रियतम कृष्ण से लगी है, उस दिन से ‘चितचोर’ कृष्ण को वह क्षण-भर के लिए भी अपनी आँखों से दूर करना नहीं चाहती। पाठयपुस्तक में संकलित रसखान के सवैये में कवि की श्रीकृष्ण और ब्रज के. प्रति अनन्य भक्ति अभिव्यक्त हुई है। कवि के लिए श्रीकृष्ण की छोटी लाठी (लकुटी) और कंबली (कमरिया) इतनी महत्त्वपूर्ण है कि तीनों लोकों का राज्य भी उनके सामने तुच्छ है। कवि कहता है कि मुझे यदि तीनों लोकों का राज्य भी प्राप्त हो जाए तो मैं कृष्ण की लाठी और कंबली की महत्ता के समक्ष उसे तुच्छ समझूँगा और उसका त्याग कर दूंगा। मुझे तो नंद की गाएँ चराते समय अपार सुख मिलता है। उसके आगे तो आठों सिद्धियों और नवों निधियों का सुख भी कुछ नहीं है। रसखान कवि के भीतर ब्रज के वन, बाग और तड़ाग को देखने की लालसा तीव्र हो उठी है। वे कहते हैं कि सोने-चाँदी के करोड़ों महल भी ब्रज के करील कुंजों की समता नहीं कर सकते। मुझे यदि कोई सोने-चाँदी के करोड़ों महल दे तब भी मैं उन्हें अस्वीकार कर दूंगा और ब्रज के करील-कुंजों के वैभव से प्राप्त आनंदानुभूति को अपने जीवन की महत्त्वपूर्ण पूँजी मानूँगा।


Q 6. सवैये में कवि की कैसी आकांक्षा प्रकट होती है ? भावार्थ बताते हुए स्पष्ट करें ?

उत्तर :- प्रेम-रसिक कवि रसखान द्वारा रचित सवैये में कवि की आकांक्षा प्रकट हुई है। इसके माध्यम से कवि कहते हैं कि कृष्णलीला की छवि के सामने अन्यान्य दृश्य बेकार हैं। कवि कृष्ण की लकुटी और कामरिया पर तीनों लोकों का राज न्योछावर कर देने की इच्छा प्रकट करते हैं। नन्द की गाय चराने की कृष्णलीला का स्मरण करते हुए कहते हैं कि उनके चराने में आठों सिद्धियों और नवों निधियों का सुख भुला जाना स्वाभाविक है । ब्रज के वनों के ऊपर करोड़ों इन्द्र के धाम को न्योछावर कर देने की आकांक्षा कवि प्रकट करते हैं।


Q 7. “मन पावन चितचोर, पलक ओट नहिं करि सकौं’ की व्याख्या करें।

उत्तर :- प्रस्तुत पंक्ति कृष्णभक्त कवि रसखान द्वारा रचित हिंदी पाठ्य-पुस्तक के ‘प्रेम-अयनि श्रीराधिका’ पाठ से उद्धृत है। इसमें कवि ने कृष्ण की मनोहर छवि के प्रति अपने हृदय की रीझ को व्यक्त किया है।
प्रस्तुत पंक्ति में कवि कहते हैं कि नन्दकिशोर में जिस दिन से चित्त लग गया है उन्हें छोड़कर कहीं नहीं भटकता । कृष्ण को अपना प्रीतम बताते हुए कहते हैं कि मन को पवित्र करने वाले चित्तचोर को आठों पहर देखते रहने की कामना समाप्त नहीं होती । कृष्ण मन को हरने वाले हैं। चित्त को चुराने वाले हैं। उनकी मोहनी मूरत अपलक देखते रहने की आकांक्षा कवि व्यक्त करते हैं।


Q 8. ‘रसखानि कबौं इन आँखिन सौं ब्रज के बनबाग तड़ाग निहारौं’ की व्याख्या करें।

उत्तर :- प्रस्तुत पंक्ति हिन्दी साहित्य की पाठ्य-पुस्तक के रसखान-रचित करोल के कुंजन ऊपर वारों’ पाठ से उद्धत है । प्रस्तुत पंक्ति में कवि ब्रज पर अपना जावन सर्वस्व न्योछावर कर देने की भावमयी विदग्धता मुखरित करते हैं।
प्रस्तुत व्याख्येय पंक्ति के माध्यम से कवि कहते हैं कि ब्रज की बागीचा एवं तालाब अति सुशोभित एवं अनपम हैं। इन आँखों से उसकी शोभा देखते बनती है। कवि कहते हैं कि ब्रज के वनों के ऊपर. अति रमनीय, सुशोभित, मनोहारी मधुवन के ऊपर इन्द्रलोक को भी न्योछावर कर दूँ तो कम है। ब्रज के मनमो इक तालाब एवं बाग की शोभा देखते हुए कवि की आँखें नहीं थकती, इसकी शोभा निरंतर निहारते रहने की भावना को कवि ने इस पंक्ति के द्वारा बड़े ही सहजशैली में
अभिव्यक्त किया है।

3.अति सूथो सनेह को मारग है


Q 1. “मन लेहु पै देहु छटाँक नहीं” से कवि का क्या अभिप्राय है ?

उत्तर :- कवि कहते हैं कि प्रेमी में देने की भावना होती है लेने की नहीं। प्रेम में प्रेमी अपने इष्ट को सर्वस्व न्योछावर करके अपने को धन्य मानते हैं। इसमें संपूर्ण समर्पण की भावना उजागर किया गया है।


Q 2. कवि कहाँ अपने आँसुओं को पहुंचाना चाहता है, और क्यों ?

उत्तर :- कवि अपनी प्रेयषी सजान के लिए विरह-वेदना को प्रकट करते हए बादल से अपने प्रेमाश्रुओं को पहुँचाने के लिए कहता है। वह अपने आँसुओं को सुजान के आँगन में पहुँचाना चाहता है, क्योंकि वह उसकी याद में व्यथित है और अपनी व्यथा के आँसुओं से प्रेयषी को भिंगो देना चाहता है।


Q 3. घनानंद के अनुसार पर-हित के लिए ही देह कौन धारण करता है ? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर :- परहित के लिए ही देह, बादल धारण करता है। बादल जल की वर्षा करके सभी प्राणियों को जीवन देता है, प्राणियों में सुख-चैन स्थापित करता है। उसके विरह के आँसू, अमृत की वर्षा कर जीवनदाता हो जाता है।


Q 4. कवि प्रेममार्ग को ‘अति सूधो’ क्यों कहता है ? इस मार्ग की विशेषता क्या है ?

उत्तर :- कवि प्रेम की भावना को अमृत के समान पवित्र एवं मधुर बताते हैं । ये कहते हैं कि प्रेममार्ग पर चलना सरल है। इसपर चलने के लिए बहुत अधिक छल-कपट की आवश्यकता नहीं है।


Q 5. घनानन्द के द्वितीय छंद किसे संबोधित है, और क्यों ?

उत्तर :- द्वितीय छंद बादल को संबोधित है । इसमें मेघ की अन्योक्ति के माध्यम से विरह-वेदना की अभिव्यक्ति है। मेघ का वर्णन इसलिए किया गया है कि मेघ विरह-वेदना में अश्रुधारा प्रवाहित करने का जीवंत उदाहरण है।


Q 6. ‘अति सूथो सनेह को मारग है, मो अँसवानिहि लै बरसौ कविता का सारांश लिखें।

उत्तर :- पाठयपुस्तक में उन्मुक्त प्रेम के स्वच्छंद मार्ग पर चलने वाले महान प्रेमी धनानंद (धन आनंद) के दो सवैये पाठयपुस्तक में संकलित है। प्रथमा. सवैया में प्रेम के सीधे, सरल और निश्छल मार्ग की बात कही गई है और दूसरे सवैया में मेघ की अन्योक्ति के द्वारा विरह-वेदना से भरे हृदय की तड़प को अत्यंत कलात्मक ढंग से अभिव्यक्त किया गया है।
धनानंद कहते हैं कि कौन कहता है कि प्रेम का मार्ग अत्यंत कठिन होता है। प्रेम का मार्ग तो अत्यंत सीधा, सरल और निश्छल होता है। यहाँ चतुराई के लिए कोई स्थान नहीं होता। हृदय से सीधे लोग ही प्रेम कर सकते हैं, सांसारिक और चतुर लोग नहीं । यहाँ तनिक भी चतुराई का टेढ़ापन नहीं चलता। यहाँ सच्चे हृदय का चलता है। जो अपने अहंकार का त्याग कर देता है, वही प्रेम कर सकता है। कपटी लोग प्रेम नहीं कर सकते। प्रेम शंकामुक्ति की अवस्था है। शंकालु हृदय प्रेम नहीं करा सकता। धन आनंद कहते हैं कि प्रेम में ऐकांतिकता होती है। ‘सुजान’ को उपालंभ देता हुआ कवि कहता है कि आपने कौन-सी विद्या पढ़ी है कि आसानी से चित्त का हरण कर लेते हैं, पर दर्शन देने में कोताही करते हैं। लेने के लिए तो बहुत कुछ (मन, एक माप) ले लेते हैं, पर देने के नाम पर कुछ भी नहीं (छटाँक, एक मान)!
दुसरे सवैया में मेघ की अन्योक्ति के माध्यम से घनानंद ने अपनी विरह-वेदना की अभिव्यक्ति की है। कवि कहता है-हे मेघ, तुमने दूसरों के लिए ही देह धारण की है, अपना यथार्थ स्वरूप दिखलाओ, यानी अपनी वर्षा से मुझे तृप्त करो। अपनी सज्जनता का परिचय देते हुए अपने अमृतरूपी जल से मुझे परितृप्त करो, मुझे रससिक्त करो। हे जल देनेवाले और उसके माध्यम से जीवन प्रदान करनेवाले मेघ, मैं वेदना से तडप रहा हूँ, मेरे हृदय की वेदना को अपने शीतल स्पर्श से दूर करो। कभी तो उस ‘विश्वासी’ (व्यंग्य और उपालंभ से पूर्ण शब्द, सुजान के लिए प्रयुक्त शब्द) के आँगन में मेरे आँसुओं को (मुझसे लेकर) बरसाओ कि उन्हें मेरी याद आए और वे मेरी सुध ले सकें।


Q 7. कवि प्रेममार्ग को ‘अति सूधो’ क्यों कहता है ? इस मार्ग की विशेषता क्या है ?

उत्तर :- कवि प्रेम की भावना को अमृत के समान पवित्र एवं ‘मधुर बताते हैं। ये कहते हैं कि प्रेममार्ग पर चलना सरल है । इसपर चलने के लिए बहुत अधिक , छल-कपट की आवश्यकता नहीं है। प्रेमपथ पर अग्रसर होने के लिए अन्य सोच-विचार नहीं करना ,पड़ता और न ही किसी बुद्धि-बल की आवश्यकता होती है। इसमें भक्ति की भावना प्रधान होती है । प्रेम की भावना से आसानी से को प्राप्त किया जा सकता है । प्रेम में सर्वस्व देने की बात होती है लेने की लेशमात्र भी नहीं होता। यह मार्ग टेढ़ापन से मुक्त है। प्रेम में प्रेमी बेझियम नि:संकोच भाव से, सरलता से, सहजता से प्रेम करने वाले से एकाकार कर
लेता है।


Q 8. ‘यहाँ एक तैं दसरौ औंक नहीं की व्याख्या करें।

उत्तर :- प्रस्तुत पक्ति हिन्दी साहित्य की पाठय-पस्तक के कवि घनानंद द्वारा राचत आत सूधी सनेह को मारग है” पाठ से उद्धत है। इसके माध्यम से कवि प्रमा आर प्रयों का एकाकार करते हुए कहते हैं कि प्रेम में दो का पह अलग-अलग नहीं रहती, बल्कि दोनों मिलकर एक रूप में स्थित हो जाते हैं। प्रेमी निश्छल भाव से सर्वस्व समर्पण की भावना रखता है और तुलनात्मक अपक्षा नही करता है। मात्र देता है, बदले में कुछ लेने की आशा नहीं करता है।
प्रस्तुत पंक्ति में कवि घनानंद अपनी प्रेमिका सुजान को संबोधित करत हक ह सुजान, सुनो ! यहाँ अर्थात् मेरे प्रेम में तुम्हारे सिवा कोई दसरा चिह्न नहीं है। मेरे हृदय में मात्र तुम्हारा ही चित्र अंकित है।


Q 9. ‘कछ मेरियौ पीर हि परसौ’ की व्याख्या करें।

उत्तर :- प्रस्तुत पक्ति हिन्दी साहित्य की पाठय-पस्तक से कवि घनानंद-रचित “मो अँसुवानिहिं लै बरसौ” पाठ से उद्धत है। प्रस्तुत पंक्ति के माध्यम से कवि परोपकारी बादल से निवेदन किये हैं।
प्रस्तुत व्याख्येय पंक्ति में कवि कहते हैं कि हे घन ! तुम जीवनदायक हो, परोपकारी हो, दूसरे के हित के लिए देह धारण करने वाले हो । सागर के जल को अमृत में परिवर्तित करके वर्षा के रूप में कल्याण करते हो। कभी मेरे लिए भी कुछ करो । मेरे लिए इतना जरूर करो कि मेरे हृदय को स्पर्श करो। मेरे दु:ख दर्द को समझो, जानो और मेरे ऊपर दया की दृष्टि रखते हुए अपने परोपकारी स्वभाववश मेरे हृदय की व्यथा को अपने माध्यम से सुजान तक पहुँचा दो। मेरे प्रेमाश्रुओं को लेकर सुजान के आँगन में प्रेम की वर्षा कर दो।


Q 10. सप्रसंग व्याख्या कीजिए:
अति सनेह को ………………. बाँक नहीं,
तहाँ साँचे चलें…………… निसाँक नहीं।

उत्तर :- प्रस्तुत सवैया में रीतिकालीन काव्यधारा के प्रमुख कवि घनानंद-रचित ‘अति सधो को मारग है’, से उद्धृत है इसमें कवि प्रेम की पीड़ा एवं प्रेम की भावना के सरल और स्वाभाविक मार्ग का विवेचन करते हैं। कवि कहते हैं कि प्रेममार्ग अमृत के समान अति पवित्र है। इस प्रेमरूपी मार्ग में चतुराई और टेढ़ापन अर्थात् कपटशीलता का कोई स्थान नहीं है । इस प्रेमरूपी मार्ग में जो प्रेमी होते हैं वे अनायास ही सत्य के रास्ते पर चलते हैं तथा उनके अंदर के अहंकार समाप्त हो जाते हैं। यह प्रेमरूपी मार्ग इतना पवित्र है कि इसपर चलने वाले प्रेमी के हृदय में लेसमात्र भी झिझक, कपट और शंका नहीं रहती है।

4. स्वदेशी -बद्रीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’


Q 1. कवि ने “डफाली’ किसे कहा है और क्यों ?

उत्तर :- जिन लोगों में दास-वृत्ति बढ़ रही है, जो लोग पाश्चात्य सभ्यता संस्कृति की दासता के बंधन में बँधकर विदेशी रीति-रिवाज के बने हुए हैं उनको कवि डफाली की संज्ञा देते हैं. क्योंकि वे विदेश की पाश्चात्य संस्कृतिक की, विदेशी वस्तुओं की, अंग्रेजी की झूठी प्रशंसा में लगे हुए हैं।


Q 2. कवि समाज के किस वर्ग की आलोचना करता है, और क्यों ?

उत्तर :- उत्तर भारत में एक ऐसा समाज स्थापित हो गया है जो अंग्रेजी बोलने में शान की बात समझता है। अंग्रेजी रहन-सहन, विदेशी ठाट-बाट, विदेशी बोलचाल को अपनाना विकास मानते हैं।


Q 3. कवि जनता के स्वप्न का किस तरह चित्र खींचता है ?

उत्तर :- भारत की जनता सदियों से, युगों-युगों से राजा के अधीनस्थ रही है लेकिन कवि ने कहा है कि चिरकाल से अंधकार में रह रही जनता राजतंत्र को उखाड़ फेंकने के स्वप्न देख रही है। राजतंत्र समाप्त होगा और जनतंत्र कायम होगा। राजा नहीं बल्कि प्रजा राज करेगी। किसान, मजदूर राजसिंहासन के अधिकारी होंगे। इस तरह कवि ने जनतंत्र की नींव डालने, जनतंत्र के उदय होने के स्वप्न का यथार्थ चित्र खींचा है।


Q 4.  नेताओं के बारे में कविवर ‘प्रेमघन’ की क्या राय है?

उत्तर :- आज देश के नेता, देश के मार्गदर्शक भी स्वदेशी वेश-भूषा, बोल-चाल से परहेज करने लगे हैं। अपने देश की सभ्यता-संस्कृति को बढ़ावा देने के बजाय । पाश्चात्य सभ्यता से स्वयं प्रभावित दिखते हैं।


Q 5. कवि को भारत में भारतीयता क्यों नहीं दिखाई पड़ती ?

उत्तर :- कवि को भारत में स्पष्ट दिखाई पड़ता है कि यहाँ के लोग विदेशी रंग में रंगे हैं। खान-पान, बोल-चाल, हाट-बाजार अर्थात् सम्पूर्ण मानवीय क्रिया-कलाप में अंग्रेजियत ही अंग्रेजियत है। अत: कवि कहते हैं कि भारत में भारतीयता दिखाई नहीं पड़ती है।


Q 6. स्वदेशी कविता के शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।

उत्तर :- प्रस्तुत पद में स्वदेशी भावना को जागृत करने का पूर्ण प्रयास किया गया है। इसमें मृतप्राय स्वदेशी भाव के प्रति रुझान उत्पन्न करने हेतु प्रेरित किया गया । है। अतः स्वदेशी शीर्षक पूर्णतः सार्थक है।


Q 7. नेताओं के बारे में कवि की क्या राय है? अथवा, नेताओं के बारे में कविवर “प्रेमघन’ की क्या राय है ?

उत्तर :- आज देश के नेता, देश के मार्गदर्शक भी स्वदेशी वेश-भूषा, बोल-चाल से परहेज करने लगे हैं। अपने देश की सभ्यता-संस्कृति को बढ़ावा देने के बजाय पाश्चात्य सभ्यता से स्वयं प्रभावित दिखते हैं। कवि कहते हैं कि जिनसे धोती नहीं सँभलती अर्थात् अपने देश के वेश-भूषा को धारण करने में संकोच करते हों वे देश की व्यवस्था देखने में कितना सक्षम होंगे यह संदेह का विषय हो जाता है। जिस नेता में स्वदेशी भावना रची-बसी नहीं है, अपने देश की मिट्टी से दूर होते जा रहे. हैं, उनसे देशसेवा की अपेक्षा कैसे की जा सकती है। ऐसे नेताओं से देशहित की अपेक्षा करना खयालीपुलाव है।


Q 8. “स्वदेशी’ कविता का सारांश लिखें।

उत्तर :- पाठयपुस्तक में संकलित ‘प्रेमधन’ के दोहों में नवजागरण और देशप्रेम के स्वर मुखरित हुए हैं। दोहों में पराधीन भारत के लोगों की मनोवृत्तियों का चित्रण हुआ है। ‘प्रेमघन’ को इस बात का बहुत दुख है कि भारत में भारतीयता का सर्वथा लोप हो गया है। भारत के लोग विदेशी रीति और वस्तु के दीवाने हो गए हैं। भारत में कोई भारतीय नहीं रह गया है। सभी परदेश की विद्या को महत्त्व देते हैं उसके चलते उनकी बुद्धि भी विदेशी हो गई है। उन्हें तो विदेशी चाल-चलन ही पसंद आता है। सबको विदेशी पोशाक ही रुचती है। अपनी भाषा छोड़कर सभी अँगरेजी भाषा के की ओर भाग रहे हैं। बोलचाल, रहन-सहन, पहनावा आदि में कहीं भी भारतीयता नजर नहीं आती। हिंदुस्तानी नाम सुनकर सबको मानो लाज लगती है और भारतीय वस्तु से सभी परहेज करते हैं। बाजारों में अँगरेजी माल भरे हुए हैं। अँगरेजी चाल पर घर बने हैं और शहर बसे हैं। राजनेताओं की नीति भी ढुलमुल है। सभी दासवृत्ति से ग्रस्त हैं। सुख-सुविधा की चाह ने सबको दास बना रखा है। सब अँगरेजों की – झूठी प्रशंसा और खुशामद में इसलिए लगे हैं कि उन्हें अंगरेजों की कृपा से कुछ सुख-सुविधाएँ प्राप्त हो जाएँ। सभी भारतीय मानसिक स्तर पर अंगरेजों के दास हो गए हैं। ‘प्रेमघन’ ने इसी पीड़ा की अभिव्यक्ति संकलित दोहों में की है।


Q 9. ‘अंग्रेजी रुचि, गृह, सकल वस्तु देस विपरीत’ की व्याख्या करें।

उत्तर :- प्रस्तुत पंक्ति हिन्दी साहित्य की पाठ्य-पुस्तक के कवि ‘प्रेमघन’ जी द्वारा रचित ‘स्वदेशी’ पाठ से उद्धत है। इसमें कवि ने कहा है कि भारत के लोगों से स्वदेशी भावना लुप्त हो गई है। विदेशी भाषा, रीति-रिवाज से इतना स्नेह हो गया है कि भारतीय लोगों का रुझान स्वदेशी के प्रति बिल्कुल नहीं है। सभी ओर मात्र अंग्रेजी का बोलबाला है।


Q 10. ‘मनुज भारती देखि कोउ, सकत नहीं पहिचान’ की व्याख्या करें।

उत्तर :- प्रस्तुत पंक्ति हिन्दी साहित्य की पाठ्य-पुस्तक के ‘स्वदेशी’ शीर्षक पद .. से उद्धृत है। इसकी रचना देशभक्त कवि बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ द्वारा की … गई है। इसमें कवि ने देशप्रेम के भाव को जगाने का प्रयास किया है।
प्रस्तुत व्याख्येय पंक्ति में कवि ने कहा है कि आज भारतीय लोग अर्थात् भारत में निवास करने वाले मनुष्य इस तरह से अंग्रेजियत को अपना लिये हैं कि वे पहचान में ही नहीं आते कि भारतीय हैं। आज भारतीय वेश-भूषा, भाषा-शैली, खान-पान सब त्याग दिया गया है और विदेशी संस्कृति को सहजता से अपना लिया गया है। मुसलमान, हिन्दू सभी अपनी भारतीय पहचान छोड़कर अंग्रेजी की अहमियत देने लगे हैं।


Q 11. निम्नलिखित पंक्तियों की सप्रसंग व्याख्या करें :
“दास-वृत्ति की चाह चहूँ दिसि चारहु बरन बढ़ाली
करत खुशामद झूठ प्रशंसा मानह बने डफाली।”

उत्तर :- प्रस्तुत पंक्तियाँ कवि ‘प्रेमघन’ की ‘स्वदेशी’ कविता की है । इन दोहों में राष्ट्रीय स्वाधीनता की चेतना को सहचर बनाया गया है। साथ ही, नवजागरण का स्वर मुखरित किया गया है। उपर्युक्त पंक्तियों में कवि कहता है कि देखा जा रहा है कि यहाँ के लोगों में गुलामी के वातावरण में जीवन-यापन करने की आदत हो गई है। चारों ओर इसी का भाव मिल रहा है। खुशामद करना तथा झूठी प्रशंसा करना, झूठे राग की डफली बजाना यहाँ के लोगों की संस्कृति बन गई है।

5. भारतमाता। -सुमित्रानंदन पंत


Q 1. भारतमाता कहाँ निवास करती है ?

उत्तर :- कविता के प्रथम अनुच्छेद में भारतमाता को ग्रामवासिनी मानते हुए तत्कालीन भारत का यथार्थ चित्रण किया गया है कि भारतमाता का फसलरूपी श्यामल शरीर है, धूल-धूसरित मैला-सा आँचल है। गंगा-यमुना के जल अश्रुस्वरूप हैं। ग्राम्य छवि को दर्शाती हुई भारत माँ की प्रतिमा उदासीन है।


Q 2. भारतमाता अपने ही घर में प्रवासिनी क्यों बनी हुई है ?

उत्तर :-भारत को अंग्रेजों ने गुलामी की जंजीर में जकड़ रखा था। परतंत्रता की बेड़ी में जकड़ी, काल के कुचक्र में फंसी विवश, भारतमाता चुपचाप अपने पुत्रों पर किये गये अत्याचार को देख रही थी। इसलिए कवि ने परतंत्रता को दर्शाते हए मुखरित किया है कि भारतमाता अपने ही घर में प्रवासिनी बनी है।


Q 3. भारतमाता शीर्षक कविता में पंत जी ने भारतीयों का कैसा चित्र खींचा है ?

उत्तर :- प्रस्तुत कविता में कवि ने दर्शाया है कि परतंत्र भारत की स्थिति दयनीय हो गई थी। परतंत्र भारतवासियों को नंगे वदन, भूखे रहना पड़ता था। यहाँ की तीस करोड़ जनता शोषित-पीड़ित, मूढ, असभ्य, अशिक्षित, निर्धन एवं वृक्षों के नीचे निवास करने वाली थी।


Q 4. भारतमाता का हास भी राहग्रसित क्यों दिखाई पड़ता है ?

उत्तर :- भारतमाता के स्वरूप में ग्राम्य शोभा की झलक है। मुखमंडल पर चंद्रमा के समान दिव्य प्रकाशस्वरूप हँसी है, मुस्कुराहट है। लेकिन, परतंत्र होने के कारण वह हँसी फीकी पड़ गई है। ऐसा प्रतीत होता है कि चन्द्रमा को राहु ने ग्रस लिया है।


Q 5. कवि की दुष्टि में आज भारतमाता का तप-संयम क्यों सफल है ?

उत्तर :- किन्तु भारतमाता ने गाँधी जैसे पूत को जन्म दिया और अहिंसा का स्तन्यपान अपने पुत्रों को कराई है । अतः विश्व को अंधकारमुक्त करनेवाली, संपूर्ण संसार को अभय का वरदान देनेवाली भारत माता का तप-संयम आज सफल है ।


Q 6. कवि भारतमाता को गीता-प्रकाशिनी मानकर भी ज्ञानमूढ़ क्यों कहता है ?

उत्तर :- परतंत्र भारत की ऐसी दुर्दशा हुई कि यहाँ के लोग खुद दिशाविहीन हो गये, दासता में बँधकर अपने अस्मिता को खो दिये । आत्म-निर्भरता समाप्त हो गई। इसलिए कवि कहता है कि भारतमाता गीता- प्रकाशिनी है, फिर भी आज ज्ञानमूढ़ बनी हुई है।


Q 7. ‘स्वदेशी’ कविता का मूल भाव क्या है? सारांश में लिखिए।

उत्तर :- स्वदेशी कविता का मूल भाव है कि भारत के लोगों से स्वदेशी भावना लुप्त हो गई है। विदेशी भाषा, रीति-रिवाज से इतना स्नेह हो गया है कि भारतीय लोगों का रुझान स्वदेशी के प्रति बिल्कुल नहीं है। सभी ओर मात्र अंग्रेजी का बोलबाला है।


Q 8. पंत रचित ‘भारतमाता’ कविता का सारांश लिखें।

उत्तर :- भारतमाता’ शीर्षक कविता पंत का श्रेष्ठ प्रगीत है। इसमें हर तत्कालीन भारत (परतंत्र भारत) का यथार्थ चित्र प्रस्तुत किया है। यह प्रगीत भावात्मक कम विचारात्मक ज्यादा है।
कवि कहता है कि भारतमाता गाँवों में निवास करती है। ग्रामवासिनी भारतमाता का धूल से भरा हुआ, मैला-सा श्यामल आँचल खेतों में फैला हुआ है। गंगा-यमुना मानो ग्रामवासिनी भारतामाता की दो आँखें हैं जिनमें उसकी परतंत्रता जनित वेदना से निस्सृत (निकला हुआ) आँसू का जल भरा हुआ है। वह मिट्टी की प्रतिमा-सी उदास दिखाई पड़ती है। गरीबी ने उसे चेतनाहीन बना दिया है। वह झुकी हुई चितवन से न जाने किसे एकटक निहार रही है। उसके आधारों पर चिरकाल से नि:शब्द रोदन का दाग है। युग-युग के अंधकार से उसका मन विषादग्रस्त है। वह अपने ही घर में प्रवासिनी बनी हुई है।
पंत ने प्रस्तुत प्रतीत में भारतवासियों का यथार्थ चित्र प्रस्तुत किया है। भारतवासियों के तन पर पर्याप्त वस्त्र नहीं है। वे अधनंगे हैं। उन्हें कभी भरपेट भोजन नहीं मिलता। वे शोषित और निहत्थे हैं। वे मूर्ख, असभ्य, अशिक्षित और निर्धन हैं। वे विवश और असहाय हैं। ग्लानि और क्षोभ से उनके मस्तक झुके हुए हैं। रोना
उनकी नियति बन चुका है। उनमें अपूर्व सहनशीलता है। भारत की सारी समृद्धि विदेशियों के पैरों पर पड़ी हुई है। भारतमाता धरती-सी सहिष्णु है। उसका मन कुंठित है। उसके अधर क्रंदन-कंपित हैं। शरविदुहासिनी भारतमाता का हास राहु ग्रसित हैं। अर्थात, अब उसके जीवन में हास के लिए कोई स्थान नहीं है। उसकी भृकुटि पर चिंता की रेखाएँ साफ देखी जा सकती है। वाष्पाच्छादित आकाश की तरह उसकी आँखें झुकी हुई हैं। उसका आनन कलंक से पूर्ण चंद्रमा से उपमित किया जा सकता है। गीता प्रकाशिनी भारतमाता ज्ञानमूढ़ है। आज उसका तप और संयम सफल हो गया है। उसने अहिंसा रूपी अमृत के समान अपना दूध पिलाकर भारत के लोगों के मन के भीतर के अंधकार और भय को दूर कर दिया है। भारतमाता जगज्जननी और जीवन को नई दिशा देनेवाली है।


Q 9. ‘चिंतित भृकुटि क्षितिज तिमिरांकित, नमित नयन नभ वाध्याच्छादित’ की व्याख्या करें।

उत्तर :- प्रस्तुत पंक्ति हिन्दी साहित्य के ‘भारतमाता’ पाठ से उद्धत है जो सुमित्रानंदन पंत द्वारा रचित है। इसमें कवि ने भारत का मानवीकरण करते हुए पराधीनता से प्रभावित भारतमाता के उदासीन, दु:खी एवं चिंतित रूप को दर्शाया है।
प्रस्तुत व्याख्येय पंक्ति में कवि ने चित्रित किया है कि गलामी में जकडी भारतमाता चिंतित है, उनकी भृकुटि से चिंता प्रकट हो रही है, क्षितिज पर गुलामीरूपी अंधकार की छाया पड़ रही है, माता की आँखें अश्रुपूर्ण हैं, और आँसू वाष्प बनकर आकाश को आच्छादित कर लिया है । इसके माध्यम से परतंत्रता की दु:खद स्थिति का दर्शन कराया गया है ।


Q 10. ‘स्वर्ण शस्य पर-पद-तल लुंठित, धरती-सा सहिष्णु मन कुंठित’ की व्याख्या करें।

उत्तर :- प्रस्तुत पंक्ति हिन्दी साहित्य के सुमित्रानंदन पंत रचित ‘भारतमाता’ पाठ से उद्धत है। इसमें कवि ने परतंत्र भारत का साकार चित्रण किया है।
प्रस्तुत व्याख्येय में कवि ने कहा है कि भारत पर अंग्रेजी हुकूमत कायम हो गयी है। यहाँ के लोग अपने ही घर में अधिकारविहीन हो गये हैं। पराधीनता के चलते यहाँ की प्राकृतिक शोभा भी उदासीन प्रतीत हो रही है । ऐसा प्रतीत होता है कि यहाँ कवि की स्वर्णिम फसल पैरों तले रौंद दी गयी है और भारतमाता का मन सहनशील बनकर कुंठित हो रही है। इसमें कवि ने पराधीन भारत की कल्पना को मूर्तरूप दिया है।

6. जनतंत्र का जन्म -रामधारी सिंह दिनकर


Q 1. दिनकर की दृष्टि में समय के रथ का घर्घर-नाद क्या है ? स्पष्ट करें।

उत्तर :- कवि ने सदियों से राजतंत्र से शासित जनता की जागृति को उजागर करते हुए समय के चक्र की ओर लोगों का ध्यान आकृष्ट किया है। राजसिंहासन पर प्रजा आरूढ़ होने जा रही है। समय की पुकार ही क्रांति की शंखनाद के रूप में रथ का घर्घर-नाद है।


Q 2. कवि की दृष्टि में आज के देवता कौन हैं और वे कहाँ मिलेंगे ?

उत्तर :- कवि ने भारतीय प्रजा, जो खून-पसीना बहाकर देशहित का कार्य करती है, जिसके बल पर देश में सुख-संपदा स्थापित होता है, किसान, मजदूर जो स्वयं आहूत होकर देश को सुखी बनाते हैं, को आज का देवता कहा है।


Q 3. कवि के अनुसार किन लोगों की दृष्टि में जनता फूल या दुध मुँही बच्ची की तरह है और क्यों ? कवि क्या कहकर उनका प्रतिवाद करता है ?

उत्तर :- अंग्रेजी सरकार भी भारत की जनता को अबोध समझकर कुछ प्रलोभन देकर राजसुख में लिप्त है। वह समझती है कि जनता फूल या दुधमुंही बच्ची की तरह है लेकिन इसके प्रतिकार में कवि ने कहा है कि जब भोली लगनेवाली जनता जाग जाती है, जब उसे अपने में निहित शक्ति का आभास हो जाता है तब राजतंत्र हिल उठता है।


Q 4. कवि जनता के स्वप्न का किस तरह चित्र खींचता है ?

उत्तर :- भारत की जनता सदियों से, युगों-युगों से राजा के अधीनस्थ रही है लेकिन कवि ने कहा है कि चिरकाल से अंधकार में रह रही जनता राजतंत्र को उखाड़ फेंकने के स्वप्न देख रही है। राजतंत्र समाप्त होगा और जनतंत्र कायम होगा। राजा नहीं बल्कि प्रजा राज करेगी।


Q 5. कविता का मूल भाव क्या है ? संक्षेप में स्पष्ट कीजिए ? अथवा, ‘जनतंत्र का जन्म’ शीर्षक कविता का भावार्थ लिखें।

उत्तर :- प्रस्तुत कविता आधुनिक भारत में जनतंत्र के उदय का जयघोष है। सदियों की पराधीनता के बाद स्वतंत्रता-प्राप्ति हुई और भारत में जनतंत्र की प्राण-प्रतिष्ठा हुई । जनतंत्र के ऐतिहासिक और राजनीतिक अभिप्रायों को कविता में उजागर करते हुए कवि यहाँ एक नवीन भारत का शिलान्यास करता है जिसमें जनता ही स्वयं सिंहासन पर आरूढ़ होने का है। इसमें कवि ने जनता निहित शक्ति को उजागर करते हुए जनतंत्र की महत्ता को स्थापित करने पर बल दिया है। राजतंत्र की जड़ को उखाड़ फेंकने की ताकत जनता में है और राजसिंहासन का वास्तविक अधिकारी प्रजा ही है, ऐसा चित्रण किया गया है।


Q 6. कविता के आरंभ में कवि भारतीय जनता का वर्णन किस रूप में करता है ?

उत्तर :- कविता के आरंभ में कवि ने भारतीय जनता की सरल एवं विनीत छवि का वर्णन किया है। कवि ने कहा है कि जनता सहनशील होती है, जाडा-गर्मी सबको सहती है, दु:ख-सुख में एकसमान रहती है। मिट्टी की मूरत की तरह अबोध है । जनता फल की तरह है जिसे जब चाहो, जहाँ जिस रूप में रख दो । जनता अबोध बालक है जिसे छोटे प्रलोभन देकर प्रसन्न किया जा सकता है, अर्थात् भारत की भोली-भाली जनता असहनीय पीड़ा को चुपचाप सहकर भी मूक बनी रहनेवाली है। राजा द्वारा शोषित होने पर भी प्रतिकार नहीं करती है।


Q 7. “देवता मिलेंगे खेतों में खलिहानों में” पंक्ति के माध्यम से कवि किस देवता की बात करते हैं और क्यों ?

उत्तर :- ोक्त पंक्ति के माध्यम से कवि जनतारूपी देवता की बात करते हैं, क्योंकि कवि की दृष्टि में कर्म करता हुआ परिश्रमी व्यक्ति ही देवतास्वरूप है। मंदिरों-मठों में तो केवल मूर्तियाँ रहती हैं वास्तविक देवता वे ही हैं जो अपने कर्म तथा परिश्रम से समाज को सुख-समृद्धि उपलब्ध कराते हैं।


Q 8. दिनकर रचित ‘जनतंत्र का जन्म’ शीर्षक कविता का सारांश लिखें।

उत्तर :- ‘जनतंत्र का जन्म’ शीर्षक कविता आधुनिक भारत में जनतंत्र के उदय की जयघोष है। समय का रथ सिंहासन की ओर बढ़ता आ रहा है। वह सिंहासनासीन अधिनायक से कहता है कि अब तुम सिंहासन का मोह त्याग दो। इसपर केवल जनता का अधिकार है। उसी जनता का इस सिंहासन पर अधिकार है जो युगों से पद-दलित रही है और जिसने अपने शोषण के विरुद्ध कभी आवाज नहीं उठाई है। वह जनता अब कोई दुधमुंही बच्ची नहीं रही जिसे खिलौनों से बहलाया जा सकें। जनता कोपाकुल होकर जब अपनी भृकुटि चढ़ाती है तो भूचाल आ जाता है। बड़े-बड़े बवंडर उठने लगते हैं। उनके हुँकारों में महलों को उखाड़ फेंकने की ताकत है, उनकी साँसों में ताज को हवा में उड़ा देने का बल है। जनता की राह को रोकने की क्षमता किसी में भी नहीं है। वह अपने साथ काल लिए चलती है। काल पर भी उसका शासन चलता है। सुनो, वह जनता युगों के शोषण के अंधकार को चीरती हुई बड़े वेग के साथ सिंहासन की तरफ आ रही है। संसार का सबसे बड़ा जनतंत्र सिंहासन के पास खड़ा है। उसका हृदय से अभिषेक करो। अब तुम्हारा समय नहीं रहा। अब प्रजा का समय है।
देवता, मंदिरों, राजप्रासादों और तहखानों में निवास नहीं करते। वास्तविक देवता तो खेतों में, खलिहानों में हल चलाते मिलेंगे; कहीं सड़कों पर गिट्टी तोड़ते और फावड़े चलाते मिलेंगे। अब उन्हीं किसानों और मजदूरों की बारी है। अब वे ही राज सिंहासन पर आरूढ़ होंगे। सिंहासन खाली कर देने में तुम्हें कोई आना-कानी नहीं करनी चाहिए।


Q 9. निम्नलिखित पंक्तियों के भाव स्पष्ट करें

‘हुंकारों से महलों की नींव उखड़ जाती
साँसों के बल से ताज हवा में उड़ता है,
जनता की रोके राह. समय में ताव कहाँ?
वह जिधर चाहती, काल उधर ही मुडता है।’

उत्तर :- प्रस्तुत पद्यांश में कवि रामधारी सिंह दिनकर ने जनता में निहित व्याप शक्ति को उजागर किया है। इसमें कहा गया है कि जनता जब जाग जाती है, अप शक्ति-बल का अभ्यास करके जब चल पड़ती है तब समय भी उसकी राह नहीरोक सकती बल्कि जनता ही जिधर चाहेगी कालचक्र को मोड़ सकती है। युगों-युग ‘ से अंधकारमय वातावरण में जीवन व्यतीत कर रही जनता अब जागृत हो चुकी है। युगों-युगों का स्वप्न साकार हेतु कदम बढ़ चुके हैं जिसे अब रोका नहीं जा सकता ।


Q 10. व्याख्या करें:

“सदियों की ठंढी-बुझी राख सुगबुगा उठी,
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है;
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।”

उत्तर :- प्रस्तुत पद्यांश में जनतंत्र की स्थापना की बात कही गयी है। साथ ही, जनता की शक्ति का बोध कराया गया है। कवि रामधारी सिंह दिनकर ने ओजस्वी भाव में जनता की महत्ता का बोध कराते हुए उसकी सहनशीलता, धैर्य की बात बड़े ही सहज रूप में कहा है। साथ ही, भारत की जनता को अपना अधिकार प्राप्त करने, जनतंत्र स्थापित करने, राजसिंहासन पर आरूढ़ होने की प्रेरणा का भाव कवि ने जागृत करने का सफल प्रयास किया है। इस पद्यांश में जनता की शक्ति का व्यापक चित्रण किया गया है जो ओज का भाव जगाता है।

7. हिरोशिमा – सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय


Q 1. हिरोशिमा में मनुष्य की साखी के रूप में क्या है ?

उत्तर :- आज भी हिरोशिमा में साक्षी के रूप में अर्थात् प्रमाण के रूप में जहाँ-तहाँ जले हुए पत्थर, दीवारें पड़ी हुई हैं। यहाँ तक कि पत्थरों पर, टूटी-फूटी सड़कों पर, घर की दीवारों पर लाश के निशान छाया के रूप में साक्षी हैं।


Q 2. कविता के प्रथम अनुच्छेद में निकलने वाला सूरज क्या है? वह कैसे निकलता है ?

उत्तर :- कविता के प्रथम अनुच्छेद में निकलने वाला सूरज आण्विक बम का प्रचण्ड गोला है। ऐसा प्रतीत होता है कि वह क्षितिज से न निकलकर धरती फाड़कर निकलता है।


Q 3. मनुष्य की छायाएँ कहाँ और क्यों पड़ी हुई हैं ?

उत्तर :- मनुष्य की छायाएँ हिरोशिमा की धरती पर सब ओर दिशाहीन होकर पड़ी हुई हैं। जहाँ-तहाँ घर की दीवारों पर मनुष्य छायाएँ मिलती हैं। टूटी-फूटी सड़कों से लेकर पत्थरों पर छायाएँ प्राप्त होती हैं।


Q 4. प्रज्वलित क्षण की दोपहरी से कवि का आशय क्या है ?

उत्तर :- हिरोशिमा में जब बम का प्रहार हुआ तो प्रचण्ड गोलों से तेज प्रकास निकला और वह चतुर्दिक फैल गया । इस अप्रत्याशित प्रहार से हिरोशिमा के लोग हतप्रभ रह गये । उन्हें ऐसा लगा कि धीरे-धीरे आनेवाला दोपहर आज एक क्षण में ही उपस्थित हो गया ।


Q 5. छायाएँ दिशाहीन सब ओर क्यों पड़ती हैं ? स्पष्ट करें।

उत्तर :- सूर्य के उगने से जो भी बिम्ब-प्रतिबिम्ब या छाया का निर्माण होता है वे सभी निश्चित दिशा में लेकिन बम-विस्फोट से निकले हुए प्रकाश से जो छायाएँ बनती हैं वे दिशाहीन होती हैं। क्योंकि, आण्विक शक्ति से निकले हुए प्रकाश सम्पूर्ण दिशाओं में पड़ता है। उसका कोई निश्चित दिशा नहीं है। बम के प्रहार से मरने वालों की क्षत-विक्षत लाशें विभिन्न दिशाओं में जहाँ-तहाँ पड़ी हुई हैं। ये लाशें छाया-स्वरूप हैं, परन्तु चतुर्दिक फैली होने के कारण दिशाहीन छाया कही गयी है।


Q 6. अज्ञेय रचित ‘हिरोशिमा’ शीर्षक कविता का सारांश अपने शब्दों में लिखें।

उत्तर :- द्वितीय विश्वयुद्ध में 6 अगस्त 1945 को अमेरिका के एक बमवर्षक विमान से जापान के हिरोशिमा नगर पर अणुबम गिराया गया। इससे जान-माल की अपार क्षति हुई। ‘हिरोशिमा’ शीर्षक कविता की पृष्ठभूमि यही है। कवि कहता है कि नगर के चौक पर एक दिन सहसा सूरज निकला। यह सूरज प्रकृति का सूरज नहीं था, मानव निर्मित अणुबम के विस्फोट से उत्पन्न सूरज था। इस सूरज की धूप आकाश से नहीं, अपितु मिट्टी के फटने से चारों ओर बरसी। प्रकृति का सूरज तो पूरब में उगता है, पर मानव निर्मित यह सूरज नगर के बीच सहसा उदित हुआ। इस अणुबम रूपी सूरज कके उदित होने से मानव-जन की छायाएँ दिशाहीन सब ओर पड़ी। काल-सूर्य के रथ के पहियों के अरे जैसे टूटकर चारों ओर बिखर गए हों। यह मानव निर्मित सूर्य कुछ ही क्षणों के अपने उदय-अस्त से सारी
मानवता को विध्वस्त कर गया। इस सूर्य का उदित होना, दोपहरी की प्रचंड गर्मी का आक्रमण और फिर सूर्य का अस्त हो जाना-ये सारी स्थितियाँ कुछ ही क्षणों में घटित हो गई। उस सूर्य के उदित होते ही सारे मानव-जन वाष्प बनकर इस दुनिया से दूर चले गए। आज भी उनकी छायाएँ झुलसे हुए पत्थरों और उजड़ी हुई सड़कों की गच पर पड़ी हुई हैं। सारे मानव-जन विनष्ट हो गए। उनकी पत्थरों पर पड़ी हुई छायाएँ उनकी साक्षी हैं। साक्षी हैं छायाएँ कि कभी यहाँ भी इनसान रहते थे। साक्षी हैं ये छायाएँ कि इनसान इतना निर्दय हो सकता है कि इनसान को मिटाने में उसे थोड़ी भी हिचक नहीं होती।
यह कविता भौतिकवादी और साम्राज्यवादी मानव की दृष्टि के विरोध में एक तीखा व्यंग्य लेकर उपस्थित होती है। यह कविता युद्ध और शांति की समस्या से मुठभेड़ करती है और हमारे भीतर यथार्थ चित्रण से करुणा का स्त्रोत प्रवाहित करती है। यह अज्ञेय की सफलतम रचनाओं में एक है।


Q 7: आज के युग में इस कविता की प्रासंगिकता स्पष्ट कीजिए।

उत्तर :- यह स्पष्ट है कि ‘अज्ञेय’ प्रयोगवादी कविता का महान प्रवर्तक हैं। इनकी कविता यथार्थ की धरातल पर एक ऐसा अमिट चित्र छोड़ता है, जो माननीय
संवेदनाओं को झकझोर देता है। ‘हिरोशिमा’ नामक कविता वर्तमान की प्रासंगिकता पर पूर्ण रूप से आधारित है। यह कविता आधुनिक संभ्यता की दुर्दान्त मानवीय विभीषिका का चित्रण करने वाली एक अनिवार्य प्रासंगिक चेतावनी भी है। यदि मानव प्रकृति से खिलवाड़ करना बाज नहीं आया तो प्रकृति ऐसी विनाशलीला खडा करेगा, जहाँ मानवीय बुद्धि की परिपक्वता छिन्न-भिन्न होकर बिखर जायेगी । हिरोशिमा में बम विस्फोट का परिणाम इतना भयावह होगा इसकी कल्पना शायद उस दुर्दान्त मानव को भी नहीं होगा जिसने इसका प्रयोग किया। अत: यह कविता केवल अतीत की भीषणतम मानवीय दुर्घटना का ही साक्ष्य नहीं है बल्कि आण्विक
आयुधों की होड़ में फंसी आज की वैश्विक राजनीति से उपजते संकट की आशंकाओं से भी जुड़ी हुई है।


Q 8. “काल-सूर्य के रथ के / पहियों के ज्यों अरे टूट कर / बिखर गये हों / दसों दिशा में’ की व्याख्या कीजिए।

उत्तर :- प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक हिन्दी साहित्य के महान प्रयोगवादीकवि अज्ञेय के द्वारा लिखित ‘हिरोशिमा’ नामक शीर्षक से उद्धत है । प्रस्तुत अंश
में यह कहा जा रहा है कि हिरोशिमा में बम का विस्फोट होना एक नहीं अनेक सूर्य के शक्ति के बराबर ज्वाला उगला था। इस व्याख्येय अंश में कहा जा रहा है कि हिरोशिमा में आण्विक आयुध का प्रयोग इतिहास का अमिट काला कलंक है । आण्विक विस्फोट की स्थिति ठीक उसी प्रकार लग रही थी जैसे महाकालरूपी सूर्य के रथ का पहिया टूटकर दसों दिशाओं में बिखर गया है। जहाँ-तहाँ पड़ी हुई लाशें सूर्यरूपी महाकाल के टूटी हुई पहियों के रूप में मानवीय संवेदनाओं को झकझोर दिया था ।


Q 9. “एक दिन सहसा/सूरज निकला’ की व्याख्या कीजिए।

उत्तर :- प्रस्तुत पद्यांश हिन्दी प्रयोगवादी विचारधारा के महान प्रवर्तक कवि अज्ञेय द्वारा लिखित ‘हिरोशिमा’ नामक शीर्षक से अवतरित है। प्रस्तुत अंश में हिरोशिमा में हुए बम विस्फोट के बाद दुष्परिणाम का जो अंश उपस्थित हुआ है उसी का मार्मिक चित्रण है। कवि कहना चाहते हैं कि जब हिरोशिमा में आण्विक आयुध का प्रयोग हुआ उस समय प्रकृति के शाश्वत तत्त्व भी कुंठित हो गये । सूरज जैसा ब्रह्माण्ड का शक्ति सम्पन्न तत्त्व भी अपनी प्रचण्डता को झुठला दिया । बम विस्फोट से निकलने वाली ज्वाला प्रकृति के सूरज को भी कई दिनों तक उगने से अवरुद्ध कर दिया। जबकि प्रकृति का सूरज अंतरिक्ष से निकलता है लेकिन बमरूपी सूरज धरती को फोड़कर केवल हिरोशिमा के चौक से निकला । प्रकृति का सूरज़ प्राणदाता के रूप में अवतरित होता है लेकिन आण्विक सूरज प्राण लेने वाला सूरज के रूप में निकला है।


Q 10. ‘मानव का रचा हुआ सूरज/मानव को भाप बनाकर सोख गया’ की व्याख्या कीजिए।

उत्तर :- प्रस्तुत पद्यांश हिन्दी साहित्य के प्रयोगवादी कवि तथा बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न कवि ‘अज्ञेय’ के द्वारा लिखित ‘हिरोशिमा’ नामक शीर्षक से उद्धृत है । प्रस्तुत अंश में हिरोशिमा पर आण्विक अस्त्र का प्रयोग कितना भयानक रहा, इसी का चित्रण यहाँ किया गया है । प्रस्तुत व्याख्येय अंश में कहा जा रहा है कि मानव जो अपने आपको प्रबुद्ध वर्ग की संज्ञा देता है वही कभी-कभी अपने बनाये गये जाल में स्वयं उलझकर रह जाता है। प्रकृति पर नियंत्रण करने का होड़ मानव की बचपना स्पष्ट दिखाई पड़ने लगती है । यही स्थिति हिरोशिमा पर बम विस्फोट के बाद देखने को मिली। मानव ने बमरूपी सूरज का निर्माण कर अपने-आपको ब्रह्माण्ड का
नियामक समझ लिया था, लेकिन वह विस्फोट मानव को ही भाप बनाकर सोख – लिया, अर्थात् वही विस्फोट मानव के लिए अभिशाप बन गया।

8. एक वृक्ष की हत्या – कुँवर नारायण


Q 1. कवि को वक्ष बूढ़ा चौकीदार क्यों लगता था ?

उत्तर :- कवि एक वृक्ष के बहाने प्राचीन सभ्यता, संस्कृति एवं पर्यावरण की रक्षा की चर्चा की है। वृक्ष मनुष्यता, पर्यावरण एवं सभ्यता की प्रहरी है । यह प्राचीनकाल से मानव के लिए वरदानस्वरूप है, इसका पोषक है, रक्षक है । इन्हीं बातों का चिंतन करते हुए कवि को वृक्ष बूढ़ा चौकीदार लगता था।


Q 2. वृक्ष और कवि में क्या संवाद होता था ?

उत्तर :- कवि जब अपने घर कहीं बाहर से लौटता था तो सबसे पहले उसकी नजर घर के आगे स्थिर खड़ा एक पुराना वृक्ष पर पड़ती । कवि को आभास होता मानो वृक्ष उससे पूछ रहा है कि तुम कौन हो? कवि इसका उत्तर देता-मैं तुम्हारा दोस्त हूँ। इसी संवाद के साथ वह उसके निकट बैठकर भविष्य में आने वाले पर्यावरण संबंधी खतरों का अंदेशा करता है।


Q 3. “एक वृक्ष की हत्या’ शीर्षक कविता का भावार्थ लिखें।

उत्तर :- प्रस्तुत कविता में कवि एक पुराने वृक्ष की चर्चा करते हैं। वृक्ष प्रहरी के रूप में कवि के घर के निकट था और वह एक दिन काट दिया जाता है। कवि के चिंतन का मुख्य केन्द्र-बिन्दु कटा हुआ वृक्ष ही है। उसी को आधार मानकर सभ्यता, मनुष्यता एवं पर्यावरण को क्षय होते हुए देखकर आहत होते हैं।


Q 4. घर, शहर और देश के बाद कवि किन चीजों को बचाने की बात करता है और क्यों ?

उत्तर :- घर, शहर और देश के बाद कवि नदियों, हवा, भोजन, जंगल एवं मनुष्य को बचाने की बात करता है क्योंकि नदियाँ, हवा, अन्न, फल, फूल जीवनदायक हैं। इनकी रक्षा नहीं होगी तो मनुष्य के स्वास्थ्य की रक्षा नहीं हो सकती है।


Q 5. “एक वृक्ष की हत्या’ कविता का समापन करते हुए कवि अपने किन अंदेशों का जिक्र करता है और क्यों ?

उत्तर :- कवि को अंदेशा है कि आज पर्यावरण, हमारी प्राचीन सभ्यता, मानवता तक के जानी दुश्मन समाज में तैयार हैं। अंदेशा इसलिए करता है क्योंकि आज लोगों की प्रवृत्ति वृक्षों की काटने की हो गई। सभ्यता के विपरीत कार्य करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, मानवता का ह्रास हो रहा है।


Q 6. “एक वृक्ष की हत्या’ कविता में एक रूपक की रचना हुई है। रूपक क्या है और यहाँ उसका क्या स्वरूप है ? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर :- रूपक भावाभिव्यक्ति की एक विधा है । इसमें कवि की कल्पना मूर्तरूप में चित्रित होती है। यहाँ वृक्ष की महत्ता को मूर्त रूप देते हुए उसे एक प्रहरी के रूप में दिखाया गया है।


Q 7. ‘एक वृक्ष की हत्या’ का सारांश अपने शब्दों में लिखें।

उत्तर :- कवि जब कभी बाहर से आता था तब अपने घर के दरवाजे पर खड़े बढे वृक्ष को देखकर उसे एक आनंदपूर्ण संतोष मिलता था। पर आज जब वह बाहर : से घर आया तब उसे अपने घर के दरवाजे पर नहीं देखकर उसे बड़ा दुःख हुआ। उसे एक रिक्तता और खालीपन का अहसास हुआ। वह बूढ़ा वृक्ष उसके घर के दरवाजे पर हमेशा चौकस-चौकन्ना रहता था। वह वृक्ष उसके घर का पहरेदार था जैसे। पर, वह बूढ़ा चौकीदार वृक्ष किसी के स्वार्थ की बलि चढ़ गया। उसे काट डाला गया। उसकी हत्या हो गई। कवि को पहले से ही आशंका थी कि किसी की निगाहें उस बूढ़े वृक्ष पर लगी हुई हैं, वह अवश्य ही बूढे वृक्ष की हत्या कर देगा और सचमुच, हुआ भी वही। वृक्ष की हत्या कर कवि अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करता हुआ कहता कि हमारी असावधानी के चलते ही ऐसा होता है कि कोई प्राणिजगत की रक्षा करनेवाले को ही अपने स्वार्थ के लिए मार डाला है। वृक्ष की हत्या के बाद कवि को आशंका होती है कि कहीं लुटेरे उसके घर को, शहर को और देश को ही लूट न लें। सब जगह लूट मची है। कवि ‘लूट’ के प्रति सावधान रहने की बात करता है। वह वृक्ष । की हत्या को पर्यावरण की हत्या का एक अंग मानता है। वह पर्यावरण की चिंताओं से ग्रस्त हो जाता है। वह आत्मसजग होकर घोषणा करता है कि हमें नदियों को नाला होने से, हवा को धुंआ होने से (विषाक्त होने से) और खाद्य पदार्थ को जहर होने से (कीटनाशक दवाओं के छिड़काव और रासायनिक खादों के प्रयोग से खाद्य पदार्थों के जहर होने से) बचाना है। जंगलों के काटने से मरुस्थलों का लगातार विस्तार हो रहा है और भौतिकता के प्रति विशेष आग्रह के कारण सभ्य कहलानेवाला आदमी निरंतर असभ्य होता जा रहा है। कवि इस चिंता से ग्रस्त है। कवि इन तमाम आशंकाओं के बीच अपने कर्मठ होने का परिचय देते हुए कहता है कि हमें इन सारी अव्यवस्थाओं को दूर करने के लिए तैयार हो जाना चाहिए। हमें हर कीमत पर अपने घर, नगर, देश, नदियों, हवा, खाद्य-पदार्थ, जंगल तथा मानव की सुरक्षा करनी है। . तुरंत काटे गए एक वृक्ष के बहाने पर्यावरण, मनुष्य और सभ्यता के विनाश की ‘अंतर्व्यथा को यह कविता अभिव्यक्त करती है।


Q 8. कविता की प्रासंगिकता पर विचार करते हुए एक टिप्पणी लिखें।

उत्तर :- आज प्राचीन सभ्यता का ह्रास हो रहा है। पर्यावरण का ख्याल नहीं रखा जा रहा है। वृक्ष एवं जंगल काटे जा रहे हैं। मानवता का गुण नष्ट हो रहा है। पशुता एवं राक्षसत्व का गुण बढ़ रहा है । नदियों का स्वच्छ जल प्रदूषित हो रहा है। ऐसी विषम परिस्थितियों में कवि का इस ओर ध्यान दिलाना प्रासंगिक है। आज के प्रसंग में कवि की कल्पना चरितार्थ हो रही है। कवि का अंदेशा सत्य हो रहा है। हमें वृक्ष, पर्यावरण, मनुष्यता; सभ्यता एवं राष्ट्रीयता के प्रति संवेदनशील होना होगा। इन सबकी रक्षा के लिए गंभीरता से विचार करना होगा ताकि आने वाला समय सुखद हो, धरती पर मानवता स्थापित हो सके, संस्कारक्षम वातावरण का निर्माण किया जा सके।


Q 9. दूर से ही ललकारता, ‘कौन ?’  मैं जवाब देता, ‘दोस्त !’ की व्याख्या कीजिए।

उत्तर :- प्रस्तुत पंक्ति हिन्दी पाठ्य-पुस्तक के कुँवरः नारायण रचित ‘एक वृक्ष की हत्या’ पाठ से उद्धत है । इसमें कवि ने एक वृक्ष के कटने से आहत होता है और इसपर चिंतन करते हुए पूरे पर्यावरण एवं मानवता पर खतरा की आशंका से आशंकित हो जाता है। इसमें अपनी संवेदना को कवि ने अभिव्यक्त किया है। प्रस्तुत व्याख्येय अंश में कवि कहता है कि जब मैं अपने घर लौटा तो पाया . कि मेरे घर के आगे प्रहरी के रूप में खड़े वृक्ष को काट दिया गया है। उसकी याद करते हुए कवि कहते हैं कि वह घर के सामने अहर्निश खड़ा रहता था मानो वह गृहरक्षक हो । जब मैं बाहर से लौटता था उसे दूर से देखता था और मुझे प्रतीत होता था कि वृक्ष मुझसे पूछ रहा है कि तुम कौन हो ? तब मैं बोल पड़ता था कि मैं तुम्हारा मित्र हूँ। यहाँ वृक्ष और मनुष्य की संगति का बखान है।


Q 10. ‘बचाना है जंगल को मरुस्थल हो जाने से/बचाना है-मनुष्य को जंगली हो जाने से’ की व्याख्या कीजिए

उत्तर :- प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक के एक वृक्ष की हत्या’ पाठ से उद्धृत है। इसमें कवि भविष्य में आने वाले प्राकृतिक संकट, मानवीयता पर खतरा  एवं ह्रास होते सभ्यता की ओर ध्यानाकर्षण कराते हुए भावी आशंका को व्यक्त किया है।
प्रस्तुत व्याख्येय अंश में कवि ने कहा है कि अगर हम इस अंधाधुंध विकास क्रम में विवेक से काम नहीं लेंगे तो वृक्ष कटते रहेंगे और भविष्य में जंगल मरुस्थल का रूप ले लेगा। साथ ही मानवता की सभ्यता की रक्षा के प्रति सचेत नहीं होंगे तो मानव भी जंगल का रूप ले सकता है। मानवीयता पशुता में परिवर्तित हो सकता है। मानव दानवी प्रवृत्ति अपनाता दिख रहा है और इस बढ़ते प्रवृत्ति को रोकना आवश्यक होगा। अर्थात् कवि मानवीयता स्थापित करने हेतु चिंतनशील है, सभ्यता की सुरक्षा हेतु पर्यावरण-संरक्षण के लिए सजग होने की शिक्षा दे रहे हैं।


Q 11. निम्नलिखित पंक्तियों का भाव सौंदर्य स्पष्ट करे :

“धूप में वारिश में; गर्मी में सर्दी में
हमेशा चौकन्ना; अपनी खाकी वर्दी में”

उत्तर :- कवि ने इन पंक्तियों में एक बूढ़ा वृक्ष को युगों-युगों का प्रहरी मानते हुए सभ्यता-संस्कृति की रक्षा हेतु मानव को जगाने का प्रयास किया है। कवि की कल्पना ने वृक्ष को अभिभावक, चौकीदार, पहरुआ के रूप में चित्रित कर मानवीयता प्रदान किया है। इसमें वृक्ष की चेतनता, कर्तव्यनिष्ठता एवं आत्मीयता दर्शाई गई है।

9. हमारी नींद –वीरेन डंगवाल


Q 1. ‘हमारी नींद’ कविता के शीर्षक की सार्थकता पर प्रकाश डालें।

उत्तर :- यहाँ शीर्षक विषय-वस्तु प्रधान हैं। शीर्षक छोटा है और आकर्षक भी है। इसका शीर्षक पूर्णरूप से केन्द्र में चक्कर लगाता है, जहाँ शीर्षक सुनकर ही जानने की इच्छा प्रकट हो जाती है। अत: सब मिलाकर शीर्षक सार्थक है।


Q 2. इनकार करना न भूलने वाले कौन हैं ? कवि का भाव स्पष्ट कीजिए।

उत्तर :- आज भी हमारे समाज में कुछ ऐसे हठधर्मी हैं जो संवैधानिक और वैधानिक स्तर पर कई गलतियाँ कर जाते हैं लेकिन अपनी भूलें या गलतियों को स्वीकार नहीं करते हैं। वे साफ तौर पर अपनी भूल को इनकार कर देते हैं। जैसे लगता है कि उनकी दलील काफी साफ और मजबूत है।


Q 3. “हमारी नींद’ कविता के प्रथम अनुच्छेद में कवि एक बिम्ब की रचना करता है। उसे स्पष्ट कीजिए।

उत्तर :- कविता के प्रथम अनुच्छेद में कवि वीरेन डंगवाल ने मानव जीवन का एक बिंब उपस्थित किया है। सुविधाभोगी-आरामपसंद जीवन नींदरूपी अकर्मण्यता की चादर से अपने-आपको ढंककर जब सो जाता है तब भी प्रकृति के वातावरण में एक छोटा बीज अपनी कर्मठतारूपी सींगों से धरती के सतह रूपी संकटों को तोड़ते हुए आगे बढ़ जाता है । यहाँ नींद, अंकुर, कोमल सींग, फूली हुई बीज, छत ये सभी बिम्ब रूप में उपस्थित है।


Q 4. मक्खी के जीवन-क्रम का कवि द्वारा उल्लेख किये जाने का क्या आशय है ?

उत्तर :- मक्खी के जीवन-क्रम का कवि द्वारा उल्लेख किये जाने का आशय है निम्न स्तरीय जीवन की संकीर्णता को दर्शाना । सृष्टि में अनेक जीवन-क्रम चलता रहता है। वह जीवन-क्रम की व्यापकता को लेकर कर्मठता और अकर्मठता का बोध : कराता है लेकिन मक्खी का जीवन-क्रम केवल सुविधाभोगी एवं परजीवी जीवन का बोध कराता है।


Q 5. कवि गरीब बस्तियों का क्यों उल्लेख करता है ?

उत्तर :- कवि गरीब बस्तियों के उल्लेख के माध्यम से कहना चाहता है कि जहाँ के लोग दो जून रोटी के लिए काफी मसक्कत करने के बाद भी तरसते हैं वहाँ पूजा-पाठ, देवी जागरण जैसा महोत्सव कुछ स्वार्थी लोग अपना उल्लू सीधा करने के लिए गरीब लोगों का उपयोग करते हैं।


Q 6. ‘हमारी नींद’ शीर्षक कविता में कवि ने किन अत्याचारियों का जिक्र किया है, और क्यों ?

उत्तर :- कवि यहाँ उन अत्याचारियों का जिक्र करता है जो हमारी सविधाभोगी. आरामपसंद जीवन से लाभ उठाते हैं। हमारी बेपरवाहियों के बाहर विपरीत परिस्थितियों से लगातार लड़ते हुए बढ़ते जाने वाले जीवित नहीं रह पाते हैं और इस अवस्था में अत्याचारी अत्याचार करने के बाह्य और आंतरिक सभी साधन जुटा लेते हैं।


Q 7. कविता में एक शब्द भी ऐसा नहीं है जिसका अर्थ जानने की कोशिश करनी पड़े। यह कविता की भाषा की शक्ति है या सीमा ? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर :- के आलोक में यह स्पष्ट जाहिर होता है कि यह भाषा की शक्ति है क्योंकि भाषा को किसी सीमा में बाँधकर रखना भाषा के विकास पर पहरा देना है। भाषा के उन्मुक्त रहने से ही भाषा की व्यापकता संभव हो सकती हैं । अतः, यह कविता भाषा की सीमा नहीं होकर उसकी शक्ति है।


Q 8. वीरेन डंगवाल रचित ‘हमारी नींद’ शीर्षक कविता का सारांश अपने शब्दों में प्रस्तुत करें।

उत्तर :- हम नींद में सोते हैं, इसका यह अर्थ कतई नहीं होता कि सृष्टि का विकास क्रम रूक गया है। हमारी नींद में भी प्रकृति का विकासक्रम अग्रसर होता है। हमारे सोने और जागने के बीच पेड़ कुछ इंच बढ़ जाते हैं; पौधों में कुछ सूतों की वृद्धि हो जाती है तथा अंकुर अपने कोमल और लघु-लघु सींगों से बीज की छत (छिलके को) को भीतर से धकेलना शुरू कर देते हैं। हमारी नींद जितने घंटे की होती है, उसमें मक्खी का जीवन-क्रम पूरा हो जाता है। मक्खी के अनेक शिश पैदा होते हैं और उनमें से अनेक मृत्यु को भी प्राप्त हो जाते हैं। हमारी नींद में ही गरीब बस्तियों में धमाके के साथ लाउडस्पीकर पर देवी जागरण हो जाता है। हम जगकर भले ही सोचें कि हमारे सोने में प्रकृति का सारा विकास रूका हुआ था, पर यह सोचना एकदम सही नहीं होता।
जीवन को घेरने, बाँधने, रोकने के अनेक प्रयास होते हैं, पर हमारा हठीला जीवन इनके बावजूद अपनी प्रकृति से कोई समझौता नहीं करता, वह बढ़ता ही जाता है आगे। हम में अधिसंख्य ऐसे हैं जो बाधाओं का सामना नहीं कर पाते, उनके सामने झुक जाते हैं। पर, कुछ ऐसे भी हैं जो भीतर से बहुत मजबूत होते हैं, वे झुकना नहीं जानते। वे अस्वीकार का दुष्परिणाम जानते हुए भी बड़े साहस के साथ साफ-साफ इनकार करने की आदी होते हैं।
प्रस्तुत कविता जीवन की ज़य की कविता है। जीवन अवरोधों को नहीं जानता। वह हर अवरोध को हँसता हुआ पार करता है। उसकी प्रकृति सतत विकास की होती है। वह रुकना नहीं जानता, वह झुकना नहीं जानता।


Q 9. ‘हमारी नींद के बावजूद’ की व्याख्या कीजिए।

उत्तर :- प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिन्दी पाठ्य-पुस्तक के ‘हमारी नींद’ नामक शीर्षक से उद्धृत है। इस अंश में हिन्दी काव्यधारा के समसामयिक कवि वीरेन डंगवाल ने वैसे लोगों का चित्रण किया है जो आरामतलबी जीवन पसंद करते हैं।
प्रस्तुत अंश में कवि कहते हैं कि जीवनक्रम कभी रुकता नहीं है। समय का चक्र के समान बिना किसी की प्रतीक्षा किये हुए अनवरत आगे ही बढ़ता जाता है। .. यदि हमारे समाज का कोई व्यक्ति सुविधाभोगी आराम का जीवन पसंद करता है तो कहीं एक पक्ष जरूर ऐसा भी होता है जिसका सिलसिला हमेशा आगे बढ़ते जाता – है जो कर्मवाद का संदेश देता है।


Q 10. “याने साधन तो सभी जुटा लिए हैं अत्याचारियों ने’ की व्याख्या कीजिए।

उत्तर :- प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक गोधूलि के ‘हमारी नींद’ नामक शीर्षक से उद्धृत है । कवि ने वीरेन डंगवाल सामाजिक अत्याचारियों की करतूतों का
पर्दाफाश किया है। आज हमारे समाज में अनेक लोग हैं जो अपनी जिंदगी को आरामतलबी बना लिये हैं । ऐसी जिंदगी समाज और राष्ट्र के लिए खतरनाक परिधि में रहती है और इन्हीं में से कुछ लोग ऐसे हैं जो इनकी विवशता का लाभ उठाने के लिए गलत अंजाम देने में पीछे नहीं हटते हैं । अत्याचारी आंतरिक और बाह्य रूप से अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए सभी प्रकार के साधन अपनाते हैं।


Q 11. व्याख्या करें –

‘गरीब बस्तियों में भी
धमाके से हुआ देवी जागरण
लाउडस्पीकर पर’

उत्तर :- प्रस्तुत पद्यांश हिन्दी साहित्य के सुप्रसिद्ध कवि वीरेन डंगवाल के द्वारा लिखित ‘हमारी नींद’ से ली गई है। इस अंश में कवि ने उन लोगों का चित्र खींचा है जो गरीब बस्तियों में जाकर अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए देवी जागरण जैसे महोत्सव का आयोजन करते हैं। कवि कहते हैं कि आज भी हमारे समाज में कुछ ऐसे स्वार्थपरक लोग हैं जिनके हृदय में गरीबों के प्रति हमदर्दी नहीं है। केवल उनसे समय-समय पर झूठेवादे करते हैं । नेता, पूँजीपति एवं अत्याचारी ये सभी गरीबों की
आंतरिक व्यथा से खिलवाड़ कर उनकी विवशता से लाभ उठाते हैं।

10. अक्षर ज्ञान – अनामिका


Q 1. कवियित्री के अनुसार बेटे को आँसू कब आता है; और क्यों?

उत्तर :- सीखने के क्रम में कठिनाइयों का सामना करते हुए बालक थक जाता है । ‘क’ से लेकर ‘घ’ तक अनवरत सीखते हुए ‘ङ’ सीखने का प्रयास करना कठिन हो जाता है। यहाँ वह पहले-पहल विफल होता है और आँसू आ जाते हैं।


Q 2. कविता में ‘क’ का विवरण स्पष्ट कीजिए।

उत्तर :- प्रस्तुत कविता में कवयित्री छोटे बालक द्वारा प्रारम्भिक अक्षर-बोध को साकार रूप में चित्रित करते हुए कहती हैं कि ‘क’ को लिखने में अभ्यास-पुस्तिका का चौखट छोटा पड़ जाता है। कर्मपथ भी इसी प्रकार प्रारंभ में फिसलन भरा होता है।


Q 3. खालिस बेचैनी किसकी है ? बेचैनी का क्या अभिप्राय है ?

उत्तर :- खालिस बेचैनी खरगोश की है । ‘क’ सीखकर ‘ख’ सीखने के कर्मपथ पर अग्रसर होता हआ साधक की जिज्ञासा बढ़ती है और वह आगे बढ़ने को बेचैन हो जाता है । बेचैनी का अभिप्राय है आगे बढ़ने की लालसा, जिज्ञासा एवं कर्म में उत्साह।


Q 4. “अक्षर-ज्ञान” शीर्षक कविता किस तरह एक सांत्वना और आशा जगाती है ? स्पष्ट करें।

उत्तर :- कविता में एक प्रवाह है जो विकासवाद के प्रवाह का बोध कराता है। सांत्वना और आशा सफलता का मूलमंत्र है । अक्षर-ज्ञान की प्रारंभिक शिक्षण-प्रक्रिया अति संघर्षशील होती है। लेकिन अक्षर ज्ञान करवाने वाली ममता की मूर्ति माँ सांत्वना और आशा का बोध कराती है।


Q 5. कविता के अंत में कवयित्री ‘शायद’ अव्यय का क्यों प्रयोग करती हैं ? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर :- यहाँ कविता के अंत में कवयित्री ‘शायद’ अव्यय का प्रयोग करके यह स्पष्ट करना चाहती है कि जो अक्षर-ज्ञान में बच्चों को मसक्कत करना पड़ता है वही मसक्कत सृष्टि के विकास में करना पड़ा होगा । शायद सृष्टि का प्रारंभिक क्रम इसी गति से चला होगा।


Q 6. बेटे के लिए ‘ङ’ क्या है, और क्यों ?

उत्तर :- बेटे के लिए ‘ङ’ उसको गोद में लेकर बैठने वाली माँ है। माँ स्नेह देती है, वात्सल्य प्रेम देती है। ‘ङ’ भी ‘क’ से लेकर ‘घ’ तक सीखने के क्रम के बाद आता है। वहाँ स्थिरता आ जाती है, साधनाक्रम रुक जाता है । ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार कर्मरत बालक माँ की गोद में स्थिर हो जाता है।


Q 7. कविता में तीन उपस्थितियाँ हैं । स्पष्ट करें कि वे कौन-कौन-सी हैं ?

उत्तर :- प्रस्तुत कविता में प्रवेश, बोध और विकास तीन उपस्थितियाँ आयी हैं। अक्षर-ज्ञान की प्रक्रिया सबसे पहले प्रवेश की वातावरण में प्रारंभ हुई है। उसके बाद बोध में कुछ परिपक्वता दिखाई पड़ने लगती है। अंत में विकास क्रम उपस्थित ” होता है जहाँ निरंतर आगे बढ़कर अक्षर को मूर्तरूप देने का प्रयास सफल होता है ।
भावना


Q 8. ‘कवयित्री अनामिका की ‘अक्षर-ज्ञान’ शीर्षक कविता का सारांश अपने शब्दों में लिखें।

उत्तर :- अबोध बालक हिंदी वर्णमाला के अक्षर पाटी पर (स्लेट पर) साधने चला है। वह ‘क’ लिखता है, पर उसका ‘क’ निर्धारित स्थान की सीमा का उल्लंघन कर जाता है, वह चौखटे में नहीं अँटता। उसे बताया गया है कि ‘क’ से कबूतर होता है। उसका ध्यान ‘क’ लिखते समय कबूतर पर होता है, उसका ‘क’ रेखा के इधर-उधर फुदक जाता है। ‘ख’ के साथ भी यही होता है। वह जानता है-‘ख’ से खरहा होता है। ‘ख’ लिखते समय उसका ध्यान ‘ख’ से ज्यादा खरहा पर होता है। परिणामस्वरूप उसका ‘ख’ रेखा से उतर जाता है। वह अबोध बालक ‘ग’ भी ठीक से नहीं लिख पाता। उसका ‘ग’ टूटे हुए गमले-सा इधर-उधर बिखर जाता है। घड़ा जैसे लुढ़कता है ठीक उसी तरह उस बालक का ‘घ’ भी लुढ़कता हुआ-सा दिखता है। रेखाओं के बीच वह ‘घ’ सही-सही नहीं बैठा पाता। ‘ङ’ लिखते समय तो वह बहुत परेशान हो जाता है। वह ‘ङ’ को दो हिस्सों में बाँटता है-‘ड’ और ‘ड’ के बगल में लगनेवाला बिंदु (.)। ‘ड’ उसे माँ की तरह दिखाई पड़ता है और बगल का बिंदु (.) माँ की गोद में बैठे हए बेटे की तरह। माँ और बेटे को एक साथ साधने में अपने को असमर्थ पाता है। वह ‘ङ’ लिखने की कोशिश करता है, पर हर बार वह असफल हो जाता है। अपनी विफलता के कारण उसके आँखों में आँसू आ जाते हैं। बालक के उन सजह-निश्छल आँसू की बूंदों पर कवयित्री टिप्पणी करती है कि “पहली विफलता पर छलके ये आँस ही/हैं शायद प्रथमाक्षर/सृष्टि की विकास-कथा के।” सृष्टि की विकास-कथा विफलता पर छलके हुए आँसू के प्रथमाक्षर से ही लिखी गई है शायद !


Q 9. “गमले-सा टूटता हुआ उसका ‘ग’/घड़े-सा लुढ़कता हुआ उसका ‘घ’ ” की व्याख्या कीजिए।

उत्तर :- प्रस्तुत व्याख्येय पंक्तियाँ हमारी हिन्दी पाठ्य पुस्तक के ‘अक्षर-ज्ञान’ शीर्षक से उद्धृत हैं। प्रस्तुत अंश में हिन्दी साहित्य की समसामयिक कवयित्री अनामिका ने अक्षर-ज्ञान की प्रारंभिक शिक्षण-प्रक्रिया में संघर्षशीलता का मार्मिक वर्णन किया है। कवयित्री कहती हैं कि बच्चों को अक्षर-ज्ञान की प्रारंभिक शिक्षण-प्रक्रिया कौतुकपूर्ण है। एक चित्रमय वातावरण में विफलताओं से जुझते हुए अनवरत प्रयासरत आशान्वित निरंतर आगे बढ़ते हुए बच्चे की कल्पना की गई है । ‘ग’ को सीखना गमले की तरह नाजुक है जो टूट जाता है। साथ ही ‘घ’ घडे का प्रतीक है जिसे लिखने का प्रयास किया जाता है लेकिन लुढ़क जाता है। अर्थात् गमले की ध्वनि से बच्चा ‘ग’ सीखता है और ‘घड़े’ की ध्वनि से ‘घ’ सीखता है।

11. लौट कर आऊंगा फिर – जीवनानंद दास


Q 1. अगले जन्मों में बंगाल में आने की क्या सिर्फ कवि की इच्छा है? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर :- अगले जम्मों में बंगाल में आने की प्रबल इच्छा तो कवि की है ही। लेकिन, इसकी अपेक्षा जो बंगालप्रेमी हैं, जिन्हें बंगाल की धरती के प्रति आस्था और विश्वास है, कवि उन लोगों का भी प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।
कीजिए।


उत्तर :- कवि ने प्राकृतिक सौंदर्य के वातावरण में बिम्बों की स्थापना सौंदर्यपूर्ण चित्रमयी शैली में किया है। बंगाल की नवयुवतियों के रूप में अपने पैरों में धुंघरू बाँधने का बिम्ब उपस्थित किया है। हवा का झोंका तथा वृक्षों की डाली को झूला के रूप में प्रदर्शित किया है । आकाश में हंसों का झुण्ड अनुपम सौंदर्य लक्षित करना है।


Q 3. कवि किनके बीच अँधेरे में होने की बात करता है ? आशय स्पष्ट करें।

उत्तर :- संध्याकाल जब ब्रह्मांड में अंधेरा का वातावरण उपस्थित होने लगता है उस समय सारस के झुंड अपने घोंसलों की ओर लौटते हैं तो उनकी सुन्दरता मन को मोह लेती है। यह सुन्दरतम दृश्य कवि को भाता है और इस मनोरम छवि को . वह अगले जन्म में भी देखते रहने की बात कहता है।


Q 4. कविता की चित्रात्मकता पर प्रकाश डालिए।

उत्तर :- प्रस्तुत कविता की भाषाशैली भी चित्रमयी हो गयी है, प्राकृतिक वर्णन में कहीं-कहीं अनायास ही चित्रात्मकता का प्रभाव भी है । खेतों में हरे-भरे लहलहाते धान, कटहल की छाया, हवा के चलने से झूमती हुई वृक्षों की टहनियाँ, झूले के चित्र की रूपरेखा चित्रित है। आकाश में उड़ते हुए उल्लू और संध्याकालीन लौटते हुए सारस के झुंड के चित्र हमारे मन को आकर्षित कर लेते हैं।


Q 5. कवि अगले जीवन में क्या-क्या बनने की संभावना व्यक्त करता है, और क्यों ?

उत्तर :- कवि को अपनी मातृभूमि प्रेम में विह्वल होकर चिड़ियाँ; कौवा, हंस, उल्लू, सारस बनकर पुनः बंगाल की धरती पर अवतरित होना चाहते हैं।


Q 6. कवि किस तरह के बंगाल में एक दिन लौटकर आने की बात करता है ?

उत्तर :- बंगाल के घास के मैदान, कपास के पेड़, वनों में पक्षियों की चहचहाहट एवं सारस की शोभा अनुपम छवि निर्मित करते हैं। बंगाल की इस अनुपम, सुशोभित एवं रमणीय धरती पर कवि पुनर्जन्म लेने की बात करते हैं।


Q 7. ‘लौटकर आऊँगा फिर’ कविता के शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।

उत्तर :- यहाँ उद्देश्य के आधार पर शीर्षक रखा गया है। कवि की उत्कट इच्छा मातृभूमि पर पुनर्जन्म की है। इससे कवि के हृदय में मातृभूमि के प्रति प्रेम दिखाई पड़ता है। शीर्षक कविता के चतुर्दिक घूमती है। शीर्षक को केन्द्र में रखकर ही … कविता की रचना हुई है । अतः, इन तथ्यों के आधार पर शीर्षक पूर्ण सार्थक है।


Q 8. ‘जीवनानंद दास द्वारा रचित “लौटकर आऊँगा फिर’ शीर्षक कविता का सारांश अपने शब्दों में लिखें।

उत्तर :- ‘लौटक र आऊँगा फिर’ शीर्षक कविता राष्ट्रीय चेतना की कविता है जिसमें कवि का अपनी मातृभूमि तथा अपने देश की प्रकृति के प्रति उत्कट-प्रेम अभिव्यक्त हुआ है। कवि अपने नश्वर जीवन के बाद पुन: अपनी मातृभूमि बंगाल में आने की लालसा रखता है। वह मरने के बाद किसी भी रूप में अपनी मातृभूमि से जुड़ना चाहता है।
कवि कहता है कि मैं बहती नदी के किनारे फैले धान के खेतोंवाले क्षेत्र, बंगाल में एक दिन अवश्य लौटकर आऊँगा। हो सकता है तब मैं मनुष्य न होऊँ, अबाबील पक्षी होऊँ या कौंवा। उस भोर में मैं बंगाल लौटकर आना चाहता हूँ जो भोर धान की नयी फसल पर कुहारे के पालने पर कटहल की छाया तक उल्लास-भरा पेंगे मारता होगा। हो सकता है कि मैं किसी किशोरी का हंस बनकर पैरों में लाल धुंघरन बाँधे हरी घास की सुगंध से परिपूर्ण वातावरण में दिन-दिन भर पानी में तैरता रहूँ। मुझे बंगाल की नदियाँ बुर लाएँगी, मैं दौड़ा चला आऊँगा; मुझे बंगाल के हरे-भरे मैदान बुलाएँगे, मैं शीघ्र आ जाऊँगा। नदी की संगीतमय चंचल लहरों से धोए गए सजल किनारों पर आकर मुझे कितनी खुशी होगी।
कवि कहता है कि मैं उसी बंगाल में लौटकर आना चाहता हूँ जहाँ शाम में उल्ल हवा के साथ मौज में उड़ते हैं या कपास के पौधे पर बैठकर मस्ती में बोलते हैं। मैं वहाँ आना चाहता हूँ जहाँ रूपसा के गंदले पानी में फटेपाल सी नाव लिए कोई लड़का जाता है; जहाँ रंगीन। बादलों के बीच सारस अँधेरे में अपने आश्रम की ओर तेजी से उडते जाते हैं। मैं चाहता हूँ कि मैं भी उन सारसों के बीच होऊँ। ऊन सारसों के बीच मुझे कितना आनंद मिलेगा।


Q 9. व्याख्या करें–

“खेत हैं जहाँ धान के, बहती नदी
के किनारे फिर आऊँगा लौट कर
एक दिन – बंगाल में;”

उत्तर :- प्रस्तुत व्याख्येय पंक्तियाँ हमारी हिन्दी पाठ्य-पुस्तक के ‘लौटकर आऊँगा फिर’ शीर्षक से उद्धत हैं। इस अंश से पता चलता है कि कवि अगले जन्म में भी अपनी मातृभूमि बंगाल में ही जन्म लेना चाहता है।
प्रस्तुत पद्यांश में कवि की मातृभूमि के प्रति प्रेम दिखाई पड़ता है। कवि ने बंगाल के प्राकृतिक सौंदर्य के साथ वहाँ के खेतों में उगने वाली धान की फसलों का मनोहर चित्र खींचा है। कवि’ कहता है कि जिस बंगाल के खेतों में लहलहाती हुई धान की फसलें हैं वहाँ मैं फिर लौटकर आना चाहता हूँ। जहाँ कल-कल करती हुई नदी की धारा अनायास ही लोगों को आकर्षित कर लेती है वहाँ ही मैं जन्म लेना चाहता हूँ। यहाँ स्पष्ट है कि कवि अपनी भावना को स्वछंद स्वरूप प्रदान करता है।


Q 10. व्याख्या करें –

“बनकर शायद हंस मैं किसी किशोरी का;
धुंधरू लाल पैरों में;
तैरता रहूँगा बस दिन-दिन भर पानी में
गंध जहाँ होगी ही भरी, घास की।”

उत्तर :- प्रस्तुत अवतरण बांग्ला माहित्य के प्रख्यात कवि जीवनानंद दास द्वारा रचित “लौटकर आऊँगा फिर” कविता । से उद्धृत है। इस अंश में कवि बंगाल की भूमि पर बार-बार जन्म लेने की उत्कट इच्छा को अभिव्यक्त करता है।
यहाँ कवि बंगाल में एक दिन लौटकर आने की बात कहता है। वह अगले जन्म में भी अपनी मातृभूमि बंगाल में ही जन्म लेने का विचार प्रकट करता है। वह
हंस. किशोरी और घुघरू की बिम्ब-शैली में अपने-आपको उपस्थित करना कहता है कि जहाँ की किशोरियाँ पैरों में घुघरू बाँधकर हंस के समान मधा में अपनी नाच से लोगों को आकर्षित करती हैं, वही स्वरूप मैं भी धारण करना चाहता हूँ। यहाँ तक कि बंगाल की नदियों में तैरने के एक अलग आनंद की अनभति मिलती है। यहाँ की क्यारियों में उगने वाली घास की गंध कितनी मनमोहक होती है यह तो बंगप्रांतीय ही समझ सकते हैं । इस प्रकार, कवि पर्ण अपनत्व की भावना में प्रवाहित होकर हार्दिक इच्छा को प्रकट किया गया है।

मेरे बिना तुम प्रभु ( Class 10th Hindi ) Mere Bina Tum Prabhu Question Answer Bihar Board Matric Exam 2022


Q 1. “देवता मिलेंगे खेतों में खलिहानों में” पंक्ति के माध्यम से कवि किस देवता की बात करते हैं और क्यों ?

उत्तर :-प्रश्नोक्त पंक्ति के माध्यम से कवि जनतारूपी देवता की बात करते हैं, क्योंकि कवि की दृष्टि में कर्म करता हुआ परिश्रमी व्यक्ति ही देवतास्वरूप है।
मंदिरों-मठों में तो केवल मूर्तियाँ रहती हैं वास्तविक देवता वे हैं जो अपने कई परिश्रम से समाज को सुख-समृद्धि उपलब्ध कराते हैं।


Q 2. शानदार लबादा किसका गिर जाएगा, और क्यों ?

उत्तर :- कवि के अनुसार भगवत्-महिमा भक्त की आस्था में निहित होता है। भक्त, भगवान का दृढाधार होता है लेकिन जब भक्तरूपी आधार नहीं होगा तो स्वाभाविक है कि भगवान की पहचान भी मिट जाएगी । भगवान का लबादा अथवा चोगा गिर जाएगा।


Q 3. कवि किसको कैसा सुख देता था ?

उत्तर :- कवि भगवान की कृपादृष्टि की शय्या है । कविः के नरम कपोलों पर जब भगवान की कृपादृष्टि विश्राम लेती है, तब भगवान को सुख मिलता है, आनंद मिलता है । अर्थात् भक्त भगवान का कृपापात्र होता है और भक्तरूपी पात्र से भगवान भी सुखी होते हैं।


Q 4. कविरेनर मारिया रिल्के ने अपने को जलपात्र और मदिरा क्यों कहता है ?

उत्तर :- कवि अपने को भगवान का भक्त मानता है। भक्त की महत्ता को स्पष्ट करते हुए कवि ने भक्त को जलपात्र और मदिरा कहा है क्योंकि जलपात्र में संग्रहित होकर भगवान अपनी अस्मिता प्राप्त करता है । इसी तरह भक्ति-रस के निकट आकर भगवान इससे आह्लादित हो जाते हैं।


Q 5. कवि को किस बात की आशंका है ? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर :- कवि को आशंका है कि जब ईश्वरीय सत्ता की अनुभूति करानेवाला प्रतीक आधार या भक्त नहीं होगा तब ईश्वर का पहचान किस रूप में होगा? प्राकृतिक छवि, मानव की हृदय का प्रेम, दया, भगवद् स्वरूप है। ये सब नहीं होगा, तब उस परमात्मा का आश्रय क्या होगा, मानव किस रूप में ईश्वर को जान सकेगा इस को लेकर कवि आशंकित है।


Q 6. कविता के आधार पर भक्त और भगवान के बीच के संबंध पर प्रकाश डालिए।

उत्तर :- प्रस्तुत कविता में कहा गया है कि बिना भक्त के भगवान भी एकाकी और निरुपाय हैं। उनकी भगवत्ता भी भक्त की सत्ता पर ही निर्भर करती है। व्यक्ति और विराट सत्य एक-दूसरे पर निर्भर हैं।


Q 7. मनुष्य के नश्वर जीवन की महिमा और गौरव का यह कविता कैसे बखान करती है ? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर :- इस कविता में कहा गया है कि मानव के अस्तित्व में ही ईश्वर का अस्तित्व है। मानवीय जीवन में ईश्वरीय अंश होता है। परमात्मा की अदृश्यतां को जीवात्मा दृश्य करता है । ईश्वर की झलक जीव के माध्यम से देखी जाती है।


Q 8. कविता किसके द्वारा किसे संबोधित है ? आप क्या सोचते हैं ?

उत्तर :- कविता में कवि भक्त के रूप में भगवान को सम्बोधित करता है । इसमें भक्त अपने को भगवान का आश्रय, गृह स्वीकारता है। अपने में भगवान की छवि को देखता है और कहता है कि हे भगवान ! मैं भी तुम्हारे लिए उतना ही महत्त्वपूर्ण हँ जितना तुम मेरे लिए । कवि के इस विचार की हम पुष्टि करते हैं।


Q 9. कवि रेनर मारिया रिल्के रचित कविता ‘मेरे बिना तुम प्रभु’ का सारांश अपने शब्दों में प्रस्तुत करें।

उत्तर :- भक्त कवि रिल्के अपने प्रभु से करता है-प्रभु, जब मेरा अस्तित्व ही नहीं रहेगा, तब तुम क्या करोगे? मैं ही तुम्हारा जलपात्र हूँ, मैं ही तुम्हारी मदिरा हूँ। जब जलपात्र टूटकर बिखर जाएगा और मदिरा सूख जाएगी या स्वादहीन हो जाएगी तब प्रभु तुम क्या करोगे ?
कवि अपने प्रभु से कहता है कि मैं तुम्हारा वेश हूँ, तुम्हारी वृत्ति हूँ। मैं ही तुम्हारे होने का कारण हूँ। तुम मुझे खोकर अपना अर्थ खो बैठोगे। मेरे अभाव में तुम गृहविहीन हो जाओगे। तब तुम निर्वासित-सा. अपना जीवन बिताओगे। तब तुम्हारा स्वागत कौन करेगा? प्रभु मैं तुम्हारे चरणों की पादुका हूँ। मेरे बिना तुम्हारे चरणों में छाले पड़ जाएँगे; तुम्हारे पैर लहूलुहान हो जाएँगे; तुम्हारे पैर मेरे बिना कहीं भ्रांत दिशा में भटक जाएँगे।
कवि अपने आराध्य से कहता कि जब मेरा अस्तित्व ही नहीं रहेगा, तब तुम्हारा शानदार लबादा गिर जाएगा। तुम्हारी सारी शान मेरे होने पर ही निर्भर है। मैं नहीं रहूँगा तो तुम्हारी कृपा दृष्टि को सुख कहाँ से नसीब होगा? दूर की चट्टानों की ठंढी गाद में सूर्यास्त के रंगों में घुलने का सुख तुम्हें मेरे नहीं रहने पर कैसे प्राप्त होगा? कवि अपनी आशंका व्यक्त करता हआ कहता है कि मेरे बिना प्रभु शायद ही 30 ही कर सकें।


Q 10. आशय स्पष्ट कीजिए :

“मैं तुम्हारा वेश हूँ, तुम्हारी वृत्ति हूँ
मुझे खोकर तुम अपना अर्थ खो बैठोगे ?”

उत्तर :- प्रस्तत पद्यांश में कवि ने भक्त को भगवान की अस्मिता माना है। भगवान का वास्तविक स्वरूप भक्त में है। भक्त भगवान का सबकुछ है। भगवान का रूप, वेश, रंग, कार्य सब भक्त में निहित है। भक्त के माध्यम से ही भगवान को जाना जा सकता है, उनके अस्तित्व की अनुभूति की जा सकती है। कवि कहता है कि हे भगवन, मेरा अस्तित्व ही तुम्हारी पहचान है। मैं नहीं रहूँगा तो तुम्हारी पहचान भी नहीं होगी, अर्थात् भक्त से अलग रहकर, भक्त को खोकर भगवान भी अपना अर्थ, अपना मतलब, अपनी पहचान खो देंगे। भक्त के बिना भगवान की कल्पना नहीं ही की जा सकती।


Q 11. कविता के आधार पर भक्त और भगवान के बीच के संबंध पर प्रकाश डालिए।

उत्तर :- प्रस्तुत कविता में कहा गया है कि बिना भक्त के भगवान भी एकाकी. और निरुपाय हैं। उनकी भगवत्ता भी भक्त की सत्ता पर ही निर्भर करती है। व्यक्ति और विराट सत्य एक-दूसरे पर निर्भर हैं। भगवान जल हैं तो भक्त जलपात्र है। भगवान के लिए भक्त मदिरा है। बिना भक्त के भगवान रह ही नहीं सकते। भक्त ही भगवान का सबकुछ हैं और भक्त के लिए भगवान सबकुछ हैं। ब्रह्म को साकार करनेवाला जीव होता है और जीव जब ब्रह्ममय हो जाता है तब वह परमानंद में डूब जाता है। भक्त की भक्ति को पाकर परमात्मा आनंदित होता है और परमात्मा को प्राप्त करके भक्त परमानंद को प्राप्त करता है। यही अन्योन्याश्रय संबंध भक्त और भगवान में है।

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